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Thursday, October 29, 2020

ASHUTOSH GANGAL - NEW RAILWAY GM

ASHUTOSH GANGAL - NEW RAILWAY GM 


रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल मेकेनिकल इंजीनियरिंग सेवा (IRSME) के वरिष्ठ अधिकारी आशुतोष गंगल को उत्तर रेलवे का महाप्रबंधक नियुक्त किया है। गंगल ने आज ही कार्यभार संभाल लिया। इससे पहले रेलवे बोर्ड में अतिरिक्त सदस्य (योजना) के पद पर कार्यरत थे।

ईरमी के हैं स्नातक

आशुतोष गंगल ने वर्ष 1985 में बिहार के जमालपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैकेनिकल एंड इलैक्ट्रीकल इंजीनियर्स (IRIMEE) के स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर, इंडिया से सेक्शन ए तथा बी में गोल्ड मैडल भी प्राप्त किया है। इन्हें भारतीय रेल में 35 वर्ष से अधिक समय तक विभिन्न पदों पर कार्य करने का अनुभव है। इससे पहले वह पश्चिम मध्य रेलवे, जबलपुर में चीफ मेकेनिकल इंजीनियर, मध्य रेलवे, मुम्बई में वरिष्ठ उप महाप्रबंधक तथा मंडल रेल प्रबंधक, बडौदा के पदों पर भी काम कर चुके हैं।

विदेशों में भी ली है ट्रेनिंग

गंगल ने विदेशों में विख्यात ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, इंटरनेशनल एंटी करप्शन एजेंसी (IACA), आस्ट्रिया; कारनेग मेलोन यूनिवर्सिटी, पीटसवर्ग, यूएसए; एसडीए-बोकोनी बिजनेस स्कूल मिलान, इटली तथा लिक्योन येन स्कूल-यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में विभिन्न मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए ट्रेनिंग भी ली है। उपरोक्त इंस्टीच्यूट में ट्रेनिंग के अलावा गंगल ऑफिसियल एसाइनमेंट पर जर्मनी, ईज़राइल तथा स्वीडन भी गए हैं।

साभार: नवभारत टाइम्स 

Wednesday, October 28, 2020

RITIKA JINDAL IAS - रितिका जिंदल, जिन्होंने दुर्गा अष्टमी की बरसों पुरानी परंपरा तोड़ी

कौन है IAS रितिका जिंदल, जिन्होंने दुर्गा अष्टमी की बरसों पुरानी परंपरा तोड़ी



IAS रितिका जिंदल सोशल मीडिया पर निशाने पर बनी हुई हैं। सिर्फ इसीलिए क्योंकि उन्होंने हिमाचल में एक मंदिर की परंपरा बदलवा दी। अपने इस काम के लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। 


यह मामला हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले का है, यहां पर शूलिनी माता का मंदिर है। नवरात्रि के दौरान दुर्गा अष्टमी के दिन यहां पर हवन का आयोजन किया जाता है, इस बार भी हुआ। IAS रितिका जिंदल वहां का इंतज़ाम देखने पहुंची। 

उन्होंने वहां हवन होते हुए देखा, तो हिस्सा लेने की इच्छा जताई। लेकिन पंडितों ने उन्होंने ये तर्क देते हुए रोक दिया कि कोई भी महिला इस हवन में शामिल नहीं हो सकती।

ये बाद रितिका को ठीक नहीं लगी, क्योंकि जिन खास 9 दिनों मां दुर्गा के सभी रूपों को पूजा जाता है। नारी को सम्मान दिया जाता है, उसी में किसी एक दिन पूजा या हवन में उन्हें हिस्सा ना लेने को कहा गया। 

तो रितिका जिंदल वहां, आस-पास मौजूद लोगों के पास पहुंची और उन्हें ऐसा पाठ पढ़ाया कि बरसों से चली आ रही परंपरा को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। रितिका ने कहा, 'अष्टमी के दिन हम महिलाओं के सम्मान की बात तो करते हैं, लेकिन उन्हीं के अधिकारों से उन्हें वंचित रखा जाता है। मैं एक अधिकार बाद में हूं पहले महिला हूं। सभी महिलाओ को ऐसी विचारधारा बदलने की जरूरत है। इसे वे तभी बदल सकती हैं, जब वे इस रूढ़िवादी सोच का विरोध करेंगी।'

रितिका का विरोध देख उन्हें हवन करने की इजाजत देनी पड़ी। लेकिन सोशल मीडिया पर हिंदू परंपरा से खिलवाड़ करने और बर्दाश्त ना करने वाले ट्वीट्स की बाढ़ आ गई। 

लोग इस आईएएस का विरोध करने लगे। किसी ने अमित शाह से इस IAS को रोकने की गुहार लगाई। तो किसी ने उन्हें हिंदू पुजारियों को ज्ञान देने से मना कर दिया।

किसी ने उन पर पावर का गलत इस्तेमाल करने वाला बताया तो किसी ने हिंदू धर्म से खिलवाड़ करने को मना किया।

बता दें, रितिका जिंदल पंजाब के मोगा से हैं। साल 2018 में उन्होंने UPSC की परीक्षा में 88वीं रैंक हासिल कर IAS क्वालिफाई किया था।


ANSHUL GOYAL - BUSINESS TYCOON

ANSHUL GOYAL - BUSINESS TYCOON

1 रुपए वाले मटर के पैकेट का बिजनेस शुरू किया, दूसरे महीने कमाई 50 हजार पहुंची, अब खुद की फैक्ट्री

अंशुल ने बताया कि बिजनेस शुरू करने से पहले मैंने सोचा कि कौन सा प्रोडक्ट लॉन्च करूं और छोटे बजट में ये कैसे हो सकता है।


राजस्थान के टोंक जिले के अंशुल गोयल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही सोच लिया था कि बिजनेस ही करना है रिसर्च की, कोई प्रोडक्ट कितना बिकता है, मार्केट में क्रेडिट कितने दिनों की होती है और सबसे ज्यादा कौन लोग खरीदते हैं

आज की कहानी राजस्थान के टोंक जिले में रहने वाले अंशुल गोयल की है। यूं तो अंशुल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है, लेकिन काम स्नैक्स बेचने का कर रहे हैं। कॉलेज में एंटरप्रेन्योरशिप के एक प्रोजेक्ट के दौरान ही उन्होंने सोच लिया था कि बिजनेस ही करना है।

घरवालों के कहने पर डेढ़ साल सरकारी नौकरी की तैयारी भी, लेकिन मन नहीं लगा तो बंद कर दी। तीन साल में अपने पार्टनर के साथ मिलकर एक से डेढ़ लाख रुपए तक की मंथली इनकम पर पहुंच चुके हैं। वही बता रहे हैं, उन्होंने ये सब कैसे किया।

एक सैलरी पर बंधकर काम नहीं करना चाहता था

अंशुल कहते हैं- इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मुझे महसूस हुआ कि नौकरी के बजाए मुझे बिजनेस में जाना चाहिए। मैं एक सैलरी पर बंधकर काम नहीं करना चाहता था, बल्कि खुद अपने काम का बॉस बनना चाहता था। कॉलेज में थर्ड ईयर में एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम में पार्टिसिपेट किया।

एक बिजनेस प्रोजेक्ट पर काम किया। तब दिमाग में ये बात घर कर गई कि बिजनेस ही करना है। घरवाले चाहते थे कि मैं पढ़ाई करके नौकरी करूं। सरकारी नौकरी की तैयारी भी की, लेकिन कुछ दिन बाद मन नहीं लगा और बिजनेस के बारे में सोचने लगा।


काम की शुरूआत अंशुल ने अपने घर से ही की थी, बाद में फैक्ट्री शुरू की।

वो बताते हैं, "मैं मार्केट में बिजनेस सर्च कर रहा था कि आखिर क्या कर सकता हूं। मेरे ज्यादातर रिश्तेदार बिजनेसमैन ही हैं। उनसे भी कंसल्ट कर रहा था। मुसीबत ये थी कि बिजनेस शुरू करने के लिए बहुत पैसा नहीं था। जो भी करना था, छोटे बजट में ही करना था। मैं देख रहा था कि कोई प्रोडक्ट कितना बिक सकता है। उसकी मार्केट में क्रेडिट कितने दिनों की होती है। सबसे ज्यादा कौन लोग उसे खरीदते हैं। कई चीजें देखने के बाद मुझे हरे मटर का काम समझ में आया।"

अंशुल कहते हैं- मैंने देखा कि एक रुपए में फ्राई मटर बेचे जाते हैं। ये पैकेट खासतौर पर बच्चों को टारगेट कर मार्केट में उतारे जाते हैं। रिसर्च करने पर मुझे पता चला कि इस काम में बहुत ज्यादा इंवेस्टमेंट भी नहीं था और रिटर्न आने की संभावना पूरी थी। 2017 में मैंने जयपुर से ही डेढ़ लाख रुपए में ये काम शुरू किया। मेरे करीब 60 से 70 हजार रुपए प्रिंटिंग में खर्च हुए, क्योंकि प्रिंटिंग का ऑर्डर बल्क में देना पड़ता है।

उन्होंने बताया कि पचास हजार रुपए में पैकिंग की एक सेकंड हैंड मशीन खरीदी। इसके अलावा मंडी से दौ सो किलो सूखी मटर खरीदी। शुरू के एक महीने काफी दिक्कतें आईं। अनुभव न होने के चलती कभी हमारी मटर पूरी तरह फ्राई नहीं हो पाती थी। कभी क्रिस्पी नहीं होती थी।

कभी तेल ज्यादा हो जाता था तो कभी मसाला अच्छे से लग नहीं पाता था। मैंने अपने जानने वाले दुकानदारों को सैम्पलिंग के लिए पैकेट दिए थे। सभी ने फीडबैक दिया। फिर पता चला कि तेल सुखाने के लिए भी मशीन आती है। मसाला लगाने के लिए भी मशीन आती है और भी कई छोटी-छोटी बातें पता चलीं।


अंशुल 11 प्रोडक्ट्स लॉन्च कर चुके हैं। दिवाली के बाद चिप्स लॉन्च करने की भी तैयारी है।

डेढ़ महीने में ही शुरू हो गई कमाई

वो कहते हैं- एक महीने की लर्निंग के बाद मैं जान गया था कि बढ़िया क्रिस्पी मटर कैसे तैयार किए जाते हैं। हम अच्छा माल तैयार करने लगे। महीनेभर बाद ही ऑर्डर बढ़ना शुरू हो गया। पहले टोंक जिले के गांव में ही मैं पैकेट पहुंचा रहा था। दूसरे महीन से ही मेरी 45 से 50 हजार रुपए की बचत होने लगी। ये काम 6 महीने तक चलता रहा।

फिर दुकानदारों ने ही बोला कि इसके साथ जो स्नैक्स के दूसरे प्रोडक्ट आते हैं, वो भी बढ़ाओ। उन प्रोडक्ट्स की भी काफी डिमांड होती है। मैंने भी सोचा कि प्रोडक्ट्स बढ़ाऊंगा नहीं तो काम कैसे फैलेगा। मटर के काम में मैंने एक बंदा मटर फ्राई करने के लिए रखा था और दूसरा पैकिंग के लिए था। मार्केटिंग का काम मैं खुद देख रहा था।

मार्केट से 50 लाख उठाए, आधे चुका भी दिए

अंशुल ने बताया कि मेरे पास बहुत से प्रोडक्ट्स लॉन्च करने के लिए पैसा नहीं था। फिर अपने साथ एक पार्टनर को जोड़ा। हमने सबसे पहले फर्म रजिस्टर्ड करवाई। मार्केट और बैंक से करीब 50 लाख रुपए उठाए और एक साथ 11 प्रोडक्ट लॉन्च कर दिए। टोंक के साथ ही जयपुर और दूसरे एरिया में भी हम डिस्ट्रीब्यूशन के जरिए प्रोडक्ट्स पहुंचाने लगे।

उन्होंने कहा- कोरोना के पहले हमारी मंथली इनकम एक से डेढ़ लाख थी। मार्केट से जो पैसा उठाया था, उसका 50% चुका भी दिया। कोरोना के चलते 6 महीने का ब्रेक लग गया था। अब फैक्ट्री फिर से शुरू कर दी है। आज मेरे पास करीब 30 लाख रुपए की मशीनें हैं। आठ से दस वर्कर हैं। पैकिंग से लेकर ड्राय करने तक की मशीनें हैं।

अब हम दिवाली के बाद चिप्स लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं। जो लोग अपना काम शुरू करना चाहते हैं, उन्हें यही कहना चाहता हूं कि जो भी काम करो, पहले उसके बारे में रिसर्च करो। उस प्रोडक्ट के मार्केट को समझो। कॉम्पीटिशन बहुत हाई है, यदि सही प्लानिंग से नहीं गए तो नुकसान हो सकता है। अंशुल यूट्यूब पर कामकाजी चैनल के जरिए लोगों को बिजनेस एडवाइज भी देते हैं।

साभार: दैनिक भास्कर 

Sunday, October 25, 2020

SKANDGUPT VIKRAMADITYA - A GREAT VAISHYA SAMRAT

SKANDGUPT VIKRAMADITYA - A GREAT VAISHYA SAMRAT 

स्कंदगुप्त_विक्रमादित्य

चौथी-पांचवी ई. सदी की बात है तब धरती पर  इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।  तुर्क और  मंगोल इलाकों में तब  हूणों का आतंक बरसता था। संभवतः तुर्क और मंगोलों की मौजूदा पीढ़ियों के मूल पूर्वज  हूण_कबीलों से ही जुड़े थे। चीन के पश्चिमोत्तर मंगोल जनजातियों से लेकर आज के यूरोप में हंगरी तक असंख्य चींटियों की तरह दल बांधकर आक्रांत हूण जब चाहे जहां चाहे धावा बोलते थे। मध्य एशिया समेत समूचे  रोमन_साम्राज्य को थर्रा देने वाले दुर्दान्त और  बर्बर_हूण आक्रांन्ताओं के सामने विश्व की समस्त प्राचीन सभ्यताएं मटियामेट हो गई थीं। आज भी हूणों का सबसे दुर्दान्त नायक अटिला यूरोप में मानवता के अभिशाप के रूप में पढ़ाया और बताया जाता है।


हूणों का नाम सुनते ही तब के समूचे चीन में कंपकपी दौड़ जाती थी। क्योंकि उसके पूरे पश्चिमोत्तर सरहदी इलाकों में उसके सारे प्रान्तीय रणबांकुरे हूणों को देखते ही भाग खड़े होते थे और चीन को जब जहां चाहते, हूणों के दल रौंद डालते थे। हूणों से बचने के लिए तब चीन के लोगों ने स्थान-स्थान पर तेजी से  सरबुलन्द  द_ग्रेट_वॉल_ऑफ_चाइना का निर्माण किया ताकि हूणों के हमलों से बचने के लिए स्थायी बन्दोबस्त किए जा सकें। 

कल्पना करिए, जिन हूणों ने प्राचीन ग्रीक, प्राचीन रोम, प्राचीन मिस्र और ईरान को ज़मींन्दोज़ कर डाला वही हूण जब #भारत की धरती पर टिड्डीदल की तरह टूटे तब उनके साथ क्या घटित हुआ था? वाराणसी के समीप गाजीपुर जनपद में स्थित #औड़िहार और #भितरी के खंडहर सारी लोमहर्षक गाथा बयान करते हैं। आज भी इस इलाके में माताएं बच्चों को सुलाते हुए कहती हैं-बचवा सुतजा नाहीं त हूणार आ जाई, बेटा सो जा नहीं तो हूण आ जाएगा।


हूणों के विरुद्ध उस महासमर में जिसका प्रारंभ औड़िहार की धरती से हुआ था और जिसका व्यापार गुजरात से लेकर कश्मीर यानी पूरे पश्चिमोत्तर भारत तक फैल गया, उसी युद्ध का नेतृत्व करने उतर पड़ा था वह महायोद्धा जिसका नाम इतिहास में #स्कन्दगुप्त_विक्रमादित्य के नाम से अमर हुआ। यही कारण है कि वह भारत रक्षक सम्राटों की पंक्ति में सबसे महान और सबसे शीर्ष पर इतिहास में स्थापित हुआ। महान इतिहासकार प्रो. आरसी मजूमदार ने स्कन्दगुप्त की वीरता को नमन करते हुए उसे #द_सेवियर_ऑफ_इंडिया कहकर पुकारा। 

इतिहास स्रोत संकेत करते हैं कि अत्यंत युवावस्था में उसने समरांगण में सैन्यदल की कमान हाथ में ली और फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। गान्धार-तक्षशिला को नष्ट-भ्रष्ट करते गंगा की घाटी में वाराणसी-गाधिपुरी तक चढ़ आए 3 लाख से अधिक खूंखार हूणों के अरिदल को उसने अपने बाहुबल- बुद्धिबल से प्रबल टक्कर दी और अंततः संसार में अपराजेय हो चुके हूणों को न केवल भारत की धरती से उखाड़ फेंका, बल्कि उनकी रीढ़ इस कदर तोड़ दी कि फिर हूण दुनिया में अपनी पहचान बचाने को भी तरस गए। स्कन्दगुप्त ने जो घाव #हूणों को दिए, उसकी टीस लिए हूणों की समूची प्रजाति का रूप ही बदल गया. मध्य एशिया के दूसरे कबीलों में छुपकर और पहचान बदलकर आततायी हूण सदा के लिए समाप्त हो गए।

इतिहास स्रोत यह भी बताते हैं कि मात्र 45 अथवा 50 वर्ष की उम्र तक ही संभवतः वह जीवित रहा। युद्ध में लगे अनगिनत घावों के कारण उसकी जीवनलीला संभवतः समय से पहले ही समाप्त हो गई, किन्तु भारत के इतिहास में वह नवयुवक अपनी कभी न मिटने वाली अमिट समर-गाथा छोड़ गया। कालचक्र उस युवा का पुनःस्मरण करता है, भूमि आज भी अपने उस वीरपुत्र को देखने के लिए आवाज देती है। गंगा की कल-कल लहरों में वह आज भी दृश्यमान प्रवाह रूप में दिखाई देता है।

आजीवन वह रणभूमि में ही जूझता रहा, परिणामतः जो मुट्टीभर हूण बचे भी तो जीवित रहने के लिए वो शिव-शिव हरि-हरि जपने को बाध्य हो गए। कौन थे हूण? कहां से आए थे? क्या चाहते थे? भारत की धरती पर उनका सफाया स्कन्दगुप्त ने कैसे किया? हूणों के विरूद्ध भारत की इस समरगाथा पर सीरीज शीघ्र। 🚩🚩

साभार : Article :- घनश्याम अग्रवाल जी, राज_सिंह--- www.vedsci.in

ISHAN GUPTA - अंतरराष्ट्रीय फलक पर छाया कानपुर का ईशान, कोरोना से बचाव के लिए बनाया वर्क डिको एप

अंतरराष्ट्रीय फलक पर छाया कानपुर का ईशान, कोरोना से बचाव के लिए बनाया वर्क डिको एप


प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। इस बात को चरितार्थ किया है यूपी के कानपुर निवासी ईशान गुप्ता ने जो हैं तो केवल 17 साल के लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है।

एक तरफ पूरी दुनिया कोरोना से जंग लड़ रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस जंग को जीतने के लिए रास्ते तलाश रहे हैं। एक ऐसा ही नाम है ईशान गुप्ता। 17 साल के ईशान उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में रहते हैं और 12वीं के छात्र हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेकर एक ऐसा एप तैयार किया है जो कोरोना से जंग में मददगार साबित हो सकता है।

दरअसल, उनका यह एप भीड़भाड़ वाले स्थानों की जानकारी देने के साथ मास्क न लगाने वाले लोगों की संख्या बताने में भी सक्षम है। ईशान ने इस एप को नाम दिया है वर्क डिको। इस एप के लिए ईशान को 500 डॉलर की राशि भी मिली है। सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल के छात्र ईशान का एप कोरोना से जंग में कई स्तर पर मददगार साबित हो सकता है।

ऐसे बहुत से स्थान हैं, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं। यह एप वहां के सीसीटीवी एप के जरिये डाटा लेकर यह बताने में सक्षम है कि वहां कितनी भीड़ है और कितने लोग मास्क नहीं लगाए हुए हैं। ईशान की इस उपलब्धि पर उनके स्कूल की प्रधानाचार्य शिखा बनर्जी भी बेहद खुश हैं। उन्होंने ईशान की प्रतिभा को सराहा और उन्हें बधाई भी दी।

वैश्विक स्तर पर पहला स्थान : 

हार्वर्ड और स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय की ओर से अप्रैल में कोरोना महामारी को लेकर प्रतियोगिता हुई थी। ईशान ने उसमें प्रतिभाग कर अपने इस एप को प्रस्तुत किया। अगस्त में जब परिणाम आया तो ईशान को वैश्विक स्तर पर पहला स्थान मिला। 500 डॉलर और किंग जॉर्ज का मेडल भी मिला।

ऐसे काम करता है एप : 

फिनलैंड में कोरोना को लेकर हुए शोध के बाद ईशान ने यह एप बनाया। ईशान बताते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, मशीन लर्निग व कंप्यूटर विजन तकनीक का उपयोग कर इस एप को तैयार किया है। इसके लिए उन्होंने डाटा तैयार किया और क्लाउड सर्वर पर अपलोड कर दिया। इसके बाद परिणाम आना शुरू हो गए। एप का उपयोग करने के लिए मॉल या स्टोर पर जो कैमरे लगे होते हैं, उनसे इस एप को जोड़ना होता है। इसके बाद जिस स्थान पर एप का उपयोग कर रहे हैं, वहां का पूरा डाटा एक क्लिक पर मिल जाता है। एप पर विच इज द बेस्ट स्टोर टू विजिट का विकल्प भी मौजूद रहता है।

गरीब बच्चों की करते हैं मदद :

कानपुर के स्वरूपनगर निवासी ईशान को 10वीं में 97.2 फीसद अंक मिले। खुद की पढ़ाई के साथ वह गरीब बच्चों की मदद भी करते हैं। ईशान वन बुक-वन स्माइल नाम से कम्युनिटी प्रोजेक्ट का संचालन भी करते हैं। इसमें मेरठ, नोएडा, कोलकाता के छात्र भी जुड़े हैं।

साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, October 21, 2020

SURAT AGRAWAL TRUST ELECTION

 SURAT AGRAWAL TRUST ELECTION 


DEVITA SHROFF - आज भारत की सबसे अमीर सेल्फमेड वुमन हैं, 1200 करोड़ रु है नेटवर्थ

DEVITA SHROFF - आज भारत की सबसे अमीर सेल्फमेड वुमन हैं, 1200 करोड़ रु है नेटवर्थ


देविता की कंपनी एडवांस TV बनाती है। इस टीवी पर यू-ट्यूब और हॉट स्टार जैसे ऐप को भी आसानी से चलाया जा सकता है।

आज देविता के पास पूरे भारत में करीब 10 लाख से ज्यादा कस्टमर्स हैं, उनकी कंपनी दुनिया के 60 देशों में अपनी टीवी बेचती है
देविता का नाम फॉर्च्यून इंडिया (2019) की भारत की सबसे ताकतवर 50 महिलाओं में भी आ चुका है, पीएम भी कर चुके हैं तारीफ

आईआईएफएल वेल्थ और हुरुन इंडिया ने हाल ही में 40 और उससे कम उम्र वाले सेल्फ मेड अमीरों की लिस्ट को जारी की। इस लिस्ट में एकमात्र महिला हैं 39 साल की देविता सराफ। वह इस सूची में 16वें स्थान पर हैं। देविता वीयू ग्रुप की सीईओ और चेयरपर्सन हैं। उनका नाम फॉर्च्यून इंडिया (2019) की भारत की सबसे ताकतवर 50 महिलाओं में भी आ चुका है। इंडिया टुडे ने 2018 में बिजनेस वर्ल्ड में 8 सबसे ताकतवर महिलाओं में देविता सराफ को जगह दी थी। उनकी कुल दौलत करीब 1200 करोड़ रुपए है।

देविता सराफ ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। वो जेनिथ कंप्यूटर्स के मालिक राजकुमार सराफ की बेटी हैं। हालांकि, वो हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थीं। इसलिए फैमिली बिजनेस नहीं संभाला। 2006 में जब टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव हो रहा था और अमेरिका में गूगल और एपल जैसी कंपनियां मोबाइल और कम्प्यूटर के बीच के गैप को खत्म करने की जद्दोजहद में थीं, उस समय देविता ने कुछ नया करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने टीवी कारोबार को चुना। उन्होंने VU टीवी की शुरुआत की। जो टीवी और सीपीयू का मिलाजुला रूप था।


देविता सराफ ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। वो जेनिथ कंप्यूटर्स के मालिक राजकुमार सराफ की बेटी हैं।

उनकी कंपनी लेटेस्ट तकनीक में अच्छा काम कर रही है। देविता की कंपनी एडवांस TV बनाती है। इस टीवी पर यू-ट्यूब और हॉट स्टार जैसे ऐप को भी आसानी से चलाया जा सकता है। मतलब ये टीवी कम कंप्यूटर होते हैं। इनके जरिए आप मल्टी टास्किंग कर सकते हैं। साथ ही कंपनी एंड्रॉयड पर चलने वाले हाई डेफिनेशन टीवी भी बनाती है। बड़ी स्क्रीन के साथ कंपनी के पास कॉरपोरेट यूज की भी टीवी है।

देविता ने जब कंपनी शुरू की थी तब उनकी उम्र महज 24 साल ही थी। शुरुआत में उन्हें दिक्कत आईं, लेकिन करीब 6 साल बाद 2012 में उनकी कंपनी प्रॉफिट में आ गई। 2017 में कंपनी का टर्नओवर करीब 540 करोड़ पहुंच गया था। उसके बाद से लगातार यह बढ़ता ही गया। आज देविता के पास पूरे भारत में करीब 10 लाख से ज्यादा कस्टमर्स हैं। कंपनी दुनिया के 60 देशों में अपनी टीवी बेचती है।


चार साल पहले वीयू टेलिविजंस की को-फाउंडर और सीईओ देविता सराफ को डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की इवांका कहा था।

लड़की समझ कर सीरियसली नहीं लेते थे लोग

देविता के लिए कंपनी को इस मुकाम तक पहुंचाना आसान नहीं था। एक इंटरव्यू में देविता ने कहा था कि जब वो बिजनेस के सिलसिले में किसी डीलर या मैन्युफैक्चरर से मिलती थीं, तो लोग उन्हें लड़की समझकर सीरियसली नहीं लेते थे। कुछ लोगों को लगता था कि ये लड़की है और इतना बड़ा बिजनेस संभाल कैसे सकती है। देविता के मुताबिक, जब आपको आगे बढ़ाना होता है तो ऐसी चीजों के बारे में ध्यान नहीं देते हैं। हालांकि उनका मानना है कि अब लोगों की सोच बदल रही है। उन्हें देखकर बहुत से लोगों को लगता है कि उनकी बेटियां भी अपना बिजनेस खड़ा कर सकती हैं।

पीएम मोदी भी कर चुके हैं तारीफ


साल 2017 में पीएम मोदी ने अपने भाषण में देविता के आइडिया का जिक्र भी किया था।

साल 2017 में देविता ने यंग सीईओ के साथ पीएम मोदी की हुई बैठक में हिस्सा लिया था। इसमें न्यू इंडिया के लिए इन सीईओज से अपने आइडिया देने को कहा गया था। देविता ने इस कार्यक्रम में मेक इन इंडिया पर अपने विचार रखे। बाद में पीएम मोदी ने अपने भाषण में उनके आइडिया का जिक्र भी किया।

हार्डवर्किंग ही सफलता का मूलमंत्र

एक इंटरव्यू में देविता सराफ ने कहा कि वह हार्डवर्किंग और युवा महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व कर रही हैं। वह देश की तमाम युवा महिलाओं को प्रोत्साहित करने का काम कर रही हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अब इस बात का भरोसा हो गया है कंपनियों के सीईओ भी किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं हैं। देविता कहती है कि महिलाओं को सिर्फ उनकी सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि उनके टैलेंट के लिए भी सराहा जाना चाहिए

साभार: दैनिक भास्कर 

Tuesday, October 20, 2020

समाजवाद के प्रर्वतक थे महाराजा अग्रसेन

समाजवाद के प्रर्वतक थे महाराजा अग्रसेन


महाराजा अग्रसेन को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया था कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले प्रत्येक परिवार की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक परिवार उसे एक सिक्का व एक ईंट देगा। जिससे आने वाला परिवार स्वयं के लिए मकान व व्यापार का प्रबंध कर सके।

महाराजा अग्रसेन ने शासन प्रणाली में एक नई व्यवस्था को जन्म दिया था। उन्होंने वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना की थी।

महाराजा अग्रसेन एक सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। महाराज अग्रसेन ने नाग लोक के राजा कुमद के यहां आयोजित स्वंयवर में राजकुमारी माधवी का वरण किया। इस विवाह से नाग एवं आर्य कुल का नया गठबंधन हुआ। 

महाराजा अग्रसेन समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, राम राज्य के समर्थक एवं महादानी थे। माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुए। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। 

माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश की स्थापना हुई। ऋषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों के साथ उनके द्वारा बसाई 18 बस्तियों के निवासियों ने भी धारण कर लिया।

एक बस्ती के साथ प्रेम भाव बनाए रखने के लिए एक सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि अपने पुत्र और पुत्री का विवाह अपनी बस्ती में नहीं दूसरी बस्ती में करेंगे। आगे चलकर यह व्यवस्था गोत्रों में बदल गई जो आज भी अग्रवाल समाज में प्रचलित है। 

धार्मिक मान्यतानुसार मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवीं पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अंतिमकाल और कलियुग के प्रारंभ में अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ। जिसे दुनिया भर में अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है।

राजा वल्लभ के अग्रसेन और शूरसेन नामक दो पुत्र हुए थे। अग्रसेन महाराज वल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय गर्ग ऋषि ने महाराज वल्लभ से कहा था कि यह बालक बहुत बड़ा राजा बनेगा। इस के राज्य में एक नई शासन व्यवस्था उदय होगी और हजारों वर्ष बाद भी इनका नाम अमर होगा। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था।

बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे। 

महाराजा वल्लभ के निधन के बाद अपने नए राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिए के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है।ऋषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नए राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास है। आज भी यह स्थान अग्रहरि और अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और मां लक्ष्मी देवी का भव्य मंदिर है। अग्रसेन अपने छोटे भाई शूरसेन को प्रतापनगर का राजपाट सौंप दिया। महाराजा अग्रसेन अग्रवाल जाति के पितामह थे।

उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था...


महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।


उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गए घोड़े को बहुत बैचैन और डरा हुआ देख उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने पशु बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवंश समाज हिंसा से दूर रहता है।

कहा जाता है कि महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया। महाराज अग्रसेन ने एक ओर हिंदू धर्म ग्रंथों में वैश्य वर्ण के लिए निर्देशित कर्म क्षेत्र को स्वीकार किया और नए आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन के मूल रूप से तीन आदर्श हैं- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, आर्थिक समरूपता एवं सामाजिक समानता।

एक निश्चित आयु प्राप्त करने के बाद कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श पर वे आग्रेय गणराज्य का शासन अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु के हाथों में सौंपकर तपस्या करने चले गए। 

कहते हैं कि एक बार अग्रोहा में बड़ी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघर हो गए और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे। पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोड़ी।

वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

वैसे महाराजा अग्रसेन पर अनगिनत पुस्तके लिखी जा चुकी हैं। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र जो खुद भी अग्रवाल समुदाय से थे। उन्होने 1871 में अग्रवालों की उत्पत्ति नामक एक प्रामाणिक ग्रंथ लिखा है। जिसमें विस्तार से इनके बारे में बताया गया है।

24 सितंबर 1976 में भारत सरकार द्वारा 25 पैसे का डाक टिकट महाराजा अग्रसेन के नाम पर जारी किया गया था। सन् 1995 में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से 350 करोड़ रूपये में एक विशेष तेल वाहक पोत (जहाज) खरीदा, जिसका नाम महाराजा अग्रसेन रखा गया। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 10 का आधिकारिक नाम महाराजा अग्रसेन पर है।

आज का अग्रोहा ही प्राचीन ग्रंथों में वर्णित अग्रवालों का उद्गम स्थान आग्रेय है। अग्रोहा हिसार से 20 किलोमीटर दूर महाराजा अग्रसेन राष्ट्र मार्ग संख्या 10 के किनारे एक साधारण गांव के रूप में स्थित है। जहां पांच सौ परिवारों की आबादी रहती है।

इसके समीप ही प्राचीन राजधानी अग्रेह (अग्रोहा) के अवशेष के रूप में 650 एकड भूमि में फैला महाराजा अग्रसेन धाम हैं। जो महाराज अग्रसेन के अग्रोहा नगर के गौरव पूर्ण इतिहास को दर्शाता है। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज में पांचवे धाम के रूप में पूजा जाता है। 

अग्रोहा विकास ट्रस्ट ने यहां पर बहुत सुंदर मंदिर, धर्मशालाएं आदि बनाकर यहां आने वाले अग्रवाल समाज के लोगो के लिए बहुत सुविधाएं उपलब्ध करवाई हैं। इतिहास में महाराज अग्रसेन परम प्रतापी, धार्मिक, सहिष्णु, समाजवाद के प्रेरक महापुरुष के रूप में उल्लेखित हैं।

देश में जगह-जगह महाराजा अग्रसेन के नाम पर बनाए गए स्कूल, अस्पताल, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि महाराजा अग्रसेन के जीवन मूल्यों का आधार हैं। जो मानव आस्था के प्रतीक हैं।

साभार: amarujala.com/columns/blog/maharaja-agrasen-jayanti-2020-date-biography-in-hindi

Monday, October 12, 2020

PRAVEEN GOYAL - श्याम रसोई: रोज खिलाते हैं 1,000 लोगों को खाना, वो भी 1 रुपये में

श्याम रसोई: रोज खिलाते हैं 1,000 लोगों को खाना, वो भी 1 रुपये में


दिल्ली में एक रसोई ऐसी भी है जहां जरुरतमंदों को महज 1 रुपये में पूरी थाली मिलती है। जी हां, दिल्ली के परवीन कुमार गोयल, नांगलोई इलाके में शिव मंदिर के पास ‘श्याम रसोई’ चलाते हैं। इस रसोई की खासियत है कि यहां कोई भी शख्स सिर्फ रुपये में पेट भरके खाना खा सकता है। और हां, वो एक रुपये भी इसलिए लेते हैं ताकि लोग खाने को मुफ्त समझकर बर्बाद न करें। सोशल मीडिया पर परवीन के इस नेककाम की खूब तारीफ हो रही है।

51 वर्षीय परवीन ने बताया, ‘लोग तरह-तरह से दान करते हैं। कोई आर्थिक रूप से मदद करता है, तो कोई अनाज/राशन देकर। हालांकि, पहले वो 10 रुपये में एक थाली देते थे। लेकिन हाल ही ज्यादा लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने दाम घटाकर 1 रुपए कर दिया है। उनकी इस रसोई में हर दिन करीब 1,000 लोग खाना खाते हैं।

अगर कोई चाहे तो ‘श्याम रसोई’ से किसी बीमार/जरूरतमंद के लिए खाना पैक करवाकर भी ले जा सकता है। लेकिन शर्त सिर्फ यह है कि खाना तीन लोगों का ही खाना पैक किया जाएगा, ताकि उसका दुरुपयोग न हो। परवीन बस ये चाहते हैं कि दुनिया में कोई भी इंसान भूखा ना सोए।

साभार: नवभारत टाइम्स 

Sunday, October 11, 2020

Sunday, October 4, 2020

स्वतंत्रता आंदोलन और मारवाड़ी वैश्य समाज

स्वतंत्रता आंदोलन और मारवाड़ी वैश्य समाज


स्वतंत्रता की भावना संस्कृति से ही प्रसारित होती है ‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं’- इस भावना के मूल में देश प्रेम की भावना कार्य करती है जिसका आधार मज़बूत सांस्कृतिक धरोहर होती है वैश्य भी देशप्रेम की इस पवित्र भावना से अछूते नहीं थे। वैश्यों के बारे में देश में प्रचलित धारणा कि ये सिर्फ व्यापारी हैं, एक भ्रान्ति के अलावा कुछ नहीं संस्कृति, साहित्य और राष्ट्रीयता के उत्थान में वैश्यों का तन-मन-धन का भरपूर सहयोग रहा कोलकाता के राजस्थानी कवि और शायर चम्पालाल मोहता ’अनोखा’ के अभिनन्दन पर वरिष्ठ कवि श्री ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’ ने वैश्य समाज का साहित्य और संस्कृति के विकास में अहम योगदान स्वीकार करते हुए अध्यक्षीय व्यक्तव्य में कहा कि वैश्य समाज देश का कवच और अस्त्र है वर्तमान में यह याद करना समीचीन होगा कि भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में वैश्य समाज की क्या भूमिका रही ? 

उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्य पूरे अंग्रेजी भारत, दक्षिण और मध्य भारत में अपना कारोबार फैला चुके थे इस समय तक सामान्य रूप से इस वर्ग का अंग्रेज सरकार या अंग्रेज व्यापारियों की नीति से कोई मतभेद नहीं था, परन्तु जो व्यापारी अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह ‘जफ़र’ और मध्य भारत की देशी रियासतों के शाषकों के संपर्क में थे उनका अंग्रेज सरकार से मोह भंग होने लगा था सन 1857 तक यह रोष बढ़ गया देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में इन व्यापारियों ने अपनी जान माल की परवाह किये बगैर स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की यह मदद मुख्य रूप से आंदोलन के लिए धन देकर की गई थी इस आर्थिक मदद से अंग्रेज सरकार इतनी घबरा गई कि इन व्यापारियों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया। सन 1857 में दिल्ली में मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ‘जफ़र’ की खुल्लमखुल्ला आर्थिक मदद करने वाले रामजीदास गुड़वाला का खजाना जब्त कर अंग्रेजो ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। सेठ रामजीदास गुड़वाला ने बादशाह को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। रामजीदास गुड़वाला मूलतः हरयाणा के अग्रवाल परिवार से थे और दिल्ली के नगरसेठ थे। सन 1857 में ग्वालियर राज्य का खजाना वहाँ के नामचीन व्यापारी सेठ अमरचंद बांठिया की देख रेख में था सेठ बांठिया मूल रूप से बीकानेर रियासत का मारवाड़ी व्यापारी था जब ग्वालियर पर रानी लक्ष्मी बाई , नाना साहेब और तांत्या टोपे का हमला हुआ तब सेठ बांठिया ने ग्वालियर का खज़ाना इनकी सेना के खर्च पूर्ति हेतु इन्हें ही सौंप दिया अंग्रेज सरकार ने इस घटना को राजद्रोह मानकर #सेठ_अमरचंद_बांठिया ’#बीकानेर_वाला’ को फांसी पर चढा दिया। इसी तरह जब तांत्या टोपे भागकर जयपुर से लालसोट होते हुए सीकर पहुंचे, #सेठ_रामप्रकाश_अग्रवाल ने गहने और धन देकर उनकी मदद की. शोलापुर के #कृष्णदास_सारडा और सतारा के सेठ सेवाराम मोर, हरयाणा के #लाला_हुकुमचंद (अग्रवाल जैन) भी अपनी उग्र कारवाइयों के चलते फांसी पर झूला दिए गये 1857 के क्रांतिकारियों के बीच समनव्यय का कार्य मारवाड़ी वैश्य वर्ग ने किया। सन्देश-समाचार पहुंचाना, सन्देश वाहकों को अपने घर में आश्रय देना, क्रांतिकारियों और उनके रिश्तेदारों को अपने यहाँ छुपाकर रखना आदि अनेक कार्य मारवाड़ी व्यापारियों द्वारा किये जाते रहे। 1857 की क्रांति की असफलता के बाद नाना साहब पेशवा का भतीजा मार्च 1862 में दक्षिण भारत के हैदराबाद में #सेठ_मोहन_लाल_पित्ती और #सेठ_शरण_मल के यहाँ गुप्त रूप से रह रहा था पता चलने पर अंग्रेज सरकार ने दोनों पर भारी जुर्माना ठोक कर उन्हें सजा दी। 

सन 1857 की क्रांति के बाद से सन 1900 तक वैश्यों और अंग्रेजों में सीधा टकराव नहीं हुआ विद्रोह के बाद दोनों पक्ष अपनी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में लगे हुए थे इस समय तक प्रशाष्निक सुधारों के नाम पर देश की लगभग सभी रियासतों में परंपरागत कानून की जगह अंग्रेजी कानून लागू हो चूका था इसका असर दूसरे वर्गों के साथ साथ व्यापारी वर्ग के परंपरागत विशेषाधिकारों पर भी पड़ा इस कारण रियासतों के व्यापारी और उनके प्रवासी भाई-बंधू , दोनों में अंग्रेजों के प्रति कटुता बढती गई उदयपुर राज्य के लगभग 2000 व्यापारी 30 मार्च 1864 को नगरसेठ चम्पालाल के नेतृत्व में कर्नल ईडन के घर विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचे और सात दिनों की हड़ताल के बाद समझौता हुआ कालांतर में मारवाड़ी व्यापारी अंग्रेज व्यापारियों के एकाधिकार को हर जगह चुनौती देने लगे शीघ्र ही मारवाड़ी व्यापारिओं की समझ में आ गया की राजनितिक दबाव और समर्थन के बगैर केंद्रीय सत्ता से जुड़े अंग्रेज व्यापारियों से व्यावसायिक टक्कर लेना मुश्किल है अंतः 1898 में बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ नाम की संस्था बनायीं इस संस्था की स्थापना के साथ उनकी घोषणा थी-‘ राजनीति का सम्बन्ध व्यापार से रहता है और यह प्रत्यक्ष रूप से व्यापार को प्रभावित करती है, इसलिए ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’ भारत की राजनीति से परहेज़ नहीं रखेगी’ इसके साथ ही मारवाड़ियों से सम्बंधित पत्र-पत्रिकाओं में , जिसमे ‘मारवाड़ी’ और ‘अग्रवाल’ पत्रिकाएं उल्लेखनीय है, मारवाड़ी व्यापारियों से राजनीति में सक्रिय योगदान का आह्वान किया गया देखते ही देखते ‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे 

‘मारवाड़ी एसोसियेशन’, ‘वैश्य सभा’ और ‘बुद्धिवर्धिनी सभा’ के माध्यम से सैकड़ों प्रगतिशील मारवाड़ी युवक तत्कालीन भारतीय राजनीति में रूचि लेने लगे थे सन 1905 के आते-आते ये मारवाड़ी युवा राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने शुरू हो गये बंग भंग के विरोध में बंगाल के जन आंदोलन में, विरोध सभाओं में और बाद में बंगाल के क्रन्तिकारी आंदोलन में ये युवक सक्रिय भूमिकाओं में नज़र आने लगे बंगाल के मारवाड़ी व्यापारियों ने इंग्लैण्ड स्थित मैंनचेस्टर के ‘चेंबर ऑफ कामर्स’ से अनुरोध किया की वे ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालें और बंग भंग को रुकवाने में मदद करें विदेशी माल के बहिष्कार आंदोलन को मारवाड़ी व्यापारियों के सहयोग से बल मिला सितम्बर 1904 में बंगाल में जहाँ 77000 रुपये का विदेशी कपडा बिका वहीँ सितम्बर 1905 में मात्र 10000 रुपये का 21 अक्टूबर 1905 को ‘भारतमित्र’ में ‘बंगविच्छेद’ शीर्षक लेख में लार्ड कर्जन को उग्र मुद्रा में बाल मुकुन्द गुप्त ने संबोधित किया, ‘आपके शाषन काल में बंगाविच्छेद इस देश के लिए अंतिम विषाद और आपके लिए अंतिम हर्ष है......दुर्बल की अंग्रेज नहीं सुनते” मारवाड़ियों में आक्रोश की लहर उठी ‘जणनी जने तो दोय जण, के दाता के सूर’ की परंपरा के मारवाड़ी अग्रवाल युवा #हनुमान_प्रसाद_पोद्दार ‘स्वदेश बांधव’ और ‘अनुशीलन समिति’ जैसी क्रन्तिकारी संस्थाओं के सक्रिय सदस्य बने। पोद्दार जी नेमुंबई में उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। सन 1914 में प्रसिद्ध ‘रोड़ा कांड’ में अनुशीलन समिति से जुड़े हुए फूलचंद चौधरी, ज्वालाप्रसाद कानोडिया, प्रभु दयाल हिम्मतसिंहका, घनश्यामदास बिडला, कन्हैयालाल चित्तलान्गिया, ओंकारमल सर्राफ, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की गिरफ्तारी के वारंट जारी किये गये घनश्यामदास बिडला को छोड़ सभी को लंबी अवधी तक जेल में रखा गया। 

ब्यावर के माहेश्वरी वंशी #सेठ_दामोदरदास_राठी का बंगाल के क्रन्तिकारी अरविन्द घोष, रासबिहारी बोस और सचेतन गांगुली के साथ ही श्यामजीकृष्ण वर्मा, राजा महेंद्रप्रताप और राजस्थान के दूसरे क्रांतिकारियों से भी गहरा संपर्क रहा कलकत्ता और काशी के क्रांतिकारियों के सहयोग से राजस्थान में भी #अर्जुनलाल_सेठी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियां बढ़ा ली थी उनको जयपुर के सेठ छोटेलाल और मोतीलाल ने काफी आर्थिक मदद की तब तक महात्मा गांधी का प्रवेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं हुआ था। 

सन 1915 में महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में पदार्पण के साथ ही मारवाड़ी व्यापारियों का झुकाव उनकी तरफ हुआ महात्मा गांधी की भावुक राजनीति ने मारवाड़ी वैश्यों को आकर्षित किया #सेठ_जमनालाल_बजाज जी इनमे अग्रणी थे एनी बेसेंट के होम रुल आंदोलन में सेठ फूलचंद चौधरी और सेठ कन्हैलाल चित्तलान्गीया गिरफ्तार हुए जलियांवाला बाग की घटना में मारवाड़ी युवक भी मारे गये थे। जमनालाल बजाज ही शेखावाटी के अग्रवाल परिवार से थे। उस समय तक कांग्रेस मारवाड़ियों का महत्व समझ चुकी थी इसलिए सन 1920 में जमना लाल बजाज को कांग्रेस पार्टी का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में ‘तिलक स्वराज फंड’ में ज्यादा से ज्यादा कोष जमा करवाने का आव्हान महात्मा गांधी ने किया इसके जबाब में जमनालाल बजाज, आनंदीलाल पोद्दार, रामकृष्ण मोहता, घनश्यामदास बिडला, केशोराम पोद्दार, रामकृष्ण डालमिया और सुखलाल करनानी ने लाखों रुपये स्वराज फंड में जमा करवाए अकेले कलकत्ता के बडाबाजार से उस समय दस लाख रुपये एकत्रित हुए महात्मा गांधी के विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन का नेतृत्व जमनालाल बजाज और कृष्णदास जाजू ने किया शेखावटी के हर बड़े कसबे में #घनश्याम_दास_बिडला ने खादी भण्डार खुलवा दिये थे जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिडला, कृष्णदास जाजू, सिद्धराज ढढा, ब्रजलाल बियानी दूसरे मारवाड़ी व्यापारियों के साथ खादी प्रचार-प्रसार, हरिजन उद्धार के कार्यक्रमों में महात्मा गांधी के सक्रिय सहयोगी रहे घनश्याम दास बिडला हरिजन-सेवक संघ के अध्यक्ष थे जमना लाल बजाज और सिद्धराज ढढा ने राजस्थान की रियासतों में घूम घूम कर खादी और हरिजन-उद्धार का बहुत प्रचार किया नमक सत्याग्रह में मारवाड़ियों ने खुलकर भाग लिया असहयोग आंदोलन की रीढ़ ही मारवाड़ी व्यापारी थे तत्कालीन बंगाल सरकार के अधिकारी ए. एच. गज़नवी ने वायसराय के प्रतिनिधि कनिंघम को 27 अगस्त 1930 को पत्र लिखा –“ महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से मारवाड़ियों को अलग कर दिया जाये तो 90 फीसदी आंदोलन यूं ही खत्म हो जायेगा ” अंग्रेज सरकार ने बंगाल के मारवाडी व्यापारियों को आन्दोलन से अलग करने के लिए राजस्थान की रियासतों के शाषकों पर दबाव दिया लेकिन लगभग सभी रियासतों ने इसमें अपनी असमर्थता जता दी उस समय मारवाड़ियों की संस्थाओं ने मारवाड़ियों से भारतीय राजनीति में और ज्यादा सक्रिय होने का आह्वान किया अखिल भारतीय मारवाड़ी अग्रवाल सभा के सन 1926 में हुए सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए #सेठ_जमनालाल_बजाज ने आव्हान किया –‘अग्रवाल समाज ने आन्दोलनों में धन दिया,जेल भुगती लेकिन अब समय आ गया है की समाज का बच्चा-बच्चा देश पर बलिदान होने के लिए तैयार रहे” इसी तरह अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के भागलपुर में आयोजित चौथे सम्मेलन में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले मारवाड़ियों की प्रसंशा में प्रस्ताव पास किया गया सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ को सहयोग करने के लिए शेखावाटी के अग्रवाल सेठ #भगवान_दास_बागला ने वर्मा में रंगून स्थित अपनी ‘नेशनल बेंक ऑफ इण्डिया’ ही सुभाष बाबु को सौंप दी सन 1942 के ‘करो या मरो’ आंदोलन में डॉ.राम मनोहर लोहिया और मगनलाल बागड़ी का योगदान अविष्मर्णीय है मालचंद हिसारिया और नेमीचंद आंचलिया गिरफ्तार हुए भारत छोड़ो आंदोलन में 483 मारवाड़ियों को सजा सुनाई गई राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान वैचारिक क्रांति में जो अखबार अपना योगदान दे रहे थे वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मारवाड़ी व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से ही निकाल रहे थे हिंद केसरी, हरिजन, कर्मवीर, प्रताप, लीडर,त्याग-भूमि, भारतमित्र आदि अखबार इसकी मिशाल हैं इस क्षेत्र में भागीरथ कानोडिया का योगदान महत्वपूर्ण है चिडावा के ताराचंद डालमिया और मंडावे के देव किशन सर्राफ का नाम इस क्षेत्र के किसानो कि समस्या समाधान हेतु संघर्ष में अग्रणी है। सीकर के किसानो की समस्याओं का समाधान करने के लिए सीताराम सेक्सरिया ने जमना लाल बजाज के साथ मिलकर सफल परिश्रम किया अन्य राज्यों के किसान आंदोलनों को आर्थिक सहयोग देने में भी मारवाड़ी व्यापारी पीछे नहीं रहे।। 

पंजाब केसरी और अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे तीव्र स्वर में आंदोलन चलाने वाले लाल-बाल-पाल तिगड़ी के लाला लाजपत राय जी को कौन भूल सकता है। सन् 1928 में लाला जी साइमन कमिसन के विरोध में अंग्रेजों के क्रूर लाठीचार्ज का शिकार हुए और अपने प्राणों का त्याग कर दिया। बंगाल के लाल-बाल-पाल कही जाने वाली तिगड़ी के बिनोय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त तिगड़ी ने भारतीयों से क्रूर व्यहवार करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी सिम्पसन की गोली मारकर हत्या कर दी थी। 

इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का गौरव शाली अध्याय लिखने वाले मारवाड़ी वैश्य व्यापारियों ने पूरे देश के लोगों के साथ मिलकर तन,मन और धन से स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्ती भूमिका दर्ज की.

साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल सभा 

E - BANIA - डिजिटल युग ने पैदा किए नए 'बनिया

डिजिटल युग ने पैदा किए नए 'बनिया', ई-कॉमर्स की दुनिया में छाया वैश्य वर्ग का परचम

डिजिटल अर्थव्यवस्था के उभार के साथ इस समुदाय ने चाहे वह बंसल हों, गोयल हों, गुप्ता हो या अग्रवाल- इन्होंने नए व्यापारिक मॉडल, विशेष रूप से तेजी से बढ़ते डिजिटल उद्योग को आसानी से अपना लिया है. 


डिजिटल कारोबार की नई जमात में वैश्य वर्ग के नौजवान तेजी से उभरकर सामने आए हैं.

भारतीय परंपरा या ग्रंथों में व्यापार, कारोबार की जिम्मेदारी एक वर्गविशेष 'वैश्य' को सौंपी हुई है. समय बदलने के साथ-साथ इन परंपराओं में बदलाव हुआ और समाज के अन्य वर्गों के लोगों ने भी कारोबार की दुनिया में नई इबारतें लिखीं. लेकिन वैश्य वर्ग को कारोबार का मझा हुआ खिलाड़ी माना जाता रहा है. इसी कड़ी में जब कारोबार की दुनिया डिजिटल कॉमर्स का लबादा ओढ़ कर नए सिरे से इजाद हुई तो इस डिजिटल दुनिया के सिरमौर भी वैश्य वर्ग के लोग ही बने.

डिजिटल अर्थव्यवस्था के उभार के साथ इस समुदाय ने चाहे वह बंसल हों, गोयल हों, गुप्ता हो या अग्रवाल- इन्होंने नए व्यापारिक मॉडल, विशेष रूप से तेजी से बढ़ते डिजिटल उद्योग को आसानी से अपना लिया है. 

ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म 'जोमेटो' के संस्थापक दीपिंदर गोयल हैं, ऑनलाइन टैक्सी सर्विस 'ओला' के संस्थापक भाविश अग्रवाल हैं, वहीं 'फ्लिपकार्ट' के संस्थापक सचिन बंसल, किफायती होटल श्रंखला 'ओयो रूम्स' के संस्थापक 24 वर्षीय रीतेश अग्रवाल और 'लेंसकार्ट' के संस्थापक पीयूष बंसल हैं.

'जोमेटो' को 2.3 अरब डॉलर की कुल पूंजी के साथ शुरू किया गया था, जिसके कोष में हाल ही में 60 करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ. भारत में 'उबर' का स्थानीय प्रतिद्वंद्वी ओला की पूंजी लगभग 60 अरब डॉलर हो गई है. 'ओला' अब लगभग 125 शहरों में है.

'फ्लिपकार्ट' से निकलने के बाद उसे अपनी लगभग एक अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेचने के बाद बंसल ने भावीश की 'ओला' में 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया और उनके इसमें और ज्यादा निवेश करने की संभावना है.

एक विशेषता समान है

हिसाब-किताब पर मजबूत पकड़ और उनके आधुनिक उपभोक्ताओं के बारे में स्पष्ट समझ, जिनमें ज्यादातर युवा हैं और पिज्जा मंगाने से लेकर, कैब बुलाने, उड़ानें बुक करने और कहीं भी खरीदारी करने तक के लिए अपना ज्यादातर समय स्मार्टफोन और इंटरनेट पर बिताते हैं.

'मोर्गन स्टेनली' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारियों, बैंकरों, साहूकारों, अनाजों और मसालों के विक्रेताओं के पेशेवर समुदाय बनिया ने लगभग 40 करोड़ युवाओं की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर खुद को बहुत तेजी से तैयार किया है.

'साइबरमीडिया रिसर्च एंड सर्विसिस लिमिटेड' (सीएमआर) के प्रमुख और वरिष्ठ उपाध्यक्ष थॉमस जॉर्ज ने कहा, "पारंपरिक व्यावसायिक घरानों के युवाओं ने फायदेमंद ई-कॉमर्स में कदम रख दिया है, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं, नए व्यापारिक मॉडलों और बेहतर शिक्षा के प्रति जागरूकता के कारण वे सफल भी हुए हैं."

देश में 40 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता और लगभग 50 करोड़ ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ता (लगभग 97 फीसदी वायरलैस कनेक्शन) हैं, जिसे 'बनिया ब्रिगेड' ने ई-कॉमर्स और ऑनलाइन उद्योग में अपना अबतक का सबसे बड़ा अवसर माना है.

'जोमेटो' वर्तमान में प्रति महीने 2.2 करोड़ ऑर्डर लेती है. कंपनी ने ड्रोन आधारित फूड डिलीवरी के लिए देशी स्टार्टअप 'टैकईगल इन्नोवेशंस' का अधिग्रहण कर लिया.

दीपिंदर गोयल के अनुसार, 'जोमेटो' अभी हवाई नवाचार के शुरुआती दौर में है और नए कल के निर्माण के लिए छोटे-छोटे कदम बढ़ा रहा है, जहां उपभोक्ता उनके ऑर्डर किए गए खाने की डिलीवरी के लिए एक ड्रोन का इंतजार करें.

साभार: zeebiz.com/hindi/small-business/new-bania-digital-business-world-4683

आशुतोष वर्णवाल, फाउंडर, buddy4study

आशुतोष वर्णवाल, फाउंडर, buddy4study

सफलता:ताकि किसी मेधावी छात्र की पढाई के आड़े न आ सके गरीबी, गया के आशुतोष ने बना डाला स्टार्टअप 
 
आशुतोष वर्णवाल, फाउंडर, buddy4study 

आशुतोष ने buddy4study स्टार्टअप से 80 हजार छात्रों को दिलवाया 95 करोड़ का स्काॅलरशिप 
गया के फतेहपुर के लोधवे का है मूल, पिता ने चाय बेचकर पहुंचाया इस मुकाम पर 

घर में इतने पैसे नहीं थे कि हम चारों भाइयों की पढाई सीबीएसई स्कूल में हो पाती। सिर्फ मेरा नामांकन सरस्वती विद्या मंदिर, सिंदरी में कराया गया। 2002 में आईआईटी जेईई क्वालीफाई करके मरीन इंजीनियरिंग किया। 2010 में जब में एमबीए कर रहा था, तब पहली बार, शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिलती है, की जानकारी मिली। अगर मुझे पहले इसकी जानकारी होती, तब मेरे बड़े भाइयों सहित अन्य जरूरतमंदों को भी आर्थिक मदद मिलती और वे पढ़ पातें। बस तभी से यह विचार मेरे मन में बैठ गया कि एक ऐसे सिस्टम बनाना हैं, जहां कोई भी मेधावी छात्र की पढाई पैसे के अभाव में न रूके। यह कहना है buddy4study स्टार्टअप के फाउंडर आशुतोष वर्णवाल का। 

पैसे की कमी के चलते नहीं पढ़ पाएं भाई 

आशुतोष ने बताया, गया के फतेहपुर के लोधवे में उनके पिता रहते थे, जहां से वे रोजगार के लिए पलायन कर 1970 में धनबाद चले गए। वहां पहले चाय व बाद में किराना की दुकान खोली। पिता ताराचंद प्रसाद वर्णवाल पांचवीं तक और मां शकुंतला देवी छठी तक पढ़ी हैं। बड़े दो भाइयों को पैसे की कमी से ज्यादा नहीं पढ़ा सके। उन्हें सीबीएसई स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। 1999 में 10वीं और 2001 में 12वीं की परीक्षा में टाॅप किया। 

ब्रिटिश कंपनी की छोड़ी नौकरी 

2006 में ब्रिटिश पेट्रोलियम कंपनी में मरीन इंजीनियर बना। लगा, समाज के उनलोगों के लिए कुछ करूं, जो जानकारी के अभाव में मुकाम नहीं पाते। 2010 में नौकरी छोड़ कर कैट कर एमबीए के लिए आईएमटी गाजियाबाद में दाखिला लिया। यहीं 2011 में अपने काम की शुरूआत की। 

20 राज्यों के छात्र को लाभ
  
बाद में उनके इस स्टार्टअप से को-फाउंडर के रूप में राज किशोर जुड़े। उनकी कंपनी से 20 राज्यों के छात्रों को लाभ मिल रहा है। बिहार, यूपी, झारखंड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, एमपी, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, आसाम, दिल्ली, मणिपुर, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य हैं। 35 लाख 33 हजार 135 में 85 हजार छात्रों को स्कॉलरशिप मिल चुकी है। इन छात्रों में 95 करोड़ की राशि बंटी है। इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन, एग्रीकल्चर, हार्टीकल्चर सहित अन्य पाठ्यक्रमों के लिए स्काॅलरशिप उपलब्ध कराया जाता है। उसके इस मुहिम में दैनिक भास्कर सहित 200 हैं देशी-विदेशी मीडिया पार्टनर हैं। 

कम्पनी के काम की प्रक्रिया 

संस्थान व कम्पनी अपनी जरूरत के आधार पर buddy4study से सम्पर्क करती है। buddy4study योग्यता के आधार पर आवेदन मंगाकर, उसे शॉर्ट आउट करते है। चयनित छात्र को स्कॉलरशिप मिलती है। एक तरह से छात्र व संस्थान के बीच कम्पनी मध्यस्थ है। इसे आउट सोर्सिंग कह सकते हैं। संस्थाओं को अतिरिक्त कर्मी के वेतन व आवेदन प्रक्रिया में खर्च न कर, एक निर्धारित राशि कम्पनी को देती है। टेक्नोलॉजी के आधार पर छात्रों की एक्टिविटी की ट्रेकिंग भी होती है। 

समाज को कुछ देने की है लालसा 

एक बहुत ही अच्छे मुकाम पर हूं। दस साल हो गए हैं, इसे शुरू किए। अब अन्य आंत्रप्रेन्योर को मेंटरिंग करना शुरू कर दिया है। 10 साल में एक अच्छी कंपनी बनाकर देश की सेवा की, अब अगले 5 साल में आशा एवं विश्वास के साथ 100 अच्छे स्टार्टअप द्वारा सोसाइटी की सेवा करूं।

साभार: दैनिक भास्कर 

NEERAJ GOYAL - जेब में पैसे नहीं, और बना लिया 82 हजार करोड़ का साम्राज्य

जेब में पैसे नहीं, मगर आँखों में सपने थे, मेहनत की और बना लिया 82 हजार करोड़ का साम्राज्य 


प्रेरणा ही असली ताकत है जो कठिन से कठिन समय और बड़ी से बड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने में हमारा साथ देता है। हमारे अंदर प्रेरणा का स्तर जितना ऊँचा होगा, असंभव को संभव करने की शक्ति भी उतनी ही प्रबल होगी। अफसोस की बात है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसी स्थिति में है जहाँ एक समय के बाद उनके भीतर की प्रेरणा पूरी तरह खत्म हो जाती है। अपने भीतर नई उर्जा और आशा का संचार करने के लिए हमें प्रेरणादायक कहानियां अवश्य पढ़नी चाहिए। 


आज हम आपके सामने एक ऐसे ही प्रेरणादायक शख्सियत की कहानी पेश कर रहे हैं, जिन्होंने कारोबार की संभावनाओं को तलाशते हुए फूटी कौड़ी बिना भारत छोड़ विदेश रवाना हुए, और फिर अथक परिश्रम की बदौलत इतने बड़े साम्राज्य की स्थापना किये कि आज इनकी गिनती दुनिया के सबसे अमीर लोगों में होती है। 

हम बात कर रहे हैं 44 साल की उम्र में दुनिया के सबसे युवा अमीरों की सूची में शुमार करने वाले टेक उद्यमी नीरज गोयल की सफलता के बारें में। लुधियाना के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्में और पले-बढ़े नीरज ने अपनी स्कूली पढ़ाई शिमला में की। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। साल 1988 में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक फाइंनेंस टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के साथ जुड़कर की। यहाँ काम करते-करते गोयल ने फाइंनेंस टेक्नोलॉजी डेवलप करने के साथ-साथ नए-नए प्रयोग भी किए। 

इस इंडस्ट्री में काम करते हुए उन्होंने तजुर्बे हासिल किये और साथ-ही-साथ एक बड़ी बिज़नेस संभावनाओं को भांपा। फिर अपना कारोबार शुरू करने की दिशा में रिसर्च करने शुरू कर दिए और सिंगापुर को सबसे बड़ा मार्केट पाया। इसी कड़ी में साल 2000 में उन्होंने खाली हाथ सिंगापुर का रुख किया। सिंगापुर में शून्य से शुरुआत कर उन्होंने एक फाइंनेंस टेक्नोलॉजी फर्म की आधारशिला रखी। 


गोयल ने अपनी कंपनी के बैनर तले फाइनेंनशियल टेक्नोलॉजी और इंश्योरेंस सेक्टर में 50 से ज्यादा इनोवेशन किये और टेक मार्केट में अपनी पहचान बनाई। शुरूआती सफलता को आगे बढ़ाने के उद्येश्य से इन्होंने क्लोन एल्गो टेक्नोलोजी नाम से एक मल्टीनेशनल फाइनेंसियल एंड इंश्योरेंस फर्म को शुरू किया। वर्तमान में गोयल इस कंपनी के प्रेसिडेंट हैं। इसके साथ ही वो ड्रैगन होल्डिंग्स के चेयरमैन और कई और भी कंपनियों में सीनियर पदों पर है। उन्होंने सिंगापुर इनोवेशन लीग की स्थापना की और गोयल वैंचर के तहत कई कंपनियों में निवेश भी किया। 

आज गोयल का नाम सिंगापुर समेत पूरी दुनिया के सबसे सफल कारोबारी की सूची में शूमार है। इतना ही नहीं उनके नाम देश के यंगेस्ट सेल्फ मेड बिलिनियर होने का खिताब है और वर्तमान में वे सिंगापुर के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति भी हैं। इनकी सालाना कमाई 12.95 बिलियन डॉलर (अर्थात् 82407 करोड़ रुपए) है। उनकी कंपनी एल्गोरिथम प्रोडक्ट बनाती है जो ट्रेडिंग के साथ क्रूड ऑयल के क्षेत्र में भी काम आता है। 

लेख साभार: tribe.kenfolios.com/hindi/story/कभी-खाली-हाथ-गये-थे-देश-छोड़ kenfoliosFebruary 11, 2017

दिल्ली की नींव में कुछ अंश अग्रवाल समाज_के

दिल्ली की नींव में कुछ अंश अग्रवाल समाज_के


दिल्ली_की_धरोहर_अग्रवाल_समाज

दिल्ली के इतिहास की परतों को पलटेंगे तो उस पर अग्रवाल समाज का गौरवशाली इतिहास सजा नजर आएगा। एक के बाद एक शासक तो दिल्ली की सत्ता हासिल करने की लालसा रही लेकिन अग्रवाल समाज ने दिल्ली को हर तरह समृद्ध, संपन्न व सम्मानित किया। सबरंग के इस अंक में अग्रवाल समाज किस तरह दिल्ली की धरोहर है इसी के बारे में विस्तार से बता रहे हैं संजीव कुमार मिश्र : 
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दिल्ली का बुनियादी विकास हो या धर्म, कर्म, कला, साहित्य, राजनीति और चिकित्सा हर जगह अग्रवाल समाज की उपस्थिति एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में दिखी। सामाजिक सरोकार से जुड़ी दिखी। तभी दिल्ली की गलियों में आज भी इनके किस्से सुनाए जाते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि उप्र, बिहार तक में विकास कार्यों में जिम्मेदारी निभाई। मंदिरों का निर्माण और पुनरुद्धार करवाया। 

#अग्रोतक_होती_थी_राजधानी 

दिल्ली में अग्रवाल समाज का लिखित इतिहास 900 साल पुराना पता चलता है। अग्रवाल जाति के लोग भगवान अग्रसेन के वंशज हैं। इनकी राजधानी अग्रोतक थी, जिसका वर्तमान नाम अग्रोहा है। यह हरियाणा के हिसार में स्थित है। मुहम्मद गोरी के आक्रमण के बाद अग्रवाल यहां से निकलने शुरू हुए और आसपास के क्षेत्रों में निवास स्थान बनाए। निकटवर्ती दिल्ली, हरियाणा के ही विविध हिस्सों, पश्चिमी उप्र और राजस्थान समेत पंजाब में भी गए। अग्रवालों की प्रारंभिक बस्तियां इन्हीं इलाकों में मिलती हैं। दिल्ली में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार जब राजपूत काल चल रहा था तो पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल तोमर के एक मंत्री नट्टल साहू थे। इन्होंने तत्कालीन प्रसिद्ध कवि विबुद्ध श्रीधर से पाश्र्वनाथ चरित्र की रचना करवाई। नट्टल साहू अग्रवाल जैन थे। यह अपभ्रंश भाषा में लिखी गई है। इसी में सबसे पहले हरियाणा स्थित दिल्ली का वर्णन किया गया है, जिससे पता चलता है कि दिल्ली, हरियाणा का भाग था और उसकी राजधानी भी। राजपूत काल, सल्तनत काल, मुगल काल में प्रशासन, राजनीति, समाज सुधार, उद्योग, धार्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में अग्रवालों का अनुपम योगदान रहा है। नट्टल साहू पहले ज्ञात अग्रवाल मंत्री हैं। सल्तनत काल में भी कई अग्रवाल मंत्री बने। मुगल काल में राय रामप्रताप मंत्री बने। ये एरण गोत्र के थे। ये पहले थे जिन्हें मुगलों ने जनाना महल का मंत्री बनाया। अकबर द्वितीय ने इन्हें आली खानदान की उपाधि दी थी। राम प्रताप मूलरूप से गुडग़ांव अब गुरुग्राम के रहने वाले थे। इनकी वंश परंपरा को राय की भी उपाधि मिली थी। इन्हीं की पीढ़ी से राय इंद्रमणि हुए। जिन्हें बिहार में दीवान पद सुशोभित किया। इन्हें बाद में वहां राजा भी बनाया गया। इंद्रमणि के बाद इनके परिवार के ख्याली राम थे। जो गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष थे। इनके बाद पटनिमल का जिक्र आता है। इनके नाम से पुरानी दिल्ली के पहाड़ी धीरज में पटनिमल गली और खिड़की है। ये बादशाहों के खजांची ज्यादा थे शाहजहां के समय में खंजाची बनने शुरू हुए थे और ब्रिटिश काल में भी खजांची थेे। 

#सोने_के_छत्र_वाला_मंदिर :

पुरानी दिल्ली स्थित धर्मपुरा में एक 200 साल पुराना मंदिर है। जिसे अग्रवाल जैनियों ने बनवाया था। इसे नया मंदिर भी कहते है। यह मंदिर उस समय 8 लाख रुपये में बनवाया गया था। इसमें गर्भ गृह की छत सोने की है। हरसुख राय के लड़के थे सुगन राय। ये बादशाह के खजांची थे। इन्होंने 7 लाख रुपये तो खुद दिए जबकि 1 लाख समाज के लोगों से चंदा इक्ट्ठा किया गया था। इसे बनवाने के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। दरअसल, उस समय मुगल मंदिर नहीं बनाने देते थे, खासतौर पर शिखर वाले मंदिर। चूंकि ये खजांची थे तो इन्होंने बादशाह से विशेष अनुमति लेकर मंदिर निर्माण शुरू करवाया। सात लाख रुपये खर्च हो जाने के बाद भी जब मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हुआ तो फिर एक लाख रुपये चंदा एकत्र किया गया। मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद इसे पंचायती घोषित कर दिया गया था। इसमें कहीं भी लाइङ्क्षटग नहीं है। मंदिर दिन में एक बार सिर्फ सुबह खुलता है। राजा हरसुख राय और सगुन चंद्र ने देशभर में 52 जैन मंदिरों का निर्माण करवाया। अकेले दिल्ली में सात मंदिर थे। जिसमें धर्मपुरा, पटपडग़ंज, जयसिंहपुरा स्थित मंदिर हैं। इसके अलावा बाकि मंदिर उप्र, राजस्थान और हरियाणा में थे। इसी तरह राजा पटनिमल ने कालकाजी मंदिर में भी सेवा कार्य किया। 1810 में 50 हजार रुपये दिए थे। इन्हें अकबर द्वितीय ने राजा का खिताब दिया था। 

ख्याली राम शाहजहां के समय में गुप्तचर रहे  इसी तरह एक सेठ सीताराम थे जो मुहम्मद शाह रंगीला के समय खजांची थे। इनके नाम पर #सीताराम_बाजार है। सीताराम ने मुहम्मद शाह रंगीला को 5 लाख रुपये उधार दिए थे। दरअसल नादिरशाह के हमले के बाद बादशाह का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका था। उस समय सेठ ने मदद की थी। बदले में बादशाह ने इनके निवास स्थान को सीताराम और इनके दो भाइयों के नाम पर कूचा घासी राम, कूचा पातीराम नाम रखा। ये ऐरन गोत्रीय थे। इन्होंने भिवानी के पास स्थित चरखी दादरी में एक लाख रुपये से एक 50 फीट गहरा तालाब बनवाया। हरियाणा सरकार ने इसके सुंदरीकरण पर 10 करोड़ खर्च किए। मुगल काल में #दिल्ली_में_पांच_ऐसे_स्थान_हैं_जो_अग्रवालों_के_नाम_पर_हैं। कूचा पाती राम, घासी राम, सीताराम बाजार, पटनिमल खिड़की व गली, कूचा ख्याली राम। ख्याली राम शाहजहां के समय में गुप्तचर विभाग के प्रमुख थे। 

#अग्रसेन_की_बावली 

दिल्ली में अग्रवाल समाज की पुरानी विरासतों का जिक्र करें तो अग्रसेन की बावली सर्वप्रथम आती है। बाराखंभा स्थित यह बावली 800 साल से ज्यादा पुरानी है। बलुआ पत्थर, चूने के पत्थरों से बनी यह बावली व्हेल के आकार की है। इसमें 108 सीढिय़ां हैं। कहते हैं समय के साथ इसमें बहुत से बदलाव किए गए हैं। नट्टल साहू ने इस बावली का पुनरुद्धार करवाया था। 1990 तक यह पानी से भरी थी लेकिन अब सूख चुकी है। 

#कई_बड़े_कॉलेज_भी_इनकी_देन 

अग्रवाल समाज ने दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। जामा मस्जिद इलाके में स्थित इंद्रप्रस्थ गल्र्स स्कूल के संस्थापकों में रहे। सोसायटी के सेक्रेटरी लाला युगल किशोर थे। वे दिल्ली में 1928 में सनातन धर्म सभा के भी अध्यक्ष रहे। मारवाड़ी पुस्तकालय का जिक्र भी जरूरी है। यह दिल्ली के मारवाड़ी अग्रवाल द्वारा स्थापित है, जिसके केदारनाथ गोयनका संस्थापक थे। पुरानी दिल्ली में ही एक बनवारी लाल आयुर्वेद औषधालय भी था। कोतवाल वाले खानदान ने इसे स्थापित किया था। यहां के पढऩे वालों को वैद्यराज की उपाधि दी जाती थी। 1938 तक इससे पढ़कर 1500से अधिक वैद्य निकले थे। लाला श्रीराम की मेहनत और लगन की मिसाल आज तक दी जाती है। इन्होंने दिल्ली कमर्शियल कॉलेज की स्थापना की थी जो आजकल श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के नाम से प्रसिद्ध है। एक लेडी श्री राम कॉलेज भी है जो उनकी पत्नी के नाम पर है। इन्होंने एक इंडस्ट्रियल रिसर्च इंस्टीटयूट भी बनवाया था। 1899 में हिन्दू कॉलेज की स्थापना कृष्णदास गुड़वाले द्वारा की गई थी। इसमें सुल्तान सिंह  जैन भी शामिल थेे।

पहले_स्पीकर_चरती_राम_गोयल_बने 

जिस समय दिल्ली में विधानसभा नहीं थी, उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा थी। 1910 में पंजाब की विधान परिषद थी। उसमें सुल्तान ङ्क्षसह जैन, राय बहादुर, देशबंधु गुप्ता, प्यारेलाल सदस्य बने। दिल्ली की पहली विधानसभा में लाला जगन्नाथ, देशबंधु गुप्ता सदस्य थे। अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई नगर पालिका में भी अग्रवाल लगातार सदस्य बने। रामलाल खेमका 3 बार सदस्य बने। श्यामनाथ मार्ग से दिल्ली के लोग गुजरते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि वो लाल श्यामनाथ के नाम पर है। दिल्ली में विधानसभा के पहले महानगर परिषद होती थी। उसका प्रमुख चीफ काउंसलर होता था। जो वर्तमान सीएम के बराबर होता था। इस पद को राधा रमण अग्रवाल ने सुशोभित किया था। विधानसभा बनी तो पहले स्पीकर भी चरती राम गोयल बने। 

धनवानों_में_दिल्ली_के_अग्रवालों_का_दबदबा

उसमें धनवानों का जिक्र भी आता है। लाला सुल्तान सिंह की चालीस हजार गज से ज्यादा जमीन कश्मीरी गेट पर थी। अपने समय के बहुत बड़े धनवान थे। अंग्रेज अधिकारी भी इनके यहां आते थे। 1920 में इनके बेटे लाला रघुबीर सिंहने मार्डन स्कूल की स्थापना की। स्कूल अब 100 साल का सफर पूरा करने वाला है। दिल्ली के सबसे बड़े धनवान व नगर श्रेष्ठि गुड़वाले थे। रामदास जी गुड़वाले मालीवाड़ा में रहते थे। 1857 के पहले भारत के चार सर्वाधिक धनी व्यक्तियों में इनकी गिनती थी। 1857 के पहले बादशाह बहादुर शाह जफर के विश्वास पात्रों में से एक थे। रामदास के पूर्वजों के नाम के साथ गुड़वाले शब्द जुडऩे का भी दिलचस्प किस्सा है। दरअसल, ये लोग बहुत दानी थे। यात्रियों के लिए जगह जगह पानी और गुड़ की व्यवस्था करते थे। इसलिए गुड़वाले नाम से ही प्रसिद्ध हो गए थे। ये हुंडी पर्ची का काम करते थे। हुंडी पर्ची को दिखाकर पूरे देश में कैश कराया जा सकता था। बादशाह हर दिवाली, ईद इनके आवास पर आते थे और ये, उन्हें एक लाख अशर्फी उपहार में देते थेे। इनकी हवेली इतनी बड़ी थी कि उसमें 12 दरवाजे थे। कहते हैं कि 1857 के विद्रोह के दौरान बादशाह को इन्होंने 3 करोड़ रुपये उधार दिए थेे। विद्रोह विफल होने के बाद लाला रामदास पर अंग्रेजों ने कुत्ता छोड़ दिया, उनकी मौत हो गई। जब बाद में अंग्रेजों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो इनके बेटे को मजिस्ट्रेट, दिल्ली नगर परिषद का सदस्य बनवाया। उनके पास बादशाह का फरमान भी है। रामदास जी किस कदर शक्तिशाली थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उस समय के जारी कई शाही सिक्कों पर एक तरफ बादशाह तो दूसरी तरफ उनके चित्र थेे। गुड़वाले के नाम पर करोल बाग में एक गुड़वाली गली भी है। दिल्ली ट्राम चलाने वाली कंपनी में इसी गुड़वाले के खानदान के लाला श्रीदास डायरेक्टर भी रहे थे। 

कोतवालों_का_खानदान

लाला श्रीराम का परिवार कोतवालों के खानदान के रूप में प्रसिद्ध है। इनके पूर्वज दिल्ली के कोतवाल थे। बाद में फिरोजपुर गए एवं फिर दिल्ली वापस आए। 1882 के आसपास गुड़वाले, कोतवालों के खान और चुनामल के खत्री परिवार ने मिलकर साझेदारी में दिल्ली क्लॉथ मिल की स्थापना की। जो उत्तर भारत की सबसे बड़ी क्लॉथ मिल थी। यह 37 एकड़ में फैली हुई थी। कोतवालों का परिवार दिल्ली में ही रहता था। 1857 में लाला बद्रीदास दिल्ली और फिरोजपुर के कोतवाल बने। 1865- 84 तक ये बैंक ऑफ बंगाल, लाहौर के मुख्य कार्यालय के खजांची भी रहे। फिरोजपुर छावनी भी इन्होंने ही बसाई। इन्हीं के समय में कोतवालों का खानदान कहना शुरू हुआ।

मुगल_बादशाह_के_खजांची_शाहदीप_चंद 

ये मुगल बादशाह शाहजहां के समय में खजांची थे। ये #हिसार से दिल्ली आए थे। इन्हें दरीबाकलां में 5 बीघा जमीन दी गईं थी ताकि इनका परिवार रह सके। कहते हैं, उस समय दरबार में सात तरह के सम्मान से नवाजा जाता था। जामा मतलब गाउन, पाजामा, चद्दर, पगड़ी, कलतुर्रें वाली कली आदि। शाहदीप को इन सातों से नवाजा गया था।

#दिल्ली_के_पुराने_अग्रवाल_संगठन

1-प्राचीन श्री अग्रवाल दिगंबर जैन पंचायत

यह बहुत बड़ी पंचायत है। जिसमें दिल्ली, पानीपत, हिसार की पंचायतें हैं, यह 250 साल पुरानी है। अग्रवाल जैन इसके सदस्य थे। यह पंचायत 22 मंदिरों का प्रबंधन है। जिसमें दिल्ली के भी कई मंदिर हैं।

2-बड़ी पंचायत

1890 के आसपास इस संस्था की स्थापना हुई। यह निगमबोध घाट का प्रबंधन देखती है। यहां विकास कार्य, मूर्तियां समेत अन्य काम करवाते हैं। सीताराम बाजार में इसका ऑफिस है।

3-दिल्ली अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन

यह 1976 से चल रहा है। अग्रवालों के बीच मेल जोल बढ़ाने, समाज में बेहतर कार्य करना मकसद है।

#प्रमुख_कारोबारी

वर्तमान में जयपुरिया परिवार, जिंदल ग्रुप, डीसीएम ग्रुप, बिकानेर, हल्दीराम, हेवेल्स, राजधानी बेसन वाले सरीखे बड़े कारोबारी इसी समाज के हैं।

साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा की फेसबुक वाल से 

Friday, October 2, 2020

SETH NARSINGH DAS AGRAWAL - सेठ नृसिंहदास अग्रवाल

 "स्वाधीनता संग्राम के भामाशाह योद्धा - बाबा नृसिंहदास अग्रवाल"

- हरिनारायण शर्मा 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947) में अनेकों भामाशाह योद्धा हुए जिनमें अग्रणी हैं- सेठ रामजीदास गुड़वाला, सेठ अमरचंद बांठिया, सेठ दामोदरदास राठी, सेठ जमनालाल बजाज आदि। उन्हीं महान् भामाशाहों में से  एक थे 'नागौर' के - सेठ नृसिंहदास अग्रवाल.



नागौर में जन्में सेठ नृसिंहदास अग्रवाल ने अपना सर्वस्व महात्मा गांधी के चरणों में अर्पित कर फकीरी धारण कर ली थी। राठौरों की वीरभूमि में 31 जुलाई, 1890 में जन्में नृसिंहदास की माँ बचपन में ही चल बसी थीं। पिता सेठ हरिराम अग्रवाल ने 13 साल की बाल-उम्र में व्यापार का सारा भार नृसिंहदास पर डाल दिया था। वह 1903 में मद्रास चले गए और वहाँ महाजनी का काम करने लगे थे। किशोर नृसिंहदास को इसमें शोषण की बू आने लगी और वो इसे छोड़कर व्यवसायिक संस्थान में नौकरी करने लगे। 6 साल बाद वह वापस नागौर लौटे और विवाहोपरांत पुनः मद्रास चले गए। वहाँ उन्होंने अपना खुद का व्यापार स्थापित किया (सर्जिकल, केमिकल, पेटेंट औषधियों का आयात) जिसमें उन्हें अपार सफलता, सम्मान और शोहरत मिली। संपर्कों का दायरा बढ़ाने के साथ ही वे आजदी के आंदोलनों में भी रुचि लेने लगे। उन दिनों अमेरिका से आये भारतीय सन्यासी सत्यदेव परिव्राजक के संपर्क में आये और उनसे काफी प्रभावित हुए। इसी दौरान उनकी मुलाकात सी. राजगोपालाचारी से भी हुई। 

नृसिंह दास अब आजादी के आंदोलन में काफी सक्रिय हो गए थे। सन् 1920 में कलकत्ता में लाला लाजपत राय जी के नेतृत्व में हुए अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया। वहाँ से लौटते वक्त वो महात्मा गांधी से प्रेरणा लेने के लिए साबरमती आश्रम पहुंचे जहाँ उनकी मुलाकात सेठ जमनालाल बजाज से हुई। वो, सेठ जमनालाल बजाज जी की गतिविधियों एवं देश के लिए किये हुए त्याग से बहुत प्रभावित हुए। हालांकि वो सेठ जमनालाल बजाज जी के बारे में काफी सुनते रहते थे लेकिन यहां उनसे रूबरू होने और उन्हें ठीक से जानने का अवसर मिला। इसके बाद नृसिंह दास जी ने उन्हें अपना आदर्श बना लिया। सन् 1921 में लोकमान्य तिलक के निधन के बाद देश की आजादी के लिए तिलक स्वराज्य फण्ड में अच्छी खासी धनराशी प्रदान करने के साथ ही अन्य  साथी व्यापारियों से भी सहयोग करवाया। श्री राजगोपालाचार्य इस कोष के अध्यक्ष थे।

 जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन  का आवाह्न किया तब नृहसिंहदास और उनके साथियों ने विदेशी वस्त्रों की होली जला दी और अपनी पत्नी के साथ खादी वस्त्र को अपना लिया। सत्यदेव विद्याशंकर ने उनकी मरणोपरांत अपनी स्मृतियों में इसका उल्लेख करते हुए लिखा - "मुझे वह दिन याद है जब अपनी पत्नी के साथ आडंबर रहित खादी वस्त्र में वो पहली बार वर्धा आये थे। बाबाजी का परिचय यहा कहकर दिया जाता था की वह मद्रास स्थित अपने कारोबार और गोदाम को समेटकर करके गांधी जी के असहयोग आंदोलन में सम्मलित हुए। मारवाड़ी और अग्रवाल समाज में महिलाओं का खादी पहनना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और सोने-चांदी का त्याग करना तो क्रांति का सूचक माना जाता था। बाबाजी नाम तो उन्हें बहुत बाद में मिला पर वो जब आये थे तब भी वह बाबा जी बनकर ही वर्धा पहुंचे थे। यह उनकी पत्नी और उनकी वेशभूषा से साफ झलकता था।"

साभार - राजस्थानी पत्रिका 'सुजस' के स्वतंत्रता संग्राम अंक से लिया गया। पूर्ण लेख इमेज में..