Friday, June 22, 2012

बनियागिरी और बंजारापन



किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।
त्तर वैदिक काल में पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, औरपणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था।

त्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणिजैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ। पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है।पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है। आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है। वैदिक साहित्य में पणियों को पशु चोर बताया गया है। गौरतलब है कि आर्य पशुपालक समाज के थे जहां पशु ही सम्पत्ति थे। सामान्य व्यापारी जिस तरह तोलने में गड़बड़ी कर लाभ कमाना चाहता है, संभव है प्राचीनकाल में वस्तु-विनिमय के दौरान पणियों द्वारा आर्यजनों से पशुओं की ऐसी ही ठगी सामान्य बात रही हो। इसीलिए वैदिक संदर्भों में पणियों को पशु चोर बताया गया हो। कृषि-संस्कृति से जुड़े आर्यों को पणियों का वाणिज्यजीवी होना, ब्याज की धन राशि लेना और लाभ कमाना निम्नकर्म लगता था और वे उन्हें अपने से हेय समझते थे।

हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है। वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है। इससे ही बना है वाणिज्य औरवणिक जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है। पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा-वणिक>बणिक>बनिअ>बनिया। इससे हिन्दी में कुछ नए शब्द रूप भी सामने आए मसलन वणिकवृत्ति के लिए बनियागीरी या बनियापन। इन शब्दों में मुहावरों की अर्थवत्ता समायी है और सामान्य कारोबारी प्रवृत्ति का संकेत न होकर इसमें ज़रूरत से ज्यादा हिसाब-किताब करना , नापतौल की वृत्ति अथवा कंजूसी भी शामिल है।

यायावरी, डगर-डगर घूमना, आवारगी आदि भावों को प्रकट करने के लिए हिन्दी-उर्दू में बंजारा शब्द है। इसकी रिश्तेदारी भी पण् से है। पण् से बना वाणिज्य अर्थात व्यापार। इस तरह व्यापार करनेवाले के अर्थ में वणिक के अलावा एक नया शब्द और बना वाणिज्यकारक इस शब्द के बंजारा में ढलने का क्रम कुछ यूं रहा -वाणिज्यकारक > वाणिजारक > वाणिजारा > बणिजारा > बंजारा। प्राचीनकाल में इन वाणिज्यकारकों की भूमिका वणिको से भिन्न थी। वणिक श्रेष्ठिवर्ग में आते थे और वाणिज्यकारक मूलत फुटकर या खेरची कारोबारी थे। रिटेलर की तरह। वाणिज्यकारक भी घूम घूम कर लोगों को उनकी ज़रूरतों का सामान उपलब्ध कराते थे। स्वभाव की भटकन को व्यक्त करने के लिए बंजारापन जैसा शब्द हिन्दी को इसी घुमक्कड़ी वृत्ति ने दिया है। यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में फेरीवालों के रूप में प्रचलित है। सामाजिक परिवर्तनों के तहत धीरे धीरे वाणिज्यकारकों की हैसियत में बदलाव आया। क्रय-विक्रय से हटकर उन्होंने कुछ विशिष्ट कुटीर-कर्मों और कलाओं को अपनाया मगर शैली वही रही घुमक्कड़ी की। इस रूप में बंजारा शब्द को जातिसूचक दर्जा मिल गया। ये बंजारे घूम-घूम कर जादूगरी, नट-नटी के तमाशे(नट-बंजारा), जड़ी-बूटी, झाड-फूंक आदि के कामों लग गए। कहीं कहीं रोज़गार की उपलब्धता में कमी के चलते बंजारों का नैतिक पतन भी हुआ। कुल मिलाकर किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

पणिक से वणिक और बनिया बनते-बनते हिन्दी को कुछ नए शब्द भी मिले जैसे बनियागीरी या बनियापन।
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि, पणम, फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर कोपणिक्कर भी लिखा जाता है। प्रख्यात विद्वान डॉ सम्पूर्णानंद पणियों(फिनीशी/प्यूनिक) को पूर्वी भारत का एक जाति समूह बताते हैं जो बाद में पश्चिम के सागर तट से होता हुआ ईरान तक फैल गया। हड़प्पा और सिन्धु घाटी की सभ्यता पर गौर करें तो यह धारणा ज्यादा सटीक लगती है क्योंकि इस सभ्यता का विस्तार सिन्ध के समुद्रतट से लेकर दक्षिण गुजरात के समुद्र तट तक होने के प्रमाण मिले हैं। डॉ भगवतशरण उपाध्याय भी भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में फिनीशियाई लोगों अर्थात फणियों के भारत भूमि पर बसे होने का उल्लेख करते हैं हालांकि वे ये स्पष्ट संकेत नहीं करते कि ये लोग कहां के मूल निवासी थे। आर्य संस्कृति से पश्चिमी जगत को परिचित कराने का श्रेय फिनिशियों को ही दिया जाता है। ये लोग अपने लंबं-चौड़े व्यापारिक कारवां(सार्थवाह) एशियाई देशों से योरप तक ले जाते थे। वाणिज्यकर्म के साथ ही ये लोग विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति के बीज भी अनायास ही छोड़ आते थे।

जो भी हो, पश्चिमी एशिया में और यूरोप के मूमध्यसागरीय क्षेत्र में किसी ज़माने में फिनिशियों (पणियों) की अनेक बस्तियां थीं। कार्थेज उनका केंद्र बन चुका था। यहां के फिनिशियों के लिए प्यूनिक नाम भी प्रचलित रहा है। रोमन साम्राज्य के साथ सदियों तक इन प्यूनिकों का युद्ध चला और अंततः यह समुदाय इतिहास में अपने उद्गम की कई गुत्थियां और अस्तित्व के स्पष्ट संकेत छोड़ते हुए ईसा से एक सदी पहले तक विलीन हो चुका था। इसके बावजूद इन्हें खोजने का काम पुरातत्ववेत्ता आज भी जारी रखे हुए हैं। जीनोग्राफिक तकनीक के जरिये हाल ही में यह पता चला है कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कई स्थानों पर पर प्राचीन फिनीशियों के कईवंशज विभिन्न समाजों में घुले-मिले हैं। मगर फिनिशियों का भारतीय पणियों से रिश्ता स्थापित करने के लिए इस शोध का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है। फिलहाल तो प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के आधार पर देशी-विदेशी विद्वान भारतीय पणियों, प्रकारांतर से फिनिशियों के रिश्ते स्थापित कर ही चुके हैं। इतिहास-पुरातत्व के साथ प्रामाणिकता का द्वन्द्व हमेशा रहा है और इस क्षेत्र में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता।

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