Wednesday, June 27, 2012

पटवा वैश्य-PATWA VAISHYA

The Patwa are a Hindu Vaishya community, found mainly in North India, who are traditional weavers and jewellery business and thread workers.


History

According to the traditions of the Patwa, they descend from a deota (a Hindu god). The Patwa have many sub-groups, the Deovanshi,Deval, Raghuvanshi and Kanaujia. They fall under vaish (Baniya) category. The Patwa are an endogamous community, and follow the principle of gotra exogamy.Maheshvari is also patwa falled in baniya category They are Hindu, and worship the goddess Bhagwati. Like other Hindu artisan castes, the Patwa have a traditional caste council, which is involved in settling issues of divorce, minor disputes and cases of adultery.

Present Circumstances 

The Patwa are involved in selling women's decorative articles like earrings, necklaces and cosmetics. They also deal in small household items, such as hand fans made of palm. The community was traditionally associated with threading of beads and binding together of silver and gold occupation, while others have expanded into other businesses. They are found ALL OVER INDIA, mainly in delhi, M.P,in madhya predesh patwa and lakhera is also not same lakhera is a other cast they not belong to patwa cast. Maharastra, Uttar Pradesh, in the districts of Bareilly, Badaun, Lucknow, Gorakhpur, Hardoi, Jalaun, Shahjahanpur, Sitapur, Lakhimpur-kheri, Lucknow, Jhansi and Lalitpur. a all india patwa mahasabha is also work for patwa samaj.



In Bihar, the community is sub-divided as Patwa and Tantu Patwa. Tantu patwa is another caste they do not belong to Patwa caste. The Patwas are mainly weavers and braid makers. The Tantu Patwa have three sub-groups, the Gouria, Rewar and Jurihar. The Tantu patwa are found mainly in the districts of Nalanda, Gaya, Bhagalpur, Nawada and Patna districts. There main gotras include the Gorahia, Chero, Ghatwar, Chakata, Supait, Bhor, Pancohia, Dargohi, Laheda and Rankut and the patwa are found all over Bihar. The Patwa of Bihar are now mainly power loom operators, while others have expanded into other businesses. They are a fairly successful community, and many have taken to modern education. The Patwa of Bihar have a state wide caste association, the Patwa Jati Sudhar Samiti.

साभार : सुरेश चन्द्र पटवा जी. 

Monday, June 25, 2012

कर्मा माता की जीवन गाथा-MAA KARMA


झांसी की पावन धरती में आज लगभग 1000 वर्ष पहले, बहुत ही सम्पन्न तैलकार रामशाह के यहां सम्वत् 1073 के चैत्र कृष्ण पक्ष 11 को एक सुकन्या ने जन्म लिया। नामकरण की शुभ बेला में पिता रामशाह ने अपना निर्णय सुनाया कि मेरे सत्कार्यों से मुझे बेटी मिली है, इसलिए मैं उनका नाम कर्माबाई रखूंगा।  चंद्रमा की सोलह कलाओं की तरह कर्मा बाई उम्र की सीढ़ियां पार कर गई। परिवार से धार्मिक संस्कार तो मिला ही था, इसलिए बचपन से भगवान श्रीकृष्ण के भजन-पूजन आराधना में ही विशेष आनंद मिलता था।
समय के साथ नरवर के एक समृध्द तैलकार के परिवार में कर्माबाई की शादी हुई। पति महोदय के अत्यधिक आमोद प्रियता से किंचित कर्माबाई दुखी रहती थी, परंतु पति व्यवहार को शालीनतापूर्वक निभाते हुए यही कोशिश कर रही थी कि पति महोदय भी ईश्वर चिंतन की ओर आकृष्ट हो जाए। एक दिन पूजा-पाठ से रुष्ट होकर पति महोदय ने पूछा, मैं साफ-साफ कहना चाहता हूं, तुम्हें किससे सुख मिलता है, पति सेवा में या ईश्वर सेवा में। बड़े ही शांति स्वर में कर्माबाई ने कहा- मुझे वही कार्य करने में सुख मिलता है, जिसमें आप प्रसन्न रहें। यही पत्नी का धर्म है। इस प्रकार अपने शांत, धार्मिक प्रवृत्ति, पत्निव्रता धर्म से अपने पति के हृदय में भगवान के प्रति अनुराग पैदा करने में सफल रही। समय के साथ सुखी जीवन में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
इसी समय कर्मा माता की परीक्षा की दूसरी घड़ी आई। नरवर के नरेश के प्रिय सवारी हाथी को असाध्य खुजली का रोग हो गया। बड़े-बड़े राजवैद्यों की नाड़ी ठंडी हो गई। इसी बीच किसी दुष्ट ने राजा को सुझाव दिया कि कुण्डभर तेल में हाथी को नहलाया जाए तो हाथी पूर्णरूप से ठीक हो जाएगा। फिर क्या था, राजा का आदेश तुरंत प्रसारित किया गया। महीना भर कुण्ड भरा न जा सका। नरवर के जागरूक सामाजिक नेता होने के कारण, पति महोदय का चिंतित होना स्वाभाविक था। पति को चिंतित एवं कारण जानकर कर्मा माता भी चिंतित हो गई।


सारे तैलिक समाज की इात को बचाने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण को अंतरात्मा की पूरी आवाज लगा दी। सचमुच ही भगवान की लीला से कुण्ड भर गया, सारा आकाश भक्त कर्मा की जय-जयकारों से गूंजने लगा। उसी समय भक्त कर्मा ने पतिदेव से निवेदन किया कि अब हम इस नर निशाचर राजा के राज में नहीं रहेंगे और सारा तैलिक वैश्य समाज, नरवर से झांसी चला गया। आज भी नरवर में एक भी तैलिक नहीं मिलेगा, परंतु झांसी में हजारों तैलिक परिवार मिलेंगे। समय चक्र से कोई नहीं बचा है, अचानक अस्वस्थता से पति का निधन हो गया, पति के चिता के साथ सती होने का संकल्प कर लिया। इसी समय आकाशवाणी हुई। यह ठीक नहीं है, बेटी तुम्हारे गर्भ में एक शिशु पल रहा है, समय का इंतजार करो मैं तुम्हें जगन्नाथपुरी में दर्शन दूंगा। समय के साथ घाव भी भर जाते हैं, कुछ समय बाद दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तीन चार वर्ष बीतते-बीतते बार-बार मन कहता था, मुझे भगवान के दर्शन कब होंगे। निदान एक भयानक रात के सन्नाटे में भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ खिचड़ी लेकर पुरी के लिए निकल पड़ी। चलते-चलते थककर एक छांव में विश्राम करने लग गई, आंख लग गई, आंख खुली तो माता कर्मा अपने आपको जगन्नाथपुरी में पाई।


आश्चर्य से खुशी में भक्तिरस में डूबी, खिचड़ी का प्रथम भोग लगाने सीढ़ियों की ओर बढ़ी। उसी समय पूजा हो रही थी। पुजारी ने माता कर्मा को धकेल दिया इससे माता कर्मा गिर पड़ी। रोते हुए माता कर्मा पुकारती है- हे! जगदीश आप पुजारियों की मरजी से कैद क्यों है? आपको सुनहरे कुर्सी ही पसंद है, क्यों? तुरंत आकाशवाणी हुई, कर्मा मैं प्रेम का भूखा हूं। मैं मंदिर से निकल कर आ रहा हूं। भगवान श्रीकृष्ण कर्मा के पास आए और बोले- कर्मादेवी, मुझे खिचड़ी खिलाइए। माता कर्मा भाव विभोर होकर खिचड़ी खिलाने लगी भक्त माता को भगवान ने कहा- हम तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न हो गए हैं कुछ भी वरदान मांगो। माता ने कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप मेरी खिचड़ी का भोग लगाया करें। मैं बहुत थक चुकी हूं मुझे आपके चरणों में जगह दे दीजिए। इस प्रकार भगवान के चरणों में गिरकर परमधाम को प्राप्त हो गई। तब से भगवान जगन्नाथ को नित्य प्रतिदिन खिचड़ी का भोग आज तक लग रहा है। वही खिचड़ी जो महाप्रसाद कहलाती है।

Friday, June 22, 2012

माहेश्वरी इतिहास, उत्पत्ति-MAHESHWARI HISTORY & ORIGIN

आज माहेश्वरी समाज में बहुत से लोग है जो नहीं जानते की माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई……? हम सभी को पता होना चाहिए की माहेश्वरी का इतिहास क्या हैं…..? क्यों माहेश्वरीयों में विवाह परंपरा को बहुत महत्वपूर्ण विधि माना जाता है? क्यों विवाह की विधि में लड़का मोड़ और कट्यार धारण करता है? क्यों माहेश्वरियों मैं महेश नवमी को विवाह की सर्वश्रेष्ठ तिथि मानते है? 


माहेश्वरी वंशउत्पत्ति : 

खंडेला नगर में सूर्यवंशी राजाओं में चौव्हान जाती का राजा खड्गल सेन राज्य करता था. इसके राज्य में सारी प्रजा सुख और शांती से रहती थी. राजा धर्मावतार और प्रजाप्रेमी था, परन्तु राजा का कोई पुत्र नहीं था. राजा ने मंत्रियो से परामर्श कर पुत्रेस्ठी यज्ञ कराया. ऋषियों ने आशीवाद दिया और साथ-साथ यह भी कहा की तुम्हारा पुत्र बहुत पराक्रमी और चक्रवर्ती होगा पर उसे 16 साल की उम्र तक उत्तर दिशा की ओर न जाने देना. राजा ने पुत्र जन्म उत्सव बहुत ही हर्ष उल्लास से मनाया. ज्योतिषियों ने उसका नाम सुजानसेन रखा. सुजानसेन बहुत ही प्रखर बुद्धि का व समझदार निकला, थोड़े ही समय में वह विद्या और शस्त्र विद्या में आगे बढ़ने लगा. देवयोग से एक जैन मुनि खड़ेला नगर आए और सुजान कुवर ने जैन धर्म की शिक्षा लेकर उसका प्रचार प्रसार शुरू कर दिया. शिव व वैष्णव मंदिर तुडवा कर जैन मंदिर बनवाए, इससे सारे राज्य में जैन धर्मं का बोलबाला हो गया.

एक दिन राजकुवर 72 उमरावो को लेकर शिकार करने जंगल में उत्तर दिशा की और ही गया. सूर्य कुंड के पास जाकर देखा की वहाँ 6 ऋषि यज्ञ कर रहे थे ,वेद ध्वनि बोल रहे थे ,यह देख वह आग बबुला हो गया और क्रोधित होकर बोला इस दिशा में मुनि यज्ञ करते हे इसलिए पिताजी मुझे इधर आने से रोकते थे. उसी समय उमरावों को आदेश दिया की यज्ञ विध्वंस कर दो और यज्ञ सामग्री नष्ट कर दो.

इससे ऋषि भी क्रोध में आ गए और उन्होंने श्राप दिया की सब पत्थर बन जाओ l श्राप देते ही राजकुवर सहित 72 उमराव पत्थर बन गए. जब यह समाचार राजा खड्गल सेन ने सुना तो अपने प्राण तज दिए. राजा के साथ 16 रानिया सती हुई.

राजकुवर की कुवरानी चन्द्रावती उमरावों की स्त्रियों को साथ लेकर ऋषियो की शरण में गई और श्राप वापस लेने की विनती की तब ऋषियो ने उन्हें बताया की हम श्राप दे चुके हे तुम भगवान गोरीशंकर की आराधना करो. यहाँ निकट ही एक गुफा है जहा जाकर भगवान महेश का अष्टाक्षर मंत्र का जाप करो. भगवान की कृपा से वह पुनः शुद्ध बुद्धि व चेतन्य हो जायेंगे. राजकुवरानी सारी स्त्रियों सहित गुफा में गई और तपस्या में लीन हो गई.

भगवान महेशजी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वहा आये, पार्वती जी ने इन जडत्व मूर्तियों के बारे में भगवान से चर्चा आरम्भ की तो राजकुवरानी ने आकर पार्वतीजी के चरणों में प्रणाम किया. पार्वतीजी ने आशीर्वाद दिया की सौभाग्यवती हो, इस पर राजकुवरानी ने कहा हमारे पति तो ऋषियों के श्राप से पत्थरवत हो गए है अतः आप इनका श्राप मोचन करो. पार्वतीजी ने भगवान महेशजी से प्रार्थना की और फिर भगवान महेशजी ने उन्हें चेतन में ला दिया. चेतन अवस्था में आते ही उन्होंने पार्वती-महेश को घेर लिया. इसपर भगवान महेश ने कहा अपनी शक्ति पर गर्व मत करो और छत्रियत्व छोड़ कर वैश्य वर्ण धारण करो. 72 उमरावों ने इसे स्वीकार किया पर उनके हाथो से हथिहार नहीं छुटे. इस पर भगवान महेशजी ने कहा की सूर्यकुंड में स्नान करो ऐसा करते ही उनके हथिहार पानी में गल गए उसी दिन से लोहा गल (लोहागर) हो गया (लोहागर- सीकर के पास, राजस्थान). सभी स्नान कर भगवान महेश की प्रार्थ्रना करने लगे. 

फिर भगवान महेशजी ने कहा की आज से तुम्हारे वंशपर (धर्मपर) हमारी छाप रहेगी यानि तुम वंश (धर्म) से “माहेश्वरी’’ और वर्ण से वैश्य कहलाओगे और अब तुम अपने जीवनयापन (उदर निर्वाह) के लिए व्यापार करो तुम इसमें खूब फुलोगे-फलोगे. 

अब राजकुवर और उमरावों ने स्त्रियों (पत्नियोंको) को स्वीकार करनेसे मना किया, कहा की हम तो धर्म से “माहेश्वरी’’ और वर्ण से वैश्य बन गए है पर ये अभी क्षत्रानिया (राजपुतनियाँ) है. हमारा पुनर्जन्म हो चूका हे, हम इन्हें कैसे स्वीकार करे. तब माता पार्वती ने कहा तुम सभी स्त्री-पुरुष हमारी चार बार परिक्रमा करो जो जिसकी पत्नी है अपने आप गठबंधन हो जायेगा. इसपर राजकुवरानी ने पार्वति से कहा की पहले तो हमारे पति राजपूत-क्षत्रिय थे, हथियारबन्द थे तो हमारी और हमारे मान की रक्षा करते थे अब हमारी और हमारे मान की रक्षा ये कैसे करेंगे तब पार्वति ने सभी को दिव्य कट्यार (कटार) दी और कहाँ की अब आपका पेशा युद्ध करना नहीं बल्कि व्यापार करना है लेकिन अपने स्त्रियों की और मान की रक्षा के लिए 'कट्यार' (कटार) को हमेशा धारण करेंगे. मे शक्ति स्वयं इसमे बिराजमान रहूंगी. तब सब ने महेश-पार्वति की चार बार परिक्रमा की तो जो जिसकी पत्नी है उनका अपने आप गठबंधन हो गया (एक-दो जगह उल्लेख मिलता है की 13 स्त्रियों ने भी कट्यार धारण करके गठबंधन की परिक्रमा की). इस गठबंधन को 'मंगल कारज' कहा गया. [उस दिन से मंगल कारज (विवाह) में बिन्दराजा मोड़ (मान) और कट्यार (कटार) धारण करके, 'महेश - पार्वती' की तस्बीर को विधिपूर्वक स्थापन करके उनकी चार बार परिक्रमा करता है इसे 'बारला फेरा' (बाहर के फेरे) कहा जाता है.) ये बात याद रहे इसलिए चार फेरे बाहर के लिए जाते है. सगाई में लड़की का पिता लडके को मोड़ और कट्यार भेंट देता है इसलिए की ये बात याद रहे - अब मेरे बेटीकी और उसके मान की रक्षा तुम्हे करनी है. जिस दिन महेश-पार्वति ने वरदान दिया उस दिन युधिष्टिर संवत 9 (विक्रम संवत ८) जेष्ट शुक्ल नवमी थी. तभी से माहेश्वरी समाज आज तक “महेश नवमी ’’ का त्यौहार बहुत धूम धाम से मनाता आ रहा है…..]

ऋषियों ने आकर भगवान से अनुग्रह किया की प्रभु इन्होने हमारे यज्ञ को विध्वंस किया और आपने इन्हें श्राप मोचन (श्राप से मुक्त) कर दिया इस पर भगवान महेशजी ने कहा - आजसे आप इनके (माहेश्वरीयोंके) गुरु है. ये तुम्हे गुरु मानेंगे. तुम्हे 'गुरुमहाराज' के नाम से जाना जायेगा. भगवान महेशजी ने कुवरानी चन्द्रावती को भी गुरु पद दिया. इन सबको दायित्व सौपा गया की, वह माहेश्वरियों को सत्य, प्रेम और न्यायके मार्गपर चलनेका मार्गदर्शन करते रहेंगे [माहेश्वरी स्वयं को भगवान महेश-पार्वती की संतान मानते है. माहेश्वरीयों में 'शिवलिंग' स्वरुप में पूजा का विधान नहीं है; माहेश्वरीयों में 'भगवान महेश-पार्वती-गणेशजी' की एकत्रित प्रतिमा / तसबीर के पूजा का विधान (रिवाज/परंपरा) है. कई शतकों तक गुरु मार्गदर्शित व्यवस्था बनी रही. तथ्य बताते है की प्रारंभ में 'गुरुमहाराज' द्वारा बताई गयी नित्य प्रार्थना, वंदना (महेश वंदना), नित्य अन्नदान, करसेवा, गो-ग्रास आदि नियमोंका समाज कड़ाई से पालन करता था. फिर मध्यकाल में भारत के शासन व्यवस्था में भारी उथल-पुथल तथा बदलाओंका दौर चला. दुर्भाग्यसे जिसका असर माहेश्वरियों की सामाजिक व्यवस्थापर भी पड़ा और जाने-अनजाने में माहेश्वरी अपने गुरूओंको भूलते चले गए. जिससे समाज की बड़ी क्षति हुई है और आज भी हो रही है.].


फिर भगवान महेशजी ने सुजान कुवर को कहा की तुम इनकी वंशावली रखो, ये तुम्हे अपना जागा मानेंगे. तुम इनके वंश की जानकारी रखोंगे, विवाह-संबन्ध जोड़ने में मदत करोगे और ये हर समय, यथा शक्ति द्रव्य देकर तुम्हारी मदत करेंगे. 

जो 72 उमराव थे उनके नाम पर एक-एक जाती बनी जो 72 खाप (गोत्र ) कहलाई. फिर एक-एक खाप में कई नख हो गए जो काम के कारण गाव व बुजुर्गो के नाम बन गए है.

कहा जाता है की आज से लगभग 2500-2600 वर्ष पूर्व (इसवीसन पूर्व 600 साल) 72 खापो के माहेश्वरी मारवाड़ (डीडवाना) राजस्थान में निवास करते थे. इन्ही 72 खापो में से 20 खाप के माहेश्वरी परिवार धकगड़ (गुजरात) में जाकर बस गए. वहा का राजा दयालु, प्रजापालक और व्यापारियों के प्रति सम्मान रखने वाला था. इन्ही गुणों से प्रभावित हो कर और 12 खापो के माहेश्वरी भी वहा आकर बस गए. इस प्रकार 32 खापो के माहेश्वरी धकगड़ (गुजरात) में बस गए और व्यापर करने लगे. तो वे धाकड़ माहेश्वरी के नामसे पहचाने जाने लगे. समय व परिस्थिति के वशीभूत होकर धकगड़ के कुछ माहेश्वरियो को धकगड़ भी छोडना पड़ा और मध्य भारत में आष्टा के पास अवन्तिपुर बडोदिया ग्राम में विक्रम संवत 1200 के आस-पास आज से लगभग 810 वर्ष पूर्व, आकर बस गए. वहाँ उनके द्वारा निर्मित भगवान महेशजी का मंदिर जिसका निर्माण संवत 1262 में हुआ जो आज भी विद्यमान है एवं अतीत की यादो को ताज़ा करता है. माहेश्वरियो के 72 गोत्र में से 15 खाप (गोत्र ) के माहेश्वरी परिवार अलग होकर ग्राम काकरोली राजिस्थान में बस गए तो वे काकड़ माहेश्वरी के नामसे पहचाने जाने लगे (इन्होने घर त्याग करने के पहले संकल्प किया की वे हाथी दांत का चुडा व मोतीचूर की चुन्धरी काम में नहीं लावेंगे अतः आज भी काकड़ वाल्या माहेश्वरी मंगल कारज (विवाह) में इन चीजो का व्यवहार नहीं करते है.) पुनः माहेश्वरी मध्य भारत और भारत के कई स्थानों पर जाकर व्यवसाय करने लगे.........

जन्म-मरण विहीन एक ईश्वर (महेश) में आस्था और मानव मात्र के कल्याण की कामना माहेश्वरी धर्म के प्रमुख सिद्धान्त हैं. माहेश्वरी समाज सत्य, प्रेम और न्याय के पथ पर चलता है. कर्म करना, बांट कर खाना और प्रभु का नाम जाप करना इसके आधार हैं. माहेश्वरी अपने धर्माचरण का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते है तथा वह जिस स्थान / प्रदेश में रहते है वहां की स्थानिक संस्कृति का पूरा आदर-सन्मान करते है, इस बात का ध्यान रखते है; यह माहेश्वरी समाज की विशेष बात है. आज तकरीबन भारत के हर राज्य, हर शहर में माहेश्वरीज बसे हुए है और अपने अच्छे व्यवहार के लिए पहचाने जाते है.



माहेश्वरी वंशउत्पत्ति




Mahesh parivar (Bhagvan Mahesh ji, sarvakulmata Aadishakti maa Bhavani & sukhakarta-dukhharta Ganesh ji)

बनियागिरी और बंजारापन



किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।
त्तर वैदिक काल में पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, औरपणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था।

त्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणिजैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ। पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है।पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है। आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है। वैदिक साहित्य में पणियों को पशु चोर बताया गया है। गौरतलब है कि आर्य पशुपालक समाज के थे जहां पशु ही सम्पत्ति थे। सामान्य व्यापारी जिस तरह तोलने में गड़बड़ी कर लाभ कमाना चाहता है, संभव है प्राचीनकाल में वस्तु-विनिमय के दौरान पणियों द्वारा आर्यजनों से पशुओं की ऐसी ही ठगी सामान्य बात रही हो। इसीलिए वैदिक संदर्भों में पणियों को पशु चोर बताया गया हो। कृषि-संस्कृति से जुड़े आर्यों को पणियों का वाणिज्यजीवी होना, ब्याज की धन राशि लेना और लाभ कमाना निम्नकर्म लगता था और वे उन्हें अपने से हेय समझते थे।

हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है। वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है। इससे ही बना है वाणिज्य औरवणिक जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है। पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा-वणिक>बणिक>बनिअ>बनिया। इससे हिन्दी में कुछ नए शब्द रूप भी सामने आए मसलन वणिकवृत्ति के लिए बनियागीरी या बनियापन। इन शब्दों में मुहावरों की अर्थवत्ता समायी है और सामान्य कारोबारी प्रवृत्ति का संकेत न होकर इसमें ज़रूरत से ज्यादा हिसाब-किताब करना , नापतौल की वृत्ति अथवा कंजूसी भी शामिल है।

यायावरी, डगर-डगर घूमना, आवारगी आदि भावों को प्रकट करने के लिए हिन्दी-उर्दू में बंजारा शब्द है। इसकी रिश्तेदारी भी पण् से है। पण् से बना वाणिज्य अर्थात व्यापार। इस तरह व्यापार करनेवाले के अर्थ में वणिक के अलावा एक नया शब्द और बना वाणिज्यकारक इस शब्द के बंजारा में ढलने का क्रम कुछ यूं रहा -वाणिज्यकारक > वाणिजारक > वाणिजारा > बणिजारा > बंजारा। प्राचीनकाल में इन वाणिज्यकारकों की भूमिका वणिको से भिन्न थी। वणिक श्रेष्ठिवर्ग में आते थे और वाणिज्यकारक मूलत फुटकर या खेरची कारोबारी थे। रिटेलर की तरह। वाणिज्यकारक भी घूम घूम कर लोगों को उनकी ज़रूरतों का सामान उपलब्ध कराते थे। स्वभाव की भटकन को व्यक्त करने के लिए बंजारापन जैसा शब्द हिन्दी को इसी घुमक्कड़ी वृत्ति ने दिया है। यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में फेरीवालों के रूप में प्रचलित है। सामाजिक परिवर्तनों के तहत धीरे धीरे वाणिज्यकारकों की हैसियत में बदलाव आया। क्रय-विक्रय से हटकर उन्होंने कुछ विशिष्ट कुटीर-कर्मों और कलाओं को अपनाया मगर शैली वही रही घुमक्कड़ी की। इस रूप में बंजारा शब्द को जातिसूचक दर्जा मिल गया। ये बंजारे घूम-घूम कर जादूगरी, नट-नटी के तमाशे(नट-बंजारा), जड़ी-बूटी, झाड-फूंक आदि के कामों लग गए। कहीं कहीं रोज़गार की उपलब्धता में कमी के चलते बंजारों का नैतिक पतन भी हुआ। कुल मिलाकर किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

पणिक से वणिक और बनिया बनते-बनते हिन्दी को कुछ नए शब्द भी मिले जैसे बनियागीरी या बनियापन।
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि, पणम, फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर कोपणिक्कर भी लिखा जाता है। प्रख्यात विद्वान डॉ सम्पूर्णानंद पणियों(फिनीशी/प्यूनिक) को पूर्वी भारत का एक जाति समूह बताते हैं जो बाद में पश्चिम के सागर तट से होता हुआ ईरान तक फैल गया। हड़प्पा और सिन्धु घाटी की सभ्यता पर गौर करें तो यह धारणा ज्यादा सटीक लगती है क्योंकि इस सभ्यता का विस्तार सिन्ध के समुद्रतट से लेकर दक्षिण गुजरात के समुद्र तट तक होने के प्रमाण मिले हैं। डॉ भगवतशरण उपाध्याय भी भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में फिनीशियाई लोगों अर्थात फणियों के भारत भूमि पर बसे होने का उल्लेख करते हैं हालांकि वे ये स्पष्ट संकेत नहीं करते कि ये लोग कहां के मूल निवासी थे। आर्य संस्कृति से पश्चिमी जगत को परिचित कराने का श्रेय फिनिशियों को ही दिया जाता है। ये लोग अपने लंबं-चौड़े व्यापारिक कारवां(सार्थवाह) एशियाई देशों से योरप तक ले जाते थे। वाणिज्यकर्म के साथ ही ये लोग विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति के बीज भी अनायास ही छोड़ आते थे।

जो भी हो, पश्चिमी एशिया में और यूरोप के मूमध्यसागरीय क्षेत्र में किसी ज़माने में फिनिशियों (पणियों) की अनेक बस्तियां थीं। कार्थेज उनका केंद्र बन चुका था। यहां के फिनिशियों के लिए प्यूनिक नाम भी प्रचलित रहा है। रोमन साम्राज्य के साथ सदियों तक इन प्यूनिकों का युद्ध चला और अंततः यह समुदाय इतिहास में अपने उद्गम की कई गुत्थियां और अस्तित्व के स्पष्ट संकेत छोड़ते हुए ईसा से एक सदी पहले तक विलीन हो चुका था। इसके बावजूद इन्हें खोजने का काम पुरातत्ववेत्ता आज भी जारी रखे हुए हैं। जीनोग्राफिक तकनीक के जरिये हाल ही में यह पता चला है कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कई स्थानों पर पर प्राचीन फिनीशियों के कईवंशज विभिन्न समाजों में घुले-मिले हैं। मगर फिनिशियों का भारतीय पणियों से रिश्ता स्थापित करने के लिए इस शोध का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है। फिलहाल तो प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के आधार पर देशी-विदेशी विद्वान भारतीय पणियों, प्रकारांतर से फिनिशियों के रिश्ते स्थापित कर ही चुके हैं। इतिहास-पुरातत्व के साथ प्रामाणिकता का द्वन्द्व हमेशा रहा है और इस क्षेत्र में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता।

हिंसा छोड़ कर्म का संदेश देती है - महेश नवमी

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२० जून यानि ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को महेश नवमी या महेश जयंती का उत्सव माहेश्वरी समाज द्वारा मनाया जाता है। यह उत्सव महेश यानि शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। महेश यानि शंकर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के नवें दिन भगवान शंकर की कृपा से माहेश्वरी समाज की उत्त्पत्ति हुई। 



धर्मग्रंथों के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज पूर्वकाल में क्षत्रिय वंश के थे, शिकार के दौरान वह ऋषियों के शाप से ग्रसित हुए। किंतु इस दिन भगवान शंकर ने उन्हें शाप से मुक्त कर न केवल पूर्वजों की रक्षा की बल्कि इस समाज को अपना नाम भी दिया। इसलिए यह समुदाय माहेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिसमें महेश यानि शंकर और वारि यानि समुदाय या वंश। भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोड़कर वैश्य या व्यापारिक कार्य को अपनाया। इसलिए आज भी माहेश्वरी समाज वैश्य या व्यापारिक समुदाय के रुप में पहचाना जाता है। माहेश्वरी समाज के ७२ उपनामों या गोत्र का संबंध भी इसी प्रसंग से है। 

माहेश्वरी समाज के लिए यह दिन बहुत धार्मिक महत्व का होता है। इस उत्सव की तैयारी करीब तीन दिन पूर्व ही शुरु हो जाती है। जिनमें धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन उमंग और उत्साह के साथ होता है। जय महेश के जयकारों की गूंज के साथ चल समारोह निकाले जाते हैं। महेश नवमी के दिन भगवान शंकर और पार्वती की विशेष आराधना की जाती है। समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन भगवान शंकर और पार्वती के प्रति पूर्ण भक्ति और आस्था प्रगट करता है। 

जगत कल्याण करने वाले भगवान शंकर ने जिस तरह क्षत्रिय राजपूतों को शिकार छोड़कर व्यापार या वैश्य कर्म अपनाने की आज्ञा दी। यानि हिंसा को छोड़कर अहिंसा के साथ कर्म का मार्ग बताया। इससे महेश नवमी का यह उत्सव यही संदेश देता है कि मानव को यथासंभव हर प्रकार की हिंसा का त्याग कर जगत कल्याण, परोपकार और स्वार्थ से परे होकर कर्म करना चाहिए।

साभार : दैनिक भास्कर 

यह है माहेश्वरी समाज के ७२ उप कुल या नाम-MAHESHWARI GOTRA

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हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार शिव कृपा से शापग्रस्त ७२ क्षत्रियों को मिले जीवनदान से माहेश्वरी समाज के साथ ही उसके ७२ उप कुल, गोत्र या नाम की उत्पत्ति भी हुई। वह उपनाम, गोत्र या कुल इस प्रकार है- 

आगीवाल, अगसूर, अजमेरा, असावा, अटल

बाहेती, बिरला, बजाज, बदली, बागरी, बलदेवा, बांदर, बंग, बांगड़, भैय्या, भंडारी, भंसाली, भट्टड़, भट्टानी, भूतरा, भूतड़ा, भूतारिया, बिदाड़ा, बिहानी, बियानी 

चाण्डक, चौखारा, चेचानी, छप्परवाल, चितलंगिया, दाल्या, दलिया, दाद, डागा, दम्मानी, डांगरा, दारक, दरगर, देवपूरा, धूपर, धूत, दूधानी, 

फलोद, गादिया, गट्टानी, गांधी, गिलदा, गोदानी, 

हेडा, हुरकत,ईनानी, 

जाजू, जखोतिया, झंवर, 

काबरा, कचौलिया, काहल्या, कालानी, कलंत्री, कंकानी, करमानी, करवा, कसत, खटोड़, कोठरी, 

लड्ढा, लाहोटी, लखोटिया, लोहिया, 

मालानी, माल, मालपानी, मालू, मंधाना, मंडोवरा, मनियान, मंत्री, मरदा, मारु, मारू, मिमानी, मोडानी, मोहता, मोहाता, मुंदड़ा, 

नागरानी, ननवाधर, नथानी, नवलखाम, नवल या नुवल, नोवल, न्याती

पचीसिया, परतानी, पलोड़, पटवा, पनपालिया, पेडि़वाल, परमाल, फूमरा, राठी, 

साबू, सनवाल, सारड़ा, शाह, सिकाची, सिंघई, सोडानी, सोमानी, सोनी, 

तपरिया, ताओरी, तेला, तेनानी, थिरानी, तोशनीवाल, तोतला, तुवानी, जवर 



साभार : दैनिक भास्कर 

महेश यानि शंकर का समुदाय है माहेश्वरी

पौराणिक कथा अनुसार राजस्थान के खण्डेला राज्य में राजपूत राजा खण्डेलसेन शासन करता था। वह और उसकी दो रानियों सूर्यकुंवर और इंद्र कुंवर की कोई संतान न थी। तब नि:संतान होने से दु:खी राजा को महर्षि याज्ञवल्क्य ने शिव आराधना करने को कहा। शिवकृपा से राजा को पुत्र प्राप्ति हुई। जिसका नाम सुजनसेन रखा गया।

सुजनसेन के बारे में राज पुरोहितों ने भविष्यवाणी की कि यह बहुत शक्तिशाली और चक्रवर्ती होगा। किंतु इसके जीवन में एक छोटी सी घटना दु:ख का कारण बनेगी। किंतु उस घटना का अंत बहुत सुखद होगा।

एक बार राजा सुजनसेन जंगल में शिकार के दौरान अपने ७२ सैनिकों के साथ रास्ता भटक गए और भूख से पीडि़त होने लगे। वह भटकते हुए एक आश्रम के करीब पहुंचे। वहां कुछ ऋषि शिव यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने भूखे और प्यासे होने से आश्रम में जाकर यज्ञ के लिए बने प्रसाद को खा लिया, जल भी पी लिया, यहां तक कि अपने शिकार में उपयोग किए गए गंदे हथियारों को भी उस सरोवर में धो लिया। जिसका जल यज्ञ के लिए उपयोग में लिया जाता था। उनके इस तरह के कार्यों से ऋषियों का यज्ञ और तपस्या भंग हो गई। जिससे ऋषियों ने क्रोधित होकर राजा सुजनसेन और ७२ सैनिकों को पत्थर बन जाने का शाप दिया।

राजा और सैनिकों के घर न लौटने पर उनकी पत्नीयां महर्षि जाबाली के पास गई। महर्षि ने सारी घटना बताई और शाप से मुक्ति के लिए उसी सरोवर के पास जाकर शिव आराधना करने का उपाय बताया। रानी और सैनिकों की शिव आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव और पार्वती प्रगट हुए। उन्होनें राजा और सैनिकों से कहा कि पापकर्मों, शक्ति के गलत उपयोग और देव अपराध के कारण तुम्हारा यह हाल हुआ।

तुम्हारी पत्नियों की आराधना से प्रसन्न होकर मैं तुम सभी को शाप मुक्त कर नया जीवन देता हूं। लेकिन अब से तुम क्षत्रिय धर्म और हिंसक वृत्ति छोड़कर वैश्य धर्म और कर्म से जीवन व्यतीत करोगे। तुम सभी अब मेरे नाम यानि माहेश्वरी नाम से पहचाने जाओगे।

इससे राजा और सैनिक तो वैश्य बन गए। किंतु रानी और सैनिक पत्नी क्षत्रिय ही रहीं। इस धर्म संकट से मुक्ति का उपाय माता पार्वती ने बताया। उन्होंने राजा, रानी और सैनिक पत्नियों से कहा कि वह सभी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ गठबंधन कर मेरे चार फेरे लगाएं। इससे रानी और सैनिकों की पत्नियां भी वैश्य धर्म के योग्य हो जाएंगी। इसलिए आज भी माहेश्वरी समाज के विवाह में चार फेरे लेने की परंपरा है।इस प्रकार शंकर और पार्वती की कृपा से माहेश्वरी समुदाय और उसके ७२ उप कुलों का उत्त्पत्ति युधिष्ठिर संवत के नवें वर्ष में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष के नवें दिन मानी जाती है।


साभार : दैनिक भास्कर

चोरसिया वैश्य समुदाय का इतिहास(CHOURASIA)

चौरसिया प्राचीन भारतीय वेदों से उत्पन्न शब्द है जो मूलतः एक वैदिक शब्द 'chaturashiitah' जो sansakrita में चौरासी उल्लेख से भारत, चौरसिया शब्द संभालते में एक ब्राह्मण समुदाय संदर्भित करता है. प्राचीन भारत के बाद से, यह हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है वहाँ चौरासी Yonis इस ब्रह्मांड में मौजूदा देवताओं के हजारों (नस्लों, प्रकार) हैं. हर प्रजाति है जो पृथ्वी पर मौजूद किसी खास योनि के हैं. बाद में मंच पर और आसान उच्चारण यह चौरसिया '(एक हिंदी बराबर भी चौरासी संदर्भित करता है) के रूप में बदल के लिए

इस शब्द राज्यों के जन्म कि एक बार सभी देव Gans (Devtas, परमेश्वर) नामक जगह पर धरती पर इकट्ठा पीछे एक प्रसिद्ध कहानी के लिए कुछ शुभ रस्म है, और जब वे वापस करने के लिए 'Bakunthya धाम' (स्वर्ग आ रहे थे 'Naumi Sharayan' ) वे सब महसूस कारण पृथ्वी पर अत्यधिक गर्मी जब एक विशेष समुदाय आगे आए और उन्हें Beatle छोड़ देता है. उनके आतिथ्य से प्रभावित की सेवा करके अपनी प्यास quenched को प्यासा, Devtas उन्हें न केवल धन्य बल्कि उन्हें शीर्षक chaturashiitah यानी उपहार देने के द्वारा सम्मानित शुरू कर दिया ' चौरसिया '. के अनुसार Baudhâyanas'rauta-सूत्र है Kashyapa के हैं चौरसिया, कुछ का मानना है कि वे [भार m ाज] के हैं, तो वहाँ Gotras के बारे में कई मान्यताओं रहे हैं.

इस समुदाय के लोगों को हाल के दिनों में व्यवसायों की एक किस्म में काम कर रहे हैं (कुछ भी खुद के रूप में 'वैश्य' यानी व्यापारियों संदर्भित करता है) और उनकी धार्मिक परंपराओं और संस्कृति दैनिक जीवन में एक कारक के कम होते जा रहे हैं.

CHOURASIA का इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मोहिनी विभिन्न देवताओं के बीच Amrut (अमृत) वितरित की. Amrut के शेष के साथ कलश है इन्द्र हाथी «Nagraja» के पास रखा गया था. कलश के अंदर बढ़ते एक अजीब जीव संयंत्र था और देवताओं उन्मादपूर्ण हो गया. विष्णु Dhanvantari करने का आदेश दिया संयंत्र की जांच. वह इस प्रकार अपने उत्तेजक गुणवत्ता की खोज की. तब से, विष्णु को इसकी पत्तियों प्यार और स्नेह का एक संकेत के रूप में, की पेशकश करना शुरू किया. के बाद से, यह कहा जाता है कि पान trine पैदा हुआ था. यह करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ट्रिनिटी के साथ जुड़े होने लगे. सुपारी ब्रह्मा, Tambool (पान) विष्णु और महेश पत्ती के लिए चूने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. एक अन्य कथा के अनुसार, हस्तिनापुर पर 'पांडवों जीत के बाद, वे Tambool के लिए एक उत्कट इच्छा है शुरू किया. एक दूत तत्काल साँपों की रानी के भूमिगत निवास करने के लिए भेजा गया था. रानी, केवल भी खुश उपकृत करने के लिए उसकी छोटी उंगली का चरम अऋगुली की पोर में कटौती और पांडवों के लिए भेजा. अऋगुली की पोर महान समारोह के साथ लगाया गया था और जल्द ही पान संयंत्र अऋगुली की पोर से बाहर हो गया. लता है तब से «Nagveli» के रूप में साँप संयंत्र के लिए भेजा. पत्तियों का समारोह इस मूल और इस अवसर पर साँप की Barais प्रस्ताव भगवान से प्रार्थना स्मारक है.

GOTRAS और उप डाले

* Kashyapa


* भारद्वाज


* शांडिल्य


* ऋषि


* ब्रह्मचारी


* Gaurhar


* चौरसिया


* Barai


* Tamoli


* भगत


* Chaurishi


* चौधरी

उप डाले

निम्नलिखित क्षेत्रीय वरीयताएँ द्वारा चौरसिया उपनाम के पर्यायवाची शब्द हैं:


* चौरसिया (Belarampur, पट्टी, प्रतापगढ़) (उप्र)


* चौरसिया (भारत भर में)


* Chourasia (उत्तर पूर्व भारत के कुछ भाग)


Chaurishi * (उत्तर भारत के पार्ट्स)


जायसवाल (उत्तर भारत) *


भारद्वाज * (भारत भर में)


* कश्यप (उत्तर भारत)


* नाग (उत्तर / पूर्वी भारत)


* भगत (उत्तर / पूर्व भारत)


* Barai (पश्चिम बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश)


* Tamoli (पश्चिम बिहार / पूर्वी उत्तर प्रदेश)


* ऋषि (मध्य भारत)


* ब्रह्मचारी (उत्तर भारत)


* Gaurhar (उत्तर भारत)


* मोदी (उत्तर भारत)


* राउत (बिहार मधुबनी)


* चौधरी (हाजीपुर बिहार)


* मुंशी (धनबाद झारखंड)

साभार : चोरसिया संघ महा कौसल

पुरवाल, पोरवाल समाज का इतिहास-PURWAL,PORWAL

पुरवालों का मूल स्थान अयोध्या के आस–पास का क्षेत्रा है। माना जाता है कि सन् 1700 के आसपास पुरवाल वैश्यों के काफी परिवारों का समूह अपने मूल स्थान को छोड़ कर दिल्ली आया। संचार व यातायात की सुविधाएं नहीं होने, निर्धन व अशिक्षित होने और दिल्ली में व्यवसाय में व्यस्त रहने के कारण उनका अपने मूल स्थान से संपर्क समाप्त हो गया। समय बीतने के साथ–साथ वे दिल्ली के स्थायी निवासी हो गए।


दिल्ली में जहां आज आजाद मार्किट है उस समय इसके बीचों बीच एक नहर हुआ करती थी। इस नहर के उत्तर में जहां तीस हजारी कोर्ट स्थित है वहां अविकसित भूमि थी। यहीं आकर पुरवाल परिवारों ने डेरा डाला। प्रारंभ में कुछ ही परिवार यहां आए तथा रोजगार की संभावनाएं देखकर और अधिक परिवार बाद में उनके साथ आ मिले। आजीविका के लिए इन्हें नहर के इस पार शहर में आना होता था। तीस हजारी की सीध में नहर पार करने पर सदर बाजार व वर्तमान बहादुरगढ़ रोड आता था और पूर्व की ओर बढ़ कर नहर पार करने पर वर्तमान खारी बावली का क्षेत्रा था। ये दोनों ही इलाके व्यवसाय के मुख्य केन्द्र थे और रोजगार के अवसरों से भरपूर थे। इन दोनों स्थानों में से जिसकी जहां रोजगार व रिहायश की अनुकूल व्यवस्था हुई वह वहां बस गया। इस प्रकार पुरवाल समाज दो भागों में बंट कर कूचा नवाब मिर्जा (वर्तमान कूचा शिव मंदिर) तथा गली महावीर (बहादुरगढ़ रोड) में बस गया। इन दोनों स्थानों पर ये लोग पहले किरायेदार रहे और बाद में धीरे–धीरे इन इलाकों के सभी मकान खरीदते गए। जब से ये लोग दिल्ली में आकर बसे तभी से आपसी परिवारों में विवाह संबंध कर रहे हैं।


पुरवालों का मुख्य व्यवसाय हलवाई का काम था। इस कार्य में वे दक्ष थे और आज भी हैं। दिल्ली में बस जाने के बाद अधिकतर लोगों ने हलवाई का ही काम किया। आज भी अनेक लोग इस व्यवसाय में हैं। परम्परागत मिठाईयों में घेवर, फेनी, पेठा, अनरसे (चावल के आटे, घी, चीनी व तिल से बनी मिठाई) जिसे कहीं कहीं संभवतः बताशफेनी भी कहा जाता है, और अनरसे की गोलियां, के वे विशेषज्ञ माने जाते हैं। घेवर व फेनी बनाने में तो इनका एकाधिकार है। लगभग पूरी दिल्ली और आस–पास के इलाकों को ये लोग घेवर व फेनी सप्लाई करते हैं। कुछ लोगों ने छोटे–छोटे व्यवसाय किए और कुछ अनाज, मसालों, घी, तेल आदि की दलाली करने लगे। उस समय खारी बावली इन वस्तुओं की प्रमुख मण्डी थी, आज भी है। इस कार्य में इन्होंने काफी अच्छी साख अर्जित की। व्यापारियों के बीच इनकी विश्वस्नीयता उच्च स्तर की रही है।


पुरवालों के व्यवसाय का वर्णन करते हुए यह उल्लेख आवश्यक है कि इन्होंने हमेशा व्यापार ही किया है चाहे उसका स्तर छोटा हो या बड़ा। आज भी लगभग 95 प्रतिशत लोग निजी व्यापार में संलग्न हैं। शेष कुछ ही लोग सरकारी या गैरसरकारी नौकरियों में हैं। पुरवाल सदैव नैतिकता से व्यापार करते हैं और अपनी छवि को उज्जवल बनाए रखते हैं। किसी का धन मार लेना ये बहुत ही अनैतिक कार्य मानते हैं। किसी भी पुरवाल व्यापारी ने स्वयं को दीवालिया घोषित नहीं किया है।

पुराने जमाने में किसान व मजदूर आवश्यकता पड़ने पर सेना में भर्ती हो जाया करते थे जिनकी सेवाएं केवल युद्धकाल में ही ली जाती थीं। शांतिकाल में ये लोग अपने व्यवसाय में व्यस्त रहते थे। दिल्ली आने के बाद कुछ पुरवालों ने अंग्रेजी सेना में नौकरी की।

1857 के स्वतंत्राता संग्राम से ये लोग भी प्रभावित हुए और अनेक भारतीय सैनिकों की भांति इन्होंने अंग्रेजी सेना में रहते हुए भी स्वतंत्राता सेनानियों की मदद की। उस समय दिल्ली पर भारतीयों का कब्जा था। अंगंरेज दिल्ली वापिस हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। अंग्रेज जनरल जॉन निकलसन ताबड़तोड़ गोलाबारी करके कश्मीरी गेट की फसील को गिराने में जुटा था। उसे सफलता की ओर बढ़ता देख 23 सितम्बर, 1857 को स्वतन्त्राता सेनानियों ने उसे गोली मार कर ढेर कर दिया और कुछ देर के लिए अंग्रेजों को सफलता से दूर कर दिया। यह दीगर बात है कि 1857 की क्रांति विफल हो गई और अंग्रेजों की सत्ता दिल्ली में स्थापित हो गई। इसकी बहुत संभावना है कि निकलसन किसी पुरवाल की गोली से मरा हो क्योंकि स्वतन्त्राता क्रांति की विफलता के बाद अंग्रेजों ने पुरवालों को ढूंढ ढूंढ कर मौत के घाट उतारा।

क्रांति को दबाने के बाद अंग्रेज अत्यन्त क्रूर हो गए और उन्होंने क्रांतिकारियों तथा उन सैनिकों को चुन चुन कर मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया जिन्होंने क्रांतिकारियों का साथ दिया था। उन्हें ज्ञात हो गया कि निकलसन को मारने वाली टुकड़ी में पुरवाल भी थे। जो भी पुरवाल अंग्रेजों के हाथ लगा उसे मार डाला गया। शेष सभी अपनी जान बचाने के लिए जहां तहां छुप गए और अपनी पहचान को भी छिपा लिया। किसी ने भी स्वयं को पुरवाल नहीं कहा। चूंकि 1857 के 90 वर्ष बाद तक भी अंग्रेजों का ही राज रहा अतः भय के कारण बाद में भी वे अपनी जाति का नाम जुबान पर लाने का साहस नहीं कर सके। अंग्रेजों की क्रूरता का भय इतना बैठा हुआ था कि इस घटना के बाद पुरवाल कभी दोबारा फौज में भरती नहीं हुए क्योंकि उन दिनों फौज में भरती होने के लिए जाति का नाम बताना आवश्यक होता था; इसी के अनुसार उन्हें भि–भि बटालियनों में रखा जाता था।

अंग्रेजों के भय से पुरवाल अपनी पहचान छिपा कर रहने लगे। जान माल की रक्षा हेतु पुरवाल मजबूरी में पहचान छिपा कर बेशक रहने लगे हों परन्तु अपनी मूल जाति और अस्मिता को नहीं भूले और न ही अपनी जाति का किसी अन्य जाति में विलय किया। इनके आसपास अनेक वैश्य तथा दूसरी जातियां रहती थीं। पुरवालों ने अपने छोटे समूह के भीतर ही विवाह संबंध करने मंजूर किए परन्तु किसी भी दूसरे समाज में संबंध नहीं किए। दूसरे वैश्य व अन्य समाजों ने इन्हें अपने में मिलाने के बहुत प्रयास किए और कई प्रकार के प्रलोभन भी दिए परन्तु ये बिना डिगे हुए अपने स्थान पर टिके रहे। अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए इन्होंने बड़े लम्बे समय तक संघर्ष किया है।

इस प्रकार पुरवाल जाति अपने मूल स्थान से विलग होकर वहां वालों के लिए विस्मृत हो गई तथा पलायित स्थान पर पुरवालों ने स्वयं अपनी पहचान को छिपा लिया। यही कारण है कि वैश्यों के इतिहास में इस जाति का नाम तो मिलता है परन्तु विवरण विस्तार से नहीं मिलता। यूं भी यह जाति बहुत संकोची व अंतर्मुखी रही है जिस कारण इन्होंने कभी अपना प्रचार नहीं किया और इसीलिए इन्हें अधिक लोग नहीं जान पाए


साभार : पुरवाल वैश् समाज

Friday, June 15, 2012

छत्तीसगढ़ में वैश्य समाज-Vaishya Community in Chattisgarh


भारतीय गणतंत्र के 26 वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का उदय 1 नवम्बर 2000 को हुआ। इसके पूर्व यह क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा था। 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश के निर्माण के रूप में यह मध्य प्रांत एवं बरार का अंग था। प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग (रायपुर, बिलासपुर क्षेत्र) दक्षिण कौशल के नाम विख्यात था, जबकि दक्षिणी भारत (बस्तर क्षेत्र) दंडकारण्य, महाकांत्तार, चक्रकोट के नाम से जाना जाता था।   
भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था व अतंर्गत ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार वर्ण आते थे। धर्म के कर्ता-धर्ता होने के कारण ब्राम्हणों से संबंधित तथा राजकीय प्रमुख होने के कारण क्षत्रियों से संबंधित विवरण बहुतायद से मिलते हैं, किन्तु वैश्य समाज का उल्लेख यदा-कदा ही मिलता है, छत्तीसगढ़ के प्राचीन अभिलेखों में वैश्य समाज से संबंधित दो नाम बड़े महत्व के साथ मिलते हैं। प्रथम जाजल्लदेव के रतनपुर शिलालेख कलचुरी संवत् 866 (ई. 1114) में श्रेष्ठी यश का उल्लेख हुआ है, जिससे ज्ञात होता है कि रत्नदेव (प्रथम) के समय श्रेष्ठी यश रतनपुर का नगर प्रमुख था। इसी प्रकार पृथ्वी देव द्वितीय के समय के कोटगढ़ शिलालेख से ज्ञात होता है, कि रत्नदेव द्वितीय की माता लाच्छल्लादेवी वल्लभराव नाम वैश्य को अपने दत्तक पुत्र जैसा मानती थी। यह रत्नदेव द्वितीय का सामन्त था, इस अभिलेख में वल्लभराज द्वारा निर्मित हटकेश्वर निर्मित हटकेश्वर पुरी का उल्लेख है तथा इसके द्वारा एक सरोवर बनाने की जानकारी मिलती है।
छत्तीसगढ़ में वर्तमान में बड़ी संस्था में अग्रवाल जाति के लोग निवास करते है। इन्हें छत्तीसगढ़ अग्रवाल के नाम जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार जहांगीर के शासनकाल में छत्तीसगढ़ में कल्याण साय नामक एक राजा हुए। कल्याण साय के दिल्ली जहांगीर के दरबार में जाने का विवरण इतिहास में मिलता है। कहा जाता है, कि दिल्ली से लौटते समय राज व्यवस्था को ठीक से संचालित करने के लिये कल्याण साय अपने साथ 5 घर ब्राम्हण, क्षत्रिय 5 घर कायस्थ और 5 घर अग्रवालों को लेकर आये थे। इन्ही अग्रवालों को कालान्तर में छत्तीसगढ़ अग्रवाल के नाम से संबोधित किया जाने लगा, कुछ लोग मंडला से अग्रवालों के आने की कथा बताते है और कुछ कहना है कि औरंगजेब के शासनकाल में धर्मपरिवर्तन से बचने के लिये छत्तीसगढ़ आ गये। छत्तीसगढ़ी अग्रवालों को यंहा दाऊ भी कहा जाता है, जो प्रतिष्ठा का सूचक है। परंपरा के रूप में छत्तीसगढ़ अग्रवालों के गोत्र सिंहल सिंघल, गोयल, गर्ग, नागल, वसिल, मुद्गल आदि मिलते है।  
छत्तीसगढ़ अग्रवालों ने दान आदि क विशेष उल्लेखनीय कार्य किये है। जैतूसाव क द्वारा पुरानी बस्ती में मंदिर का निर्माण कराया गया था बाद में जहां मंहत लक्ष्मी नारायण दास हुये थे। जो एम. एल. ए. राज्य सभा सदस्य और कांग्रेसाध्यक्ष भी रहे। तरेंगा के दाऊ कल्याण सिंह के नाम पर है, इसके अतिरिक्त दाऊ कल्याण सिंह ने अपने पिता के कहने पर टी. बी. अस्पताल बनवाया था, इन्हें रायबहदुर और दीवान बहादुर की उपाधियां भी अंग्रेज सरकार ने दी थी ।
जहां तक वर्तमान में छत्तीसगढ़ के वैश्य समाज का प्रथम लगभग 19 वी शताब्दी में आवागमन के विकास के साथ बड़ी संख्या में यहां वैश्यों का आगमन हुआ। जिसमें मुख्यरूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बुंदेलखंड गुजरात के वैश्य उल्लेखनीय है। इनका आगमन लगभग 150-200 वर्शों का है।
छत्तीसगढ़ में वैश्य समाज अलग-अलग क्षेत्रीय समुदायों में अपनी-अपनी विरासत के अनुसार जीवन निर्वाह कर रहा है। इनकी कोई एक साथ समग्र पहचान नही है।  
छत्तीसगढ़ के सामाजिक राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन में वैश्यों का विशेश महत्व रहा है, आवश्यकता इस बात की है कि इसे सिलसिलेवार एकत्रित समग्ररूप से प्रकाश में लाया जावे।  
छत्तीसगढ़ के वैश्यों की अन्य शाखा में तेली (साहू), जायसवाल की जानकारी भी यहां मिलती है। छत्तीसगढ़ की प्रतिद्ध धार्मिक नगरी राजिम का संबंध राजीव अथवा तेलिन से है। यहां का प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर का संबध उनसे स्थापित किया जाता है, छ.ग. में तेलीय वैश्य बड़ी संख्या में है। इसी प्रकार जायसवाल समाज से संबंधित किवदंतियां एवं लोक कथाये भी यहां पर प्रचलित है।



साभार  - रमेश कुमार जैन 

Friday, June 8, 2012

पोरवाल वैश्य समाज - Porwal Vaishya


जांगडा पोरवाल समाज की उत्पत्ति

गौरी शंकर हीराचंद ओझा (इण्डियन एक्टीक्वेरी, जिल्द 40 पृष्ठ क्र.28) के अनुसार आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।

जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। समय-समय पर उन्होंने अपने शौर्य गुण के आधार पर जंग में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और मरते दम तक भी युद्ध भूमि में डटे रहते थे। अपने इसी गुण के कारण ये जांगडा पोरवाल (जंग में डटे रहने वाले पोरवाल) कहलाये। नौवीं और दसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर हुए विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिये एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। दिल्ली में रहनेवाले पोरवाल “पुरवाल”कहलाये जबकि अयोध्या के आस-पास रहने वाले “पुरवार”कहलाये। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गये। यहां ये पोरवाल व्यवसाय /व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा। और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाये। वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 3 लाख 46 हजार (लगभग) है।

आमद पोरवाल कहलाने का कारण

इतिहासग्रंथो से ज्ञात होता है कि रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमदकहलाता था। 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में आमदगढ़ पर चन्द्रावतों का अधिकारथा। बाद में रामपुरा चन्द्रावतों का प्रमुखगढ़ बन गया। धीरे-धीरे न केवलचन्द्रावतों का राज्य ही समाप्त हो गया अपितु आमदगढ़ भी अपना वैभव खो बैठा।इसी आमदगढ़ किले में जांगडा पोरवालों के पूर्वज काफी अधिक संख्या में रहतेथे। जो आमदगढ़ का महत्व नष्ट होने के साथ ही दशपुर क्षेत्र के विभिन्नसुविधापूर्ण स्थानों में जाकर बसते रहे। कभी श्रेष्ठीवर्ग में प्रमुख मानाजाने वाला सुख सम्पन्न पोरवाल समाज कालांतर में पराभव (दरिद्रता) कीनिम्नतम् सीमा तक जा पहुंचा, अशिक्षा, धर्मभीरुता और प्राचीन रुढ़ियों कीइसके पराभव में प्रमुख भूमिका रही। कृषि और सामान्य व्यापार व्यवसाय केमाध्यम से इस समाज ने परिश्रमपूर्वक अपनी विशिष्ठ पहचान पुन: कायम की।किन्तु आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवालकहलाते है ।

गौत्रों का निर्माण

श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगायी जाने वाली 24 गोत्रें किसीन किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल वैश्य अपने- अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाये रखने के लिये इन्होंने अपनेउपनाम (अटके) रख लिये जो आगे चलकर गोत्र कहलाए। किसी समूह विशेष में जोपोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। पोरवालसमाज के जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्षथे वे मेहता कहलाने लगे। यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर परजो लोग अगुवाई (नेतृत्व) करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा कापूरा-पूरा ध्यान रखते वे संघवी कहे जाने लगे। मुक्त हस्त से दान देने वालेपरिवार दानगढ़ कहलाये। असामियों से लेन-देन करनेवाले, वाणिज्य व्यवसाय मेंचतुर, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया और धनवाले धनोतिया पुकारेजाने लगे। कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, राजा पुरु के वंशज्पोरवाल और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए। कुछगौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे उदिया-अंतरवेदउदिया(यमुना तट पर), भैसरोड़गढ़(भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, मंडावलमें मण्डवारिया, मजावद में मुजावदिया, मांदल में मांदलिया, नभेपुर केनभेपुरिया, आदि।


श्री जांगडा पोरवाल समाज की 24 गोत्र


सेठिया, काला, मुजावदिया, चौधरी, मेहता, धनोतिया, संघवी, दानगढ़, मांदलिया, घाटिया, मुन्या, घरिया, रत्नावत, फरक्या, वेद, खरडिया, मण्डवारिया, उदिया, कामरिया, डबकरा, भैसोटा, भूत, नभेपुरिया, श्रीखंडिया


भेरुजी


प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वाराकभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गयी थी। स्थान का चयन पवित्र स्थान के रुपमें अधिकांश नदी के किनारे, बावड़ी में, कुआं किनारे, टेकरी या पहाड़ी परकिया गया। प्रत्येक परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित भेरुजी की वर्षमें कम से कम एक बार वैशाख मास की पूर्णिमा को सपरिवार पूजा करता है।मांगलिक अवसरों पर भी भेरुजी को बुलावा परिणय पाती के रुप में भेजा जाताहै, उनकी पूजा अर्चना करना आवश्यक समझा जाता है। भेरुजी के पूजन पर मालवाकी खास प्रसादी दाल-बाफले, लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।भेरुजी को भगवान शंकर का अंशावतार माना जाता है यह शंकरजी का रुद्रावतारहै इन्हें कुलदेवता भी कहा जाता है। जांगडा पोरवाल समाज की कुलदेवीअम्बिकाजी (महाशक्ति दुर्गा) को माना जाता है।

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

मांदलिया- अचारिया – कचारिया (आलोट-ताल के पास)

कराड़िया (तहसील आलोट)

रुनिजा

पीपल बाग, मेलखेड़ा

बरसी-करसी, मंडावल

सेठिया- आवर – पगारिया (झालावाड़)

नाहरगढ़

घसोई जंगल में

विक्रमपुर (विक्रमगढ़ आलोट)

चारभुजा मंदिर दलावदा (सीतामऊ लदूना रोड)

काला- रतनजी बाग नाहरगढ़

पचांयत भवन, खड़ावदा

बड़ावदा (खाचरौद)

मुजावदिया- जमुनियाशंकर (गुंदी आलोट)

कराड़िया (आलोट)

मेलखेड़ा

रामपुरा

अचारिया, कचारिया, मंडावल

चौधरी - खड़ावदा, गरोठ

रामपुरा, ताल के पास

डराड़े-बराड़े (खात्याखेड़ी)

आवर पगारिया (झालावाड़)

मेहता- गरोठ बावड़ी में, रुनिजा

धनोतिया- घसोई जंगल में

कबीर बाड़ी रामपुरा

ताल बसई

खेजड़िया

संघवी- खड़ावदा (पंचायत भवन)


दानगढ़- आवरा (चंदवासा के पास)

बुच बेचला (रामपुरा)

घाटिया- लदूना रोड़ सीतामऊ

मुन्या- गरोठ बावड़ी में

घरिया- बरसी-करसी (महिदपुर रोड़)

मंडावल (आलोट)

रत्नावत - पंचपहाड़, भैसोदामंडी

सावन (भादवामाता रोड)

बरखेड़ा पंथ 

फ़रक्या- पड़दा (मनासा रोड)

बरखेड़ा गंगासा (खड़ावदा रोड)

घसोई जंगल में

बड़ागांव (नागदा)

वेद- जन्नोद (रामपुरा के पास)

साठखेड़ा

खर्ड़िया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

मण्डवारिया- कबीर बाड़ी रामपुरा

तालाब के किनारे पावटी

दोवरे-पैवर (संजीत)

उदिया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

कामरिया- मंडावल (तह. आलोट)

जन्नोद (रामपुरा के पास)

डबकरा- अराडे-बराडे (खात्याखेड़ी, सुवासरा रोड)

सावन, चंदवासा, रुनिजा

भैसोटा- बरसी-करती (महिदपुर रोड के पास)

मंडावल (तह. आलोट)


भूत- गरोठ बावड़ी में

रुनिजा – घसोई

नभेपुरिया - वानियाखेड़ी, (खड़ावदा के पास)


श्रीखंडिया- इन्दौर सेठजी का बाग

श्री जांगडा पोरवाल समाज में प्रचलित उपाधियाँ (पदवियाँ)

पदवी - वास्तविक गोत्र

चौधरी - मांदलिया, काला, धनोतिया, डबकरा, सेठिया, चौधरी या अन्य

मोदी - काला, धनोतिया, डबकरा, दानगढ़

मरच्या - उदिया

कोठारी - मांदलिया, सेठिया या अन्य

संघवी - काला, संघवी

बटवाल - वेद

मिठा - मांदलिया

समाज के प्रति हमारा उत्तरदायित्व


हमजो कुछ भी हैं और जो कुछ भी आगे बनेंगे वह समाज के कारण ही बनेंगे। हमारेये विद्यालय और जीवन की व्यावहारिक शिक्षा समाज के कारण ही हमें प्राप्तहैं। इसलिये हमें धर्म पालना चाहिए अर्थात् अपने कर्त्तव्यों का पालन करनाचाहिए। समाज के हम पर तीन ॠण माने गये हैं-

देवॠण – धरती, वायु, आकाश, अग्नि और जल आदि तत्व देवों की कृपा से ही मिले हैं।


ॠषिॠण – विद्या, ज्ञान और संस्कार ॠषिमुनियों और गुरुजनों की देन हैं।

पितृॠण – यह शरीर, मन बुद्धि अपने पिता की देन हैं।

अतः परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों के पालन से ही इन ॠणों से मुक्त हो सकते हैं।

पोरवाल समाज के महापुरुष

राजा टोडरमल पोरवाल (सन् 1601 से 1666 ई.)

टोडरमल का जन्म चैत्र सुदी नवमी बुधवार संवत् 1658 वि. (सन् 1601, मार्च 18) को बूँदी के एक पोरवाल वैश्य परिवार मे हुआ था। बाल्यकाल से वह हष्टपुष्ट, गौरवर्ण युक्त बालक अत्यन्त प्रतिभाशाली प्रतीत होता था। धर्म के प्रती उसका अनुराग प्रारंभ से ही था। मस्तक पर वह वैष्णव तिलक लगया करता था।

युवावस्था में टोडरमल ने अपने पिता के लेन-देन के कार्य एवं व्यवसाय में सहयोग देते हुए अपने बुद्धि चातुर्य एवं व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया । प्रतिभा सम्पन्न पुत्र को पिता ने बूँदी राज्य की सेवा में लगा दिया । अपनी योग्यता और परिश्रम से थोड़े ही दिनों में टोडरमल ने बूँदी राज्य के एक ईमानदार , परिश्रमी और कुशल कर्मचारी के रुप में तरक्की करते हुए अच्छा यश अर्जित कर लिया।

उस समय मुगल सम्राट जहाँगीर शासन कर रहा था। टोडरमल की योग्यता और प्रतिभा को देखकर मुगल शासन के अधिकारियों ने उसे पटवारी के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही काल में टोडरमल की बुद्धिमत्ता , कार्यकुशलता, पराक्रम और ईमानदारी की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वह तेजी से उन्नति करने लगा।

सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का स्वामी बना। 1639 ई. में शाहजहाँ ने टोडरमल के श्रेष्ठ गुणों और उसकी स्वामी भक्ति से प्रभावित होकर उसे राय की उपाधि प्रदान की तथा सरकार सरहिंद की दीवानी, अमीरी और फौजदारी के कार्य पर उसे नियुक्त कर दिया। टोडरमल ने सरहिंद में अपनी प्रशासनिक कुशलता का अच्छा परिचय दिया जिसके कारण अगले ही वर्ष उसे लखी जंगल की फौजदारी भी प्रदान कर दी गई । अपने शासन के पन्द्रहवें वर्ष में शाहजहाँ ने राय टोडरमल पोरवाल को पुन: पुरस्कृत किया तथा खिलअत, घोड़ा और हाथी सहर्ष प्रदान किये । 16 वें वर्ष में राय टोडरमल एक हजारी का मनसबदार बन गया। मनसब के अनुरुप से जागीर भी प्राप्त हुई। 19वें वर्ष में उसके मनसब में पाँच सदी 200 सवारों की वृद्धि कर दी गई । 20वें वर्ष में उसके मनसब में पुन: वृद्धि हुई तथा उसे ताल्लुका सरकार दिपालपुर परगना जालन्धर और सुल्तानपुर का क्षेत्र मनसब की जागीर में प्राप्त हुए । उसने अपने मनसब के जागीरी क्षेत्र का अच्छा प्रबन्ध किया जिससे राजस्व प्राप्ति में काफी अभिवृद्धि हो गई ।

राय टोडरमल निरन्तर उन्नति करते हुए बादशाह शाहजहाँ का योग्य अधिकारी तथा अतिविश्वस्त मनसबदार बन चुका था । 21वें वर्ष में उसे राजा की उपाधि और 2 हजारी 2हजार सवार दो अस्पा, तीन अस्पा की मनसब में वृद्धि प्रदान की गई । राजा की पदवी और उच्च मनसब प्राप्त होने से राजा टोडरमल पोरवाल अब मुगल सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी बन गया था। 23वें वर्ष में राजा टोडरमल को डंका प्राप्त हुआ।

सन् 1655 में राजा टोडरमल गया। जहाँ उसका एक परममित्र बालसखा धन्नाशाह पोरवाल रहता था। धन्नाशाह एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। आतिथ्य सेवा में वह सदैव अग्रणी रहता था। बूँदी पधारने वाले राजा एवं मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी उसका आतिथ्य अवश्य ग्रहण करते थे। बूँदी नरेश धन्नाशाह की हवेली पधारते थे इससे उसके मानसम्मान में काफी वृद्धि हो चुकी थी। उसकी रत्ना नामक एक अत्यन्त रुपवती, गुणसम्पन्न सुशील कन्या थी। यही उसकी इकलौती संतान थी। विवाह योग्य हो जाने से धन्नाशाह ने अपने समान ही एक धनाढ्य पोरवाल श्रेष्ठि के पुत्र से उसकी सगाई कर दी।

भाग्य ने पलटा खाया और सगाई के थोड़े ही दिन पश्चात् धन्नाशाह की अकाल मृत्यु हो गई । दुर्भाग्य से धन्नाशाह की मृत्यु के बाद लक्ष्मी उसके घर से रुठ गई जिससे एक सुसम्पन्न, धनाढ्य प्रतिष्ठित परिवार विपन्नावस्था को प्राप्त हो गया। धन्नाशाह की विधवा के लिए यह अत्यन्त दु:खमय था। गरीबी की स्थिति और युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उसे रात दिन सताया करती थी । ऐसे ही समय अपने पति के बालसखा राजा टोडरमल पोरवाल के बूँदी आगमन का समाचार पाकर उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ।

एक व्यक्ति के साथ धन्नाशाह की विधवा ने एक थाली मे पानी का कलश रखकर राजा टोडरमल के स्वागत हेतू भिजवाया। अपने धनाढ्य मित्र की ओर से इस प्रकार के स्वागत से वह आश्चर्यचकित रह गया। पूछताछ करने पर टोडरमल को अपने मित्र धन्नाशाह की मृत्यु उसके परिवार के दुर्भाग्य और विपन्नता की बात ज्ञात हुई, इससे उसे अत्यन्त दु:ख हुआ । वह धन्नाशाह की हवेली गया और मित्र की विधवा से मिला। धन्नाशाह की विधवा ने अपनी करुण गाथा और पुत्री रत्ना के विवाह की चिन्ता से राजा टोडरमल को अवगत कराया।

अपने परममित्र सम्मानित धनाढ्य श्रेष्ठि धन्नाशाह की विधवा से सारी बातें सुनकर उसे अत्यन्त दु:ख हुआ। उसने उसी समय धन्नाशाह की पुत्री रत्ना का विवाह काफी धूमधाम से करने का निश्चय व्यक्त किया तथा तत्काल समुचित प्रबन्ध कर रत्ना के ससुराल शादी की तैयारी करने की सूचना भिजवा दी। मुगल साम्राज्य के उच्च सम्मानित मनसबदार राजा टोडरमल द्वारा अपने मित्र धन्नाशाह की पुत्री का विवाह करने की सूचना पाकर रत्ना के ससुराल वाले अत्यन्त प्रसन्न हुए ।

राजा टोडरमल ने एक माह पूर्व शान शौकत के साथ गणपतिपूजन करवा कर (चाक बंधवाकर) रत्ना के विवाहोत्सव का शुभारंभ कर दिया। निश्चित तिथि को रत्ना का विवाह शाही ठाटबाट से सम्पन्न हुआ। इस घटना से राजा टोडरमल की उदारता, सहृदयता और मित्रस्नेह की सारी पोरवाल जाति में प्रशंसा की गई और उसकी कीर्ति इतनी फैली की पोरवाल समाज की स्त्रियाँ आज भी उनकी प्रशंसा के गीत गाती है और पोरवाल समाज का एक वर्ग उन्हें अपना प्रातः स्मरणीय पूर्वज मानकर मांगलिक अवसरों पर सम्मान सहित उनका स्मरण करता है तथा उन्हें पूजता है। इस प्रकार राजा टोडरमल का यश अजर-अमर हो गया। हाड़ौती (कोटा-बूँदी क्षेत्र) तथा मालवा क्षेत्र में जहाँ भी पोरवाल वास करते है, वहाँ टोडरमल की कीर्ति के गीत गाये जाते हैं तथा उनका आदरसहित स्मरण किया जाता है। उनके प्रति श्रद्धा इतनी अधिक रही है कि पोरवाल व्यापारी की रोकड़ न मिलने पर टोडरमल का नाम लिखा पर्चा रोकड़ में रख देने से प्रातःकाल रोकड़ मिल जाने की मान्यता प्रचलित हो गई है।

सम्राट शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दाराशिकोह वेदान्त दर्शन से अत्यन्त प्रभावित उदार विचारों का व्यक्ति था। सन् 1658 से बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रुप से अस्वस्थ हो जाने की अफवाह सुनकर उसके बेटे मुराद और शुजा ने विद्रोह कर दिया। 16 अप्रैल 1658 ई. शुक्रवार को धरमाट (फतियाबाद) के मैदान में औरंगज़ेब की सेनाओं ने शाही सेना को करारी शिकस्त दी। सामूगढ़ के मैदान में पुनः दाराशिकोह के नेतृत्व में शाही सेना को औरंगज़ेब और मुराद की संयुक्त सेना से पराजय का सामना करना पड़ा। दारा युद्ध में पराजित होकर भागा। औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर पिता को किले में कैद किया और फिर आगे बढ़ा। रास्ते में मुराद को समाप्त कर औरंगज़ेब ने पंजाब की ओर भागे दाराशिकोह का पीछा किया।

राजा टोडरमल की प्रारम्भ से ही दाराशिकोह के प्रति सहानुभूति थी। पराजित दारा के प्रति उसकी सहानुभूति में कोई अन्तर नहीं आया। अतः जब दारा लखी जंगल से गुजरा तो राजा टोडरमल ने जो लखी जंगल का फौजदार था, अपने कई मौजें में गड़े धन से 20 लाख रुपये गुप्त रुप से सहायतार्थ प्रदान किये थे।

इसी कारण पंजाब की ओर दारा का पीछा करने के बाद लाहौर से दिल्ली की तरफ लौटते हुए औरंगज़ेब ने अनेक सरदारों और मनसबदारों को खिलअते प्रदान की थी। तब लखी जंगल के फौजदार राजा टोडरमल को भी खिलअत प्राप्त हुई थी।

इटावा का फौजदार रहते हुए राजा टोडरमल ने अपनी पोरवाल जाति को उस क्षेत्र में बसाने तथा उन्हें व्यापार- व्यवसाय की अभिवृद्धि के लिये समुचित सुविधाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था। सम्भवतः इस कारण भी जांगड़ा पोरवाल समाज में इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के उद्देश्य से एक श्रद्धेय पूर्वज के रुप में राजा टोडरमल की पूजा की जाती है ।

राजा टोडरमल अपने अंतिम समय में अपने जन्मस्थल बूँदी में अपना शेष जीवन परोपकार और ईश्वर पूजन में व्यतीत करने लगे तथा समाज के सैकड़ों परिवार इटावा क्षेत्र त्यागकर बून्दी कोटा क्षेत्र में आ बसे। यहीं से ये परिवार बाद में धीरे-धीरे मालवा क्षेत्र में चले आए।

राजा टोडरमल की मृत्यु कहाँ और किस तिथि को हुई थी इस सम्बन्ध में निश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है । किन्तु अनुमान होता है कि सन् 1666 ई. में पोरवाल समाज के इस परोपकारी प्रातः स्मरणीय महापुरूष की मृत्यु बूँदी में ही हुई होगी । कोटा बूँदी क्षेत्र में आज भी न केवल पोरवाल समाज अपितु अन्य समाजों मे भी राजा टोडरमलजी के गीत बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ – पोरवाल समाज का इतिहास