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Tuesday, May 19, 2020

Aparajita Bhushan - अपराजिता भूषण

Ramayan Mandodri Aparajita Bhushan Biography in Hindi

Ramayan's Mandodari Aparajita Bhushan Speaks About Her Role ...

अपराजिता भूषण जी का जन्म 09 नवम्बर 1954 को मुंबई में हुआ था। भारत भूषण जी की दो बेटियां थी। बड़ी बेटी का नाम अनुराधा था और अपराजिता जी इनकी छोटी बेटी हैं। अपराजिता जी से ज्यादा लगाव उन्हें अपनी बड़ी बेटी अनुराधा जी से था। क्योंकि अनुराधा जी एब्नॉर्मल चाइल्ड थी। भारत भूषण जी को हमेशा लगता था की उनके ना रहने के बाद अनुराधा जी का जीवन कैसे गुजरेगा। हालाँकि अपराजिता जी की बहन अनुराधा जी को इस दुनिया को अलविदा कहे हुए करीब 10 से 15 साल हो गए हैं। अपराजिता जी कभी एक्ट्रेस नहीं बनना चाहती थी। उनका लगाव शिक्षा और अद्ध्यात्म में ज्यादा रहा। उनकी शादी हो गयी और उस शादी से उनके एक बेटा और एक बेटी हुई। 

भारत भूषण जी उनके पिता थे। इसलिए उनका बचपन किसी राजकुमारी जैसा गुजरा। गाडी, बंगला, नौकर- चाकर सब थे उनके पास। किन्तु किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। भारत भूषण जी का फ़िल्मी करियर ढलान पर आने लगा। भारत भूषण जी की बाहरी लोगों के साथ उठक बैठक कम ही थी। ज्यादातर उनका समय किताबों और संगीत में जाता था। निराशा कभी उनके चेहरे पर नहीं झलकी। और इसी का असर था की उनकी बेटी अपराजिता भूषण जी को उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। जब भारत भूषण जी का करियर ढलान पर आया उसी दौरान अपराजिता जी के पति का देहांत हो गया। इधर पिता जी का समय ठीक नहीं था उधर उनके पति का यूँ चले जाना। बच्चे साथ थे, आखिरकार परिवार तो चलाना ही था। 

इन्होने फिल्मो और धारावाहिकों में डबिंग का काम करना शुरू किया। एक दिन जब ये रामानंद सागर जी के उमर गाँव स्टूडियो में रामायण में डबिंग का काम कर रही थी। तब इन्हे रामानंद सागर जी ने मंदोदरी का किरदार सौंप दिया। इन्हे एक्टिंग नहीं आती थी। इसलिए इन्हे रामानंद सागर जी ने कला के छेत्र में काफी कुछ सिखाया। मंदोदरी के किरदार से इनके जीवन में धनात्मक रूप से परिवर्तन आया। यहाँ से उनकी फ़िल्मी दुनिया में पहचान बन गयी और उन्हें अनेकों फिल्मो और धारवाहिकों में किरदार करने के मौके मिले। 

इन्होने करीब 40 से 50 टेलीविज़न धारावाहिकों और फिल्मों में काम किया। हत्या इनके करियर की पहली फिल्म थी। इन्होने काला बाजार, विश्वात्मा, हत्या, ब्रह्मचारी, महाराज और गुप्त जैसी सुपरहिट फिल्मों में काम किया। वैसे तो ज्यादातर किरदार इन्होने पॉजिटिव ही निभाए। नेगेटिव किरदार की बात करें तो इन्होने दूरदर्शन पर प्रसारित हुए इम्तिहान धारावाहिक में नेगेटिव किरदार निभाया था। वहीँ इन्होने कुछ भोजपुरी फिल्मों में काम तो किया ही और साथ ही साथ कुछ गुजराती फिल्मों में भी काम किया। इसी दौरान उन्होंने पुणे में अपना रहने का ठिकाना बनाया। 

उन्हें कभी अपने नाम की फ़िक्र नहीं हुई और ना ही सोहरत की। वर्ष 1997 में उनकी आखिरी फिल्म गुप्त आयी थी। इस फिल्म के बाद वो वापस पुणे में अपने परिवार के साथ रहने लगी। उनका बेटा कॉर्पोरेट इंडस्ट्री में है तो वहीँ उनकी बेटी एक व्यवसाय चलती हैं। वर्तमान में उनके दोनों बच्चे अच्छे से सेटल्ड हैं। दोनों बच्चों की शादी भी हो चुकी है। 

जैसा हमने पहले बताया की उनकी रूचि पढाई और अद्ध्यात्म में शुरू से रही है। इसलिए जब वो फ़िल्मी दुनिया से पूरी तरह दूर हुई तो उन्होंने स्वतंत्र लेखन में हाथ आजमाया। अगर आपने टाइम्स ऑफ़ इंडिया और नवभारत टाइम्स अख़बार पढ़े होंगे। तो उसमे आपने एक कॉलम देखा होगा स्पीकिंग ट्री का। स्पीकिंग ट्री एक टाइम्स ग्रुप की धार्मिक वेबसाइट है। जहाँ विभिन्न धर्मगुरुओं के लेख आपको मिलते हैं जैसे ओशो, सद्गुरु आदि। उन्ही में से कुछ लेख इनके भी हैं। साथ ही साथ वो कैंप लगा कर उन लोगों की भी मदद करती हैं जो मानसिक रूप से परेशान हैं। फिलहाल उनकी फ़िल्मी दुनिया में कोई रूचि नहीं है। उन्हें अपने लेखन में ही संतुष्टि मिलती है। 

इनके जीवन से हम सबको प्रेरणा लेनी चाहिए की कोई भी घडी हो कितना भी संकट का समय हो हार नहीं मान नई चाहिए। मेहनत करते रहो एक ना एक दिन जरूर मंजिल मिलेगी। 

साभार: biographies.lekhakkilekhni.in/2020/04/ramayan-mandodri-aparajita-bhushan-biography-in-hindi.html

AGROHA A GREAT CITY - "अग्रोहा - खोई हुई सभ्यता और उसका अग्रवालों से संबंध"

"अग्रोहा - खोई हुई सभ्यता और उसका अग्रवालों से संबंध"

भारत में तथ्य और मिथक के बारे में अंतर करना मुश्किल होता है। कभी कभी इतिहास और किवदन्तियां दोनों कभी कभी एक दूसरे से ऐसे गुथे हुए होते हैं, खासकर जब चर्चा समुदायों की चल रही हो। ऐसी ही एक विस्मयकारी किवदंती है सरस्वती नदी के तट पर बसी एक प्राचीन रहस्यमयी नगरी की और जो की भारत के सर्वश्रेष्ठ व्यापारिक समुदायों में से एक अग्रवालों से जुड़ी हुई है।

लेकिन इस मामले में पुरातत्ववेत्ताओं ने किवदंतियों के आधार पर इस खोई हुई नगरी को ढूंढा।


अग्रवाल भारतीय व्यापार पर एकाधिकार सा रखते हैं- छोटे व्यापारियों से लेकर बजाज, जिंदल, रुइया और मित्तल जैसे घरानों तक और नए युग के उद्यमी जैसे ओला के भाविश अग्रवाल और ओयो के रितेश अग्रवाल भी.. और ये सूची लंबी है। अग्रवालों की उत्पत्ति के बारे में एक किवदंती महाभारत काल में महाराज अग्रसेन और उनके गणराज्य अग्रोहा से जुड़ी हुई है।

इस किवदंती के अनुसार आजसे लगभग 5000 वर्ष पर महाराज अग्रसेन आग्रेय गणराज्य, जिसकी राजधानी अग्रोदक थी, पर राज करते थे। वो एक दयालु और प्रजापालक सम्राट थे उन्होंने राज्य में नियम बनाया था की आग्रेय में बसने वाले नवांगतुक को आग्रेय गणराज्य की तरफ से 1 स्वर्ण मुद्रा और एक ईंट दी जाएगी। उस समय अग्रोदक की जनसंख्या 1 लाख थी तो नवांगतुक के पास 1 लाख स्वर्ण मुद्रा और पर्याप्त ईंट हो जाते थे जिससे वो अपना व्यापार स्थापित करे और अपना घर बनाये। अग्रोहा जल्द ही व्यापारियों का समृद्ध राज्य बन गया। कुछ मतों के अनुसार आगरा जिसका प्राचीन नाम अग्रवती था और दिल्ली की अग्रसेन की बावड़ी दोनों महाराज अग्रसेन द्वारा स्थापित हैं।

इस किवदंती के अनुसार महाराज अग्रसेन के 18 पुत्र थे और इन्हीं पुत्रों के 18 गोत्र आज अग्रवाल समाज के 18 गोत्र हैं। गर्ग, गोयल, मित्तल, जिंदल, सिंघल, बंसल, धारण आदि अग्रवालों के गोत्र हैं। महाराज अग्रसेन का राज्य शताब्दियों तक समृद्ध रहा फिर इसका बाहरी आक्रमणों के कारण पतन हुआ जिसके कारण अग्रवाल अपनी जन्मभूमि से निकल कर पूरे विश्व में फैले। 

लेकिन ये सिर्फ एक मौखिक इतिहास था जो पीढ़ियों से अग्रवाल परिवार अपने वंशजों को बताते आरहे थे, इसे प्रसिद्धि तब मिली जब आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिचंद्र, जो स्वयं भी अग्रवाल थे, उन्होंने सन् 1871 में अपनी पुस्तक अग्रवालों की उत्पत्ति में इसका जिक्र किया। इस ग्रंथ से लोगों में अग्रवाल समुदाय के प्राचीन इतिहास के बारे में लोगों की रुचि जगी और इस किवदंती के बारे में पुरात्व शोध शुरू हुए।

शुरुवात में इस बात का अनुमान नहीं था की ये नगरी कहाँ है? कुछ लोगों का दावा था की ये राजस्थान या पंजाब में है तो कुछ लोगों का दावा था की ये आगरा का प्राचीन नाम है। सन 1888-89 में Archaelogical Survey of India (ASI) को हरयाणा के हिसार शहर में अग्रोहा के पास 650 एकड़ में फैली हुक एक दबी हुई सभ्यता के अवशेष मिले। ये विलुप्त हो चुकी घग्गर नदी के तट पर थी। इस टीले की खुदाई तीन स्टेजेज में हुई 1888-89, 1838-39 और अंतिम बार 1879-85. 

पुरातत्वविदों ने जो पाया, वह वास्तव में आश्चर्यजनक था। यह था, जैसे कि प्रत्येक उत्खनन के साथ, टीले ने सबूतों ने उस प्राचीन किवदंती को सही साबित किया। उन कीमती कलाकृतियों से पता चला, कि पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने मिलकर जो सोचा था वो अग्रोदक नामक महान व्यापारिक शहर कैसा रहा होगा। खुदाई से एक अच्छी तरह से नियोजित शहर के अस्तित्व का पता चला, जिसमें एक खाई, ऊंची दीवारें और चौड़ी सड़कें थीं। यहां लोगों के निवास करने के संकेत 4-5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 15 वीं शताब्दी तक मिलते हैं। सदियों से, यह एक महान व्यापारिक शहर था, जो सरस्वती नदी के तट पर, तक्षशिला और मथुरा के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित था।

वास्तव में, उत्खनन से इसकी प्राचीनता साबित हुई थी। ऐसा लगता था कि अग्रोदका पूर्व-हड़प्पा काल से पनप रहा था। इसमें कहानी, ग्रे पॉटरी और बहुत बाद में बौद्ध स्तूप के अवशेष और साथ ही कई मौर्य और शुंग मूर्तियां थीं। साइट के निरंतर कब्जे ने उन समयों के दौरान इसके महत्व को प्रकट किया। अग्रोहा में कई सिक्के पाए गए हैं, जिनमें शिलालेख 'अगोदक अगाका जनपदसा' या 'सिक्कों में अगाका जनपद के सिक्के' हैं। यह अग्रवाल पौराणिक राज्यों के रूप में, अग्रस के एक संपन्न जनपद को प्रकट करता है।

यह क्षेत्र कुषाण के हाथों में पड़ गया और इसके बाद गुप्त शासन आया। इस समय के दौरान, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और साथ ही जैन धर्म यहाँ संपन्न हुआ। शहर का अंतिम ज्ञात संदर्भ 14 वीं शताब्दी में तुगलक शासनकाल से है। मोरक्को के यात्री इब्न-बतूता ने अपने यात्रा  वृत्तांत में खुरासान के छात्रों द्वारा बताई गई एक कहानी दोहराई कि कैसे मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में अकाल के दौरान, उन्होंने अग्रोहा शहर को छोड़ दिया। उन्होंने एक घर में अपना रास्ता बना लिया, जहाँ उन्होंने देखा कि एक आदमी एक मानव पैर खा रहा था जिसे उसने आग पर भुना हुआ था। जियाउद्दीन बरनी ने तारिख-ए-फ़िरोज़ शाही ’में उल्लेख किया कि फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अग्रोहा में परित्यक्त इमारतों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया और हिसार के नए शहर के निर्माण के लिए सामग्री का उपयोग किया। 

इन सबूतों से पता चला की इस लॉस्ट सिटी के वास्तविक निवासी  अग्रवाल थे जो अपनी स्मृति में इस सुंदर और भव्य शहर को बसाये हुए थे। आज अग्रोहा वापस अपनी समृद्धि की ओर बढ़ रहा है। यहां अग्रवालों द्वारा स्थापित महाराज अग्रसेन और देवी महालक्ष्मी के भव्य मंदिर, स्कूल और कॉलेज हैं।

लेख साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल सभा, प्रखर अग्रवाल जी 

Wednesday, May 13, 2020

PRAN - प्राण - प्रसिद्द खलनायक

PRAN - प्राण - प्रसिद्द खलनायक 



बात बुलंद आवाज और ख़ास अंदाज की चले तो अपने विशेष तेवर के लिए विख्यात अभिनेता प्राण (Pran) का नाम खासतौर पर सामने आता है | दिल्ली में कलवार वैश्य परिवार में जन्मे  प्राण (Pran) का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था और उनके पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद एक सरकारी ठेकेदार थे | प्राण खुद भी कम आकर्षक नही थे लेकिन उनकी दिली ख्वाहिश कैमरे के पीछे रहकर फोटोग्राफी करने की ही थी | लाहौर में उन्होंने बतौर फोटोग्राफर भी काम किया लेकिन ये संयोग था कि कैमरे को शायद उनकी शक्लो-सुरत ज्यादा पसंद आ गयी और वो कैमरे के आगे आ गये |

सन 1940 में उन्हें “यमला जट” नाम की पंजाबी फिल्म में पहली बार अभिनय करने का मौका मिला | आवाज ,अंदाज और तेवर के मालिक प्राण की उपस्थिति इतनी सराही गयी की उन्हें लगातार काम मिलता गया | लाहौर में उन्हें ज्यादातर नकारात्मक किरदार ही मिलते थे लेकिन पहली बार दलसुख पंचोली ने हिंदी फिल्म “खानदान” में बतौर नायक मौका दिया | इस फिल्म में उस दौर की मशहूर अदाकारा और गायिका नूरजहाँ उनके संग नायिका बनी थी |

आजादी से पहले तक प्राण (Pran) ने लाहौर में करीब 22 फिल्मो में काम किया लेकिन आजादी और बंटवारे के बाद वो मुम्बई आ गये | यहा संघर्ष का नया सिलसिला शुरू हुआ | चूँकि इससे पहले उनकी छवि खल नायक के तौर पर स्थापित हो चुकी थी लिहाजा उनके पास खलनायक के ही ज्यादातर ऑफर आते गये और वो सबको कुबूल करते गये | इस दौरान उन्होंने ये नही सोचा कि खलनायक का किरदार नफरत करने वाला होता है या प्यार करने वाला | बस किरदार की जिन्दगी को संजीदगी से जीने में विशवास करते लगे |

यही वो खासियत थी कि उनकी अदायगी धीरे धीरे परवान चढती गयी और उनकी तल्लीनता के दर्शक मुरीद होते गये | प्राण जिस किरदार को निभाते उसमे वो पुरी तरह डूब जाते थे | कहते है कि शूटिंग में ब्रेक के दौरान भी वो अपनी ड्रेस नही बदलते थे क्योंकि उनका मानना था कि जब तक ड्रेस में रहना होता है तक तक उस किरदार को वो दिल से महसूस करते रहते है | यह भावना कैमरे के आगे उस चरित्र को निभाने में सहायता पहुचाती है |

प्राण (Pran) के साथ कई फिल्मो में अभिनय कर चुके रजा मुराद के शब्द है “मै समझता हु कि उनके जितना मेहनती , लगनशील और वक्त का पाबन्द कोई इन्सान नही देखा , वे मेकअप करके सुबह नौ बजे ही सेट पर आकर बैठ जाते थे | चूँकि उस समय स्टूडियो सेंट्रली एयर कंडीशन नही होते थे | बहुत गर्मी और उमस होती थी फिर भी प्राण साहब ढाढी .मूंछ लगाकर अपने मोटे costume के समय पर सेट पर पहुच जाते थे | एक शिकन नही होती थी चेहरे पर” |

बाद के दौर उनकी शैली को ओर भी कई कलाकारो ने भी अपनाने की कोशिश की | आंकड़ो के मुताबिक़ प्राण ने करीब 400 फिल्मो में काम किया था | “राम और श्याम” फिल्म में उन्होंने ऐसी चतुर और क्रूर खलनायकी दिखाई कि लोगो ने प्राण से घृणा करना शुरू कर दिया लेकिन सच्चाई तो यह है कि उनके किरदार से की गयी घृणा या नफरत , उनकी अभिनय क्षमता की सफलता की पहचान बनी | प्राण जब तक खलनायक का किरदार निभाते रहे , तब तक उतने ही मशहूर रहे जितने कि चरित्र अभिनेता का किरदार निभाकर |

सबसे पहले राजकपूर ने प्राण को पारम्परिक खलनायकी के घेरे से बाहर निकालने का प्रयास किया था फिल्म “जिस देश में गंगा बहती है (1960) ” से | इस फिल्म में प्राण ने राका डाकू का किरदार निभाया था | प्राण की कडकती आवाज ने राका डाकू का किरदार तो पसंद किया लेकिन दर्शको का प्यार नही मिल सका | इसके बाद मनोज कुमार ने प्राण को “उपकार (1968)” में मंगल चाचा का किरदार देकर खलनायकी के घेरे से पुरी तरह आजाद करा दिया |

मंगल चाचा के किरदार को प्राण (Pran) ने अपने अभिनय कौशल से अमर बना दिया | मनोज कुमार की ज्यादातर फिल्मो में प्राण खलनायक से कही ज्यादा चरित्र भूमिका निभाते थे मसलन “शहीद” , “पूरब और पश्चिम” , “बेईमान” , “सन्यासी” , “दस नम्बरी” , “पत्थर के सनम” आदि | 1973 में एक फिल्म आयी जंजीर | अमिताभ बच्चन की इस पहली हिट फिल्म में शेर खा का किरदार प्राण के निभाये चरित्र किरदारों में सबसे बेहतरीन किरदार माना जाता है | आगे चलकर अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई फिल्मे सफल हुई मसलन “डॉन” , “अमर अकबर अन्थोनी” , “मजबूर” , “दोस्ताना” , “नास्तिक” , “कालिया ” और “शराबी” |

प्राण (Pran) इतने लोकप्रिय थे कि फिल्मो में कास्टिंग के दौरान पर्दे पर सबसे आखिरी में “and PRAN” लिखा आता था ताकि दर्शको को यह नाम अलग से दिखाई दे | कोई संयोग नही कि उनकी इसी अहमियत को देखते हुए उनके जीवन पर पुस्तक का नाम भी “एंड प्राण” रखा गया जिसके लेखक बन्नी रुबेन है | प्राण अकेले ऐसे कलाकार थे जिन्होंने कपूर खानदान की सभी पीढियों के कलाकारों के साथ अभिनय किया है | प्राण अपने दौर के सभी चर्चित नायको चाहे वह दिलीप कुमार हो , देव आनन्द हो या फिर राज कपूर , अपनी खलनायकी के दमखम पर उन्हें बराबरी की टक्कर देते थे |

कई बार तो वो दृश्यों में अभिनेताओ पर भारी पड़ जाते थे | नब्बे के दशक में बाद उन्होंने फिल्म अभिनय के प्रस्ताव अस्वीकार करना शुरू कर दिया | हिंदी सिनेमा में अहम योगदान के लिए 2001 में उन्हें भारत सरकार के पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया | साथ ही साल 1997 में उन्हें फिल्म फेयर के लाइफ टाइम अचीवमेंट खिताब से सम्मानित किया गया | अपने लम्बे फ़िल्मी करियर और शानदार सफलता को देखते हुए साल 2012 का दादा साहब फाल्के सम्मान दिया गया | 12 जुलाई 2013 को इस शानदार अभिनेता ने प्राण त्यागे |

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

1973 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - बेईमान

1970 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - आँसू बन गये फूल

1968 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - उपकार

लेख साभार: biographyhindi.com/pran-biography-in-hindiRajkumar Mali

Tina Munim Ambani- टीना मुनीम अम्बानी

Tina Munim Ambani- टीना मुनीम अम्बानी 

बाहरी दिखावे से परे टीना के भीतर गज़ब का आत्मविश्वास है जो उन्हें सबसे अलग, सबसे बेहतर बनाता है!

मुंबई। 11 फरवरी 1957 को जन्मीं पूर्व अभिनेत्री टीना मुनीम शादी के बाद टीना अंबानी हो गईं! कभी अभिनेत्री टीना मुनीम की पहचान उनकी फ़िल्मों से थी।1975 में एक अंतर्राष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद देवानंद साहब की नज़र उन पर पड़ी और 'देस-परदेस' फ़िल्म से 1978 में टीना ने फ़िल्म जगत में अपना पहला कदम रखा।

टीना एक ऐसे गुजराती वैश्य  परिवार से आती थीं जिसका फ़िल्मों से दूर तक कोई नाता न था और न ही वो खुद फ़िल्मों में दिलचस्पी रखती थीं। मगर देवानंद जैसे महान अभिनेता का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता था और फिर उनका फ़िल्मी सफ़र बड़े सुन्दर मकाम हासिल करता 1987 तक चलता रहा जब तक कि वो कॉलेज अटेंड करने कैलिफ़ोर्निया नहीं चली गयीं। इस बीच उन्होंने 30-35 फ़िल्मों में काम किया जिनमें संजय दत्त के साथ 'रॉकी' सुपर हिट रही।


बासु चटर्जी के साथ उन्होंने दो फ़िल्में दीं- 'बातों-बातों में',और 'मनपसंद'। हालांकि वे खुद 'अधिकार' को अभिनय की दृष्टि से सबसे बेहतरीन फ़िल्म मानती हैं। 1991 में जब टीना 31 वर्ष की थीं तब उन्होंने अनिल अंबानी से विवाह किया। टीना के फ़िल्मी जीवन में बेशक उनके सम्बन्ध अभिनेताओं से जोड़े गए,ख़ास तौर पर राजेश खन्ना के साथ। पर विवाह के पश्चात टीना अंबानी परिवार की बेहतरीन बहु, अच्छी पत्नी और मां साबित हुईं हैं।

टीना बार बार अपने साक्षात्कारों में ये कहती रही हैं कि उनके पति अनिल ने उन्हें आज तक किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं किया और ऐसा कुछ भी नहीं उनके जीवन में जो वे पाना चाहती हों और पा न सकी हों। परियों की कथा सी है टीना की कहानी....सब कुछ सुनहरा...चमचमाता...चमत्कारी !

 टीना-अनिल के दो बेटे हैं जय अनमोल अंबानी और जय अंशुल अंबानी।


टीना मुंबई की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करती हैं, शोभा डे की पत्रिका “हेल्लो” के अप्रेल 2012 के संस्करण में टीना फिर लम्बे अंतराल के बाद कवर पेज पर दिखीं। इसी पत्रिका के लिए दिए एक साक्षात्कार में टीना ने शोभा डे को बताया कि आम सोशलाइट औरतों की तरह वे ब्रांडेड कपड़ों, ब्यूटी पार्लरों में अपना अपना वक्त ज़ाया नहीं करतीं,वे जब ज़रुरत पड़े कमर्शियल फ्लाइट का इस्तेमाल करती हैं, पति के चार्टर्ड प्लेन के होते हुए भी। बाहरी दिखावे से परे टीना के भीतर गज़ब का आत्मविश्वास है जो उन्हें सबसे अलग, सबसे बेहतर बनाता है।

साभार: दैनिक जागरण