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Friday, September 24, 2021

THE GREAT VAISHYA COMMUNITY - वैश्य समुदाय का सामाजिक योगदान

वैश्य समुदाय का सामाजिक योगदान

वैवैश्य जाति का सामाजिक योगदानश्य जाति का सामाजिक योगदान

इतिहास गवाह है कि वैश्य जाति का सामाजिक योगदान अतुलनीय रहा है। इतिहास के हर एक काल में वैश्य जाति प्रासंगिक रहा है। किसी की आलोचना नहीं की, निंदा नहीं किया ,बस कर्म करता चला गया।
चाहे गुप्त काल हो, हर्षवर्धन काल हो, चेर, चालुक्य साम्राज्य हो, प्रत्येक काल में समाज का नेतृत्व किया।
हेमु ने अफगान सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया और मुगलों को कड़ी चुनौती पेश की।
एक हजार साल की गुलामी से जब हमारा समाज किंकर्तव्यविमूढ़ हो चला था तो महात्मा गांधी ने आशा की नई किरण दिखाई तथा लोगों को विरोध प्रकट करने , अपने अधिकारों के लिए लड़ने के नयै तरीके सिखाए। १८५७ की हिंसात्मक क्रांति में अंग्रेजों द्वारा बुरी तरह कुचले जाने के बाद बुरी तरह से टूट और बिखर चुके समाज को निराशा के गर्त से बाहर निकाला। धरना , प्रदर्शन, बहिष्कार, भुख हड़ताल, बायकाट, सिविल नाफरमानी, अनशन,पिकेटिंग जैसे अहिंसक आधुनिक, तार्किक आंदोलन के तरीकों से ,विश्व को अवगत कराया। आज भी गांधी के इन तकनीकों का उपयोग हमारा समाज सत्ता के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए कर रहा है। जो यह साबित करता है कि गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

पुरे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान घनश्याम दास बिड़ला, सर जमनालाल बजाज जैसे उद्योगपतियों ने कांग्रेस को बड़े पैमाने पर फंड उपलब्ध कराये। तब जाकर स्वतंत्रता आंदोलन सफल हो पाया।

बहुत सारे बोलियों,ऊपबोलियों मैं बंटे हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को खड़ी बोली ,जिसे आधुनिक हिंदी भाषा के रूप में जाना जाता है, भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पहचान दिलाई। और सही मायने में हिंदी भाषा को आजादी दिलाई। आधुनिक छायावाद के जनक जयशंकर प्रसाद ने कामायनी जैसे महाकाव्य की रचना कर हिन्दी भाषा को नई ऊंचाई प्रदान किया। कालिदास गुप्ता ने उर्दू में अनेक रचनाएं रचीं।

कहने का मतलब है कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, समाज के सभी क्षेत्रों में वैश्य समाज का अतुलनीय योगदान रहा हैं।

वैश्य समाज ने स्कूल, कालेज, धर्मशाला खोले, समाज से जितना लिया, उतना वापस समाज में कर दिया।
स्वतंत्रता के बाद के कुछ दशकों तक वैश्य समाज राजनीति से दूर हो गया, यह सोचकर कि स्वशासन में सब कुछ ठीक हो जाएगा।

परंतु अफसोस की बात है कि विघटनकारी ताकतै क्षेत्रीयता, सांप्रदायिकता, जातियता, के रूप में एक बार पुनः वापस आ रही हैं।

कहने का मतलब है कि वैश्य समाज को एक बार फिर सामाजिक स्थिति को देखते हुए समाज का राजनीतिक नेतृत्व करना हीं होगा।

साभार: हम हैं वैश्य , Jayprakash Kumar फेसबुक वाल से

धर्म निष्ठ और बहादुर वैश्य समुदाय, जिसने धर्म नहीं बदला

धर्म निष्ठ और बहादुर वैश्य समुदाय, जिसने धर्म नहीं बदला 



Thursday, September 23, 2021

PUNEET GUPTA - ASTROLOGY APP DEVELOPER

PUNEET GUPTA - ASTROLOGY APP DEVELOPER

एस्ट्रोलॉजर की भविष्यवाणी सच हुई तो इंजीनियर ने बनाया एस्ट्रोलॉजी का ऐप, अब रोज 30 लाख का बिजनेस, 1600 लोगों को जॉब भी दी

हर किसी को अपने कल की चिंता होती है। आने वाले दिन कैसे होंगे? जॉब लगेगी या नहीं, किस सेक्टर में करियर बनेगा? आगे की लाइफ कैसी रहेगी, जिंदगी में चल रही उठापटक कब थमेगी? जीवन साथी कैसा होगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिन्हें लेकर ज्यादातर लोग परेशान रहते हैं। इसे देखते हुए पंजाब के भटिंडा जिले में रहने वाले पुनीत गुप्ता ने 3 साल पहले एक ऑनलाइन स्टार्टअप की शुरुआत की। वे मोबाइल ऐप के जरिए लोगों को उनके फ्यूचर के बारे में बताते हैं, उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं।

इसके लिए पुनीत ने एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर्स को हायर कर रखा है। 1600 से ज्यादा एस्ट्रोलॉजर्स उनके साथ जुड़े हुए हैं। कोविड के बाद उनके स्टार्टअप को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला है। फिलहाल हर दिन 30 लाख रुपए से ज्यादा का रेवेन्यू वे जेनरेट कर रहे हैं।

एक एस्ट्रोलॉजर की भविष्यवाणी से बदल गई जिंदगी

32 साल के पुनीत ने 2011 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब 4 साल तक नौकरी की। इसके बाद साल 2015 में उन्होंने खुद का एक स्टार्टअप शुरू किया। इसमें वे मोबाइल ऐप डेवलपमेंट का काम करते थे। अलग-अलग कंपनियों और लोगों की डिमांड के मुताबिक वे ऐप तैयार करते थे। करीब 2 साल तक उन्होंने यह काम किया। अच्छी कमाई भी हुई और कस्टमर्स का रिस्पॉन्स भी अच्छा मिला, लेकिन इसी बीच उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जिससे उनकी लाइफ बदल गई।


पंजाब के रहने वाले पुनीत गुप्ता ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। इस स्टार्टअप से पहले वे चार साल तक नौकरी और ऐप डेवलपमेंट का खुद का बिजनेस कर चुके हैं।

पुनीत बताते हैं कि 2015-16 में एक एस्ट्रोलॉजर से मेरी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि अभी आपकी यह कंपनी जरूर अच्छा कर रही है, लेकिन अगले दो सालों में इसे बंद करना पड़ेगा। आपका साथी काम छोड़कर चला जाएगा। वे कहते हैं कि तब मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ। मैं इन सब चीजों में भरोसा नहीं करता था। इसलिए कुछ खास ध्यान नहीं दिया। हालांकि दो साल से पहले ही कुछ वैसा ही हुआ जैसा कि उस एस्ट्रोलॉजर ने कहा था। मेरे पार्टनर ने कंपनी छोड़ दी, मैं अकेला पड़ गया। कुछ दिनों तक तो जैसे-तैसे काम चलाया, लेकिन फिर बहुत दिक्कत होने लगी, इम्प्लॉइज को सैलरी देने में दिक्कत होनी लगी। आखिरकार मुझे अपना स्टार्टअप बंद करना पड़ा।

मेरी तरह ही हर कोई कहीं न कहीं कोई एस्ट्रोलॉजर तलाश रहा है

पुनीत कहते हैं कि जब मेरी कंपनी बंद हुई तो मुझे एस्ट्रोलॉजी पर भरोसा हुआ। मैंने उसी एस्ट्रोलॉजर को फोन किया जिससे दो साल पहले मेरी बातचीत हुई थी। मैंने उसे सब कुछ बताया और कहा कि आपकी भविष्यवाणी सही साबित हुई। उससे इस मुश्किल दौर से निकलने का उपाय पूछा। तब मुझे रियलाइज हुआ कि मेरी तरह दुनिया में और भी लोग हैं, जिन्हें आए दिन किसी न किसी परेशानी से गुजरना पड़ता है और वे कोई न कोई एस्ट्रोलॉजर तलाश कर रहे होते हैं।

इसलिए हम क्यों न एक ऐसा ऐप तैयार करें जहां लोग खुलकर और आसानी से अपनी लाइफ और भविष्य से जुड़े सवाल पूछ सकें, उन्हें उनकी परेशानियों से छुटकारा मिल सके। वे एक ही प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर्स से बातचीत कर सकें।

2017 में शुरू किया ऑनलाइन स्टार्टअप


पुनीत की टीम में 70 से ज्यादा लोग काम करते हैं। ये अलग-अलग बैकग्राउंड के लोग हैं, जो ऐप के मैनेजमेंट से लेकर मार्केटिंग तक का काम करते हैं।

इसके बाद मैंने उसी एस्ट्रोलॉजर बात की और पूछा कि अगर हम इस तरह का एक प्लेटफॉर्म तैयार करें, तो क्या वे हमारे साथ काम करेंगे? उन्होंने अपनी सहमति दे दी, वे हमारे साथ काम करने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद हमने कुछ और भी एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर अपने साथ जोड़े और 2017 में Astrotalk नाम से नोएडा में अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। तब हम लोग ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग करते थे। इसके बाद यूजर्स की एस्ट्रोलॉजर से बातचीत कराते थे। हर यूजर का 30 मिनट का सेशन रहता था।

वे बताते हैं कि शुरुआत से ही हमें अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा था, लेकिन साथ ही लोगों को एक दिक्कत भी फेस करनी पड़ रही थी। उन्हें तत्काल समाधान नहीं मिल पा रहा था। बुकिंग के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता था। हर आदमी का 30 मिनट का सेशन था, इसलिए हम लिमिटेड लोगों को ही बुकिंग दे सकते थे। इसके बाद हमने इस कॉन्सेप्ट को बदल दिया और लाइव चैट और फोन कॉल को इम्प्लीमेन्ट कर दिया। यानी ऐप पर जाने के बाद किसी भी यूजर को न तो बुकिंग की जरूरत होगी, न ही उसे इंतजार करना पड़ेगा। वह जब चाहे कॉल या चैट के जरिए अपनी पसंद के एस्ट्रोलॉजर से सवाल-जवाब कर सकता है। इस सुविधा के बाद यूजर्स की संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ गई।

कोरोना में बढ़ गई ऑनलाइन एस्ट्रोलॉजी की डिमांड


पुनीत की टीम में 1600 से ज्यादा एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर्स जुड़े हैं। कोई भी यूजर अपनी पसंद के मुताबिक एस्ट्रोलॉजर सिलेक्ट कर सकता है।

पुनीत कहते हैं कि मार्च 2020 तक हमारा कारोबार अच्छा-खासा जम गया था। बड़ी संख्या में यूजर्स हमारे ऐप पर आ रहे थे और अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ रहे थे, लेकिन जैसे ही कोरोना के चलते लॉकडाउन लगा, हमारा बिजनेस डाउन हो गया। करीब दो हफ्ते तक कुछ खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। इसके बाद जैसे-जैसे वक्त बीता और लॉकडाउन बढ़ने लगा, लोगों की नौकरियां जाने लगी, लोग बीमार होने लगे, तब अचानक से लोग तेजी से हमारे ऐप पर शिफ्ट हो गए। दो महीने के भीतर ही हमारा बिजनेस कई गुना बढ़ गया। लोगों की डिमांड बढ़ गई और हमें अपनी टीम भी तेजी से बढ़ानी पड़ी।

वे बताते हैं कि तब युवाओं के कॉल ज्यादा आ रहे थे। वे अपनी नौकरी की सिक्योरिटी को लेकर डरे थे, परेशान थे। इसी तरह कई लोग अपनी हेल्थ को लेकर भी चिंतित थे और समाधान तलाश रहे थे। अभी भी कॉल करने वालों में ज्यादातर युवा ही हैं। इनमें लड़कियों की संख्या भी ठीक ठाक है।

फिलहाल पुनीत के साथ देशभर से 1600 से ज्यादा एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर जुड़े हैं। इसमें हर लैंग्वेज जानने वाले लोग हैं। इसके साथ ही उनके साथ 70 से ज्यादा लोग टीम में काम करते हैं, जो टेक्नोलॉजी से लेकर मार्केटिंग और मैनेजमेंट का काम संभालते हैं। अभी हर दिन करीब 55 हजार लोग उनके ऐप पर आते हैं। इसमें से 5 हजार से ज्यादा कस्टमर्स पेड हैं। भारत के साथ ही दूसरे देशों के भी लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनसे कॉन्टैक्ट करते हैं।

कैसे करते हैं लोगों की मदद? क्या है पूरा प्रोसेस?


पुनीत बताते हैं कि अभी उनके ऐप पर हर दिन 55 हजार यूजर्स आ रहे हैं। इनमें से 5 हजार से ज्यादा यूजर्स पेड कस्टमर्स हैं।

पुनीत की टीम ने एक मोबाइल ऐप तैयार किया है। इसमें लॉगिन करने और अकाउंट क्रिएट करने के बाद आप अपने सवाल पूछ सकते हैं। इसमें दो तरह की सर्विसेज हैं- एक पेड और दूसरी मुफ्त। एक्सपर्ट एक्सट्रोलॉजर से चैट और फोन पर बातचीत के लिए आपको पेमेंट करना होगा। जबकि रोज का राशिफल पढ़ने, ऑनलाइन कुंडली बनवाने और लाइव शो देखने के लिए पेमेंट की जरूरत नहीं होगी। यह सबके लिए फ्री सर्विस है।

पुनीत कहते हैं कि हमारे ऐप पर एक्सपर्ट एस्ट्रोलॉजर्स की लिस्ट है। इसमें उनके बारे में हर डिटेल जानकारी, उनकी एक्सपर्टीज, उनकी रेटिंग और फीस उपलब्ध है। इसके आधार पर कस्टमर अपनी पसंद का एस्ट्रोलॉजर सिलेक्ट कर सकता है और उससे चैट या फोन कॉल के जरिए अपनी समस्याओं का समाधान जान सकता है। पेमेंट के लिए उसे अपना वॉलेट रिचार्ज करना होगा। पैसे मिनट के हिसाब से कटते हैं। यानी जितनी देर तक वह चैट या कॉल पर एक्सपर्ट से बातचीत करेगा, उतना अमाउंट उसके वॉलेट से कटता जाएगा। चार्ज को लेकर वे कहते हैं कि अलग-अलग एस्ट्रोलॉजर्स के रेट अलग-अलग हैं। औसतन 25 से 30 रुपए में कस्टमर्स को उनकी समस्या का समाधान मिल जाता है।

मार्केटिंग को लेकर पुनीत की टीम सोशल मीडिया और गूगल ऐड्स का सहारा लेती है। वे लोग लगातार पेड प्रमोशन करते रहते हैं। अगर कोई बतौर एस्ट्रोलॉजर पुनीत की टीम के साथ जुड़ना चाहता है तो उसे ऐप पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा। इसके बाद उसका क्वालिफिकेशन टेस्ट होगा। फिर एक्सपर्ट की टीम सवाल जवाब करेगी और यह जांचने की कोशिश करेगी कि उस एस्ट्रोलॉजर को जानकारी है या नहीं। सबकुछ ठीक रहा तो उसे काम करने का मौका मिलेगा।

ADITYA BANGAD - A YOUNG ENTERPRENEUR

ADITYA BANGAD - A YOUNG ENTERPRENEUR

17 साल के आदित्य ने 9 महीने पहले प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर बनाने का स्टार्टअप शुरू किया, अब एक करोड़ रु. पहुंचा टर्नओवर

प्लास्टिक वेस्ट को मैनेज करना हम सबके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इससे पर्यावरण को तो नुकसान पहुंचता ही है, साथ ही कूड़े के ढेर पर कई जिंदगियां भी दम तोड़ देती हैं। कई मवेशी कचरा खाकर बीमार हो जाते हैं, उनकी जान चली जाती है। कई बार तो झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे भी इसका शिकार हो जाते हैं। इस परेशानी को कम करने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में रहने वाले आदित्य बांगर ने एक पहल की है।

12वीं में पढ़ने वाले 17 साल के आदित्य प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर तैयार कर रहे हैं। फिलहाल हर दिन वे 10 टन प्लास्टिक वेस्ट रिसाइकिल कर रहे हैं। अपनी इस पहल से वे न सिर्फ प्लास्टिक वेस्ट की समस्या से छुटकारा दिला रहे हैं, बल्कि इससे कमाई भी कर रहे हैं। एक साल के भीतर ही उन्होंने एक करोड़ रुपए से ज्यादा का टर्नओवर हासिल किया है।

पहली बार चीन में प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर बनते देखा


आदित्य बांगर फिलहाल भीलवाड़ा के एक स्कूल में 12वीं क्लास में पढ़ते हैं। उनके पिता का अपना पुराना बिजनेस है।

आदित्य एक बिजनेस फैमिली से ताल्लुक रखते हैं। अपने आइडिया को लेकर वे कहते हैं कि जब मैं 10वीं में था, तब परिवार के साथ कुछ दिनों के लिए चीन जाने का मौका मिला। वहां मुझे उन जगहों पर जाने का मौका मिला जहां प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर तैयार किए जा रहे थे। मुझे वह काम पसंद आया और यही से मेरी दिलचस्पी इसमें बढ़ने लगी। मुझे लगा कि यह काम अगर मैं सीख लूं तो अपने देश में भी इस तरह की पहल की जा सकती है। इसके बाद मैं वहां काम कर रहे लोगों से मिला। उनसे बातचीत की और उनके काम करने की प्रोसेस को समझा।

इसके बाद साल 2019 में आदित्य वापस इंडिया लौट आए। उन्होंने अपने घर में इस आइडिया को लेकर बात की। चूंकि परिवार पहले से बिजनेस से जुड़ा हुआ था, इसलिए आदित्य को भी आसानी से इसकी इजाजत मिल गई। उन्होंने चीन में प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर तैयार कर रही कंपनियों से कॉन्टैक्ट किया और वहां से रिसाइकिल करने वाली मशीनें मंगाई। इसके बाद भीलवाड़ा में ही उन्होंने अपना सेटअप जमाया और प्रोडक्शन यूनिट शुरू की। इसके लिए उन्हें पिता की कंपनी से फंड मिला था।

सेटअप तो जमा लिया, पर कोविड के चलते एक साल काम रोकना पड़ा


आदित्य बताते हैं कि एक किलो प्लास्टिक वेस्ट से करीब 800 ग्राम फाइबर निकलता है। इसके बाद इस फाइबर से कपड़े तैयार किए जाते हैं।

आदित्य कहते हैं कि हमने पूरी तैयारी कर ली थी। काम शुरू करने ही वाले थे कि कोरोना के चलते लॉकडाउन लग गया और हमें काम बंद करना पड़ा। करीब एक साल तक हमारा काम बंद रहा। इस बीच खाली वक्त का उपयोग मैंने नए आइडिया जेनरेशन के रूप में किया। इंटरनेट पर वेस्ट मैनेजमेंट संबंधी ढेर सारे वीडियो देखे, जानकारी जुटाई। साथ में अपनी पढ़ाई भी करता रहा। फिर जनवरी 2021 में कोरोना के मामले कम हुए और लॉकडाउन में ढील दी गई। बाजार और ऑफिस धीरे-धीरे खुलने लगे। नौ महीने पहले हमने भी फिर से कोशिश की और 'ट्रैश टू ट्रेजर' नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की।

कैसे करते हैं काम? कहां से लाते हैं प्लास्टिक वेस्ट?

आदित्य बताते हैं कि हम अभी सिर्फ प्लास्टिक वेस्ट को ही रिसाइकिल कर रहे हैं। इसके लिए हम लोकल लेवल से लेकर नगर निगम तक से वेस्ट कलेक्ट करते हैं। कई छोटे वेंडर्स से हमारा टाइअप है, जिन्हें हम पैसे देकर प्लास्टिक खरीदते हैं, फिलहाल हम लोग हर दिन 10 टन प्लास्टिक रिसाइकिल कर रहे हैं। हालांकि यह हमारी डिमांड के मुताबिक कम है। हम जल्द ही प्लास्टिक वेस्ट कलेक्शन को बढ़ाने वाले हैं। जैसे-जैसे लोगों को हमारे काम के बारे में पता चल रहा है, वैसे-वैसे हमारा काम आगे बढ़ रहा है।


फिलहाल आदित्य और उनकी टीम मिलकर हर दिन 10 टन से ज्यादा प्लास्टिक वेस्ट रिसाइकिल कर रही है।

प्लास्टिक वेस्ट से फाइबर तैयार करने की प्रोसेस को लेकर वे बताते हैं कि सबसे पहले हम वेस्ट को कलेक्ट करने के बाद उसे कैटेगराइज करते हैं। इसके बाद सभी बॉटल से ढक्कन निकालते हैं और उन्हें क्लीन करने के बाद ड्राय करते हैं। फिर मशीन की मदद से उसे महीन क्रश कर लेते हैं। इसके बाद इसे केमिकल वॉश करते हैं और मशीन की मदद से मेल्ट कर लेते हैं। मेल्ट होने के बाद हम इसे कुछ घंटों के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ते हैं। ठंडा होने के बाद यह फाइबर के रूप में तब्दील होता है। इसके बाद प्रोसेसिंग करके इससे फैब्रिक तैयार किया जाता है।

आदित्य के मुताबिक एक किलो प्लास्टिक वेस्ट से लगभग 800 ग्राम फाइबर तैयार होता है। अभी वे हर दिन 8 टन फाइबर तैयार कर रहे हैं। फिलहाल वे ब्रांड-टू-कस्टमर यानी B2C मॉडल पर काम नहीं कर रहे हैं। उनके यहां जितना भी फाइबर तैयार होता है, वे एक कंपनी को सीधे बेच देते हैं। जो आगे इससे कपड़े और बाकी चीजें तैयार करती है। अभी आदित्य की टीम में 200 लोग काम करते हैं।

करियर के लिहाज से इस फील्ड में बेहतर स्कोप

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सालाना 150 लाख टन प्लास्टिक का कूड़ा बनता है। दुनियाभर में जितना कूड़ा हर साल समुद्र में बहा दिया जाता है उसका 60% हिस्सा भारत डालता है। जबकि अभी करीब एक चौथाई प्लास्टिक वेस्ट को ही रिसाइकिल्ड किया जा रहा है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अभियान चला रही हैं। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के तहत देश में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर कई प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।


अगर कोई इस सेक्टर में करियर बनाना चाहता है तो उसे सबसे पहले प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को समझना होगा। उसकी प्रोसेस को समझना होगा। इसको लेकर केंद्र और राज्य सरकारें ट्रेनिंग कोर्स भी करवाती हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल से इसकी ट्रेनिंग ली जा सकती है। इस सेक्टर में काम करने वाले कई इंडिविजुअल भी इसकी ट्रेनिंग देते हैं।

अगर आप भी वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर काम करना चाहते हैं तो ये दो स्टोरी आपके काम की है

असम में रहने वाले संजय गुप्ता वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर काम कर रहे हैं। स्विट्जरलैंड की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर वे पिछले तीन साल से भारत में वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर काम कर रहे हैं। असम में वे घर-घर जाकर लोगों के यहां से कचरा कलेक्ट करते हैं और फिर उससे ऑर्गेनिक खाद तैयार करते हैं। 100 से ज्यादा लोगों को उन्होंने रोजगार से जोड़ा है। वे खुद भी लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं।

SANJAY GUPTA - A YOUNG ACHIEVER

SANJAY GUPTA - A YOUNG ACHIEVER

अखबार में अपने शहर की गंदगी के बारे में पढ़ा तो विदेश की जॉब छोड़ घर-घर कचरा इकट्ठा करने लगे, 122 लोगों को नौकरी दी, खुद भी लाखों कमा रहे

मैं 5 साल से स्विट्जरलैंड में वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहा था। अच्छी सैलरी और हर तरह की सुविधा थी। किसी चीज की दिक्कत नहीं थी। एक दिन अखबार में छपी एक खबर पर मेरी नजर गई। जिसमें मेरे होमटाउन असम के तिनसुकिया जिले को सबसे गंदा शहर बताया गया था। खबर पढ़ने के बाद मुझे काफी तकलीफ पहुंची। मैं सोचने लगा कि विदेश में रहकर स्वर्ग को स्वर्ग बना रहा हूं, लेकिन अपने शहर के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं, ऐसे में मेरे मिशन का क्या मतलब है, जब खुद का शहर ही गंदा हो।

साल 2018 में मैंने नौकरी छोड़ी दी और अपने शहर की गंदगी मिटाने की मुहिम में जुट गया। आज मेरा शहर लगभग वेस्ट फ्री हो गया है, लोग जागरूक हो गए हैं। इतना ही नहीं अब असम के दूसरे जिले भी वेस्ट फ्री हो रहे हैं। लोगों को काम मिल रहा है, महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। बदलाव की इस कहानी को गढ़ने वाले शख्स का नाम संजय गुप्ता है, जो लंबे वक्त से वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहे हैं।

पढ़ाई के दौरान ही वेस्ट मैनेजमेंट पर काम करना शुरू कर दिया था


संजय गुप्ता लंबे वक्त से वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़े रहे हैं। उन्होंने भारत में और भारत के बाहर इससे जुड़े कई प्रोजेक्ट के लिए काम किया है।

49 साल के संजय गुप्ता की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव में ही हुई, उसके बाद बैचलर्स की पढ़ाई के लिए वे इलाहाबाद चले गए। इसके बाद उन्होंने JNU में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने मास्टर्स और फिर पीएचडी की डिग्री हासिल की। संजय कहते हैं कि JNU में पढ़ाई के दौरान ही वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी। कैंपस में जहां भी गंदगी दिखती, उसे साफ करने में हम लग जाते थे। तब हमारा मोटिव था कैंपस को जीरो वेस्ट बनाना और हम बहुत हद तक उसमें कामयाब भी हुए। इसके बाद मैंने तय किया कि आगे इसी फील्ड में करियर बनाऊंगा।

JNU से पढ़ाई पूरी करने के बाद संजय गुप्ता की जॉब लग गई। 2013 तक उन्होंने अलग-अलग संस्थानों के लिए वेस्ट मैनेजमेंट और इससे जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया। इसके बाद वे स्विट्जरलैंड चले गए। अपनी इस मुहिम की कहानी को लेकर संजय बताते हैं कि तीन साल पहले जब मुझे अपने होमटाउन की गंदगी के बारे में पता चला तो मैंने सरकार और जिले के अधिकारियों को लेटर लिखा। उन्हें बताया कि मैं वेस्ट मैनेजमेंट पर काम कर रहा हूं और अब अपने राज्य और शहर के लिए कुछ करना चाहता हूं। इसको लेकर सरकार से पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला और मैं असम लौट आया।

बहुत कम लोग अवेयर थे, जिसे जहां मन किया कचरा फेंक देता था


संजय गुप्ता की टीम हर तरह के वेस्ट कलेक्ट करती है। इसके बाद वे लोग वेस्ट को सेग्रिगेट करके आगे की प्रोसेसिंग करते हैं।

संजय गुप्ता कहते हैं कि यहां आने के बाद पता चला कि मुसीबत वाकई बहुत बड़ी है। शहर में गंदगी तो थी ही, साथ ही लोगों की आदतें भी सही नहीं थीं। जिसको जहां मन किया वहां कचरा फेंक देता था। सूखा कचरा और गीला कचरा सब मिक्स कर देते थे। होटल और दुकानों के बाहर वेस्ट का ढेर लगा रहता था। बहुत कम लोग ही अवेयर थे। इसके बाद मैं नगर निगम के अधिकारियों से मिला और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अपनी एक टीम तैयार की।

सबसे पहले उन्हें वेस्ट मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी। सूखे और गीले कचरे का फर्क बताया। हर तरह के कचरे को कैसे अलग करना है, इसकी प्रोसेस समझाई और फिर अपने काम में जुट गए। हमारी टीम लोगों के घर-घर जाकर वेस्ट कलेक्ट करने लगी। इसका असर भी दिखा और एक साल के भीतर ही शहर की आधी गंदगी साफ हो गई, लोग अवेयर होने लगे, वे इधर-उधर कचरा फेंकने की बजाए, डस्टबिन में वेस्ट इकट्ठा करने लगे।


संजय गुप्ता की टीम के लोग रोज लोगों के घर-घर जाकर वेस्ट कलेक्ट करते हैं। बदले में लोगों से वे 50 से 100 रुपए मंथली चार्ज करते हैं।

इसके बाद हमने अपने काम का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। तिनसुकिया जिले के साथ ही तीताबर और बाकी शहरों में भी हमने अवेयरनेस फैलाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग हमारी मुहिम से जुड़ते गए और हमारी टीम बढ़ती गई। आज हमारी टीम में 122 लोग काम करते हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। अब तक हम लोग 500 टन वेस्ट कलेक्ट कर चुके हैं। 50 लाख से ज्यादा प्लास्टिक बॉटल रिसाइकिल्ड कर चुके हैं।

कैसे करते हैं काम? क्या है वेस्ट मैनेजमेंट का मॉडल?
संजय गुप्ता ने केयर नॉर्थ ईस्ट फाउंडेशन नाम से खुद का ऑर्गेनाइजेशन बनाया है। वे कहते हैं कि हमने एरिया के हिसाब से अलग-अलग टीमें बनाई हैं। इनमें वेस्ट कलेक्ट करने वाले, उन्हें सेग्रिगेट करने वाले और ड्राइवर शामिल हैं। ये लोग हर दिन सुबह एक निश्चित समय पर अपने-अपने एरिया में जाते हैं और लोगों के घर से वेस्ट कलेक्ट करके अपनी यूनिट तक लाते हैं। यहां हम वेस्ट का एनालिसिस करते हैं। सूखा वेस्ट, गीला वेस्ट, प्लास्टिक वेस्ट, पेपर वेस्ट, रिसाइकिल्ड होने वाले वेस्ट, डिकंपोज करने वाले वेस्ट और ऑर्गेनिक वेस्ट को अलग-अलग करते हैं।


संजय गुप्ता और उनके साथी ऑर्गेनिक वेस्ट को प्रोसेस करके खाद तैयार करते हैं। हर साल वे लोग 2.5 टन खाद तैयार कर रहे हैं।

इसके साथ ही हमने होटल वाले, दुकानदार और बड़ी कंपनियों से भी टाइअप किया है। हमारी टीम उनके यहां से सभी तरह के वेस्ट कलेक्ट करती है। शहर में कोई कार्यक्रम या इवेंट होता है तो हम वहां से भी वेस्ट कलेक्ट करते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर इतने वेस्ट का होता क्या है? संजय बताते हैं कि रिसाइकिल्ड होने वाले वेस्ट को हम लोग कबाड़ी वाले को बेच देते हैं। इससे जो कुछ आमदनी होती है वह वेस्ट कलेक्ट करने वाली टीम की होती है। जो वेस्ट रिसाइकिल्ड नहीं किए जा सकते, उन्हें हम डंप कर देते हैं। इसके बाद जो ऑर्गेनिक वेस्ट बचते हैं, उनसे हम लोग खाद तैयार करते हैं। अब तक हमारी टीम 2.5 टन से ज्यादा खाद तैयार कर चुकी है।

फंड कहां से लाते हैं, सोर्स ऑफ इनकम क्या है?
संजय कहते हैं कि CSR की तरफ से हमें कुछ फंड मिला है। उन्होंने वेस्ट कलेक्ट करने के लिए हमें 23 गाड़ियां उपलब्ध कराई हैं। कुछ मदद हमें नगर निगम से भी मिलती है। इसके अलावा जिन घरों से हम वेस्ट कलेक्ट करते हैं उनसे 50 रुपए से लेकर 100 रुपए तक महीना हम चार्ज करते हैं। इसी तरह होटल वालों और दुकानदारों से भी हम कुछ चार्ज लेते हैं। इसका कोई रेट फिक्स नहीं है। कई लोग पैसे नहीं देते हैं, फिर भी हम उनके यहां से वेस्ट कलेक्ट करते हैं। अभी करीब 20 हजार घरों तक हमारी टीम पहुंच रही है। इससे हर साल करीब 6 से 7 लाख रुपए कलेक्ट हो जाते हैं।

संजय कहते हैं कि व्यक्तिगत लेवल पर मैं कानपुर और देश के दूसरे हिस्सों के लिए भी काम कर रहा हूं। कई राज्यों में मेरा मॉडल अपनाया जा रहा है। जल्द ही हम बिहार में अपना प्रोजेक्ट शुरू करने वाले हैं।


संजय बताते हैं कि ऑर्गेनिक वेस्ट से खाद तैयार करने में करीब 70 दिन का वक्त लगता है। 25 से 30 टन कचरे से एक किलो खाद बनता है।

करियर के लिहाज से भी वेस्ट मैनेजमेंट में बेहतर स्कोप है
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 150 लाख टन प्लास्टिक वेस्ट निकलता है। इसमें से महज 25% ही रिसाइकिल्ड हो पाता है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अभियान चला रही हैं। कई शहरों में प्लास्टिक वेस्ट कलेक्शन सेंटर भी बने हैं। जहां लोगों को कचरे के बदले पैसे मिलते हैं। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के तहत देश में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर कई प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

अगर कोई इस सेक्टर में करियर बनाना चाहता है तो उसे सबसे पहले प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट को समझना होगा। उसकी प्रोसेस को समझना होगा। इसको लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकार ट्रेनिंग कोर्स भी करवाती हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वेस्ट मैनेजमेंट, भोपाल से इसकी ट्रेनिंग ली जा सकती है।

देश में कई ऐसे छोटे-बड़े स्टार्टअप हैं, जो वेस्ट से ईकोफ्रेंडली प्रोडक्ट बनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। दिल्ली की रहने वाली कनिका आहूजा भी उनमें से एक हैं, जो न सिर्फ कचरे की समस्या से छुटकारा दिलाने की पहल कर रही हैं, बल्कि इससे ईकोफ्रेंडली बैग, पर्स, फैब्रिक प्रोडक्ट और हैंडीक्राफ्ट आइट्स की मार्केटिग करके सालाना 50 लाख रुपए की कमाई भी कर रही हैं। उन्होंने 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार से भी जोड़ा है।