Thursday, November 3, 2016

OMAR -UMAR VAISHYA - ओमर उमर वैश्य

जगन्नाथपुरी एवं द्वारिका पुरी अधिवेशनों के समय अखिल भारतीय ओमर-ऊमर वैश्य महासभा की गौरव यात्रा लेख लिखते समय वैश्य समाज एवम् उनके उपवर्गो के प्रामाणिक इतिहास के बारे में शोधात्मक जानकारी की जिज्ञासा ने मेरे अन्तर्मन को आन्दोलित करना आरम्भ कर दिया था।

’वैश्य’ शब्द का प्रयोग वेदों में सर्वप्रथम ’पुरुष सूक्त’ में प्राप्त होता है।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासी दाहुराजन्यः कृतः।
उरु तदस्य यद्वैश्य पदाभ्यांशद्रो अजायत।।

तत्पश्चात इसकी विस्तृत व्याख्या श्रीमद्भगवत गीता के 18वें अध्याय के श्लोक 44 में मिलती है-

’कृषि गोरक्ष्य वाणिज्यं वैश्य कर्म स्वभावजम’
अर्थात खेती, गोपालन और क्रय विक्रय रुपी सत्य व्यवहार ये वैश्य के स्वाभावित कर्म है।

वैश्यों के उपवर्गो का प्रामाणिक इतिहास सामान्यतः उपलब्ध न होने की बात मैंने 2010 के प्रकाशित लेख में की थी। परंतु अंतर्मन में अपने उपवर्ग के प्रमाणिक इतिहास को खोजने की उत्कंठा इस शोध का कारक बनी।

अनेक स्थानों के नाम ओमर-ऊमर शब्द प्रतिध्वनित करते हुये यथा उमरिया, उमरी, उमराहट, उमरेड आदि नाम के ग्राम भारत के अनेकों स्थानों पर मिलते हैं। परंतु वह जाने से इसका सम्बंध ओमर ऊमर वैश्य समाज से स्थापित न हो सका। अध्ययन तथा शोध कार्यो का दौर चलता रहा, पुरातत्वविदों एवम् इतिहासकारों से सतत चर्चा भी चलती रही ओर इस ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के दौरान कानपुर परिक्षेत्र के इतिहास पर ’ ’कानपुर एक सिंहावलोकन’ का सम्पादन एवम् लेखन हिन्दुस्थान समाचार-बहुभाषी संवाद समिति के कानपुर संभाग का सचिव होने के नाते मेरे द्वारा किया गया। इस रचना यात्रा में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकारियों के सम्बंध भी प्रगाढ़ हुये तथा उनके माध्यम से जानकारियाँ जुटनी आरम्भ हुयी।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित प्रदेशों की जातीय जनगणना सर्वप्रथम 1871 में की गयी और उसके आधार पर विलियम क्रुक द्वारा लिखित पुस्तक ष्ज्तपइमे ंदक ब्ेंजमे वि छवतजीमद प्दकपं ॅमेजमतद च्तवअपदबमे ंदक व्नकीष् जो सन् 1896 में प्रकाशित हुई। जिसमें ओमर-ऊमर वैश्य जाति के बारे में अभिलेखीय आधार सर्वप्रथम प्राप्त हुये जिसमें इन जातियों की प्रभावी बसावट कानपुर तथा मिर्जापुर में विशेष रूप से मानी गई तथा इस वैश्य जाति को मूलतः तत्कालीन अवध प्रांत के बनियों की एक उपजाति के रूप में प्रदशित किया गया परंतु इसका कोई ऐतिहासिक विवरण नही लिखा गया।

जब अभिलेखीय ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं प्राप्त हुये तो पुराणों के वर्णित वंशावलियों एवम् कथानकों का अध्ययन मैंने आरम्भ किया। ईश्वर की अनुकम्पा से मुझे पद्म पुराण में स्वर्ग खण्ड के 30 वें तथा 31 वें अध्याय के यमुना स्नान के महत्व में वैश्य हेमकुण्डल की कथा नारद-युधिष्ठिर संवाद में मिली।

नारद जी ने युधिष्ठिर से कहा कि इसविषय में मैं तुमसे एक प्राचीन इतिहास का वर्णन करता हूँ। पूर्वकाल के सत्ययुग की बात है। निषध नाम के सुन्दर नगर में एक वैश्य रहते थे। उनका नाम हेमकुण्डल था। वे उत्तम कुल में उत्पन्न होने के साथ ही सत्कर्म करने वाले थे देवता, ब्राह्मण और अग्नि की पूजा करना उनका नित्य का नियम था। वे खेती और व्यापार का काम करते थे। पशुओं के पालन-पोषण में तत्पर रहते थे। दूध, दही, मट्ठा, घास, लकड़ी, फल, मूल, लवण, अदरख, पीपल, धान्य, शाक, तैल, भांति भांति के वस्त्र, धातुओं के सामान और ईख के रस से बने हुए खाद्य पदार्थ (गुड़, खाँड़, शक्कर आदि)- इन्ही सब वस्तुओं को सदा बेचा करते थे। इस तरह नाना प्रकार के अन्याय उपायों से वैश्यने आठ करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ पैदा की।

इस प्रकार धर्मकार्य में लगे हुए वैश्य के दो पुत्र हुए। उनके नाम थे- श्रीकुण्डल और विकुण्डल। उन दोनों के सिर पर घरका भार छोड़कर हेमकुण्डल तपस्या करने के लिये वन में चले गये । वहाँ उन्होंने सर्वश्रेष्ठ देवता वरदायक भगवान् गोविन्द की आराधना में संलग्न हो तपस्या द्वारा अपने शरीर को क्षीण कर डाला। निरंतर श्री वासुदेव में मन लगाये रहने के कारण वे वैष्णव-धाम को प्राप्त हुए, जहाँ जाकर मनुष्य को शोक नहीं करना पड़ता। तत्पश्चात् उस वैश्य के दोनों पुत्र जब तरुण हुए तो उन्हें बड़ा अभिमान हो गया। वे धन के गर्व से उन्मत हो उठे। उनका आचरण बिगड़ गया। वे दुर्व्यसनों में आसक्त हो गये। धर्म-कर्मोकी ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती थी। वे माता की आज्ञा तथा वृद्ध पुरुषों का कहना नही मानते थे। धन का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने वैश्याओं, गुंडों, नटों, मल्लों, चारणों तथा बन्दियों को अपना सारा धन लुटा दिया। ऊसर में डाले हुए बीज की भांति सारा धन उन्होंने अपात्रों को ही दिया।

इस प्रकारउन दोनों का धन थोड़े ही दिनों में समाप्त हो गया। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके घर में ऐसी कोई भी वस्तु नही बची, जिससे वे अपना निर्वाह करते। द्रव्य के अभाव में समस्त स्वजनों, बांधवों, सेवकों तथा आश्रितों ने भी उन्हें त्याग दिया। उस नगर में उनकी बड़ी शोचनीय स्थिति हो गयी। इसके बाद उन्होंने चोरी करना आरम्भ किया। राजा तथालोगों के भय से डरकर वे अपने नगर से निकल गये और वन में जाकर रहने लगे। अब वे सबकों पीड़ा पहुँचाने लगे। इस प्रकार पापपूर्ण आहार से उनकी जीविका चलने लगी।

तदनन्तर, एक दिन उनमें से एक तो पहाड़ पर गयाऔर दूसरे ने वन में प्रवेश किया। राजन! उन दोनों में जो बड़ा था, उसे सिंह ने मार डाला और छोटे को साँप ने डस लिया। उन दोनों महापापियों की एक ही दिन मृत्यु हुई। इसके बाद यमदूत उन्हें पाशों में बाँधकर यमपुरी में ले गये। वहाँ जाकर वे यमराज से बोले-धर्मराज आपकी आज्ञा से हम इन दोनों मनुष्यों को ले आये हैं। अब आप प्रसन्न होकर अपने इन किंकरों को आज्ञा दीजिये, कौन-सा कार्य करें? तब यमराज ने दूतों से कहा ’वीरो! एक को तो दुःसाह पीड़ा देने वाले नरक में डाल दो और दूसरे को स्वर्गलोक में, जहाँ उत्तम-उत्तम भोग सुलभ हैं, स्थान दो।’ यमराज की आज्ञा सुनकर शीघ्रतापूर्वक काम करने वाले दूतों ने वैश्य के ज्येष्ठ पुत्र को भयंकर रौरव नरक में डाल दिया।

मार्ग में अत्यन्त विस्मित होकर विकुण्डल ने दूत से पूछा-दूतप्रवर! मैं आपसे अपने मन का एक संदेह पूछ रहा हूँ। हम दोनों भाइयों का एक ही कुल में जन्म हुआ। हमने कर्म भी एक-सा ही किया तथा दुर्मृत्यु भी हमारी एक-सी ही हुई फिर क्या कारण है कि मेरे ही समान कर्म करने वाला मेरा बड़ा भाई नरक में डाला गया और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हुई? आप मेरे इस संशय का निवाण कीजिये। बाल्यकाल से ही मेरा मन पापों में लगा रहा। पुण्य-कर्मो में कभी संलग्न नहीं हुआ। यदि आप मेरे किसी पुण्य को जानते हो तो कृपया बतलाइये।

देवदूत ने कहा-वैश्यवर! सुनो। हरिमित्र के पुत्र स्वमित्र नामक ब्राह्मण वन में रहते थे। वे वेदों के पारगामी विद्वान थे। यमुना के दक्षिण किनारे उनका पवित्र आश्रम था। उस वन में रहते समय ब्राह्मण देवता के साथ तुम्हारी मित्रता हो गयी थी। उन्हीं के संग से तुमने कालिन्दी के पवित्र जल में, जो सब पापों को हरने वाला और श्रेष्ठ है, दो बार माघ-स्नान कियाहै। एक माघ-स्नान के पुण्य से तुम सब पापों से मुक्त हो गये और दूसरे के पुण्य से तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई है इसी पुण्य के प्रभाव से तुम सदा स्वर्ग में रहकर आनन्द का अनुभव करो। तुम्हारा भाई नरक में बड़ी भारी यातना भोगेगा। दूत की यह बात सुनकर विकुण्डल को भाई के दुःख से बड़ा दुःख हुआ। उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। वह दीन और विनीत होकर बोला- ’साधो! सत्पुरुषों में सात पग साथ चलने मात्र से मैत्री हो जाती है तथा वह उत्तम फल देने वाली होती है अतः आप मित्रभावना विचार करके मेरा उपकार करें। मैं आपसे उपदेश सुनना चाहता हूँ। मेरी समझ में आप सर्वज्ञ हैं, अतः कृपा करके बताइये, मनुष्य किस कर्म के अनुष्ठान से यमलोक का दर्शन नहीं करते तथा कौन- सा कर्म करने वे नरक में नहीं जाते हैं?

देवदूत ने विकुण्डल से कहा कि जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा कभी किसी भी अवस्था में दूसरों को पीड़ा नहीं देते तथा अहिंसा को परमधर्म मानते हैं। जो अपनी जीविका हेतु जलचर और थलचर जीव की भी हत्या नही करते। वर्णाश्रम धर्म में स्थित होकर शास्त्रोक्त रुप से ’ईष्ट’ अर्थात अग्निहोत्र, तप, सत्य, यज्ञ, दान, वेदरक्षा, आतिथ्य वैश्वदेव और धार्मिक कार्यो को तथा ’पूर्त’ अर्थात वावली कुंआ तालाब, देव मंदिर, धर्मशाला तथा बगीचे आदि की स्थापना में सतत लगे रहते है।। जो पंगु अंध बाल-वृद्ध, अनाथ रोगी तथा दरिद्रों का पालन पोषण करते हैं। गायों को गोग्रास अर्पण करते हुये गो सेवा करते हैं और गाय का पीठ पर कभी भी सवारी नहीं करते हैं, वे स्वर्ग लोक जाते हैं।

प्रतिदिन प्रातः स्नान करने वाले, बिना स्नान के भोजन न करने वाले, उपर्व में नदी स्नान करने वाले, पृथ्वी स्वर्ण और गौ का सोलह बार दान करने वाले, पुण्य तिथियों में तथा संक्रांति में स्नान दान करने वाले। सत्यवादी, प्रियवक्ता, क्रोधविहीन, सदाचारी, दूसरों की बात गुप्त रखने वाले तथा दूसरे के धन का लालच न करने वाले को कभी भी नरक यातना नहीं मिलती। जो तीर्थ को जीविका का साधन नहीं बनाता तथा गंगाजल में पवित्र होने वाला भी नरक में नहीं पड़ता।

जो परस्त्री के प्रति मातृभाव रखते हैं और माता पिता की देवता के समान आराधना करते हैं जो स्त्रियां अपने शील सदाचार की रक्षा करती हैं उन्हें उत्तम स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। वेद पुराण सुनने तथा उनके ऊपर निष्ठा रखने वाले का भव बन्धन नष्ट हो जाते हैं।

ँ नमो नारायण का जप करते हुये जो श्री हरि विष्णु का पूजन करते हैं, शालिग्राम शिला का पूजन कर उस पर चढ़ाये जल का आचमन करते हैं। एकादशी का व्रत रहने वाला अत्यंत पुण्य वान होता है और वह मनुष्य पितृकुल, मातृकुल एवं पत्नीकुल का उद्धार करने वाला होता जो शालिग्राम शिला के निकट श्राद्ध करता है उसके पितर सौ कल्पों तक स्वर्ग मे तृप्त रहते हैं। दरिद्र से दरिद्र को भी पत्र,फल,मुल तथा जल आदि देकर अपना जीवन सफल बनानाउ चाहिये। मनुष्य मोह के वशीभूत अनेकों पाप करके भी यदि श्री हरि के चरणों में मस्तक झुकाता है तो नरक में नहीं जाता।

इस सम्पूर्ण कथा से शोध के निम्न बिंदु के किनारे था।
1. विषध नगर अथवा क्षेत्र के किनारे था।
2. वह नगर पैराणिक एवं समृद्ध था।
3. वह यमुना के उत्तर तट पर बसा था और दक्षिण तट पर हरिमित्र का आश्रम था।
4. वैष्य पुत्रों को देवदूत द्वारा बताये गये पौराणिक धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किस वैश्य उपसर्ग द्वारा किया जाता है।
5. निषध क्षेत्र में पैराणिक ण्काल (लगभग 3000 पूर्व) के विष्णु और शिवमंदिरों के सांस्कृतिक अवशेष होने चाहिये।

इन बिन्दुओं के उत्तर ‘कानपुर एक सिंहावलोकन’ के प्रकाशन के दौरान मुसानगर के पुरातात्विक विवरणों में मुझे प्रतिबिम्बित होने लगे और मैं तथ्यों को संग्रह करने में जुट गया। उपवर्णित बिन्दुओं पर तार्किक पुरातात्विक शोध करने से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं।

‘निषध’ का शाब्दिक अर्थ जहाँ निषाद निवास करते हों होता है और यमुना के किनारे बसा मूसानगर निषाद बाहुल्य प्राचीन समृद्ध नगर पौराणिक काल से रहा है।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद् निंबियाखेड़ा के मंदिरों के खोजकर्ता श्री एल0एम0 बहल जी ने अपने लेख प्रौगतिहासिक क्षेत्र जनपद कानपुर में वैदिक इन्डेक्स के हवाले से सिद्ध करते हैं कि गंगा समुना के क्षेत्र में निषाद संस्कृति आर्य संस्कृति के पूर्व थी। इस संबंध में वे वैदिक साहित्य के विद्वान मैकडानल व कीथ के मत को निम्नवत प्रस्तुत करते हैं।

"The Vedic Aryans, on reaching the plains of northern India, encouraged certain aboriginals mtribes whom they called the Nishads and described them as having a dark complexion, short structure and flat nose (ans).” Vedic Indx Lender, 1912.

वैज्ञानिक परीक्षण एवं उससे प्राप्त परिणामों के साक्ष्यों के अनुसार इतना तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि ताम्रयुगीन ई.पू. 2100 वर्ष में तो अवश्य गंगा यमुना कांठे में पल्लवित रही होगी, सम्भवतः एवह इस काल से भी और अधिक प्राचीन रही हो।

जब हमने इस क्षेत्र के पौराणिक प्राचीन सांस्कृतिक एवम् पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन आरम्भ किया तो मूसानगर क्षेत्र (मूसानगर-उमरगढ़ काटर व आस-पास के गांव) उपरोक्त आधार पर चिन्हित होता है क्योंकि मूसानगर (उमरगढ़) यमुना के उतार मे है तथा उमराहट (हरिमित्र का आश्रम) यमुना के दक्षिण में हैं।

वर्तमान समय मे भारत के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर जनरल श्री राकेश तिवारी तथा पुरातात्वविद् राकेश कुमार श्रीवास्तव ने वर्ष 1993 में इस क्षेत्र का गहन सर्वेक्षण किया और उनके सर्वेक्षण पुरातत्व विभाग की पत्रिका प्राग्धारा के अंक 1 तथा अंक 4 में विस्तृत रूप् से फोटोग्राफ सहित प्रकाशित हुये उनके सर्वेक्षण के अनुसार
1. विन्ध्य क्षेत्र के भोजन संग्रह करने वाले मानव ने जब अनाज उगाना सीखा तो कदाचित् समुना-तट का यह भू-भाग भी उन्हें खेती के लिये उपयोगी लगा होगा। संभव है कि उन्होने कुछ दिनों यहाँ भी डेरा डाला हो। यहां से मिली पत्थर कुल्हाड़ी ऐसा सोचने के सूत्र प्रदान करती है। लेकिन ऐसी कुल्हाड़ियां तो किसी के द्वारा, किसी अन्य के स्थान से भी, यहां लायी जा सकती हैं ? इनका काल सामान्यतः 1500 ई0पू0 से पहले का होना चाहिए लेकिन कुछ जगहों के पुरातात्विक उत्खानों में ये उपकरण मध्यकालीन जमावों में भी पाये गये हैं, जो कि इनके मूल संदर्भ से स्थानान्तरित होने का पमाण प्रस्तुत करते हैं। इसलिये इस क्षेत्र से खेती की शुरूआत करने वाली सांस्कृतिक (नवाश्म काल) के अन्य पुष्ट प्रमाण और ऐसी कुल्हाड़ियों का प्रामाणिक सांस्कृतिक संदर्भ मिलन इस विषय में कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। ण्फिर भी, ऐसे प्रमाण मिलने की संभावनाओं की जांच तो होनी ही चाहिए।
2. मूसानगर के टीले से उत्तर हड़प्पायुगीन मुद्रा-छाप (मेसोपोटामिया की तत्कालीन मुद्रा-छाप से प्रभावित) का मिलना भी कुछ बताता है? क्या यहां के प्राचीन निवासियों का पश्चिमी भारत के हड़प्पा संस्कृति अथवा तत्कालीन अन्य संस्कृतियों से, परवर्ती युग में, कोई सम्पर्क था? यह अवशेष अन्य प्रकृति अथवा मानवजन्य कारणों से भी यहां आ सकता है? इस युग के अन्य सांस्कृतिक अवशेष क्या यहां मिलते हैं? एक ही साक्ष्य पर परिणाम निकालने का उपक्रम तर्कसंगत नहीं है ? इन आयामों को अग्रेतर अध्ययन की कसौटी पर कस कर ही कछ कहना श्रेयस्कर होगा।
3. पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दूसरी सहशास्त्री की संस्कृतियों की तस्वीरें धीरे-धीरें साफ हो जा रही है, पास ही के इटावा जिले के सई-पई से भी गेरूए रंग के बर्तनों वाली सुस्कृति (ओ.सी.पी. संस्कृति) के अवशेष मिल चुके हैं। लेकिन पूर्व-पश्चिम के बीच के इस भाग में तत्कालीन संस्कृतियों की पर्याप्त जानकारी अभी नहीं मिल सकी हैं ऐसा तो नहीं होना चाहिये कि यह भू-ीाग उस समय पूरी तरह सांस्क1तिक शून्यता में रहा हो? और खोंजे तो शायद पूर्व पश्चिम के कुछ सम्पर्क के कुछ सम्पर्क-सूत्र जुट जायें?
4. टीले के विस्तार और पूरे विस्तार में फैले सघन पुरावशेष यहां छोटी-मोटी बसावट नहीं बरन् एक बड़े नगर के रहे होने होने की कहानी संजाये दिखाते हैं। नगर की साधारण नहीं, ऐसा बड़ और महत्वपूर्ण कि जहां का शासक अष्वमेघ यज्ञ कराने का साक्ष्य लिखवा कर छोड़ गया? इससे यहां की उततलिक राजनैतिक सुदृढ़ता का ज्ञान भी होता है।
5. यहां की भौगोलिक स्थिति और परिस्थितिजन्य विशेषतायें भी बहुत कुछ कहती हैं? कौशाम्बी और उससे आगे प्रतिष्ठापुर वाराणसी , पाटलिपुत्र की और यमुना क ेजल मार्ग के जाने वाली व्यापारिक नौकाओं के बेड़े यहां विश्राम और व्यापार के लिये अवश्य लंगर डालते होंगे? यहां मिलने वाले मथुरा क्षेत्र के लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर के वास्तु अवशेष, सिक्के और मुदायें इस पक्ष को बहुत कुछ उतार करते दिखते हैं ?
6. इस नगर का राजनैतिक स्थायित्व लम्बे समय तक ऐसा रहा होगा कि शांतिपूर्ण जीवन जीने वाले नागरिक भिन्न-भिन्न मत-मतान्तरों, यथा बौद्ध-जैन-ब्राम्हण, को मानते हुए एक साथ रह सकें तथा व्यापार, कला और अन्य सकारात्मक कार्यों के लिये अनुकूल वातावरण बन सके।
7. यहां की अत्यन्त सुंन्दर मिट्टी और पत्थर की कृतियां कौशाम्बी और मथुरा काशी की कलाकृतियों से स्पर्धा करती दिखाती है। यहीं के शिल्पी और कलाकार इन्हें गढ़ते थे? या कहीं और के कलाविदों ने इन्हें रूपायित किया? कहीं से गढ़वा कर ये कृतियां यहां मंगवायी गयीं? अथवा श्रेष्ठ शिल्पियो की श्रेणी को यहां बुलवा कर दूरस्थ क्षेत्रों से आयातित पत्थर आदि सामग्री से इन कलाकृतियों को निरूपित कराया गया ?
8. यहां से मिले पुरावशेषों को काल-क्रम में रखने पर आसानी से कहा जा सकता है कि आज से कम से कम 3000 वर्ष के आस-पास तो यहां मानव बस्तियां बस गई थीं (यह अवधि कुछ और पीछे भी जा सकती है) और तब से यह स्थान निरन्तर आबाद रहा है (?)

लेखक द्वय ने अपने सर्वेक्षण के बिन्दु संख्या 9 में जिज्ञासा प्रस्तुत की किए ‘राजनैतिक प्रमुख’ स्थायी सामाजिक जीवन से युक्त धन-धान्य से परिपूर्ण, समुन्नत व्यापारिक केन्द्र और सर्व धर्म की इस महानगरी की ्रपाचीन पहचान क्या थी? किस नाम से अभिहित रही होगी यह नगरी? अश्वमेध यज्ञ कराने वाले यशस्वी देवमित्र किस वंश के कुल-तिलक थे? जिनके गौरव के प्रतीक टीले से मिलकर हमें कौतुक में डाल रहे हैं ? हमारे वे पूर्वज कौन थे ? गहरे डूबे तो शायद इन बातों का कुछ अता-पता चले ?’

उनके प्रश्न का उत्तर पद्म पुराण की यह कथा देती है कि उस नगरी का नाम ‘निषध’ था क्योंकि पद्म पुराण की कथा में वर्णित भौगोलिक आधार पर मुसानगर यमुना के उत्तर में है एऔर उसकी पौराणिक बसावट उमरागढ़ है तथा यमुना के दक्षिण तट पर वर्णित हरिमित्र के आश्रम का स्थान ‘उमरहट’ के नाम स जाना जाता है। इस क्षेत्र में यमूना ‘ऊँ’ का आकार बनाती है। यहां पर उमर शब्द की उत्पत्ति तथा क्षेत्र के ग्रामों के नामकरण हेतु बिन्दु संख्या 4 की चिवेचना समीचीन होगी।

वस्तुतः पद्म पुराण के आख्यान में वर्णित धार्मिक परम्पराओं का पालन तत्कालीन मूसानगर क्षेत्र के वैष्य वर्ग करना आरम्भ किया जिसमें प्रमुख धारा ऊँ हरि की शरण में जाना तथा यमुना के ऊँ आकार के कारण ऊँ हरि आस्था समूहों का विकास रहा जो कालान्तर में अपभ्रंस होकर ओमर-ऊमर हुआ। इसी कारण तत्कालीन नगर जिसे वहां लोग गढ़ का भूकम्प में उलटना मानते हैं को ‘उमरगढ़’ तथा ‘हरिमित्र आश्रम’ के स्थान हो ‘उमरहाट’ ‘ऊँ’ हरि के लोगों का मिलन स्थल कहने लगे तथा समूह के वैष्यों को ओमर-ऊमर। इस समाज का विस्तार हुआ जो यमुना गंगा दोआब में प्रचलित हुआ और वहां के पुरातात्विक तथा सांस्कृतिक अवशेष एवं देवदूत द्वारा धार्मिक परम्पराओं का पालन ओमर-ऊमर वैश्यों द्वारा करने के कारण उपरोक्त तथ्या सिद्ध होता है।

धार्मिक दृढ़ता से सजातीय विवाह पद्धति विकसित हुइ्र और वह आज भी प्रचलित है। मुसानगर उमरगढ़ के प्राप्त अवशेष यह प्रमाणित करते हैं वहां पर समृद्ध नगर तथा विष्णु, शिव मंदिर थे इन मंदिरों में पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियां थीं।

मोक्ष प्राप्त करने हेतु इस क्षेत्र में निवास करने तथा देवदूत द्वारा वर्णित धार्मिक परम्पराओं का पालन करने के कारण इस क्षेत्र को ‘मोक्ष नगर’ के रूप् में चर्चित किया गया जो कालान्तर में अपभ्रंश होकर ‘मूसानगर’ हुआ। भवबन्धन से मुक्ति प्राप्त करने हेतु अश्वमेघ आदि यज्ञ कार्य यहाँ सम्पन्न होने लगे। इस कारण इसे मुक्तानगर भी कहा गया। मुक्तादेवी मन्दिर का यहाँ पर होना इस तथ्य की पृष्ठि करती हैं।

श्री तिवारी एवम् श्रीवास्तव के सर्वेक्षण के अनुसार वैष्णव प्रतिमाओं में नृसिंह, वामन वराह, चतुर्भुज विष्णु, सर्प, गरूड़, सूर्यपुत्र रेवन्त, सप्त मातृकाओं, लज्जा गौरी, कुबेर ब्रह्मा एवं शिव मूर्तियां मुक्ता देवी मंदिर परिसर में संग्रहीत हैं तथा इस क्षेत्र के अनेक मन्दिरों में प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष रखे हैं। इस संदर्भ में निम्न चित्र अवलोकनीय हैं। इनका काल निर्धारण ईसा पूसर्व काल खण्ड है और प्राप्त पुरावशेषों का काल खण्ड पुराण रचना कल से मेल खाता है।

मूसानगर के टीले से समय-समय पर प्राप्त पुरावशेषों में से पालिशयुक्त प्रस्तर-कुल्हाड़ (पालिस्ड स्टोन शेड) उत्तर हड़प्पा युगीन मुद्रा छाप, चित्रित धूसर पात्र (पी.जी.डब्ल्यू.), उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (एन.बी.पी. वेयर) काले लाल पात्र (ब्लैक एण्ड रेड वेयर), तथा शुंग-कुषाण और मध्यकाल काल के परवर्ती पात्र, शुंग-कुषाण काल के तांबे के सिक्के, अस्थि-बाणाग्र एवं सूजे, मिट्टी और पत्थर के मनके, अभिलिखित मुद्रा-छापे (इन्सक्राइब्ड सीलिंग्स), शुंग-कुषाण कालीन वदिका-स्तम्भ एवं सूचियों, ब्राम्हण-जैन-बौद्ध प्रतिमाएं और मृणमुर्तियां तथा जले हुये अन्न आदि के अवशेष इस स्थल के बहुआयामी पुरातात्विक महत्व का परिचय देते रहे हैं।

मुक्ता देवी मंदिर-परिसर में संग्रहीत प्रतिमाओं में से सिंह के साथ प्रदर्शित शिव की कुषाण कालीन दुर्लभ प्रतिमा अने विशिष्ट लक्षणों के लिए मूर्ति-कला विशेषज्ञों द्वारा बारम्बार चर्चित होती रही है। यहां की अन्य मूर्तियांं का अध्ययन शोध का विशिष्ट विषय बन सकता है। हाल ही मे मूसानगर के निकट स्थित काटर और उमरगढ़ से प्रकाश में आये प्रथमशती ई0पू0 के अत्यंत सुन्दर तोरण-द्वार के अवशेषों से प्रकाश में आये प्रथम शती ई0पू0 के अत्यंत सुन्दर तोरण द्वार के अवशेषों ने एक बार फिर एक क्षेत्र की ओर ध्यान आकृष्ट काराया है। इससे उनको द्वारा कराये गये मंदिर निर्माण की सत्य सिद्ध होती है।

देवदूत द्वार बताये गये धार्मिक परम्पराओं का पालन यथा, कुंआ तालाब बनवाना, सोलह संस्कारों में स्वर्णदानए तथा गौदान करना, गंगाजल का उपयोग, एकादशी व्रत तथा संक्रान्ति में स्नान दान प्रतिदिन प्रातः स्नान करके ही भेजन ग्रहण करना, शालिग्राम पूजन तथा चरणामृत पान, ऊँ नमो नारायण की दीक्षा लेकर जप करना। अहिंसा आदि परंपराओं का पालन अभी भी किया जाता है। दूसरों की बात गोपनीय रखने के कारण यहाँ के वैष्यों ने ‘गुप्त’ तथा ‘गुप्ता’ का उपनाम अंगीकार कर मूल नाम के उपरान्त लगाना आरम्भ कर दिया जो अभी भी प्रत्रलित है।

मूसानगर में श्रृंगारयुत महिलाओं के दर्शित श्रृंगार प्रतीक अभी भी परम्परागत रूप् में विवाह में तथा पूजन में ‘सुहाग टिपरियां’ देवी को अर्पित करने में किया जाता जो इस बात का प्रमाण है कि मूलतः ओमर-ऊमर समाज इसी क्षेत्र का मूल निवासी था। उसमें दर्शित जेवर अभी भी परम्परागत रूप् से विवाह में कन्या को पहनाकर उसका पंच चुड़ भी बनाया जाता है।

श्री तिवारी तथा श्रीवास्तव ने अपन द्वारा लिखित बिंदु 5 में लिखा है कि मूसानगर जलमार्ग से व्यापारिक क्षेत्रों से जुड़ा था अतः यहां के व्यापारी जलमार्ग से आगे बढ़े और कौशाम्बी के पतन के पश्चात् इलाहाबाद से आगे प्रमुख व्यापारिक केन्द्र मिर्जापुर में जा बसे इसीलिये वहां ऊमर वैश्य बड़ी संख्या में हैं। विकास के साथ साथ यह साजए मैदानी क्षेत्रों में भी फैल गया।

यदि मूसानगर को केन्द्र मानकर 25 मील 25 मील की परिधि खींचा जाये जो वर्तमान ओमर-ऊमर समाज के मूलग्राम यथा-मूसानगर, पुखरायां, गढ़ाथा, कुटरा मकरन्दपुर, रेउना, गजनेर, हमीरपुर, मौदहा, बिदोखर, बीबीपुर, जहानाबाद, भरूआ सुमेरपुर, पतेयुरा, अमौली, गढ़ी बिन्दकी बुढ़वां दौलतपुर, बारा, देवमई, रमईपुर, मझावन, नौरंगा तथा जहानाबाद आदि प्रमुख ग्राम इसी क्षेत्र में हैं। उन्नीसवीं सदी में कानपुर बसने के कारण ओमर-ऊमर समाज की बड़ी मात्रा में यहाँ बस गया तथा कुछ लोग गंगा पार शाहजहांपुर, मल्लावां, हरदोई तिलहर, शाहाबाद, बिलग्राम आदि में बस गये।

अकबर के शासनकाल में हुए जमीन बन्दोबस्त में मूसानगर का क्षेत्र कोड़ा जहानाबाद सरकार में निहित हुआ। अतः इस क्षेत्र के ओमर समाज को जहानाबादी, गंगापार क्षत्र के समाज को पछइयां तथा मिर्जापुर तथा पूर्वांचल के समाज को ऊमर थोक कहा जाने लगा।

यह समपूर्ण विवेचना भली प्रकार सिद्ध करती है कि पद्म पुराण में वर्णित कथा के आधार पर ‘ऊँ हरि’ आस्था समूहों से ओमर-ऊमर समाज का प्रादुर्भाव मूसानगर क्षेत्र में ही हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह सिद्ध होती है कि यदि पुराणो के कथानकां की पुरातात्विकों आधार पर मीमांसा की जाये तो वह सर्वथा सत्य प्रमाणित होते हैं।

यह मेरी शोध का सारांश है। मेरा प्रयास है ि कइस शोध को विस्तृत रूप से एक ग्रथ के रूप में प्रस्तुत किया जाये ताकि ओमर-ऊमर वैष्य समाज अपनी प्राचीनता एवम् इतिहास को अक्षुण्ण रूप् से संरक्षित कर गौरवान्वित हो।

इस शोध कार्य हेतु मैं भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर जनरल श्री आर.के. तिवारी, इसी विभाग के विद्वान श्री एल.एम. बहल, कानपुर के वरिष्ठ संरक्षण सहायक श्री मनोज वर्मा, श्री आर.एन. त्रिवेदी (पूर्व आई.ए.एस.), कानपुरियम के संयोजक श्री मनोज कपूर संस्कृत भाषा के ज्ञाता श्री संदीप गुप्ता आदि का विशेष आभार ज्ञापित करता हूँ। अन्त में मैं सभी विद्वान तथा सुधीरजनों से अनुरोध करता हू ि कइस विषय में यदि अन्य जानकारी प्राप्त हो तो मुझे अवगत कराकर कृतार्थ करें।

आभार

महासभा केन्द्रीसय कार्य समिति सत्र 35 में महासभा अध्यक्ष श्री राम प्रकाश ओमर, महामंत्री श्री धर्म प्रकाश गुप्त, माननीय सुरेन्द्र कुमार गुप्त, ‘गोल्डी’ स्वजाति रत्न महेश गुप्ता एड., प्रचार मंत्री श्री श्यामि कशोर कुक्कू महिला परिषद अध्यक्ष श्रीमती बीना गुप्ता, युवजन संघ अध्यक्ष श्री अजय गुप्ता सहित अपने सभी पदाधिकारियों, कार्यसमिति सदस्यों, वरिष्ठ सलाहकारों तथा सभी सहयोगकर्ताओं तथा नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री कैलाश नारायण गुप्ता के प्रति अपना आभार ज्ञापित करती है और कामना करती है कि सबका सहयोग यथावत सदैव प्राप्त होता रहेगा।

लेख साभार :

Akhil Bhartiya Omar Umar Vaishya Mahasabha
omarumarvaishy.com/history.php

ओमर-ऊमर वैश्य जाति का उद्भव
शोधकर्ता - धर्म प्रकाश गुप्त

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