Wednesday, July 17, 2019

SANDEEP GOYAL DG TIHAD - सदीप गोयल तिहाड़ जेल के DG बने


साभार: नवभारत टाइम्स 

Tuesday, July 16, 2019

वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा


◆ वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा

★ महाराज अग्रसेन ने अपने नगर अग्रोहा में बसने वाले नए शख्श के लिए एक निष्क और एक ईंट हर परिवार से देने का नियम बनाया था। ताकि अग्रोहा में आने वाले हर शख्श के पास व्यापार के लिए पर्याप्त पूंजी हो और वो अपना घर बना सके।

★ जगतसेठ भामाशाह कांवड़िया महाराणा प्रताप के सलाहकार, मित्र व प्रधानमंत्री थे। इन्होंने हिन्दवी स्वराज के महाराणा प्रताप के सपने के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था । जिसके बाद महाराणा ने एक के बाद एक किले फतेह किये ।

★ एक घटना है जब गुरुगोविंद सिंहः के बच्चो की मुसलमानो ने निर्मम हत्या कर दी, मुसलमान यह दवाब डाल चुके थे, के उनका दाह संस्कार भी नही होने देंगे !! सभी सिख सरदार भी बस दूर खड़े तमाशा देख रहे थे !!

तब एक हिन्दू बनिया टोडरमल जी आगे आये, उन्होंने जमीन पर सोने के सिक्के बिछाकर मुसलमानो से जमीन खरीदी , जिन पर गुरु गोविंद सिंह के बच्चो का दाह संस्कार हो सके !!

आज उनकी कीमत लगभग 150 से 180 करोड़ रुपये तक बेठती है !!

★ बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के निर्माण के समय महामना मदन मोहन मालवीय सेठ दामोदर दास राठी (माहेश्वरी) जी से मिले थे। उस समय सेठ जी ने BHU के निर्माण के लिए महामना को 11000 कलदार चांदी के सिक्कों की थैली भेंट की जिसकी कीमत आज 1 हज़ार करोड़ रुपये बैठती है।

★ आजादी के दीवानों में अग्रवाल समाज के सेठ जमनालाल बजाज का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए 

यह रहते महात्मागांधी के साथ थे, लेकिन मदद गरमदल वालो की करते थे ! जिससे हथियार आदि खरीदने में कोई परेशानी नही हो !!

इनसे किसी ने एक बार पूछा था, की आप इतना दान कैसे कर पाते है ?

तो सेठजी का जवाब था ---मैं अपना धन अपने बच्चो को देकर जाऊं, इससे अच्छा है इसे में समाज और राष्ट्र के लिए खर्च कर देवऋण चुकाऊं ।

★ रामदास जी गुड़वाला अग्रवाल समाज के गौरव हैं । जगतसेठ रामदास जी गुरवाला एक बड़े बैंकर थे जिन्होंने 1857 की गदर में सम्राट बहादुर शाह जफर (जिनके नेतृत्व में 1857 का आंदोलन लड़ा गया था ) को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। वे चाहते थे देश आजाद हो ।

सम्राट दीवाली समारोह पे उनके निवास पे जाते थे और सेठ उन्हें 2 लाख अशरफी भेंट करते थे ।

उनका प्रभाव देखते हुए अंग्रेजों ने उनसे मदद मांगी लेकिन उन्होंने मना कर दिया था ।

बाद में अंग्रेजों ने उन्हें धोके से शिकारी कुत्तों के सामने फिकवा दिया और उसी घायल अवस्था मे चांदनी चौक के चौराहे पे फांसी पे चढ़ा दिया था ।

लेख साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल सभा 













सेठ रामदास जी गुड़वाला-1857 के महान क्रांतिकारी व दानवीर


सेठ रामदास जी गुड़वाला दिल्ली के अरबपति सेठ और बैंकर थे और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर के गहरे दोस्त थे। इनका जन्म #अग्रवाल परिवार में हुआ था। इनके परिवार ने दिल्ली क्लॉथ मिल्स की स्थापना की थी। उस समय मुग़ल दरबार की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। अधिकांश मुग़ल सरदार बादशाह को नीचा दिखाने वाले थे । अनेक मुस्लिम सरदार गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिले हुए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के कुचक्रों से बादशाह बेहद परेशान थे। एक दिन वे अपनी खास बैठक में बड़े बेचैन हो उदास होकर घूम रहे थे। उसी समय सेठ रामदास गुड़वाला जी वहाँ पहुंच गए और हर प्रकार से अपने मित्र बादशाह को सांत्वना दी। उन्होंने बादशाह को कायरता छोड़कर सन्नद्ध हो क्रांति के लिए तैयार किया, परंतु बादशाह ने खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए असमर्थता प्रकट की। सेठ जी ने तुरंत 3 करोड़ रुपये बादशाह को देने का प्रस्ताव रखा। इस धन से क्रांतिकारी सेना तैयार की।

सेठ जी जिन्होंने अभी तक साहूकारी और व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया। उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी दंग हो गए लेकिन दुःख है की बादशाह के अधिकांश दरबारी दगाबाज निकले जो अंग्रेजों को सारा भेद बता देते थे। फिर भी वे निराश नहीं हुए। सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया और अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया। उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की इस संकट काल में सम्राट की मदद कर देश को स्वतंत्र करवाएं।

सेठ रामदास गुड़वाला जी ने अंग्रेजों की सेना में भारतीय सिपाहियों को आजादी का संदेश भेजा और क्रांतिकारियों ने निश्चित समय पर उनकी सहायता का वचन भी दिया। यह भी कहा जाता है की क्रांतिकारियों द्वारा मेरठ व दिल्ली में क्रांति का झंडा खड़ा करने में गुड़वाला का प्रमुख हाथ था।

गुड़वाला की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत चिंतित हुए। सर जॉन लॉरेन्स आदि सेनापतियों ने गुड़वाला को अपनी तरफ मिलने का बहुत प्रयास किया लेकिन वो अग्रेंजो से बात करने को भी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज़ अधिकारियों ने मीटिंग बुलाई और सभी ने एक स्वर में कहा की गुड़वाला की इस तरह की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से हमारे भारत पर शासन करने का स्वप्न चूर ही जाएगा । अतः इसे पकड़ कर इसकी जीवनलीला समाप्त करना बहुत जरूरी है ।

सेठ रामदास जी गुड़वाला को धोके से पकड़ा गया और जिस तरह मारा गया वो क्रूरता की मिसाल है। पहले उनपर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी घायल अवस्था में चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।

इस तरह अरबपति सेठ रामदास गुड़वाला जी ने देश की आजादी के लिए अपनी अकूत संपत्ति और अपना जीवन मातृभूमि के लिए हंसते हंसते न्योछावर कर दिया । सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है - "सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे। अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उसकी साहूकारी का डंका बजता था।"

परंतु भारतीय इतिहास में उनका जो स्थान है वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है। वह मंगल पांडेय से भी पहले देश की आजादी के लिए शहीद हुए थे इस तरह उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखने योग्य है। दिल्ली की विधानसभा के गलियारे में उनके बलिदान के बारे में चित्र लगा है।

साभार- पं गोविंद लाल पुरोहित जी की पुस्तक 'स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास'

Bhartendu Hariachandra ~ Father of Mordern Hindi Literature .



भारतेन्द्र हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं।भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। जिस समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अविर्भाव हुआ, देश ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ी चरमोत्कर्ष पर थी। शासन तंत्र से सम्बन्धित सम्पूर्ण कार्य अंग्रेज़ी में ही होता था। अंग्रेज़ी हुकूमत में पद लोलुपता की भावना प्रबल थी। भारतीय लोगों में विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण था। ब्रिटिश आधिपत्य में लोग अंग्रेज़ी पढ़ना और समझना गौरव की बात समझते थे। हिन्दी के प्रति लोगों में आकर्षण कम था, क्योंकि अंग्रेज़ी की नीति से हमारे साहित्य पर बुरा असर पड़ रहा था। हम ग़ुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर किये गये थे। हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था। ऐसे वातावरण में जब बाबू हरिश्चन्द्र अवतारित हुए तो उन्होंने सर्वप्रथम समाज और देश की दशा पर विचार किया और फिर अपनी लेखनी के माध्यम से विदेशी हुकूमत का पर्दाफ़ाश किया।

युग प्रवर्तक बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी नगरी के प्रसिद्ध 'सेठ अमीचंद' के वंश में 9 सितम्बर सन् 1850 को हुआ। इनके पिता 'बाबू गोपाल चन्द्र' भी एक कवि थे। इनके घराने में वैभव एवं प्रतिष्ठा थी। जब इनकी अवस्था मात्र 5 वर्ष की थी, इनकी माता चल बसीं और दस वर्ष की आयु में पिता जी भी चल बसे। भारतेन्दु जी विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। इन्होंने अपने परिस्थितियों से गम्भीर प्रेरणा ली। इनके मित्र मण्डली में बड़े-बड़े लेखक, कवि एवं विचारक थे, जिनकी बातों से ये प्रभावित थे। इनके पास विपुल धनराशि थी, जिसे इन्होंने साहित्यकारों की सहायता हेतु मुक्त हस्त से दान किया।

बाबू हरिश्चन्द्र बाल्यकाल से ही परम उदार थे। यही कारण था कि इनकी उदारता लोगों को आकर्षित करती थी। इन्होंने विशाल वैभव एवं धनराशि को विविध संस्थाओं को दिया है। इनकी विद्वता से प्रभावित होकर ही विद्वतजनों ने इन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि प्रदान की। अपनी उच्चकोटी के लेखन कार्य के माध्यम से ये दूर-दूर तक जाने जाते थे। इनकी कृतियों का अध्ययन करने पर आभास होता है कि इनमें कवि, लेखक और नाटककार बनने की जो प्रतिभा थी, वह अदभुत थी। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार थे।

इनकी #मातृभाषा_के_प्रति रचना की कुछ पंक्तियां

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"

 भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अग्रवालों की उत्पत्ति नाम से भी एक ग्रंथ रचना की थी 

साभार: राष्ट्रीय  अग्रवाल सभा 

उत्तर प्रदेश का गौरव अग्रवाल समाज


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उत्तर प्रदेश जो जनसंख्या के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा सूबा है उसके उत्थान में अग्रवालों का योगदान। उत्तर प्रदेश से अग्रवाल समाज का गहरा संबंध है। महाराज अग्रसेन का जन्म काशी विश्वनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। महाभारत युद्ध में उन्हें श्री कृष्ण ने भारत वर्ष के पुनरुत्थान का आशीर्वाद दिया था। गुप्त वंश जो धारण गोत्रीय अग्रवाल था उसकी राजधानी पश्चिम उत्तर प्रदेश थी। उत्तर प्रदेश में राजनीति, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, धर्म, उद्योग समाजसेवा लगभग हर क्षेत्र में अग्रवालों का अग्रणी स्थान रहा है । UP के अग्रवालों ने देश और अग्रवाल समाज को कई नगीने दिए हैं। उत्तर प्रदेश को इन्होंने अपने ज्ञान, बुद्धि और मेहनत से सींचा है। कुछ प्रमुख अग्रवाल नाम और घराने जिनकी जन्मभूमि/कर्मभूमि/ मूलभूमि उत्तर प्रदेश थी -

धर्म -

★ गोरखपुर जिले में दो अग्रवालों घनश्याम दास जालान और जयदयाल गोयनका ने हिंदुओं की सबसे बड़ी धार्मिक प्रेस गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की थी।

★विहिप के पूर्व अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल जी जिन्होंने राम जन्मभूमि के लिए सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया और रामलला के लिए चोटिल हुए वो आगरा उत्तर प्रदेश से थे।

★ प्रसिद्ध पर्यावरणविद्य व iit के पूर्व प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद(GD Aggarwal) उत्तर प्रदेश से थे। जिन्होंने माँ गंगा की निर्मलता और शुद्धता के लिए अपने प्राण त्याग दिए।

★अग्रवाल जैन मुग़ल कालीन आगरा के साहू टोडर ने 500 से अधिक जैन स्तूपों का निर्माण किया था।

★सिंघानिया परिवार ने कानपुर में भव्य JK मंदिर का निर्माण किया था ।

★ शिव प्रसाद गुप्त ने काशी का मशहूर भारत माता मंदिर का निर्माण किया था।

उद्योग पति व मीडिया घराने-

★ साहू जैन परिवार - देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी The Times Group की मालिक । ये अग्रवाल जैन परिवार से हैं । यह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बिजनोर से हैं।

★ सिंघानिया परिवार - देश के सबसे बड़े आद्योगिक घराने में से एक सिंघानिया परिवार का मूल उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले का है।

★बड़े हिंदी समाचार पत्र - दैनिक भास्कर के फाउंडर रमेश चंद्र अग्रवाल का जन्म झांसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था व दैनिक जागरण के फाउंडर पुराण चंद गुप्ता का जन्म कालपी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।

★ अमित अग्रवाल - देश का टॉप ब्लॉगर; ये उत्तर प्रदेश के आगरा शहर से है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश की अनेक यूनिवर्सिटी, इंडस्ट्री आदि के मालिक अग्रवाल हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीती - राजनीति में उत्तर प्रदेश के अग्रवालों का अग्रणी स्थान रहा है। उत्तर प्रदेश ने तीन अग्रवाल मुख्यमंत्री(चंद्र भानु गुप्ता, बाबू बनारसी दास, राम प्रकाश गुप्त) दिए हैं। जिन्होंने प्रदेश के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई है। डॉ राम मनोहर लोहिया जिन्हें अग्रवालों का नवरत्न कहा जाता है वो भी उत्तम प्रदेश से थे। उनके नाम पर लखनऊ में एक पार्क और हॉस्पिटल है। उत्तर प्रदेश के वर्तमान वित्त मंत्री भी अग्रवाल समाज से आते हैं । उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं अग्रवालों की कुलभूमि अग्रोहा होकर आये हैं ।

लेखक -

आधुनिक हिंदी के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी में हुआ था। इन्होंने ही हिंदी में नाटक विधा की शुरुवात की थी। पद्मश्री काका हाथरसी का असली नाम प्रभुदयाल गर्ग था। इनका जन्म हाथरस में हुआ था। इन्हें हास्य सम्राट कहा जाता है। प्रसिद्ध लेखक बाबू गुलाबराय भी उत्तर प्रदेश के अग्रवाल समाज से हैं।

अग्रवाल नवरत्न - विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय 9 अग्रवालों को अग्रवाल नवरत्नों का दर्जा हासिल है। अग्रवालों के 9 में से 5 अग्रवाल नवरत्न की जन्मभूमि या कर्म भूमि उत्तर प्रदेश है । जिनमे शुमार हैं - राम मनोहर लोहिया(भारतीय समाजवाद को दिशा दिखाने वाले), डॉ भगवान दास(भारत रत्न), भारतेंदु हरिश्चन्द्र(आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक), शिव प्रसाद गुप्त(काशी विद्यापीठ के जनक), हनुमान प्रसाद पोद्दार(गीताप्रेस के जनक)।

अग्रवालों के इतिहास लेखन- अग्रवालों का सर्वप्रथम इतिहास भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अग्रवालों की उत्पत्ति के नाम से लिखा था । महालक्ष्मी व्रत कथा का खोज भी इन्होंने ही किया था । अग्रवालों पे इतिहास पे ऐतिहासिक ग्रंथ अग्रसेन अग्रोहा अग्रवाल लिखने वालीं स्वराज्यमानी अग्रवाल जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयाग में हुआ था।

साभार: Prakhar Agrawal, अग्रवाल चिंतक, राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा