Wednesday, May 20, 2015

KEDARNATH AGRAWAL - केदारनाथ अग्रवाल


केदारनाथ अग्रवाल (अंग्रेज़ी: Kedarnath Agarwal, जन्म: 1 अप्रैल, 1911 - मृत्यु: 22 जून,2000) प्रगतिशील काव्य-धारा के एक प्रमुख कवि हैं। उनका पहला काव्य-संग्रह 'युग की गंगा' देश की आज़ादी के पहले मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए यह संग्रह एक बहुमूल्य दस्तावेज़ है। केदारनाथ अग्रवाल ने मार्क्सवादी दर्शन को जीवन का आधार मानकर जनसाधारण के जीवन की गहरी व व्यापक संवेदना को अपने कवियों में मुखरित किया है। कवि केदारनाथ की जनवादी लेखनी पूर्णरूपेण भारत की सोंधी मिट्टी की देन है। इसीलिए इनकी कविताओं में भारत की धरती की सुगंध और आस्था का स्वर मिलता है।

अपनी कविता से जन-गण-मन को मानवता का स्वाद चखाने वाले अमर कवि केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1 अप्रैल, 1911 को उत्तर प्रदेश के बाँदा नगर के कमासिन गाँव में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिताजी हनुमान प्रसाद अग्रवाल और माताजी घसिट्टो देवी थी। केदार जी के पिताजी स्वयं कवि थे और उनका एक काव्य संकलन ‘मधुरिम’ के नाम से प्रकाशित भी हुआ था। केदार जी का आरंभिक जीवन कमासिन के ग्रामीण माहौल में बीता और शिक्षा दीक्षा की शुरूआत भी वहीं हुई। तदनंतर अपने चाचा मुकुंदलाल अग्रवाल के संरक्षण में उन्होंने शिक्षा पाई। क्रमशः रायबरेली, कटनी,जबलपुर, इलाहाबाद में उनकी पढ़ाई हुई। इलाहाबाद में बी.ए. की उपाधि हासिल करने के पश्चात् क़ानूनी शिक्षा उन्होंने कानपुर में हासिल की। तत्पश्चात् बाँदा पहुँचकर वहीं वकालत करने लगे थे

बचपन में ग्रामीण परिवेश में रहते केदार जी के मन में सबके साथ मिल-जुलकर रहने के संस्कार पड़े थे और प्रकृति के प्रति अनन्य प्रेम व लगाव भी उत्पन्न हुआ था। बचपन से ही कविता लिखने में रुचि उत्पन्न हुई थी, कारण उनके पिताजी की कवि कर्म में रुचि, वहीं से केदार जी को काव्य-सृजन की प्रेरणा मिली थी। बचपन में घर-परिवार से मिले संस्कारों ने उन्हें गरीब और पीड़ितवर्ग के लोगों के संघर्षपूर्ण जीवन से वाकिफ़ होने का अवसर दिया था। कालांतर में क़ानूनी शिक्षा हासिल करते समय उन्हें इस वर्ग के उद्धार के उपाय तब सूझने लगे जब वे मार्क्सवाद के परिणामस्वरूप उत्पन्न प्रगतिशील विचारधारा से परिचित होने का मौका मिला। यह उनके जीवन का आत्ममंथन का दौर था, जिसने आगे चलकर उन्हें एक समर्पित वकील व अनूठे कवि बनने में योग दिया।

"कवि चेतन सृष्टि के कर्ता हैं। हम कवि लोग ब्रह्मा हैं। कवि को महाकाल मान नहीं सकता । मैं उसी की लड़ाई लड़ रहा हूँ।" - केदारनाथ अग्रवाल “कविता जीवन को उदात्त बनाती है” मानने वाले केदारनाथ अग्रवाल ने लगभग नौ दशकों का उदात्त जीवन अन्यतम कवि के रूप में पूरी उदात्तता के साथ जीने की कोशिश की थी। अपने समय के दर्जनों कवियों में अपना एक अलग जीवन, अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल जनकवि के रूप में केदार जी की काव्य-साधना स्तुत्य है। उन्होंने अपनी निर्भीक वाणी से हृदय के उद्गार जितने भी प्रकट किए, वे सब चेतना की लहरें उमड़ने वाले अथाह सागर के रूप में नज़र आते हैं। केदार जी का काव्य-संसार - सागर जैसा विशाल, नदी की धारा जैसा निर्मल व तेज और चाँदनी-सी निश्छल आभा फैलाते हुए काव्य-प्रेमियों लिए थाती बन गया है।
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केदार जी की काव्य-यात्रा का आरंभ लगभग 1930 से माना जा सकता है। केदारनाथ अग्रवाल जी को प्रगतिशील कवियों की श्रेणी में बड़ी ख्याति मिली है। कविता के अलावा गद्य लेखन में भी उन्होंने रुचि दर्शायी थी, मगर काव्य-सर्जक के रूप में ही वे सुख्यात हैं। इनकी प्रकाशित ढ़ाई दर्जन कृतियों में 23 कविता संग्रह, एक अनूदित कविताओं का संकलन, तीन निबंध संग्रह, एक उपन्यास, एक यात्रावृत्तांत, एक साक्षात्कार संकलन और एक पत्र-संकलन भी शामिल हैं।

कृतियाँ

केदारनाथ अग्रवाल के प्रमुख कविता संग्रह हैं:-

युग की गंगा

फूल नहीं, रंग बोलते हैं

गुलमेंहदी

हे मेरी तुम!

बोलेबोल अबोल

जमुन जल तुम

कहें केदार खरी खरी

मार प्यार की थापें

केदारनाथ अग्रवाल अग्रवाल द्वारा यात्रा संस्मरण 'बस्ती खिले गुलाबों की' उपन्यास 'पतिया', 'बैल बाजी मार ले गये' तथा निबंध संग्रह 'समय समय पर' (1970), 'विचार बोध' (1980), 'विवेक विवेचन' (1980) भी लिखे गये हैं। उनकी कई कृतियाँ अंग्रेज़ी, रूसी और जर्मन भाषा में अनुवाद हो चुकी हैं। केदार शोधपीठ की ओर हर साल एक साहित्यकार को लेखनी के लिए 'केदार सम्मान' से सम्मानित किया जाता है।

प्रकाशित साहित्य

केदारनाथ अग्रवाल का प्रकाशित साहित्य

काव्य संकलन युग की गंगा (1947)

नींद के बादल (1947)

लोक और आलोक (1957)

फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965)

आग का आइना (1970)

देश की कविताएं (1970)

गुल मेंहदी (1978)

आधुनिक कवि-16 (1978) 

पंख और पतवार (1979)

हे मेरी तुम (1981)

मार प्यार की थापें (1981)

बम्बई का रक्त स्नान (1981)

कहे केदार खरी खरी (1983)

अपूर्वा (1984)

जमुन जल तुम (1984)

बोले बोल अबोल (1985) 

जो शिलाएं तोड़ते हैं (1986)

आत्मगंध (1988)

अनहारी हरियाली (1990)

खुली आँखें खुले डैने (1993)

पुष्पदीप (1994)

वसंत में प्रसन्न हुई पृथ्वी (1996)

कुहक कोपल खड़े पेड़ की देह (1997)

केदारनाथ अग्रवाल की प्रगतिशीलता का मूर्त आधार है भारत की श्रमजीवी जनता मार्क्सवादी दर्शन ने जनता के प्रति उनकी ममता को प्रगाढ़ किया। जनता के संघर्ष में आस्था और उसके भविष्य में विश्वास उत्पन्न किया। इसीलिए वे अंग्रेज़ी या काँग्रेसी शासकों की आलोचना करते हुए जनता पर होने वाले पाशविक दमन और जनता के कठिन संघर्षों को सामने रखते हैं। इस कारण उनकी राजनीतिक कविताएँ जहाँ प्रचार के उद्देश्यों से लिखी गयी है वहाँ भी सिद्धांत अमूर्त या कथन मात्र होकर नहीं रह जाती। लेकिन सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जहाँ बहुत से प्रगतिशील लेखक दमन से डरकर या रामराज के लुभावने सपनों में बहकर काँग्रेसी 'नवनिर्माण' में हाथ बंटाने चले गए, वहाँ केदार उन लेखकों में थे जो इन सारी परिस्थितियों के प्रति जनता की ओर से, जनता को संबोधित करते हुए अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे। चूँकि केदार की दृढ़ आस्था मार्क्सवाद में और श्रमजीवी जनता में है, इसलिए वे घोषणा करते हैं: भजन का नहीं मैं भुजा का प्रतापी
उनकी यह आस्था तथाकथित नवनिर्माण वाले प्रभाव को टिकाऊ नहीं रहने देती। वे जनता पर आने वाले विपत्तियों से क्षुब्ध होकर व्यंग्य करते हैं:

राजधर्म है बड़े काम में छोटे काम भुलाना
बड़े लाभ की खातिर छोटी जनता को ठुकराना

उपरोक्त पंक्तियाँ सन् 1949 की है। सन् 1950 में वे पीड़ा के साथ दमन का चित्र खींचते हैं:

बूचड़ों के न्याय घर में

लोकशाही के करोड़ों राम सीता

मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ

वीर तेलंगावनों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ

क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ।

परिमल प्रकाशन से संबंध

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने लिखने की शुरुआत की। उनकी लेखनी में प्रयाग की प्रेरणा का बड़ा योगदान रहा। प्रयाग के साहित्यिक परिवेश से उनके गहरे रिश्ते का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी सभी मुख्य कृतियाँ इलाहाबाद के परिमल प्रकाशन से ही प्रकाशित हुई। प्रकाशक शिवकुमार सहाय उन्हें पितातुल्य मानते थे और 'बाबूजी' कहते थे। लेखक और प्रकाशक में ऐसा गहरा संबंध देखने को नहीं मिलता। यही कारण रहा कि केदारनाथ ने दिल्ली के प्रकाशकों का प्रलोभन ठुकरा कर परिमल से ही अपनी कृतियाँ प्रकाशित करवाईं। उनका पहला कविता संग्रह 'फूल नहीं रंग बोलते हैं' परिमल से ही प्रकाशित हुआ था। जब तक शिवकुमार जीवित थे, वह प्रत्येक जयंती को उनके निवास स्थान पर गोष्ठी और सम्मान समारोह का आयोजन करते थे।

सम्मान एवं पुरस्कार

सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार

साहित्य अकादमी पुरस्कार

हिंदी संस्थान पुरस्कार

तुलसी पुरस्कार

मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार

साभार : भारत डिस्कवरी 


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