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Thursday, April 30, 2026

SETH PREMCHAND RAYCHAND - बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संस्थापक

SETH PREMCHAND RAYCHAND - बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संस्थापक

जब भी भारत में स्टॉक मार्केट की बात होती है, सबसे पहला नाम आता है बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का, जो न केवल देश बल्कि पूरे एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है। इसी बदलाव को औपचारिक रूप देने में सबसे अहम भूमिका निभाई प्रेमचंद रायचंद ने 


भारत के शेयर बाजार की कहानी सिर्फ संख्याओं और ग्राफ्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा इतिहास है जिसने देश के वित्तीय ढांचे की नींव रखी। जब भी भारत में स्टॉक मार्केट की बात होती है, सबसे पहला नाम आता है बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का, जो न केवल देश बल्कि पूरे एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है।

इस ऐतिहासिक वित्तीय व्यवस्था की शुरुआत 19वीं सदी में हुई, जब मुंबई के टाउन हॉल (आज का हॉर्निमन सर्कल) के पास एक बरगद के पेड़ के नीचे कुछ शेयर दलालों ने मिलकर शेयरों की खरीद-फरोख्त शुरू की। यह साधारण शुरुआत धीरे-धीरे एक बड़े वित्तीय सिस्टम में बदल गई।

इसी बदलाव को औपचारिक रूप देने में सबसे अहम भूमिका निभाई प्रेमचंद रायचंद ने। 1875 में उन्होंने ‘द नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन’ की स्थापना की, जो आगे चलकर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के रूप में विकसित हुआ। इसी कारण उन्हें भारतीय शेयर बाजार का जनक भी कहा जाता है।

प्रेमचंद रायचंद अपने समय के बेहद प्रभावशाली व्यापारी थे और उन्हें “कॉटन किंग” और “बुलियन किंग” जैसे नामों से भी जाना जाता था। अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान कपास के वैश्विक व्यापार में आई उथल-पुथल का उन्होंने शानदार लाभ उठाया और अपार संपत्ति अर्जित की।

हालांकि उनकी जिंदगी हमेशा आसान नहीं रही। 1865 में अमेरिका में गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद कपास की कीमतों में भारी गिरावट आई, जिससे उन्हें बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ और वे दिवालिया तक हो गए। लेकिन उनकी कारोबारी समझ और जुझारू स्वभाव ने उन्हें दोबारा खड़ा किया और उन्होंने फिर से सफलता हासिल की।

प्रेमचंद रायचंद की कहानी आज भी यह सिखाती है कि जोखिम, समझदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ असफलताओं के बाद भी नई शुरुआत की जा सकती है। उनकी विरासत आज भी भारत के आधुनिक शेयर बाजार की मजबूत नींव के रूप में जिंदा है।

MAHARAJA AGRASEN LIFE CYCLE AND HISTORY

MAHARAJA AGRASEN LIFE CYCLE AND HISTORY

महाराजा अग्रसेन का संक्षिप्त प्रमाणिक जीवन चरित्र


जेमिनी ऋषि ने कहा हरियाणा प्रांत में सरस्वती, इषदवती और घग्घर नदी के संगम पर एक छोटा सा प्रताप नगर का राज्य था जिसके राजा का नाम बल्लभसेन था। बल्लभ सेन की महारानी का नाम भगवती देवी था। बल्लभसेन के पिता का नाम वृहतसेन था जिनका उल्लेख महाभारत में आया है। प्रताप नगर 20 गांवों का एक छोटा सा राज्य था। बल्लभसेन के छोटे भाई का नाम कुंदसेन था। केशी उनके सेनापति का नाम था। दुर्भाग्य से बल्लभसेन के कोई पुत्र न था। छोटे भाई कुंदसेन का पुत्र एक वर्ष का हो चुका था। प्रजा ने श्री वल्लभ से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया किंतु सूर्यवंशी क्षत्रिय एक पत्नीधारी होते हैं। ऐसा निश्चय सुनाते हुए राजा वल्लभ ने दूसरे विवाह से इन्कार कर दिया। कुंदसेन को भाई के इस विचार से बड़ी खुशी हुई कि निकट भविष्य में उसका ही पुत्र राजा बनेगा। परंतु विधाता को कुछ और मंजूर था। राजा वल्लभ और विदर्भ की कन्या भगवती देवी ने मिलकर शिवजी की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम्हारे दो पुत्र होंगे। कालांतर में अग्रसेन जी का जन्म हुआ।

मासेसश्वयुजेमाघे शुक्ले मध्य दिवसे शुभम्।
आदित्यवासरे महेन्द्रसमये उत्पन्नो बहु भाग्यवान ।। 
नक्षत्रेऽश्वनी मेषति लग्ने गुरू पुष्ययागे परम् ।। 
वुधानुराधा शनिरोहणीश्च कुजरेवतिश्च ।। 
श्रुतस्य शस्त्र शास्त्रे च परेषम जीवं चेतिस।
धाता गमनार्थ विच्चकार नाम्ना अग्र सम्भवम् ।। (अग्रसेन उपाख्यान)

अर्थात - आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि के दिन बारह बजे महेन्द्रकाल में राजा वल्लभ के घर महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ। महेन्द्रकाल के विषय में कहा जाता है कि इस काल में जन्मा बालक बहुत भाग्यवान शस्त्र शास्त्र में निपुण, धन धान्य, दैविक शक्ति से आपूर रहता है। अग्रसेन जी के जन्म पर प्रताप नगर में अपार खुशियां मनाई गई। प्रजा खुशी से उन्मुक्त हो नाचने, गाने, धूम मचा-मचा कर अपनी खुशियां प्रकट करने लगी। लेकिन अग्रसेन जी के चाचा कुंदसेन और उनके पुत्रों को यह खुशियां जरा भी रास न आई। उनके राज्यारोहण का सपना धराशायी हो चुका था। अग्रसेन जी धीरे-धीरे बड़े होने लगे। बाल सुलभ लीला से आगे बढ़कर गुरू के आश्रम जाने की तैयारी होने लगी। उनकी शिक्षा उज्जैन में आगर नगर में संदीपन ऋषि के आश्रम के पास तांडव्य ऋषि के आश्रम में सम्पन्न हुई। चौदह वर्ष की अल्पायु में वह गुरु के गृह से शस्त्र-अस्त्र में दीक्षित होकर वापस आ गए। वह तांडव्य ऋषि के आश्रम में थे तभी छोटे भाई शूरसेन का जन्म हुआ। कुंदसेन व उसका बेटा महात्वाकांक्षी और ऐय्याश प्रकृति के थे। किंतु अग्रसेन जी के शील और सद्आचरण की सभी प्रशंसा करते थे।

एक दिन राज दरबार लगा हुआ था कि पांडवों की तरफ से युद्ध का निमंत्रण लेकर एक दूत का आगमन हुआ। राजा बल्लभ ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया और पांडवों की तरफ से युद्ध में लड़ने के लिए गए। पिता की रक्षा के लिए अग्रसेन जी भी उनके साथ गए। प्रतापनगर का राज्य कुंदसेन और उनके पुत्र को समर्पित कर गए।

युद्ध में नौ दिन के बाद वल्लभसेन शहीद हो गए। अग्रसेन व्याकुल होकर पागलों की तरह विलाप करने लगे तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना देते हुए संसार की असारता का पाठ पढ़ाया। अग्रसेन जी ने महाभारत में पूरे अठारह दिन तक पांडवों का साथ दिया। अंत में युद्ध समाप्ती पर पांडवों ने उन्हें आशीर्वाद, धन धान्य देकर विदा किया।

प्रतापपुर में वापस आते ही अग्रसेन को माँ के करुणा विलाप तथा चाचा कुंदसेन के षडयंत्रो का सामना करना पड़ा। केशी सेनापति की सहायता से वह अपने ही महल में बंदी बना लिए गए। असहाय दुःखी परिस्थितियों से भ्रमित अग्रसेन जी अपने ही महल में फूट-फूट कर रो पड़े और ईश्वर से सहायता मांगने लगे। राजा वल्लभ का प्राचीन पदाधिकारी सुमंत अग्रसेन जी के प्रति बहुत ही वफादार था। उसने अपनी जान पर खेलकर अग्रसेन की रक्षा की और उन्हें कैद से छुटकारा दिलाते हुए स्वंय को उनके ऊपर न्यौछावर कर दिया।


अग्रसेन जी. भागकर इष्दवती नदी के इस पार महर्षि गर्ग मुनि के आश्रम में आए। यही उनकी शरण स्थली बनी। गर्ग मुनि ने उन्हें बहुत सांत्वना प्रदान की और महालक्ष्मी की आराधना करने का उपदेश दिया। अग्रसेन जी ने महालक्ष्मी की आराधना की। दीपावली के दिन ही महालक्ष्मी प्रकट हुई और उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारे कुल में मैं सदा प्रतिष्ठित रहूंगी। साथ ही महालक्ष्मी ने आदेश दिया कि जिस भूमि पर तुमने तपस्या की है उसी धरती के अंदर अपार धन छिपा है। राजा मरूत ने सौ अश्वमेघ यज्ञ किए थे। उससे बचा हुआ सोना सब धरती पर गाड़ दिया है। धरती के धन का अधिकारी राजा ही होता है अतः तुम संकोच न करो इस धन को स्वीकार करो और इसी बीहड़ में एक नए राज्य की स्थापना करो।

गर्ग मुनि के शिष्यों की सहायता से अग्रसेन ने अग्रोहा की धरती से अपार धन शक्ति प्राप्त की वहां के बीहड़ काटे और एक नए नगर की स्थापना की। इस नवीन नगर का नाम अग्र नगर रखा गया। यह नगर सब भांति सम्पन्न था। वहां बड़े-बड़े महलों की पंक्तियां खड़ी की गई। टेढ़ी-मेढ़ी गलियां, चौबारों सड़कों, चौराहों से उसे समृद्ध किया गया। मंदिर, तालाब बावड़ी आदि बनवाई गई तरह-तरह के पक्षी, शुक, मयूर, हंस, कोकिल आदि आकर उस नगरी में आनंद की ध्वनि बिखरने लगे।

महालक्ष्मी का वरदान

तब वंशे मही सर्वा पूरिता च भविष्यति, 
तव वंशे जातिपर्णे कुल नेता भविष्यति । 
अद्यारम्य कुले तव नाम्नां प्रसिद्धयति, 
अग्रवंशियां हि प्रजाः प्रसिद्धाः भुवनत्रये । 
भुजा प्रसादं तव वसेत् नान्यस्में प्रतिदापयेत, 
येन सा सफला सिद्धिभूर्यात् तव युगे युगे।
मम पूजा कुले यस्य सोग्रवंशो भविष्यति ।। (अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम् ).

फल फूल वाले वृक्षों से नगर की शोभा इंद्रपुरी को भी मात करने लगी। नगर स्थापना से फुर्सत पाकर अग्रसेन ने अपनी राज्य शक्ति बढ़ाने की ओर ध्यान दिया। तभी गर्ग मुनि ने उन्हें नागकन्या के स्वयंवर की बात बताई और कहा कि तुम जाकर महीधर की कन्या से विवाह करो। नागराजा से संबंध करके तम्हारी शक्ति अपार हो जाएगी।

गर्ग मुनि से आदेश पाकर अग्रसेन असम की तरफ बढ़े। मार्ग में अनेक कठिनाइयां आई पर सबका समाधान करते हुए अंत में मणिपुर पहुंच गए। यहां बहुत वाद-विवाद, कशमकश के बाद उनका विवाह नागराजा की कन्या माधवी से निर्विन्ध सम्पन्न हो गया। आर्य सभ्यता और शैव सभ्यता का मिलाप हुआ। महीधर ने विवाह की खुशी में अग्रसेन के नाम का एक नगर बसाया जिसका नाम 'अगरतला' रखा वह आज भी असम की राजधानी है।

माधवी से विवाह होने के पश्चात अग्रसेन ने अपनी राज्य शक्ति का विस्तार किया। अठारह गणराज्यों में अपने राज्य का विस्तार किया। उनके नाम क्रमशः हिसार, हॉसी, तोसाम, सिरसा, नारनौल, रोहतक, पानीपत, दिल्ली, जींद, कैथल, मेरठ, सहारनपुर, जगाधरी नाभा, अमृतसर, अलवर, उदयपुर आदि थे। आज भी इन राज्यों में अग्रवाल अधिकाधिक संख्या में पाए जाते हैं। उन्होंने राज्य के नागरिकों में परस्पर समन्वय वाद की भावना का विकास किया। अपनी अलौकिक सूझ-बूझ से ही उन्होंने आग्रेय गणराज्य को एक ऐसे शक्तिशाली राज्य के रूप में प्रतिष्ठित किया जिसे सम्पूर्ण देश में क्षत्रियों जैसी प्रतिष्ठा मिली तथा सभी देश राजाओं ने अग्रसेन की कर्मठता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें अपने समकक्ष आदर सम्मान दिया।

विवाह एवं वंशबेलि

अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम के अनुसार महाराजा अग्रसेन के अठारह विवाह हुए वहां उनकी रानियों के नाम भी दिए गए हैं। किंतु अग्रसेन उपाख्यान में केवल एक ही रानी माधवी का वर्णन हैं और उनके अठारह पुत्र हुए ऐसा उल्लेख है। अग्रसेन उपाख्यान के अनुसार राजा अग्र के अठारह पुत्रों के विवाह भी नागवंशों में ही हुए हैं। इन सभी पुत्रों के वंश सोलह पीढ़ी तक अग्रोहा पर राज्य करते रहे। उसके बाद भी ग्यारहवीं सदी तक अग्रवाल लोग अपनी भूमि पर बने रहे। मोहम्मद गोरी के आक्रमण के बाद यह राज्य सदा-सदा के लिए अतीत के गर्भ में विलीन हो गया।

महाराजा अग्रसेन ने 108 वर्ष तक राज्य किया, तत्पश्चात अपने पुत्र विभू को राज्य सौंप वन में चले गये।

अग्रसेन जी की अठारह रानियों के नाम जो अग्रवंश वैश्यानुकीर्तनम् में है वह इस प्रकार हैं- माधवी, सुंदरावती, मित्रा, चित्रा, शुभा, शीला, शिखा, शांता, रजा, चरा, शची, सखी, रंभा, भवानी, सरसा, रती, रूची और समा थे।

अन्य पुत्रों के नाम विभू, विरोचन, वाणी, पावक, अनिल, केशव, विशाल, रत्न, धन्वी, धामा, पामा, पयोनिधि, कुमार, पवन, माली, मंदोकत, कुंडल, कुश, विकास, विरण, विनोद, वपुन, वली, वीश, हर, रव, दंती, दाड़ियोदंत, सुंदर कर, खार, गर, शुभ, फ्लश, अनिल, सुंदर, घर प्रखर, मल्लीनाथ, नंद, कुंद, कुलुम्बक, कांति, शांति, क्षमाशाली, पसयामाली और विलासद तथ अन्य दो कुमार थे।

उनकी पुत्रियों के नाम दया, शांति, कला, कांति, नितिक्षा, अधरा, अमला, शिका, मही, रमा, रामा, पायिनी, जलदा, शिवा, अमृता और आर्जिका आदि प्रसिद्ध हैं। ये सारी संताने राजा अग्र की संताने कही गई। अग्रसेन ने गौड़ को अपना पुरोहित बनाया। उनका पुरोहित वेद विद्या और बुद्धि में पारंगत था। उसने अपनी शक्ति से राजा अग्रसेन के राज्य में वृद्धि और कीर्ति की पताका फहराई। आज भी अग्रवाल गौड़ को ही अपना पुरोहित मानते हैं।

क्षत्रिय से वैश्य वर्ण स्वीकार करना

राज्य को सुगठित करने के बाद अग्रसेन ने प्रजा के विकास के लिए अठारह प्रकार के यज्ञ करने का संकल्प लिया। उनके समय में यज्ञ ही राज्य की प्रतिष्ठा का मापदंड माना जाता था। उस समय अठारह प्रकार के यज्ञों का चलन था। उन्होंने अठारह यज्ञ कर संपूर्ण देश में अपनी ख्याति एवं कर्मठता का अद्भुत उद्धरण प्रस्तुत किया। लेकिन इन यज्ञों में होने वाली पशु बलि तथा हिंसा से उनके हृदय में करुणा अत्पन्न हुई और अठारहवां यज्ञ उन्होंने हिंसा रहित किया। ब्राह्मणों ने इसका घोर विरोध किया और कहा कि यदि आप यज्ञों में पशु बलि बंद कर देंगे तो आपको क्षत्रिय वर्ण से वैश्य वर्ण स्वीकार करना पड़ेगा। राज अग्रसेन ने कहा - हे ब्राह्मण देव आपका हर दंड मुझे शिरोधार्य है पर निरीह पशुओं की बलि देकर अपनी प्रतिष्ठा की स्थापना मुझे स्वीकार नहीं है। दूसरों की जान लेकर बनाई गई कीर्ति अधिक टिकाऊ नहीं होती। यज्ञ भले ही अच्छे हो पर इनमें दी जाने वाली निरीह पशुओं की बलि ठीक नहीं हो सकती। राजा के इस परिवर्तन को लक्ष्यकर ब्राह्मणों ने उन्हें दंड स्वरूप क्षत्रिय से वैश्य वर्ण घोषित कर दिया और अठारहवां यज्ञ बिना किसी बलि के पूर्ण किया गया। इस अंतिम यज्ञ के साथ ही अग्रसेन के स्वभाव में एक अद्भुत परिवर्तन का समावेश हो गया। उन्होंने संपूर्ण राज्य में शाकाहारी भोजन एवम् नियम से रहन-सहन का कानून बनाया। इस तरह संपूर्ण अग्रवाल जाति में अहिंसा, शाकाहारी सादे भोजन का प्रचार, प्रसार कर अग्रसेन ने प्रजा में सदाचार की भावना का बीजारोपण किया।

गोत्र स्थापना

राज्य स्थापना यज्ञ आदि से निवृत्त होकर अग्रसेन जी ने वैश्यवंश की उत्कृष्टता कायम करने के लिए गोत्रों की स्थापना पर बल दिया। राजा के अठारह गणराज्यों के प्रतिनिधियों को एक-एक गोत्र देकर उन्होंने राज्य के मुखिया को अपने वंश का गौरव प्रदान किया। परंपरा से चले आए विवाहित नियमों को उन्होंने अनुशासन में बांधकर वैश्य वर्ण को अठारह गोत्रों में ही विवाह करने का नियम बनाया

इसके अतिरिक्त अन्य जातियों में होने वाले शादी-विवाह के संबंधों को वर्जित कर दिया। उन्होंने कहा प्रत्येक गोत्रधारी अपना गोत्र छोड़कर अन्य सत्रह गोत्रों में ही विवाह करेगा। इससे अन्यत्र नहीं। उस समय विवाह में बंधन नहीं था। परस्पर निकट के संबंधों में भी विवाह हो जाते थे जो कालान्तर में आपसी फूट का कारण बनते थे। अग्रसेन जी ने गोत्र द्वारा विवाह की नई परंपरा स्थापित कर समाज में वंशोत्पति का ऐसा सशक्त सूत्र दिया जिससे अग्रवाल जाति आज भी बुद्धि, बल, कौशल से आपूर चहुंमुखी समृद्धि का प्रतीक बनी हुई है। यह गोत्र परंपरा का ही प्रभाव था कि राज्य में अच्छी बुद्धिवादी प्रवृत्तियों की वृद्धि हुई और 5000 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी अग्रवाल जाति सारे देश में अपने उदार वृत्ति, समन्वयवाद, धार्मिक परंपरावादी संस्कृति की रक्षक बनी हुई है। अठारह गोत्र अठारह यज्ञों के पुरोहित ऋषियों के नाम पर दिए गए। उनके नाम हैं-गर्ग, गोभिल, गवाल, वात्सल, कांसल, सिंहल, मंगल, महल, तिंगल, ऐरन, टेरन, टिंगल, वित्तल, मित्तल, तन्दुल, तॉयल, गोईल और गवन उपर्युक्त गोत्र नाम अग्रवालों की उत्पत्ति से उद्वत हैं। अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने 1974-75 में गोत्रों के नामों में सुधार करके प्रामणिक रूप से 18 गोत्रों के नाम इस प्रकार दिये हैं-

गर्ग, गोयल, गोयन, बंसल, कंसल, सिंहल, मंगल, जिंदल, तिंगल, ऐरण, धारण, मधुकुल, बिन्दल, मित्तल, तॉयल, मंदल, नागल, कुच्छल ।

समतावादी शासन तंत्र

अग्रसेन जी ने अपनी सूझ-बूझ, अपने बल कौशल से एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया, जिसका आधार समाजवाद, मानवता तथा अहिंसा पर निर्भर था। उनके साम्राज्य का विस्तार राजनीति धर्म और समाजवाद के समन्वय से पूर्ण इतना व्यवहारिक था कि तत्कालीन, प्राचीन, अर्वाचीन, दार्शनिक तथा बड़े-बड़े समाजवाद के व्याख्याता भी उस तरह का दर्शन आज तक नहीं दे पाए हैं।

उन्होंने अपने राज्य के नागरिकों में परस्पर समता व ममता का आधार स्थायी तौर पर स्थापित करने के लिए अत्यंत सरल सा नियम बनाया, जिसके व्यवहारिक पक्ष की सफलता ने ही उन्हें महान तथा आदर्श राजाओं की श्रेणी में विद्यमान किया। उनके राज्य का नियम था कि राज्य में कोई भी परिवार चाहे किसी वर्ण, किसी कुल का हो, यदि वह राज्य में बसना चाहता है तो राज्य में बसने वाले अन्य परिवार उसको एक रुपया, एक ईंट भेंट करेंगे। इस तरह यदि एक लाख परिवार उस राज्य में बसते थे तो आंगतुक परिवार 24 घंटे में ही उन परिवारों के समकक्ष बन जाता था। उसका मकान तथा व्यापार स्थापित होने में केवल 24 घंटे का समय पर्याप्त होता था। समाजवाद और मानवता का इससे बड़ा सिद्धान्त व्यवहार में कुछ हो ही नहीं सकता था।

उनके राज्य के ये नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं थे, वह अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक होने के कारण जन-सामान्य के लिये जीवन का एक अंग ही बन गए थे। क्योंकि देना और लेना दोनों ही राज्य का नियम था अतः देने वाले के मन में न अंह का भाव आता था और न लेने वाले के मन में कृतज्ञता का भाव आता था। परोपकार की भावना, परस्पर भाईचारे की भावना ही इस नियम का द्वढ़ आधार थी। भ्रष्टचार तथा स्वार्थ का उनके शासन में नामर्मोनिशान नहीं था, कृषि गोरक्षा, व्यवसाय पर ही सम्पूर्ण जन-जीवन आधारित था।

धार्मिक उत्थान

महांराजा अग्रसेन ने अपने शासन काल में अद्भुत क्रांतिकारी परिवर्तन किए। धर्म के क्षेत्र में उन्होंने यज्ञों को तो मान्यता दी, किन्तु बलि की प्रथा का उन्होंने समूल उच्छेद कर दिया। इसके लिए उन्हें तत्कालीन ब्राह्मण वर्ण का कठिन विरोध झेलना पड़ा किन्तु वह अपने निश्चय पर अडिग रहे। अंत में उनकी ही जीत हुई। कालांतर में सभी यज्ञ हिंसा रहित हो गए। धर्म में अहिंसा का पालन करवा कर सम्पूर्ण जाति को उन्होंने सात्विक वृत्ति से आपूर कर एक नया मानवतावादी पाठ पढ़ाया जहां मांसाहार, अनाचार का निषेध था। जहां पशु, पक्षियों तक को राजकीय सुरक्षा प्राप्त थी।

राजकीय उत्थान

राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने अति-प्राचीन परम्परागत नियमों की अवहेलना कर एक नया नियम बनाया। प्रत्येक गृहपति, बालक, वृद्ध युवती शस्त्र धारण करें और अपनी रक्षा स्वयं करें। प्राचीन नियमों के अनुसार तो केवल क्षत्रिय ही शस्त्र धारण करते थे, वहीं युद्ध में जाने के अधिकारी थे। इस नियम से देश की तीन चौथाई जनता एकदम अकर्मण्य हो गई थी। यदि कोई शत्रु आक्रमण करता तो केवल क्षत्रिय लड़ाई पर जाते थे बाकी प्रजा हाथ पर हाथ धरे बैठी रह जाती थी। राजा की जय-पराजय पर ही उसका भविष्य निर्भर रहता था। महाराजा अग्रसेन ने इस कुलघातक नियम का घोर विरोध किया। उनके राज्य में शस्त्र चलाना अनिवार्य हो गया। प्रत्येक नागरिक को शस्त्र धारण करना आवश्यक था, अधिकार था, चाहे वे किसी भी वर्ण का हो। यही कारण था कि अग्रवाल जाति विदेशी शत्रुओं से अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ रही और ग्यारहवीं शताब्दी तक वह अग्रोहा में अपना अस्तित्व बनाए रखने में समक्ष रही।

उनका राज्य समता के सिद्धान्त पर आधारित था। विभिन्न जाति, वर्ण, कुल के सभी लोग राजा को ही अपना पिता मानते थे, अपने राज्य को ही वह अपना देश मानते थे। चाहे वे कहीं से आए हो, कहीं के वासी हों, किन्तु अग्रसेन के राज्य में वह उन्हीं को अपना मालिक और राज्य को ही अपनी मातृभूमि समझते थे। ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। सभी लोग राज्य की समृद्धि के लिए ही प्रयासरत थे। इसलिए ही अग्रसेन के राज्य में अल्पकाल में ही राज्य की चहुंमुखी उन्नति हुई। उन्होंने राजा का अधिकार सभी को दिया। विवाह के दिन घुड़चढ़ी के अवसर पर दुल्हा छत्र चंवर धारण कर एक दिन के लिए अपने को राजा के समान अनुभव कर कसता था। यह एक क्रांतिकारी नियम था जाहां राजा प्रजा सभी में एकत्व की भावना समुचित विकास हुआ। अग्रवाल जाति में आज भी यह नियम चला आ रहा है।

शैक्षणिक उन्नति

शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अभूतपूर्व क्रांतिकारी कदम उठाए। सभी वर्ण, सभी वर्ग के लिए शिक्षा अनिवार्य थी। शिक्षा के साथ-साथ कला, साहित्य, औद्योगिकी विकास की ओर भी उन्होंने पूरा-पूरा ध्यान दिया। उनके राज्य में धर्म और संस्कृति को जीवन का अनिवार्य तत्व माना गया। सभी अपने अपने धर्म का पालन करते हुए, समान रूप से शासन के सहयोगी बनें, यह उनके दैनिक जीवन का मूल मंत्र था। हजारों वर्ष बाद आज भी अग्रवाल समाज में यही धर्म और संस्कृति, दान-पुण्य, परस्पर मिल बांट खाने की प्रथा अग्रसेन जी की विरासत के रूप में विद्यमान है। यही कारण है कि आज भी इस जाति ने अपने देश को बढ़ाने, विकास करने में हर क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। शासकीय सेवाएं, शिक्षा,, कला, विज्ञान, साहित्य अभियांत्रिकी, मिलिट्री, राजनीति के क्षेत्र में हर जगह अग्रवाल सपूत अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सामाजिक सेवा तथा धार्मिक अनुष्ठानों के क्षेत्र में तो अग्रवाल समाज सदा अग्रणी रहा है। इस जाति ने कभी शासन से कोई अपेक्षा नहीं की है। यह तो केवल सेवा में लगी रही है, सेवा ही इसका जीवनोद्देश्य बन गया है।

अन्य उपलब्धियाँ


अग्रसेन जी के इस तरह प्रतिष्ठापित होने से चारों ओर उसके यश का डंका बजने लगा। देवताओं का राजा इंद्र को उसके वैभव से ईर्ष्या होने लगी। उसने अग्रसेन जी के राज्य में वर्षा बंद कर दी। चारों ओर अकाल, भूखमरी का तांडव गूंजने लगा। अग्रसेन ने अपना सारा खजाना प्रजा के सुख के लिये खोल दिया। कुंए बावड़ी, तालाब से राज्य में पानी की कमी को दूर किया। अंत में गर्ग मुनि के निर्देशानुसार पुनः एक बार महालक्ष्मी की तपस्या की। महालक्ष्मी प्रकट हुई। उन्होंने कहा-वर मांग। राजा ने कहा 'इन्द्र मेरे राज्य में अशांति पैदा करता है इसे बंद करें' महालक्ष्मी ने कहा 'इन्द्र तेरे राज्य में अशांति पैदा नहीं करेगा। और पुनः वरदान दिया कि आज से यह पृथ्वी तेरे वंश से पूरित होगी, सब जाति और वंशों के कुल नेता तेरे वंश में उत्पन्न होंगे। आज से यह कुल तेरे नाम से जाना जाएगा तथा अग्रवंशी पूजा तीनों लोकों में अग्र होगी। जब तक अग्रकुल में महालक्ष्मी की पूजा होती रहेगी यह कुल सदा धन वैभव से आपूर रहेगा। महालक्ष्मी से वरदान पाकर राजा प्रसन्न हो गया। उसके राज्य का विस्तार उत्तर में हिमालय पर्वत, पर्वत की नदियों तथा पूर्व और दक्षिण की सीमा गंगा जी व पश्चिम की सीमा यमुनाजी से लेकर मारवाड़ देश के पास के देश थे।

एक रुपया, एक ईंट


अग्रसेन जी के राज्य में एक लाख परिवार बसते थे। उनमें से कोई भी यदि देवी विपत्ति का शिकार हो जाता था तो समस्त राज्य के परिवार उसको एक रुपयां, एक ईंट स्वेच्छा से देते थे और वह परिवार पुनः अपनी स्थिति को प्राप्त कर लेता था। समाजवाद का ऐसा अद्भूत उदाहरण अन्य किसी राज्य में न देखा गया न सुना गया। बाहर से आए हुए नए परिवार भी इसी प्रकार की सुरक्षा प्राप्त करने के अधिकारी थे।

अग्रसेन का काल

'अग्रसेन उपाख्यान' तथा महालक्ष्मी व्रत कथा के आधार पर अग्रसेन जी का जीवन चरित्र प्रामाणिक रूप से यही माना जाता है। उनका काल महाभारत युद्ध के समय का ही माना जाएगा। क्योंकि 'महालक्ष्मीव्रत कथा' तथा अग्रसेन उपाख्यान दोनों में ही उनका काल का प्रवेश हो चुका था। 'अग्रसेन उपाख्यान' के अनुसार अग्रसेन जी राजा परीक्षित से 14 या पंद्रह वर्ष बड़े थे।

निष्कर्ष

1. प्रताप नगर हरियाणा प्रांत का ही एक राज्य था जो तीन नदियों के संगम पर बसा था, वे तीन नदियां हरियाणा में ही थी। इषद्वती, घग्घर और सरस्वती। सरस्वती नदी अब विलोप हो गई है।

2. अग्रोक नगर आग्रेयगण की स्थापना-जिसे आज 'अग्रोहा' कहा जाता है महाराजा अग्रसेन ने ही की थी इसके पूर्व वह गणराज्य नहीं था। महाभारत में कर्णविजय के प्रसंग में श्लोक आया है-

भदान रोहितकांचैव आग्रेयान मालवानपि ।

गणान् सर्वान विनिर्जित्य नीतिकृत प्रहसन्निव ।। महाभारत वन पर्व 25520 । इसमें 'आग्रेयान' पाठ न होकर आग्नेयान् पाठ ही सही है जो कि आग्रेय दिशा की ओर संकेत देता है। अग्रसेन, अग्रोहा अग्रवाल ग्रंथ में पहले भी या मत प्रतिस्थापित किया गया है।

3. महाराजा अग्रसेन का जन्म परीक्षित के जन्म से पंद्रह वर्ष पूर्व का था और कलि के प्रांरभ में उन्होंने अपने नवीन गणराज्य की स्थापना की तथा एक सौ आठ वर्ष तक राज्य करने के बाद स्वयं तपस्या करने वन में चले गए।

अग्रसेन जी की शासन व्यवस्था

युद्ध की विभीषिका तथा साम्राज्यवाद के विस्तार की महात्वाकांक्षा के दुष्परिणामों से अवगत राजा अग्रसेन ने अपने शासन का आधार लोकतंत्र की परम्परा पर रखा। इन शासन तंत्र के दो मुख्य नियम थे।

राजा जनता की इच्छा से चुना जाता था। जनता की इच्छा ही सर्वोपरि थी। राजा बनने के बाद भी राजा केवल अपनी ही इच्छा से कोई कार्य नहीं कर सकता था। उसका प्रत्येक कार्य मंत्री परिषद की सलाह से ही हुआ करता था। राजा बनने के पूर्व वह समस्त प्रजा के सामने शपथ लेता था कि 'यदि मैं प्रजा से द्रोह करूं तो मेरी संतुलित, धन, आयु, और यश सब नष्ट हो जाऐं। मैं मंत्री परिषद के आदेशों का पालन करूंगा।'

शासन प्रबंध के लिए उन्होंने प्रत्येक नगर का, ग्राम का एक अधिपति बनाया। इन शासकों को ग्रमिक कहते थे। दस ग्राम के शासकों को दशिक, 20 ग्रामों के शासकों को विशाधिप कहते थे, 900 ग्रामों के शासकों को सतपाल कहते थे। 1000 ग्रामों के शासकों को सहस्त्रपति कहते थे। जनपद या राष्ट्र के अंतर्गत जो नगर थे उनके एक-एक सर्वार्थ चिंतक शासक की नियुक्ति की जाती थी ये सब राज्य के पदाधिकारी राज्य की सभा में सभासदों के रूप में भी सम्मिलित होते थे।

इन सभी पदाधिकारीयों के कार्य अलग-अलग थे। ग्रमिक का कार्य ग्राम संबंधी सब कार्यों को सम्पन्न करना था। यदि वह उसमें कोई दोष देखता था तो उसे दशिक के पास पहुंचा देता था, दशिक विशाधिप को, विशाधिप शतूपाल को, शतपाल सहस्त्रपति को और सहस्त्रपति सम्पूर्ण राज्य के राजा को पहुँचा देता था। इस प्रकार राज्य की छोटी से छोटी कमी से भी राज्य सरकार अवगत रहती थी तथा उसे दूर करने का प्रयत्न करती थी। अग्रसेन के राज्य में उन्होंने सीधे जनता से सम्पर्क बनाए रखने का एक और नियम बनाया था। गणों के शासन में उन्होंने कुलों को महत्व दिया। ये कुल, बुद्धि, रूप व धन में समान नहीं हुए होते भी जाति की दृष्टि से अपने को एक समान समझते थे। इनके कुल वृद्ध ही इनके मुखिया होते थे। इनका कर्तव्य था कि वे अपने कुलों को नियंत्रण में रखें ताकि उनमें फूट न पड़ने पावे। कुलों को महत्व देने के कारण ही राज्य में फूट पड़ने की आशंका समाप्त हो गई थी।

राज्य में फूट नहीं पड़े लोगों के मन स्वच्छ रहें, इस विचार से उन्होंने राज्य का यह नियम बनाया कि राज्य में आकर जो भी बसना चाहे, उसे सारी प्रजा एक मोहर, एक ईट प्रदान करें ताकि नवीन परिवार पुराने परिवार के समकक्ष बन जाये। प्रजा में ऊंच-नीच के भेद मिटाने वाला या अद्भूत नियम था। इसमें राजा से लेकर सेवक तक सभी शामिल थे। अग्रसेन के इस नियम का ही यह फल निकला कि दूर दराजों में, जंगल में बसे लोग वापस आकर अग्रसेन के राज्य में बसने लगे। राज्य धन-जन से पूर्ण हो गया।

अहिंसा

अहिंसा को उन्होंने राज्य धर्म का आधार बनाया। पूर्व के राजाओं में यज्ञ में पशु बलि का प्रचलन जोरों पर था। अग्रसेन ने धर्म की आड़ में की जा रही इस हिंसा से पशुओं को मुक्ति दिलाई। उन्होंने लोगों को तलवार तो पकड़ाई किन्तु अपनी रक्षा के लिए। धर्म और राजनीति के संदर्भ में उन्होंने प्रजा को स्वयं निर्णय लेने का अधिकार दिया।

उनके शासन की यही सब खुबियां थी जिनके कारण आज भी अग्रवाल जाति अनगिनत संख्या में पूरे विश्व में फैली हुई अपनी दान, दया, धर्म का डंका बजा रही है। जिस जाति के पूर्वज ऐसे महान पुरुष हो क्यों न उनसे सारा राष्ट्र ही गौरवान्वित हो।

उपसंहार

महाराजा अग्रसेन का काल चारों ओर शांति तथा अमन चैन का काल रहा है। महाभारत युद्ध की विभीषिका से त्रस्त लोग शांति की खोज में जहां जिसे स्थान मिला वहीं एक समूह बनकर जीवन यापन कर रहे थे। इसी समय अग्रसेन जी का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने चारों ओर घूम-फिर कर बिखरे हुये लोगों को एकत्र किया, उन्हें संगठित किया और एक चहुंमुखी शांतिपूर्ण धार्मिक, अहिंसावादी राजनीति की छत्र-छाया में प्रजा का पालन पोषण कर उन्हें सुख चैन दिया। यही कारण है कि आज भी वे सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रेरक बने हुए हैं।

अग्रसेन जी के युग की सम्पूर्ण धार्मिक स्थिति पर यदि एक विहंगम दृष्टि डाली जाए तो यह निष्कर्ष सरलता से निकलता है कि राजा और प्रजा सभी धार्मिक सहिष्णुता में न केवल विश्वास करते थे वरन् उसका पालन भी करते थे। स्वयं अग्रसेन जी भी. वैदिक धर्मावलंबी होते हुए भी विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति विद्वेष का लेशमात्र भी आभास नहीं होने देते थे। राजा स्वयं चाहे किसी धर्म का अनुयायी हो तथापि प्रजा के ऊपर धार्मिक कट्टरता का कोई बंधन नहीं था। धर्म को सदैव ही व्यक्तिगत हित की बात माना गया। कालान्तर में इसी धार्मिक सहिष्णुता के अनुयायी भारतवर्ष के अन्य शासक भी बने।

महाराजा अग्रसेन ने स्वयं तो छत्र और चंवर धारण किया उन्होंने अपनी प्रजा को भी यह अधिकार दिया कि विवाह के समय दूल्हा छत्र और चंवर धारण कर अपने को अग्रवंशीय परम्परा का पोषक मानते हुए गौरव अनुभव करे। राजा और प्रजा में समानता लाने का यह एक अद्भुत दृष्टिकोण था। समता और ममता का ऐसा उदाहरण विश्व के किसी भी शासक में अब तक नहीं पाया गया है।

उनके काल में धर्म के अधिष्ठातागण भी बौद्विक विकास में किसी प्रकार से शिथिलता नहीं आने देते थे। राजा और प्रजा सभी प्रकार के दार्शनिक विचारों को सुनने और समझने के लिए तत्पर रहते थे। यहां मस्तिष्क की मस्तिष्क से और सिद्धान्त से सिद्धान्त की टक्कर होती थी। यही कारण था कि धर्म अपने सिद्धांत पर नवीन वातावरण में भी अडिग बना रहा।

श्री लक्ष्मी, विष्णु, शिव, कार्तिकेय आदि देवी-देवताओं की पूजा होती। प्रकृति में सूर्य, नदी, वृक्ष, आकाश आदि की पूजा भी प्रचलित थी। हल, बैल, चक्र, वेदी आदि राजा के राज चिन्हों के रूप में प्रतिष्ठित होते थे। खेती के लिए सिंचाई इत्यादि का प्रबन्ध करना शासन का मुख्य कर्तव्य था। नदी, तालाब, कुंओं, झील आदि का निर्माण कर पानी की कमी को दूर करने का प्रयास शासन द्वारा ही किया जाता था। भूमि चाहे किसकी हो उसके उपज के - लिए प्रबंध शासन ही करता था। भूमि का मालिक राजा को अन्न के रूप में कर देता था। कृषि करने की प्राचीन प्रणाली हल-बैल ही थी इसीलिए धर्मशास्त्रों में हल को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। ऋग्वेद में तो हल और इसे चलाने वाले के लिए बहुत से मंत्र कहे गये है - स्त्री-पुरूष, बच्चे सभी खुशहाल थे। कृषकों को ऐसी सुविधा अन्य किसी राज्य में नहीं प्राप्त हुई थी।

स्त्रियों की दशा बहुत ही उन्नत अवस्था में थी, वे शिक्षित तथा स्वतंत्र होती थी। राजकाज में परामर्श भी देती थी। आभूषणों का विशेष प्रचलन था। कम उम्र में विवाह नहीं होते थे। विवाह में उनकी इच्छा सर्वोपरि रहती थी, विभिन्न वंशों से विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी। राजा तो बहु-विवाह कर सकता था पर स्त्रियों के लिए बहु-विवाह वर्जित थे। विधवाओं को विशेष संरक्षण प्राप्त था। संयुक्त परिवार की प्रणाली ही परम्परा का निर्वाह करती थी। सम्पूर्ण समाज अहिंसा और शाकाहारी पद्धति से जीवन निर्वाह करता था। अहिंसा उनका दैनिक जीवन था, लेकिन युद्ध में हिंसा ही उनका परमों धर्म था। इनके वंश के लोग सदा इन्हीं देशों में बसे तथा पंजाब से मेरठ, आगरा तक इनकी बस्तियां प्रमुख रूप से विद्यमान रहीं। महाराजा अग्रसेन के राज्य में कोई गरीब अमीर नहीं था। सभी एक से थे। यहां समाजवाद ही प्रजा का आधार था। लोकतंत्रात्मक पद्धति में राजा-प्रजा सभी समान थे, यही कारण था कि उनके वंशजों ने बारह पीढ़ी तक निर्विघ्न शासन किया।

यह उनके ही पुण्य प्रताप का फल है कि अग्रवालों में आज भी वही सहिष्णुता, उदारता, धार्मिकता कूट-कूट कर भरी हुई है। अहिंसा और शाकाहारी शुद्ध सात्विक जीवन ही अग्रवालों के जीवन की आधारशिला बनी है। इसीलिए वे आज भी लक्ष्मीपुत्र हैं। लक्ष्मी उनके आंगन में नृत्य करती रहती है। इसीलिए किसी ने कहा है 'महाराजा अग्रसेन पांच हजार वर्ष बाद भी पूज्यनीय हैं, वे इसलिए नहीं कि वह एक प्रतापी राजा थे, किंतु इसलिए कि क्षमता, ममता और समता की त्रिविध मूर्ति थे वह।'

- लेखिका स्व. डॉ. स्वराज्यमणि अग्रवाल

Wednesday, April 29, 2026

THE GREAT VAISHYA EMPIRE OF INDIA

THE GREAT VAISHYA EMPIRE OF INDIA

वैसे तो भारतीय वैश्यों ने देश देशांतर में अपने व्यवसाय एवं उद्योग की धाक जमा कर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की, किन्तु उनकी महत्वकांशा केवल व्यवसाय तक सीमित न रही अपितु उन्होने राजनैतिक क्षेत्र में भी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया और अनेक राज्यों की स्थापना कर अपना बल, वैभव और पराक्रम प्रदर्शित किया।

नन्द राय जी की मां वैश्य थी और राधा जी यशोदा के सगे भाई वृषभानु वैश्य की पुत्री थी, इसी प्रकार कृष्ण द्वारा इन्द्र को पराजित किये जाने की गाथा वैश्यों द्वारा क्षत्रियों को परास्त करने की गाथा से जुड़ी है। महाराजा अग्रसेन पर भी इन्द्र ने आक्रमण किया था और जब युद्ध में इन्द्र अग्रसेन को परास्त न कर सका, तो उसने उनसे समझौता कर लिया था।

मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त था। चन्द्रगुप्त के पिटा का नाम सूर्य गुप्त  था यह चन्द्रगुप्त कौन था? इसको लेकर इतिहासकारों ने विभिन्न मतों की कल्पना की है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की माँ मुरा नामक दासी थी मुरा से ही मौर्य बना। इतिहासकार नगेन्द्र नाथ वसु ने अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मौर्य साम्प्रज्य के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त न शुद्र थे, न क्षत्रिय, अपितु वे वैश्य कुलोत्पन्न थे। उनका मत है कि पारस्कर गृह्य सूत्रों के अनुसार नाम के अन्त में गुप्त उपाधि केवल वैश्य ही धारण करते थे। 'गुप्तेति वैश्यस्ये' पारस्कर गृहसूत्र (1. 17. 4) चन्द्रगुप्त के नाम में गुप्त उपाधि का होना उसके वैश्य होने का परिचायक है। मौर्य चन्द्रगुप्त ने गिरनार के प्रदेश में शासक के रूप में जिस राष्ट्रीय प्रान्तीय शासक की नियुक्ति की थी, उसका नाम वैश्य पुष्यगुप्त था। गिरनार पर्वत से मिले एक प्राचीन शिलालेख से पता चलात है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह एक वैश्य कन्या से हुआ था और उसके वर्षे का नाम पुष्यगुप्त था, जो वैश्य वंशी था।

मौर्यस्य राज्ञः चन्द्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्यन
पुष्पगुप्तेन करितम शोकस्य मौर्यस्य।' (प्रथम रूद्रदमन का जूनागढ़ लेख) 8वीं लाईन

रोमिला थापर ने सुझाव रखा है कि मौर्य नरेश वैश्य जातीय थे 150 ई०पूर्व रूद्रदमन के जूनागढ़ शिलालेख में मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रान्तीय गवर्नर वैश्य पुष्यगुप्त का उल्लेख है।

जूनागढ़ अभिलेख के उक्त स्थल की व्याख्या करते हुए कीलहार्न पुष्यगुप्त को चन्द्रगुप्त का बहनोई स्वीकार करते हैं। इन विद्वानों का विचार है कि चन्द्रगुप्त द्वारा अपने साम्राज्य के पश्चिमी भाग में अपने बहनोई को अधिकारी के रूप में नियुक्त करना अस्वाभाविक नहीं है।

इसी प्रकार अनेक तर्क देकर डा० नगेन्द्र नाथ वसु ने प्रमाणित किया है कि भारत वर्ष में सबसे प्रथम एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने वाला, भारतीय इतिहास का प्रथम प्रतापी सम्राट वैश्याकुलोत्पन्न ही था।

इसी वंश में बिम्बसार, सम्राट अशोक जैसे महान राजा उत्पन्न हुए, जिन्होने अपने श्रेष्ठ शासन एवं प्रजावत्सलता द्वारा भारतीय शासन में विशेष स्थान प्राप्त किया। अशोक ने स्वंय अपना विवाह विदिशा की एक वैश्य श्रेष्ठि कन्या से किया था। महावंश के अनुसार जब अशोक अविन्तराष्ट्र का भोग कर रहा था तो विदिशा में उसका प्रेम वैश्य श्रेष्ठि श्रीदत्त की पुत्री श्रीदेवी से हुआ था, जिससे महेन्द्र और संघमित्र का जन्म हुआ।

कनेन वेदिसगिरिं नगरं मातु देविया।
सम्पत्तो मातरं पस्सि, देवी दिस्वा पियं सुतम् । 16
अवन्तिरट्ट्ठ भुञ्जन्तोपितरा दिन्नमत्तनो ।
सो असोक कुमारो हि उज्जैनीगमना पुरा । 18
वेदिसे नगरे वासं उपगन्त्वा तहिं सुभं।
देविं नाम लभित्वान कुमारि सेट्ठिधीतरम् । 19
संवासं ताय कप्पेसि गव्यं गण्हिय तेन सा।
उज्जेनियं कुमारं तं महिन्दं जनयी सुभं ।। 10
वस्तद्वयमतिक्कम्म संघामित्तञ्च धीतरं ।। 11 महावंसो-13-6-111

गुप्तवंश - भारत के इतिहास में स्वर्णिम युग अंकित करने वाला गुप्त वंश भी अग्रोहा के राजवंश से है। गुप्तकाल भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है। वैसे तो इस काल के राजाओं की जाति को लेकर अनेक मतभेद हैं, किन्तु ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि गुप्तवंशी शासक वैश्य सम्राट ही थे, जैसा कि उनकी गुप्त उपाधि से ही स्पष्ट है, क्योंकि मनुस्मृति, बौधयान गृह सूत्र तथा पारस्कर संहिता में उल्लेख मिलता है वैश्यान्त ! गुप्तेति ! इस वंश के सभी राजाओं ने गुप्त उपाधि का प्रयोग कर अपना वैश्य होना प्रकट किया है।

गुप्तकुल भारत के प्राचीन राजकुलों में से एक था। शंगुकाल के प्रसिद्ध बरहुत स्तम्भके लेख में एक राजा विशदेव का उल्लेख है, जो गोप्ति पुत्र (गुप्त कुल की स्त्री का पुत्र) था। अन्य अनेक शिलालेखों में भी गोप्ति पुत्र व्यक्तियों का उल्लेख है, जो राज्य में विविध उच्च पदों पर नियुक्त थे। इसी गुप्त कुल के एक वीर पुरूष श्रीगुप्त ने उस वंश का आरम्भकिया था।

एलेन, एस के आयंगर, अल्तेकर, रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, डी.एन.झा आदि इतिहास कारो के अनुसार वर्षो तक क्षत्रियो के संपर्क में रहने के कारण वैश्य समुदाय क्षत्रिय कृत्य करने लगे।


स्मृतियों के अनुसार ब्राह्मण की उपाधि शर्मा, क्षत्रिय की वर्मा, वैश्य की गुप्त या भूमि और शुद्र की दास होनी चाहिए।

शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता च भूभजः ।
भूतिर्गुप्तश्च वैश्यस्य दासः शुद्रस्य कारयेत् ।।
(विष्णुपुराण 3/10/9)'

मंजु श्री कल्प नामक ग्रंथ में उसके वैश्य होने तथा पूना से प्राप्त ताम्रपत्र में प्रभावती गुप्त का धारण गोत्र का उल्लेख इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि वे धारण गोत्रीय अग्रवाल ही थे, क्योंकि धारण गोत्र अग्रवालों में ही मिलता है। प्रभावती के पूनाताम्रपट्ट अभिलेख में निम्नांकित उल्लेख पाया जाता है।

"पृथ्थ्यिाम्प्रतिरथः सर्वराजोच्छेता चतुरूदधिसलिलास्वादितयशा अनेक-गो-हिरण्य-कोटि - सहस्रपदः परमभागवतः महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त तस्यदुहिता धारणसगोत्रा नागकुल संभूतायां श्री महादेव्यां कुबेरनागायामुत्पन्ना उभयकुलांकारभूता अत्यन्त भगवद्भक्ता वाकाटकानां महाराज श्री रूद्रसेनस्य अग्रमहिषी....। एपि०इण्डिया जिल्द 15, पृ041

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने नागवंश की राजकुमारियों से विवाह किया। महाराजा अग्रसेन ने भी नागवंश की राजकुमारियों के साथ विवाह किया था।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की पुत्री गुप्तदुहिता प्रभावती गुप्त का विवाह वल्लभी नरेश से हुआ था। तेन गुप्तः प्रभावती का अर्थ 1/5 गुप्त इसी के अनुरूप है।

इसके अतिरिक्त गुप्त शासकों के वैवाहिक सम्बन्ध वर्द्धन और नागवंश की कन्याओं से होना, वहां के खुदाई से प्राप्त मुद्राओं पर अग्रवालों में पूज्यनीय लक्ष्मी, विष्णु, कुबेर, गरूड़ आदि के चित्र अंकित होना, उनकी दान प्रियता, उदार दृष्टिकोण, धर्म के प्रति रुचि, शुद्ध-सात्विक पवित्र जीवन, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति रूचि, लोक कल्याणकारी प्रशासन, महाराजा अग्रसेन के समान ही इस वंश के राजाओं के नागवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध, उदार वादी समाजवादी परम्परा आदि से स्पष्ट होता है कि गुप्त वंशी सम्राट निश्चित रूप से वैश्य अग्रवाल ही रहे होंगे।'

गुप्तकालीन एक लेख में वर्णन आता है कि साम्राज्य में कोई भी अति दरिद्र तथा दुखी न था -

तस्मिन्नये शासति नैव कश्चिद्धम्मदिपेतां मनुजप्रजासु ।
आतों दरिद्रो व्यसनी कदमो दण्ड न वाचो भृश पीडितः स्यात (स्कन्द गुप्त का जूनागढ़ लेख लाईन नं० 6)2

गुप्तकाल में समुन्द्रगुप्त की सत्ता का प्रभाव सिंहल (श्रीलंका) तक माना जाता था। हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति में सैंहलकों का गुप्त सम्राटों के लिए भेंट आदि लेकर उपस्थित होना वर्णित है।


देवपुत्र शाहीशाहानुशाहीशकमुरण्डैः सैंहलक आदिभिः ।

इस वंश में सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमार गुप्त, स्कन्द गुप्त, नृसिंह गुप्त, बुद्धगुप्त, भानुगुप्त, तथागत गुप्त, कृष्ण गुप्त, हर्ष गुप्त, जीवित गुप्त. कुमार गुप्त द्वितीय आदि अनेक गुप्त शासकों ने भारत पर शासन किया तथा विदेशी शक्तियों से लोहा लिया। धीरे-धीरे गुप्त शक्ति कमजोर पड़ती गई। और गुप्त वंश के शासन का अन्त हो गया।

इस युग में विज्ञान, साहित्य कला, संस्कृति, अर्थ, धर्म, ज्योतिष आदि सभी क्षेत्रों में पर्याप्त प्रगति हुई। इसी कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता

वर्द्धन वंश - गुप्तकाल के बाद भी अग्र / वैश्य कुल द्वारा राज्य की यह परम्परा अनवरत रूप से किसी ने किसी रूप में चलती रही। गुप्त काल के पतन के बाद 569 ई० में वर्द्धन वंश का उल्लेख मिलता है। हृवेनसांग ने हर्ष को फी-शे या वैश्य जाति का बताया हैं।' वाटर्स का भी कहना है कि उसके कथनका कुछ आधार अवश्य रहा होगा। बौद्ध ग्रंथ मंजु श्री मूल कल्प के अनुसार श्री कंठ के पुण्यभूति वंश के राजा वैश्य जाति के थे।

सप्त्यष्ठौ तथा त्रीणि श्रीकण्ठावासिनस्तदा ।
आदित्यनामा वैश्यास्तु स्थानमीश्वरवासिनः।। 617
भविष्यति न सन्देहो अन्ते सर्वत्र भूपतिः
हकाराख्यो नामतः प्रोक्तो सर्वभूमिनराधिपः। 618 मंजुश्रीमूलकल्प पृष्ठ45

मंजु श्री कल्प एवं अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वर्द्धन वंशीय सम्राट गुप्त वंश के दौहित्र थे और उनका संबंध वैश्य समुदाय से था। राज गोबिन्द चन्द्र ने उन्हें धारणी गोत्रीय बताया है, जो अग्रवालों का एक गोत्र है। हर्ष चरित्र में भी बाणभट्ट ने हर्ष को वैश्य कुलोत्पन बताया है।

इस काल में आदित्य वर्धन, प्रभाकर वर्द्धन, राज्य वर्द्धन, हर्ष वर्द्धन जैसे अनेक यशस्वी सम्राट हुए। इनका राज्य थानेसर में (कुरूक्षेत्र) था, जो अग्रोहा के बिलकुल समीप है। वर्द्धन राजाओं का काल 700 ई0 तक रहा।

इसका विस्तार पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली राज्य के कुछ भाग में था। हर्षचरित्र तृतीय उच्छ्वास, में इस जनपद की समृद्धि तथा वैभव का कथात्मक वर्णन किया गया है। बाणने इस देश में ईख, धान तथा गेहूं की खेती का भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त तरह-2 के द्राक्षा तथा दाड़िम के उद्यान यहां की शोभा बढ़ाते थे। वहां की धरती केलों के निकुंजों से श्यामल दिखती थी। पद-पद पर ऊँटों के झुंड थे। सहस्रो कृष्ण-मृगों से वह देश चित्र-विचित्र लगता था।

अन्ततः अधिकांश वैश्यों ने कृषि और पशुपालन को त्याग कर उद्योग-व्यापार को अपना लिया।' आर्थिक जीवन पर उनके इस एकाधिपत्य से राजनीति में भी वैश्यों का प्रभाव बढ़ गया था। स्वंय हर्ष का वैश्य होना भी उनके प्रभाव वृद्धि का एक कारण माना जा सकता है।

मुगलकाल एवं अंग्रेज काल

मध्यकालीन सुल्तानों, बादशाहों और राजाओं के दरबार में वैश्य समाज के लोग सेनाओं के संचालन में भी पीछे नहीं रहे। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, बीकानेर आदि रियासतों में न जाने कितने ही अग्र / वैश्य मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि बनते रहे।

शेरशाह सूरी के साम्राज्य में एक छोटे से राजस्व अधिकारी के रूप में काम शुरू करके वीर हेमू ने (जिसे हेमू वक्काल भी कहा जाता है) सैन्य संचालन और नगर प्रशासन में अभूतपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया और शेरशाह के उत्तराधिकारी आदिल शाह सूरी के प्रधान सेनापति बन गए। इसी वीर वैश्य सेनापति के नेतृत्व में अफगान सेनाओं ने बीस लड़ाईयां जीती। उन्हें अपने बल पराक्रम और पौरूष के कारण वीर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त हुई तथा उन्हें सेनापति के साथ प्रधानमंत्री भी बनाया गया।

यह वही वीर हेमूशाह थे, जिनके नाम से मुगल सेनाएं कांपने लगती थी और जिन्हें मुगल सेना का काल समझा जाता था किन्तु पानीपत की दूसरी लड़ाई में आंख में तीर लगने से पासा ही पलट गया।

मुगल काल में अग्रवाल वैश्य महत्वपूर्ण पदों पर थे। राज्य के अधिकांश मोदी खानों का उत्तरदायित्व उन्होने सम्भाला हुआ था। युद्ध के समय वे ही सेना को अस्त्र-शस्त्र और रसद-सामग्री पहुंचाने का कार्य करते थे। उन्हें सेना और प्रशासन दोनों में उच्च पद प्राप्त किया

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल वैश्यों का इतिहास

HISTORY OF SONWAL SIHARE VAISHYA - सोनवाल वैश्यों का इतिहास

सोनवाल वैश्यों के सम्पूर्ण भारतवर्ष में मात्र 40000 से 50000 परिवार ही है। यह एक विलुप्त होती दुर्लभ वैश्य जाति है। जिसके कारण लोगों को इस जाति के संबंध में ज्ञान नहीं है।

सोनवाल वैश्य मूलतः सोमनाथ से आये गुजराती वैश्य है। सोमनाथ से आने के कारण सोनवाल वैश्य कहलाते है। जैसे कि अग्रोहा से निकलने एवं महाराजा अग्रसेन के वंशज होने से अग्रवाल, खण्डेला से निकलने के कारण खण्डेलवाल, ओसा से निकलने के कारण ओसवाल, मथुरा से निकलने के कारण माथुर, अयोध्या से निकलने के कारण अयोध्यावाशी, मारवाड़ से निकलने के कारण मारवाड़ी आदि। बुन्देलखण्ड में पटिया (जगा) ब्राह्मण जो कि गहोई एवं सोनवाल वैश्यों के द्विज है उनसे समाज के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त की गई। पटिया (जगा) ब्राह्मण श्री हरिओम शरण निवासी हिण्डोन सिटी, राजस्थान (मोबाईल नम्बर 08058902753) द्वारा उनके पास उपलब्ध ग्रन्थों के आधार पर सोनवाल वैश्यों का इतिहास निम्नानुसार है:-

सृष्टि के आदिक्रम में सर्व प्रथम जल की उत्पत्ति हुई। जल में भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति का आधान किया। इससे सुवर्णमय अंड का प्रादुर्भाव हुआ। इसी अंड से ब्रह्मा जी प्रकट हुये। ब्रह्मा जी द्वारा हजार वर्ष तक तप किया गया तब उन्हें सृष्टि रचना की शक्ति प्राप्त हुई। ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम मन से सृष्टि रचना की लेकिन उससे प्रजा का विस्तार नहीं हुआ। तब उन्होंने अपने शरीर के दो भाग कर डाले एक भाग से पुरूष और दूसरे भाग से नारी की सृष्टि हुई। जिससे अनेक प्रकार की मैथुनी सृष्टि होने लगी। यही पुरूष मनु और स्त्री शतरूपा कहलाई। मनु के नौ पुत्र हुये इक्ष्वाकु, नाभाग, घृष्णु, शर्याति, नरिष्यंत, प्रांशु, नाभागारिष्ट, करूष, और पृषथ। मनु की पुत्री इला के पुत्र पुरूरवा के सात पुत्र हुये। आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, घढायु, वनायु और शतायु। आयु के पांच पुत्र हुये नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, राजि तथा अनेना। इसमें से क्षत्रवृद्ध का एक पुत्र सुनहोत्र हुआ। सुनहोत्र के तीन पुत्र, काश, शल तथा गृत्समद थे। गृत्समद के एक पुत्र हुआ जिसका नाम शुनक (शौनक) रखा गया जो कि शौनक ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुए है।

शौनक ऋषि ने अपने तपोबल से 84 (चौरासी) पुत्र उत्पन्न किये। इन सभी पुत्रों को वैष्णव मत धारण कराया। शौनक ऋषि के वंश में उत्पन्न हुये पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि थे। इनके जिन पुत्रों ने कृषि व व्यापार कर्म अपनाया वे सोनवाल वैश्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। इन्होंने सोनखेरा नाम का ग्राम बसाया। यह स्थान राजस्थान की सीमा पर सौराष्ट्र में है। वर्तमान में पियाना शौनकपुर नाम से जाना जाता है। शौनक ऋषि के शिष्य शौनकादि ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुये और प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषाराण्य में आश्रम बनाकर रहे। श्री मद्भागवत पुराण में भी यह उल्लेख मिलता है कि नेमिषारण्य में 88 हजार शौनकादि ऋषियों ने सूत जी महाराज से भागवत कथा सुनी थी।

सोनवाल वैश्य बहुत अधिक धनी थे तथा गुजरात के सोमनाथ (सौराष्ट्र) में निवास तथा व्यापार करते थे जहां भगवान सोमनाथ जी का विशाल मंदिर था इस मंदिर की व्यवस्था में सोनवाल वैश्यों का बहुत अधिक योगदान था। सन् 1026 में जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर का विध्वंस कर दिया तब सोनवाल वैश्यों ने वहां से पलायन कर राजस्थान में आकर बस गये एवं व्यापार करने लगे तथा अपनी पहचान को गुप्त रखा। कालान्तर में राजस्थान से निकलकर बुन्देलखंड में आकर निवास एवं व्यापार करने लगे। शुनक (शौनक) ऋषि के पुत्र होने तथा सोमनाथ से आने के कारण सोनवाल वैश्य कहलाते है। अपनी पहचान को गुप्त रखने के कारण गुप्ता कहलाते है। सोनवाल वैश्यों के कुछ परिवारों द्वारा बुन्देलखंड में आकर बसने के समय, गरीबी एवं विपत्तिवश अपनी आजीविका हेतु कपड़ों पर छपाई का कार्य कर लिया था जिसके कारण लोग इन्हें छीपा समझते हैं जबकि यह विशुद्ध सोनवाल वैश्य है। गुजरात में बनियों को शाह भी कहा जाता था। अतः लोग इन्हें शाह भी कहते थे। इसी कारण शाह-हारे कहलाये, जो कि कालान्तर में बिगड़ते-बिगड़ते सिहारे हो गया। सिहारे शब्द सुनते ही अधिकांश व्यक्ति, जातियों के संबंध में ज्ञान नहीं होने से, इन्हें शिवहरे, सिहोरे (कलार), सहारे (अनुसूचित जाति) सहारिया, सहारिआ, सेहारिआ, सेहरिआ (अनुसूचित जनजाति) समझने लगते है। यदि हम अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति होते, तो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का लाभ उठाकर आज उच्च पदों पर नौकरी पा जाते एवं प्रमोशन भी मिलता।

यह विशेष उल्लेखनीय है कि भारत विभाजन के समय सिंध प्रान्त से हिन्दु आये थे, तत्समय उनकी भाषा, वेशभूषा को देखकर स्थानीय निवासियों ने इन्हें मुस्लिम समझा, परन्तु इनके आचार विचार रहन-सहन आदि को समझकर इन्हें हिन्दु माना। ठीक इसी प्रकार सोमनाथ से आए गुजराती वैश्यों को प्रारंभ में वैश्य नहीं माना। कालान्तर में इनके रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज आदि को देखते हुए सोनवाल वैश्य मानते है।

सोनवाल वैश्यों के गोत्र/अल्ल/आंकने निम्नानुसार है :-

1. राऊ (राहू, रहू) 2. अजमेरिया 3. माहुर (माहोरे) 4. कांकर (कंकर) 5. बरदिया 6. पहारिया 7. निहोनियां 8. सिंहोनिया (सिंघानिया) 9. मोहनिया 10. बिसौरिया 11. बुधिया 12. गौंड्या 13. पलैया 14. सोंजेले 15. मोहपतेले 16. खड़ेरे 17. गुरेले 18. सिंघल 19 नरवरिया 20. मुखरिया 21. बकेवरिया 22. अलापुरिया 23. सिघरिया 24. पवैया 25. विलवार 26. रठा 27. जिकसोल्या 28. चिनोनियां 29 जिगनिया 30. बडेतनिया 31. मांदेले 32. अत्रि 33. चनपुरिया 34. बरसैंया 35. गठेले 36. झुडेले 37. छिरौल्या 38. जिकसारिया 39. चखरिया 40. लाठ 41. बोखदा 42. बरसानिया।

उक्त गोत्रों/अल्लों में कुछ स्थान परक है, जैसे अजमेरिया, बकेवरिया, अलापुरिया, नरवरिया आदि। सौराष्ट्र से निकलकर प्रथमतः जिस स्थान पर निवास किया उस स्थान से बुंदेलखण्ड में आकर बसे जिससे उस स्थान के नाम से गोत्र बन गया जैसे अजमेर से आने के कारण अजमेरिया, नरबर से आने के कारण नरबरिया, बकेवर से आने के कारण बकेवरिया, अलापुर से आने के कारण अलापुरिया आदि।

उल्लेखनीय है कि बरदिया, पहारिया, बरसैंया, छिरौल्या, झुडेले आंकने गहोई वैश्यों में भी है। गुरेले, मोहपतेले, सिघरिया गहोई वैश्यों के आंकने कुरेले, महतेले, सिजरिया के अपभ्रंश हैं। राऊ गोत्र खण्डेलवाल वैश्यों में भी है। कांकर, अजमेरिया, मुखरिया एवं गोवरेले गोत्र ब्राह्मणों में भी है। अलापुरिया एवं मोहनियां गोत्र माथुर वैश्यों में भी है। सिंघल गोत्र अग्रवाल वैश्यों में भी है। पवैया गोत्र जैनों में भी है।

जिस प्रकार कोई भी गहोई वैश्य स्वयं को गहोई न लिखते हुए गुप्ता या अपना गौत्र/आंकने लिखते है। ठीक इसी प्रकार कोई भी सोनवाल वैश्य स्वयं को सोनवाल न लिखते हुए गुप्ता या अपना गौत्र / आंकने लिखते है।

सोनवाल वैश्य मूल गुजराती वैश्य एवं शौनक ऋषि के पुत्र होने के कारण पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी है, भोजन में सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, प्याज एवं लहसुन का सेवन भी नहीं करते थे। समय के परिवर्तन के अनुसार वर्तमान में प्याज एवं लहसुन का प्रयोग करने लगे हैं। सोमनाथ के उपासक होने के कारण भगवान शिव कुलदेवता है। कुलदेवी महालक्ष्मी जी है। कुछ परिवार बीजासेन माता को भी कुलदेवी मानते है।

सोनवाल वैश्य समाज में पूजा, पाठ, ध्यान, जप, यज्ञ का बडा महत्व है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन के साथ सभी त्यौहार उत्साह के साथ मनाये जाते है। "बाबू की दोज" की पूजा ब्राह्मणाों के साथ ही सोनवाल वैश्य समाज में भी होती हैं महिलायें गणगौर, महालक्ष्मी, करवाचौथ, तीजा, हलषष्ठी, ऋषिपंचमी आदि सभी त्यौहार पारंपरिक रीति-रिवाज से मनाती है।

आज (सन 2015) से लगभग 50-60 वर्ष पूर्व तक सोनवाल वैश्य अन्य वैश्य समाज में संबंध नहीं करते थे। समाज से भिन्न जाति में संबंध करने से उन्हें समाज से बाहर कर दिया जाता था। जिस परिवार को समाज से बाहर कर दिया जाता था, वह मजबूरन अन्य समाजों में विवाह संबंध करने को बाध्य हो जाता था। इसका यह अभिप्राय नहीं हो सकता कि उसकी मूल जाति बदल जायेगी।

समाज के बहुत कम परिवार होने के कारण विवाह संबंध स्थापित करने में परेशानी होने लगी थी। एक ही व्यक्ति से अनेकानेक संबंध स्थापित न करना पड़े, इसे दृष्टिगत रखते हुए व वृहद मानसिकता होने से, पूर्वजों ने 50-60 वर्ष पूर्व सोनवाल वैश्यों के अतिरिक्त अन्य वैश्य समाजों जैसे माहोर, महावर, गुलहरे, माथुर, गहोई, ओमर, माहेश्वरी, अग्रवाल आदि में भी संबंध करना प्रारंभ कर दिये थे। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि सोनवाल वैश्यों का वर्ग बदलकर अग्रवाल, माहेश्वरी, माथुर, ओमर, माहोर, गुलहरे हो जायेगा। वरन् शादी-विवाह होने से उनका मूल वर्ग परिवर्तित नहीं होगा। सोनवाल, माहोर, गुलहरे, ओमर, दोसर, माथुर, अग्रवाल, गहोई, माहेश्वरी आदि अलग-अलग वैश्य हैं। इसी कारण हजारों वर्षो से अलग-अलग लिखे जाते है। कुछ संबंध शिवहरे वैश्यों में इस कारण हुये, क्योंकि वह भी सोमनाथ से आए मूलतः चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे एवं सोमनाथ मंदिर का विध्वंस हो जाने से वहां से पलायन कर, क्षत्रिय धर्म त्यागकर व्यापार करने से वैश्य कहलाते हैं। ग्वालियर, आगरा साईड के कुछ शिवहरे वैश्यों द्वारा शराब का व्यापार करने से इन्हें कलार समझते हैं, जबकि कलार एक अलग जाति है।

कुछ परिवार जो बुन्देलखण्ड से दूर स्थानों पर जाकर बस गये एवं उन स्थानों पर सोनवाल वैश्यों की संख्या नहीं होने से, उन स्थानों पर उपलब्ध अन्य वैश्यों में संबंध स्थापित किये एवं उसी समाज में अपने आपको शामिल कर दिया। कुछ परिवार विदेशों / महानगरों में जाकर बस रहे है एवं उन स्थान पर निवासरत अन्य वैश्यों / समाजों में संबंध कर रहे हैं। जिन परिवारों को समाज से बाहर किया गया वह अन्य वैश्यों / समाजों में भी शामिल हो गये। इसी कारण सोनवाल वैश्यों की संख्या लगातार घटती गई एवं वर्तमान में भी घटती जा रही हैं। जिसके कारण सभी वैश्यों जैसे अग्रवाल, माहेश्वरी, नेमा, गहोई, गुलहरे, माहोर, महावर, माथुर, ओमर, पोरवाल आदि में संबंध करना मजबूरी हो गया है। वर्तमान में हमारे समाज में लड़कियों की संख्या अपेक्षाकृत रूप से अत्यंत ही कम हो गई है। इस कारण से कुछ परिवार अपने बच्चों को कुंवारा रहने से बचाने एवं वंशवृद्धि के लिए अन्य समाजों में भी विवाह संबंध कर रहे है। जिन्हें कि सामाजिक रूप से मान्य भी किया जाने लगा है। वर्तमान में अन्य समाजों में संबंध करने से किसी को समाज से बाहर नहीं किया जा रहा है।

JAIN RATN VEERCHAND RAGHAV JI GANDHI


JAIN RATN VEERCHAND RAGHAV JI GANDHI 


 

AGRAWAL VAISHYA - A DETAILED REPORT

AGRAWAL VAISHYA  - A DETAILED REPORT

अग्रवाल जाति का सम्बन्ध वैश्य समुदाय से है। अग्रवाल शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं और विभिन्न विद्वानों ने अपने ढंग से इसकी व्याख्या की है। भारतेन्दु हरिशचन्द्र के अनुसार अग्रवाल शब्द अग्रवाल दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है अग्र की संतान अर्थात् महाराजा अग्रसेन का बालक, जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर का मत है कि अग्रवाल सेना के अग्र भाग की रक्षा करते थे, इसलिए उस का नाम अग्रपाल पड़ा, जो अग्रवाल शब्द के रूप में परिवर्तित हो गया। एक मत के अनुसार अग्रसेन का अर्थ है सेना के अग्र भाग में रहने वाले और अग्रवाल क्योंकि सदैव सेना की अगली पंक्ति में रहते थे, इसलिए उनका नाम अग्रवाल पड़ा।'

यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में यज्ञ की अधिकता के कारण जो लोग अगर (एक प्रकार की सुगन्धित लकड़ी जो यज्ञ में प्रयुक्त होती थी) का व्यापार करते थे, वे अगरवाल या अग्रवाल कहलाए।

इसी प्रकार कहा जाता है कि महाराजा अग्रसेन वैश्य समुदाय में सबसे अग्रगण्य पुरूष थे, इसलिए उनकी संतान अग्रवाल कहलाई। जो सबसे अग्र रहे. वह कहलाता है अग्रवाल। इस प्रकार की व्याख्या भी अग्रवाल शब्द की करी गई है।

इस सम्बन्ध में सर्वमान्य मत यह है कि अग्रवाल आग्रेयगण या अग्रोहा के मूल निवासी थे। अग्रवाल जाति की उत्पत्ति की विवेचना करते हुए डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं - "मैं अग्रवाल जाति की उत्पत्ति आग्रेयगण से मानता हूँ।" इस आग्रेयगण का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में निम्न स्थान पर आता है -

भद्रान रोहतकांश्चैव आग्रेयान मालवान् अपि । 

गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत प्रहसन्निव ।।

(महाभारत वन पर्व 255.20)

इस श्लोक में जिस आग्रेयगण का उल्लेख किया गया है, वह निश्चित रूप से अग्रोहा ही था।

वनं पुरगामिश्रका सिधका, सारिका, कोटसग्रेभ्यः पुरगावण, मिश्र कावण, सिधकावण, सारिका कावण, कोटरावण और अग्रेवण । (अष्टाध्यायी (8/4) / 41 )^ 1

अग्रेवण निश्चित रूप से अग्रजनपद, जिसकी राजधानी अग्रोदक (अग्रोहा) थी, में स्थित वन का नाम था। (पृ० 42)

डा० वासुदेव शरण अग्रवाल, डा० परमेश्वरी लाल गुप्त एवं राधा कमल मुखर्जी ने आग्रेयगण के अस्तित्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया है।

काठक संहिता, आपस्तवं श्रोत-सूत्र तथा अष्टाध्यायी में भी आग्रि. आग्रेय और आग्रायण का उल्लेख आया है। (अष्टाध्यायी (4/1) / 99 )^ 2

वर्तमान अग्रोहा प्राचीन अग्रोदक या अग्रोतक है। स्थानीय किदवंती के अनुसार महाभारत काल में यह राजा अग्रसेन की राजधानी और स्थान का नाम अग्रसेन का ही अपभ्रंश है। यवन सम्राट सिकंदर के भारत आक्रमण के समय 327 ई०पूर्व) यहाँ आग्रेगण राज्य था। चीनी यात्री चेमांड (फाह्यान) ने भी आग्रोदक का उल्लेख किया है।'

अरोड़े, खत्री, सहरालिए, अग्रवाले आदि अनेक जातियों के अन्तर्गत जो बहुत सी अल्ले या उप जातियां हैं, उनके नामों में पाणिनीय नामों की पहचान मिलती है। जैसे अरोड़ा, खत्रियों में कंवर, हंस, चौपे, खेते में अल्लों या जाति उप विभागों के नाम है जो पाणिनि के कुमार नडादिगण ((4/1) / 11) हंसक नडादिगण ((4/1) / 11) चुप अश्वादिगण में चौपायन ((4/1) / 10) क्षेतयत तिकादिगण ((4/1) / 54) गोत्र नामों से सम्बन्धित है।'

अग्रोहा की खुदाई से जो मुद्राएं मिली हैं उन पर 'अगोदके अगाच्च जनपदस' शब्द अंकित मिले हैं। इन तीनों शब्दों में ही अग्रवाल जाति और उनके नामकरण का रहस्य छिपा हुआ है। आजकल जिसे हम अग्रोहा कहते हैं, उसका प्राचीन नाम ही अग्रोदक था। जो कालान्तर में अग्रोहा बन गया। यह अग्रोहा एक जनपद की राजधानी था, जिस का नाम अग्र या अग्रयेगण था। इस जनपद के मूल वैश्य निवासी, जब वहां से चारों ओर फैले, तो वे अपना परिचय अग्रोहा वाले, अग्रवा वाले के रूप में देने लगे और उसी से उनका नाम अग्रवाल पड़ गया, जो भाषा शास्त्र के अनुरूप है। आज भी सामान्य बोली में अग्रोहा को अग्रवा के नाम से पुकारा जाता है। अन्य वैश्य जातियों या समुदायों के नामों का विश्लेषण करने पर भी यह व्याख्या या मत अधिक समीचीन प्रतीत होता है। जैसे ओसवाल, खंडेलवाल, पालीवाल आदि। जातिसूचक शब्दों में प्रथम नाम किसी स्थान या जनपद विशेष का है. जिसमें मध्यकालीन 'वाल' प्रत्यय जुड़कर इनका निर्माण हुआ जैसे ओसिया में वाल प्रत्यय जुड़कर ओसवाल, खंडेला में वाल प्रत्यय जुड़कर खण्डेलवाल, ठीक उसी प्रकार अग्र में 'वाल' प्रत्यय जुड़ने से अग्रवाल बन गया है।'

आज भी जिस क्षेत्र विशेष में अग्रवालों का एक बहुत बड़ा भाग केन्द्रित है, वह अग्रोहा से कुछ सौ किलोमीटर की परिधि में ही है। कालान्तर में यही स्थान बोधक नाम जाति बोधक बन गया।

अग्रवाल शब्द की प्राचीनता

अग्रवाल शब्द का प्रचलन कैसे हुआ इस संबंध में डा० परमेश्वरी लाल गुप्त, जैन साहित्य के विद्वान अगर चन्द नाहटा, श्री परमानन्द शास्त्री आदि ने गम्भीर अध्ययन किया है और अब तक प्राप्त प्रमाणों, शिलालेखों, प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख आदि के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि अग्रवाल शब्द का प्रचलन किसी न किसी रूप में ई० सन् 1100 के आसपास हो गया था। प्राकृत भाषा के जो ग्रन्थ मिलते हैं उस से पता चलता है कि इस शब्द का प्रचलन प्रारम्भ में 'अगरवाल' या 'अयरवाल' के रूप में था। सन 1132 में तोमर वंशीय राजा अंगपाल तृतीय के शासन काल में कविवर श्रीधर द्वारा रचित 'पासणाह चरिउ' (पार्श्वनाथ चरित्र) में अयरवाल जाति का उल्लेख है।

सण वासि एयारह सएहि, परिवाडिए वरि सहं परिगएहिं। 

कसणटठभीहिं आगहणमीस, रविवारि समाण्डि सिसिर भासि ।।'

इसी प्रकार (सम्वत् 1393) सन 1336 में रचित दातृ प्रशस्ति में अयरवाल और यश कीर्ति द्वारा रचित हरिवंश पुराण में अयरवाल शब्द का उल्लेख किया गया है -

सिरि अयरवाल वंशहि पराणु, तो संघ हे अच्छतु विनयपाणु (पाण्डव पुराण) 1.

2. तहि अयरवाल वसहि पहाणु, सिरि गडगनो गगेय भाण (हरिवंश पुराण)

अग्ररचन्द नाहटा ने सुधारू जैन कवि का उल्लेख किया है जिसने सन् 1354 में प्रधुम्नचरित की रचना की थी। इस कवि ने अपना परिचय स्पष्ट रूप से अग्रवाल के रूप में दिया है।

मइया मीकड़ कीयहु बखाण, तुम पानुन पासउ निखाण। अगरवाल की मेरी जाति, पुर अगरोए मोहि उत्त्पति।।

इसी प्रकार सन् 1498 में कवि छीहल ने अपना परिचय देते हुए लिखा है कि जातिगवंश सि नाथु सुतनु, अगरवाल कुल प्रगटरवि।

बावनी बसुधा विस्तरी कवि कंकण छीहल कवि बावनी ।।"

डा० परमेश्वरी लाल गुप्त ने पता लगाया है कि फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में सन् 1370 में मुल्ला दाउद ने अपने ग्रंथ में अग्रवाल जाति की चर्चा की थी। सन् 1540 में जयसी कृत 'प‌द्मावत' (सिंहलद्वीप खण्ड बाजार) में भी अग्रवाल जाति का उल्लेख मिलता है।

अग्रवाल चौहान चन्देले, खत्री और पंचवान बघेले।

1519 में माणिक्यचन्द्र ने अपना जीवन परिचय देते हुए लिखा था

अयरवाल सुप्रसिद्ध विभासिउ। सिंघलु गोत्रउं सुवण समासिउ ।।'

प्राचीन ग्रंथों में जहां अगरवाल, अयरवाल जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहां कतिपय ग्रंथों में अग्रोतकानवय शब्द का भी उल्लेख हुआ है। प्रयाग के सुप्रसिद्ध प्राचीन नगर कौशम्बी के निकट पभोसा हाड़ा (प्रभास पर्वत) की धर्मशाला में विक्रमी सम्वत 1881 की एक प्रशस्ति लगी हुई है। उसमें निर्माता का परिचय 'अग्रोतकान्वय गोयल गोत्री कहकर दिया गया है। अग्रोतक अथवा अग्रोदक अग्रोहा का ही प्राचीन नाम है।

इन सब प्रमाणो से स्पष्ट होता है कि अयरवाल अग्रोतकान्वय, अगरवाल जैसे शब्दो का प्रचलन 11वी० शताब्दी में हो गया था।

प्राचीन वैश्य वंश - इतिहास में ऐसे अनेक कुलों का उल्लेख मिलता है, जो वैश्य थे और जिन्होने व्यापार-व्यवसाय के साथ उच्च कोटि की राज्य एवं प्राशासनिक प्रतिभा का परिचय दिया।

महाराजा अग्रसेन और अग्रवाल जाति- 

महाभारत युद्ध से 51 वर्ष पूर्व अग्रोहा में अग्र जनपद की स्थापना हो चुकी थी। महाराजा अग्रसेन वहां के प्रतापी राजा थे। उनके राज्य में एक लाख आबादी थी और उनका राज्य दूर दूर तक फेला था। उन्ही महाराजा अग्रसेन से आगे जाकर अग्रकुल परम्परा चली और अग्रवाल समाज के रूप में एक नये गौरवपूर्ण समाज का आविर्भाव हुआ।'

महाजनपदों का उदय और विकास -

कालान्तर में भारत के राजनीतिक मानचित्र पर सोलह महाजन पदों का उदय और उत्कर्ष हुआ। यह काल बुद्ध काल से भी 150-120 वर्ष पूर्व था। इस काल में अहिच्छत्र (पांचाल), अयोध्या (कौशल), कौशाम्बी और मथुरा जनपदों में अनेक वैश्य राजाओं के राजवंशों ने शासन किया। इस सम्बन्ध में मूलदेव, वायुदेव, विशाखा देव, घनदेव, बृहस्पति मित्रा, वरूण मित्रा, अश्वकोष, ब्रहममित्र, उत्तम दत्त, रमा दत्त, शिव दत्त, भावदत्त आदि अनेक राजाओं का उल्लेख मिलता है।

अनेक जनपदों में वैश्य राज्य या गणराज्य के प्रधान तो नहीं थे किन्तु राज्य के मंत्रीमण्डल में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। धन और साधन सम्पन्नता के कारण वे राज्य को आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी करने लगे थे।

मोहनजोदड़ो तथा हडप्पा सभ्यता

भारत की प्राचीन सभ्यता के अवशेष मोहन जोदडो तथा हडप्पा सभ्यता में मिले हैं। इस सभ्यता से प्राप्त अवशेषों से उस समय के वैश्य समुदाय (वणिको) की आश्चर्यजनक प्रतिभा का परिचय मिलता है। उस समय वैश्यों ने जिन नगरों का निर्माण कराया वैसे वैज्ञानिक ढंग से बने नगर विश्व में अन्यत्र नहीं मिलते। उनमें जल-निकास, सफाई आदि की व्यवस्था कहीं अधिक स्वच्छ और वैज्ञानिक थी। ललित कला, शिल्प कला और निर्यात व्यापार पराकाष्ठा पर थे तथा मानव निर्मित बन्दरगाहों से पूरे विश्व को सोने-चांदी के गहनों से लेकर पीतल के बर्तनों तक अनेक वस्तुओं का निर्यात किया जाता था उनकी नाप-तोल तथा दशमलव प्रणाली अत्यन्त विकसित थी।'

उल्लेख के अनुसार 2000 ई० पूर्व यहूदी नरेश सुलेमान ने चन्दन तथा हाथी दांत के सामान तथा बहुमूल्य वस्त्रों का भारतीय वणिकों से पर्याप्त मात्रा में आयात किया था। मेसोपटामिया, वेबीलोन तथा सीरिया आदि देशों में भारतीय व्यापारियों के कार्यालय खुले हुए थे, जहां भारी मात्रा में उद्योग-व्यवसाय का संचालन होता था।

जैन तथा बौद्ध धर्म काल 700 ई० पूर्व तक भारत के वणिक वैदिक धर्म का ही पालन करते आए थे, किन्तु 600 ई० पूर्व भारत में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म का उदय हुआ। इन धर्मों के काल में भी वैश्य समाज की परम्पराएं अक्षुक्ष्ण्य बनी रहीं।

उस समय के साहित्य से पता चलाता है कि तत्कालीन युग में अनेक वैभवशाली वैश्य विद्यमान थे। उनके पास अपार सम्पति तथा वैभव था। उपासुक दशासूत्र नामक एक जैन ग्रंथ में आनन्द नामक एक वैश्य का उल्लेख मिलता है, जिसमें उस समय के वैश्यों की प्रतिष्ठा का अनुमान लगता है। इस आनन्द नामक वैश्य का 4 करोड़ रूपये का सोना ऋण रूप में बंटा हुआ था और 4 करोड़ का सोना भूमि आदि में लगा हुआ था। उसके पास 40 हजार गाएं और भैंसे थी। 500 गाड़ियां विदेश में तथा उतनी ही स्वदेश में व्यापार के लिए चलती थी। उसके चार जलयान विदेशों में तथा 4 ही जलयान स्वदेशी व्यापार में लगे थे।

जातककथा की निदान कथा में हम देखते हैं कि श्रावास्ती का प्रसिद्ध व्यापारी अनाथपिण्डिक राजगृह अपने किसी व्यापारिक कार्य से 500 गाड़ियों को साथ लेकर गया था और इसी समय प्रथम बार उसने भगवान बुद्ध के दर्शन किए थे।*

जातक में अनेक ऐसे श्रेष्ठियों (अनाथपिणिडक) (सेरिवा) का उल्लेख मिलता है जिन्होने भिक्षु संघ, राज्य तथा समाज को करोड़ों रूपयों का दान दिया था। मगध निवासी एक वैश्य द्वारा भिक्षु-संघ को अस्सी करोड़ कार्यापण दान का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार भृंगार श्रेष्ठि की कथा तथा विशाखा द्वारा श्रावस्ती में 9 करोड़ की लागत से बुद्ध के लिए चैत्यालय स्थापित करने का विवरण मिलता है।'

बौद्धकाल में वैश्यों का आर्थिक जीवन समृद्ध था। बौद्धकालीन अनेक सौदागरों की अपार सम्पत्ति का वर्णन पाली स्त्रोतों में मिलता है। चाम्पा निवासी श्रेष्ठी पुत्र सोण कोटिविशं बीस करोड़ का धनी था। उसके पास अस्सी गाड़ी स्वर्णमुदाएँ थीं। साकेत के सेठ धनंजय ने, अंगुत्तरनिकाय की अट्टकथा के अनुसार अपनी पुत्री विशाखा के लिए 9 करोड़ मूल्य से महालता नामक आभूषण को बनवाया था। श्रावास्ती के प्रसिद्ध व्यापारी अनाथपिण्डिक ने जेतवन की सारी भूमि को सोने की मोहरों से किनारे से किनारा मिलाकर रोक कर जेत कुमार से उसे खरीदा था और इसमें उसकी 18 करोड़ मोहर लगी थी।

बौद्ध तथा जैन काल में इन्ही 'वणिको' ने विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार प्रसार में बहुमूल्य योगदान दिया था। उन्होने भारतीय धर्म, दर्शन और विज्ञान से सम्बन्धित हजारों ग्रन्थों का अनुवाद कराया, जो आज भी वहां उपलब्ध है। इस काल में वैश्यों का प्रभाव इतना अधिक बढ़ा हुआ था कि राजाओं का चुनाव भी वैश्यों द्वारा किया जाता था।

सम्पन्न वैश्यों का सत्कार राजाओं के द्वारा किया जाता था तथा वे उनकी कृपा और विश्वासपात्र होने का आनन्दोपभोग करते थे।'

इस काल में जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के उत्थान में वैश्यों का महान योगदान रहा। वैश्यों और शिल्पियों के विशाल संघ बने और वैश्यों ने भिक्षु बनकर देश विदेश में धर्म का प्रचार किया। बुद्ध के प्रथम 500 अनुयायियों में से 400 से अधिक वैश्य थे और वैश्यों ने भारी संख्या में तीर्थों, स्पूतों तथा मंदिरों का निर्माण कराकर अपनी दानवीरता तथा उदारता का परिचय दिया था।'

Tuesday, April 28, 2026

SWAMI RAMCHARAN DAS JI MAHARAJ - स्वामीजी श्री रामचरणजी महाराज

SWAMI RAMCHARAN DAS JI MAHARAJ - स्वामीजी श्री रामचरणजी महाराज  

भगवान कृश्ण ने गीता में कहा है - ‘‘यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः, अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यंऽहम’’ अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब मैं जन्म लेता हूं। राश्ट्र में बढ़ते मुस्लिम प्रभाव, धर्म में रूढि़वादिता एवं आड़म्बर, धर्म-कर्म में आम जनता की रूचि में कमी होना, रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना के प्रमुख कारण रहें। रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना विजयवर्गीय जाति के कापड़ी गौत्र में जन्मे श्री रामचरण जी विजयवर्गीय महाराज ने की। ये निर्गुण भक्ति के उपासक एवं गुरू परम्परा के पोशक रहे। ज्ञान, वैराग्य उनके साधन थें तथा सत्य, अहिंसा के भक्ति (प्रेमाभक्ति) टेक (एकेसुरवाद) उनके सिद्धान्त थे।


अवतरण

अन्तर्राश्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय षाहपुरा (भीलवाड़ा) पीठ के प्रवर् स्वामी श्री रामचरणजी महाराज का जन्म षनिवार, 24.फरवरी, सन् 172र्0 ईं (विक्रम संवत् 1776, माघ मास, चैदस-षुक्ल पक्ष) के दिन अपने ननिहाल-सोड़ा (षूरसेन) ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बख्तराम (भगतराम) एवं माता का नाम श्रीमती देऊजी (देवहूति) था। इनका मूल ग्राम बनवाड़ा, जाति विजयवर्गीय एवं गोत्र कापड़ी था। पुत्र जन्म की प्रसन्नता में बनवाड़ा में सूचना मिलते ही गाजे-बाजे बजे एवं समस्त ग्राम में नारियल बंटवाए गये। दूसरे दिन परिवार वालों को भोजन कराया गया। ज्योतिशी से जन्म पत्रिका बनवाई गई। तब उसने बताया कि इस बालक की जन्म कुण्डली में भारी ग्रह पड़े हुए है, ऐसा पुत्र तो न छत्रपति के घर हुआ है और न होगा। नामकरण संस्कार के दिन आपका नाम रामकिषन घोशित हुआ।

षैषव

श्री रामकिषन का रूप सूर्य की आभा के समान दैदीप्यमान था। वे गौर वर्ण के थे तथा उनके नयन कमल के सदृष थे। लम्बे हाथ का व्यक्तित्व अत्यन्त मोहक था। छोटी अवस्था में ही बड़ों के समान सद्विवेक प्राप्त था। बाल्यकाल में ही कुषाग्र बुद्धि एवं सर्वगुणसम्पन्नता ने इन्हें सबका प्रिय बना दिया।

गृहस्थ जीवन

श्री रामकिषनजी का विवाह चांदसेन ग्राम निवासी श्री गिरधारी लाल विजयवर्गीय (खूटेंटा) की सुपुत्री गुलाब कॅुवर बाई के साथ हुआ। जनश्रुति के अनुसार इनके एक पुत्र और एक कन्या हुई। कुछ लोग कहते हैं कि एक पुत्री ही हुई।

जीविकोपार्जन

षिक्षा के बाद इन्होनें जयपुर राज्य में सेवा की। अपनी कर्तव्यनिश्ठा, कार्य कुषलता, न्याय परायणता एवं ईमानदारी के कारण ये निरन्तर पदोन्नत होते गए और दीवान पद तक पहुंच गए।

जीवन परिवर्तन की दो घटनाएं

(1) एक बार श्री रामकिषनजी अपने ससुराल चांदसेन गए। भोजन करने के बाद वे दुकान में लेटे हुए थे तभी एक यति उस मार्ग से निकला, उसकी दृश्टि इनके पदतल की रेखा पर पड़ गई। देखकर वह यति वहां उपस्थित व्यक्तियों से बोला - ष्इनके चरण में उध्र्व रेखा है, मुझे आष्चर्य हो रहा है कि ये यहां कैसे लेटे हुए हैं! ज्योतिश के अनुसार तो इन्हे राजा होना चाहिए या दृढ़ वैराग्यवान योगीष्।

(2) यति तो अपनी बात कहकर चला गया। नींद खुली तब वहां उपस्थित लोगों ने श्री रामकिषन जी को यति के कथन से परिचित करा दिया। उसी रात को श्री रामकिषनजी को एक स्वप्न आया। स्वप्न में वे सरिता में स्नान करते समय तेज धार की चपेट में आ गए और बहने लगे। बचकर निकलने के उनके सारे प्रयास विफल हो गए। मृत्यु का भय सताने लगा। कुछ ही समय पष्चात् एक षुभ्र वेषधारी साधु दौड़ता हुआ आया और उसने इन्हें बांह पकड़कर बाहर निकाला। उसी समय निद्रा टूटी और स्वप्न भंग हो गया। नींद भंग होने के साथ ही श्री रामकिषनजी की मोह निद्रा भी हटने लगी। आत्म चिन्तन प्रारम्भ हुआ। स्वप्न के संबंध में विचार करने लगे। यह नदी क्या है ? डूबने वाला कौन है? बचाने वाला कौन है ? आत्म बोध हुआ ‘‘मैं (जीव) मोह रूपी नदी में डूब रहा हूॅ तब सद्गुरू ने आकर बचाया। इसी चिन्तन में वैराग्य जगा तथा सांसारिक मोह बंधन को तोड़कर स्वयं मुक्ति हेतु घर-बार छोड़कर सद्गुरू की खोज में निकल पड़े। षाहपुरा पहुंचने पर स्वप्न की छवि वाले सन्त के बारे में संकेत मिला की ऐसे सन्त दांतड़ा ग्राम में विराजते हैं। यह सुनकर वे अत्यन्त हर्शित हुए और प्रभात होते ही दांतड़ा ग्राम के लिए चल पड़े। उस समय उनकी आयु 31 वर्श व 7 मास की थी।

स्वामी श्री कृपाराम जी से भेंट

दांतड़ा पहुंच कर सन्त दासोत सम्प्रदाय के महन्त श्री कृपारामजी के दर्षन कर अत्यन्त उल्लसित हुए। स्वप्न में जिस सन्त ने उन्हें बचाया था वहीं साक्षात् मूर्ति उनके सामने थी। भाव विभोर होकर षीष नवाया, प्रणाम किया, प्रसाद चढ़ाया और प्रदक्षिणा की।

दीक्षा

एक पक्ष (पखवाड़े) तक विभिन्न प्रकार के प्रष्नोत्तर से परीक्षा लेकर स्वामी श्री कृपारामजी ने श्री रामचरण जी महाराज को सुपात्र समझ कर विक्रम संवत् 1808 की भाद्रपद षुक्ला सप्तमी, गुरूवार के दिन श्री रामकिषनजी को दीक्षा दी। ष्रामष् मंत्र एवं ष्रामचरणष् नाम प्रदान कर इन्हें अपना षिश्यत्व प्रदान किया।

गूदड़ वेष धारण

अपने गुरू श्री कृपारामजी से दीक्षा प्राप्त कर स्वामी श्री रामचरण जी ने गुरू के सम्प्रदाय का गूदड़ वेष धारण कर लिया। भजन एवं स्मरण साधना में उनका समय व्यतीत होने लगा। कुछ समय बाद आप अपने गुरू के निर्देष पर अपने गुरू भाई की सेवा में बहादुरगढ़ गये।

वहां एक दिन आप भोजन बना रहे थे, सावधानी रखते हुए भी एक पीपल के वृक्ष की सूखी लकड़ी आपके द्वारा चूल्हे में लगा दी गई जिसमें चीटियां थी। अग्नि के ताप से परेषान होकर चींटियां उस लकड़ी के छेद में से बाहर निकलने लगी। यह देखकर इनका मन उद्विग्र हो उठा। वे आत्मग्लानि अनुभव करने लगे। तत्काल रसोई बनाने का कार्य छोड़कर बाहर निकल गए। गुरू भाई ने इन्हें गुरूजी के पास लौटने के लिए निर्देषित किया। लौटते समय राह में एक वृद्ध रसायनी ने इन्हें तांबे से सोना बनाने कीे विधि सिखाने का प्रस्ताव रखा जिससे पुण्य कमा सके किन्तु इन्होनें तो स्पश्ट जवाब दे दिया हमने तो राम रसायन प्राप्त कर ली है अतः आप की यह विद्या मुझे नहीं चाहिए।

दांतड़ा पहुंचकर आपने गुरू महाराज को बहादुरपुर की सारी घटना सुना दी। श्री कृपारामजी ने तब से इन्हें भोजन बनाने की सेवा से मुक्त कर दिया। अब तक स्वामी श्री रामचरण जी को गूदड़ वेष में साधना करते हुए लगभग सात वर्श की अवधि व्यतीत हो चुकी थी। किन्तु गुरू के आदेष से उनके साथ गलता मेले में चलने के सुझाव को स्वीकार कर लिया। इस यात्रा में चूरे ग्राम पहुंचने पर भोजन की व्यवस्था के सम्बन्ध में साधु मण्डली में परस्पर मतभेद और त.ूतू मैं.मैं होते हुए इन्होनें देखा तो बड़े दुःखी हुए एवं गुरूजी से निवेदन किया कि क्या यहीं मुक्ति का मार्ग हैं ? स्वामी श्री कृपाराम जी ने अपने षिश्य के उद्वेलित चिŸा के वेग को समझ कर इन्हें प्रवृŸिा मार्ग को छोड़कर निवृŸिा मार्ग अपनाने का सुझाव बताया।

गलता मेले के बाद श्री राम चरण जी वृन्दावन की ओर जाने लगे, राह में उन्हें एक साधु ने पूछा-रामस्नेही तुम कहा चलिया ? इन्होनें उत्तर दिया - वृन्दावन। तब उसने सुझाव दिया, तुम निवृŸिा मार्ग के अनुयायी हो वहां तो प्रवृŸिा ढ़ाठ है तुम्हारा मन नहीं लगेगा। वहां से लौटकर गुरू से आज्ञा प्राप्त कर चाकसू ग्राम चले गये। वहां वर्शा में भीगने से तालाब के किनारे भजन करते हुए कांपने की अवस्था में देखकर श्री उपमीचंद जी ने इन्हें हिरमची रंग की चादर भेंट में दी। तब से रामस्नेही सम्प्रदाय में हिरमची व गुलाबी रंग प्रचलन में हो गया।

भीलवाड़ा की ओर

विक्रम संवत् 1817 में भीलवाड़ा पहुंचकर नगर के पष्चिम की ओर स्थित मयाचन्द जी की बावड़ी में आसन जमाया। यहां तक आप अकेले विराजते थे, तब तक कोई भी जिज्ञासु या षिश्य आपके साथ नहीं था। स्वामी श्री रामचरणजी भीलवाड़ा में निर्गुण भक्ति के प्रचार के लिए आए थे। प्रारम्भ में साधनारत स्वामीजी ने मौनव्रत धारण किया था। उनसे सर्वप्रथम भेंट करने वाले श्री देवकरणजी थे। परस्पर प्रष्नोŸार हुआ। उनकी जिज्ञासा षान्त हुई। श्री देवकरणजी ने श्री नवलरामजी से, फिर श्री नवलरामजी ने श्री कुषलरामजी से स्वामीजी के साधुता की एवं सिद्धान्तों की प्रषंसा की । दूसरे दिन तीनों एक साथ स्वामीजी के दर्षनार्थ आए। षनैः षनःै सम्पूर्ण भीलवाड़ा में इनकी ख्याति फैल गई। नगर सेठ भी इनके दर्षनार्थ आया एवं इन्हें देखकर प्रफुल्लित हुआ। उŸाम ज्ञान चर्चा होने लगी। जिज्ञासुओं की संख्या बढ़ी । यहीं पर इन्होंने विक्रम संवत 1817 में रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की। रामस्नेही का अर्थ है राम से स्नेह करने वाले - राम से प्रेम करने वाले।

श्री देवकरण, श्री कुषलराम एवं श्री नवलराम तीनों अपनी धुन के पक्के थे। ये स्वामीजी के यषस्वी षिश्य हुए । उस समय श्री कुषलरामजी की उम्र मात्र तीस वर्श, श्री देवकरणजी की पच्चीस वर्श एवं श्री नवलरामजी की इक्कीस वर्श थी। श्री कुषलरामजी के एक पुत्र एवं एक पुत्री, श्री देवकरणजी के एक पुत्र तथा श्री नवलरामजी की पत्नी गर्भवती थी। फिर भी इन तीनों ने एक साथ षीलव्रत धारण कर गुरू उपदेष की दृढ़निश्ठा का परिचय दिया।

वाणी रचना

गुरू से प्राप्त ‘राम’ मंत्र की साधना करके स्वामी श्री रामचरणजी ने राम स्मरण का अभ्यास बढ़ाया। कंठ, हृदय, नाभि कमल से षब्द को शट्चक्रों का भेदन करते हुए गगन मण्डल, सहस्त्रार तक पहुंचाने की योग साधना (सुरति षब्द योग मिलाने) में सफल हुए। बारह वर्श तक निरन्तर साधनारत होकर मदोन्मत की भांति उपदेष देने लगे। स्वः अनुभूति का खजाना अनुभव वाणी (अणभै वाणी) के षब्दों के रूप में खुलने लगा। कहते है जैसे नदीं में लहरें उठती है, वैसे ही महाराज भजन वेग से षब्द फरमाने लगे। विक्रम संवत् 1820 से 1827 के बीच में सम्पूर्ण अनुभव वाणी का अंगबद्ध रूप में हस्तलिखित संपादन सम्पन्न हुआ। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित की तथा सत्य, अहिंसा, भक्ति, टेक के सिद्धान्तों का समन्वित रूप प्रकट किया। इसी अवधि में बारह बीघा भूमि में रामद्वारे की स्थापना भीलवाड़ा में हुई एवं फूलडोल उत्सव प्रारम्भ हुआ।

वाणी रचना

विरोध की अनुगूॅंज . व्यसन विकारों, समाजिक रूढि़यों एवं धार्मिक अंधविष्वासों एवं पाखंडो के विरूद्ध स्वामीजी ने उपदेष दिए तथा भक्ति का प्रचार किया। जिनके स्वार्थों पर चोट पहुंची ऐसे द्विज परिवारों ने उदयपुर जाकर महाराणा को स्वामी श्री रामचरणजी के विरूद्ध षिकायत कर दी। बिना विचारे राजा ने एक कर्मचारी के द्वारा यह आदेष भिजवा दिया - ‘आपका प्रचार बन्द करो या बाहर चले जाओ’।

कुहाड़ा प्रस्थान

महाराणा के दूत का संदेष पाते ही स्वामीजी भीलवाड़ा नगर को छोड़कर कुहाड़ा ग्राम में चले आए। कुहाड़ा भीलवाड़ा नगर से चार कि.मी. दूर था। वहां कोठारी नदी के तट पर वट वृक्ष के नीचे आपने आसन जमाया। यहां साधना निर्विघ्न चलने लगी।

कुहाड़ा प्रस्थान

महाराणा के दूत का संदेष पाते ही स्वामीजी भीलवाड़ा नगर को छोड़कर कुहाड़ा ग्राम में चले आए। कुहाड़ा भीलवाड़ा नगर से चार कि.मी. दूर था। वहां कोठारी नदी के तट पर वट वृक्ष के नीचे आपने आसन जमाया। यहां साधना निर्विघ्न चलने लगी।

फूलडोल

भीलवाड़ा के समान षाहपुरा में भी फूलडोल उत्सव प्रारम्भ हुआ। स्वामी रामचरण जी की छतरी मे ही इसका आयोजन होने लगा। चारों ओर देष-देषान्तर से रामस्नेही साधु, भक्तजन एवं जिज्ञासु जन फूलडोल के अवसर पर षाहपुरा आने लगे। प्रारम्भ में यह फूलडोल मात्र मात्र एक दिन का था। स्वामीजी के निर्वाण के बाद यह चालीस दिन का हो गया। वर्तमान में यह पच्चीस दिन का एवं प्रमुख रूप से चैत्र षुक्ल एकम् से पॅचमी तक का हो गया है। उसमंें भी पॅचमी का दिन नवदीक्षितों की षोभायात्रा, आर्चाय श्री के चातुर्मास के निर्णय, सन्तों के प्रवचन एवं जिनकी मनौतियाॅं पूर्ण हुई है उनके द्वारा मिश्री-पताषे का प्रसाद वितरण होते देखकर अपार भीड़ आनन्द एवं उल्लास का अनुभव करती है। होली एवं पंचमी के दिन नगर में स्थित राममेड़ी पर जागरण होने लगा।

अनुभव वाणी

स्वामी श्री रामचरणजी ने विक्रम संवत् 1820-27 में भीलवाड़ा एवॅ षाहपुरा में अनुभव वाणी का उच्चारण किया था, उनको बत्तीस अक्षरों के ष्लोकों में गणना करें तो 36,397 ष्लोक बैठते हैं । इस वाणी के प्रारम्भ के आठ हजार ष्लोकों का संग्रह, संपादन एवं लेखन माहेष्वरी वंषोद्भव स्वामीजी के परम षिश्य भीलवाड़ा निवासी षीलव्रती श्री नवलरामजी ने किया । षेश अठ्ठाईस हजार तीन सौ दस ष्लोक संख्या परिमाण का लेखन, संकलन, संपादन स्वामी जी के षिश्य श्री रामजनजी महाराज ने लिपिबद्ध कर अंगबध्द किया। वर्तमान में अनुभव वाणी ग्रन्थ सन् 1925 ईं (विक्रम संवत् 1981) में 1000 पृश्ठों की छपी हुई मिलती थी, उसका नवीन संस्करण का प्रकाषन सन् 2005 ईं में हुआ।

निर्वाण में भी अद्भुत संयोग

स्वामी श्री रामचरण जी महाराज के निर्वाण (गुरूवार.5 अप्रेल, सन् 1798 ईं) में भी गुरू षिश्य परम्परा में भी एक चमत्कारपूर्ण दृश्टान्त प्रस्तुत हुआ है। षिश्य अपने गुरू से तिथी एवं वार में भी आगे रहे है

अठ्ठारह सौ शट् वर्श मास फागुण बदी साते।

सन्त पधारी धाम सनीसर वार विख्याते ।।

बŸाीसे कृपाल छट्ट भाद्रप सुदि सुक्कर।

छोड़े आप षरीर परम पद पहुंचे मुक्कर।।

पचपन के बैसाख बदी पांचे गुरूवार।

रामचरण तन त्याग भये निज निराकारं।। 1069 ।।

1. स्वामी सन्तदास जी . विक्रम संवत 1806 फाल्गुन बदी सप्तमी, षनिवार।

2. स्वामी कृपाराम जी . विक्रम संवत 1832, भाद्रपद सुदी शश्ठी, षुक्रवार।

3. स्वामी रामचरण जी . विक्रम संवत 1855, बैसाख बदी पंचमी, गुरूवार।

दार्षनिक विचार

स्वामी श्री रामचरण जी महाराज ब्रह्मवादी थे और अद्वैत ब्रह्म में पूर्ण आस्था रखते थे। इनके मतानुसार ब्रह्म एक है - राम, रहीम, अल्लाह, निरंजन आदि उसी के नाम है। न कोई रूप है, न कोई आकार। वह सर्व व्यापक है, अन्तर्यामी है। वह निर्गुण और सगुण से परे हैं, ज्योतिस्वरूप है और उसी से संसार की सृश्टि हुई है। सूर्य, चंद्र आदि में उसका प्रकाष है। संसार के सभी सजीव एवं निर्जीव पदार्थ उनसे व्याप्त है। उसी ब्रह्म को नाम से पुकारा है। यह राम दषरथ पुत्र न होकर निर्गुर्ण, निराधार, निरजंन, निर्लेप, अगम, अगोचर है। स्वामी जी ने आत्मकल्याण का मार्ग आत्म दर्षन तथा सद्धर्म पालन बताया । जनसाधारण को मध्यम मार्ग विषिश्टाद्वैत का अनुसरण करवाया।

सन्त परम्परा

उस समय आपके 225 षिश्य थे। उनमें से प्रथम उŸाराधिकारी श्री रामजन जी महाराज हुए। तद्तन्तर श्री दूल्हेराम जी, श्री चŸारदास जी, श्री नारायणदास जी, श्री हरिदास जी, श्री हिम्मतराम जी, श्री दिलषुद्धराम जी, श्री धर्मदास जी, श्री दयाराम जी, श्री जगरामदास जी, श्री निर्भयराम जी, श्री दर्षनराम जी महाराज, श्री रामकिषोर जी महाराज गादीदर हुए। वर्तमान में इस पीठ पर पूज्य श्री रामदयाल जी महाराज विराजमान है।

सम्प्रदाय की परम्पराऐं

रात्री भोजन निशेध, सात्विक एवं षाकाहारी, पानी छान कर पीना, चतुमार्स में एक ही स्थान पर निवास, गुरू भक्ति, ष्रामष् नाम का उच्चारण, निर्गुण ब्रह्मरूप, नषीले पदार्थों का उपयोग निशेध, गले मंे कंठी, ललाट पर गंगामाटी का तिलक, संतो के लिए गेरूआ रंग के वस्त्र धारण करना।

कोई सवै आकार कूं, कोई निराकार का भाव। रामचरण वंें संत जन मधिका करै उपाव।।

हद बेहद को पूछबो, रामचरण करि दूर। मधिका मारग सोधिकै, भंजन करो भरपूर।।

रामचरण संतातणा, रामनाम पंथ एक। अबै भर्म की मूलि सै, मत का बन्ध अनेक।।

पंथी चाले राम पंथ, मत सू बंधै नांहि। प्रवृŸिा पसारा छाडिकै, मिलै संत पदमांहि।।

समर्थ एको राम है, जाचक सबही देव। रामचरण समर्थ भजो, तजि जाचक की सेव।।

समर्थ की समर्थ सरण, निबल होय बलवंत। रामचरण बल नाम कै, लंक गयो हुनमंत।।

तुमतो रामदयाल हो, मैं अनाथ निरधार। रामचरण कह रामजी, बेग लगावोपार।।

रामचरण कह राम जी, मेरा गुन्हा बिसार । पिता परिहरै पूतकूं तो जीवे कूणं आधार।।

फूलडोल महोत्सव

बसन्त ऋतु के फाल्गुन मास में फूलडोल के अवसर पर स्वामी जी के षिश्य श्री कुषलराम जी, श्री नवलराम जी एवॅ भीलवाड़ा की जनता से प्रार्थना पर श्री महाराज रामद्वारे से षहर में पधारे तथा समस्त जनता को दर्षन देकर कृतार्थ किया। कहा जाता है कि इस अवसर पर देवताओं ने फूल बरसाए इसलिए इसे फूलडोल नाम दिया गया। इस घटना की पुनित स्मृति में प्रतिवर्श फूलडोल महोत्सव मनाया जाता है। पीठासीन स्वामी इस अवसर पर रामद्वारे से षहर में पधारते हैं और रात्री जागरण एवं भजन कीर्तन एवं ष्रामष् स्मरण का आयोजन होता है।

इस अवसर पर स्वामी जी की ष्अनुभव वाणीष् का पदार्पण होता है। यह वाणी एक श्रावक के सिर पर पधराई जाती है। यह परम्परा षुरू से चली आ रही है। फूलडोल के अवसर पर भारी मेला लगता है और धर्मनिश्ठ लोग वहां महाराज श्री के अवषेश - गुदडी एवम् कम्बल के दर्षन करते हैं।

इस प्रकार रामचरण जी की पुण्यतिथि बैसाख बुदी पंचमी, उनके श्राद्ध पर्यन्त फूलडोल मेला भरता था। किन्तु होली से प्रारम्भ होकर इस लोकोत्सव में भी सभी भावधारियों के ठहराव को असुविधाजनक समझकर चैत्र बुदी पंचमी को ही फूलडोल की महत्वपूर्ण तिथी के रूप में निर्वाण तिथि का प्रतीक मानकर सर्वाधिक महत्व प्रदान किया जाता है। इस दिन चातुर्मास का निर्णय होता है तथा श्रद्धालुओं के भावों को सुढृढ़ता प्रदान करने के लिए रात्रि जागरण भी किया जाता है।

सत्गुरू सन्त कृपाल जी रामचरण षिख तास के।

कारज करि कारण मिले तुम गुरू राम जन दास के।।

श्री रामचरण जी महाराज के परमधाम के बाद जिस स्थान पर आपकी देह का अग्नि संस्कार हुआ उसे ‘‘रामनिवास धाम’’ कहा जाता है। अन्य स्थान ‘‘रामद्वारे’’ कहलाते है। सबसे अधिक रामद्वारे मेवाड़ में हैं। मुख्य रामद्वारा भीलवाड़ा षहर का है। इसके अतिरिक्त कोटा, मुम्बई, अहमदाबाद, पुश्कर, हरिद्वार आदि में है। रामद्वारे में कोई मूर्ति नही होती।