SAKSHI JAIN - CA FOUNDATION INDIA TOPPER
HAMARA VAISHYA VANIK MAHAJAN SAMAJ
प्रिय मित्रो यह चिटठा हमारे महान भगवान विष्णु माता लक्ष्मी पुत्र वनिक वानिया महाजन सेठ लाला जैन योद्धेय समाज के बारे में है। इसमें विभिन्न वनिक महाजन जातियों के बारे में बताया गया हैं, उनके इतिहास व उत्पत्ति का वर्णन किया गया हैं। आपके क्षेत्र में जो भी वनिक महाजन जातिया हैं, कृपया उनकी जानकारी भेजे, उस जानकारी को हम प्रकाशित करेंगे।
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Saturday, July 4, 2026
Friday, July 3, 2026
SETH AMAR CHAND NAHTA
SETH AMAR CHAND NAHTA
श्री अगरचंद नाहटा का जन्म हिंदू कैलेंडर के चैत्र महीने की कृष्ण चतुर्थी को संवत 1967 (ग्रेगोरियन कैलेंडर साल 1911) में हुआ था।
श्री अगरचंद नाहटा संवत 2039 (अंग्रेजी साल 1983) में पौष महीने की कृष्ण चतुर्दशी को स्वर्ग सिधार गए।
उनके पिता शंकरदान, जो बीकानेर के रहने वाले थे, 'नाहटा' गोत्र के ओसवाल जैन थे। उनकी माँ का नाम चुन्नी बाई था। उनके आठ बच्चे थे - छह बेटे और दो बेटियाँ।
श्री अगरचंद नाहटा ने अक्षय तृतीया को स्कूल में एडमिशन लिया। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई 'जैन पाठशाला' से पूरी की। बदकिस्मती से, नाहटा की स्कूल की पढ़ाई छठी क्लास में ही समय से पहले खत्म हो गई।
श्री अगरचंद नाहटा की सगाई गंगाशहर के मोरसीदास सेठिया की बेटी पन्नी बाई से हुई, जो असल में मेलानिया गाँव के रहने वाले थे। यह शादी संवत 1981 (इंग्लिश साल 1936) में हुई थी। लगभग एक साल बाद आषाढ़ कृष्ण 12 तारीख, संवत 1982 (इंग्लिश साल 1937) को उनकी शादी हो गई। उनके दो बच्चे हुए धर्मचंद और विजयचंद।
नाहटा अब एक जिज्ञासु स्टूडेंट बन गए और खुद को रिसर्च और किताबों में डुबो दिया। वे एक जाने-माने विचारक बन गए।
सीखने की लगन: एक पुरानी कहावत है कि दुनिया में कई लतें रही हैं लेकिन उनमें से दो सबसे अच्छी हैं – पढ़ाई और भगवान की पूजा।
व्यासनानी शांति बहुधा, व्यासं द्वयमेव केवलं व्यासनम्
विद्या व्यासनम् व्यासनम् अथवा हरिपद सेवनम् व्यासनम्
अगरचंद नाहटा को सीखने का बेजोड़ जुनून था। हर दिन, वे 10 घंटे पढ़ने, मेडिटेशन और सोचने में बिताते थे। पढ़ाई के लिए उनके प्यार का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है कि दुनिया भर में मशहूर इंस्टिट्यूट 'अभय जैन ग्रंथालय', जिसे उन्होंने अकेले ही बनाया था?
इस लाइब्रेरी में 40,000 से ज़्यादा दुर्लभ मैन्युस्क्रिप्ट और इतनी ही छपी हुई किताबें हैं। इसके अलावा उन्होंने 'शंकरदान नाहटा कला भवन' भी बनाया, जिसमें दुर्लभ पेंटिंग, सिक्के, मूर्तियां और दूसरी कलाकृतियों का कलेक्शन है।
दोनों ही देश की अनमोल संपत्ति हैं। और, खास बात यह थी कि उन्होंने इसे बिना किसी सरकारी मदद के बनाया था। वे कहते थे, "पुरानी और कलात्मक चीज़ों का कलेक्शन और उन्हें संभालकर रखना बहुत ज़रूरी है। पुरानी संस्कृति के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए ये ज़रूरी हैं।"
लेकिन, उनका जुनून सिर्फ़ किताबों के कलेक्शन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे खुद भी एक शौकीन लेखक थे। उन्होंने 40 किताबें लिखीं और एडिट कीं। 300 से ज़्यादा मैगज़ीन में 5000 से ज़्यादा आर्टिकल छपे। कई मैगज़ीन ने उन्हें एडिटर या एडिटोरियल बोर्ड का मेंबर बनाया। राजस्थानी, राजस्थान भारती, विशम्भरा, परंपरा, मरु भारती, वरदा, अन्वेषण और वैचारिकी कुछ खास मैगज़ीन थीं जो उनके एडिटरशिप में निकलती थीं। उन्होंने 'अभय जैन ग्रंथालय' से 25 और 'राजस्थान साहित्य परिषद' से 9 किताबें भी पब्लिश करवाईं।
नाहटा सैकड़ों रिसर्च स्टूडेंट्स के लिए गाइड भी बने और हज़ारों दूसरे लोगों ने उनसे ज़रूरी जानकारी और स्टडी मटीरियल पाया। उन्होंने रिसर्चर्स के लिए इनविजिलेटर का भी काम किया।
नाहटा बदकिस्मत थे कि उन्हें शुरुआती दौर में ही फॉर्मल एजुकेशन छोड़नी पड़ी, फिर भी ज्ञान के लिए उनका प्यार और लगन मिसाल थी। राजस्थानी की नाहटा की जानकारी महान आचार्य हेमचंद्र की याद दिलाती है, जिनकी इन भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी। नाहटा ने जैन, बौद्ध, शंकर, अद्वैत (एकेश्वरवाद), विशिष्टाद्वैत और शुद्धाद्वैत दर्शन के साथ-साथ कबीर की निर्गुण पूजा और सूफीवाद जैसे संतों का गहराई से अध्ययन किया।"
हिंदी में एक मशहूर कहावत है, जिसका मतलब है कि धन और साहित्य साथ-साथ नहीं चलते। यह एक आम सोच है कि लेखकों को धन की ज़रा भी परवाह नहीं होती, जबकि धनवानों को साहित्य की कोई समझ नहीं होती।
हालांकि, आम सोच के हमेशा अपवाद होते हैं। और, अगरचंद नाहटा उनमें से एक हैं। एक धनवान परिवार से होने और खुद एक सफल व्यवसायी होने के बावजूद, वह सच में ज्ञान की देवी सरस्वती के बेटे थे। हालांकि, उनका जन्म एक व्यवसायी परिवार में हुआ था, लेकिन उन्होंने खुद को साहित्य और शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
नाहटा सिर्फ़ एक इतिहासकार ही नहीं थे, बल्कि अपने आप में एक लेजेंड थे। राजस्थान के महान साहित्यकारों, विचारकों और इतिहासकारों में से एक, वह बेशक देश का गौरव थे। वह एक व्यवसायी, विद्वान और एक आध्यात्मिक व्यक्ति का एक दुर्लभ मेल थे।
एक मशहूर विचारक और पुरानी पढ़ाई के बहुत जानकार, नाहटा ने अपनी ज़िंदगी राजस्थानी भाषा और साहित्य की अनगिनत अनजान किताबों को खोजने और उन पर रिसर्च करने में लगा दी। ऐसा करके, वे एक चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया बन गए, जिनसे दुनिया भर के रिसर्चर गाइडेंस के लिए संपर्क करते थे। उन्हें किताबों और ज्ञान से इतना लगाव था कि उन्होंने एक प्राइवेट लाइब्रेरी 'अभय जैन ग्रंथालय' शुरू की।
नाहटा ने खुद 7000 से ज़्यादा रिसर्च पेपर लिखे, 100 से ज़्यादा किताबों को एडिट किया और न सिर्फ़ प्राकृत, अपभ्रंश और राजस्थानी बल्कि जैन लिटरेचर की भी रेयर मैन्युस्क्रिप्ट्स पर रिसर्च की। उन्होंने एक लाख से ज़्यादा हाथ से लिखी मैन्युस्क्रिप्ट्स भी खोजीं और अनजान किताबें पब्लिश कीं।
उन्होंने 'शार्दुल राजस्थानी शोध संस्था', बीकानेर और 'राजस्थानी साहित्य परिषद', कोलकाता के डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया। उन्होंने राजस्थानी को संविधान के 8वें शेड्यूल में जगह दिलाने के लिए बहुत संघर्ष किया। अगर राजस्थानी को 'केंद्रीय साहित्य अकादमी' से पहचान मिली और एक इंडिपेंडेंट लिटरेरी भाषा का दर्जा मिला, तो यह उनकी कोशिशों की वजह से ही था।
नाहटा ने नए लेखकों को बढ़ावा देने और उन्हें इंस्पायर करने के लिए अपने पिता के नाम पर 'शंकरदान नाहटा पुरस्कार' भी शुरू किया। उन्होंने अपने भतीजे (अपनी बहन के बेटे) हजारीमल बांठिया को भी अपने पिता फूलचंद बांठिया के नाम पर एक अवॉर्ड शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि उन्हें राजस्थानी साहित्य जगत की सबसे बड़ी हस्ती माना जाता है। वे हमेशा प्राचीन अध्ययन के विद्वानों में सबसे आगे रहे। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि जैन समुदाय भी उन्हें अपना मार्गदर्शक मानता था। कई संगठनों ने उन्हें सम्मानित किया। जैन सिद्धांत भवन, आरा ने उन्हें 'सिद्धांताचार्य', जिंदुतसूरि संघ ने उन्हें 'जैन इतिहास रत्न' और राजस्थान भाषा प्रचार सभा ने 'राजस्थान साहित्य वाचस्पति' की उपाधि दी।
इसके अलावा, दूसरी स्थानीय भाषाओं के लेखकों ने भी उनके साहित्यिक काम की तारीफ़ की और उन्हें बधाई दी।
SANJAY AGRAWAL - AU SMALL FINANCE BANK
SANJAY AGRAWAL - AU SMALL FINANCE BANK
संजय अग्रवाल ने उधार के पैसे से फाइनेंस का एक छोटा-सा काम शुरू किया था. धीरे-धीरे कंपनी बड़ी होती चली गई. आज वह कंपनी एक बैंक में बदल चुकी है, जिसकी मार्केट कैप लगभग 50,000 करोड़ है.
सफलता की ये कहानी है एक ऐसे साधारण-से लड़के की, जो 8वीं कक्षा में फेल हो गया था. जैसे-तैसे करके आगे बढ़ा और बाद में दो बार चार्टर्ड अकाउंटेंड (CA) की परीक्षा में फेल हो गया. फिर नौकरी भी की. लेकिन इंसान की मेहनत और जिद के सामने पूरी कायनात झुक जाती है. इस लड़के ने भी कायनात को अपने पक्ष में लाकर खड़ा कर दिया. इसने एक फाइनेंस कंपनी की स्थापना की, जो आज 49,698 करोड़ की मार्केट कैप वाले नामी बैंक में बदल चुकी है. कहानी के मुख्य पात्र का नाम है संजय अग्रवाल
संजय अग्रवाल राजस्थान की पिंक सिटी जयपुर में पैदा हुए थे. शुरुआती पढ़ाई का अहम पड़ाव कक्षा आठवीं होती है, मगर वे उसमें फेल हो गए. बाद में उन्होंने 2 बार सीए की परीक्षा में भी असलता का सामना किया. हालांकि तीसरी बार कड़ी मेहनत के बूते वे सीए की मेरिट लिस्ट में जगह पा गए. नौकरी की, मगर रास नहीं आई. 1996 में संजय अग्रवाल ने 5 लोगों से पैसा लेकर एक एनबीएफसी (नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी) की स्थापना की. इसका नाम था एयू फाइनेंशियर्स (AU Financiers). यह वही कंपनी है, जिसे आज आप एयू स्माल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) के नाम से जानते हैं.
एक स्कैम ने डरा दिया निवेशकों को, अटक गया काम
उधार के पैसों से शुरू की गई एक छोटी-सी एनबीएफसी एक बैंक में बदल गई. मगर इन दोनों के बीच 28 साल का लंबा और दिलचस्प सफर भी है. NBFC की स्थापना के बाद काम चलना ही शुरू हुआ था कि 1997 में 1200 करोड़ रुपये का चैन रूप भंसाली स्कैम (Chain Roop Bhansali scam) सामने आया. इस स्कैम के बारे में एक अलग आर्टिकल में विस्तार से बताएंगे. अभी इतना समझ लीजिए कि इस स्कैम ने NBFCs से लोगों का भरोसा डिगा दिया था. हालात ऐसे हो गए थे कि लोग NBFC के नाम से दूर भागने लगे थे. ऐसे में संजय अग्रवाल की एयू फाइनेंशियर्स के लिए भी बड़ी समस्या पैदा हो गई.
एक तरफ धंधे का बैंड बजा हुआ था और उधर उनकी बहन अरुणा कैंसर से जूझ रही थी. सन 2000 में वे अपनी बहन को इलाज के लिए लंदन चले गए. लंदन जाना उनकी लाइफ में एक टर्निंग पॉइंट लेकर आया. संजय अग्रवाल ने एक भाई का फर्ज निभाते हुए अपनी बहन को कैंसर से बचा लिया और जयपुर लौट आए. लौटने के बाद उन्होंने फाइनेंसिंग बिजनेस को नए स्तर पर ले जाने की कोशिशें शुरू कर दीं. 2003 में एचडीएफ (HDFC) ने एयू फाइनेंशियर्स से पार्टनरशिप कर ली.
HDFC से पार्टनरशिप से बदल गई तस्वीर
एक रोचक जानकारी यह भी है कि AU सोने का सिंबोलिक नाम है. लेटिन भाषा के औरम (Auram) से बना है. इस शब्द के पहले दो अक्षरों का इस्तेमाल करके सोने को एक सिंबल दिया गया है. HDFC ग्राहकों के लिए एयू (संजय अग्रवाल की कंपनी) सोने की खरीद-बेच का साधन बन गया. साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में महज 18 फीसदी सालाना ब्याज पर वाहनों के लिए लोन 24 घंटों के भीतर पास होने लगा. कंपनी लगातार अच्छा काम कर रही थी.
बिजनेस जगत का एक नियम है कि जब भी कोई नई कंपनी अच्छा काम करती है तो बड़े निवेशकों की निगाहों में चढ़ ही जाती है. संजय अग्रवाल की कंपनी पर मोतीलाल ओसवाल प्राइवेट इक्विटी की नजर पड़ी. मोतीलाल ने एयू फाइनेंशियर्स में 20 करोड़ रुपये का निवेश किया.
2017 का 19 अप्रैल हमेशा रहेगा याद
जून 2011 तक एयू ने 7 राज्यों में मौजूद अपनी 150 ब्रांच से 1,25,000 ग्राहकों को 1508 करोड़ का लोन बांट दिया था. कंपनी ने व्हीकल लोन के लिए सुजुकी और टाटा मोटर्स के साथ पार्टनरशिप की, तो हाउसिंग लोन के लिए नेशनल हाउसिंग कंपनी के साथ. एयू और आगे बढ़ी तो 250 करोड़ रुपये का निवेश आ गया. निवेश करने वालों में वारबर्ग पिन्कस, क्रिस कैपिटल और आईएफसी शामिल थे.
सितंबर 2013 तक कंपनी ने 4200 करोड़ रुपये का लोन लोगों तक पहुंचा दिया था. संजय अग्रवाल लगातार मेहनत करते रहे और फिर कायनात उनके आगे नतमस्तक हो गई. 2015 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने फाइनेंस के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी घोषणा की. बैंकिंग सेक्टर के लिए एक नई कैटेगरी बना दी गई- स्माल फाइनेंस बैंक. तब एयू एकमात्र ऐसी NBFC थी, जो लाइसेंस पाने में कामयाब रही. 2017 के अप्रैल महीने की 19 तारीख को संजय अग्रवाल जीवनभर नहीं भूलेंगे, क्योंकि इसी दिन एयू स्माल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) बना.
IPO आया तो टूट पड़े थे लोग
2017 में कंपनी 1912.51 करोड़ रुपये का आईपीओ लाई. लोगों को इतना भरोसा था कि यह 53 गुना सबस्क्राइब हुआ. इस तरह नवम्बर 2017 में यह एक शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंक बन गया. मार्च 2018 में इस बैंक ने 11 राज्यों में 306 ब्रांच खोल दीं और 292 एटीएम लगा दिए. कुछ ही समय में यह फॉर्च्यून इंडिया 500 कंपनी बन गई. यह एक ऐसा ग्रुप है, जहां पहुंच पाना हर कंपनी के लिए मुमकिन नहीं. आज एयू स्माल फाइनेंस बैंक की 21 राज्यों में उपस्थिति है और इसकी 2383 ब्रांच हैं. बैंक के पास 1.1 करोड़ ग्राहक हैं.
प्राइवेट कमर्शियल बैंकों को आने लगा पसीना!
AU Small Finance Bank में सेविंग अकाउंट पर ही 7.25 फीसदी का ब्याज मिलता है. 7 जून 2024 को रिवाइज की गई FD की दरों के हिसाब से 18 महीनों की एफडी पर 8.24 फीसदी (एनुएलाइज्ड) ब्याज दर प्राप्त होती है. वरिष्ठ नागरिकों को इसी अवधि के लिए एफडी पर 8.77% ब्याज मिलता है. ज्यादा ब्याज दरों के चलते ही, एफडी कराने के लिए इन दिनों लोग स्माल फाइनेंस बैंकों का रुख करते हैं. ऐसे में अगर यह कहा जाए कि एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसे दिग्गज कमर्शियल बैंकों के माथे पर भी पसीना आने लगा है, तो गलत नहीं होगा.
विदेशी संस्थागत निवेशकों का अटूट भरोसा
चूंकि अब यह एक लिस्टेड कंपनी है तो इसका शेयरहोल्डिंग पैटर्न आसानी से ट्रैक किया जा सकता है. इस पैटर्न में खास बात यह है कि इसमें विदेशी निवेशकों (FIIs) की हिस्सेदारी सबसे अधिक है. वे 39.36 फीसदी हिस्सेदारी पर कब्जा किए बैठे हैं, जबकि इसके प्रोमोटर्स के पास केवल 25.45 फीसदी हिस्सेदारी ही है. घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) भी बैंक पर पूरा भरोसा टिकाए हुए हैं. उनकी हिस्सेदारी 22.79 प्रतिशत है. प्रोमोटर्स में संजय अग्रवाल के पास 17.58 फीसदी की हिस्सेदारी है.
Thursday, July 2, 2026
PODDAR FAMILY - RAMGARH SETHAN
PODDAR FAMILY - RAMGARH SETHAN
ताराचंद घनश्यामदास राजस्थान के रामगढ शेखावाटी में पोद्दार परिवार की एक जानी-मानी मारवाड़ी ट्रेडिंग और बैंकिंग फर्म थी। यह लगभग 1791 में बनी थी और 1957 तक चलती रही। यह पूरे भारत में फाइनेंस, अफीम, कपास और अनाज का व्यापार करती थी।
रामगढ़ सेठान का सारा टैक्स केवल सेठ भरते थे ।
1. इन्होंने काफी स्कूल , कॉलेज , हॉस्पिटल और धर्मशालाएं खोली थीं ।
2. रामगढ़ सेठान को उस समय #छोटा_काशी कहा जाता था क्योंकि उसमें 25 संस्कृत के विद्यालय थे , उसमे आयुर्वेद और ज्योतिष के लिए विद्यालय थे और उस समय जयपुर के अलावा केवल रामगढ़ में कॉलेज था ।
3. सभी विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा , मुफ्त खाना और सभी चीजें मिलती थीं ।
4. सेठों के लड़कों के विवाह में नगर के सभी लोग आमंत्रित होते थे और जो भी आता था उसे हेड़ा दिया जाता था जो कि बहुत प्रसिद्ध था । जो भी आता था उसे एक रुपये दिए जाते थे जाते समय कुछ लोग तो तो अपने साथ अपने मवेशी लाते थे उनके लिए भी ले जाते थे । एकबार एक आदमी लोटा भर के चीटे लाया और हर चीटे के लिए हेड़ा मांगा और उसे दिया भी गया ।
5. गौशाला में गायों के लिए 60-70 मन (2400 किलो)ग्वार रहता था जो कि जिसका प्रबन्द सेठों द्वारा किया जाता था ।
6. उनके लड़के की शादी के वक़्त खुली लूट रहती थी पूरे नगर में कोई भी जिसके घर मे शादी है उसकी दुकान से कुछ भी ले सकता था जिसका नुकसान जिस सेठ के लड़के की शादी है वो ही उठाता था ।
7. एकबार किसी गांव के एक गांववाले ने सीकर के महाराज से शिकायत की आप रामगढ़ वालों पे इतना ज्यादा ध्यान क्यों देते हैं । राजा ने उनकी परीक्षा ली कहा कि तुमलोग 1 करोड़ रुपये का प्रबन्द करो अभी । और पूरे सीकर में । लोगों ने मना कर दिया कहा ऐसा नहीं हो सकता है । फिर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा कि रामगढ़ जाओ और सेठों को बोलो की महाराज को इस समय एक करोड़ रुपये चाहियें (इस समय के करीब अरबों में ) । मंत्री गए और सेठों को बताया । सेठों ने कहा कि राजा से पूछो की रुपये ,अन्ना ,पैसे किसमे चाहिए ? मंत्री आये और राजा को बताया । राजा ने कहा अब समझे मैं रामगढ़ सेठान का इतना ध्यान क्यों रखता हूँ ।
8. पोद्दारों ने वहाँ कुएं , तालाब , बावड़ी , मंदिर , छतरियाँ और आलीशान हवेलियां बनवाईं थीं वहीं रुइया ने कॉलेज , स्कूल और हॉस्पिटल इत्यादि ।
9. सेठ श्री अनंत राम पोद्दार जी जाड़ों में सियारों को लाडू और कंबल देते थे ताकि वो मर न जाएं ।
10. भक्तवारी देवी , सेठ श्री लक्ष्मी चंद पोद्दार जी की धर्म पत्नी गुप्त दान करतीं थीं । उन्होंने अपने मुनीम को बोल दिया था कि नगर में कोई भूखा नहीं रहना चाहिए न ही किसी को किसी बात की चिंता हो ।
शुरुआत और परिवार का इतिहास
इस फर्म की जड़ें शेखावटी इलाके के चुरू के पोद्दार परिवार से जुड़ी हैं, यह बंसल गोत्र के अग्रवाल थे जिनके शुरुआती पूर्वजों जैसे सेठ चतरभुज पोद्दार ने 18वीं सदी के आखिर में कमर्शियल काम शुरू किए थे चतरभुज के बेटों—जोहुरीमल, जिंदाराम, और ताराचंद—ने परिवार के व्यापार नेटवर्क को बढ़ाया, और ताराचंद के वंशज ही फर्म के मुख्य सदस्य बने जिंदाराम के बेटे मिर्ज़ामल (1790–1850) ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी बैंकर के तौर पर काम किया और बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह जैसे शासकों को 400,000 रुपये जैसी बड़ी रकम उधार दी यह फर्म परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारे से बनी; ताराचंद की असमय मृत्यु के बाद, उनके बेटों गुरसहायमल और हरसहायमल ने परिचालन का प्रबंधन किया, गुरसहायमल के बेटे घनश्यामदास (मृत्यु 1885) ने नेतृत्व किया जब तक कि उनके अपने बेटों - राधाकृष्ण, केशवदास, और अन्य ने 19वीं शताब्दी के अंत में कार्यभार नहीं संभाला 1823 तक, पारिवारिक विभाजन ने शाखाओं को औपचारिक रूप दिया, जिसमें हरसमल रामचंद्र जैसी संबंधित फर्मों के साथ-साथ ताराचंद घनश्यामदास भी शामिल थे
ताराचंद घनश्यामदास ने हुंडी प्रणाली (विनिमय पत्र) के माध्यम से स्वदेशी बैंकिंग में उत्कृष्टता हासिल की, पूर्वी भारत के मुद्रा बाजार के केंद्र, बड़ा बाजार में अपने कलकत्ता बेस से बंगाल, बिहार और असम में व्यापार को वित्तपोषित किया इसने 1860 के आसपास कलकत्ता शाखा की स्थापना की, 1864 तक निर्देशिकाओं में सूचीबद्ध किया, और बम्बई (1868 से पूर्व), कराची, मथुरा (1833 तक) और यहां तक कि 1919 में न्यूयॉर्क तक विस्तार किया, न्यूयॉर्क कॉटन एसोसिएशन जैसे एक्सचेंजों में शामिल हो गया। प्रमुख गतिविधियों में मालवा के इलाकों में अफीम का व्यापार, कपड़ा वितरण (1917-1921 तक मुंगटूराम जयपुरिया जैसी फर्मों के साथ साझेदारी), तेल दलाली (शिवरामदास मोरारका जैसे भागीदारों को शेयर आवंटित किए गए) फर्म ने शेखावाटी गांवों से मुनीम (क्लर्क) नियुक्त किए, मुख्य रूप से अग्रवाल, निश्चित वेतन (51-351 रुपये सालाना) और भत्ते के साथ, परिवार और सामुदायिक संबंधों के माध्यम से वफादारी पर जोर दिया इसने मारवाड़ी प्रवासियों को ऋण, मुफ्त आवास और प्रारंभिक पूंजी प्रदान की, जबकि दिवाली खाता पूजा और नकद आधारित लेखा (परता प्रणाली) जैसी पारंपरिक प्रथाओं को बनाए रखा उल्लेखनीय वित्तीय पैमाने में 1919 में करों में 38 लाख रुपये और शासकों को ऋण शामिल थे, जैसे 1825 में बीकानेर को 127,000 रुपये का ऋण साझेदारी, जैसे कि 1905 से तेल में, अक्सर गद्दी (फर्म-विशिष्ट) नेटवर्क शामिल होते थे, 1933 में एक बड़ा विभाजन हुआ
1860 और 1919 के बीच बड़ी मारवाड़ी फर्मों में से एक मानी जाने वाली ताराचंद घनश्यामदास, शेखावाटी मारवाड़ियों के लोकल साहूकारी से भारत के देसी बैंकिंग और व्यापार पर हावी होने, जूट, कपास और अफीम में ब्रिटिश कमर्शियल हितों को फाइनेंस करने और कम्युनिटी नेटवर्क बनाने का एक उदाहरण है यह ट्रेडिंग कम्युनिटी के लिए एक मॉडल के तौर पर काम करती थी, जिसमें बिड़ला परिवार ने अपना इंडस्ट्रियल साम्राज्य बनाने से पहले इसके ब्रोकर के तौर पर शुरुआत की थी फर्म की एडजस्ट करने की क्षमता – पारिवारिक बंटवारे, पुरोहिती संबंधों और रिसोर्स शेयरिंग के ज़रिए – ब्रिटिश विस्तार और 1918 के बाद के बदलावों के बीच काम करती रही, जिससे 19वीं सदी तक भारत के नौ-दसवें हिस्से के व्यापार पर मारवाड़ियों का कंट्रोल हो गया इसके वाहिस (लेजर) और कर्मचारियों के इंटरव्यू पीढ़ियों से चली आ रही निरंतरता को दिखाते हैं, जो बचत, प्रतिष्ठा बनाए रखने और आपसी मदद के मूल्यों को दिखाते हैं, जिसने आधुनिक भारतीय एंटरप्रेन्योरशिप का रास्ता बनाया 1957 में फर्म बंद हो गई, जिससे पारंपरिक मारवाड़ी घरों से इंडस्ट्रियलाइज़्ड ग्रुप्स में बदलाव आया।
फर्म ने ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के अनुकूल खुद को ढाल लिया, अंतर्देशीय रसद के लिए यूरोपीय एजेंसियों के साथ साझेदारी करते हुए पृथक बाज़ार अर्थव्यवस्था में एकीकृत हो गई। यह इजारा प्रणाली के तहत राजस्व खेती में शामिल थी यह जुड़ाव कॉलोनियल रेवेन्यू की मांगों के साथ जुड़ा हुआ था, जिससे ताराचंद घनश्यामदास को खेती की मार्केटिंग को फाइनेंस करने और श्रॉफ और आढ़तिया के तौर पर ट्रेड बिल की गारंटी देने का मौका मिला
1820-1840 के दशक में मालवा इलाके में अफीम एजेंसी कॉन्ट्रैक्ट मिलना एक अहम घटना थी, जहाँ इंदौर और आस-पास के अफीम इलाकों में ब्रांचों ने चीन जाने वाले उतार-चढ़ाव वाले एक्सपोर्ट के बीच सीधी सोर्सिंग और सट्टेबाजी को मुमकिन बनाया। जार्डाइन हेंडरसन जैसी ब्रिटिश फर्मों के साथ नेटवर्क के ज़रिए हासिल किए गए इन कॉन्ट्रैक्ट ने बंगाल की ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल के बाहर मालवा के नॉन-मोनोपॉली प्रोडक्शन का फ़ायदा उठाया, जिससे 1840 के दशक तक बॉम्बे में शुरू हुए फ्यूचर ट्रेडिंग में फर्म की भूमिका को बढ़ावा मिला
1860 के दशक तक, ताराचंद घनश्यामदास मारवाड़ी व्यापारियों के बीच सबसे बड़ी "बड़ी फर्मों" में से एक बन गए थे, जो 1914 तक पूर्वी भारत में ब्रिटिश कंपनियों के बराबर थीं। कलकत्ता से काम करते हुए, शॉ वालेस और बर्मा ऑयल जैसी बड़ी यूरोपियन कंपनियों के लिए मुख्य (गारंटी ब्रोकर) के तौर पर काम किया इस भूमिका में बिल ऑफ़ एक्सचेंज की गारंटी देना और क्रेडिट फ्लो को आसान बनाना, कमीशन कमाना और फर्म को ब्रिटिश कमर्शियल नेटवर्क में गहराई से शामिल करना शामिल था। जो क्लासिक मारवाड़ी महाजन संरचना के हिस्से के रूप में ब्रोकरेज, सट्टेबाजी और स्थानीय संग्रह का प्रबंधन करते थे ये एजेंट, जो अक्सर ताराचंद घनश्यामदास जैसे स्थापित घरानों में क्लर्क के रूप में शुरुआत करते थे, ने फर्म की पहुंच सट्टा बाजारों में बढ़ा दी, जिसमें कमोडिटीज में वायदा कारोबार भी शामिल था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, फर्म ने आकर्षक अफीम व्यापार के माध्यम से चीन के साथ संबंध बनाए, अंतर्देशीय क्षेत्रों से पोस्त का स्रोत बनाया और पारसी व्यापारियों को आपूर्ति की, जिन्होंने इसे चीनी बाजारों में निर्यात किया और अहमदाबाद और सूरत में इकाइयों में इसका प्रसंस्करण किया।[3] परोपकारी प्रयासों ने ताराचंद घनश्यामदास की सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाया, इस तरह की गतिविधियों ने न केवल फर्म की प्रतिष्ठा को चमकाया बल्कि औपनिवेशिक बंगाल में मारवाड़ियों को आर्थिक बाहरी लोगों के रूप में देखने की धारणा के बीच सद्भावना को भी बढ़ावा दिया। औपनिवेशिक परियोजनाओं के वित्तपोषण में, ताराचंद घनश्यामदास ने जूट और तेल सहित वाणिज्यिक कृषि और निर्यात व्यापार के विस्तार को रेखांकित करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की मांगों का समर्थन किया। शॉ वालेस के लिए अपनी ब्रोकरेज के माध्यम से, फर्म ने उत्तर भारतीय क्षेत्रों में किसान कृषकों को ऋण के प्रवाह को सक्षम किया, जिससे औपनिवेशिक उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चे माल के उत्पादन और परिवहन में सुविधा हुई 20वीं सदी की शुरुआत तक, इसने फर्म को स्वदेशी पूंजी के शिखर पर पहुंचा दिया, जो औद्योगिक निवेशों की ओर संक्रमण करते हुए बाज़ार अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों को नियंत्रित कर रही थी।
1957 के बाद, परिवार में बंटवारे के बीच फर्म के ऑफिशियल तौर पर खत्म होने के बाद, इसके पोद्दार परिवार से अलग-अलग कंपनियाँ निकलीं, जो टेक्सटाइल और फाइनेंस जैसे अलग-अलग सेक्टर में काम करती रहीं; खास वारिसों में जयपुरिया परिवार से जुड़ी ब्रांच शामिल हैं, जिन्होंने असली गद्दी (फर्म सीट) मॉडल को आज़ाद भारत के इंडस्ट्रियल माहौल के हिसाब से अपनाया ये ब्रांच पोस्ट-कोलोनियल बिज़नेस तरीकों पर फर्म के लंबे समय तक चलने वाले स्ट्रक्चरल असर को दिखाती हैं। ऐतिहासिक रूप से, ताराचंद घनश्यामदास कॉलोनियल भारत में देसी कैपिटलिज़्म के उदय और कमज़ोरियों को दिखाते हैं। वे इस बात की चेतावनी देते हैं कि कैसे ग्लोबल ट्रेड में बदलाव – जो पहले विश्व युद्ध की रुकावटों और युद्ध के बाद डीकोलोनाइज़ेशन से और बढ़ गए – ने पारंपरिक बड़ी फर्मों को खत्म कर दिया, जिससे मॉडर्न कंपनियों के लिए रास्ता बना, साथ ही माइग्रेशन, रिश्तेदारी और इकोनॉमिक नेशनलिज़्म के आपसी असर को भी दिखाया। साहित्य में इसकी विरासत अभी भी खास है, पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ (1950s) जैसे मारवाड़ी बायोग्राफिकल कलेक्शन में इसके कुछ ज़िक्र हैं, जो वैष्णव समाज सेवा के ज़रिए इसके कल्चरल संरक्षण का त्यौहार मनाते हैं
ऐतिहासिक मारवाड़ी फर्म तारा चंद घनश्यामदास 1957 के दशक में भंग हो गई और कई उत्तराधिकारी शाखाओं में विभाजित हो गई। पोद्दार और नेओटिया परिवार के वंशजों ने राधाकृष्ण बिमल कुमार, पोद्दार ग्रुप वेंचर्सऔर नेवटिया ग्रुप जैसे समूह स्थापित किए , जबकि श्रीकुमार पोद्दार और रोहित पोद्दार जैसे अन्य लोगों ने रियल एस्टेट जैसे आधुनिक उद्यमों में कदम रखा।मुख्य वंशज और उनके वर्तमान समूह इस प्रकार हैं:राधाकृष्ण बिमल कुमार / नेओटिया समूह: बिमल कुमार पोद्दार (एक दत्तक वंशज) द्वारा सुरेश और विनोद नेवटिया के साथ मिलकर स्थापित किया गया। यह समूह रियल एस्टेट, आतिथ्य सत्कार और इंजीनियरिंग (जैसे, अंबुजा नेओटिया समूह) में विस्तारित हुआ।पॉद्दार ग्रुप (अमेरिका/यूरोप): मूल फर्म के प्रत्यक्ष वंशज श्रीकुमार पॉद्दार द्वारा स्थापित, जो अंतरराष्ट्रीय निवेशों पर ध्यान केंद्रित करता है।पॉद्दार हाउसिंग एंड डेवलपमेंट: इसका संचालन रोहित पॉद्दार द्वारा किया जाता है, जो मुंबई में रियल एस्टेट का कारोबार संभालने वाले उनके वंशज हैं
SETH JWALA PRASAD BHARTIYA
SETH JWALA PRASAD BHARTIYA
इतिहास के झरोखे से_ कान के अंदर चना फंसने के बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने लिया अस्पताल बनाने का संकल्प, जयपुर बीकानेर के बीच रास्ते में था एकमात्र अस्पताल।
फतेहपुर। सैकड़ो वर्ष पुराना इतिहास संजोए अपने विराट स्वरूप को लिए आज 100 साल बाद भी अडिग खड़ा फतेहपुर कस्बे का भरतीया अस्पताल जिसका निर्माण आज से 100 वर्ष पूर्व हुआ लेकिन 1985 के दौर में अस्पताल वापस बंद हो गया था
1923 में सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने बताया था अस्पताल।
एक सामान्य घर में जन्मे सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया जब 12 साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया जिसके बाद वह नौकरी करने कोलकाता चले गए कोलकाता में जब वह खेल रहे थे तब उनके कान में एक चना फस गया जिससे उनको काफी पीड़ा हुई जब अस्पताल गए और वहां पर लोगों को पीड़ित अवस्था में देखा तो उनके मन में ख्याल आया कि जब भी ईश्वर उन्हें धनवान बनाएगा तो सबसे पहले वह अपना घर बाद में और अस्पताल पहले बनाएंगे और हुआ भी ऐसा ही कुछ साल नौकरी करने के बाद ज्वाला प्रसाद भरतीया कपड़े की ट्रेडिंग और शेयर मार्केट का काम की शुरुआत कर दी जिससे उनका काफी फायदा हुआ इसके बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने 1923 में अस्पताल बनाने के लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया चैरिटेबल ट्रस्ट का निर्माण करवाया जिसमें उन्होंने उसे समय 40 लाख़ रुपए जमा करवाएं।
1923 में रखी अस्पताल की नीव।
कोलकाता से फतेहपुर आने के बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने 6 एकड़ जगह लेकर उसमें अस्पताल बनाने की नींव रखी उसके बाद अस्पताल के सामने ही अपने खुद के रहने के लिए अपनी हवेली की नीव रखी, उस दौर में निर्माण कार्य में लोहे का इस्तेमाल बहुत कम हुआ करता था लेकिन इस अस्पताल में लोहे का भारी भरकम इस्तेमाल किया गया जिसके लिए उस समय की दो बड़ी कंपनी टाटा स्टील और इंडियन आयरन स्टील दोनों कंपनियों ने अस्पताल को लोहा देने के लिए अपने कार्यालय अस्पताल के बाहर खोलकर उनमें मैनेजर बैठाया।
विद्युत सप्लाई के लिए जनरेटर अमेरिका आर्मी से लिया।
1923 के दौर में फतेहपुर में विद्युत के सप्लाई नहीं थी अस्पताल में विद्युत की सप्लाई के लिए अमेरिकन आर्मी से तीन जनरेटर खरीदे गए तो वहीं अस्पताल में विद्युत की फिटिंग का सामान इंग्लैंड से मंगवाया गया और अस्पताल में लगी सभी टाइल इटली से मंगवाई गई।
जर्मन से मंगवाया ऑपरेशन का सामान।
अस्पताल में ऑपरेशन और डॉक्टर के उपकरण के लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने अस्पताल के डॉक्टर बद्री नारायण शर्मा को जर्मन भेजा वहां से अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सारी मशीन और उपकरण खरीद कर लाए गए।
अस्पताल में इलाज खाना ऑपरेशन सब था फ्री।
अस्पताल शुरू होने के बाद अस्पताल में मरीज के लिए इलाज ऑपरेशन की सुविधा खाना और रहने की सुविधा के अलावा मरीज के साथ आने वाले एक व्यक्ति के खाने पीने और रहने की सुविधा भी फ्री थी इसके अलावा अस्पताल में भर्ती मरीजों को अच्छे दूध मिले इसके लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने अस्पताल के पास ही एक गौशाला भी बनवाई।
100 बेड का अस्पताल बनाया।
आसपास के क्षेत्र में अस्पताल नहीं होने को देखते हुए सेठ ज्वाला प्रसाद उस दौर में 100 बेड का अस्पताल बनवाया जिसमें 6 बड़े वार्ड सहित डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ के रहने के लिए अस्पताल में ही
उनके क्वार्टर भी बनवाए
अस्पताल के सर्जन डॉक्टर को जब खुद मुख्यमंत्री ने बुलाया।
जयपुर से बीकानेर के बीच भरतीया हॉस्पिटल एकमात्र बड़ा हॉस्पिटल था जहां ऑपरेशन हुआ करते थे ऐसे में उस समय के तत्कालीन सरकार के मुखिया मोहनलाल सुखाड़िया अस्पताल से पहले ही तीन मेडिकल सर्जन डॉक्टर को जयपुर ले जा चुके थे ऐसे में उस समय के डॉक्टर इंद्रनाथ सोबती को ले जाने का समाचार जब ज्वाला प्रसाद भरतीया को दिया तो सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने मुख्यमंत्री को जवाब देते हुए कहा कि आप चाहो तो मेरी हवेली की रजिस्ट्री बनवा लो लेकिन मैं डॉक्टर इंदर नाथ सोबती को यहां से नहीं ले जाने दूंगा।
Dr. सोबती के जाने के बाद बंद हुआ अस्पताल का दौरा।
डॉक्टर इंदर नाथ सोबती ने 1985 तक अस्पताल में अपनी बेहतर सेवाएं दी यहां तक जयपुर से भी लोग अपना ऑपरेशन करवाने के लिए उनके पास आते थे लेकिन 1974 में डॉक्टर शोभती अस्पताल छोड़ जयपुर और फिर जयपुर से अमेरिका शिफ्ट हो गए इसके बाद अस्पताल बंद हो गया।
परिवार का सपना हुआ फिर से साकार।
सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया के पौत्र राधेश्याम भरतीया ने कहा कि हमारे दादा ने फतेहपुर के आम जन को चिकित्सा का लाभ प्राप्त हो इसके लिए अस्पताल का निर्माण करवाया था लेकिन किसी कारण वंश अस्पताल कई सालो पूर्व बंद हो गया जिसे 2025 में सरकार के साथ एमओयू करके दोबारा शुरू किया गया था यह हमारे भरतीया परिवार के लिए एक सुनहरे सपने से कम नहीं है।
PARAG AGRAWAL - AI STARTUP
PARAG AGRAWAL - AI STARTUP
कभी ट्विटर के सीईओ रहे पराग अग्रवाल एक बार फिर टेक्नोलॉजी जगत में चर्चा का विषय बने हुए हैं। 2022 में एलन मस्क द्वारा ट्विटर के अधिग्रहण के बाद उन्हें कंपनी छोड़नी पड़ी थी। उस समय कई लोगों ने सोचा था कि यह उनके करियर का सबसे बड़ा झटका साबित होगा, लेकिन पराग ने इसे एक नए अवसर में बदल दिया।
ट्विटर से बाहर निकलने के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर केंद्रित किया और Parallel Web Systems नामक स्टार्टअप की शुरुआत की। आज यह कंपनी तेजी से उभरती हुई एआई कंपनियों में गिनी जा रही है। हाल ही में कंपनी ने बड़ी फंडिंग हासिल की है, जिसके बाद इसका मूल्यांकन करीब 2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है।
कंपनी ऐसी तकनीक विकसित कर रही है जो एआई एजेंट्स को इंटरनेट से रियल-टाइम जानकारी प्राप्त करने, उसे समझने और जटिल कार्यों को पूरा करने में सक्षम बनाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की एआई तकनीकों में इस तरह के समाधान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पराग अग्रवाल की कहानी यह दिखाती है कि करियर में आने वाला एक बड़ा बदलाव हमेशा अंत नहीं होता। कभी-कभी वही चुनौती नई शुरुआत और असाधारण सफलता का रास्ता भी बन जाती है।
Aisshpra Gems and Jewels
Aisshpra Gems and Jewels
ऐशप्रा जेम्स एंड ज्वेल्स(Aisshpra Gems and Jewels) भारतीय बाजार में एक विश्वसनीय ज्वेलरी ब्रांड है, जो पिछले कई वर्षों से ग्राहकों के दिलों में अपना स्थान बनाए हुए है. वह अपनी सिंपल लेकिन क्रिएटिव डायमंड डिज़ाइन के लिए ज्यादा प्रसिद्ध है. लेकिन क्या आपको मालूम है कि हीरे के आभूषण का कारोबार करने वाले इस कंपनी की शुरूआत जरी-गोटा के किराए के दुकान से हुई थी?
जरी-गोटे का काम करने वाले बाद में चांदी के आइटम्स बेचने लगे. बढ़ती मांग और ग्राहक का बढ़ता भरोसा देखते हुए इन्होंने अपने कलेक्शन में गोल्ड ज्वेलरी को भी जोड़ा. ऐशप्रा जेम्स एंड ज्यूल्स की इसी गुणवत्ता को देखते हुए गोरखपुर के निवासी बालकृष्ण और उनके बड़े भाई गोपी कृष्ण ने मिलकर उत्तर प्रदेश में ब्रांड ज्वेलरी शोरूम की स्थापना की. आज कंपनी एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हो चुकी है.
आइए आज की ब्रांड स्टोरी में जानते हैं, जरी-गोटा बेचने वाले किराए की दुकान से सफर शुरू करते हुए हीरे का कारोबार करने वाली ऐशप्रा जेम्स एंड ज्यूल्स ब्रांड की कामयाबी की कहानी.
ऐशप्रा यानी ऐश्वर्य और प्रगति
ऐशप्रा जेम्स एंड ज्यूल्स ब्रांड की शुरुआत 1940 में हुई थी. ऐशप्रा शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ऐश्वर्य और प्रगति. यह नाम रखने के पीछे कंपनी का उद्देश्य था कि कि ग्राहकों का ऐश्वर्य बढ़े, जिससे उनके साथ-साथ ब्रांड की भी प्रगति हो. यह ब्रांड हरि प्रसाद गोपी कृष्ण सराफ ग्रुप का वेंचर है. हरि प्रसाद गोपी कृष्ण सराफ ग्रुप को उनके पिता बालकृष्ण और उनके बड़े भाई गोपी कृष्ण ने मिलकर शुरू किया था.
82 साल पहले, बालकृष्ण और गोपी कृष्ण ने मिलकर 100 वर्गफीट का एक किराए का स्टोर खरीदा. इसमें उन्होंने जरी-गोटा का कारोबार शुरू किया. धीरे-धीरे इसमें सोने और चांदी के आइटम्स जैसे पायल, बिछिया आदि भी जुड़ने लगें. ग्राहकों की मांग को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ब्रदर्स ने अपने कलेक्शन में अन्य कई ज्वेलरी को भी जोड़ा. साल 1990 के आसपास ऐशप्रा ने अपने क्लेकेशन में डायमंड ज्वेलरी को एड किया.
ग्राहकों से मिला अच्छा रेस्पॉन्स
गोरखपुर और उसके आसपास के इलाके में उस वक्त डायमंड ज्वेलरी एक नई चीज थी. इसके बाद ऐशप्रा ने बायबैक गारंटी और सर्टिफिकेशन के साथ डायमंड ज्वेलरी को प्रमोट करने का फैसला किया. प्रमोशन के दौरान उन्हें ग्राहकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली. नतीजतन साल 1995 में कंपनी ने किराए पर लिए गए 100 वर्गफीट के स्टोर को पूरी बिल्डिंग समेत खरीद लिया.
अब ऐशप्रा ब्रांड का कारोबार 10000 वर्गफीट के शोरूम से चल रहा है. वर्तमान में ब्रांड को इसकी दूसरी व तीसरी पीढ़ी संभाल रही है. ऐशप्रा के डायरेक्टर अनूप सराफ हैं, जिनके कार्यकाल में नए मार्केट में ब्रांड का नया ज्वेलरी शोरूम 10000 वर्गफीट में बनकर तैयार हुआ है.
कंपनी ने हासिल किए कई पुरस्कार
देश के सात विभिन्न शहरों में ऐशप्रा ज्वेलरी ब्रांड की 8 स्टोर से कंपनी की सक्रिय उपस्थिति है. इस तरह से यह पूरे उत्तर भारत में अपना खुद का ब्रांड शुरू करने वाले पहले रिटेल विक्रेता बन गए हैं. ऐशप्रा को 20 राष्ट्रीय और 2 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है. ऐशप्रा के Jewelry दिखने में हलके और पहनने में एक नया लुक देते है. इनकी बनाई गई डिज़ाइन नए भारत की आधुनिकता को दर्शाती है. इसे पहनकर लोग अत्यधिक आकर्षित लगते हैं
FORCE MOTORS - FIRODIYA GROUP
FORCE MOTORS - FIRODIYA GROUP
काफी विदेशी चीजें हम भारतीयों के बिना अधूरी हैं। अब आप BMW, रोल्स-रॉयस और मर्सिडीज बेंज जैसी कारों को ही देख लें। इन विदेशी कारों के इंजन भारतीय कंपनी फोर्स मोटर्स बनाती है। इस कंपनी के मालिक दौलत के मामले में काफी अमीर हैं। जानें कितनी है इनकी नेटवर्थ:
आपने BMW, रोल्स-रॉयस और मर्सिडीज बेंज जैसी विदेशी कारों के नाम सुने होंगे। ये कारें इतनी महंगी होती हैं कि आम आदमी के लिए इन्हें खरीदना एक सपने जैसा होता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन विदेशी कारों का इंजन कोई विदेशी कंपनी नहीं, बल्कि भारत की कंपनी फोर्स मोटर्स ( Force Motors ) बनाती है। वही फोर्स मोटर्स जो वैन, पिकअप ट्रक, एसयूवी आदि वाहन बनाती है। कंपनी के चेयरमैन अभय फिरोदिया ( Abhay Firodia ) हैं। अमीरी के मामले में भी 79 साल के अभय फिरोदिया काफी आगे हैं।
फोर्स मोटर्स की स्थापना अभय फिरोदिया के दिवंगत पिता नवलमल फिरोदिया ने साल 1958 में की थी। साल 1975 में अभय ने कंपनी की जिम्मेदारी संभाली। महाराष्ट्र में जन्में अभय फिरोदिया ने अपनी स्कूली शिक्षा मध्य प्रदेश के ग्वालियर से पूरी की। कंपनी संभालने के बाद वह 2009 तक फर्म के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) थे, इसके बाद उन्होंने अपने बेटे प्रसन्न को कारोबार सौंपने का फैसला किया। वह अब कंपनी के अध्यक्ष पद को संभाल रहे हैं।
निवेश से आता है संपत्ति का अधिकांश हिस्सा
फिरोदिया ने बड़ा हिस्सा बजाज ऑटो समेत बजाज ग्रुप की दूसरी कंपनियों में किया हुआ है। ऐसे में उनकी संपत्ति का ज्यादातर हिस्सा इसी निवेश से आता है। इस समय फोर्स मोटर्स का मार्केट कैप करीब 11 हजार करोड़ रुपये है। फोर्स मोटर्स को पहले बजाज टेंपो के नाम से जाना जाता था जो बजाज परिवार के साथ इसके संयुक्त उद्यम की उत्पत्ति को दर्शाता है। इसकी स्थापना उनके दिवंगत पिता नवलमल फिरोदिया ने 1958 में की थी, जो 1968 में एक झगड़े के बाद बजाज परिवार से अलग हो गए थे।
कितनी है अभय फिरोदिया की संपत्ति?
फोर्ब्स के अनुसार अभय फिरोदिया की संपत्ति 4.6 बिलियन डॉलर (करीब 39 हजार करोड़ रुपये) है। यह दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में 715वें स्थान पर हैं। वहीं फोर्ब्स की भारत के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट की बात करें तो यह 66वें नंबर पर हैं। यह लिस्ट साल 2023 के आधार पर है। वह फोर्स मोटर्स के अध्यक्ष के साथ-साथ वह ऑटो पार्ट्स फॉर्म जय हिंद इंडस्ट्रीज के भी प्रमुख हैं।
ऐसी है फोर्स मोटर्स की स्थिति
फोर्स मोटर्स के एक शेयर की कीमत इस समय 8290 रुपये है। शुक्रवार को इसमें 1.85% की तेजी देखी गई थी। पिछले 6 महीने में कंपनी ने निवेशकों को 45 फीसदी का मुनाफा दिया है। वहीं एक साल का रिटर्न करीब 137 फीसदी है। यानी कंपनी ने एक साल में निवेशकों का पैसा दोगुने से काफी ज्यादा कर दिया है। फोर्स मोटर्स ने कुछ समय पहले चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे पेश किए थे। इसमें कंपनी को तिमाही के आधार पर 69 फीसदी का फायदा हुआ है।
SINGHANIYA FAMILY - PADAMPAT SINGHANIYA
SINGHANIYA FAMILY - PADAMPAT SINGHANIYA
जुग्गीलाल कमलापत सिंघानिया परिवार अग्रवाल समुदाय से है। उनका गोत्र सिंघल है । कानपुर में अपना इंडस्ट्रियल साम्राज्य शुरू करने से पहले इस परिवार की जड़ें राजस्थान के शेखावाटी इलाके सिंघाना गांव से जुड़ी हैं।
सिंघाना राजस्थान के शेखावाटी इलाके के झुंझुनू जिले में आता है। यह छोटा सा शहर मशहूर सिंघानिया परिवार का पैतृक घर है, जो बाद में कानपुर चले गए और भारत के सबसे बड़े इंडस्ट्रियल ग्रुप्स में से एक, जे. के. ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना की।
इस यशस्वी परिवार में सर पदमपत सिंघानिया का जन्म 3 फरवरी 1905 को कानपुर में एक प्रमुख मारवाड़ी परिवार में हुआ था, वह लाला कमलापत सिंघानिया के पुत्रों में से एक थे ।
वह जेके मिल्स के अध्यक्ष थे, जो जे के संगठन का हिस्सा था। उन्हें 1943 के नए साल के सम्मान की सूची में नाइट की उपाधि दी गई थी, और 23 फरवरी को नई दिल्ली में वाइसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में भारत के वायसराय, मार्क्वेस ऑफ लिनलिथगो द्वारा नाइटहुड के साथ नवासा गया था।
1947 में स्वतंत्रता के बाद, वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य बने और भारतीय संविधान के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक थे, लेकिन उन्होंने राजनीति में प्रवेश नहीं करने का विकल्प चुना।
व्यवसाय और जेके ग्रुप का विस्तार
पद्मपत सिंघानिया ने मात्र 16 वर्ष की आयु में स्वदेशी आंदोलन की भावना से प्रेरित होकर नवस्थापित 'जेके कॉटन स्पिनिंग एंड वीविंग मिल्स' में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालनी शुरू कर दी थीं। अपने पिता के निधन के बाद, उन्होंने जेके ऑर्गनाइजेशन के व्यवसाय का बहुत तेजी से और सफल विस्तार किया。
दूरदर्शिता: उन्होंने माना था कि सच्ची स्वतंत्रता का रास्ता औद्योगिक मुक्ति से होकर गुजरता है
एफ़आईसीसी अध्यक्ष: वे 1935-1936 के दौरान भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (FICCI) के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष चुने गए थे
स्वतंत्रता संग्राम और राजनीति
पद्मपत सिंघानिया एक सच्चे राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता सेनानी थे। 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' के चरम पर, उन्होंने और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने देश की स्वतंत्रता में अपना सक्रिय योगदान दिया
संविधान सभा के सदस्य: उन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण में अपना योगदान दिया और भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) के सदस्य भी रहे。उन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई और उस पर हस्ताक्षर भी किए
सामाजिक कार्य और परोपकार
व्यापार के साथ-साथ वे एक परोपकारी व्यक्ति भी थे। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति के उत्थान के लिए कई संस्थाओं और ट्रस्टों की स्थापना की。उनके द्वारा शुरू किए गए शिक्षण संस्थान (जैसे सर पद्मपत सिंघानिया स्कूल और जेके स्कूल) आज भी देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में गिने जाते हैं
वे हमेशा समाज के कल्याण के बारे में सोचते थे। उनका मानना था कि मुनाफे का एक हिस्सा समाज के लिए जाना चाहिए। वे न्यास में विश्वास करते थे, कि आप समाज की संपत्ति के मालिक नहीं बल्कि संरक्षक हैं। आप भाग्यशाली हैं कि आपको एक व्यवसाय की देखभाल करने का दायित्व मिला है। वे कहा करते थे कि लोग आपके पास इसलिए आते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि आप उनकी मदद करने में सक्षम हैं।
व्यापारिक घरानों के बारे में वह धारणा अब पहले जैसी नहीं रही।
हर कारोबारी घराना ऐसा नहीं होता। कानपुर में भी कई धनवान कारोबारी घराने हैं; कहा जाता है कि सर पदमपत सिंघानिया के अलावा किसी और ने उनकी कोई संपत्ति बनवाई हो। इसीलिए कानपुर के लोग उन्हें याद करते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई समूह समाज के बारे में कितना सोचता है। यह आपके संस्कारों की बात है । हर कोई परोपकार में विश्वास नहीं रखता।
लेकिन लोकप्रिय संस्कृति में छवि अलग थी। 1970 और 80 के दशक में, लगभग हर अच्छे कपड़े पहने हुए सभ्य बॉलीवुड खलनायक को सिंघानिया कहा जाता था।
ब्रिटिश शासन के दौरान व्यवसाय चलाना आसान था।
सर पदमपत सिंघानिया ने जिस तेज़ी से एक के बाद एक कारोबार शुरू किए, उससे तो लगता है कि यह ज़्यादा मुश्किल नहीं था। उस समय लाइसेंसिंग का कोई सिस्टम नहीं था। इसे आज़ादी मिलते ही लागू किया गया। लेकिन हां, कारोबार स्थापित करना मुश्किल हो गया। फिर भी, पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के ज़माने में हालात इतने मुश्किल नहीं थे, क्योंकि भ्रष्टाचार नहीं था। भ्रष्टाचार 70 के दशक में जड़ पकड़ने लगा और उसके बाद हालात कभी पहले जैसे नहीं रहे। सर पदमपत सिंघानिया ने एक सीमेंट प्लांट स्थापित किया। उसमे क्षमता से कहीं अधिक उत्पादन किया। उन्होंने अपने प्रबंधकों को बधाई दी, लेकिन उन्हें एमआरटीपीसी से कारण बताओ नोटिस मिला, जिसमें पूछा गया था कि हमने क्षमता से अधिक उत्पादन क्यों किया। उसी समय उन्हें उद्योग मंत्रालय से प्रशंसा पत्र मिला, क्योंकि उस वर्ष सीमेंट की कमी थी और उन्होंने समय की मांग को पूरा करने के लिए सराहनीय कार्य किया था।
सर पदमपत सिंघानिया हमेशा अलमारी में एक साथ केवल चार जोड़ी कमीज़ और पतलून रखते थे और पेंसिल का इस्तेमाल तब तक करते थे जब तक उन्हें पकड़ना मुश्किल न हो जाए।
देश की आजादी के बाद उन्होंने हर संभव औधौगिक क्षेत्र को बढ़ावा देने का कार्य किया। वर्तमान में उनका परिवार " सिंघानिया परिवार " के नाम से जाना जाता है। 18 दिसंबर 1979 को उनका निधन हो गया।
वर्ष 2005 में सर पदमपत सिंघानिया की स्मृति में भारतीय डाक सेवा द्वारा " डाक टिकट " जारी किया गया। वर्ष 2008 में जे. के. समूह द्वारा उदयपुर में उनके नाम पर " सर पदमपत सिंघानिया विश्विद्यालय" की स्थापना की गई है।
Tuesday, June 30, 2026
रामजन्मभूमि आंदोलन की अग्रवाल विभूतियां
रामजन्मभूमि आंदोलन की अग्रवाल विभूतियां
महाराज अग्रसेन का जन्म मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के पुत्र कुश के वंश में प्रतापनगर के राजा वल्लभसेन के घर में हुआ था। अग्रभागवत के अनुसार परम शुद्ध इक्ष्वाकु वंश में द्वापर के अंत में महाराज अग्रसेन के जन्म हुआ था। महाराज अग्रसेन वंशकर राजा थे। (अर्थात जिनके नाम पर उनके वंशजों के जाना जाए) इसीलिए महाराज अग्रसेन के वंशज अग्रवाल कहलाते हैं। रामजन्मभूमि आंदोलन में अग्रवालों की अहम भूमिका थी उन्हीं में से कुछ अग्रकुल वंशजों का नाम नीचे उल्लेखित किया है-
◆ हिंदुत्व पुरोधा श्रद्धेय श्री अशोक सिंहल -
माननीय अशोक सिंहल जी ने विश्व के सबसे बड़े आंदोलन राम जन्मभूमि आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। अशोक सिंघल जी रामजन्मभूमि आंदोलन के हनुमान थे। उन्होंने राम जन्म भूमि न्यास के नाम से ट्रस्ट की स्थापना की थी। क्या आप जानते हैं की वो कोई बाबा या साधु नहीं बल्कि IIT BHU से पासआउट इंजीनियर थे लेकिन उन्होंने अपने जीवन में प्रण लिया था की वो हिंदुओं के मस्तक पर जो कलंक लगा है (बाबरी मस्जिद) उसे मिटाकर ही दम लेंगे। उन्होंने सर्व प्रथम 1989 में एक ईंट अपने सर पर रखकर राम जन्मभूमि आंदोलन का शिलान्यास किया और उसी के ठीक 30 वर्ष पश्चात सुप्रीम कोर्ट से राम जन्मभूमि आंदोलन के पक्ष में फैसला आया।
अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में विहिप ने पूरे देश में बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित की जिसमें अशोक जी की तेजस्वी वाणी से लोगों में जोश भरा। अशोक सिंघल जी ने अपना पूरा जीवन राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया था। ये रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान कई बार पुलिस की लाठियों से घायल हुए लेकिन उन्होंने अपनी राम जन्मभूमि के प्रति लगन कम नहीं होने दी। जब तथाकथित हिंदूवादी लोगों ने भी रामजन्मभूमि आंदोलन से अपना पल्ला झाड़ लिया था तब भी अशोक सिंहल जी अपनी अंतिम सांस तक रामजन्मभूमि आंदोलन के साथ बने रहे।
◆ नित्यलीलालीन हनुमान प्रसाद पोद्दार 'भाई जी'-
अयोध्याधाम में जो भगवान श्री रामलला सरकार का विग्रह है उसका निर्माण स्वयं भाई जी ने अष्टधातु में करवाया था। 1949 में जब श्रीरामलला सरकार का प्राकट्य हुआ था उसमें श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की महती भूमिका थी। पोद्दार जी ने जन्मभूमि के वास्तविकता को साबित करने के लिए बहुत ही तथ्यपूर्ण ढंग अपने कल्याण में "रामजन्मभूमि अंक" निकाला था।कल्याण पत्रिका उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ करता था।कांग्रेस को इसकी भनक लगी उसने कल्याण के 'रामजन्मभूमि ' अंक पर बैन लगा दी साथ में उसके मूलप्रति को भी जब्त कर लिया था। उन्होंने कल्याण पत्रिका में खुल कर राम जन्म भूमि के पक्ष में रिपोर्टिंग की थी।
◆ रामलला के सखा देवकीनंदन अग्रवाल जी -
इन्होंने श्री रामलला सरकार के विग्रह को जन्मभूमि का पैरोकार बनाने के लिए कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया था और कोर्ट में खुद को रामलला सरकार के निकटतम मित्र के तौर पर पेश किया था। हिंदू मान्यताओं के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति एक जीवित इकाई है और अपना मुकदमा लड़ सकती है। लेकिन प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति नाबालिग मानी जाती है, इसलिए उनका मुकदमा लड़ने के लिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। न्यायालय ने रामलला का मुकदमा लड़ने के लिए देवकीनंदन अग्रवाल को रामलला के अभिन्न सखा के रूप में अधिकृत किया। न्याय प्रक्रिया संहिता की धारा 32 मानती है कि विराजमान ईश्वर (मूर्ति) को एक व्यक्ति माना जाता है। उसे एक व्यक्ति मानकर पक्षकार बनाया जा सकता है। इससे जन्मभूमि परिसर में फालतू में दावा करने वालों और मंदिर निर्माण में बाधा डालने वालों को रोका गया।
◆ सीताराम गोयल जी और रामस्वरूप अग्रवाल जी -
सीताराम गोयल जी का मंदिर आंदोलन में अद्वितीय योगदान था। सीताराम गोयल जी ने भारत भर में आक्रान्ताओं द्वारा तोड़े गए मंदिरों की पूरी सूची, तथ्यों और तस्वीरों के साथ संकलित की थी, व इसमें सप्रमाण सभी तोड़े गए मंदिरों की पूरी डिटेल हिन्दू समाज के सामने रखी थी, जिसमें अयोध्या का श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर भी था।
◆ चम्पत राय जी -
बहुत कम लोग जानते हैं चम्पत राय जी को जो आज कल रामजन्मभूमि न्यास का कुशलतापूर्वक संचालन व सब व्यवस्थओं की देखरेख कर रहे हैं। वे हमेशा से जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले संघ के प्रचारक रखे हैं जिन्होंने पूरा जीवन रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए खपा दिया। वे अशोक सिंघल जी के राइट हैंड माने जाते थे इससे उनके योगदान का अंदाजा हो जाता है।
◆ जय भगवान गोयल जी - अग्रवंशी जय भगवान गोयल वो शेरदिल शख्शियत जिसने सबसे पहले नेशनल टेलीविजन पर स्वीकारा की हाँ हमने तोड़ी थी बाबरी मस्जिद जो प्रतीक थी गुलामी की। इन्होंने कोर्ट में ये कहा था कि वह ढांचा मैंने ढहाया जो सजा देनी है मुझे दो।
◆ पवन सिंहल जी -
ये अशोक सिंघल जी के भतीजे हैं और 5 अगस्त को अयोध्या में होने वाले भूमिपूजन के मुख्य यजमान है। पवन जी बहुत धार्मिक हैं और ये स्वयं का वेद विश्वविद्यालय भी चलते हैं।
उपरोक्त जन्में सभी साकेतवासी महापुरुषभगवान् राम के वंशज थे। इन सभी का जन्म अग्रोहानरेश महाराज अग्रसेन की कुलपरम्परा में हुआ था। लाखों अग्रवाल व्यापारी और उद्योगपतियों ने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए तन-मन-धन तीनों से सहयोग किया... विहिप के पूर्व अध्यक्ष और भारत के जाने माने उद्योगपति श्री विष्णु हरि डालमिया तो आजीवन रामजन्मभूमि मंदिर के कोषाध्यक्ष बने रहे और आंदोलन को आर्थिक सहायता प्रदान की। कहते हैं बाबरी मस्जिद को ढहाने के बाद सर्वाधिक अग्रकुल वंशजों की गिरफ्तारी हुई थी। इस तरह अनेकों अग्रवालों ने अपने बलिदान से खुद को श्री राम का वंशज होना चरितार्थ किया।
Monday, June 29, 2026
KASHI PRASAD JAYASWAL - A GREAT HISTORIAN
KASHI PRASAD JAYASWAL - A GREAT HISTORIAN
#काशी_प्रसाद_जायसवाल (Kashi Prasad Jayaswal) भारत के महान इतिहासकार, पुरातत्वविद् और वकील थे। उनका जन्म 27 नवंबर 1881 को उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में हुआ था और 4 अगस्त 1937 को उनका निधन हुआ। उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास और राजनीतिक व्यवस्था पर महत्वपूर्ण शोध किया।
उनके प्रमुख महान कार्य:
1. प्राचीन भारत की लोकतांत्रिक परंपरा को सामने लाना
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "Hindu Polity" में उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में गणराज्य और प्रतिनिधि शासन की मजबूत परंपरा थी। उन्होंने वैशाली जैसे प्राचीन गणराज्यों के अध्ययन से भारतीय राजनीतिक इतिहास को नई दिशा दी।
2. भारतीय इतिहास लेखन में बड़ा योगदान
उनकी पुस्तक "History of India, 150 A.D. to 350 A.D." प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
3. पुरातत्व और शोध को बढ़ावा दिया
उन्होंने #बिहार की प्राचीन धरोहरों, इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शोध संस्थाओं के विकास में योगदान दिया।
4. बिहार और भारतीय संस्कृति के लिए योगदान
उन्होंने #Bihar_and_Orissa_Research_Society की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे बिहार के इतिहास और संस्कृति पर वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा मिला।
5. #महत्वपूर्ण_पुस्तकें_और_लेखन
उनकी प्रमुख रचनाओं में:
Hindu Polity
History of India 150 A.D. to 350 A.D.
An Imperial History of India
A Chronology and History of Nepal
शामिल हैं।
आज भी उनके नाम पर पटना में #Kashi_Prasad_Jayaswal_Research_Institute कार्यरत है, जो इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में शोध करता है।
काशी प्रसाद जायसवाल भारत के सबसे प्रसिद्ध शोधकर्ता, इतिहासकार, विचारक, लेखक और अधिवक्ताओं में से एक हैं।
THERMOCOOL - RAJEEV GUPTA
THERMOCOOL - RAJEEV GUPTA
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के एक छोटे से गांव सपनावत से निकले राजीव कुमार गुप्ता की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मानते हैं। एक समय ऐसा था जब राजीव की जेब में पैसे तक नहीं होते थे और वे अपने पिता की छोटी सी किराना दुकान पर हाथ बंटाते थे। लेकिन कुछ बड़ा करने के अटूट जज्बे के साथ उन्होंने साल 1992 में 'थर्मोकूल होम अप्लायंसेज' (Thermocool) की नींव रखी।
एक पहली पीढ़ी के उद्यमी (First-generation Entrepreneur) के रूप में उनके पास सीमित संसाधन थे और बाजार में बड़े ब्रांड्स का दबदबा था। शुरुआत में केवल एयर कूलर और पंखे बनाने वाली इस कंपनी ने गुणवत्ता और ग्राहकों के भरोसे के दम पर धीरे-धीरे अपना विस्तार किया। आज थर्मोकूल वाशिंग मशीन, गीजर, एलईडी टीवी और रेफ्रिजरेटर जैसे बेहतरीन प्रोडक्ट्स बना रही है और इसका टर्नओवर करीब ₹285 करोड़ से ₹300 करोड़ के आंकड़े को छू चुका है।
AMIT LAKHOTIA PARK PLUS
AMIT LAKHOTIA PARK PLUS
भारत के शहरों में वाहनों की पार्किंग की एक बहुत बड़ी समस्या है. लोगों को अक्सर अपनी कार पार्क करने में समस्या आती है. लोगों को अच्छा खासा समय इसमें जाया हो जाता है. आज हम आपको ऐसे शख्स के बारे में बताएंगे जो कार पार्किंग की समस्या से जूझता था लेकिन एक दिन उसने इस समस्या का समाधान करने का संकल्प लिया और पार्क प्लस नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया.
आज लाखों लोग पार्क प्लस की मदद से बिना समय गंवाए अपनी कार पार्क कर लेते हैं. इससे इनका काफी समय बर्बाद होने से बच जाता है. आज हम आपको बताएंगे कैसे कॉरपोरेट की नौकरी छोड़कर अमित लाखोटिया ने पार्क प्लस की शुरुआत की और कुछ ही समय में स्टार्टअप काफी लोकप्रिय हो गया.
कैसे हुई पार्क प्लस की शुरुआत?
पार्क प्लस की बात करें तो ये एक मोबाइल बेस्ड ऐप प्लेटफॉर्म है. इसके फाउंडर अमित लाखोटिया हैं, जिन्होंने साल 2019 में पार्क प्लेस प्लेटफॉर्म की स्थापना की. अमित की बात करें उन्हें गुरुग्राम स्थित एक कॉर्पोरेट ऑफिस में पार्किंग ढूंढने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती थी. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें ऑफिस में पार्किंग के लिए जगह नहीं मिलती थी.
Park Plus Success Story: पार्किंग में दिक्कत आई तो एक आइडिया से लाखों लोगों की समस्या की दूर
पार्क प्लस की बात करें तो ये एक मोबाइल बेस्ड ऐप प्लेटफॉर्म है. इसके फाउंडर अमित लाखोटिया हैं, जिन्होंने साल 2019 में पार्क प्लेस प्लेटफॉर्म की स्थापना की.
Park Plus Success Story: पार्किंग में दिक्कत आई तो एक आइडिया से लाखों लोगों की समस्या की दूर
भारत के शहरों में वाहनों की पार्किंग की एक बहुत बड़ी समस्या है. लोगों को अक्सर अपनी कार पार्क करने में समस्या आती है. लोगों को अच्छा खासा समय इसमें जाया हो जाता है. आज हम आपको ऐसे शख्स के बारे में बताएंगे जो कार पार्किंग की समस्या से जूझता था लेकिन एक दिन उसने इस समस्या का समाधान करने का संकल्प लिया और पार्क प्लस नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया.
आज लाखों लोग पार्क प्लस की मदद से बिना समय गंवाए अपनी कार पार्क कर लेते हैं. इससे इनका काफी समय बर्बाद होने से बच जाता है. आज हम आपको बताएंगे कैसे कॉरपोरेट की नौकरी छोड़कर अमित लाखोटिया ने पार्क प्लस की शुरुआत की और कुछ ही समय में स्टार्टअप काफी लोकप्रिय हो गया.
कैसे हुई पार्क प्लस की शुरुआत?
पार्क प्लस की बात करें तो ये एक मोबाइल बेस्ड ऐप प्लेटफॉर्म है. इसके फाउंडर अमित लाखोटिया हैं, जिन्होंने साल 2019 में पार्क प्लेस प्लेटफॉर्म की स्थापना की. अमित की बात करें उन्हें गुरुग्राम स्थित एक कॉर्पोरेट ऑफिस में पार्किंग ढूंढने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती थी. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें ऑफिस में पार्किंग के लिए जगह नहीं मिलती थी.
इसके बाद आसपास उन्हें पार्किंग खोजने में 30 मिनट से ज्यादा लग जाते थे. इस वजह से उनका अच्छा खास समय जाया हो जाया करता था. इसलिए एक दिन परेशान होकर उन्होंने इस समस्या का समाधान करने का संकल्प लिया. उन्होंने साल 2019 में पार्क प्लस नाम का वेंचर बनाया. इस वेंचर के जरिए लोगों की पार्किंग की समस्या को दूर करने लगे. काफी कम समय में ये वेंचर लोगों के बीच में लोकप्रिय हो गया और देशभर में इस वेंचर का नाम फैल गया.
पार्क प्लस को मिली 250 करोड़ की फंडिंग
इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पार्क प्लस को 250 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली है. अमित लाखोटिया दावा करते हैं कि पार्क प्लस जैसी सुविधा दुनिया में कहीं भी नहीं है. भारत में ही दुनिया भर में लोग पार्किंग की समस्या से काफी परेशान हैं. अब इस पर भी उनका वेंचर काम कर रहा है.
पार्क प्लस की बात करें तो 20 साख से ज्यादा कार इनके साथ लिस्टेड है. जबकि 50 लाख से ज्यादा फास्टटैग ट्रांजैक्शन पार्क प्लस की ऐप से हो चुके हैं. पार्क प्लस के पास अभी 1 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं. देश में 1.50 लाख पार्किंग लोकेशन पर इनकी सर्विस उपलब्ध है.
2000 में कॉरपोरेट में शुरू की जॉब
अमित लखोटिया ने साल 2000 में कॉरपोरेट में अपनी पहली नौकरी की. साल 2019 में अपना वेंचर शुरू करने से पहले वो , पेटीएम मोबाइल सॉल्यूशंस में वाइस प्रेसिडेंट बिजनेस और मेकमायट्रिप में प्रोडक्ट मैनेजर और बिजनेस हेड जैसे टॉप पदों पर काम कर चुके है. वो गेटमीएकैब डॉट कॉम के फाउंडर और डायरेक्टर भी रह चुके हैं.
अमित लोखाटिया ने बताया कि पार्क प्लस आरएफआईडी टेक्नोलॉजी के माध्यम से स्मार्ट पार्किंग सलूशन उपलब्ध कराती है. पार्क प्लस से लोगों को पता चल जाता है कि किस जगह पर कार पार्किंग के लिए जगह उपलब्ध है और उसकी फीस क्या है? पार्क प्लस की मदद से लोग ट्रैफिक चालान की धनराशि भी चुरा सकते हैं
LT GEN SANDEEP JAIN - लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन
LT GEN SANDEEP JAIN - लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन
लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को सेना के अगले उप प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया है।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन, एवीएसएम, एसएम, दक्षिणी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी-इन-सी) के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त करने के बाद 1 जुलाई 2026 को सेना के उप प्रमुख (वीसीओएएस) का पदभार ग्रहण करने वाले हैं।
13 महार रेजिमेंट के एक अधिकारी, लेफ्टिनेंट जनरल जैन ने 1 अप्रैल 2026 को दक्षिणी कमान के जीओसी-इन-सी के रूप में कार्यभार संभाला, लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ के सेना के उप प्रमुख के रूप में पदोन्नत होने के बाद उन्होंने उनका स्थान लिया।
लेफ्टिनेंट जनरल जैन को 11 जून 1988 को भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ था। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खड़कवासला, रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज (डीएसएससी), वेलिंगटन और राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज, केन्या के पूर्व छात्र हैं।
38 वर्षों से अधिक के अपने विशिष्ट सैन्य करियर में, उन्होंने कई महत्वपूर्ण कमान और स्टाफ पदों पर कार्य किया है। उनकी कमान में जम्मू और कश्मीर में सोलहवीं कोर (व्हाइट नाइट कोर), भारतीय सैन्य अकादमी और दक्षिणी कमान शामिल हैं। सेना प्रमुख बनने से पहले, उन्होंने दक्षिणी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में कार्य किया।
उनके परिचालन अनुभव में सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन में सेक्टर कमांडर के रूप में सेवा देना, स्ट्राइक कोर में एक इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभालना, जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद विरोधी बल का नेतृत्व करना और सैन्य संचालन निदेशालय, सैन्य सचिव शाखा और सेना मुख्यालय में महानिदेशक (क्षमता विकास) के रूप में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करना शामिल है। उन्होंने इथियोपिया में सैन्य पर्यवेक्षक के रूप में भी कार्य किया है।
लेफ्टिनेंट जनरल जैन 1 अगस्त 2024 से महार रेजिमेंट के कर्नल के रूप में कार्यरत हैं, और इस प्रकार भारतीय सेना की सबसे सम्मानित पैदल सेना रेजिमेंटों में से एक के साथ अपना घनिष्ठ संबंध जारी रखे हुए हैं।
उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए, उन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम) और सेना पदक (एसएम) के साथ-साथ कई परिचालन, सेवा और दीर्घ सेवा सम्मानों से सम्मानित किया गया है।
HDFC NEW CHAIRMAN RAJEEV KUMAR
HDFC NEW CHAIRMAN RAJEEV KUMAR
एचडीएफसी बैंक ने पूर्व मुख्य आयुक्त राजीव कुमार को अध्यक्ष नियुक्त किया।
यह नियुक्ति पूर्व अंशकालिक अध्यक्ष अतानु चक्रवर्ती द्वारा 18 मार्च को इस्तीफा देने के तीन महीने से अधिक समय बाद हुई है।
एचडीएफसी बैंक के बोर्ड ने भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अनुमोदित तिथि से प्रभावी तीन वर्ष की अवधि के लिए अंशकालिक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने को मंजूरी दे दी है।
बैंक ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि 66 वर्षीय कुमार, जो 1984 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी और फरवरी 2020 में भारत के पूर्व वित्त सचिव रह चुके हैं, को 30 जून, 2026 से प्रभावी चार साल की अवधि के लिए बैंक के अतिरिक्त निदेशक (स्वतंत्र) के रूप में भी नियुक्त किया गया है।
उनकी नियुक्ति पूर्व अंशकालिक अध्यक्ष अतानु चक्रवर्ती के 18 मार्च को तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देने के तीन महीने से अधिक समय बाद हुई है। चक्रवर्ती ने कहा था कि "बैंक के भीतर कुछ घटनाएं और प्रथाएं मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं"। बैंक को क्लीन चिट देते हुए, विल्सन सोंसिनी गुडरिच एंड रोसाटी, पीसी और वाडिया गांधी एंड कंपनी नामक कानूनी फर्मों ने कहा कि समकालीन साक्ष्य चक्रवर्ती के बयान से मेल नहीं खाते हैं, और फर्मों की समीक्षा में बयान का कोई आधार नहीं मिला।
चक्रवर्ती द्वारा कुछ "घटनाओं और प्रथाओं" का हवाला देते हुए इस्तीफा देने के बाद से बैंक एक नए अध्यक्ष की तलाश में है।
इस बीच, एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक (आरबीआई) और सीईओ के रूप में शशिधर जगदीशन का वर्तमान कार्यकाल 26 अक्टूबर, 2026 को समाप्त होने वाला है। उन्होंने 27 अक्टूबर, 2020 से इस पद पर कार्यभार संभाला था। उनका वर्तमान तीन वर्षीय कार्यकाल (27 अक्टूबर, 2023 से 26 अक्टूबर, 2026) आरबीआई द्वारा 2023 में स्वीकृत किया गया था। उम्मीद है कि बोर्ड आरबीआई की मंजूरी के अधीन जगदीशन को तीसरे कार्यकाल के लिए प्रबंध निदेशक और सीईओ के रूप में नामित करने की सिफारिश करेगा। पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया, जो बाहरी कानूनी समीक्षा लंबित होने के कारण रुकी हुई थी, अब होने की संभावना है क्योंकि कानूनी फर्मों ने बैंक को दोषमुक्त करने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है।
निर्णायक नीति और क्रियान्वयन; प्रमुख निकायों का नेतृत्व किया।
कुमार ने सार्वजनिक उद्यम चयन बोर्ड (पीईएसबी) के अध्यक्ष के रूप में भी संक्षिप्त रूप से कार्य किया। 2017 से 2020 तक वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव के रूप में, उन्होंने ऐसे समय में कार्यभार संभाला जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उच्च स्तर के अमान्य गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए), पूंजी की अपर्याप्तता, नए ऋण से वंचित ऋणदाताओं, अंधाधुंध वित्तीय हेरफेर, इक्विटी और ऋण के डायवर्जन और पुनर्चक्रण जैसी समस्याओं का सामना कर रहे थे। इस क्षेत्र को शासन संबंधी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, जिनमें बड़े संघ, नोटबंदी के बाद सूक्ष्म ऋण की कमी को पूरा करने के लिए संघर्षरत गैर-वित्तीय वित्तीय कंपनियां और नागरिकों को धोखा देने वाली पोंजी योजनाएं शामिल थीं।
उनके डीएफएस में शामिल होने के दो सप्ताह के भीतर ही लगभग 3.38 लाख फर्जी फर्मों के खाते फ्रीज कर दिए गए। इसके बाद अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध अधिनियम, 2019 पारित करके पोंजी योजनाओं पर अंकुश लगाया गया। निर्णायक नीतिगत दिशा-निर्देश और क्रियान्वयन के माध्यम से, उन्होंने एनपीए की पारदर्शी पहचान और प्रावधान को अनिवार्य बनाकर तथा दिवालियापन और दिवालियापन संहिता के ढांचे के तहत उधारकर्ताओं की जवाबदेही को मजबूत करके सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बैलेंस शीट को साफ करने का नेतृत्व किया।
उन्होंने देश की वित्तीय संरचना को आकार देने वाले अधिकांश प्रमुख निकायों का नेतृत्व किया, जिनमें रिजर्व बैंक का केंद्रीय बोर्ड, वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद, वित्तीय क्षेत्र नियामक नियुक्तियों की खोज समिति, कैबिनेट की नियुक्ति समिति के सचिव, सार्वजनिक उद्यम चयन बोर्ड, बैंक बोर्ड ब्यूरो, एसबीआई और नाबार्ड के बोर्ड शामिल हैं। वे केंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे पर एक विशेषज्ञ समिति और नीति आयोग के पुनर्गठन पर एक समिति के भी सदस्य थे।
स्वच्छ बैंकिंग पहल, पीएसडी पुनर्पूंजीकरण
कुमार ने बैंकिंग क्षेत्र को साफ करने के लिए कई पहलें लागू कीं, जिनमें अवैध वित्तीय गतिविधियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई, सहकारी बैंकों की नियामक निगरानी को मजबूत करना और हाई-प्रोफाइल डिफॉल्ट मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करना शामिल था। 50 करोड़ रुपये और उससे अधिक के ऋणों के लिए पासपोर्ट विवरण अनिवार्य कर दिया गया ताकि बड़े उधारकर्ता कार्रवाई होने से पहले भाग न सकें। धोखाधड़ी की जांच, 250 करोड़ रुपये से अधिक के ऋणों की विशेष निगरानी और 34 से अधिक कारकों पर आधारित आईटी-आधारित जोखिम स्कोरिंग ने उन नरम संकेतों की जगह ले ली, जो अक्सर 25 से अधिक बैंकों के बड़े संघों द्वारा दिए जाने वाले ऋण में अंतर्निहित ढीले नियंत्रणों से मुक्त थे।
ऋणदाता-ऋणदाता संबंधों का पूर्णतः पुनर्गठन, जिसमें यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि धन विवेकपूर्ण तरीके से उधार दिया जाना चाहिए और देनदारों को इसे चुकाना होगा।
इस परिवर्तन का एक प्रमुख स्तंभ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) का पुनर्पूंजीकरण था, जिसमें 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डाली गई, जिससे बैंकों की वित्तीय स्थिरता और ऋण देने की क्षमता में सुधार हुआ। इसके साथ ही एक व्यापक समेकन प्रक्
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