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Sunday, November 27, 2022

AMIT LODHA IPS - A SUPER COP - SINGHAM

AMIT LODHA IPS - A SUPER COP - SINGHAM 

Khakee The Bihar Chapter वेब सीरीज आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा के जीवन और उनकी किताब ‘द बिहार डायरीज’ से प्रेरित है।


Khakee The Bihar Chapter: नेटफ्लिक्स (Netflix) पर आज यानी 25 दिसंबर को सुपर कॉप की कहानी ‘खाकी: द बिहार चैप्टर’ रिलीज हो रही है। डायरेक्टर-प्रोड्यूसर नीरज पांडे (Director Neeraj Pandey) द्वारा लिखी वेब सीरीज IPS अधिकारी अमित लोढ़ा (IPS Amit Lodha) पर आधारित है। अमित लोढ़ा ने इस कहानी को अपनी पुस्तक ‘द बिहार डायरीज’ (The Bihar Diaries) में भी शामिल किया है। अमित को ‘बिहारी सिंघम’ भी कहा जाता है।


कौन हैं IPS अमित लोढ़ा?

आईपीएस अमित लोढ़ा मुख्य रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर से पूरी की है। साल 1998 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं। अमित लोढ़ा बहुत कम उम्र में भारतीय पुलिस सेवा में शामिल हो गए थे। अमित लोढ़ा को बिहार कैडर मिला।

अमित साल 2006 में पहली बार तब चर्चा में आए, जब उन्होंने शेखपुरा (Criminal History of Sheikhpura) के ‘गब्बर सिंह’ कहे जाने वाले अशोक महतो और उसके साथी पिंटू महतो जेल पहुंचाया था। अमित लोढ़ा ने यह काम तब किया था, जब बड़े-बड़े पुलिस वाले हिम्मत हार गए थे। इसी के चलते उन्हें वीरता पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था।

शुरुआत में शर्मीले स्वभाव के थे अमित

अमित लोढ़ा शुरुआत में दब्बू और शर्मीले स्वभाव के थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद यह बात कही थी। अमित ने पहले प्रयास में IIT दिल्ली की परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन यहां उनका अनुभव बहुत ही भयानक था। आईआईटी के बाद उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास करके खुद को साबित करने की कोशिश की और अपनी कड़ी मेहनत और लगन के कारण सफल हुए। अमित कहते हैं कि पुलिस सेवा ने उन्हें आत्मविश्वास हासिल करने में काफी मदद की।

IPS अमित के नाना थे IAS

IPS अमित लोढ़ा की गिनती बिहार के टॉप IPS अफसरों में होती है। वे वर्तमान में पुलिस महानिरीक्षक (IG) के पद पर तैनात हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक, पुलिस पदक और आंतरिक सुरक्षा पदक से भी सम्मानित किया गया। आपको बता दें कि IPS अमित लोढ़ा के नाना IAS अधिकारी थे। अमित, बचपन से ही अपने नाना और अपने आसपास रहने वाले पुलिसकर्मियों और उनकी वर्दी के प्रति आकर्षित थे।

अक्षय कुमार के साथ मिलकर लॉन्च किया था ‘भारत के वीर’

गृह मंत्रालय के साथ अपने दोस्त और अभिनेता अक्षय कुमार (Akshay Kumar) के सहयोग से उन्होंने bharatkeveer.gov.in लॉन्च करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इस पोर्टल में केंद्रीय सशस्त्र अर्धसैनिक बल के शहीद जवानों के चित्र और विवरण हैं, ताकि आम लोग अपने परिवारों की सहायता के लिए योगदान कर सकें। दो साल से भी कम समय में इस पहल ने 205 परिवारों को समर्थन देने के लिए 45 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए हैं।

पत्नी का मिलता है सहयोग

अमित लोढ़ा की पत्नी तनु लोढ़ा हाउस वाइफ हैं। एक बार उन्होंने साक्षात्कार में बताया कि, “सौभाग्य से मेरी पत्नी तनु, बहुत ही समझदार हैं। वह दिखने में भले ही साधारण और नाजुक हों, लेकिन वह अंदर से बेहद मजबूत हैं। जब मैं नक्सली इलाकों मुठभेड़ के लिए जाता हूं, तो सबसे पहले वही मुझे अपनी बंदूक थमाती हैं। कभी-कभी तो मैं भी नहीं सोच पाता हूं जब वह इतने विश्वास के साथ पूछती है, ‘जब आप शाम को लौटें, तो क्या मैं आलू के पराठे बनाऊं?’ उसे विश्वास है कि मैं सकुशल वापस आ जाऊंगा और यह एक छोटी सी बात हो सकती है, लेकिन 

एक घटना ने बदल दिया जीवन

अमित लोढ़ा की जिंदगी पर कॉलेज के दिनों की एक घटना ने गहरा असर डाला। अमित के मुताबिक वे स्क्वैश खेल रहे थे, तभी एक खिलाड़ी ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें कोर्ट से बाहर कर दिया। उसने कहा “यह खेल तुम्हारे जैसों के लिए नहीं है।” इस बात से अमित को काफी बुरा लगा लेकिन उनके अंदर एक ऊर्जा जगी। उन्होंने हर रात 1 बजे अभ्यास शुरू किया और तीन महीने बाद कॉलेज स्क्वैश टीम में शामिल हो कर उसी व्यक्ति को हराया।

अमित बताते हैं, “मुझे यह सफलता इस आत्म-विश्वास से मिली है कि यदि मैं किसी भी कार्य को 100 प्रतिशत से अधिक देता हूं, तो मैं सफल हो सकता हूं। मैंने उसी विश्वास के साथ अपनी UPSC की तैयारी शुरू कर दी। मैंने सुबह 4 बजे सोने और 1 बजे उठने की अपनी आदत को बदला, ऐसा कॉलेज की परीक्षाओं के दौरान किया था। मैंने एक सख्त शेड्यूल बनाया और उसका व्यवस्थित रूप से पालन किया। IIT में मैथ्स में ई ग्रेड मिलने के बाद इस सब्जेक्ट से डर लगता था लेकिन यूपीएससी के दौरान मैंने इसमें टॉप किया!”

MUKESH AMBANI WORLD - सब्जी से लेकर पेट्रोल-डीजल तक... रिलायंस ने आपके लिए बनाए 200 से ज्यादा ब्रांड्स

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देखें मुकेश अंबानी की दुनिया:सब्जी से लेकर पेट्रोल-डीजल तक... रिलायंस ने आपके लिए बनाए 200 से ज्यादा ब्रांड्स

सोचिए क्या कोई ऐसी कंपनी हो सकती है जो घर की जरूरत का लगभग हर सामान अपने ब्रांड के तहत बनाती और सर्विस देती हो। सब्जी से लेकर दाल, चावल, दूध जैसा सामान, कपड़े, मोबाइल फोन, इंटरनेट कनेक्शन और यहां तक की पेट्रोल-डीजल भी। ये कंपनी सुबह के नाश्ते से रात के बिंजवाच तक आपकी जिंदगी का हिस्सा है...

भारत में लाखों लोग दुनिया के 8वें और एशिया के दूसरे सबसे अमीर कारोबारी मुकेश अंबानी की कंपनियों या उनके साथ पार्टनरशिप करने वाली फर्म्स के प्रोडक्ट और सर्विसेज पर निर्भर हैं। फोर्ब्स के अनुसार, रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी की नेटवर्थ 93.2 बिलियन डॉलर यानी करीब 7.6 लाख करोड़ रुपए है।

मुकेश अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी ने 1950 के दशक में कपड़े के व्यापार से इस कंपनी की शुरुआत की थी। टेक्सटाइल से शुरू हुआ कंपनी का सफर आज एनर्जी, मटेरियल, रिटेल, मीडिया एंड एंटरटेनमेंट और डिजिटल सर्विस में फैल गया है। कंपनी 200 से ज्यादा प्रोडक्ट और सेवाएं आपको दे रही है।

ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल होगा कि आखिर रिलायंस इंडस्ट्रीज का साम्राज्य कितना बड़ा है? ये ग्रुप क्या-क्या सामान और सर्विस प्रोवाइड करता है। ऐसे कितने ब्रांड है जो रिलायंस के हैं। यहां हम आपको ग्राफिक्स के जरिए रिलायंस के इस साम्राज्य के बारे में बता रहे हैं।

restofworld.org की रिपोर्ट से बनाए ग्राफिक्स में आप देख पाएंगे कि कैसे मुकेश अंबानी की कंपनियों के कोई न कोई प्रोडक्ट और सर्विसेज से लगभग हर भारतीय जुड़ा है।












Tuesday, November 1, 2022

RUCHI JAYASWAL - A GREAT ACHIEVER

RUCHI JAYASWAL - A GREAT ACHIEVER

संडे जज्बात झुग्गी-झोपड़ी से अमेरिका पहुंची:पापा स्कूल नहीं भेजते, जहर खाने की धमकी देते; 32 लाख का फ्लैट गिफ्ट किया तो रोने लगे

चंडीगढ़ का बापूधाम स्लम एरिया। पता जानते ही लोग मुंह फेर लेते। मानो मेरे चेहरे पर चोर उचक्का लिखा हो। खाने को कभी रूखा-सूखा मिल जाता, तो कभी वो भी नसीब नहीं होता। ऊपर से पापा का अलग ही खौफ। कॉलेज जाने लगी तो पापा ने खाना-पीना छोड़ दिया। नौकरी लगी तो जहर खाने की धमकी दे दी, लेकिन मैं तय कर चुकी थी कि गरीब पैदा हुई हूं, पर गरीब मरना नहीं है।

जब 40 हजार रुपए कमाकर पापा को दी, तो उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि बेटियां भी काम की होती हैं। जब 32 लाख का फ्लैट खरीदा और पापा को उसकी चाबी दी, तो वे इमोशनल हो गए, उनकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे। आज अपने पास सबकुछ है। स्लम के फूटपाथों से निकलकर अमेरिका घूम चुकी हूं, अब ऑस्ट्रेलिया की उड़ान भरने वाली हूं।

चलिए अब आपको अपनी कहानी बताती हूं….

मैं रुचि जायसवाल, 26 साल की हूं और चंडीगढ़ के पास जीरकपुर में रहती हूं। बचपन चार बहनों और एक भाई के साथ बापूधाम में बीता। पापा छोटा-मोटा काम करते थे। कभी चलता था कभी नहीं भी। एक वक्त का खाना भी बड़ी मुश्किल से नसीब होता था।

ऊपर से लोगों के ताने। प्राइवेसी नाम की तो कोई चीज ही नहीं थी। जिसका जब मन घर चला आता, जो मन बोलकर चला जाता।

पर मेरे अंदर एक चीज थी कि मुझे इस स्लम से बाहर निकलना है। 2008 की बात है। मैं अपने स्लम के पास के स्कूल में पढ़ती और हैंडबॉल भी खेलती। मेरा हैंडबॉल के लिए नेशनल टीम में सिलेक्शन हो गया। मुझे छत्तीसगढ़ जाना था। पापा से बताया तो उन्होंने साफ मना कर दिया।


उनके ऊपर खुद से ज्यादा रिश्तेदारों का असर था। उन लोगों ने ही पापा से कहा कि घर की बेटी को बाहर नहीं जाने दो। ये नेशनल खेलना बड़े घर की बेटियों का काम है। हमारे घर की बेटी बाहर जाएगी तो इज्जत की ऐसी-तैसी हो जाएगी।

मैंने भी तय कर लिया था कि मुझे वहां जाना है। मैं भी तो देखूं कि बड़े घर की लड़कियां कैसे नेशनल खेलती हैं। पापा ने तो साफ कह दिया कि एक पैसा नहीं दूंगा, देखते हैं कैसे जाती हो। खैर मैं बिना पापा की मर्जी के निकल पड़ी छत्तीसगढ़ के लिए। रहना-खाना फ्री था, इसलिए पैसे की कोई खास दिक्कत नहीं हुई। पापा के साथ ये मेरी पहली बगावत थी।

इसके बाद तो बगावत का सिलसिला चलता रहा। जब भी कहीं बाहर जाने का होता, घर में कलह मच जाती, लेकिन मैं भी अपने इरादे से टस से मस नहीं हुई। कई बार नेशनल खेलने गई। पांच बार मेडल भी जीता।


ये तस्वीर मेरे जन्मदिन की है। स्लम एरिया में रहने वालों के लिए जन्मदिन मनाना ही बड़ी बात होती है।

2012 की बात है। मैं और दीदी 10वीं कर चुके थे। घर के लोगों को लगता था कि बेटी 10वीं पढ़ ली, बस हो गया, इससे आगे पढ़ने की जरूरत नहीं। दोनों बहनों ने पापा से कहा कि हमें 12वीं तो कम से कम करने दीजिए। बहुत मिन्नतें करने के बाद आखिरकार पापा मान गए।

12वीं बाद मेरे दिमाग में यह बात घूमने लगी कि अब जैसे भी करके कुछ पैसे कमाना है। इस गरीबी से बाहर निकलना है। दरअसल गरीबी बताती नहीं है, लेकिन महसूस बहुत कुछ करवाती है।

जब भी हम किसी दोस्त के घर जाते या स्कूल में कोई पूछता कि कहां रहते हो, मैं कहती कि बापूधाम में तो उसका बात करने का नजरिया ही बदल जाता। उन्हें लगता कि हम चोर-उच्चके हैं। ऐसा लगता था कि जैसे बापूधाम में रहना गुनाह हो।


हम दोनों बहनें कॉलेज जाना चाहती थीं। इधर घर में मेरी बहन की शादी की बातें हो रही थीं। मेरे साथ की कई लड़कियों की शादी हो भी गई थी। मुझे लगा कि बहन की शादी हो गई, तो उसके बाद तो मेरा ही नंबर है। पता नहीं कैसा लड़का मिलेगा, सारी जिंदगी गरीबी में ही चली जाएगी। शादी, उसके बाद बच्चे और घर गृहस्थी।

मुझे लगा कि अभी नहीं तो कभी नहीं। मैंने पापा से कहा कि मुझे कॉलेज जाना है। वो मुझसे कहने लगे कि तुझे पता है कि तू क्या कह रही है?

मैंने कहा कि हां अच्छी तरह से पता है कि क्या बोल रही हूं। पापा ने कहा कि कॉलेज तो कोई खानदान की लड़की नहीं गई। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया। इमोशनल ब्लैकमेलिंग होने लगी। घर का माहौल जहरीला हो गया। मुझे घुटन होने लगी। मुझे लगता था कि शादी करना जीवन का अंत होगा। दिन-रात दिमाग में एक ही बात रहती कि पापा कैसे मानेंगे..कैसे मानेंगे।

पापा ने फिर एक और हथकंडा अपनाया कि कॉलेज जाओगी तो पैसे नहीं दूंगा, फीस नहीं दूंगा। मैंने चुप्पी साध ली। मैंने सोचा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, पैसे कमाकर फीस निकाल सकती हूं। अपनी एक सहेली से बात की, उसकी बहन कॉल सेंटर कंपनी में काम करती थी। उसके जरिये मुझे वहां 4500 रुपए महीने की नौकरी मिल गई।

मैंने पापा को बताया कि मुझे नौकरी मिल गई है। इसपर तो घर में बवाल हो गया। पापा ने कहा कि आज तक हमारे घर में किसी लड़की ने नौकरी नहीं की। तुम नौकरी करोगी तो मैं जहर खा लूंगा।

मैं अंदर ही अंदर डर गई। बिस्तर पर पड़ी कई दिन सोचती रही कि क्या करूं। फिर दिमाग में आया कि ऐसे कोई इतनी जल्दी अपनी जान नहीं देता है। तीन दिन बाद मैंने हिम्मत कर पापा से कहा कि आपको जो करना है कर लो, मैं नौकरी करूंगी और कॉलेज जाऊंगी। उस वक्त मां ने पापा को समझाया, क्या समझाया मुझे नहीं पता, लेकिन वे कॉलेज भेजने के लिए राजी हो गए।


मैं कॉलेज जाने लगी। एक साल निकल गया। पापा मुझसे बात नहीं करते थे। सेकेंड ईयर की बात है, पापा का काम बंद हो गया। घर में पैसे आने बंद हो गए। हालात ऐसे हो गए कि एक-एक किलो आटा आने लगा। मां ने राशन खरीदने के लिए अपनी अंगूठी तक बेच दी। मैंने उस दिन मां को रोते हुए देखा था। वो सीन मेरे दिमाग में बस गया।

तब कॉलेज से छुट्टियां होने वाली थीं। मैंने दीदी से कहा कि क्या हम छुट्टियों में पार्ट टाइम काम कर सकते हैं। घर के पास ही नया मॉल खुला था। हम दोनों बहनें शाम में वहां काम करने के लिए जाने लगीं। तीन महीने में हम दोनों ने 40,000 रुपए कमाए और जब पापा को वो पैसे दिए, तो उस दिन पापा को आइना दिखा।

उन्हें पहली बार लगा जिन बेटियों को वे हर कदम पर रोकते रहे, वो कैसे मुसीबत में ढाल बनकर खड़ी हो गईं।

पापा अब मुझसे थोड़ा ठीक से बात करने लगे। 2015 में मैंने ग्रेजुएशन कर लिया। स्लम एरिया में ही एक एनजीओ की ओर से चलाए जा रहे एक प्रोग्राम में एडमिशन लिया। वहां कम्युनिकेशन स्किल्स सिखाए जाते थे। इंटरकंट्री प्रोग्राम होते थे, विदेश से कई लोग आते थे। मुझे इसका बहुत फायदा हुआ और मल्टीनेशनल टॉय स्टोर में काम मिल गया।

नौकरी के दौरान मैंने देखा कि लोग अपने बच्चों के लिए 20 हजार रुपए तक के खिलौने खरीदते थे। मैं हैरान होती थी ये कौन से बच्चे हैं, जो इतने मंहगे खिलौनों से खेलते हैं। मैं इससे प्रेरित होती थी कि मुझे भी ऐसा बनना है, मुझे भी इनके जैसा दिखना है, मुझे भी ऐसा बोलना सीखना है, उठना-बैठना सीखना है।


स्लम एरिया में रहने के दौरान में अक्सर स्कूल जाकर बच्चों को पढ़ाती थी।

इसी बीच पापा को डेंगू हो गया। मुझे लगा कि पापा को कुछ हुआ तो हम सड़कों पर आ जाएंगे। लोग हमें अलग नजर से देखने लगेंगे। मुझे किसी तरह पापा को ठीक करना होगा। मैं अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद सीधे अस्पताल चली जाती थी। वहां रातभर पापा की सेवा करती। फिर सुबह काम पर जाती।

15 दिन बाद मुझे भी डेंगू हो गया। अब सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई। खैर 15 दिन बाद दोनों ठीक हो गए। मैं बहुत ज्यादा उस दौर को याद नहीं करना चाहती, बहुत मुश्किल भरे हालात थे हमारे।

इसके बाद मैंने अपनी अंग्रेजी पर काम करना शुरू किया। जिस दिन जो नया शब्द सुनती उसे लिख लेती और घर जाकर उसे रट लेती। नए-नए शब्द सुनती, सीखती, उल्टा-सीधा बोलती। कस्टमर के साथ अपनी अंग्रेजी झाड़ देती। ऐसा करते-करते अंग्रेजी बोलना सीख गई। तीन महीने के बाद तो मैंने ऐसा काम किया कि एक महीने में दो-दो लाख रुपए का इन्सेंटिव मुझे मिला।

एक और बात, तब मेरे कई कलीग कार से ऑफिस आते थे। वे मुझसे अक्सर कहते कि कार खरीद लो आप। पर मैं सोचती कि कार खरीदती हूं, तो स्लम एरिया में मेरा सिर छिपेगा, लेकिन मेरा परिवार तो उसी छत के नीचे रहेगा। मुझे उस छत को बदलनी थी।

एक दिन मैंने बहन से कहा कि हमें अब अपना मकान लेना है। किराए के घर में बहुत रह लिए। इसके बाद दोनों बहनें ओवर टाइम करने लगीं। मैं 15-15 घंटे काम करती थी और अच्छा खासा इन्सेंटिव कमाती थी।


2019 की बात है। मुझे पता लगा कि अमरीका के एक मल्टीब्रांड स्टोर में रिटेल एसोसिएट्स के लिए इंटरव्यू है। मैंने किसी से कुछ पैसे उधार लिए और तत्काल फ्लाइट से सीधे मुंबई पहुंच गई। 6 राउंड में मेरा इंटरव्यू हुआ। इसके बाद मेरा सिलेक्शन हो गया।

मैं शायद शब्दों में बयां नहीं कर पाऊंगी कि मेरे लिए वो कितना बड़ा दिन था। मां-पापा को तो पता ही नहीं चल रहा था कि ये सब कैसे मुमकिन हो गया। उन्हें शायद अंदर ही अंदर ये एहसास हो रहा था कि वे गलत थे।

अब बारी थी अमेरिका के लिए उड़ान भरने की। रास्ते में कुछ देर के लिए पेरिस में फ्लाइट रुकी, तो मैं वॉशरूम में बैठकर जोर-जोर से रोने लगी। बाहर निकली तो किसी ने पूछा कि क्यों रो रही हो? मैंने कहा कि मुझे घर की याद आ रही है, वो आदमी ऐसे चला गया, जैसे उसने मेरी बात ही नहीं सुनी हो।

उस दिन मुझे पता चला कि यहां ऐसे इमोशन्स की कोई जगह नहीं है। लोगों को अपने काम से मतलब है।


ये तस्वीर मेरे दिल के काफी करीब है। जब पहली बार अमेरिका पहुंची तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।


मां और दीदी के बीच खड़ी मैं। पीछे हमारे फ्लैट का नेम प्लेट दिख रहा है। यही फ्लैट मैंने 32 लाख रुपए में खरीदा था।

जब अच्छी खासी सेविंग्स हो गई तो चंडीगढ़ में मैंने 32 लाख रुपए का घर लिया। वो घर मैं पापा के नाम पर लेना चाहती थी, लेकिन डॉक्युमेंट के चक्कर में नहीं ले सकी, घर मैंने अपने नाम पर लिया और उसकी चाबी पापा को गिफ्ट की। पता है उस दिन पापा की शक्ल देखी नहीं जा रही थी। उनकी आंखों से आंसू बरस रहे थे।

एक साल तक मैं अमेरिका में रही, फिर हेल्थ की वजह से मुझे भारत आना पड़ा। इसके बाद 2021 में फिर से अमेरिका चली गई। अब लौट आई हूं। नई जगह नौकरी मिल गई है। जल्द ही ऑस्ट्रेलिया के लिए उड़ान भरने वाली हूं।

GAMINI SINGLA IAS

GAMINI SINGLA IAS