Sunday, July 28, 2013

Maharaja Sri Gupta - महाराजा श्री गुप्त

कुषाण साम्राज्य के पतन के समय उत्तरी भारत में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उससे लाभ उठाकर बहुत से प्रान्तीय सामन्त राजा स्वतंत्र हो गए थे।

सम्भवतः इसी प्रकार का एक व्यक्ति 'श्रीगुप्त' भी था। गुप्त राजवंश की स्थापना महाराजा गुप्त ने लगभग 275 ई. में की थी। उनका वास्तविक नाम श्रीगुप्त था।

उसने मगध के कुछ पूर्व में चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार नालन्दा से प्रायः चालीस योजन पूर्व की तरफ़, अपने राज्य का विस्तार किया था।

अपनी शक्ति को स्थापित कर लेने के कारण उसने 'महाराज' की पदवी ग्रहण की।

चीनी बौद्ध यात्रियों के निवास के लिए उसने 'मृगशिख़ावन' के समीप एक विहार का निर्माण कराया था, और उसका ख़र्च चलाने के लिए चौबीस गाँव प्रदान किए थे।

गुप्त राजा स्वयं बौद्ध नहीं थे, पर क्योंकि बौद्ध तीर्थ स्थानों का दर्शन करने के लिए बहुत से चीनी इस समय भारत में आने लगे थे। अतः महाराज श्रीगुप्त ने उनके आराम के लिए यह महत्त्वपूर्व दान दिया था।

दो मुद्राएँ ऐसी मिली हैं, जिनमें से एक पर 'गुतस्य' और दूसरी पर 'श्रीगुप्तस्य' लिखा है। सम्भवतः ये इसी महाराज श्रीगुप्त की हैं।

प्रभावती गुप्त के पूना स्थित ताम्रपत्र अभिलेख में श्री गुप्त का उल्लेख गुप्त वंश के आदिराज के रूप में किया गया है। लेखों में इसका गोत्र   धारण बताया गया है।

 धारण अगरवाल वैष्यो का एक गोत्र होता हैंजिससे यह पता चलता हैं की गुप्त वंश के सम्राट अग्रवाल वैश्य थे

श्री गुप्त ने 'महाराज' की उपाधि धारण की। श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक था । प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से राज्य प्रयाग का शासक था

इत्सिंग के अनुसार श्री गुप्त ने मगध में एक मंदिर का निर्माण करवाया तथा मंदिर के लिए 24 गांव दान में दिए थे।

इसके द्वारा धारण की गई उपाधि 'महाराज' सामंतों द्वारा धारण की जाती थी, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि श्रीगुप्त किसी शासक के अधीन शासन करता था।

Sri Gupta (240–280) was a pre-imperial Gupta king in northern India and start of the Gupta dynasty. A portion of northern or central Bengal might have been the home of Guptas at that time, but however not much evidence is available. Maharaj Srigupta belongs to a vaishya lineage.


The first evidence of Śri Gupta comes from the writings of I-tsing around 690 CE who describes that the Poona copper inscription of Prabhavati Gupta, a daughter of Chandra Gupta, describes "Maharaja Sri-Gupta" as the founder of the Gupta dynasty. According to I-tsing's account, Śri Gupta ordered the construction of a temple at Mṛgaśikhāvana for the use of Buddhist pilgrims coming from China, endowing it with the revenue from 40 villages.

Historian A. K. Narain (1983) noted that contemporary scholarship is unaware of Śri Gupta's religious affiliation, due to the lack of surviving evidence. Narain suggested that because he constructed a temple for Chinese Buddhist pilgrims, Śri Gupta might have been a Buddhist himself, or a member of the Hindu sect of Vaiṣṇavism who was tolerant of Buddhist activity in his kingdom. This latter scenario would have been comparable with the later Gupta monarchs, who were predominantly Vaiṣṇavites, but under whose regimes heterodox religious movements like Buddhism and Jainism were allowed to flourish.

साभार : विकिपीडिया 

KALYAN JI - ANAND JI - कल्याण जी आनंद जी


संगीत सम्राट कल्याण जी आनंद जी 

कल्याण जी आनंद जी भाइयो का जन्म गुजरात के जैन वैश्य परिवार मे हुआ था. हिंदी फिल्म जगत की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी-आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। 

वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आया और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था। 

वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी जिसने अपने संगीत से हिंदी फिल्म जगत को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया।

हालाँकि उधारी के संगीत के इन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ जरूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए।

कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना आर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फिल्म संगीतकारों के संपर्क में आए और फिर दोनों भाई उस जमाने में हिंदी फिल्म जगत में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। 

शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फिल्मों में संगीत देना शुरू किया और सम्राट चंद्रगुप्त (1959) उनके संगीत से सजी पहली फिल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी-आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। 

कल्याणजी-आनंदजी ने 1959 में फिल्म ‘सट्टा बाजार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। 1965 की ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब जब फूल खिले’ ने इन दोनों को सफल संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया।

कई दशकों तक बॉलीवुड को अपनी धुनों पर मदमस्त कर देने वाली इस जोड़ी के महत्वपूर्ण अंग कल्याणजी 24 अगस्त 2000 को दुनिया को अलविदा कह गए।

इस जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 70 और 80 तक बॉलीवुड पर राज किया।

कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फिल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फिल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए। भारतीय फिल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी को ही जाता है।

फिल्म ‘छलिया’ में राजकूपर और नूतन पर फिल्माए गए कल्याणजी-आनंदजी के गीत ‘छलिया मेरा नाम’ और ‘डम डम डिगा डिगा’ बेहद लोकप्रिय हुए। इस फिल्म ने उन्हें पृथक पहचान दिलाई।

फिल्म ‘हिमालय की गोद’ (1965) से यह जोड़ी शीर्ष पर पहुँच गई। ‘सरस्वतीचंद्र’ (1968) के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

फिल्मकार प्रकाश मेहरा के साथ कल्याणजी आनंदजी का सफल गठजोड़ बन गया, जिसने ‘हसीना मान जाएगी’, ‘हाथ की सफाई’, ‘हेराफेरी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’ जैसी कई सफल फिल्में दीं। 

फिरोज खान के साथ किया हुआ काम भी बहुत लोकप्रिय हुआ। इस तिकड़ी ने ‘धर्मात्मा’, ‘अपराध’, ‘कुर्बानी’ और ‘जाँबाज’ में खूब वाहवाही लूटी।

Saturday, July 27, 2013

KAMLAPURI VAISHYA - कमलापुरी वैश्य

 मूलतः कमलापुर (कश्मीर) के मूल निवासी है हमारे पूर्वज व्यापार हेतु नेपाल के तराई में आया करते थे हमारी महारानी कमलावती थी राज्य धन संपदा से परिपूर्ण था,हम लोगो का गोत्र कश्यप है कमलापुर नगर का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में किया है किन्तु बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण राज्य छिन्न-भिन्न हो गया सुरच्छा के लिए जो जहाँ व्यापार करते थे वही बस गए परिणाम स्वरूप आज उत्तर प्रदेश व् विहार के शहरो -बस्ती ,गोंडा ,बलरामपुर ,गोरखपुर,सिदार्थनगर ,जौनपुर बढनी,पटना,छपरा,पलामू में है.बाद में लखनऊ ,कानपूर दिल्ली ,मुंबई होते हुए देश भर में फ़ैल गए साथ ही नेपाल में काठमांडू ,कृष्णानगर,बहादुरगंज,चंद्रौता,दान,बुटवल आदि में भी है हमलोग कमलापुरी ,गुप्ता ,कमल आदि टाइटिल का प्रयोग करते है 

साभार : श्री आनन्द गुप्ता 

Tuesday, July 16, 2013

भारत भूषण :Bharat Bhushan


भारत भूषण (अंग्रेज़ी:Bharat Bhushanजन्म:1920 - मृत्यु: 27 जनवरी 1992) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे ऐतिहासिक चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता रहे।


जीवन परिचय

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 1920 में एक  रईस वैश्य जमींदार परिवार में जन्मे भारत भूषण गायक बनने का ख्वाब लिए मुंबई की फ़िल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फ़िल्म 'चित्रलेखा' में एक छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी। 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी ख़ास पहचान नहीं बन पाई। इस दौरान उन्होंने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आंखें (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और मां (1952) फ़िल्मों में काम किया।

बैजू बावरा ने दी नई दिशा

भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फ़िल्म बैजू बावरा से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने न सिर्फ विजय भट्ट के प्रकाश स्टूडियो को ही डूबने से बचाया, बल्कि भारत भूषण और फ़िल्म की नायिका मीना कुमारी को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फ़िल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ओ दुनिया के रखवाले.., मन तड़पत हरि दर्शन को आज.., तू गंगा की मौज में जमुना का धारा.., बचपन की मुहब्बत को.., इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम.., झूले में पवन के आई बहार.., और दूर कोई गाए.. धुन ये सुनाए जैसे फ़िल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। इस फ़िल्म से जुडे़ कई रोचक पहलू हैं। निर्माता विजय भट्ट फ़िल्म के लिए दिलीप कुमारऔर नर्गिस के नाम पर विचार कर रहे थे, लेकिन संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपेक्षाकृत नए अभिनेता-अभिनेत्री को फ़िल्म में लेने पर जोर दिया। इसी फ़िल्म के लिए नौशाद ने तानसेन और बैजू के बीच प्रतियोगिता का गाना शास्त्रीय गायन के धुरंधर उस्ताद आमिर खान और पंडि़त डी.वी. पलुस्कर से गवाया। फ़िल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत 'मन तपड़त हरिदर्शन को आज..' जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था। बैजू बावरा की सफलता से उत्साहित यही टीम एक बार फिर श्री चैतन्य महाप्रभु फ़िल्म के लिए जुड़ी और इसमें सशक्त अभिनय के लिए भारत भूषण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, भक्तों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने सहज स्वाभाविक अभिनय के रंगों से परदे पर जीवंत करने का भारत भूषण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा।

मिर्ज़ा ग़ालिब में शानदार अदाकारी

भारत भूषण के फ़िल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब का अहम स्थान है। इस फ़िल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि ग़ालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस फ़िल्म के लिए गजलों के बादशाह तलत महमूद की मखमली और गायिका, अभिनेत्री सुरैया की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत 'बेहद मकबूल हुए .., आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक.., फिर मुझे दीदए तर याद आया.., दिले नादां तुझे हुआ क्या है.., मेरे बांके बलम कोतवाल.., कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां कुछ और भारत भूषण ने लगभग 143 फ़िल्मों में अपने अभिनय की विविधरंगी छटा बिखेरी और अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर तथा देवानंद जैसे कलाकारों की मौजूदगी में अपना एक अलग मुकाम बनाया।

प्रमुख फ़िल्में

  • बैजू बावरा (1952)
  • श्री चैतन्य महाप्रभु (1954)
  • मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)
  • रानी रूपमती (1957)
  • सोहनी महीवाल (1958)
  • सम्राट चंद्रगुप्त (1958)
  • कवि कालिदास (1959)
  • संगीत सम्राट तानसेन (1962)
  • नवाब सिराजुद्दौला (1967)

फ़िल्म निर्माण

भारत भूषण ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा, लेकिन उनकी कोई भी फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं रही। उन्होंने 1964 में अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'दूज का चांद' का निर्माण किया, लेकिन इस फ़िल्म के भी बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिट जाने के बाद उन्होंने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली।

अंतिम समय

वर्ष 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तकदीर नायक' के रूप में भारत भूषण की अंतिम फ़िल्म थी। इसके बाद वह माहौल और फ़िल्मों के विषय की दिशा बदल जाने पर चरित्र अभिनेता के रूप में काम करने लगे, लेकिन नौबत यहां तक आ गई कि जो निर्माता-निर्देशक पहले उनको लेकर फ़िल्म बनाने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। इस स्थिति में उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए फ़िल्मों में छोटी-छोटी मामूली भूमिकाएं करनी शुरू कर दीं। बाद में हालात ऐसे हो गए कि भारत भूषण को फ़िल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। तब मजबूरी में उन्होंने छोटे परदे की तरफ रुख़ किया और दिशा तथा बेचारे गुप्ताजी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णिम युग के इस अभिनेता ने आखिरकार 27 जनवरी 1992 को 72 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

साभार : भारत डिस्कवरी 

Sunday, July 14, 2013

व्यापारिक समुदायों की खासियत


मारवाड़ी कलकत्ता में कैसे आए? कृष्ण कुमार बिड़ला की आत्मकथा ब्रशेज विद हिस्ट्री में इसकी कहानी है, ‘16वीं सदी तक व्यापारिक समुदाय राजस्थान तक ही सीमित थे। अकबर के प्रमुख सेनापति और अंबेर के राजा मान सिंह ने जब दूरदराज के इलाकों को जीतना शुरू किया, तो उनके साथ ही व्यापारिक समुदाय के लोग अपनी जन्मभूमि से बाहर निकले। और फिर समय के साथ-साथ पूरे देश में फैल गए।’

इस किताब को पढ़ने से पहले तक मैंने इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचा था। मान सिंह शेखावटी का रहने वाला था, उसी इलाके का, जहां का बिड़ला परिवार है। मान सिंह को 1594 में बंगाल का गवर्नर बनाया गया, इस पद पर वह कई साल तक रहे। इसका अर्थ हुआ कि मारवाड़ी बंगाल में 400 साल से रह रहे हैं। यहां मारवाड़ी शब्द सभी राजस्थानी बनियों के लिए इस्तेमाल होता है, चाहे वे मारवाड़ के हों, मेवाड़ के हों या शेखावटी के।

बिड़ला का कहना है कि उत्तर भारत में तीन मुख्य व्यापारिक समुदाय हैं- अग्रवाल, ओसवाल और महेश्वरी। इनमें महेश्वरी समुदाय सबसे छोटा है और बिड़ला परिवार इसी समुदाय का है। बिड़ला बताते हैं कि महेश्वरी मूल रूप में क्षत्रिय हैं, जिन्होंने वैश्य बनना पसंद किया। युद्ध लड़ने वाले पूर्वजों का दावा सभी व्यापारिक समुदायों में पाया जाता है, चाहे वे पंजाब के खत्री हों या फिर गुजरात और सिंध के लोहणा। अग्रवालों की उत्पत्ति नाम की एक छोटी-सी किताब में कहा गया है कि वे क्षत्रिय पूर्वज राजा अग्रसेन की संतान हैं। उनके पूर्वज चाहे जो कोई भी हों, लेकिन मारवाड़ी कलकत्ता में काफी अच्छी तरह रच-बस गए, क्योंकि बंगालियों में कोई व्यापारिक समुदाय नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे गुजराती मुंबई में बसे।

भीम राव अंबेडकर ने इस पर 1948 में एक बहुत अच्छा लेख लिखा था। लेख का शीर्षक था- ‘महाराष्ट्रा ऐज अ लिंग्विस्टिक प्रोविंस’ यानी एक भाषायी प्रांत के रूप में महाराष्ट्र। इंडियन मर्चेट चैंबर ने एक प्रस्ताव पारित करके यह मांग की थी कि बंबई (अब मुंबई) को भावी महाराष्ट्र का हिस्सा न बनाया जाए। यह लेख उसी के जवाब में था। अंबेडकर ने इस लेख में बताया है कि यह प्रस्ताव पास करने वालों में एक भारतीय ईसाई के अपवाद के अलावा बाकी सभी गुजराती व्यापारी थे। इसके बाद अंबेडकर ने बताया कि गुजराती व्यापारी किस तरह बंबई में आए और छा गए। सच यह है कि ब्रिटिश सरकार ने सूरत से बनियों का आयात किया था, ताकि बंबई में बना नया बंदरगाह जोर पकड़ सके। मराठियों में भी कारोबार करने वाली जातियां नहीं होतीं। इसके लिए गुजरात के इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के सामने दस मांगें रखी थीं, जिनमें से कुछ का जिक्र अंबेडकर ने अपने लेख में किया था। ये मांगें थीं-

- दक्षिण बंबई की जमीन पर घर या गोदाम बनाने के लिए कोई किराया नहीं लिया जाएगा। (शायद यही वजह है कि मालाबार हिल, कोलाबा और नेपियन सी रोड के इलाके में बहुत सारे गुजराती मिल जाते हैं)

- किसी भी अंग्रेज, पुर्तगाली, ईसाई या मुसलमान को उनके परिसर में रहने की इजाजत नहीं होगी। वे वहां किसी जीव को मार भी नहीं सकेंगे।

- किसी भी वाद या अन्य मामले में गवर्नर या डिप्टी गवर्नर किसी बनिया को सार्वजनिक तौर पर गिरफ्तार नहीं करेंगे, उसका अपमान नहीं करेंगे और उसे नोटिस दिए बिना जेल नहीं भेजेंगे।

- किसी युद्ध या अन्य किसी खतरे की स्थिति के लिए किले में (आज का फोर्ट इलाका) उसका एक गोदाम होगा, जहां वह अपने सामान, अपनी संपत्ति और अपने परिवार को सुरक्षा के लिए रख सकेगा।

- उसे अपने साथ छाता लेकर चलने का अधिकार होगा। (शायद यह बनियों को सम्मान का आभामंडल देने के लिए जरूरी लगा होगा)।

इसी तरह, सूरत के पारसियों ने शांति की मीनार के लिए मुफ्त जमीन की मांग की थी, जिसे 1672 में बंबई के दूसरे गवर्नर गेराल्ड औंगियर ने उन्हें इसके लिए जमीन दी भी।

दक्षिण अफ्रीका में मेमन किस तरह आए? हमें पता है कि जब गांधी महज 23 साल के थे, तो नटाल में उनका गुजराती मुसलमानों से विवाद हुआ था। लेकिन वे गुजराती मुसलमान वहां क्या कर रहे थे? मिहिर बोस ने अपनी किताब द मेमंस में बताया है कि मारीशस के एक भारतीय सेठ अबूबकर अमद ने नटाल में दुकान खोलने की सोची। नटाल के अंग्रेजों को पता नहीं था कि भारतीय व्यापारी क्या कर सकते हैं। जल्द ही उन्हें पता चल गया। ‘उसकी संपन्नता की कहानी उसके शहर पोरबंदर पहुंची। कई दूसरे मेमन भी नटाल पहुंच गए। इसके बाद वहां सूरत से बोहरा भी पहुंचे। कारोबारियों को मुनीम चाहिए था, सो उनके साथ वहां हिंदू मुनीम भी पहुंच गए।’

पाकिस्तान में कोई अर्थव्यवस्था ही नहीं है, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पंजाब के कारोबार करने वाले सारे हिंदू और सिख इसे छोड़कर चले गए। अब वहां कराची में जो बचे हैं, वे सब गुजराती मेमन, खोजा और बोहरा ही हैं।

व्यापारिक समुदायों की क्या खासियत होती है? बाकी समुदायों से उनमें क्या अलग होता है? एक तो वे बहुत बहादुर होते हैं और अपनी महत्वाकांक्षाओं के साथ पूरी दुनिया में कहीं भी जा सकते हैं, जबकि हम सब जैसे बाकी लोग अपनी जाति के इलाके में ही रह जाते हैं। अपनी किताब इंडियाज न्यू कैप्टलिस्ट्स: कास्ट, बिजनेस ऐंड इंडस्ट्री इन मॉर्डन नेशन स्टेट में हरीश दामोदरन ने लिखा है, ‘चाहे वे हिंदू हों, पारसी हों या मुसलमान, इन सभी समुदायों में कुछ समानताएं होती हैं- शादी व कारोबारी लेन-देन के लिए कड़े नियम और इसके अलावा सामाजिक मूल्यों के लिए काफी संकीर्ण होना।’

रुपये-पैसे का लेन-देन एक ऐसा रिश्ता है, जिससे एक पक्ष को फायदा होता है और दूसरे पक्ष को न तो कोई फायदा होता है और न कोई नुकसान। इसका एक उदाहरण है, बनियों का एक-दूसरे को बिना किसी ब्याज के पूंजी देना।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


साभार : आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक हिन्दुस्तान 


Friday, July 12, 2013

MAHARAJA AGRASEN - अग्रोहा के महाराजा अग्रसेन

अग्रोहा के महाराजा अग्रसेन

वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं। 


अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्रजी, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने 1871 में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिसमें विस्तार से इनके बारे में बताया गया है। इसी में 'अग्रवाल का अर्थ भी समझाया गया है कि अग्रवाल यानी "महाराज अग्रसेन के वंशधर या बच्चे"।

वर्तमान के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5185 साल पहले हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। पर इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।

कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।

अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।

महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था। 

महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।

उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया। 

उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवाल समाज हिंसा से दूर ही रहता है। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।

महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे। इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे। पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी। वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

साभार : गगन शर्मा, http://kuchhalagsa.blogspot.in

Thursday, July 11, 2013

SANJEEV KUMAR - संजीव कुमार


संजीव कुमार



संजीव कुमार हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं । महान कलाकार हरि भाई जरीवाला  उर्फ संजीव कुमार का नाम फिल्मजगत की आकाशगंगा में एक ऐसे धुव्रतारे की तरह याद किया जाता है जिनके बेमिसाल अभिनय से सुसज्जित फिल्मों की रोशनी से बॉलीवुड हमेशा जगमगाता रहेगा.वे मूल रूप से गुजराती थे। उन्होंने नया दिन नयी रात फिल्म में नौ रोल किये थे। कोशिश फिल्म में उन्होंने गूंगे बहरे व्यक्ति का शानदार अभिनय किया था। शोले फिल्म में ठाकुर का चरित्र उनके अभिनय से अमर हो गया।

जीवन

संजीव कुमार का जन्म मुंबई में 9 जुलाई 1938 को एकमध्यम वर्गीय गुजराती जैन वैश्य परिवार में हुआ था। इनका असली नाम हरिभाई  जरीवाला  था. इनका पैतृक निवास सूरत था, बाद में इनका परिवार मुंबई आ गया. वह बचपन से हीं फिल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखा करते थे। फिल्म के प्रति जुनून इन्हें भारतीय फिल्म उद्योग ले आया. अपने जीवन के शुरूआती दौर मे रंगमंच से जुड़े और बाद में उन्होंने फिल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फिल्मालय बैनर की फिल्म हम हिन्दुस्तानी में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला। जहाँ ये एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता बने. ये आजीवन कुंवारे रहे और मात्र 47 वर्ष की आयु में सन 1984 में हृदय गति के रुक जाने से इनकी मृत्यु हुई. ये अपने व्यव्हार, विशिष्ट अभिनय शैली के लिए जाने जाते है. संजीव कुमार ने विवाह नहीं की परन्तु प्रेम कई बार किया था. इन्हें यह अन्धविश्वास था की इनके परिवार में बड़े पुत्र के 10 वर्ष का होने पर पिता की मृत्यु हो जाती है. इनके दादा, पिता, और भाई के साथ यह हो चुका था. संजीव कुमार ने अपने दिवंगत भाई के बेटे को गोद लिया और उसके दस वर्ष का होने पर उनकी मृत्यु हो गयी ! संजीव कुमार भोजन के बहुत शौक़ीन थे. बीस वर्ष की आयु में गरीब माध्यम वर्ग के इस युवा ने रंगमच में कम करना शुरू किया. इन्होने छोटी भूमिकाओ से कोई परहेज नहीं किया. एच.अस.रवैल की 'संघर्ष' में दिलीप कुमार की बाँहों में दम तोड़ने का दृश्य इतना शानदार किया की अभिनय सम्राट भी सकते में आ गए. सितारा हो जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी नखरे नहीं किये. इन्होने जया बच्चन के स्वसुर, प्रेमी, पिता, पति की भूमिकाएँ भी निभाई. जब लेखक सलीम ख़ान ने इनसे त्रिशूल में अपने समकालीन अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता की भूमिका निभाने का अगढ़ किया तो उन्होंने बेझिजक यह भूमिका इस शानदार ढंग से निभाई की उन्हें ही केंद्रीय पत्र मान लिया गया. इन्होंने बीस वर्ष की आयु में वृद्ध आदमी की भूमिका इतनी खूबी से निभाई कि पृथ्वीराज कपूर देखकर दंग रह गए.

कैरियर

फिल्मी सफर

संजीव कुमार ने अपनी करिअर की शुरुआत 1960 में बनी फिल्म हम हिन्दुस्तानी में दो मिनट की छोटी-सी भूमिका से की। वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की निर्मित फिल्म आरती के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नही हो सके। इसके बाद उन्हें कई बी-ग्रेड फिल्में मिली। इन महत्वहीन फिल्मों के बावजूद अपने अभिनय के जरिये उन्होंने सबका ध्यान आकर्षित किया। सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म निशान में काम करने का मौका मिला। वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिल्म हम हिंदुस्तानी के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने स्मगलर, पति-पत्नी, हुस्न और इश्क, बादल, नौनिहाल और गुनहगार जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म शिकार में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फिल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेन्द्र पर केन्द्रित थी फिर भी सजीव कुमार धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म संघर्ष में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन संजीव कुमार अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों की वाहवाही लूट ली। इसके बाद आशीर्वाद, राजा और रंक, सत्याकाम और अनोखी रात जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी के जरिए संजीव कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां वह फिल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म खिलौना की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फिल्म दस्तक में उनके लाजवाब अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कि या गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। फिल्म कोशिश में गूंगे की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। बगैर संवाद बोले सिर्फ आंखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाए। इन्होंने दिलीप कुमार के साथ संघर्ष (1968) फिल्म में काम किया. फिल्म खिलौना ने इन्हें स्टार का दर्जा दिलाया. इसके बाद इनकी हिट फिल्म सीता और गीता (1972) और मनचली (1973) प्रदर्शित हुईं.70 के दशक में इन्होने गुलज़ार जैसे दिग्दर्शक के साथ काम किया. इन्होने गुलज़ार के साथ कुल 9 फिल्मे की जिनमे आंधी (1975), मौसम (1975), अंगूर (1982), नमकीन (1982) प्रमुख है. इनके कुछ प्रशंसक इन फिल्मों को इनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में से मानते है. फिल्म शोले (1975) में इनसे अभिनीत पात्र ठाकुर आज भी लोगो के दिलो में ज़िंदा है जो मिमिक्री कलाकारों के लिए एक मसाला है.संजीव कुमार के दौर में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, शम्मी कपूर, दिलीप कुमार जैसे अभिनेता छाए हुए थे, लेकिन अपने सशक्त अभिनय से उन्होंने अपना स्थान बनाया।


नामांकन और पुरस्कार

1977 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - अर्जुन पंडित

1976 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - आँधी

साभार : विकिपीडिया 

Tuesday, July 9, 2013

BHARTENDU HARISHCHANDRA - भारतेंदु हरिश्चंद्र


भारतेन्दु हरिश्चंद्र




भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (९ सितंबर १८५०-७ जनवरी १८८५) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था, भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है। यद्यपि नाटक उनके पहले भी लिखे जाते रहे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।

जीवन परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ९ सितंबर, १८५० में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता लिखा करते थे। १८५७ में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु ७ वर्ष की होगी। ये दिन उनकी आँख खुलने के थे। भारतेन्दु का कृतित्व साक्ष्य है कि उनकी आँखें एक बार खुलीं तो बन्द नहीं हुईं। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। भारतेन्दु के पूर्वज अंग्रेज भक्त थे, उनकी ही कृपा से धनवान हुए। पिता गोपीचन्द्र उपनाम गिरिधर दास की मृत्यु इनकी दस वर्ष की उम्र में हो गई। माता की पाँच वर्ष की आयु में हुई। इस तरह माता-पिता के सुख से भारतेन्दु वंचित हो गए। विमाता ने खूब सताया। बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था प्रथापालन के लिए होती रही। संवेदनशील व्यक्ति के नाते उनमें स्वतन्त्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत का विकास होने लगा। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उखड़ता रहा। क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कॉलेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा। स्मरण शक्ति तीव्र थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत। इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक - राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी शिक्षा सीखी। भारतेन्दु ने स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं।

उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान।वाणा सुर की सेन को हनन लगे भगवान॥

पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी, अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने कवि वचन-सुधा नामक पत्र निकाला जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। वे बीस वर्ष की अवस्था मे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने १८६८ मे 'कविवचनसुधा` नामक पत्रिका निकाली, १८७६ 'हरिश्चन्द्र मैगजीन` और फिर 'बाल बोधिनी` नामक पत्रिकाएँ निकालीं, साथ ही उनके समांतर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होने 'तदीय समाज` की स्थापना की थी। अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुये भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० मे उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की।  हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा तथा साहित्य दोनो ही क्षेत्रों में है। भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिन्दी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। इसी भाषा में उन्होंने अपने सम्पूर्ण गद्य साहित्य की रचना की। साहित्य सेवा के साथ-साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी। उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना में अपना योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप १८८५ में अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रस लिया।

प्रमुख कृतियाँ नाटक

वैदिक हिंसा हिसा न भवति (१८७३),
भारत दुर्दशा (१८७५),
साहित्य हरिश्चंद्र (१८७६)
नीलदेवी (१८८१)।
अंधेर नगरी (१८८१)
सत्य हरिश्चन्द्र
चंद्रावलीकाव्यकृतियां 

भक्तसर्वस्व,
प्रेममालिका (१८७१),
प्रेम माधुरी (१८७५),
प्रेम-तरंग (१८७७),
उत्तरार्द्ध भक्तमाल(१८७६-७७),
प्रेम-प्रलाप (१८७७),
होली (१८७९),
मधुमुकुल (१८८१),
राग-संग्रह (१८८०),
वर्षा-विनोद (१८८०),
विनय प्रेम पचासा (१८८१),
फूलों का गुच्छा (१८८२),
प्रेम फुलवारी (१८८३)
कृष्णचरित्र (१८८३)
दानलीला
तन्मय लीला
नये ज़माने की मुकरी
सुमनांजलि
बन्दर सभा (हास्य व्यंग)
बकरी विलाप (हास्य व्यंग)अनुवाद 
बंगला से "विद्यासुन्दर" नाटक,
संस्कृत से "मुद्राराक्षस" नाटक,
प्राकृत से "कपूरमंजरी" नाटक।निबंध संग्रह 
भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसरा खंड) में संकलित है।

"नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
वर्ण्य विषय

भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।

श्रृंगार रस प्रधान भारतेंदु जी ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का सुंदर चित्रण किया है। वियोगावस्था का एक चित्र देखिए-देख्यो एक बारहूं न नैन भरि तोहि यातेजौन जौन लोक जैहें तही पछतायगी।बिना प्रान प्यारे भए दरसे तिहारे हाय,देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी।

भक्ति प्रधान भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग के मानने वाले थे। उनको कविता में सच्ची भक्ति भावना के दर्शन होते हैं। वे कामना करते हैं -बोल्यों करै नूपुर स्त्रीननि के निकट सदापद तल मांहि मन मेरी बिहरयौ करै।बाज्यौ करै बंसी धुनि पूरि रोम-रोम,मुख मन मुस्कानि मंद मनही हास्यौ करै।

सामाजिक समस्या प्रधान भारतेंदु जी ने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए। महाजनों और रिश्वत लेने वालों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा-चूरन अमले जो सब खाते,दूनी रिश्वत तुरत पचावें।चूरन सभी महाजन खाते,जिससे जमा हजम कर जाते।

राष्ट्र-प्रेम प्रधान भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। भारत के प्राचीन गौरव की झांकी वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं -भारत के भुज बल जग रच्छित,भारत विद्या लहि जग सिच्छित।भारत तेज जगत विस्तारा,भारत भय कंपिथ संसारा।

प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। चंद्रावली नाटिका के यमुना-वर्णन में अवश्य सजीवता है तथा उसकी उपमाएं और उत्प्रेक्षाएं नवीनता लिए हुए हैं-कै पिय पद उपमान जान यह निज उर धारत,कै मुख कर बहु भृंगन मिस अस्तुति उच्चारत।कै ब्रज तियगन बदन कमल की झलकत झांईं,कै ब्रज हरिपद परस हेतु कमला बहु आईं॥

प्रकृति वर्णन का यह उदहारण देखिये, जिसमे युमना की शोभा कितनी दर्शनीय है |"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये |झुके कूल सों जल परसन हित मनहूँ सुहाये || "
भाषा

भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।
शैली

भारतेंदु जी के काव्य में निम्नलिखित शैलियों के दर्शन होते हैं -

१. रीति कालीन रसपूर्ण अलंकार शैली - श्रृंगारिक कविताओं में,

२. भावात्मक शैली - भक्ति के पदों में,

३. व्यंग्यात्मक शैली - समाज-सुधार की रचनाओं में,

४. उद्बोधन शैली - देश-प्रेम की कविताओं में।
रस

भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।
छंद

भारतेंदु जी ने अपने समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों को अपनाया है। उन्होंने केवल हिंदी के ही नहीं उर्दू, संस्कृत, बंगला भाषा के छंदों को भी स्थान दिया है। उनके काव्य में संस्कृत के बसंत तिलका, शार्दूल, विक्रीड़ित, शालिनी आदि हिंदी के चौपाई, छप्पय, रोला, सोरठा, कुंडलियां कवित्त, सवैया घनाछरी आदि, बंगला के पयार तथा उर्दू के रेखता, ग़ज़ल छंदों का प्रयोग हुआ है। इनके अतिरिक्त भारतेंदु जी कजली, ठुमरी, लावनी, मल्हार, चैती आदि लोक छंदों को भी व्यवहार में लाए हैं।

अलंकार

अलंकारों का प्रयोग भारतेंदु जी के काव्य में सहज रूप से हुआ है। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक और संदेह अलंकारों के प्रति भारतेंदु जी की अधिक रुचि है। शब्दालंकारों को भी स्थान मिला है।निम्न पंक्तियों में उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकार की योजना स्पष्ट दिखाई देती है:तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहु सुहाए॥

महत्वपूर्ण कार्य

आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतेंदु बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में उनकी देन अपूर्व है। भारतेंदु जी हिंदी में नव जागरण का संदेश लेकर अवतरित हुए। उन्होंने हिंदी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। भाव, भाषा और शैली में नवीनता तथा मौलिकता का समावेश करके उन्हें आधुनिक काल के अनुरूप बनाया। आधुनिक हिंदी के वे जन्मदाता माने जाते हैं। हिंदी के नाटकों का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। भारतेंदु जी अपने समय के साहित्यिक नेता थे। उनसे कितने ही प्रतिभाशाली लेखकों को जन्म मिला। मातृ-भाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं संपूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिंदी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था -निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥

अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतेंदु हिंदी साहित्याकाश के एक दैदिप्यमान नक्षत्र बन गए और उनका युग भारतेंदु युग के नाम से प्रसिध्द हुआ। हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैग्जीन, स्त्री बाला बोधिनी जैसे प्रकाशन उनके विचारशील और प्रगतिशील संपादकीय दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।

साभार : विकिपीडिआ 

SWAMI SHRADDHANAND - A VAISHYA GOURAV - स्वामी श्रद्धानन्द - वैश्य गौरव


स्वामी श्रद्धानन्द



स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

स्वामी श्रद्धानन्द भारत के उन महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।


जीवन परिचय

स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म २२ फरवरी सन् १८५६ (फाल्गुन कृष्ण त्र्योदशी, विक्रम संवत् १९१३) को पंजाब प्रान्त के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट ईण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनके बचपन का नाम वृहस्पति और मुंशीराम था, किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ।

पिता का ट्रान्सफर अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी। लहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र मुंशीराम को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुंचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

वे एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। आर्य समाज में वे बहुत ही सक्रिय रहते थे।

उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था। जब आप ३५ वर्ष के थे तभी शिवा देवी स्वर्ग सिधारीं। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। सन् १९१७ में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।

गुरुकुल की स्थापना

सन् 1901 में मुंशीराम ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल विद्यालय खोला गया। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है जिसका नाम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय है। गांधी जी उन दिनों अफ्रीका में संघर्षरत थे। महात्मा मुंशीराम जी ने गुरुकुल के छात्रों से 1500 रुपए एकत्रित कर गांधी जी को भेजे। गांधी जी जब अफ्रीका से भारत लौटे तो वे गुरुकुल पहुंचे तथा महात्मा मुंशीराम तथा राष्ट्रभक्त छात्रों के समक्ष नतमस्तक हो उठे। स्वामी श्रद्धानन्द ने ही सबसे पहले उन्हे महात्मा की उपाधि से विभूषित किया और बहुत पहले यह भविष्यवाणी कर दी थी कि वे आगे चलकर बहुत महान बनेगे।

पत्रकारिता एवं हिन्दी-सेवा

उन्होने पत्रकारिता में भी कदम रखा। वे उर्दू और हिन्दी भाषाओं में धार्मिक व सामाजिक विषयों पर लिखते थे। बाद में स्वामी दयानन्द सरस्वतीका अनुसरण करते हुए उनने देवनागरी लिपि में लिखे हिन्दी को प्राथमिकता दी। उनका पत्र सद्धर्म पहले उर्दू में प्रकाशित होता था और बहुत लोकप्रिय हो गया था। किन्तु बाद में उनने इसको उर्दू के बजाय देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में निकालना आरम्भ किया। इससे इनको आर्थिक नुकसान भी हुआ। उन्होने दो पत्र भी प्रकाशित किये, हिन्दी में अर्जुन तथा उर्दू में तेज। जलियांवाला काण्ड के बाद अमृतसर में कांग्रेस का 43वां अधिवेशन हुआ। स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना भाषण हिन्दी में दिया और हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किए जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन

उन्होने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ-चढकर भाग लिया। गरीबों और दीन-दुखियों के उद्धार के लिये काम किया। स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया। सन् 1919 में स्वामी जी ने दिल्ली में जामा मस्जिद क्षेत्र में आयोजित एक विशाल सभा में भारत की स्वाधीनता के लिए प्रत्येक नागरिक को पांथिक मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया था।

शुद्धि

स्वामी श्रद्धानन्द ने जब कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को "मुस्लिम तुष्टीकरण की घातक नीति" अपनाते देखा तो उन्हें लगा कि यह नीति आगे चलकर राष्ट्र के लिए विघटनकारी सिद्ध होगी। इसके बाद कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया। दूसरी ओर कट्टरपंथी मुस्लिम तथा ईसाई हिन्दुओं का मतान्तरण कराने में लगे हुए थे। स्वामी जी ने असंख्य व्यक्तियों को आर्य समाज के माध्यम से पुन: वैदिक धर्म में दीक्षित कराया। उनने गैर-हिन्दुओं को पुनः अपने मूल धर्म में लाने के लिये शुद्धि नामक आन्दोलन चलाया और बहुत से लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया। स्वामी श्रद्धानन्द पक्के आर्यसमाज के सदस्य थे, किन्तु सनातन धर्म के प्रति दृढ़ आस्थावान पंडित मदनमोहन मालवीय तथा पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ को गुरुकुल में आमंत्रित कर छात्रों के बीच उनका प्रवचन कराया था।

हत्या

23 दिसम्बर, 1926 को नया बाजार स्थित उनके निवास स्थान पर अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी धर्म-चर्चा के बहाने उनके कक्ष में प्रवेश करके गोली मारकर इस महान विभूति की हत्या कर दी। उसे बाद में फांसी की सजा हुई।

साभार : विकिपीडिया 

Wednesday, July 3, 2013

दानवीर भामाशाह - वैश्य गौरव


दान की चर्चा होते ही भामाशाह का नाम स्वयं ही मुँह पर आ जाता है। देश रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के चरणों में अपनी सब जमा पूँजी अर्पित करने वाले दानवीर भामाशाह का जन्म अलवर, राजस्थान में 28 जून, 1547 को हुआ था। उनके पिता श्री भारमल्ल तथा माता श्रीमती कर्पूरदेवी थीं। श्री भारमल्ल राणा साँगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे। अपने पिता की तरह भामाशाह भी राणा परिवार के लिए समर्पित थे। एक समय ऐसा आया जब अकबर से लड़ते हुए राणा प्रताप को अपनी प्राणप्रिय मातृभूमि का त्याग करना पड़ा। वे अपने परिवार सहित जंगलों में रह रहे थे। महलों में रहने और सोने चाँदी के बरतनों में स्वादिष्ट भोजन करने वाले महाराणा के परिवार को अपार कष्ट उठाने पड़ रहे थे।
राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएँ, जिससे अपने देश को मुगल आक्रमणकारियों से चंगुल से मुक्त करा सकंे। इस समय राणा के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या धन की थी। उनके साथ जो विश्वस्त सैनिक थे, उन्हें भी काफी समय से वेतन नहीं मिला था। कुछ लोगों ने राणा को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी; पर राणा जैसे देशभक्त एवं स्वाभिमानी को यह स्वीकार नहीं था। भामाशाह को जब राणा प्रताप के इन कष्टों का पता लगा, तो उनका मन भर आया। उनके पास स्वयं का तथा पुरखों का कमाया हुआ अपार धन था। उन्होंने यह सब राणा के चरणों में अर्पित कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने25 लाख रु0 तथा 20,000 अशर्फी राणा को दीं। राणा ने आँखों में आँसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया।
राणा की पत्नी महारानी अजवान्दे ने भामाशाह को पत्र लिखकर इस सहयोग के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। इस पर भामाशाह रानी जी के सम्मुख उपस्थित हो गये और नम्रता से कहा कि मैंने तो अपना कर्त्तव्य निभाया है। यह सब धन मैंने देश से ही कमाया है। यदि यह देश की रक्षा में लग जाये, तो यह मेरा और मेरे परिवार का अहोभाग्य ही होगा। महारानी यह सुनकर क्या कहतीं, उन्होंने भामाशाह के त्याग के सम्मुख सिर झुका दिया। उधर जब अकबर को यह घटना पता लगी, तो वह भड़क गया। वह सोच रहा था कि सेना के अभाव में राणा प्रताप उसके सामने झुक जायेंगे; पर इस धन से राणा को नयी शक्ति मिल गयी। अकबर ने क्रोधित होकर भामाशाह को पकड़ लाने को कहा। अकबर को उसके कई साथियों ने समझाया कि एक व्यापारी पर हमला करना उसे शोभा नहीं देता। इस पर उसने भामाशाह को कहलवाया कि वह उसके दरबार में मनचाहा पद ले ले और राणा प्रताप को छोड़ दे; पर दानवीर भामाशाह ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
इतना ही नहीं उन्होंने अकबर से युद्ध की तैयारी भी कर ली। यह समाचार मिलने पर अकबर ने अपना विचार बदल दिया। भामाशाह से प्राप्त धन के सहयोग से राणा प्रताप ने नयी सेना बनाकर अपने क्षेत्र को मुक्त करा लिया। भामाशाह जीवन भर राणा की सेवा में लगे
रहे। महाराणा के देहान्त के बाद उन्होंने उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, जब उनका अन्त समय निकट आया, तो उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह अमरसिंह के साथ सदा वैसा ही व्यवहार करे, जैसा उन्होंने राणा प्रताप के साथ किया है। भामाशाह के लिए निम्नलिखित पंक्तियाँ कही गई हैं- वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला ।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला ।।


Monday, July 1, 2013

BANIYAS AND THEIR SECRET OF SUCCESS


THE SECRET OF BANIYA SUCCESS


News Item: IIM-B creams the best paid jobs

$193,000. That’s how much 29-year-old Gaurav Agarwal of the Indian Institute of Management, Bangalore, will make once he joins Barclays Capital, a British Bank, to work on Global financial risk management.
‘‘I attribute the increasing salaries to the economy. I also feel that many Indian salaries being offered now are much more when compared relatively,’’ said Agarwal, an electrical engineer from IIT Kanpur. ‘‘I joined IIM Bangalore as I wanted to change what I was doing,’’ says Agarwal, who plans to return to India after a few years.
IIM-B also saw the highest offer for a domestic position by an international firm — at Rs. 30 lakh per annum. ‘‘This has been a historic event for us. Of the 182 students that opted for placements, 65 have already been recruited,’’ said placement committee member Saurav Bansal.
While it may be stale news that Indians are making unprecedented success in many fields and that too in global arena, maybe you’ve not noticed something between the lines: the success of typical middle class in general-- and Baniya class in particular-- in professional fields; the success of Baniya clan in business is already well-established. Baniyas have shown their mettle in business and be it Gujarati, UP or Marwari, the Baniya has the will and the capabilities to make money in any adverse situation.
Let me explain why.
You go to any IIT, IIM, Engineering, Medical, Management, Architecture or any other knowledge- based institution, you’ll come across many Bansals, Aggarwals, Jains, Guptas, Mittals at every level of these institutions and organizations. Have you wondered why?
1.       Family Values: Baniyas are conservative, conventional, and enterprising. But, most of all, they are family people who respect family values. Which means, they respect their women and elders and inculcate good values in their children. I think the divorce rate in Baniyas might be the lowest, but I’ve no figures to substantiate this. Yes, the curse of dowry is there in Baniyas but then, it is there in the whole of Indian class.
2.       Pragmatic and Progressive: Baniyas value progress and are extremely practical and adaptable. They realize that the only way to climb up the stair in the society is by education. No wonder, Baniyas are willing to sell their house to finance the education of their children and pay through their noses for making the best possible education available to their wards. They are also God fearing and religious, but liberal towards other religions.
3.       Law abiding and conservative: Baniyas are the most conservative and believe in being law abiding. In US, the crime rate of Indians is the lowest and being highly educated expatriate and immigrants; they respect education, merit and are useful to their society they live in. Yes, they’re somewhatdabboo and cowardly, but being in interface with the general and sometimes envious public, they have learnt to be low profile and simple/ austere in their conduct.
4.       Money-wiseThe credit card companies in US are extremely angry with Indians for taking their credit card and paying the bills on them in time, unlike Americans; this means these companies make no money from them and this they don’t like. Baniyas like me take the cards, use it to the minimum and pay on time, much to the consternation of the card companies. Baniyas are the least defaulters of banks, loan companies and live within their means. They save money and use it for education, marriages and building properties. No wonder, most Baniyas die rich. They believe in living within their means.
5.       Genetic Disposition: Baniyas are good at maths and they’re genetically inclined towards engineering, business and hisaab-kitaab. It is in their ghutti that they get maths and science from their mothers and fathers.

So, no wonder if you come across a Baniya at every level of management in any organization.
Incidentally, the richest Indian is also a Baniya.
His name is Lakshmi Mittal.

SABHAR : INDIATIMES.COM