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Tuesday, April 28, 2026

वैश्य जाति में उपजातियों का सृजन

वैश्य जाति में उपजातियों का सृजन

जैन विद्दानों ने वैश्यों की उपजातियों का वर्णन किया है। कर्नल टाड ने 84 उपजातियों का वर्णन किया है। लेकिन प्रश्न यह है कि उपजातियों का विभाजन किस प्रकार हुआ। उनके सूजन का आधार क्या था। इस विषय में हम निम्न आधारों पर विचार करते हैं:

1. कर्म के आधार पर वर्गीकरण आदिकाल में कुछ

ब्राह्मणोचित कर्म त्यागकर, आजीविका हेतु वैश्य कर्म स्वीकार करने पर ब्राह्मण वैश्य बने। इसी प्रकार क्षत्रिय लोगों ने युद्ध में हार जाने या हिंसा छोड़ देने पर आजीविका हेतु वैश्य कर्म अपनाया तथा वे क्षत्रिय वैश्य बने। इसी प्रकार कुछ शूद्रों को शूद्रोचित कर्म त्यागकर वैश्य कर्म धारण करने पर शूद्र वैश्य बने।

2. श्रेणी के आधार पर विभाजन

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल

अपने गुप्त अभिलेख में लिखते है कि गुप्त कालीन अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि वैश्य जन छोटी-छोटी समितियां बनाकर या समूह बनाकर व्यापार करते थे। कालांतर में ये समितियां या समूह ही श्रेणी के रुप में विकसित हुए। यहीं से उपजातियों के सृजन की श्रंखला प्रारंभ हो गई। इस श्रेणी परंपरा में वैश्य जाति की जो उपजातियां बनीं वे आज भी मौजूद हैं। जैसे बारहसैनी, चौसेनी, यज्ञसेनी, अग्रसेनी, महासेनी, शूरसेनी आदि।

3. जनपद के नाम पर विभाजन वैश्य जाति की कुछ

उपजातियां जनपद विशेष, स्थान विशेष तथा क्षेत्र विशेष के नाम पर विकसित हुई। निम्न उदाहरण ये स्पष्ट करते हैं:

1. अग्रोहा जनपद से अग्रवाल वैश्य

2. बुलंदशहर जनपद से बरनवाल वैश्य

3. मथुरा जनपद से माथुर वैश्य

4. माहौरगढ़ जनपद से माहौर वैश्य

5. गौलेर जनपद से गुलहरे वैश्य

6. मोरवरी जनपद से मौर्य वैश्य

7. अयोध्या जनपद से अयोध्यावासी वैश्य

8. खंडेला जनपद से खंडेलवाल वैश्य

9. चुरू जनपद से चुरूवाल वैश्य

10. मध्यदेशीय जनपद से मध्यदेशीय वैश्य

11. जायस जनपद से जायसवाल वैश्य

12. पोरवंदर जनपद से पोरवाल वैश्य

13. मारवाड़ जनपद से मारवाड़ी वैश्य

14. कन्नौज जनपद से कान्याकुब्ज वैश्य

15. धूसर जनपद से धूसर वैश्य 

16. पाली जनपद से पालीवाल वैश्य 

17. मेड़ता जनपद से मेड़तवाल वैश्य

18. टाँक जनपद से टौंकवाल वैश्य

19. खातर जनपद से खातरवाल वैश्य

20. ओसिया  जनपद से ओसवाल वैश्य 

इस प्रकार हम देखते है कि जनपद, क्षेत्र या स्थान विशेष के द्वारा अनेक वैश्य उपजातियां बनीं।

4. वस्तु विशेष का व्यापार करने पर विभाजन : जैसे गुड़ का व्यापार करने पर गुड़ियां वैश्य या गुलहरे वैश्य, लोहे का व्यापार करने पर लोहिया वैश्य, केसर का व्यापार करने पर केसरवानी वैश्य, पिस्ते का व्यापार करने पर पिसरवानी वैश्य, लवण का व्यापार करने पर लाड़वाणि या लाड़वानी वैश्य, कपड़े का व्यापार करने पर तन्तुवाय वैश्य, तेल का व्यापार करने पर तैलिक वैश्य। इस प्रकार वस्तु विशेष का व्यापार करने पर अनेकानेक उप-जातियों का निर्माण हुआ।

5. अल्ल के आधार पर उपजातियों का विभाजन : वैश्य जाति में कुछ उपजातियों का निर्माण अल्लों के आधार पर हुआ। अल्ल के आधार पर  अल्लों का निर्माण निम्न प्रकार हुआ:

1. राजपुरिया

2. विलासपुरिया

3. भरतपुरिया

4. कमलपुरिया

5. अग्निपुरिया

6. सौरोठिया

7. मारोठिया

8. मजीठिया

9. तेनगुरिया

कालांतर में इन्ही अल्लों के आधार पर भी उपजातियों का विभाजन हुआ तथा इस प्रकार अनेकानेक उपजातियों का निर्माण हुआ।

सन 1882 में वैश्य जाति का सर्वप्रथम संगठन स्थापित हुआ जो अखिल भारतीय वैश्य महासभा के रुप में प्रतिस्थापित हुआ। इसके वर्तमान अध्यक्ष प्रेमशंकर गर्ग बुलंदशहर हैं। उन्होंने बताया कि 8 जनवरी सन् 1901 में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को अखिल भारतीय वैश्य महासभा ने एक पत्र लिखा कि वैश्य जाति की उपजातियों को वणिक, बनिया या वर्वकाल ना लिखकर 'वैश्य' लिखा जाए।

(साभार : वैश्य जाति का गौरवमयी इतिहास)

Website: www.vaishbharati.com

AGRAWAL HISTORY FROM KURUVANSH

AGRAWAL HISTORY FROM KURUVANSH

बहुत पहले श्री त्रिलोक सिंह धाकरे जो की एक राजपूत लेखक थे उनके द्वारा लिखित एक पुस्तक " राजपूतो की वंशावली और इतिहास महागाथा " प्रकाशित की थी जिद्मे अग्रवाल वैश्यों की उत्पत्ति कुरु वंश से बतायी हैं उसके कुछ प्रकाशित प्रष्ट नीचे दे रहा हूँ




1. तौमर वंश का प्रथम राज्य - हस्तिनापुर महाभारत समाप्ति के बाद हस्तिनापुर की राजगद्दी के महाराजा

सत्यार्थप्रकाश समल्लोस 11 के अनुसार

1. महाराजा युधिष्ठिर इन्होने 36 वर्ष 8 महा 25 दिन राज्य किया है इन्होने राजसूय यज्ञ भी किया है। 2.अभिमन्यु ये महाभारत में वीरगति को प्राप्त हुए इन्होने राज्य नहीं किया इनके समय से कलयुग प्रारम्भ हुआ। 3. परीक्षित ने 60 वर्ष राज्य किया। 4. जनमेजय (इन्होने जरसन आबाद किया तथा 84 वर्ष 7 माह 23 दिन राज्य किया। 5. अश्वमेघ ने 82 वर्ष 8 माह 22 दिन राज्य किया। 6. द्वितीय राम ने 88 वर्ष 2 माह 8 दिन राज्य किया। 7. छत्रमल ने 81 वर्ष 11 माह 27 दिन राज्य किया। 8. चित्र रथ ने 75 वर्ष 3माह 18 दिन राज्य किया इन्होने चीन व रूस को आबाद किया। 9. दुष्टशैल्य या बल्लभ सेन ने बलिया बल्लभ या बल्लमीपुर बसाया। इन्हाने 75 वर्ष 10 माह 14 दिन राज्य किया 10. अग्रसेन इनके वंशज अग्रवाल वैश्य उन्होने अग्रोह शहर आबाद किया इन्होने 78 वर्ष 7 माह 21 दिन राज्य किया। 11. सूरसेन अग्रसेन के भाई थे इनका हाल अज्ञात हैं 12. भुवनपति इन्होने 69 वर्ष 5 माह 5 दिन राज्य किया। 13. रणजीत ने 65वर्ष 10 माह 4 दिन राज्य किया। 14. रिक्षक ने 64 वर्ष 7 माह 4 दिन राज्य किया। 15. सुखदेव ने 62 वर्ष 24 दिन राज्य किया । 16. नृहरिदेव 51 वर्ष 10 माह 2 दिन राज्य किया। 17. सुचिरथ ने वर्ष माह दिन 18. सूरसेन ने 58वर्ष 10 माह 8 दिन राज्य किया। 19. पर्वत सेन ने 55 वर्ष 8 माह 10 दिन राज्य किया । 20, मेघावी ने 52 वर्ष 10 माह 10 दिन राज्य किया। 21. सोनवीर ने 50 वर्ष 8 माह 21 दिन राज्य किया। 22. भीमदेव ने 47 वर्ष 8 माह 20 दिन राज्य किया। 23. नृहरिदेव द्वितीय ने 45 वर्ष 11 माह 23 दिन राज्य किया। २४. पूर्णमल ने 44वर्ष 8 माह 6 दिन राज्य किया। 25. पूर्ण मल के 2 पुत्र हुए कारादेव व धर्मदेव (धुलियान शाखा) इनका हाल अज्ञात हैं। 26 अलमाक ने 50 वर्ष 11 माह 8 दिन राज्य किया। 27. उदयपाल ने 38 वर्ष 9 माह राज्य किया। 28. दुवन पाल ने 40वर्ष 10 माह 26 दिन राज्य किया। 29. दमात ने 22 वर्ष राज्य किया। 30. भीमपाल ने 58वर्ष 5माह 8 दिन । 31. क्षेमक ने 48 वर्ष 11 माह 21 दिन राज्य किया। अपिराजा विश्रवा ने क्षेमक को मारकर 17 वर्ष 3 माह 21 दिन राज्य किया इसके बाद फिर इसी वंश (तौमर वंश) ने राज्य किया। 32. मानक राजा 33. जायकराजा 34. जोधाराजा 35. जलभरत राजा 36. कन्नराजा इसके 15 पुत्र हुए 37. सम्राट अनंगपाल तौमर प्रथम 734ई-754ई.

सम्राट अनंगपाल प्रथम के वंशज - 1. अनंगपाल प्रथम 2. बामदेव 3. गंगादेव 4. पृथ्वीमल 5. जयदेव 6. नरपाल 7. उदयपाल 8. अप्रिश देव 9. पिपलराजदेव 10. रघुपाल देव 11. तिलहनपाल देव 12. गोपाल देव 13. सुलखनपाल देव 14. जयपाल 15. कुमारपाल, 16. अनंगपाल

8. अग्रवाल वंश (कुरूवंश की आठवी शाखा)

अग्रवाल वंश (निकास तौमर वंश से)

महाराजा अग्रसेन तोमर वंश में महाराजा युधिश्ठिर के 10वी पीढी में और महाराजा जनमेजय की 7वी पीढी में हुए इन्होंने अग्रोहा शहर बसाया और अग्रवाल वंश की स्थापना की। अग्रवालों का विवाह रिश्ता 36 कुरी के राजपूतों में नही होता है।

अग्रवंश भासकर में पृष्ठ 10 पर अग्रवालों की कुल 84 शाखाओं का वर्णन है। इनमें से 18 शाखायें राजपूतों की है। कई विद्वानों का मत है कि अग्रवालों के केवल 18 ही शाखायें है, सही नही है, उनका यह भी मत है कि अग्रसेन महाराज के अठारह पुत्र थे जिनसे ये भिन्न-भिन्न शाखायें चली। यह मत सही नहीं है। क्यों कि यदि ये अठारह सगे भाई होते तो फिर इनमें परस्पर वैवाहिक संबंध क्यों होते हैं? वास्तव में अग्रोहा नगर के संस्थापक महाराज अग्रसेन और उसके पुत्रों को जैन धर्म के आचार्य स्वामी लोहाचार्य जी ने अहिंसा का महत्व समझाया था। अंत में राजा ने एक वृहद्ध यज्ञ किया जिसमें भारत के सभी राजाओं को निमंत्रित किया था। इस युद्ध में पूर्वी राजस्थान के 18 राजकुमार सम्मिलित हुए थे। और अहिंसा परमो धर्मः का उपदेश ग्रहण कर वैश्य बन गये थे। इनका विवरण इस प्रकार है ।

नाम राजकुमार

1. गुलाब देव

2. गैदूमल

3. करण

4. मणीपाल

5. भृन्देव

6. द्रावकदेव

7. सिन्धुपाल

8. जैत्रसंघ

9. मंत्रीपति

10. तम्बोलकर्ण

11. ताराचन्द्र

12. वीरमान

13. घ्वसुदेव

14. नारसेन

15. अमृतसेन

16. इन्द्रसेन

17. माधवसेन

18. गोधर

गोत्र असली

गर्ग

गोमिल

कश्यप

कौशिक

वशिष्ठ

धौम्य

सांडिल्य

जेमिनी

मैत्रेय

तांडव

तिगंल

तेतिरेय

वत्स

धान्यान

नागेन्द्र

मांडव्य

ओर्व

मुकुल

गौतम

वैश्य होने पर गोत्र

गर्ग

गोहिल या गोयल

कंछन

कांसल

विन्दल

ढलन

सिंधल

जिंदल

मित्तल

तायल

बांसल

देरण

नागिल

मंगल

ऐरन

मधुकुल

मोहन

वैश्यों में अग्रवाल वैश्य, ओसवाल वैश्य, माहेश्वरी वैश्य, खंडेलवाल वैश्य, विजयवर्गीय वैश्य, सरावगी वैश्य तथा जैन वैश्य की उत्पत्ति राजपतों से हई हैं

रमेशचन्द्र राजस्थानी जातियों की खोज पृष्ठ 5

AGRAWAL A STUDY - अग्रवाल शब्द का अध्ययन

AGRAWAL A STUDY - अग्रवाल शब्द का अध्ययन

महाराजा अग्रसेन की संतति अग्रवालों के बारे में विभिन्न विद्दानों ने अपने मत दिये है। सबसे पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सन १८७१ में भविष्य पुराण से ली गई महालक्ष्मी व्रत कथा के आधार पर अग्रवाल जाति कि उत्पत्ति नाम की पुस्तिका प्रकाशित की थी। इस छोटी सी पुस्तिका में उन्होनें अग्रवाल शब्द की विवेचना करते हुए ये विचार व्यक्त किए कि अग्रवाल शब्द संभवत अग्रवाल शब्द की रुपांतर है, इसका विवेचन करते हुए उन्होनें बताया कि यह शब्द अग्रबाल है जिसका सीधा अर्थ है अग्रसेन के बालक अर्थात अग्रसेन के वशंज

दूसरी धारणा जग्गनाथ प्रसाद रत्नाकर द्वारा प्रस्तुत की गई है उनके अनुसार अग्रवाल शब्द अग्रपाल शब्द से बिगड़कर बना है। उनके अनुसार अग्रवाल क्षत्रिय थे तथा सेना के अग्रभाग में रहते थे जिसकी वजह से वे अग्रपाल कहलाए तथा यही शब्द बाद में अग्रवाल कहलाया। लेकिन अग्रभागवत के अनुसार अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। अठारहवें यज्ञ में पशु बलि से उन्हें घृणा हो गई इसलिए उन्होने क्षत्रिय धर्म छोड़कर वैश्य धर्म अपना लिया।

डॉ परमेश्वर लाल गुप्ता एवं कुछ अन्य विद्दानों ने मत व्यक्त किया है कि व्यवसाय में लगे समुदाय को वाल प्रत्यय लगाकर व्यक्त करने के उदाहरण है जैसे पत्थर वाले, गोटे वाले, टोपी वाले आदि इसी प्रकार सुंगधित लकड़ियों के व्यापार करने वाले या यज्ञ सामग्री का व्यापार करने वाले अगरवाल कहलाये। उस समय यज्ञ का बहुत अधिक महत्व था। इसलिए अगर का व्यवसाय बहुत उन्नति पर होगा तो इन्होनें अपनी अलग श्रेणी बना ली होगी।

डॉ राय गोविंद चंद तथा अन्य विद्वानों के अनुसार स्थान विशेष पर रहने वालों में से कुछ उपजातियां बनी, जैसे चुरु जनपद से चुरुवाल, पोरबंदर से पोरवाल, खंडेला जनपद से खंडेलवाल, वरन के रहने वाले वरनवाल, मथुरा के माधुर कहलाये, उसी प्रकार अग्रोहा के रहने वाले अगरवाल कहलाये, जो बाद में अग्रवाल शब्द में परिवर्तित हो गया। डॉ सत्यकेतु विद्यालंकार तथा हिंदी के सुप्रिसद्द व्याकरणाचार्य पं अंबिका प्रसाद वाजपेयी भी इसी मत के हैं। उसके अनुसार बूढा आपा-बुढापा हो जाता है, उसी प्रकार अगरवाल से अग्रवाल हो जाता है। अगरवाल, अईरवाल, अयरवाल, सब एक ही विश्लेषण के विभिन्न रुप है। मूल शब्द अग्र है तथा वाल इसमें प्रत्यय लगाकर शुद्द शब्द अग्रवाल बना हैं

अग्रवालों के अठारह गोत्र

महाराजा अग्रसेन ने तत्कालीन 18 कबीलों को अर्थात 18 उपजातियों को अर्थात 18 श्रेणियों को एक सूत्र में आबद्द कर सुसंगठित वैश्य अग्रवाल जाति का निर्माण किया तथा उनके रक्त की शुद्धा और पवित्रता के लिए उन्हें गोत्र प्रदान किया। एक गोत्र का व्यक्ति अपने गोत्र में वैवाहिक संबंध स्थापित नही कर सकता था। रक्त शुद्दि और संस्कारों की पवित्रता के लिए वैश्य अग्रवालों को दूसरी जाति में वैवाहिक संबंध स्थापित करना भी निषिद्द था।

गोत्र धारण करने का तरीका-अठारह श्रेणियों को एक सूत्र में आबद्द करने हेतु एक वैज्ञानिक तरीका अपनाया गया जिसके अनुसार अठारह यज्ञ किये गए। पहले दिन गर्ग ऋषि के द्वारा यज्ञ कराया गया तथा गर्ग गोत्र प्रदान किया गया। दूसरे दिन गोभिल ऋषि द्वारा यज्ञ कराया, तथा गोयल गोत्र प्रदान किया गया, तीसरे दिन गौतम ऋषि द्वारा यज्ञ से गोयन गोत्र, चौथे दिन वातसल्य ऋषि से बंसल गोत्र प्रदान किया गया। पांचवे दिन कौशिक ऋषि ने कंसल गोत्र दिया, छठवें दिन शांडिल्य रिषि दारा सिंहल गोत्र, सातवें दिन माण्डलिक ऋषि द्वारा मंगल गोत्र, आठवें दिन जैमिनि ऋषि ने जिंदल गोत्र, नौवें दिन तांडय ऋषि द्वारा तिंगल गोत्र, दसवें दिन औरण ऋषि द्वारा ऐरण गोत्र, ग्यारहवें दिन घौम्य ऋषि द्वारा धारण गोत्र, बारहवें दिन मुदगल ऋषि द्वारा मधुकुल गोत्र तेरहवें दिन वशिष्ठ ऋषि द्वारा बिंदल गोत्र, चौदहवें दिन मैत्रेय ऋषि द्वारा मित्तल गोत्र प्रदान किया गया। पंद्रहवें दिन तेतिरय ऋषि द्वारा तायल गोत्र प्रदान किया गया, सोलहवें दिन भारद्वाज ऋषि ने भंदल गोत्र प्रदान किया, सतरहवें दिन नगेंद्र ऋषि ने नागल गोत्र प्रदान किया, अठारहवें दिन कश्यप ऋषि द्वारा कुच्छल गोत्र प्रदान किया गया। यद्यपि पशु बलि ना देने के कारण यज्ञ अधूरा छोड़ दिया गया था तथापि गोत्र प्रदान की कार्यवाही पूरी हो चुकी थी।

गोत्र

प्रस्तावित ऋषि

गोत्र

प्रस्तावित ऋषि

1 गर्ग गर्ग

10 ऐरण औरण

2 गोयल

गोभिल

11 धारण धौम्य

3-गोयन गौतम

12 मधुकुल मुदगल

4-बंसल वात्सलय

13 बिंदल वशिष्ठ

5 कंसल

कौशिक

14 मित्तल मैत्रेय

6 सिंहल शांडिल्य

15 तायल तैत्तिरय

7 मंगल माण्डक

16 भंदल भारदाज

8 जिंदल जैमिनि

17 नागल नागेंद्र

9 तिंगल तांडय

18 कुच्छल कश्यप

SABHAR : वैश्य भारती || अगस्त-सितम्बर 2017 13

VAISHYA VANIK HISTORY AND ORIGIN - वैश्य समाज का इतिहास और वैश्य शब्द की उत्पत्ति

VAISHYA VANIK HISTORY AND ORIGIN - वैश्य  समाज का इतिहास और वैश्य शब्द की उत्पत्ति 


वैश्य शब्द विश् धातु में क्विप् प्रत्यय लगने से बना हैं। विश् धातु का अर्थ है विशति, प्रविश्ति, प्रान्तरादावित घूमने वाले लोग। पाणिनी ने पाणि को ही वैश्य की संज्ञा दी।' पाणिनी ने वैश्य के लिए अर्यः शब्द का भी प्रयोग किया हैं। अर्यः स्वामि वैश्ययोंः (3/1/103)²

आर्यो के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में विश् शब्द का उल्लेख मिलता हैं। इस का प्रारम्भिक प्रयोग समूचे जन-समुदाय के अर्थ में किया जाता था। आर्य सभ्यता का विकास उन विश नामक कबीलों से प्रारम्भ हुआ, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे। अन्त में वे जहां बस गये, उसी का नाम जनपद पड़ गया। जन का अर्थ है- कबीला और पद का अर्थ है स्थान। विश का नाम बड़ा ही महत्त्वपूर्ण था क्योंकि सम्पूर्ण समाज इस के अर्न्तगत आता था। जब आर्य भारत वर्ष में विस्तृत रूप से फैल गये और खेती-बाड़ी करते हुए जीवन यापन करने लगे, तो वे विश कहलाने लगे। डा० परमेश्वरी लाल गुप्त का मत है कि वैदिक काल के आरम्भ में सारी जनता विश नाम से जानी जाती थी उनके अनुसार विश का अर्थ है- बैठना। घुमने फिरने के बाद जब आर्य लोग एक स्थान पर बैठ कर स्थायी रूप से व्यवसाय करने लगे तो उन की बस्ती बिश कहलाने लगी और धीरे-धीरे वहां बसने वालों का नाम विश या श्य हो गया। सस्कृत भाषा में यह अर्थ अभी तक चलता है।

विशत्याशु विशमवशय  कृष्णादाय  रुचिशुची।

वेदाध्ययनापन्नः स वैश्य अति संज्ञित: ।। (बदन पुराण)

इस विश में कुछ लोग ऐसे थे, जो शस्त्र क्रिया में दक्ष थें, उन्हें क्षत्रिय तथा मंत्रादि रचने की क्षमता रखते थे, उन्हें विश में 'ब्राह्मण' की संज्ञा से सम्बोधित किया गया।

कुछ समय उपरान्त ऐसा लगता है- इस विश समुदाय से ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग हो गये, जो बचे वे विश कहलाते रहें। यही शब्द बाद में विश्य और वैश्य हो गया।'

किन्तु बाद में जब मनुष्य ने वर्ण-व्यवस्था में एक निश्चित रूप प्राप्त कर लिया, तो विश शब्द का उपयोग समाज के उस वर्ग को व्यक्त करने के लिए किया जाने लगा, जो कृषि, गोपालन तथा व्यापार में संलग्न था।

भारतीय परिकल्पना के अनुसार ब्रहम् ही सृष्टि के आदि कर्त्ता है। उन्हें विराट पुरूष की संज्ञा दी गई है। ब्रहम् ने एक से बहुत होने की कामना (एकोऽहं बहुस्यामः) से सृष्टि का विस्तार किया। ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में उसकी सुन्दर व्याख्या मिलती है। वैश्य शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य ऋग्वेद में सब से पहले पुरूष सूक्त अथार्त दशम मण्डल में आता है, जो अपेक्षाकृत आधुनिक है।

ब्राह्मणोऽस मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः
उरू तदस्य यद्वैश्यःपद्भ्यां शूद्रो अजायत् ।। (1.0/90/12)*

सम्पूर्ण सृष्टि को उस विराट पुरूष का अंग मानते हुए. उसकी कल्पना शरीर के चार अंगों के सन्दर्भ में की गई है। उस के अनुसार ब्रह्म के मुख से ब्राह्मणों की, भुजाओं से क्षत्रियों की, जंघाओं से वैश्यों की और पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। इस परिकल्पना के मूल में समाज को सुचारू रूप से चलाने की भावना ही थी। यह व्यवस्था गुण-कर्म के आधार पर थी  जिनकी परम्पराएं आपस में  मिलती-जुलती थी। जब वे पूर्ण रूप से उनमें घुल मिल गये तो उनकी सतत पर्यटनशील वृत्ति के कारण उनका नाम वैश्य पड़ गया।'

भारत के सामाजिक इतिहास में वर्ण व्यवस्था का महत्त्पूर्ण स्थान है, जो सामाजिक विभाजन के रूप में वैदिक काल से आज तक उत्तर से दक्षिण तक निरन्तर प्रवहमान है। इस व्यवस्था के अर्न्तगत भारतीय समाज का वणों में विभाजन किया गया था।

भारतीय साहित्य में वर्ण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ है। मनु ने वेद के आधार पर वर्ण व्यवस्था का विकास किया है। यजुर्वेद (31/10-11) में जो

यत्पुरुषैव्यदधुः कतिधाव्यकल्पयन् ।
मुख किमस्पासीत्किम् बाहूकिमरू पादा उच्चते ।।

(यजुर्वेद 31/10-11)3

ब्राह्मणोऽस मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः ।
उरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यों शूद्रो अजायत् ।।

(यजुर्वेद 31/11)

वर्ण व्यवस्था प्रदर्शित की है, मनु ने उसी को यथावत् प्रस्तुत किया है यह व्यवस्था जन्मना न हो कर कर्मणा है। इस श्लोक में ओर

लोकानान्तु विवृद्धियर्थ मुख बाहूरूपायादातः ।
ब्राह्मणं क्षत्रिय वैश्यै शूद्र च निवर्तमत् ।। (1/31)5

मनुस्मृति में भी यह स्पष्ट किया गया है कि समाज में चार वर्णों का निर्माण मुख, बाहु, उरू और पैर की तुलना के अनुसार हुआ है और तदानुसार ही कर्मों का निधारर्ण किया है।

नाविशेषीऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।
ब्राह्मणा पूर्व सृष्टा हि कर्माभिर्वर्णताऽव्गतम् ।। 88

वर्ण व्यवस्था कर्मो के आधार पर थी और उसमे समाज के कार्यों का चार वणों में इस तरह विभाजन कर दिया गया था, जिससे सृष्टि का क्रम ठीक ढ़ग से चलता रहे।'

अर्थवेद में उरू के स्थान पर मध्यतदस्थयद् वैश्य इस प्रकार की उक्ति है।

तैत्तिरीय संहिता (7/1/4/1/9) में कहा गया है कि प्रजापति ने वैश्य वर्ण अन्नाकार से उत्पन्न किया है।

सर्वईदं ब्राह्मण सृष्टं ऋगम्यों जातं वैश्यवर्णभाहुः
यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहु योनिम सामवेदों ब्राह्मणनाम प्रसूतिः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण3/12/93)²

तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है कि समस्त विश्व की सृष्टि ब्रह्मा द्वारा हुई है। ऋग्वेद  से वैश्य वर्ण उत्पन्न हुआ, यजुर्वेद से क्षत्रियों और सामवेद से ब्राह्मण उत्पन्न हुए।

इसमें वैश्य वर्ग का निर्धारण, कर्म के आधार पर, एक ऐसे समुदाय के लिए किया गया, जिसका मुख्य कार्य कृषि, गोपालन और व्यापार माना गया। श्री वामन पुराण में कहा गया कि वैश्य गण यज्ञाध्यययन से सम्पन्न, दाता, कृषि कर्त्ता तथा वाणिज्य जीवी हो तथा पशुपालन का कर्म करें।

ऋग्वेद में वैश्यों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। इन्हें विश, पाणि आदि संज्ञाएं प्रादन की गई हैं। यास्काचार्य ने पाणियो को ही व्यापारी कहा है - पाणिर्वणिग मवति (2/17)

प्राचीन समय में जब मुद्रा का प्रचलन तथा वस्तुओं का आदान-प्रदान ही वस्तु प्राप्ति का साधन था, तो वस्तुओं का आदान-प्रदान करने वालों को पाणि की संज्ञा दी गई। बाद में आर्यों के प्रसार के कारण समाज का विभाजन जब आर्य और अनार्य में होने लगा, तो आर्यों ने पाणि लोगों को अपने में मिला लिया, क्योंकि कृषि, गोपालन, शाकाहार आदि की कार्य वैश्य वर्ण का मुख्य कर्म था 

कामभोगीप्रियास्तीक्ष्णः क्रोधिना प्रियसाहसाः ।
त्यक्त स्वधर्मारक्ताडव्ग्रास्त द्विजाः क्षत्रतांगता ।।
गोभ्यो वृतिमास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः ।
स्वधर्मान्नानुतिष्ठन्ति ते द्विजाः वैश्यतां गताः ।।
हिंसानृत, प्रिय लुब्धा, सर्वकर्मोपजीविनः ।
कृष्णाः शौच परिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रांता गताः ।। 91 (महा० भा० शा० पूर्व० अ० 188)' (मनुस्मृति 1/88-91)

जो व्यक्ति इन कर्मों का पालन करेगा, वह उस उस वर्ण का अधिकारी होगा।

वर्ण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'वृञ वरणे' अथवा वरी धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'चुनना या वरण करना। 'वर्ण और वरण' शब्दों मे साम्य भी है। संभवतः 'वर्ण' से तात्पर्य वृत्ति से है, किसी विशेष व्यवसाय के चुनने से। समाज शास्त्रीय भाषा में 'वर्ण' का अर्थ 'वर्ग' से है, जो अपने चुने विशिष्ट व्यवसाय से आबद्ध है। वास्तव में वर्ण उस सामाजिक वर्ग की ओर इंगित करता है जिसका समाज में विशिष्ट कार्य और स्थान है, जो अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण समाज के अन्य वर्गों अथवा समूहों से सर्वथा अलग होता है तथा अपने हितों की स्थितियों के विषय में जागरूक होता है।

स्वयं वर्ण शब्द इस व्यवस्था को कर्माधारित व्यवस्था सिद्ध करता है। निरूक्त में वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति दी है वर्णो वृणोतेः (2/1/4) अर्थात कर्मानुसार जिस का वरन् किया जाये वह वर्ण है। इस प्रकार प्रकाश डालते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं -

वर्णों वृणोतेरिति निरूक्त प्रामाण्याद् वर्णिया वरीतुमर्हाः गुणकर्माणि च दृष्टवा यथायोग्य त्रियन्ते  ये ते वर्णाः ।।
(ऋ० भा० भू० वर्णाश्रम कर्म विषय)"

दैवी सिद्धान्त के रूप में वर्ण व्यवस्था के उद्भव का वर्णन महाभारत में भी किया गया हैं, अन्तर केवल इतना है कि विराट पुरूष के स्थान पर ब्रह्मा का उल्लेख किया गया है।

ब्राह्माणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम । 
बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट उरूभ्यां वैश्य एवं च ।। 
वर्णानां परिचार्यार्थ त्रयाणां भरतर्षभ । 
वर्णश्चतूर्थः संभूत पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ।। (महाभारत शान्तिदवे 122.4-5)'

गीता में भी भगवान श्री कृष्ण का कथन है कि चारों वर्णों के सृष्टि मैने गुण और कर्म के आधार पर की है तथा मैं ही उन कर्त्ता और विनाशक हूँ ।

चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः । 
तस्य कर्तारमयि यां विद्धयकर्तारमव्ययम् ।। (गीता 4.13)2 

रामायण (3.14.29-30) के अनुसार 
मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा । 
उरूभ्यां जज्ञिरे वैश्या पद्मां शूद्रा

पुराणो में भी वर्णों का उद्भव ईश्वरीय माना गया है तथा वर्ण-व्यवस्था के महत्त्व को तद्वत् स्वीकार किया गया है।

त्वन्मुखात् ब्राह्मणास्त्वर्त्ता बाहोंः क्षत्रमजायत ।
वैश्यास्तवों रूजाः शूद्रास्तव पद्भ्यां समुद्गताः ।। (विष्णु पुराण 1.12.63-64)

वामदेवस्तु भगवान सृजन्मुखतो द्विजान् ।
राजन्यान् सृजद्दाहोर्वित् शूद्रानुरूपादयोः ।। (मत्स्य पुराण 4.28) 
वक्त्रादस्य ब्राह्मणः सम्प्रसूता यद्वक्षतः क्षत्रिया पूर्वभागे। 
वैश्याश्चारोर्यस्य पदभ्यांच शूद्राः सवै गात्रतः संप्रसूता। (वायु पुराण 9.113)

ग्बारहवी सदी के लेखक अरब यात्री अलबेरूनी ने भी वर्षों की उत्पत्ति के विषय में उद्धत कथनों से मिलता जुलता ही विवरण दिया है।'

वर्ण व्यवस्था -

किसी भी संगठित समुदाय के लिए कार्य-विभाजन की प्रणाली आवश्यक हो जाती है। प्रत्येक संगठित समाज के कुछ नियम होते हैं, जिन का उद्देश्य संगठन का स्थायित्व बनाए रखना और समुदाय के समस्त व्यक्तियों के पारस्परिक संबंध को सुव्यवस्थित बनाना तथा उसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने की व्यवस्था करना रहता है। ये नियम वैचारिक पृष्ठ भूमि में बनाए जाते है और समुदाय के कुछ व्यक्ति इसी चिन्तन के कार्य में लग जाते हैं। समुदाय के इस वर्ग को भारत में बाह्मण की संज्ञा दी गई। समुदाय की बाह्य और आन्तरिक सुरक्षा के लिए उपयुक्त विचारकों के द्वारा बनाए गए सामाजिक नियमों का पालन कराने के लिए समाज को एक प्रशासक वर्ग की भी आवश्यकता होती है, जिसे भारत में क्षत्रिय की संज्ञा दी गई। इन दोनों बगों के अतिरिक्त तीसरा वर्ग, जो सभ्यता के प्रारम्भ में खेती-बाड़ी, गोपालन तथा वस्तुओं के आदान-प्रदान में लगा, वह वैश्य कहलाया। प्रत्येक संगठित समाज में एक ऐसे वर्ग की आवश्यकता षड़ेगी, जो उपर्युक्त तीनों वर्गों अर्थात क्षत्रिय, बाह्मण, वैश्य की उन के कार्यों में सहायता करे। यह वर्ग स्वयं खेती-बाड़ी, गोपालन आदि सम्बन्धित सम्पत्ति के स्वामी के रूप में कार्य न कर सके अर्थात् वे स्वामियों के साहयक के रूप में कार्य करेगा। भारत में बही वर्ग शूद्र कहलाया।

बैश्य समाज वाणिज्य व्यवस्था द्वारा सभ्यता के प्रारम्भ काल से ही अपनी विशिष्ट छाप अंकित करता आया है। प्रारम्भ में वर्षों के सस्तरण में वैश्यों को तीसरा स्थान प्राप्त था और ब्राहमण क्षत्र्य वैश्य ऊपर के तीन  वर्ण माने जाते थे। इन को अध्ययन करने, यग्य करने और दान करने का अधिकार था  वैश्यस्थाध्यमनं भजन दान कृषि पशु पालन वनिज्या च. किनती कालान्तर में वैश्य वर्ण दान करने में तो अग्रणी रहा परन्तु बज्ञ और अध्ययन आदि में अन्य द्विज वर्षों में पिछड़ गया। इस का मुख्य कारण यह लगता है कि वैश्यों की जो श्रेणियां विशेष शिल्प या व्यापार पर आधारित की, उन के लिए शिक्षा का प्रबन्ध या तो पैतृक होता था अथवा श्रेणी द्वारा ही व्यवस्थित किया जाता था। उस के लिए किसी आचार्य के पास शिक्षा लेने के लिए जाना आवश्यक नहीं था।'

वर्ण और जाति-

भाषा कोश के अनुसार जाति शब्द जात (सं०) शब्द से व्युत्पन्न है। जात का अर्थ है - जन्म, पुत्र आदि। जाति भी एक तत्सम शब्द है जिसका मूल अभिप्राय पंक्ति से है, जो जाति-बिरादरी के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाव यह है कि जो एक पंक्ति अर्थात् एक वर्ग विशेष में उत्पन्न हुए हैं वे एक जाति हैं। अरबी में यह शब्द जात है जिसका अर्थ है - शरीर, देह, जाति आदि अर्थात् जिनमें पूर्वजों का समरक्त है, वह मानव समूह एक जाति है।

जाति शब्द से ही ध्वनित होता है कि इसमें मर्यादा की भावना अन्तर्निहित है। मर्यादा से तात्पर्य है कि कुछ विशिष्ट मान्यताएँ, क्रियाएँ, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाएँ उससे सम्बन्धित होती हैं, जिनमें कुछ ऐसे रीति-रिवाज भी होते हैं जिन्हें अन्धविश्वास के नाम से जानते हैं।

भारत में जाति प्रथा पीढ़ी दर पीढी अनेक शताब्दियों से चली आ रही है। हमारे देश में जाति अपरिवर्तनीय है, अर्थात् मनुष्य अपना धर्म बदल सकता है, किंतु अपनी जाति नहीं बदल सकता। हमारे पारिवारिक जीवन की आधारशिला जन्म से लेकर वैवाहिक व्यबस्था व मृत्युपर्यंत इसी जातिय तत्व पर अवलम्बित रहती है। पश्चिमी विद्वान टायलर ने जाति व्यवस्था की आवश्यकता का प्रतिपादन निम्न शब्दों में किया है "भारत में जाति समूह एक मौलिक सांस्कृतिक आवश्यकता है, किसी भी जाति की आदि परम्पराएँ, ज्ञान, बिशिष्ट संस्कार कला, नैतिक आचार-विचार, विश्वास, रूढ़ियाँ, रीति-रिवाज, आदतें एवं क्षमताएँ उस सांस्कृतिक धरातल में समाहित होते हैं जिनका प्रत्येक जातिय सदस्य कुछ परिवर्तन और कुछ संशोधन के साथ उन्हें वंशानुक्रम से आत्मसात और ग्रहण करता चलता

डॉ० वी०ए० स्मिथ ने बताया है कि जाति परिवारों के उन समूहों को कहते हैं जो आपस में संस्कार, वंश तथा कई विशेष कार्यों के लिए विशेष नियमों से बंधे हुए हैं।

वैदिक युग में 'जाति' जैसे किसी शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। उस समय केवल वर्ण व्यवस्था थी और कार्यानुरूप व्यक्ति को किसी वर्ण विशेष से जुड़ा मानते थे। उत्तर वैदिक युग के प्रारम्भ में विभिन्न वर्णों में पृथकता की भावना आरम्भ हो गई और तीनों वर्ण शुद्र वर्ण को अपने से अलग और त्याज्य मानने लगे।

भारत के प्राचीन शास्त्रकारों ने समाज को चार वर्षों में विभक्त किया है। ये चार वर्ण है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। पर भारत में जिन सैंकड़ों जातियो की सत्ता है, उन सब को किसी वर्ण के अर्न्तगत कर सकना सम्भव नहीं है। जाट और कायस्थ सदृश कितनी ही ऐसी जातियां हैं, वर्ण विभाजन की दृष्टि से जिन्हें किस वर्ण का माना जाए, यह निर्धारित नहीं किया जा सकता। शास्त्रों के अनुसार कृषि और पशुपालन वैश्यों के कार्य माने गये हैं और जाट जाति के लोग प्रायः कृषक और पशुपालक ही होते हैं। परन्तु वे स्वयं को वैश्य नहीं मानते। उन्हें न ब्राह्मणों के अर्न्तगत रखा जा सकता है न क्षत्रियों के और न शूद्रों के। कायस्थ जाति के लोग प्रायः मुंशी गिरी से अपना निवार्ह करते रहे हैं और उनमें शिक्षा का भी बहुत प्रचार रहा है, परन्तु उन्हें ब्राह्मण नहीं माना जाता। खत्री, अरोड़े प्रायः व्यापार और दुकानदारी के धन्धे करते है, परन्तु वे स्वयं को वैश्य नहीं समझते। गूजर, अहीर गडरिया आदि जातियों को किस वर्ण के अर्न्तगत रखा जाए, यह भी निर्विवाद नहीं है। नाई और बढ़ई सदृश जातियों के लोग स्वयं को ब्राह्मण कहने लगे है। अधिक ब्राह्मण उनके इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। वस्तुतः जातियों की वर्षों से पृथक व स्वतन्त्र सत्ता है और जातियों की उत्पत्ति तथा विकास का वर्ण-भेद के विकास के साथ कोई सुनिश्चित संबंध नहीं है।'

अष्टाध्यायी में वर्ण, जाति और बन्धु में तीन शब्द आये है। वर्ण प्राचीन शब्द था। उसके स्थान पर जाति शब्द चलने लगा था, जो इस अर्थ में अपेक्षाकृत नवीन था। कात्यायान और श्रोतसूत्र में जाति का अर्थ केवल परिवार है। एक वर्षा में उत्पन्न हुए व्यक्ति परस्पर स्वर्ण होते थें (6/3/85, समान वर्ण) जाति का एक एक व्यक्ति बन्धु कहलाता था। जात्यंताच्छ बेधुनि (5/4/9) सूत्र का अभिप्रायः यह है कि जातिवादी शब्द से द्दः प्रत्यय लगाकर उस जाति के एक व्यक्ति का बोध किया जाता है, जैसे ब्राह्मण जातीयः, क्षत्रिय जातीय वैश्य जातीयः।

गोत्र का सामान्य अर्थ है एक कुल, एक वंश, एक परिवार, एक खानदान अथवा एक कुनबा, जो कि एक मूल पुरूष से अपना सम्बन्ध मानता है। गोत्र का निर्माण एक वंशसमूह से होता है, दूसरे शब्दों में एक ही पूर्वज की सभी संतानें सम्मिलित की जाएं तो वे एक गोत्र का रूप धारण कर लेती हैं।

गोत्र अष्टाध्यायी का महत्वपर्ण शब्द है। पाणि के अनुसार अपत्यं पौत्र प्रभृति गोत्रम् (4/11/162) यह गोत्र की परिभाषा थी। इस का अर्थ था पौत्र, प्रभृति यद पत्यं तद् गोत्र संज्ञ भवति, अर्थात् एक पुरखा के पोते, पड़पोते आदि जितनी संतान होगी वह गोत्र कही जायेगी। गोत्र-प्रवर्तक मूल पुरुष को वृद्ध, स्थविर या वैश्य भी कहते है।

दिगम्बर जैनाचार्य श्री भद्रवीर सेन स्वामी ने ध्वला टीका में इस प्रकार गोत्र की परिभाषा की है गोत्रं, कुलं वंशः, सन्तानम्, भित्येको अर्थः ।

श्री माल पुराण के अनुसार -

कुल देवी प्रवक्ष्यामि गोत्रे गोत्रे पृथक-पृथक । 
वितृ स्थानादि कर्मादि शाखा सर्व प्रवर्तते ।।

डा० ए०एल० बाशम ने गोत्र का अर्थ गौ समूह बताया है।

पाणिनि व्याकरण के अनुसर गोत्रों और चरणों की भी पृथक जातियां होने लगी थी। भाष्यकार ने जाति की परिभाषा के अर्न्तगत गोत्रों और चरणों को भी गिना है-गोत्रंञच चरणैः सह (4/1/69)

भारतीय सामाजिक जीवन प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था पर आधारित किया गया, किन्तु कालान्तर में वर्ण का स्थान जाति ने ले लिया। आज लोगों के व्यवसाय, उद्योग धन्धो, खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, वैवाहिक संबंध, धार्मिक संस्कार रीतिरिवाज आदि सब जाति से ही निश्चित होते जा रहे है। वर्ण और जाति कालान्तर में बिल्कुल अलग-अलग संस्थाएं हो गई है। इस विकास प्रक्रिया में सामाजिक नियन्त्रण को शक्ति के रूप में वर्ण का महत्त्व घटता चला गया तथा जाति का महत्त्व बढ़ता चला गया।

वैश्यों के कर्त्तव्य-

वैश्यों के मुख्य कार्यों के संबन्ध में विभिन्न युगों में स्मृतिकारों ने भिन्न-भिन्न निर्देश दिए है।

गौतम धर्म सूत्र के अनुसार कृषि, वाणिज्य, पशुपालन और कुसीन्द वैश्यों के मुख्य कार्य थे। मनुस्मृति के अनुसार कृषि, पशुपालन रक्षा, दान देना, अध्ययन करना और कुसीन्द वैश्यो के कार्य हैं।

पशुनाम रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च
वनिक पथं कुशीदम च वैश्यश्च कृषिमेव च  

श्री बामन पुराण, अध्याय 75, श्लोक 46 में भी बताया गया है -

बज्ञाध्ययन-सम्बन्ना दातारः कृषिकारिणः।
पाशुषाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः ।।

वैश्य-गण यज्ञाध्ययन से सम्पन्न दाता, कृषिकर्ता तथा वाणिज्य-जीवी हों तथा पशु पालन का कर्म करें।'

महाभारत में कहा गया है कि कृषि, गौरक्षा और वाणिज्य वैश्यों के स्वाभिवक कर्म थे। वैश्यों का मुख्य कार्य था धनोपार्जन करना। वैश्यों धनार्जम कुयार्त।

महाभारत में उल्लेख आया है कि सर्वाधिक धनाढ्य होने के कारण राज्य को सर्वाधिक कर देने वाला वैश्य वर्ग ही था। उपातिष्ठनत कौनतेयं वैश्या इव कर प्रदाः

(2.47.28) 1

कौटिल्य ने भी अध्ययन, भजन, दान, कृषि, पशुपालन और वाणिज्य वैश्यों का कर्म बताया है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार :-

वैश्यस्य अध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपालाये वाणिज्या च

मनुस्मृति के अनुसार -

यो यत्र तत्र व्यवहारविधासु प्रविशति सः 'वैश्य'
व्यवहार विधाकुशलः जनो वा।

अर्थात जो विविध व्यवहारिक व्यापारों में प्रवष्टि रहता है या विविध व्यवहारिक विधाओं मे

कुशल जन वैश्य होता है।

ब्राह्मण ग्रंथो के अनुसार

एतद् वै वैश्यस्य समृद्धं यत् पशवः (ता० 18/4/6)
तस्मादु बहुषशवैश्व देवो हि जागतो (वैश्यः) (ला० 16/1/10)

पशुषालन से ही वैश्य की समृद्धि होती है। यह वैश्य का कर्त्तव्य है।

तैत्तिरीय संहिता (7/1/4/9) में कहा गया है कि प्रजापति ने वैश्य वर्ण अन्नाकार से उत्पन्न किया है।'

तैत्तिरीय संहिता (7.11.7) के अनुसार इस वर्ग का मुख्य कार्य पशुपालन और अन्नोत्पादन था।

वैश्य वर्ग का तीसरा स्थान था। बंजारा एवं पशुपालन की अवस्था का पार करने के पश्चात् आर्यों ने व्यवस्थित ढंग से कृषि काम अपना लिया। कृषि आर्यों की एक नई विशेषता हो गई। इस व्यवस्था में खेती, पशुपालन एवं व्यापार करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से वैश्य के कंधों पर आ गई। वैश्यों ने अनेक बस्तियों के बीच आर्थिक सम्बन्ध स्थापित किये। धीरे-2 वैश्यों का एक वर्ग किसान हो गया। इस वर्ग का मुख्य काम खेती हो गया। दूसरा वर्ग व्यापारियों का हो गया।

'वैश्य' का प्रधान कर्त्तव्य था पशुपालन कृषि और वाणिज्य। अध्ययन, भजन और दान तो वह करता था। किन्तु बाद में व्यस्तता के कारण अध्ययन का कर्म उस से छूट गया और उसनें अपना पूरा समय कृषि और वाणिज्य में लगाया। इस संबंध में बौधायन का कथन है कि कृषि और वेदाध्ययन परस्पर विरोधी हैं।

वेदकृषि विनाशाय कृषिर्वेद विनाशिनी।

(बौद्ध धर्म सूत्र 1.5.93-94)

प्रायः वैश्य व्यक्ति इन दोनो कर्मों को एक साथ अनुपालित नहीं कर पाता था इस लिए वैश्य वर्ण से अध्ययन छूट गया। उसने अपना पूरा समय अर्थ लाभ के निमित कृषि, पशुपालन वाणिज्य और कुसीद में लगाया।

वैश्यास्याधिकं कृषिवणिक्यालुपात्यंकुसीदम्

(गौतम धर्म सूत्र 10.1.3)'

इस काल के ग्रन्थों में हमें वाणिज्य शब्द मिलता है जिससे पता चलता है कि इस काल में व्यापार बड़े पैमाने पर होने लगा था। व्यापारी व्यापार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करते थे। महाजनी प्रथा की चर्चा हमें शतपथ ब्राह्मण में देखने को मिलती है जिसमें सूद पर रूपया देने की बात है। सूदखोर को कुसुदिन कहा गया है।

जैसे जैसे सामाजिक व्यवस्था सुदृढ होती गई, वैसे-वैसे धन-संग्रह का समाज में एक विशेष महत्त्व हो गया और ब्याज के लिए ऋण देना भी एक प्रमुख उधम हो गया। स्वाभावतः यह कार्य भी समाज के इसी वर्ण ने अपनाया, जिस के कारण आगे चलकर समृद्ध वैश्य सेठ या महाजन कहलाने लगे। यही वैश्य समुदाय राजा या जनपद को कर देता था। आपत्तिकाल में जन सामान्य की रक्षा करता था और युद्ध आदि के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन में भी एक प्रमुख स्थान प्राप्त करता था। विभिन्न स्त्रोतों से देश के आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर वैश्य समुदाय के प्रभाव एवं महत्व के प्रमाण मिलते है।

प्राचीन काल में वैश्य वर्ग एक सुसंगठित वर्ग बन गया था, जो कृषि, गोपालन, उधोग एवं वाणिज्य में लगा हुआ था। यही वे व्यवसायी हैं, जो समाज की मूल आवश्यकताओं को पूरा करते हैं तथा उस को समृद्ध और शक्ति प्रदान करते हैं। वैश्य वर्ग अपनी सुरक्षा की आवश्यकता के कारण एक संगठित वर्ग था। इसके सदस्यों को अपने व्यापार के सम्बन्ध में दूर-दूर तक यात्रा करना आवश्यक रहता था। क्षेमेन्द्र ने कथा मंजरी में धन गुप्त नामक वर्णिक का उल्लेख किया है जो ताम्रज्ञिप्ति से समीपवर्ती द्वीपों में जाकर व्यापार किया करता था।' इसलिए वे अपनी सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था स्वंय करते थे।

जैसा कि स्वाभाविक था धनोपार्जन के कार्य में लगे रहने के कारण यह वर्ग समाज का सबसे समृद्ध वर्ग बनता गया।

वैश्य वर्ण के लिए बौद्ध साहित्य में 'वेस्स' 'गृहपति', 'सेट्टि', 'कुटुम्बिक' आदि शब्द मिलते हैं। बौद्ध युग में वैश्य गृहपति भी कहे जाते थे। 'सेट्टि' अथवा सेठ (बड़े व्यापारी) के साथ-साथ वह बैंकपति और सार्थवाह भी था। सार्थवाह दूरस्थ प्रदेशों की यात्रा करते हुए व्यापार करते थे। काफिलों के साथ वे पश्चिम से पूर्व और पूर्व से पश्चिम की ओर सामग्री के आदान-प्रदान के लिए जाते थे। श्रावस्ती निवासी अनाथर्पिडक नामक श्रेष्ठि अपनी व्यापारिक सामग्री के साथ राजगृह आता जाता था। अमरकोश 378 में पान्थानं वहति सार्थवाह; उल्लेखित है।

बौद्ध युग में ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि उस काल में इस वर्ग ने अपनी समृद्धि और दान प्रियता के कारण समाज में अपना विशेष महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था।

महा वग्ग में एक श्रेष्ठी का वर्णन आया है जिसने अपने धन से राजा और व्यापारी निगमों का भला किया था। (8.1.16) जातक में अनेक ऐसे व्यापारियों का वर्णन आया है जिन्होने भिक्षु संघ को, राज्य को, समाज को करोड़ों रूपये का दान प्रदान किया था। मगध निवासी के एक सेठ ने भिक्षु संघ को अस्सी करोड़ कार्षापण का दान दिया था। भृंगार श्रेष्ठी की कन्या विशाखा ने श्रावस्ती में नौ करोड की लागत से बुद्ध के लिए चैत्यालय स्थापित किया था।'

गुप्त युग में स्थान-स्थान पर इन के दान देने की प्रवृति का उल्लेख हुआ है। गुप्त अभिलेखों के अनुसार वैश्य सदा से दानी, सदाव्रती, कर्म निष्ठ रहे। गुप्त राज्यों की रहन सहन अत्यन्त सीधी एवं सात्विक थी। फाह्यान ने लिखा है कि सारे देश में कोई अधिवासी हिंसा नहीं करता था। सम्पूर्ण भारतवासी साधारण जीवन में दाल, चावल, रोटी, दूध, घी, शक्कर आदि का प्रयोग करते थे। इनकी प्रवृति परलोकोन्मुखी अधिक थी। राज्य के निवासी भ्रष्टाचार, पाप-पुण्य से डरते थे। यह आख्यान वैश्यों की उस प्राचीन परम्परा की ओर संकेत करता है, जहां वे कर्म काण्डी होते हुए भी अहिंसा की ओर झुके थे। उसने आगे लिखा है कि 'जनपद के वैश्यों के मुखिया ने नगर में सदावर्त तथा औषधालय स्थापित किया था। फाह्यान ने सेठ सुदत्त द्वारा निर्मित विहार देखा था।"

नए नए व्यापारियों ने सुविधा एवं सुरक्षा दृष्टि से संगठित होकर रहना पसंद किया। इन लोगों का संगठन लगता है श्रेष्ठी अर्थात् प्रधान या मुख्य शब्द श्रेष्ठी से बना है। बाद के वैदिक ग्रंथ ऐतेरेय ब्राह्मण में श्रेष्ठी शब्द की चर्चा की गई है। यह शब्द शायद किसी व्यापारियों के संघ के प्रधान या श्रेष्ठ के लिए किया गया है।

गुप्त युग में उन्हें श्रेष्ठि, वाणिक सार्थवाह आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता था।

कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेख में कोटि वर्ष (उत्तरी बंगाल) के सार्थवाह बंधुमित्र का नाम मिलता है। तथा बंधुगुप्त के दामोदर पुर ताम्रपत्र में सार्थवाह बसुमित्र का नामोल्लेख है।

चाहमान लेखों में इन्हें वाणजारक बनजारा कहा गया है। समस्त वण्जारेषु वृषभभरित जतु पाइलाल गमने, (ए० इ० भाग 11 पृ० 43) अपनी समृद्धि और सामाजिक उपयोगिता के कारण जहां भौतिक दृष्टि से इस समुदाय ने बहुत उन्नति की, वहां एक दृष्टि से इस को क्षति भी उठानी पड़ी।

गुप्त सम्राट और स्वयं सम्राट हर्ष वैश्य था, उसने दान देने की अनोखी परम्परा कायम की। प्रति बारह वर्ष पर प्रयाग में एक धार्मिक मेला लगता था जहां सम्प्रट अपना सब कुछ दान कर खाली हाथों राजधानी वापस लौटता था। उनके व्यवसाय से राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती थी। अतः समाज में उनका आदर अधिक था। हवेनसांग ने भी लिखा है कि तीसरा वर्ण वैश्यों या व्यापारियों का था जो पदार्थों का विनियमन कर लाभान्वित होते रहे। (वाटर हवेनसांग भाग-1 पृ०68) वैश्य पूर्णतः एक ठोस जाति थी, जिस ने अपने व्यावसायिक कार्यों के कारण अपनी बिरादरी का नाम ऊँचा उठा लिया था। आचार्य भगवान देव ने अपनी पुस्तक हरयाणे के वीर यौधये में  वैश्य वर्ण का धर्म बताया है।'

तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः ।
अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्ष फलदा हिते ।।
यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवे मुस्तथापरे। 
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा ।
अग्नि होत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ।। 54 
वाणिज्यं सत्यथस्थानमातिच्यं प्रशमो दभः।
विप्राणं स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः 55

वैश्य जाति में उप जातियों का विकास

धर्म शास्त्र युग में जाति व्यवस्था का रूप और स्पष्ट कर दिया। इसका प्रारम्भ तीसरी शताब्दी से हुआ और धर्म का महत्व अधिक बढ़ जाने से ब्राह्मण ईश्वर और मनुष्य के बीच प्रतिनिधि माने जाने लगे। जाति के नियम कठोर बनाए गए तथा उनका तनिक भी उल्लंघन व्यक्ति को जाति-च्युत बना देता था। फलस्वरूप उपजातियों का निर्माण होना प्रारम्भ हो गया।

विभिन्न वर्ण धीरे-धीरे उपसमुदायों में विभक्त होने लगे। आरम्भ के चार वर्णों में से एक प्रकार के श्रम-विभाजन की व्यवस्था की गई थी। अब प्रत्येक वर्ण में श्रम-विभाजन की प्रक्रिया और आगे बढ़ी तथा एक वर्ण के अन्तर्गत आने वाले छोटे-छोटे समुदाय पृथक-पृथक उधमों में स्थायी रूप से लग गए। यह स्वाभाविक था कि जब कोई परिवार या समुदाय किसी विशेष उधोग में निपुणता प्राप्त कर ले और उस व्यापार या उधोग को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने की सारी व्यवस्था संगठित कर ले तो उस परिवार की आने वाली पीढ़ी भी उसी विशेष उधम में लगे। इस प्रकार विभिन्न उधम पुश्तैनी बन गए और जाति का आधार कर्म न होकर जन्म बन गया, जो कालान्तर में विभिन्न उपजातियों में पुनः विभाजित हो गया।'

जिन तत्वों ने वर्णों को विभिन्न जातियों में विभाजित कर दिया था, उन्हीं तत्वों ने आगे चलकर जातियों को उपजातियों में भी बांट दिया और वैवाहिक सम्बन्धों, खान-पान, छुआछूत आदि के सम्बन्ध में जो कट्टरता तथा निषेधात्मक प्रतिबन्ध जाति में थे, वही उपजातियों में भी आ गए। जातियों का उपजातियों में विभिक्त होते रहने का क्रम अत्यन्त प्राचीन है, किन्तु विद्वानों का यह मत है कि दसवीं शताब्दी के बाद से भारतीय समाज में जो राजनैतिक परिवर्तन हुए, और जिनके फलस्वरूप भारतीय धर्म और संस्कृति के लिए एक महान संकट उत्पन्न हो गया, उस का सामना करने के लिए और भारतीय धर्म और संस्कृ ति की रक्षा करने के लिए जातियां और भी सुदृढ़ बनती चली गई तथा इनको धार्मिक आधार प्रदान करके भारत ने अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा की।

उप जातियों का उद्भव मूलतः व्यावसायिक कारणों से हुआ किन्तु कालान्तर में इन उपजातियों का निर्माण दूसरे तत्वों ने भी किया। यही कारण है कि आज भारत में असंख्य जातियां पाई जाती हैं। उपजातियां कुछ तो कौटुम्बिक नामों से, कुछ व्यापारिक नामों से, कुछ शहर के नामों से, कुछ पेशों के नाम से और कुछ पदों के नाम के अनुसार बनती गई।'

व्यापारियों के लिए वणिक (3/3/52) और वाणिज (6/2/13) ये दोनो शब्द प्रयुक्त होते थे। व्यापारियों के नाम कई कारणों से पडते थे, उनके व्यापार की विशेषता से, व्यापार की वस्तुओं से, पूंजी के आधार पर अथवा वे जिन देशों में वाणिज्य करते हो उनके नाम से।

पणिनी ने एक विशेष प्रकार के व्यापारी को सांस्थानिक कहा है। (4/4/72 संस्थाने व्यवहरीत) संस्थान का अर्थ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। प्राचीन भारत में आर्थिक जीवन की तीन मुख्य संस्थाएं थी। शिल्पियों के संगठन को श्रेणी, व्यापारियों के संगठन को निगम (3/3/119, निगच्छन्तीति निगमः) और एक साथ माल लाद कर वाणिज्य करने वाले व्यापारियों को सार्थवाह कहते थे। व्यापारी वस्तुओं के नाम से भी प्रसिद्ध हो जाते थे, जैसे अश्ववणिजः, गोवणिजः (6/2/13) इसी प्रकार उन देशों के नाम से जिनके साथ वे प्रायः व्यापार करते थे, व्यापारियों का नाम पड़ा (गन्तव्य पव्यं वाणिजे 6/2/13) जैसे काश्मीर वाणिज, मद्र वाणिज, गान्धरि वाणिज (मद्रादिषु गत्वा व्यवहरान्तीत्यर्थः)

भारत के उत्तरी भाग में विदेशियों का दबाब जब अधिक होने लगा तब वहां से लोगों ने हटना प्रारम्भ किया, और यही जन यत्र-तत्र जा कर बसे, वहीं अपने देश व जनपद का नाम लेते गए। कालान्तर में जिनके नाम पर वे उप जातियों के रूप में प्रसिद्ध हुए, आचार-विचार में उनकी संस्कृति देश काल के अनुसार बदलती गईं, पर मूल देश का नाम वही रहा, यहीं से उपजातियों का इतिहास प्रारम्भ हुआ।

Saturday, April 25, 2026

BHAIBAND SINDHI LOHANA TRADER CASTE

BHAIBAND SINDHI LOHANA TRADER CASTE

भाईबंद (सिंधी: ڀائيبند), जिसका अर्थ है "भाईचारा", सिंधी समुदाय के भीतर एक हिंदू व्यापारी जाति है, जो ऐतिहासिक रूप से सिंध क्षेत्र (अब पाकिस्तान और भारत के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ) में केंद्रित है और लंबी दूरी के व्यापार और वाणिज्य में अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध है। लोहना जाति के एक उपसमूह के रूप में उत्पन्न, भाईबंद सिंधी हस्तशिल्प, वस्त्र, रेशम और जिज्ञासाओं के निर्यात में विशेषज्ञता रखते थे, जो सिंधवर्क के नाम से जाने जाने वाले वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से होता था, और 19वीं शताब्दी के मध्य से ही प्रमुख आर्थिक अभिनेताओं के रूप में खुद को स्थापित कर लेते थे।

आमिल जाति के विपरीत, जो शिक्षा, सिविल सेवा और प्रशासनिक भूमिकाओं को अपनाते थे, भाईबंदों ने परिवार-आधारित व्यावसायिक उद्यमों पर जोर दिया, अक्सर औपचारिक साक्षरता की तुलना में व्यावहारिक व्यापार कौशल को प्राथमिकता दी और रिश्तेदारी के संबंधों और व्यावसायिक रहस्यों को संरक्षित करने के लिए अपने समुदाय के भीतर अंतर्विवाही विवाहों को बनाए रखा। यह व्यावसायिक विभाजन, जो मीर जैसे शासकों के अधीन पूर्व-औपनिवेशिक सिंध में निहित था , ने भाईबंदों को प्राथमिक व्यापारिक वर्ग के रूप में स्थापित किया, जो 1843 के विलय के बाद ब्रिटिश सेनाओं को माल की आपूर्ति करते थे और अंतर्राष्ट्रीय विस्तार के लिए1869 में स्वेज नहर के खुलने का लाभ उठाते थे। उनकी व्यावसायिक प्रथाओं में लेखांकन के लिए हट्टा वार्नका नामक एक गुप्त लिपि का उपयोग शामिल था, जिसने अमिल जैसे बाहरी लोगों को बाहर रखा और उनके ट्रांसलोकल नेटवर्क को मजबूत किया।

भाईबंद प्रवासी समुदाय का इतिहास 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बॉम्बे, सिंगापुर, जापान और कैरिबियाई जैसे बंदरगाहों की ओर प्रवास के साथ गति पकड़ गया, जिसके बाद 1947 में भारत के विभाजन के बाद बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, जिसने 12 लाख से अधिक सिंधी हिंदुओं - जिनमें कई भाईबंद भी शामिल थे - को पूरे भारत (जैसे उल्हासनगर और मुंबई) और दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में बिखेर दिया। इन नए स्थानों में, उन्होंने हीरे, सोने और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में विविधता लाकर अनुकूलन किया, जबकि बॉम्बे में अस्पतालों, स्कूलों और शरणार्थी बस्तियों को वित्त पोषण जैसे परोपकार के माध्यम से मेजबान समाजों में योगदान दिया। 2025 तक, भाईबंदों सहित वैश्विक सिंधी हिंदू आबादी लगभग 8 मिलियन होने का अनुमान है, जिसमें भारत में लगभग 3 मिलियन और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 4.9 मिलियन लोग शामिल हैं। उल्लेखनीय उपसमूहों में हैदराबादी भाईबंद शामिल हैं, जिन्होंने सिंध के बाज़ारों में शहरी व्यापार पर प्रभुत्व जमाया, और सिंधवर्की, कुलीन व्यापारी जिन्होंने पूर्वी अफ्रीका, खाड़ी और यूरोप के लिए मार्गों का नेतृत्व किया। आज, भाईबंद एक महानगरीय पहचान का प्रतीक हैं, जो धार्मिक उदारवाद को आर्थिक लचीलेपन के साथ मिलाते हैं, हालाँकि उन्हें प्रवासी में भाषा परिवर्तन और अंतर-जातीय अंतरविवाह जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

शब्द-व्युत्पत्ति

"भाईबंद" शब्द सिंधी शब्दों भाई (जिसका अर्थ है "भाई") और बंद ( जिसका अर्थ है "समूह" या "बांधना") से लिया गया है, जिसका सामूहिक अर्थ "भाईचारा" या "भ्रातृ बंधन" है, जो इस व्यापारी समुदाय के लिए केंद्रीय सांप्रदायिक संबंधों को रेखांकित करता है। पुराने अंग्रेजी स्रोतों में इस शब्द को कभी-कभी "भाईबंद" लिखा जाता है।

भाषाई दृष्टि से, इसे सिंधी फारसी-अरबी लिपि में ڀائيبند और देवनागरी में भाईबंद के रूप में लिखा जाता है, जो इस क्षेत्र में हिंदू व्यापारियों द्वारा बोली जाने वाली सिंधी भाषा में इसकी जड़ों को दर्शाता है ।

सांस्कृतिक रूप से, "भाईबंद" का अर्थ केवल पारिवारिक रिश्तेदारी से कहीं अधिक है; यह व्यापारियों के बीच एक सामाजिक-आर्थिक गठबंधन को दर्शाता है, जो व्यापारिक नेटवर्क में आपसी समर्थन, विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देता है , जो रक्त संबंधों से परे जाकर व्यावसायिक साझेदारी और संघ जैसी संरचनाओं को भी शामिल करता है। सामूहिक एकजुटता पर इस जोर ने भाईबंद सदस्यों को व्यापक लोहाना जाति के भीतर एक उपसमूह के रूप में अलग किया , कठोर पदानुक्रमिक संबंधों पर वाणिज्यिक अंतरनिर्भरता को प्राथमिकता दी।

सिंधी जातियों से संबंध

भाईबंद , सिंधी हिंदुओं के बीच एक व्यापारी समुदाय, लोहना जाति के भीतर एक प्रमुख हिंदू जाति (उपजाति) का गठन करते हैं, जो व्यापार और वाणिज्य में अपनी प्रमुख भूमिका के कारण कार्यात्मक रूप से वैश्य वर्ण के साथ जुड़ा हुआ है । यह बदलाव सिंध में जाति वर्गीकरण की अनुकूली प्रकृति को दर्शाता है, जहाँ व्यावसायिक विशेषज्ञता ने अक्सर कठोर वर्ण पालन को पीछे छोड़ दिया, जिससे लोहाना - और विस्तार से भाईबंद - को उच्च जातियों के पूर्ण अनुष्ठानिक विशेषाधिकारों के बिना क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थान मिला।

भाईबंद के पैतृक संबंध उन्हें प्राचीन लोहाना वंश से जोड़ते हैं, जिसमें पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों, जिनमें जैसलमेर और जोधपुर जैसे क्षेत्र शामिल हैं , से हुए ऐतिहासिक प्रवास ने सदियों से सिंध में उनके बसने में योगदान दिया है । ये उत्पत्ति अन्य लोहना उपसमूहों के साथ एक साझा विरासत को रेखांकित करती है, विविध क्षेत्रीय प्रभावों के बीच सांप्रदायिक एकजुटता की भावना को बढ़ावा देती है , हालांकि भाईबंद नेपितृवंशीय रिश्तेदारी नेटवर्क और भाईचारे (भ्रातृ) संरचनाओं के माध्यम से विशिष्ट जाति पहचान बनाए रखी।

सिंधी जाति व्यवस्था के भीतर, भाईबंद सहित लोहानों के बीच अंतर -जातिगत गतिशीलता, अन्य जगहों की अधिक पदानुक्रमित भारतीय जातियों की तुलना में अपेक्षाकृत लचीली अंतर्विवाही को प्रदर्शित करती है , जिससे साहितियों जैसे सहयोगी समूहों के साथ सीमित ऐतिहासिक अंतर्विवाह की अनुमति मिलती है, जबकि समूह सामंजस्य को बनाए रखने के लिए व्यावसायिक सीमाओं को संरक्षित किया जाता है - जैसे कि भाईबंद का व्यापार पर ध्यान केंद्रित करना। यह तरलता, जो विभाजन-पूर्व प्रथाओं में स्पष्ट थी, अन्य क्षेत्रों में सख्त प्रतिबंधों के विपरीत थी, जिससे जातिगत भेदों को पूरी तरह से भंग किए बिना सामाजिक गठबंधन संभव हो सके।

ऐतिहासिक विकास

उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास

सिंधी हिंदुओं में लोहना जाति की एक उप-प्रजाति , भाईबंद समुदाय , अपनी प्राचीन जड़ों को सिंधु घाटी क्षेत्र के क्षत्रिय वर्ण की योद्धा परंपराओं से जोड़ती है । लोहना समुदाय अपनी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के रघुवंशी वंश से अपनी उत्पत्ति का दावा करता है । लोहनाओं ने धीरे-धीरे व्यापार और वाणिज्य की ओर व्यावसायिक बदलाव किया, विशेष रूप से 711 ईस्वी में सिंध पर अरब विजय के बाद मुस्लिम शासन के तहत क्षेत्र में व्यापारिक नेटवर्क के विस्तार के कारण, जिसने क्षेत्र को व्यापक इस्लामी व्यापार मार्गों में एकीकृत किया, जबकि हिंदू समुदायों को वाणिज्य पर ध्यान केंद्रित करके अनुकूलन करने की अनुमति दी। भाईबंद 19वीं शताब्दी में लोहाना केएक विशिष्ट व्यापारिक उपसमूह के रूप में उभरे ।

मध्यकाल में, सोमरा राजवंश (1024-1351 ईस्वी) और उसके बाद सम्मा राजवंश (1351-1524 ईस्वी) के तहत लोहाना और अन्य सिंधी हिंदू व्यापारियों ने व्यापार में अपनी भूमिका को मजबूत किया , जिसके दौरान सिंध ने हिंद महासागर और भूमि व्यापार नेटवर्क में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य किया, जो सिंधु घाटी को मध्य एशिया , अरब और उससे आगे जोड़ता था। इन राजवंशों ने देबल और थट्टा जैसे बंदरगाह शहरों के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया, जिससे व्यापारियों - मुख्य रूप से साहूकारों, कारीगरों और व्यापारियों - को हैदराबाद (18वीं शताब्दी में स्थापित लेकिन मध्ययुगीन व्यापार केंद्रों पर निर्मित) और नवाबशाह सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों जैसे उभरते शहरी केंद्रों में प्रारंभिक बस्तियां स्थापित करने में सक्षम बनाया 12वीं शताब्दी के भूगोलवेत्ता अल-इदरीसी सहित ऐतिहासिक वृत्तांत, इन आदान-प्रदानों में सिंध की भूमिका को उजागर करते हैं, जो हिंदू और मुस्लिम प्रभावों को मिलाकर एक समन्वित वातावरण में समुदाय के अनुकूलन को रेखांकित करते हैं।

मुस्लिम शासन के तीव्र होने से पहले, लोहना ग्रामीण सिंध में जमींदार और जागीरदार के रूप में भूमिका निभाते थे , व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ छोटी भूमि जोतों का प्रबंधन करते थे, जैसा कि 17वीं शताब्दी के व्यापारी-जमींदार सुजानमल जैसे पूर्वजों के उदाहरण से पता चलता है, जिनके परिवार के पास हैदराबाद के पास जागीरें थीं। यह दोहरी पहचान—भूमि राजस्व संग्रह में निहित होते हुए भी वाणिज्य की ओर उन्मुख— लोहना वर्ण के लचीलेपन को दर्शाती है, जिसमें भाईबंद शासन पर व्यापार पर जोर देकर प्रशासनिक अमिलों से खुद को अलग करते हैं।[2] प्रारंभिक आधुनिक युग तक , उनके नेटवर्क उत्तर की ओर फैलने लगे थे, जिससे बाद के प्रवासों की नींव रखी गई, हालाँकि प्राथमिक दस्तावेज़ीकरणइस प्रारंभिक चरण के दौरान अंतर- सिंध गतिशीलता पर केंद्रित है।

विभिन्न शासकों के अधीन सिंध में भूमिका

711 से 1843 ईस्वी तक सिंध पर शासन करने वाले मुस्लिम राजवंशों के दौरान , लोहाना वंश से उत्पन्न भाईबंद समुदाय मुख्य रूप से एक हिंदू अल्पसंख्यक समूह के रूप में वित्तीय सलाहकारों और व्यापारियों के रूप में कार्यरत था, जो तालपुरों सहित शासकों को आवश्यक आर्थिक सेवाएं प्रदान करते थे। वे एशिया भर में व्यापक व्यापार नेटवर्क का प्रबंधन करते थे , हुंडी के नाम से जाने जाने वाले विनिमय बिलों का लेन-देन करते थे और कृषि से होने वाले लाभ को मुस्लिम अभिजात वर्ग के साथ साझा करते थे, जिसके बदले में उन्हें अक्सर कर छूट और बिना किराए की भूमि जैसे विशेषाधिकार प्राप्त होते थे । गैर-मुस्लिम होने के नाते, भाईबंद धिम्मी व्यवस्था के तहत अल्पसंख्यकों पर लगाए जाने वाले पेशकुश कर का भुगतान करते थे , जिससे उन्हें अपने धर्म का पालन करने और जबरन धर्मांतरण से बचने में मदद मिलती थी । सीमित अभिलेखों के कारण इस अवधि के उनके जनसंख्या अनुमान अविश्वसनीय हैं, लेकिन वे शिकारपुर और कराची जैसे शहरी केंद्रों में महत्वपूर्ण थे , जहां उन्होंने वाणिज्य और साहूकारी पर अपना वर्चस्व स्थापित किया था।

1843 से 1947 तक ब्रिटिश शासन के तहत, सिंध को बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मिलाए जाने के बाद , भाईबंद समुदाय के लोग व्यापारी और वित्तपोषक के रूप में औपनिवेशिक प्रशासन में एकीकृत हो गए और नए बुनियादी ढांचे का लाभ उठाकर अपने कारोबार का विस्तार किया। रेलवे के विस्तार से उन्हें अनाज और हस्तशिल्प जैसी वस्तुओं के व्यापार में सुविधा मिली, जिससे उन्हें काफी धन प्राप्त हुआ । इस दौरान उन्होंने अपने समुदाय के भीतर सामाजिक प्रतिबंधों, जैसे कि प्रशासनिक पदों पर आसीन अमिलों से उनकी सामाजिक स्थिति में अंतर, का भी सामना किया। सेठ नौमूल हॉटचंद जैसे प्रमुख व्यक्तियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहयोग किया और राजस्व संग्रह और अनाज बिक्री के ठेके हासिल किए, जिससे ब्रिटिश अधिकारियों के साथ कभी-कभार होने वाले संघर्षों के बावजूद उनका आर्थिक प्रभाव बढ़ा। 19वीं शताब्दी के अंत तक , भाईबंदों सहित हिंदू , सिंध की लगभग एक तिहाई आबादी का हिस्सा थे, जो शहरी क्षेत्रों में केंद्रित थे।[9]

सक्रियता की बजाय वाणिज्य पर इस ध्यान केंद्रित करने से उन्हें बदलते परिवेश में फलने-फूलने और ब्रिटिश नेटवर्क के माध्यम से सिंधी हस्तशिल्प का वैश्विक स्तर पर निर्यात करने में मदद मिली।[9]

विभाजन और 1947 के बाद का प्रवासन

1947 में भारत के विभाजन ने नवगठित पाकिस्तान से , विशेषकर सिंध प्रांत से, हिंदू सिंधियों के बड़े पैमाने पर पलायन को जन्म दिया। यह पलायन रेडक्लिफ रेखा की घोषणा के बाद बढ़ते सांप्रदायिक हिंसा और असुरक्षा के माहौल में हुआ । लगभग 10 लाख हिंदू , जिनमें भाईबंद व्यापारी समुदाय का बहुमत और सिंध की लगभग 90% हिंदू आबादी शामिल थी, सिंध छोड़कर भारत आ गए । उन्होंने कराची और हैदराबाद जैसे शहरों में शहरी अचल संपत्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों सहित लाखों रुपये की अचल संपत्तियों को त्याग दिया। यह प्रवास सिंध की हिंदू आबादी के लगभग 90% का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें भाईबंद - पारंपरिक व्यापारी जिन्होंने ब्रिटिश शासन के तहत वाणिज्य के माध्यम से धन अर्जित किया था - विशेष रूप से कठिनाई का सामना कर रहे थे क्योंकि उनके व्यवसाय बाधित हो गए थे और पाकिस्तान के निकासी संपत्ति कानूनों के तहत संपत्ति जब्त कर ली गई थी।

इसके तुरंत बाद, भाईबंदों सहित आने वाले शरणार्थियों को पश्चिमी भारत के अस्थायी शिविरों में रखा गया , जैसे कि बॉम्बे (अब मुंबई ), गुजरात में अहमदाबाद और राजस्थान में अजमेर , जहाँ अक्सर हालात दयनीय थे, सीमित स्वच्छता और अत्यधिक भीड़भाड़ के कारण 1947 के अंत तक 100,000 से अधिक सिंधी प्रभावित हुए थे । भारतीय सरकार ने पुनर्वास मंत्रालय के माध्यम से पुनर्वास प्रयास शुरू किए, और विस्थापित व्यक्ति (मुआवजा और पुनर्वास) अधिनियम 1954 जैसी योजनाएँ स्थापित कीं, जिसमें व्यापारिक समुदायों को व्यवसाय फिर से शुरू करने के लिए शहरी भूखंडों और ऋणों को प्राथमिकता दी गई, और भाईबंदों के व्यापारिक कौशल का लाभ उठाने के लिए शहरों में छोटे वाणिज्यिक स्थान आवंटित किए गए।[13][14] इन उपायों ने कई लोगों को शिविर जीवन से अर्ध-स्थायी बस्तियों में संक्रमण करने में सक्षम बनाया, हालाँकि नौकरशाही देरी और मुआवजे की कमी ने हजारों लोगों को लंबे समय तक अनिश्चितता में छोड़ दिया।

अगले दशकों में, द्वितीयक प्रवासों के कारण भाईबंद समुदाय महाराष्ट्र के उल्हासनगर और गुजरात के अहमदाबाद जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों में केंद्रित हो गया , जहाँ उन्होंने वस्त्र, आभूषण और थोक व्यापार पर केंद्रित जीवंत "सिंधी बाज़ार" स्थापित किए और पूर्व सैन्य शिविरों को वाणिज्यिक केंद्रों में बदल दिया, जिन्होंने हजारों परिवारों का भरण-पोषण किया। अकेले उल्हासनगर में ही, 1950 तक 90,000 से अधिक सिंधी शरणार्थी बस गए और ऐसे बाज़ार बनाए जो समुदाय के लिए आर्थिक आधार बन गए ।[16][17] जबकि चल रहे तनावों के बीच पाकिस्तान के भीतर कराची मेंकुछ भाईबंद रहे या स्थानांतरित हो गए, वहाँ उनकी उपस्थिति न्यूनतम थी, क्योंकि अधिकांश ने हिंदू व्यापारियों के लिए भारत के अधिक स्थिर वातावरण को प्राथमिकता दी।[18]

सामाजिक संगठन

अमिलों से अंतर

भाईबंद और आमिल सिंधी हिंदू समुदाय के दो प्रमुख उपसमूह हैं, जो मुख्य रूप से अपने व्यावसायिक भूमिकाओं और ऐतिहासिक संरक्षण प्रणालियों के तहत विकसित सामाजिक पदानुक्रमों द्वारा पहचाने जाते हैं। भाईबंद पारंपरिक रूप से व्यापारी और सौदागर के रूप में कार्य करते थे, जो व्यापक हिंदू जाति व्यवस्था में वैश्य वर्ण के समान थे । वे वाणिज्य, पारिवारिक व्यवसायों और सिंधवर्की जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क में संलग्न थे, जो एशिया और उससे आगे वस्त्र और कलाकृतियाँ निर्यात करते थे।[6] इसके विपरीत, अमिलों ने प्रशासक, लेखक और पेशेवर के रूप में काम किया, अक्सर मुस्लिम शासकों और बाद में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन वेतनभोगी पदों पर, जहाँ उन्होंने फारसी और अंग्रेजी में लिपिकीय कर्तव्यों, राजस्व संग्रह और शासन को संभाला।

इन समूहों के बारे में सामाजिक धारणाओं ने 18वीं और 19वीं शताब्दियों के दौरान, विशेष रूप से तालपुर मीरों (1783-1843) के शासनकाल में, एक पदानुक्रम को सुदृढ़ किया। इन मीरों ने हैदराबाद में अपने दरबार में लोहाना उपसमूहों को प्रशासनिक ( अमिल ) और व्यापारिक (भाईबंद) भूमिकाओं में विभाजित किया, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान को बढ़ावा मिला। अमिलों को अधिक शिक्षित, सुसंस्कृत और पश्चिमीकृत अभिजात वर्ग के रूप में देखा जाने लगा, जिन्हें 1843 के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजी शिक्षा और सिविल सेवा के अवसरों तक शीघ्र पहुँच का लाभ मिला। भाईबंद, यद्यपि अपने व्यावसायिक सफलता के कारण अक्सर अधिक धनी होते थे, लेकिन अमिलों द्वारा उन्हें असभ्य और दिखावटी के रूप में देखा जाता था, और धन का प्रदर्शन भद्दा या परिष्कारहीन माना जाता था - यह धारणा 20वीं शताब्दी तक बनी रही ।

1947 के विभाजन से पहले अंतर-समूह संबंधों में सामाजिक एकीकरण सीमित था , और सामाजिक स्थिति में व्याप्त अंतरों के कारण अंतर्जातीय विवाह दुर्लभ थे। हालांकि दोनों समूहों की उत्पत्ति लोहाना समुदाय से हुई थी और वे कभी-कभी बिना किसी रीति-रिवाज के एक ही घर में साथ रहते थे। विभाजन के बाद भारत और अन्य जगहों पर हुए प्रवासन ने इन सीमाओं को धुंधला कर दिया, क्योंकि आर्थिक आवश्यकताओं और प्रवासी जीवन के कारण अंतर्जातीय विवाह और सहयोगात्मक उद्यम बढ़े, जिससे 1947 से पहले के कठोर भेद कम हो गए।[19][2]

परिवार और सामुदायिक संरचनाएं

भाईबंद समुदाय पितृसत्तात्मक रिश्तेदारी प्रणालियों के इर्द-गिर्द संगठित हैं, जहां वंश और विरासत पुरुष वंश का अनुसरण करती है, जिससे भाईचारे के रूप में जाने जाने वाले विस्तारित परिवार बनते हैं जो भाइयों और उनके वंशजों के बीच पैतृक संबंधों पर जोर देते हैं।[2] उपनाम आमतौर पर "-अनी" में समाप्त होते हैं, जो बहिर्विवाही वंशों या कुलों को दर्शाते हैं, जैसे कि भरवानी या मंगनानी बिरादरी, जो गठबंधन बनाए रखने और अंतर्प्रजनन को रोकने के लिए एक ही समूह के भीतर विवाह को प्रतिबंधित करते हैं ।[19] ये विस्तारित परिवार ऐतिहासिक रूप से सिंध में साझा आंगन वाले घरों, जहाँ विवाहित भाई और उनकी पत्नियाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत सहवास करते थे, जहाँ महिलाएं शादी के बाद अपने पति के घर में चली जाती थीं ।[2]

सामुदायिक शासन पंचायतों पर निर्भर करता है, जो बुजुर्गों के नेतृत्व वाली सभाएं होती हैं और विवादों के समाधान , विवाह निर्धारण और जातिगत मानदंडों को बनाए रखने के लिए अनौपचारिक परिषदों के रूप में कार्य करती हैं।[2] बॉम्बे के लोखंडवाला या उल्हासनगर जैसी प्रवासी बस्तियों में, ये पंचायतें—अक्सर जाति या क्षेत्रीय मूल द्वारा संगठित—कल्याण निधि का प्रबंधन करती हैं, व्यापक भाईबंद समूह के भीतर अंतर्विवाह को लागू करती हैं, और सामुदायिक सामंजस्य कोबनाए रखने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं[7] संयुक्त परिवार के व्यवसाय इस संरचना के केंद्र में हैं, जिसमें पूहूमुल्ल ब्रदर्स या भगतानी परिवार के संचालन जैसे उद्यम पुरुष रिश्तेदारोंके माध्यम से आगे बढ़ते हैंबिरादरी के भीतर आर्थिक अन्योन्याश्रय और सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूत करते हैं।[2]

पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएं पितृसत्तात्मक आधार पर श्रम को विभाजित करती हैं, जिसमें पुरुष मुख्य रूप से व्यापार और यात्रा में लगे रहते हैं जबकि महिलाएं घरेलू प्रबंधन, धार्मिक अनुष्ठानों और आभूषणों के माध्यम से चल संपत्ति के संचय की देखरेख करती हैं।[19] विभाजन-पूर्व व्यापार अभियानों के दौरान महिलाओं की सीमित गतिशीलता ने पारिवारिक स्थिरता सुनिश्चित की, जिससे उन्हें सांस्कृतिक और वैवाहिक नेटवर्क के संरक्षक के रूप में स्थान मिला।[2] 1947 के विभाजन और शहरी भारत में बड़े पैमाने पर प्रवास के बाद , ये गतिशीलता बॉम्बे जैसे शहरों में परमाणु परिवार इकाइयों की ओर स्थानांतरित हो गई, जो फैलाव और आर्थिक दबावों से प्रेरित थी, हालांकि व्यापार समर्थन और पारिवारिक उद्यमों में महिलाओं की कभी-कभार भागीदारी के लिए विस्तारित रिश्तेदारी नेटवर्क बने रहे[2]

आर्थिक भूमिका

पारंपरिक व्यवसाय

सिंधी हिंदुओं में एक प्रमुख व्यापारी जाति के रूप में, भाईबंद ऐतिहासिक रूप से सिंध भर में और गुजरात तक फैले वस्त्रों, मसालों और अनाजों के थोक व्यापार में लगे हुए थे । उनके वस्त्र व्यापार में कढ़ाईयुक्त सामान, रेशम और हस्तशिल्प शामिल थे, जो प्रसिद्ध सिंधवर्की व्यापार का आधार बने। साथ ही, वे मसालों और अनाजों के व्यापार में भी संलग्न थे, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को आवश्यक सेवाएं प्रदान करते थे। इसके अतिरिक्त, 1843 में सिंध पर ब्रिटिश कब्जे से पहले , कई भाईबंद साहूकार के रूप में काम करते थे, जो किसानों को कृषि संबंधी जरूरतों के लिए और स्थानीय शासकों को प्रशासनिक और सैन्य उद्देश्यों के लिए ऋण प्रदान करते थे, इस प्रकार वित्तीय सेवाओं को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के साथ एकीकृत करते थे ।

उनकी पेशेवर कुशलता व्यापारिक मांगों के अनुरूप थी, जिसमें हाटवानाकी लिपि के माध्यम से लेखांकन में विशेषज्ञता शामिल थी—यह अरबी अंकों से व्युत्पन्न एक पारंपरिक, घुमावदार प्रणाली थी जिसका उपयोग व्यापारियों के बीच सुरक्षित बहीखाता और मानसिक गणित के लिए किया जाता था—और काफिले के प्रबंधन में दक्षता, जिसमें मौसमी और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच व्यापक भूमि मार्गों पर आवागमन शामिल था। जातिगत मानदंडों का पालन करते हुए, जो गैर-शारीरिक श्रम के माध्यम से शुद्धता पर जोर देते थे, भाईबंदों ने कृषि में प्रत्यक्ष भागीदारी से परहेज किया, जिससे वे कृषक समुदायों से अलग हो गए और इसके बजाय वाणिज्य और वित्त में मध्यस्थ भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित किया ।[6]

समय के साथ, भाईबंद व्यवसायों का विकास प्रारंभिक ग्रामीण भूमि स्वामित्व संबंधों से हुआ, जहाँ कुछ परिवार जमींदार के रूप में जागीरदारी संपदा रखते थे, और 19वीं शताब्दी तक शहरी बाजारों में उनका दबदबा हो गया , विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक विस्तार के बाद जिसने बड़े पैमाने पर व्यापार को सुगम बनाया । यह बदलाव पारिवारिक प्रशिक्षण के माध्यम से कायम रहा, जहाँ परिवार के युवा सदस्यों को कम उम्र से ही व्यापारिक प्रथाओं, लेखांकन और पारिवारिक फर्मों के भीतर नेटवर्क निर्माण का प्रशिक्षण दिया जाता था, जिससे व्यापारिक विशेषज्ञता में पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता सुनिश्चित होती थी।[6]

व्यापारिक नेटवर्क और आर्थिक प्रभाव्

भाईबंद समुदाय ने व्यापक अंतरक्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क स्थापित किए, जिन्होंने सिंध को बॉम्बे, लाहौर और मध्य एशिया जैसे प्रमुख केंद्रों से जोड़ा । इसके लिए उन्होंने जमीनी कारवां मार्गों और हिंद महासागर के समुद्री मार्गों दोनों का उपयोग किया । हैदराबाद और शिकारपुर जैसे केंद्रों से शुरू होने वाले इन नेटवर्कों ने वस्त्र, अनाज और मसालों सहित विभिन्न वस्तुओं के आदान-प्रदान को सुगम बनाया, जिसमें भाईबंद स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक बाजारों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। 19वीं शताब्दी के मध्य तक, समुद्री मार्गों का विस्तार पूर्वी एशिया , मध्य पूर्व और यहां तक ​​कि पनामा के बंदरगाहों तक हो गया , जिससे वे औपनिवेशिक व्यापार की गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण घटक बन गए।[6]

लंबी दूरी के व्यापार में जोखिमों को कम करने के लिए, भाईबंदों ने हुंडी प्रणाली का उपयोग किया, जो विनिमय बिल और प्रेषण नोटों के रूप में कार्य करने वाला एक पारंपरिक ऋण साधन था। इससे नकदी के भौतिक हस्तांतरण के बिना विशाल दूरियों तक सुरक्षित धन हस्तांतरण संभव हो सका। यह व्यवस्था, जो उनके संचालन में गहराई से समाहित थी, सिंधु नदी घाटी और उससे आगे के वाणिज्य को बढ़ावा देती थी, ग्रामीण उत्पादकों को शहरी वित्तदाताओं और अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों से जोड़ती थी। हुंडी के उपयोग से न केवल डकैती और समुद्री डकैती से होने वाले नुकसान में कमी आई, बल्कि प्रवासी समुदाय के भीतर विश्वास-आधारित साझेदारी को भी बढ़ावा मिला ।

19वीं शताब्दी में, भाईबंदों ने सिंध से कपास और अफीम के निर्यात पर नियंत्रण के माध्यम से महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति का प्रयोग किया, जो विभाजन-पूर्व क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का आधार था और इसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्वपूर्ण योगदान देता था। 1869 में फ्रियर हॉल में आयोजित सिंध औद्योगिक प्रदर्शनी में कपास के निर्यात को प्रमुखता से दर्शाया गया था, जिसने सिंधी उत्पादकों को ब्रिटिश कपड़ा मिलों से जोड़ा, जबकि अफीम व्यापार मार्गों ने बंगाल के बराबर आकर्षक राजस्व स्रोत प्रदान करके औपनिवेशिक विलय नीतियों को प्रभावित किया। गोलक के नाम से जाने जाने वाले सामुदायिक कोषों ने बाजार में मंदी के दौरान आपसी सहायता प्रदान की, संघर्षरत सदस्यों का समर्थन करने और व्यापार की निरंतरता बनाए रखने के लिए संसाधनों को एकत्रित किया, जिससे उतार-चढ़ाव के बीच स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को स्थिरता मिली। इन गतिविधियों से वार्षिक धन प्रवाह 1940 के दशक तक 5-10 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो क्षेत्रीय समृद्धि में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।[6][21]

भाईबंदों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक अवसंरचना के वित्तपोषण द्वारा व्यापक प्रभाव डाला, जैसे कि 1932 में पूरा हुआ सुक्कुर बांध , जिसने सिंध में सिंचाई और कृषि उत्पादन को बढ़ाया । औपनिवेशिक काल में, उन्होंने ब्रिटिश अवसंरचना परियोजनाओं और प्रशासनिक ढांचों को अपनाया, जिससे क्षेत्र के आर्थिक विस्तार में योगदान मिला। इन प्रयासों ने न केवल सिंध के कृषि आधार को मजबूत किया बल्कि समुदाय को साम्राज्यवादी आर्थिक विस्तार में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित किया।[6]

सांस्कृतिक प्रथाएँ

धार्मिक अनुष्ठान

सिंधी हिंदू परंपरा के व्यापक भाग के रूप में, भाईबंद समुदाय अपनी धार्मिक आस्था को झूलेलाल पर केंद्रित करता है, जिन्हें संरक्षक संत और वैदिक जल देवता वरुण का अवतार माना जाता है, जो नदी व्यापार पर निर्भर व्यापारियों के लिए सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक हैं।[2][19] यह पूजा घर के मंदिरों के माध्यम से प्रकट होती है जिसमें झूलेलाल की प्रतिमाओं के साथ-साथ लक्ष्मी , धन की देवी, जैसी अन्य हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा की जाती है, जिनकी पूजा व्यापारिक सफलता के लिए दैनिक भेंट के साथ व्यापारिक लोकाचार को रेखांकित करती है।[2] वार्षिक चेती चंद उत्सव, जो चैत्र के पहले दिन(आमतौर पर मार्च-अप्रैल) सिंधी नव वर्ष को चिह्नित करता है, विस्तृत नदी जुलूसों, मेलों और बहरानो साहिब अनुष्ठान के साथ झूलेलाल के जन्म का सम्मान करता है, जहां आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रसाद की आरती थाली को पानी में विसर्जित किया जाता है।[19][2]

भाईबंदों के बीच अनुष्ठानों में पवित्रता और अनुशासन पर जोर दिया जाता है, जिसमें शाकाहार और शराब से परहेज प्रमुख जातिगत चिह्नों के रूप में कार्य करते हैं जो उन्हें अन्य समूहों से अलग करते हैं और हिंदू और सिख तत्वों के मिश्रण वाले उनके नानकपंथी प्रभावों के साथ मेल खाते हैं।[19] इन प्रथाओं को सिंधी आध्यात्मिक नेता टी.एल. वासवानी द्वारा स्थापित साधु वासवानी मिशन द्वारा सुदृढ़ किया जाता है, जो 25 नवंबर को मांस रहित दिवस के वैश्विक पालन और आध्यात्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव के मार्ग के रूप में शराब से परहेज को।[23] लड़कों के लिए जनेओ (पवित्र धागा अनुष्ठान) जैसे जीवन-चक्र समारोहों को अक्सर टीकाना (सामुदायिक मंदिर) में समूहों में आयोजित करके व्यापारिक जीवन शैली के अनुकूल बनाया जाता है, जोवैदिक हवन के साथ झूलेलाल प्रार्थनाओं को शामिल करते हुए पारिवारिक पुनर्मिलन और व्यावसायिक नेटवर्किंग को सुविधाजनक बनाता है।[2] विवाह आनंद कारज ( गुरु ग्रंथ साहिब की परिक्रमा) या पारंपरिक हिंदू अनुष्ठानों का पालन कर सकते हैं, जो समुदाय के लचीले लेकिन जड़ से जुड़े रीति-रिवाजों को दर्शाता है।[19]

सिंध के बहुसांस्कृतिक परिवेश के समन्वयवादी तत्व भाईबंद प्रथाओं में अभी भी मौजूद हैं, जिनमें सूफी पीरों के प्रति ऐतिहासिक श्रद्धा और सैं जिन दामोदर जैसे साझा तीर्थस्थलों की यात्राएं शामिल हैं, जहां हिंदू परिवारों ने अपनी प्राथमिक हिंदू पहचान के बावजूद कई पीढ़ियों के संबंध बनाए रखे।[2][19] यह अंतरधार्मिक सद्भाव, जो विभाजन-पूर्व अनुष्ठानों में सूफी ज्ञान को हिंदू भक्ति के साथ मिलाकर स्पष्ट है, प्रवासी समुदाय में कम हो गया है,लेकिन सिंध के बहुलवादी वातावरण द्वारा आकारित समुदाय के अनुकूली धार्मिक लोकाचार को रेखांकित करता है।[2]

रीति-रिवाज और सामाजिक मानदंड

भाईबंद समुदाय में विवाह ऐतिहासिक रूप से व्यवस्थित और अंतर्विवाही रहा है, जो सिंध के इन हिंदू व्यापारी परिवारों के बीच सामाजिक सामंजस्य और व्यावसायिक निरंतरता बनाए रखने के लिए समूह के भीतर ही विवाह तक सीमित रहा है ।[24][21] 1947 के विभाजन के बाद, प्रवासी समुदायों में बदलाव आए, जिसमें व्यवस्थित विवाहों की जगह साथी चयन में अधिक व्यक्तिगत विकल्प देखने को मिले।

भाईबंद समाज में दैनिक सामाजिक मानदंड आतिथ्य सत्कार के इर्द-गिर्द घूमते थे , जो सिंधी परंपरा ' मेहमान नवाजी' में समाहित था, जहां मेजबान साई भाजी और कोकी जैसे व्यंजनों से युक्त शाकाहारी दावतों के माध्यम से मेहमानों का भव्य स्वागत करते थे ।[25][26] उदारता और सामुदायिक भोजन पर यह जोर व्यापार-उन्मुख नेटवर्क में संबंधों पर रखे गए मूल्य को रेखांकित करता है।

1947 से पहले के सामाजिक वर्जनाओं ने अंतरजातीय भोजन को सख्ती से प्रतिबंधित कर दिया था, जिससे रीति-रिवाजों की पवित्रता और सामाजिक स्थिति के अंतर को बनाए रखने के लिए भाईबंद और अमिल जैसे उपसमूहों के बीच अलगाव को और मजबूत किया गया था।[24][27]

आतिथ्य सत्कार और पारिवारिक अपेक्षाओं सहित इन मानदंडों को अक्सर धार्मिक त्योहारों के दौरान सामुदायिक संबंधों को मजबूत करने के लिए एक पृष्ठभूमि के रूप में उजागर किया जाता था।[25]

आधुनिक प्रवासी

भारत और विदेशों में बसावट के पैटर्न

1947 में हुए भारत के विभाजन के बाद , जिसमें भाईबंद व्यापारी समुदाय सहित लाखों हिंदू सिंधी विस्थापित हुए, परिवारों ने स्थापित व्यापार नेटवर्क के इर्द-गिर्द अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया और भारत और विदेशों में दीर्घकालिक बस्तियां बसाईं ।[28]

भारत में , महाराष्ट्र का उल्हासनगर भाईबंद और अन्य सिंधी समुदायों का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा । 2011 की जनगणना के अनुसार, सिंधी भाषी लोग जनसंख्या का लगभग 32% (कुल 506,000 लोगों में से लगभग 162,000) थे; हाल के अनुमानों से पता चलता है कि 2025 तक भी यह समुदाय शहर के 700,000 से अधिक निवासियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।[28] मुंबई के पास 1949 में स्थापित यह पूर्व शरणार्थी शिविर,सिंधी उद्यमों, विशेष रूप सेकिफायती कपड़ों , जींस और कपड़ों में विशेषज्ञता वाले कपड़ा बाजारों के प्रभुत्व वाले एक वाणिज्यिक केंद्र में विकसित हुआ , जो भारतीय बाजार की अधिकांश आपूर्ति करता है।[29] भाईबंदों ने इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विभाजन से पहले की अपनी व्यापारिक विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए विनिर्माण इकाइयों और थोक बाजारों की स्थापना की, अक्सरउल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन की उत्पत्ति को दर्शाने के लिए " मेड इन यूएसए " जैसे चंचल लेबल के साथ माल की ब्रांडिंग की।[29] अन्य महत्वपूर्ण अंतर्देशीय बस्तियों में गुजरात में अहमदाबाद शामिल है , जहां भाईबंदसिंधी पंचायत जैसे सामुदायिक संगठनों के माध्यम से स्थानीय व्यापार में एकीकृत हो गए, जिससे बिखरे हुए परिवारों के बीच भाईचारा और व्यापार समर्थन को बढ़ावा मिला।[30] इंदौर , मध्य प्रदेश में, भाईबंद की उपस्थिति ने शहर को एक उल्लेखनीय सिंधी केंद्र बना दिया है, जिसमें समुदाय स्थानीय सिंधी पंचायत के माध्यम से वस्त्र और खुदरा जैसे क्षेत्रों में सक्रिय है, जो सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का समन्वय करता है।[31]

विदेशों में, 1950 के दशक के बाद भाईबंदों का प्रवास तीव्र हो गया, जिन्होंने औपनिवेशिक काल के व्यापारिक केंद्रों पर आधारित जीवंत प्रवासी समुदायों का निर्माण किया। यूनाइटेड किंगडम में , विशेष रूप से लंदन के साउथॉल इलाके में, विभाजन के बाद भाईबंदों ने पुनर्वास किया और अपने परिवार के युवा सदस्यों को खुदरा और आयात व्यवसायों को विस्तारित करने के लिए भेजा, जिससे एक ऐसा एकजुट समुदाय बना जिसने शहरी एकीकरण के बीच व्यापारिक परंपराओं को संरक्षित रखा।[6] इसी तरह, संयुक्त राज्य अमेरिका में, न्यू जर्सी क्षेत्रीय उथल-पुथल से विस्थापित भाईबंद परिवारों के लिए एक केंद्र बिंदु बन गया, जहाँ उन्होंने आयात-निर्यात फर्मों और रियल एस्टेट उद्यमों की स्थापना की, सामुदायिक विकास के लिए वैश्विक नेटवर्क का लाभ उठाया।[6] हांगकांग ने 1960 के दशक के दौरान इंडोनेशिया में राजनीतिक अस्थिरता से भाग रहे भाईबंदों को आकर्षित किया, जिससे एक समृद्ध व्यापारी समुदाय का विकास हुआ जो इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ा व्यापार के माध्यम से क्षेत्र की मुक्त-बंदरगाह अर्थव्यवस्था के अनुकूल हो गया।[6] पाकिस्तान में , अंतर-सामुदायिक तनाव के बावजूद कराची में छोटे भाईबंद समुदाय बने रहे, बंदरगाह शहर में विभाजन-पूर्व जड़ों के अवशेष के रूप में कम प्रोफ़ाइल व्यापारिक संबंध बनाए रखते हुए।[6]

इन नए स्थानों में सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए , भाईबंदों ने संरक्षण के लिए समर्पित संघों का गठन किया, जैसे कि अखिल भारत सिंधी बोली ऐन साहित्य प्रचार सभा, जो सेमिनारों, प्रकाशनों और कार्यक्रमों के माध्यम से सिंधी भाषा , साहित्य और परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए प्रवासी स्थलों के बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को एकजुट करती है।[32] ये संगठन सामुदायिक सभाओं और शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन करके अनुकूलन को सुगम बनाते हैं , भौगोलिक फैलाव के बीच भाईबंद रीति-रिवाजों के प्रसारण को सुनिश्चित करते हैं।[32]

समकालीन सामाजिक-आर्थिक स्थिति

21वीं सदी में , भाईबंद समुदाय ने पारंपरिक लंबी दूरी के व्यापार नेटवर्क से हटकर खुदरा व्यापार, रियल एस्टेट विकास और बॉलीवुड निर्माण वित्तपोषण जैसे मनोरंजन क्षेत्रों में निवेश सहित विविध आधुनिक व्यवसायों की ओर रुख किया है। भारत में कई भाईबंदों ने छोटे पैमाने के उद्योग और वाणिज्यिक केंद्र स्थापित किए हैं, विशेष रूप से उल्हासनगर में, जहाँ कपड़ा और विनिर्माण क्षेत्र में 5,000 से अधिक व्यवसाय फल-फूल रहे हैं, जो विभाजन के बाद पुनर्वास के बाद स्थानीय उद्यमिता की ओर बदलाव को दर्शाता है । वैश्विक स्तर पर, सिंधी व्यापारिक जड़ों से उत्पन्न हिंदुजा समूह जैसे पारिवारिक स्वामित्व वाले समूह इस विकास का उदाहरण हैं, जिनका संचालन ऑटोमोटिव, वित्त और मीडिया क्षेत्रों में फैला हुआ है और बहुराष्ट्रीय विविधीकरण के माध्यम से उन्होंने काफी धन अर्जित किया है।[33][34]

सामाजिक रूप से, भाईबंद समुदाय ने उल्लेखनीय सामाजिक उन्नति देखी है। विस्थापित सिंधी हिंदुओं में साक्षरता दर 1947 के बाद के प्रारंभिक दौर में राष्ट्रीय औसत 18.3% से काफी अधिक थी और उच्च शिक्षा पर जोर देने के कारण, विशेष रूप से महिलाओं में, जो अक्सर पारिवारिक व्यवसाय में प्रवेश करने या विवाह के बाद इस्तीफा देने से पहले विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त कर लेती हैं, यह दर आज भी राष्ट्रीय मानकों से अधिक है। जातिगत कठोरता में कमी आई है, विभाजन के बाद भाईबंद और अमील समुदायों के बीच अंतरजातीय विवाह अधिक आम हो गए हैं, जिससे एक एकीकृत "सिंधायत" पहचान को बढ़ावा मिला है। हालांकि, विवाह संबंधी चर्चाओं और सामुदायिक विमर्शों में भाईबंदों को व्यापारी और अमीलों को पेशेवर मानने की रूढ़िवादिता अभी भी बनी हुई है । इस शैक्षिक और सामाजिक प्रगति ने शहरी व्यावसायिक क्षेत्रों में, विशेष रूप से मुंबई और लंदन जैसे प्रवासी केंद्रों में , बेहतर एकीकरण को संभव बनाया है।

इन उपलब्धियों के बावजूद, भाईबंद समुदाय को लगातार कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें सकारात्मक कार्रवाई तक सीमित पहुंच भी शामिल है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कुछ उपसमूहों को कुछ शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन ओबीसी दर्जे की व्यापक मांगें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं, जो कम संपन्न परिवारों के लिए असमानताओं को उजागर करती हैं। वैश्विक प्रेषण और भारतीय अचल संपत्ति जैसे क्षेत्रों में अनिवासी भारतीयों के निवेश ने सामुदायिक नेटवर्क को मजबूत किया है , और अंतर-स्थानीय प्रवाह प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक व्यवसायों में विभाजन के बीच आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा दे रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 28 लाख सिंधी भाषी और विदेशों में कुछ छोटे समूहों वाले इस समुदाय के प्रवासी समुदाय के लिए एकीकरण और सांस्कृतिक संरक्षण जैसी समकालीन आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए 2021 की विलंबित जनगणना से अद्यतन आंकड़ों की आवश्यकता पर बल दिया गया है। 2025 के अनुमानों के अनुसार, भारतीय सिंधी आबादी बढ़कर लगभग 30 लाख हो गई है। महाराष्ट्र में 5 लाख से अधिक सिंधियों को संपत्ति कार्ड जारी करने जैसी हालिया सरकारी पहलों से सामुदायिक एकीकरण को समर्थन मिला है ।