Saturday, April 20, 2013

कहाँ से आता था राजाओं के पास इतना धन ?




बचपन से ही राजस्थान के किले, हवेलियाँ आदि देखने के बाद मन सोचता था कि उस राजस्थान में जहाँ का मुख्य कार्य कृषि ही था और राजस्थान में जब वर्षा ही बहुत कम होती थी तो कृषि उपज का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि कितनी उपज होती होगी? सिंचाई के साधनों की कमी से किसान की उस समय क्या आय होती होगी? जो किसी राजा को इतना कर दे सके कि उस राज्य का राजा बड़े बड़े किले व हवेलियाँ बनवा ले| जिस प्रजा के पास खुद रहने के लिए पक्के मकान नहीं थे| खाने के लिए बाजरे के अलावा कोई फसल नहीं होती थी| और बाजरे की बाजार वेल्यु तो आज भी नहीं है तो उस वक्त क्या होगी? राजस्थान में कर से कितनी आय हो सकती थी उसका अनुमान शेरशाह सूरी के एक बयान से लगाया का सकता है जो उसने सुमेरगिरी के युद्ध में जोधपुर के दस हजार सैनिको द्वारा उसके चालीस हजार सैनिको को काट देने के बाद दिल्ली वापस लौटते हुए दिया था – “कि एक मुट्ठी बाजरे की खातिर मैं दिल्ली की सल्तनत खो बैठता|”

मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जिस राज्य की प्रजा गरीब हो वो राजा को कितना कर दे देगी ? कि राजा अपने लिए बड़े बड़े महल बना ले| राजस्थान में देश की आजादी से पहले बहुत गरीबी थी| राजस्थान के राजाओं का ज्यादातर समय अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को रोकने के लिए आत्म-रक्षार्थ युद्ध करने में बीत जाता था| ऐसे में राजस्थान का विकास कार्य कहाँ हो पाता ? और बिना विकास कार्यों के आय भी नहीं बढ़ सकती| फिर भी राजस्थान के राजाओं ने बड़े बड़े किले व महल बनाये, सैनिक अभियानों में भी खूब खर्च किया| जन-कल्याण के लिए भी राजाओं व रानियों ने बहुत से निर्माण कार्य करवाये| उनके बनाये बड़े बड़े मंदिर, पक्के तालाब, बावड़ियाँ, धर्मशालाएं आदि जनहित में काम आने वाले भवन आज भी इस बात के गवाह है कि वे जनता के हितों के लिए कितना कुछ करना चाहते और किया भी|

अब सवाल ये उठता है कि फिर उनके पास इतना धन आता कहाँ से था ?


राजस्थान के शहरों में महाजनों की बड़ी बड़ी हवेलियाँ देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी कई सेठों के पास तो राजाओं से भी ज्यादा धन था और जरुरत पड़ने पर ये सेठ ही राजाओं को धन देते थे| राजस्थान के सेठ शुरू ही बड़े व्यापारी रहें है राजा को कर का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं व्यापरियों से मिलता था| बदले में राजा उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराते थे| राजा के दरबार में सेठों का बड़ा महत्व व इज्जत होती थी| उन्हें बड़ी बड़ी उपाधियाँ दी जाती थी| सेठ लोग भी अक्सर कई समारोहों व मौकों पर राजाओं को बड़े बड़े नजराने पेश करते थे| कालेज में पढते वक्त एक ऐसा ही उदाहरण सुरेन्द्र सिंह जी सरवडी से सीकर के राजा माधो सिंह के बारे में सुनने को मिला था- राजाओं के शासन में शादियों में दुल्हे के लिए घोड़ी, हाथी आदि राजा की घुड़साल से ही आते थे| राज्य के बड़े उमराओं व सेठों के यहाँ दुल्हे के लिए हाथी भेजे जाते थे|

सीकर में राजा माधोसिंह जी के कार्यकाल में एक बार शादियों के सीजन में इतनी शादियाँ थी कि शादियों में भेजने के लिए हाथी कम पड़ गए| जन श्रुति है कि राजा माधो सिंह जी ने राज्य के सबसे धनी सेठ के यहाँ हाथी नहीं भेजा बाकि जगह भेज दिए| और उस सेठ के बेटे की बारात में खुद शामिल हो गए जब दुल्हे को तोरण मारने की रस्म अदा करनी थी तब वह बिना हाथी की सवारी के पैदल था यह बात सेठजी को बहुत बुरी लग रही थी| सेठ ने राजा माधो सिंह जी को इसकी शिकायत करते हुए नाराजगी भी जाहिर की पर राजा साहब चुप रहे और जैसे ही सेठ के बेटे ने तोरण मारने की रस्म पूरी करने को तोरण द्वार की तरफ तोरण की और हाथ बढ़ाया वैसे ही तुरंत राजा ने लड़के को उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया और बोले बेटा तोरण की रस्म पूरी कर| यह दृश्य देख सेठ सहित उपस्थित सभी लोग आवक रह गए| राजा जी ने सेठ से कहा देखा – दूसरे सेठों के बेटों ने तो तोरण की रस्म जानवरों पर बैठकर अदा की पर आपके बेटे ने तो राजा के कंधे पर बैठकर तोरण रस्म अदा की है| इस अप्रत्याशित घटना व राजा जी द्वारा इस तरह दिया सम्मान पाकर सेठजी अभिभूत हो गए और उन्होंने राजा जी को विदाई देते समय नोटों का एक बहुत बड़ा चबूतरा बनाया और उस पर बिठाकर राजा जी को और धन नजर किया| इस तरह माधोसिंह जी ने सेठ को सम्मान देकर अपना खजाना भर लिया|

इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है कि राजस्थान के राजाओं के पास धन कहाँ से आता था| राजाओं की पूरी अर्थव्यवस्था व्यापार से होने वाली आय पर ही निर्भर थी न कि आम प्रजा से लिए कर पर|

व्यापारियों की राजाओं के शासन काल में कितनी महत्ता थी सीकर की ही एक और घटना से पता चलता है- सीकर के रावराजा रामसिंह एक बार अपनी ससुराल चुरू गए| चुरू राज्य में बड़े बड़े सेठ रहते थे उनके व्यापार से राज्य को बड़ी आय होती थी| चुरू में उस वक्त सीकर से ज्यादा सेठ रहते थे| जिस राज्य में ज्यादा सेठ उस राज्य को उतना ही वैभवशाली माना जाता था| इस हिसाब से सीकर चुरू के आगे हल्का पड़ता था| कहते है कि ससुराल में सालियों ने राजा रामसिंह से मजाक की कि आपके राज्य में तो सेठ बहुत कम है इसलिए लगता है आपकी रियासत कड़की ही होगी| यह मजाक राजा रामसिंह जी को चुभ गई और उन्होंने सीकर आते ही सीकर राज्य के डाकुओं को चुरू के सेठों को लूटने की छूट दे दी| डाकू चुरू में सेठों को लूटकर सीकर राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते और चुरू के सैनिक हाथ मलते रह जाते| सेठों को भी परिस्थिति समझते देर नहीं लगी और तुरंत ही सेठों का प्रतिनिधि मंडल सीकर राजाजी से मिला और डाकुओं से बचाने की गुहार की|

राजा जी ने भी प्रस्ताव रख दिया कि सीकर राज्य की सीमाओं में बस कर व्यापार करो पूरी सुरक्षा मिलेगी| और सीकर राजा जी ने सेठों के रहने के लिए जगह दे दी, सेठों ने उस जगह एक नगर बसाया , नाम रखा रामगढ़| और राजा जी ने उनकी सुरक्षा के लिए वहां एक किला बनवाकर अपनी सैनिक टुकड़ी तैनात कर दी| इस तरह सीकर राज्य में भी व्यवसायी बढे और व्यापार बढ़ा| फलस्वरूप सीकर राज्य की आय बढ़ी और सेठों ने जन-कल्याण के लिए कई निर्माण कार्य यथा विद्यालय, धर्मशालाएं, कुँए, तालाब, बावड़ियाँ आदि का निर्माण करवाया| जो आज भी तत्कालीन राज्य की सीमाओं में जगह जगह नजर आ जाते है और उन सेठों की याद ताजा करवा देते है|


इस तरह के बहुत से सेठों द्वारा राजाओं को आर्थिक सहायता देने या धन नजर करने के व जन-कल्याण के कार्य करवाने के किस्से कहानियां यत्र-तत्र बिखरे पड़े| बुजुर्गों के पास सुनाने के लिए इस तरह की किस्सों की कोई कमी ही नहीं है| अक्सर राजा लोग ही इन धनी महाजनों से जन-कल्याण के बहुत से कार्य करवा लेते थे| बीकानेर के राजा गंगासिंह जी के बारे में इस तरह के बहुत से किस्से प्रचलित है कि कैसे उन्होंने धनी सेठों को प्रेरित कर जन-कल्याण के कार्य करवाये| वे किसी भी संपन्न व्यक्ति से मिलते थे तो वे उसे एक ही बात समझाते थे कि इतना कमाया, नाम किया पर मरने के बाद क्या ? इसलिए जीते जी कुछ जन-कल्याण के लिए कर ताकि मरने के वर्षों बाद तक लोग तुझे याद रखे| और उनकी बात का इतना असर होता था कि कुछ धनी सेठों ने तो अपना पुरा का पुरा धन जन-कल्याण में लगा दिया|


राजा गंगासिंह जी के मन में जन-कल्याण के लिए कार्य करने का इतना जज्बा था कि उन्होंने आजादी से पहले ही भांकड़ा बांध से नहर ला कर रेगिस्तानी इलाके को हराभरा बना दिया था| रेवाड़ी से लेकर बीकानेर तक उन्होंने अपने खजाने व सेठों के सहयोग से रेल लाइन बिछवा दी थी| दिल्ली के स्टेशन पर बीकानेर की रेल रुकने के लिए प्लेटफार्म तक खरीद दिए थे| और यही कारण है कि आज भी बीकानेर वासियों के दिलों में महाराज गंगासिंह जी के प्रति असीम श्रद्धा भाव है| उपरोक्त कुछ किस्सों व राजस्थान में सेठों व राजाओं के संबंध में बिखरे पड़े किस्सों कहानियों से साफ़ जाहिर है कि राजाओं के पास जो धन था वह गरीब प्रजा का शोषण कर इकट्ठा नहीं किया जाता था बल्कि राज्य के व्यवसायियों द्वारा किये जाने वाले व्यापार से मिलने वाले कर से खजाने भरे जाते थे|

पर अफ़सोस आज के व्यवसायी जो सरकारों को अपनी जेब में रखने का दावा करते है वे जन-कल्याण के लिए खर्च करना तो दूर उल्टा सत्ताधारी नेताओं, मंत्रियों से मिलकर आम-गरीब जनता व देश के संसाधनों को लूटकर सरकारी खजाना खाली कर अपना खजाना भरने में लगे है|


साभार : श्री रतन सिंह जी शेखावत 

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