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Sunday, July 28, 2013

KALYAN JI - ANAND JI - कल्याण जी आनंद जी


संगीत सम्राट कल्याण जी आनंद जी 

कल्याण जी आनंद जी भाइयो का जन्म गुजरात के जैन वैश्य परिवार मे हुआ था. हिंदी फिल्म जगत की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी-आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। 

वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आया और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था। 

वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी जिसने अपने संगीत से हिंदी फिल्म जगत को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया।

हालाँकि उधारी के संगीत के इन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ जरूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए।

कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना आर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फिल्म संगीतकारों के संपर्क में आए और फिर दोनों भाई उस जमाने में हिंदी फिल्म जगत में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। 

शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फिल्मों में संगीत देना शुरू किया और सम्राट चंद्रगुप्त (1959) उनके संगीत से सजी पहली फिल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी-आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। 

कल्याणजी-आनंदजी ने 1959 में फिल्म ‘सट्टा बाजार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। 1965 की ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब जब फूल खिले’ ने इन दोनों को सफल संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया।

कई दशकों तक बॉलीवुड को अपनी धुनों पर मदमस्त कर देने वाली इस जोड़ी के महत्वपूर्ण अंग कल्याणजी 24 अगस्त 2000 को दुनिया को अलविदा कह गए।

इस जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 70 और 80 तक बॉलीवुड पर राज किया।

कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फिल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फिल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए। भारतीय फिल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी को ही जाता है।

फिल्म ‘छलिया’ में राजकूपर और नूतन पर फिल्माए गए कल्याणजी-आनंदजी के गीत ‘छलिया मेरा नाम’ और ‘डम डम डिगा डिगा’ बेहद लोकप्रिय हुए। इस फिल्म ने उन्हें पृथक पहचान दिलाई।

फिल्म ‘हिमालय की गोद’ (1965) से यह जोड़ी शीर्ष पर पहुँच गई। ‘सरस्वतीचंद्र’ (1968) के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

फिल्मकार प्रकाश मेहरा के साथ कल्याणजी आनंदजी का सफल गठजोड़ बन गया, जिसने ‘हसीना मान जाएगी’, ‘हाथ की सफाई’, ‘हेराफेरी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’ जैसी कई सफल फिल्में दीं। 

फिरोज खान के साथ किया हुआ काम भी बहुत लोकप्रिय हुआ। इस तिकड़ी ने ‘धर्मात्मा’, ‘अपराध’, ‘कुर्बानी’ और ‘जाँबाज’ में खूब वाहवाही लूटी।