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Tuesday, December 20, 2011

वैश्य, एक विचार

वैश्य जाति पर हमेशा कुलदेवी महालक्ष्मी की तथा विद्या की देवी माँ सरस्वती की कृपा बनी रही हैं. माँ दुर्गा, माँ काली ने समय समय पर इस समाज के प्राणियों में खून का संचार किया हैं. चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक महान, सम्राट श्री गुप्त, चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, स्कंदगुप्त, कुमार गुप्त, उदयन, हर्षवर्धन, हेमू विक्रमादित्य, मौखरी वंश के सम्राट, पुष्य भूति वंश के सम्राट, भामाशाह, भगवान् श्री कृष्ण, नन्द राय जी, लाला लाजपत राय, महात्मा गाँधी, मनमंथ नाथ गुप्त, विष्णु शरण दुबलिश, विपिन गुप्त, दिनेश गुप्त, निलोंजनी कान्त गुप्त, इत्यादि ने समय समय पर अपना शौर्य प्रदर्शित किया हैं. विनोबा भावे जी ने कहा था की, कोई भी संस्था, सामाजिक कार्य बिना वैश्य के सफल नहीं हो सकता. बावन बुद्धि बनिया, आगे आगे शाह पीछे बादशाह, बनिया हाकिम, गज़ब खुदा करेगे बनिए, जुबान बनिये की, आदि कहावते इस समाज के लिए प्रसिद्द हैं. इस जाति ने देश को योद्धा दिए, वीर दिये, साहित्यकार दिये, समाज सेवी दिये, वकील दिये, डाक्टर दिये, वैज्ञानिक दिये, दानी दिये, महा दानी दिये, उद्योगपति दिये, न्यायाधीश दिये, इतनी संख्या हैं कि गिनते गिनते थक जाओगे, स्वाधीनता आन्दोलन तो बिना इनके अधूरा हैं, धर्मशाला, मंदिर, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, बावड़ी, पियाऊ, उद्योग, वैश्य जाति के कर्मस्थल हैं. यह समाज हमेशा गुण ग्राही रहा हैं, जहा से भी इसकी आत्मिक भूख शांत होती हैं, वह वंहा जाता हैं, करुणा, प्रेम, समानता, भाईचारा, शान्ति, सहानुभूति, अहिंसा, सद्भाव, धर्म -रूचि, सद्विचार, आदि गुण उसके जहँ में हैं. यज्ञ, गो सेवा में उसकी रूचि हैं.

जब वैश्य वर्ण का न्याय तराजू खतरे में हैं, कुलदेवी माता माँ लक्ष्मी का अपहरण कि आशंका हो, तलवार कलम से शक्ति शाली हो गयी हो, तब सभी वैश्य लोगो कि समाज को जरुरत हैं, समाज को साहित्य, संगीत, कला, राजनीति, धर्म से रु बरु कर दो. समाज कि कोशिश रंग भी ला रही हैं, समाज के महापुरुषो को मान्यता मिल रही हैं. उनके जन्म दिन पर छुट्टिया घोषित हो रही हैं, वामो का दिल पसीज रहा हैं, बहु जन सर्व जन बन चूका हैं, बहुत सारे समाज सेवियों ने मौर्चे संभाल लिए हैं, आशा हैं, आने वाले समय में हमें अपना पुराना गौरव मिल जायेगा, व्यापारी समुदाय कभी भी जाति वादी नहीं होता, वह सब को साथ लेकर के चलता है.वह सबका हैं, सब उसके लिए हैं.

निति में निपुण व्यक्ति को पुरूस्कार मिले ना मिले, इसका कोई महत्व नहीं हैं. वह तो निर्लेप होकर अपने कर्त्तव्य को पूरा करने में लगा हुआ हैं. हम २५ करोड़ वैश्य यदि अपनी जाति पाती को भुलाकर एक हो जाये, और रोटी बेटी का संबंध स्थापित करले, तो हम मज़बूत होंगे, हिन्दू मज़बूत होंगा, देश मज़बूत होंगा.

वन्देमातरम