आदिकाल से लेकर मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के हर क्षेत्र में वैश्य समाज यानी बनिये का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं महाराणा प्रताप के समय में यह बात उस समय सिद्ध हो गई जब राणा जी पर परेशानी पड़ी और सेना एकत्रित करने के लिये पैसा चाहिये था तो भामाशाह ने अशरफियों का ढेर उनके सामने लगा दिया। इसी प्रकार अन्य शासकों के शासनकाल में भी वैश्य समाज के योगदान को बादशाओं व राजाओं ने खूब सराहा और फिर उन्हे बड़ी बड़ी पदवियां भी दी।
समाज सुधार और समाजवाद की व्यवस्था बनाने के क्षेत्र में महाराजा अग्रसेन जी का बड़ा योगदान रहा। साफ सफाई के लिये उनके समय में कई व्यवस्थाएं की गई बताई जाती हैं। तो समाज में सबको बराबर का दर्जा भी प्राप्त हो और हर व्यक्ति के पास घर और रोटी तथा व्यापार उपलब्ध हो इसके लिये उन्होंने अपने समय में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को एक रूपया एक ईंट देने का प्रचलन शुरू किया जिससे ईंटो से घर बनाया जा सकें और रूपयों से व्यवसाय हो सके और इसके लिये समाज का हर संपन्न व्यक्ति जिसके पास जितना होता था वो सबको एक एक ईंट देता था लेकिन अगर कम भी है तो एक रूपया एक ईंट सब दे देते थे।
राष्टपिता महात्मा गांधी के समाज में योगदान और आजादी में उनके कार्याें एक कुर्बानियों को कोई भी भुला नहीं सकता। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि वैश्य समाज बनियों का मानव जाति के उत्थान में बहुत बडा योगदान रहा है।
वर्तमान समय में तो अब जो भी कोई व्यवसाय कर रहा है चाहे वो किसी जाति से संबंध क्यों न हों वो व्यवसाय होने की वजह से हर व्यक्ति के लिये व्यापारी वैश्य की श्रेणी मे आता है। और जो नहीं जानता उसे बनिया कहकर ही पुकारता है।
आप गाडी या बस में यात्रा करते है तो वहां श्लोगन लिखा मिलता है अच्छे यात्री बनिए की बात पढाई की चली तो अभिभावक व हर बुजुर्ग कहता है अच्छे छात्र बनिए। राजनेता की बात चलती है तो भी एक जुमला हर जगह सुनने को मिलता है अच्छा नेता बनिये और अच्छा जनसेवक बनिये अच्छा व्यापारी बनिये और अब तो कितने ही स्थानों पर सुनने को मिलता है अच्छे ज्योतिषी बनिये और अच्छे पूजारी बनिये पुलिस वाले हर सम्मेलन और विचार गोष्ठी में कहते सुनाई देंगे अच्छे वाहन चालक बनिये अच्छे इंसान बनिये।
जब सवाल यह उठता है कि सर्वमान्य शब्द बनिये को प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों से कहा जाता है कि अच्छे बनिये तो फिर आलोचना क्यों? कितनी ही जगह जब कोई किस्सा या बात होती है तो घूमा फिराकर व्यापारियों या बनियों की आलोचना करने का मौका कोई नहीं चूकता। कुछ लोग तो राजनीति हो या कोई ओर क्षेत्र। सीधे सीधे या घूमा फिराकर व्यापारी और बनिया कहकर इनकी आलोचना करने में कोई कसर नहंी छोड़ते। कितने ही अफसर तो जब अकेले बैठकर बात करते हैं तो अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिये यह कहने से नहंीं चूकते कि वो बनिये वो ऐसा ऐसा वो तो वैसा हैं ।
मेरा मानना है कि हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनिया आखिर खराब कैसे हो सकते हैं। अगर कुछ लोगों को कमी दिखाई देती है तो वो पहले अपने अंदर झांककर देखे और जब वो एक उंगली दूसरे पर उठाता है तो तीन उंगूलियां उस पर उठ रही हैं। तो भैया मेरे कहने का मतलब यह है कि बनियों की आलोचना छोड़ उनके द्वारा जो हर मंच और हर क्षेत्र में उन्हे प्रमुख स्थान देने की बात उठ रही है उसमे अब कोताही न कर जितनी जिसकी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धांत को मानकर और वैश्य समाज बनियों के योगदान को देखते हुए उन्हे हर क्षे में अब समाज को प्रगति विकास को गति तथा जरूरतमंदों की मदद करने वाले इस समाज के लोगों को उनकी योगता और काबलीयत के आधार पर बढ़ावा देने में अब कोई कोताही किसी को नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह जब अच्छा बनिया है और हर कोई उसके जैसा बनना चाहता है तो उसकी अवहेलना ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है और जो उनको अधिकार नहीं देगा वो देर सवेर पिछड़ता ही रहेगा।
क्योंकि कुछ भी कह लों जिस प्रकार अन्नदाता किसान के योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता उसी प्रकार वैश्य व्यापारी और बनिया के योगदान को किसी भी क्षेत्र में कोई भी नकारने की स्थिति में सही मायनों में नहीं हैं। और गलत तरीके से किसी को परेशान करना अपनी ही हानि के मार्ग को खोलना ही कहा जा सकता है।
साभार: – रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
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