Wednesday, October 1, 2014

DR. VED PRATAP VAIDIK - डॉ. वेद प्रताप वैदिक




डॉ० वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944 , इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ० राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ० वैदिक का नाम अग्रणी है।

वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।

अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ• वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।

वेद प्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसम्बर 1944 को इंदौर एक सभ्रान्त वैश्य परिवार में हुआ। वे सदैव प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। दर्शन और राजनीति उनके मुख्य विषय थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करने के पश्चात् कुछ समय दिल्ली में राजनीति शास्त्र का अध्यापन भी किया।

अपने अफ़गानिस्तान सम्बन्धी शोधकार्य के दौरान श्री वैदिक को न्यूयार्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय¸ लन्दन के प्राच्य विद्या संस्थान¸ मास्को की विज्ञान अकादमी और काबुल विश्वविद्यालय में अध्ययन का विशेष अवसर मिला। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञों में उनका स्थान महत्वपूर्ण है। उन्होंने लगभग पचास देशों की यात्रा की है। वे रूसी, फारसी, अंग्रेजी, संस्कृत व हिन्दी सहित अनेक भारतीय भाषाओं के विद्वान हैं। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में अखिल भारतीय स्तर पर अनेकों बार पुरस्कृत किये जा चुके वैदिक जी अपने मौलिक चिन्तन और प्रभावशाली वक्तृत्व के लिये जाने जाते हैं।

उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। इसके पूर्व वे नवभारत टाइम्स में सम्पादक भी रहे। उस समय नवभारत टाइम्स सर्वाधिक पढा जाने वाले हिन्दी अखबार था। इस समय वे भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम नामक बहुभाषी पोर्टल के सम्पादकीय निदेशक हैं।

वैदिक जी का हिन्दी प्रेम

1957 में सिर्फ 13 वर्ष की आयु में उन्होंने हिन्दी के लिये सत्याग्रह किया और पहली बार जेल गये। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध ग्रन्थ हिन्दी में लिखा जिसके कारण ‘स्कूल ऑफ इण्टरनेशनल स्टडीज़’ (जे०एन०यू०) ने उनकी छात्रवृत्ति रोक दी और स्कूल से उन्हें निकाल दिया। इस ज्वलन्त मुद्दे को लेकर 1966-67 में भारतीय संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ। डॉ० राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, हीरेन मुखर्जी, प्रकाशवीर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्रशेखर, भागवत झा आजाद, हेम बरुआ आदि ने वैदिक का समर्थन किया। अन्ततोगत्वा श्रीमती इन्दिरा गान्धी की पहल पर ‘स्कूल’ के संविधान में संशोधन हुआ और वैदिक को वापस लिया गया। इसके बाद वे हिन्दी-संघर्ष के राष्ट्रीय प्रतीक बन गये।

वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। उन्होंने भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उल्लेखनीय भूमिकायें निभायी हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।

अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ• वैदिक का नाम अग्रणी है। 1958 में बतौर प्रूफ रीडर वे पत्रकारिता में आये, 12 वर्ष तक नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक फिर सम्पादक के पद पर रहे। आजकल वे प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया की हिन्दी समाचार समिति भाषा के सम्पादक हैं।

उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उस समय काफी लम्बी लड़ाई लडनी पड़ी जब उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध पर अपना शोध प्रबन्ध हिन्दी में प्रस्तुत किया जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया और उनसे कहा कि आप अपना शोध प्रबन्ध अंग्रेजी में ही लिखकर दें। वैदिक जी भी जिद्द पर अड़ गये और उन्होंने संघर्ष शुरू कर दिया। बात बहुत आगे संसद तक जा पहुँची अनेक राजनेता उनके समर्थन में आगे आये और परिणाम यह हुआ कि आखिर में प्रशासन को झुकना ही पड़ा।

डॉ. वैदिक ने पिछले 50 वर्षों में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये अनेकों आन्दोलन चलाये और अपने चिन्तन व लेखन से यह सिद्घ किया कि स्वभाषा में किया गया काम अंग्रेजी के मुकाबले कहीं बेहतर हो सकता है। उन्होंने एक लघु पुस्तिका विदेशों में अंग्रेजी भी लिखी जिसमें तर्कपूर्ण ढँग से यह बताया कि कोई भी स्वाभिमानी और विकसित राष्ट्र अंग्रेजी में नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा में सारा काम करता है। उनका विचार है कि भारत में अनेकानेक स्थानों पर अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण ही आरक्षण अपरिहार्य हो गया है जबकि इस देश में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रकाशित पुस्तकें

भारतीय विदेश नीति : नये दिशा संकेत (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 1971)

अंग्रेजी हटाओ : क्यों और कैसे ? (प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1973)

अफगानिस्तान में सोवियत-अमरीकी प्रतिस्पर्धा (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 1973).

हिन्दी का सम्पूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ? (प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली 1994)

अफगानिस्तान : कल, आज और कल (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 2002).

वर्तमान भारत (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 2002).

महाशक्ति भारत (राजकमल प्रकाशन दिल्ली 2002).

सम्पादित पुस्तक

हिन्दी पत्रकारिता : विविध आयाम संपादित (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 1976)

अंग्रेजी पुस्तक

एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका : इंडिया‘ज़ ऑप्शंस‘ (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 1985).

पुरस्कार एवं सम्मान

काबुल विश्वविद्यालय द्वारा अफगानिस्तान सम्बन्धी शोधग्रन्थ पर दस हजार रुपये की सम्मान राशि, 1972

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमरीकी प्रतिस्पर्धा‘ ग्रन्थ पर गोविन्द वल्लभ पन्त पुरस्कार, 1976

उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा हिंदी सेवा के लिये ‘पुरुषोत्तम दास टण्डन‘ स्वर्ण पदक, 1988

मधुवन (भोपाल) द्वारा पत्रकारिता में ‘श्रेष्ठ कला आचार्य‘ की उपाधि, 1989

हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा पत्रकारिता के लिये इक्कीस हजार रुपये की सम्मान राशि, 1990

डॉ. राममनोहर लोहिया सम्मान, कानपुर, 1990

इण्डियन कल्चरल सोसायटी द्वारा ‘लाला लाजपतराय सम्मान‘, 1992

मीडिया इण्डिया सम्मान, नई दिल्ली, 1992

प्रधानमन्त्री द्वारा रामधारी सिंह दिनकर शिखर सम्मान, 1992

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