Friday, September 28, 2018

महान स्वतंत्रता सेनानी - लाला जयदयाल, लाला हरदयाल

१८५७ में जहाँ एक ओर स्वतन्त्रता के दीवाने सिर हाथ पर लिये घूम रहे थे, वहीं कुछ लोग अंग्रेजों की चमचागीरी और भारत माता से गद्दारी को ही अपना धर्म मानते थे। कोटा (राजस्थान) के शासक महाराव अंग्रेजों के समर्थक थे। पूरे देश में क्रान्ति की चिनगारियाँ १० मई के बाद फैल गयीं थी, पर कोटा में यह आग अक्तूबर में भड़की।

महाराव ने एक ओर तो देशप्रेमियों को बहकाया कि वे स्वयं कोटा से अंग्रेजों को भगा देंगे, तो दूसरी ओर नीमच छावनी में मेजर बर्टन को समाचार भेज कर सेना बुलवा ली। अंग्रेजों के आने का समाचार जब कोटा के सैनिकों को मिला, तो वे भड़क उठे। उन्होंने एक गुप्त बैठक की और विद्रोह के लिए लाला हरदयाल को सेनापति घोषित कर दिया।

लाला हरदयाल महाराव की सेना में अधिकारी थे,जबकि उनके बड़े भाई लाला जयदयाल दरबार में वकील थे। जब देशभक्त सैनिकों की तैयारी पूरी हो गयी, तो उन्होंने अविलम्ब संघर्ष प्रारम्भ कर दिया। १६ अक्तूबर को कोटा पर क्रान्तिवीरों का कब्जा हो गया। लाला हरदयाल गम्भीर रूप से घायल हुए। महाराव को गिरफ्तार कर लिया गया और मेजर बर्टन के दो बेटे मारे गये। महाराव ने फिर चाल चली और सैनिकों को विश्वास दिलाया कि वे सदा उनके साथ रहेंगे। इसी के साथ उन्होंने मेजर बर्टन और अन्य अंग्रेज परिवारों को भी सुरक्षित नीमच छावनी भिजवा दिया।

छह माह तक कोटा में लाला जयदयाल ने सत्ता का संचालन भली प्रकार किया, पर महाराव भी चुप नहीं थे। उन्होंने कुछ सैनिकों को अपनी ओर मिला लिया,जिनमें लाला जयदयाल का रिश्तेदार वीरभान भी था। निकट सम्बन्धी होने के कारण जयदयाल जी उस पर बहुत विश्वास करते थे।

इसी बीच महाराव के निमन्त्रण पर मार्च १८५८ में अंग्रेज सैनिकों ने कोटा को घेर लिया। देशभक्त सेना का नेतृत्व लाला जयदयाल, तो अंग्रेज सेना का नेतृत्व जनरल राबर्टसन के हाथ में था। इस संघर्ष में लाला हरदयाल को वीरगति प्राप्त हुई। बाहर से अंग्रेज तो अन्दर से महाराव के भाड़े के सैनिक तोड़फोड़ कर रहे थे। जब लाला जयदयाल को लगा कि अब बाजी हाथ से निकल रही है, तो वे अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी आ गये।

तब तक सम्पूर्ण देश में १८५७ की क्रान्ति का नक्शा बदल चुका था। अनुशासनहीनता और अति उत्साह के कारण योजना समय से पहले फूट गयी और अन्ततः विफल हो गयी। लाला जयदयाल अपने सैनिकों के साथ बीकानेर आ गये। यहाँ उन्होंने सबको विदा कर दिया और स्वयं संन्यासी होकर जीने का निर्णय लिया। 

देशद्रोही वीरभान इस समय भी उनके साथ लगा हुआ था। उसके व्यवहार से कभी लाला जी को शंका नहीं हुई। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने वाले को दस हजार रु. इनाम की घोषणा कर रखी थी।

वीरभान हर सूचना महाराव तक पहुँचा रहा था। उसने लाला जी को जयपुर चलने का सुझाव दिया। १५ अप्रैल, १८५८ को जब लाला जी बैराठ गाँव में थे, तो उन्हें पकड़ लिया गया। अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और फिर १४ सितम्बर, १८५८ को उन्हें कोटा के रिजेन्सी हाउस में फाँसी दे दी गयी। 

इस प्रकार मातृभूमि की बलिवेदी पर दोनों भाइयों ने अपने शीश अर्पित कर दिये। गद्दार वीरभान को शासन ने दस हजार रुपये के साथ कोटा रियासत के अन्दर एक जागीर भी दी।

महान समाज सुधारक महाराजा अग्रसेन

इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज में अनाचार, अत्याचार, दुराचार भ्रष्टाचार, हद से गुजरता है तो कोई अवतारी पुरूष जन्म लेता है और अव्यवस्थाओं व पापों के केन्द्र को नष्ट करता है। भगवान राम ने रावण का अन्त किया। भगवान कृष्ण ने कंस का अंत किया और अग्रसेन जी ने कुंदसेन का अंत किया। कंस श्रीकृष्ण का मामा था और कुंदसेन महाराजा अग्रसेन जी के चाचा थे।
Image result for महाराजा अग्रसेन

सभी अवतारी पुरूषों को जीवनभर कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि दूसरों की कठिनाईयां ही उनकी कठिनाईयां होती हैं। वे अपने जीवन के आदर्शाें से लोगो को जीना सिखाते है। जिस तरह दो राजाओं राम और कृष्ण के जीवन से कुछ न कुछ सीखते है, उसी प्रकार तीसरे राजा अग्रसेन के जीवन से बहुत सीख सकतें है। उन्होने अहिंसा खाई, यज्ञ में पशुबली को बंद किया। उन्होने त्याग सिखाया, इसके लिए उन्होने अपना वर्ण बदल लिया। वह क्षत्रिय से वैश्य हो गये। उन्होने परोपकार सिखाया। राज्य में आकर नये बसने वाले या किन्ही कारणों से अक्षम हो गये परिवारों को एक मुद्रा और एक ईंट का उपहार देकर उनकी मदद की प्रथा उन्होनें डाली। अन्य वस्तुओं के अलावा जीवन जीने के लिए धन बहुत जरूरी होता है! इसलिए महालक्ष्मी की पूजा करने की प्रथा उन्होनें डाली। राज्य का प्रत्येक नागरिक अपनी और राज्य की सुरक्षा करने में सक्षम हो, इसके लिए उन्होनें शस्त्र चलाना सीखना भी अपने राज्य में अनिवार्य किया।

अवतारी पुरूष धरती पर आते भी आसानी से नहीं है। कृष्ण के जन्म से पहले 8 भाई-बहनों का बलिदान देना पड़ा। कंस ने उन्हे पटक-पटक मार दिया था। अग्रसेन के माता पिता ने तो संतान की उम्मीद ही छोड़ दी थी। छोटे भाई कुंदसेन के पुत्र के पास सत्ता जाने के आसार बनने लगे थे। किन्तु शिवजी की आराधना के बाद उन्हे एक नहीं दो पुत्र प्राप्त हुए।

अग्रसेन पहले पुत्र थे। दूसरे पुत्र शूरसेन का जन्म कुछ वर्षो बाद हुआ। अग्रसेन जी का जन्म महाभारत शुरू होने से 15 वर्ष पूर्व अश्विन (कुआर) मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपदा) दिन रविवार को हुआ। उन्होने 108 वर्ष राज किया, वैशाख पूर्णिमा के दिन अपने पुत्र विभु को सौंपकर सन्यास ले लिया। वन चले गये और वहीं से परलोक सिधार गये।

एक सर्वगुण सम्पन्न राजा में तीन गुणों का होना अनिवार्य माना जाता है और महाराजा अग्रसेन जी चूंकि अवतारी पुरूष थे इसलिए इनमें वो तीनों गुण व्यापकता के साथ विद्यमान थे। ये गुण हैं : वीरता, धर्मप्रेम और दयालुता।

अग्रसेन जी की जीवनी पढते ही स्वतः ही ये गुण प्रकट हो जाते है।अवतारी पुरूष महाराजा अग्रसेन जी के बारे में थोड़ा विस्तार से और सिलसिलेवार जानते हैं।

हरियाणा में बीस गांवों का एक छोटा सा राज्य था – प्रतापनगर। यहाँ के राजा थे सूर्यवंशी बल्लभसेन। प्रतापनगर बहुत खुशहाल राज्य था। यह सरस्वतीए इष्टवती और घग्घर नदी के संगम पर बसा था। राज्य में बस एक ही कमी थी। राजा बल्लभसेन के कोई संतान नहीं थी। बल्लभसेन अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे और फिर वे सूर्यवंशी क्षत्रिय थे इसलिए दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे। पुरोहितों के कहने से राजा बल्लभसेन और उनकी पत्नी भागवती देवी ने शिवजी की अराधना की और शिवजी के वरदान स्वरूप अग्रसेन का जन्म हुआ। अग्रसेन के जन्म पर पूरे राज्य में खुशियां मनायी जाने लगी पर बल्लभसेन के छोटे भाई को यह खुशियां जरा भी नहीं भायी क्योकिं उसने सोच रखा था कि बल्लभसेन के संतान न होने की वजह से उसका पुत्र ही राजा बनेगा। उसका सपना टूट गया था।

अग्रसेन जी का जन्म कुआर सुदी प्रतिपदा के दिन 12 बजे हुआ था। उस समय महेन्द्र काल था। माना जाता है कि इस काल में जन्म लेने वाला व्यक्ति बहुत भाग्यवान और दैविक शक्तियों से पूर्ण होता है। वह शस्त्र-शास्त्र में निपुण और धनधान्य से भी परिपूर्ण होता है। अग्रसेन जी को शिक्षा-दीक्षा के लिए उज्जैन के आगर नगर में स्थित तांडव्य ऋषि के आश्रम में भेज दिया गया। 14 वर्ष की उम्र में वह शस्त्र-शास्त्र में पारंगत होकर आश्रम से राजमहल वापस आये। इसी समय बल्लभसेन और भगवती देवी की दूसरी संतान ने जन्म लिया। यह भी पुत्र था। इसका नाम शूरसेन रखा गया। इसी बीच राजा बल्लभसेन को पांडवों की और से युद्ध में भाग लेने का निमंत्रण प्राप्त हुआ।

बल्लभसेन पांडवों की ओर से युद्ध करने चल पड़े। पिता की रक्षा के लिए अग्रसेन जी भी उनके साथ हो लिए। बल्लभसेन ने जाते जाते छोटे भाई कुन्दसेन को राज्य की बागडोर सौंप दी थी।

कुन्दसेन और उसका बेटा दोनों ही अय्याश और गलत आचरण रखने वाले थे। महाभारत के युद्ध में नौ दिन बाद राजा बल्लभसेन वीरगति को प्राप्त हुए। पिता की मृत्यु पर अग्रसेन बहुत व्याकुल हुए। विलाप करने लगे। तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हे संसार के नश्वर होने का ज्ञान दिया। अग्रसेन जी ने पूर 18 दिन तक पांडवो का साथ दिया। युद्ध समाप्त होने पर उन्हें सम्मान के साथ उपहार भेंटकर विदा किया गया।

अग्रसेन जब अपने राज्य प्रतापनगर वापस आये तो यहां का माहौल ही बदला हुआ था। सेनापति से लेकर तमाम दरबारी अधिकारी भ्रष्ट और अय्याश हो चुके थे। कुंदसेन ने सेनापति को आदेश देकर अग्रसेन जी को उनके महल में बंदी बना दिया। अग्रसेन की मां भगवती भी बुरे दिन काट रही थी। विलाप करती रहती थी। अग्रसेन जी बहुत व्याकुल हुए। ऐसी परिस्थितियों में ईश्वर ही सहारा होता है। उन्होने ईश्वर की मदद मांगी और अचानक सुमते सामने आया। वह बल्लभसेन के दौर का प्रशासनिक अधिकारी था। उसने अपनी जान की बाजी लगा दी और अग्रसेन जी को मुक्त करा लिया।

अग्रसेन जी छिपते – छिपते बचते – बचते किसी तरह गर्ग मुनि के आश्रम में पहुंचे। गर्ग मुनि का आश्रम इष्टवती नदी के तट पर था। गर्ग मुनि ने उनका स्वागत कियाए उन्हे बहुत सांत्वना दी। गर्ग मुनि ने उन्हे महालक्ष्मी की पूजा करने का कहा। अग्रसेन जी ने महालक्ष्मी की पूजा शुरू की। उनकी श्रृद्धाए विश्वास और पूजा से प्रसन्न होकर ठीक दीपावली की रात महालक्ष्मी प्रकट हुई। उन्होने अग्रसेनजी को वरदान दिया कि श्मैं सदा तुम्हारे कुल में प्रतिष्ठत रहूंगी।

महालक्ष्मी जी ने ही अग्रसेनजी को यह राज बताया की उन्होने जिस स्थान पर बैठकर उनकी उपासना की है उस स्थान पर अपार सोना गड़ा है। यह वह बचा हुआ सोना है जो सौ अधवमेघ यज्ञ करने के बाद राजा मरूत ने ही इसे यहां दबा दिया था। महालक्ष्मी ने ही अग्रसेनजी को बताया की धरती से प्राप्त धन का मलिक राजा ही होता है। लक्ष्मी जी ने अग्रसेन जी को निर्देश दिया कि इस धन से वह बीहड़ में नये राज्य की स्थापना करें।

अग्रसेन जी अग्रोहा की धरती पर नये नगर की स्थापना में लग गये। गर्ग मुनि के शिष्यों ने उनकी पूरी मदद की। उबड-खाबड धरती को समतल किया गया सड़के और गलियां बनायी गई। पेड़ लगाये गये। बाग-बगीचे बनाये गये। महल और अन्य भवन बनाए गये। मंदिर और धर्मशालाऐं बनायी गयीं देखते हीे देखते उस नगरी में पक्षी चहकने लगे, बाग-बगीचे महकने लगे। मंदिर में शंख और घंटे बजने लगें। तालाब हवाओं को ठण्डे करने लगे, वृक्ष फल और छाया देने लगे, कोयल कूकने लगीं, मोर नाचने लगे। सुखः शान्ति और समृद्धि की बयार बहने लगी। आंनदमयी वातावरण का यह नगर “अग्रनगर” कहलाया।

अग्रनगर तैयार होने के बाद अग्रसेन जी ने अपने राज्य के विस्तार की बात सोची। लेकिन गर्ग मुनि ने उन्हे विवाह करने की सलाह दी। उन्होने ही कहा कि वह नागकन्या माधवी से विवाह करें क्योंकि नागराजा महोधर से सम्बन्ध होने के बाद उनकी शक्ति बढ़ेगी। गर्ग मुनि की बात सुनकर अग्रसेन जी नागकन्या के स्वयंवर में शामिल होने के लिए असम की और चल पड़े। असम पहुंचना आसान नही था। रास्ता लम्बा, कठिन और अन्जान था पर मुनि श्री का आदेश और राज्य के विस्तार की इच्छा ने उनके कदम नहीं रूकने दिये। वह स्वयंवर में पहुंचे। तमाम शर्ते पूरी करने और वाद – विवाद में जीतने के बाद उनका विवाह नाग कन्या माधवी से हो गया। इस तरह आर्य और शैव सभ्यता का मिलन हुआ। नागराजा महोधर ने इस खुशी में एक नया नगर “अगरतला” बसाया।

नागकन्या माधवी से विवाह के पश्चात अग्रसेन जी ने अपने राज्य में 18 राज्यों को मिलाया। आज भी ये राज्य जिलों के रूप में मौजूद हैं। इनमें दिल्ली समेत उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के जिले है। आज भी यहाँ पर सबसे ज्यादा अग्रवाल रहते है। ये जिले हैं – मेरठ, सहारनपुर, हिसार, झांसी, तोसाम, सिरसा, नारनौल, रोहतक, जीन्द, पानीपत, कैथल, जगाधरी, नामा, अमृतसर, अलवर, उदयपुर। अब अग्रनगर एक शक्तिशाली आग्रेय गणराज्य के रूप में स्थापित हो गया था और अग्रसेन जी महाराजा के रूप में प्रतिष्ठित हो गये थे। अन्य राजा भी अग्रसेन जी की कर्मठता की प्रशंसा करते थें।

साभार: #अग्रभागवत (अदृश्य स्याही से रचित दुर्लभ ग्रंथ) के आधार पर संकलित , राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

अग्रोहा व लक्खी तालाब




लेख साभार: डा. चम्पालाल गुप्त, मरुधर के स्वर , पत्रिका,  जमशेदपुर 

Tuesday, September 25, 2018

"Ramgarh Sethan" (Sethon ka Ramgarh) - सेठो का रामगढ़

"Ramgarh Sethan" or Ramgarh Shekhawati (Sethon ka Ramgarh)

रामगढ़ 1791 में सेठान पोद्दार सेठों ने बसाया था । ये राजस्थान के सीकर जिले में पड़ता है । वैसे तो शहर अपने राजा के नाम से जाने जाते हैं लेकिन राजस्थान का रामगढ़ सेठान या रामगढ़ सेठोका जाना जाता है अपने सेठों की वजह है । इसके इतिहास से एक बहुत ही दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है । पोद्दार चुरू , राजस्थान में व्यापार करते थे । वो बहुत ही सम्पन्न व्यापारी थे । उनके आलीशान हवेलियां उसमे की गई नक्काशी उनके रुतबे को दर्शाती थीं । अब वहाँ के राजा को इनकी अमीरी देख के जलन हुई उन्होंने इनपे टैक्स बड़ा दिए और वो टैक्स इतने ज्यादा थे कि पोद्दारों ने कहा ये गलत है और इसका विरोध किया । और विरोध इतना ज्यादा बढ़ गया कि पोद्दारों ने कहा "हम चुरू छोड़ के जा रहे हैं और जहाँ भी जाएंगे वहाँ इससे भव्य और आलीशान नगर बसायेंगे ।" उसके बाद सीकर के महाराज रामचंद्र सिंह की मदद से पोद्दारों ने सीकर में रामगढ़ शेखावाटी या रामगढ़ सेठान बसाया । 1830 में एक ब्रिटीश ट्रैवलर ने इसकी भव्यता के लिए लिखा -

"Ramgarh is singularly striking and seems to give reality to a vision drawn from eastern romance. The buildings are all constructed from kunkur [gravel] grey hardpan, …numerous handsome houses of the seths [businessmen] some of which are on a magnificent scale, ornamented and painted in various devices outwardly; the neat high wall and gateways and the cupolard chhutrees [cenotaphs] in the suburb in contrast with the desert around, altogether exhibit a scene deserving to be allied with enchantment." But that was more than a century and a half back. Now the town clearly shows signs of aging. However, that doesn’t make Ramgarh less interesting; old is beautiful. and in any case, Ramgarh boasts of more paintings than any other town in Shekhawati."

रामगढ़ सेठान उन्नीसवीं शताब्दी का भारत के सबसे अमीर नगरों था । इसकी भव्य हवेलियां , छतरियां और मंदिर भारत की प्राचीन कला और वास्तुशास्त्र का अद्भुत उदाहरण हैं । छतरियाँ भारत की सबसे बड़ी Open Air Art Gallery है । उसमें रामायण और राधा कृष्ण की कला कृतियाँ बनी हैं ।

लेकिन दुर्भाग्य आज बच्चे बड़े हो गए और इस नगर को छोड़ गए । कुछ विदेशों में या दूसरी जगहों पे बस गए ।हवेलियां वीरान हैं अब सिर्फ आम जनता रहती हैं । लेकिन नगर की छतरियाँ , हवेलियां , बावड़ियां , मंदिर और उनपे बनी कला कृतियाँ आज भी 19 वीं सदी के उस महान गौरव की जलक से रुबरु करती है ।

रामगढ़ सेठान के बारे में कुछ दिलचस्प चीजें -

रामगढ़ सेठान भारत के सबसे अमीर नगरों में था । इसके सेठ पोद्दार और Ruia बहुत ही उदार और दयालु थे और उन्होंने बहुत सी दिलचस्प चीजें की थी .

1. रामगढ़ सेठान का सारा टैक्स केवल सेठ भरते थे ।

2. इन्होंने काफी स्कूल , कॉलेज , हॉस्पिटल और धर्मशालाएं खोली थीं ।

3. रामगढ़ सेठान को उस समय #छोटा_काशी कहा जाता था क्योंकि उसमें 25 संस्कृत के विद्यालय थे , उसमे आयुर्वेद और ज्योतिष के लिए विद्यालय थे और उस समय जयपुर के अलावा केवल रामगढ़ में कॉलेज था ।

4. सभी विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा , मुफ्त खाना और सभी चीजें मिलती थीं ।

5. सेठों के लड़कों के विवाह में नगर के सभी लोग आमंत्रित होते थे और जो भी आता था उसे हेड़ा दिया जाता था जो कि बहुत प्रसिद्ध था । जो भी आता था उसे एक रुपये दिए जाते थे जाते समय कुछ लोग तो तो अपने साथ अपने मवेशी लाते थे उनके लिए भी ले जाते थे । एकबार एक आदमी लोटा भर के चीते लाया और हर चीटे के लिए हेड़ा मांगा और उसे दिया भी गया ।

6. गौशाला में गायों के लिए 60-70 मन (2400 किलो)ग्वार रहता था जो कि जिसका प्रबन्द सेठों द्वारा किया जाता था ।

7. उनके लड़के की शादी के वक़्त खुली लूट रहती थी पूरे नगर में कोई भी जिसके घर मे शादी है उसकी दुकान से कुछ भी ले सकता था जिसका नुकसान जिस सेठ के लड़के की शादी है वो ही उठाता था ।

8. एकबार किसी गांव के एक गांववाले ने सीकर के महाराज से शिकायत की आप रामगढ़ वालों पे इतना ज्यादा ध्यान क्यों देते हैं । राजा ने उनकी परीक्षा ली कहा कि तुमलोग 1 करोड़ रुपये का प्रबन्द करो अभी । और पूरे सीकर में । लोगों ने मना कर दिया कहा ऐसा नहीं हो सकता है । फिर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा कि रामगढ़ जाओ और सेठों को बोलो की महाराज को इस समय एक करोड़ रुपये चाहियें (इस समय के करीब अरबों में ) । मंत्री गए और सेठों को बताया । सेठों ने कहा कि राजा से पूछो की रुपये ,अन्ना ,पैसे किसमे चाहिए ? मंत्री आये और राजा को बताया । राजा ने कहा अब समझे मैं रामगढ़ सेठान का इतना ध्यान क्यों रखता हूँ ।

9. पोद्दारों ने वहाँ कुएं , तालाब , बावड़ी , मंदिर , छतरियाँ और आलीशान हवेलियां बनवाईं थीं वहीं Ruias ने कॉलेज , स्कूल और हॉस्पिटल इत्यादि ।

10. सेठ श्री अनंत राम पोद्दार जी जाड़ों में सियारों को लाडू और कंबल देते थे ताकि वो मर न जाएं ।

11. भक्तवारी देवी , सेठ श्री लक्ष्मी चंद पोद्दार जी की धर्म पत्नी गुप्त दान करतीं थीं । उन्होंने अपने मुनीम को बोल दिया था कि नगर में कोई भूखा नहीं रहना चाहिए न ही किसी को किसी बात की चिंता हो ।

12. बहुत से भारत के अमीर कॉरपोरेट्स यहीं से निकले हैं जैसे Esaar ग्रुप के Shashi Ruia और Ravi Ruia .

13. भारत की पहली रजिस्टर्ड कंपनी सेठ श्री ताराचंद घनश्याम दस पोद्दार की थी जिसमे मशहूर उद्योगपति GD Birla जी और स्टील किंग Lakshmi Niwas Mittal के पितामाह ने काम किया था ।

साभार  Prakhar Agrawal की फेसबुक वाल से 
~ प्रखर अग्रवाल , अग्रवाल समाज के बुद्धिजीव , अग्रवाल इतिहास के संरक्षक





परस्पर_विरोधी_संस्कृतियों_के_समन्वयक : श्री_अग्रसेन

ऐतिहासिक सत्य है कि वैष्णव (आर्य) एवं शैव (नाग) संस्कृतियां परस्पर विरोधी रही हैं। साम्प्रदायिक दुर्भाव तथा धर्मान्धता के दुर्गुणों के कारण मानवीय इतिहास, भयंकर द्वंदों तथा रक्तपात के दुराचरण से सदा कलंकित होता रहा है। नागराज महीधर, वैष्णवों से द्वेष भाव रखते थे, वे यह सोचते थे कि वैष्णव शिवद्रोही हैं, (नाग संस्कृति के पोषक नागराज, भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के, नागों से वैर की भावना के वशीभूत) वे सदैव वैष्णवों के दोष ही ढूंढा करते थे। उनका मानना था कि –

"यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दव: ।
तथा न श्लेषमिच्छन्ति ज्ञातय: स्वेषु सौहृदम् ॥"

जैसे कमल के पत्तों पर पर गिरी हुई पानी की बूंदे, उसमें अधिक देर नहीं टिकती, वैसे ही आर्यों के हृदय में, परस्पर सौहाद्र अधिक देर नही टिकता। ऐसे वैष्णवों के अनकों दोषों का बखान करते हुए उनका मत था –

"हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातय: सदा ॥
नागकन्यां प्रार्थयानस्त्वं नाप्यामकृतात्मभिः ।"

वहां ( वैष्णव ) सर्वदा अपने अन्य सजातीय बंधुओं के दुख में या आपत्ति में पडने पर ही हर्ष मनाते हैं । जिनका अन्तःकरण शुध्द नहीं है, अथवा जो पुण्यात्मा नहीं है, उन वैष्णवों के लिये नागकन्या की प्राप्ति असंभव है।

नागराज का ऐसा विचार उनके आर्यों के प्रति द्वेष भाव तो था ही, इसीलिए उन्होने स्वयंवरा माधवी जी का विवाह देवराज इन्द्र के साथ करने का निश्चय कर रखा था। जबकि नागलोक की परम्परा के अनुकूल कन्या स्वयं वर का चयन करती थी। नागसुता माधवी जी ने श्री अग्रसेन के परम दयाभाव को देखते ही मन ही मन उनका वरण कर लिया था। तथापि नागपाश बंधन से विमुक्त श्री अग्रसेन ने अपनी चैतन्य बुद्धि व दिव्य ज्ञान के प्रकाश से नागराज व उनकी सभा को विनम्रतापूर्वक पराभूत कर दिया। इस संदर्भ में महर्षि जैमिनी जी का कथन दृष्टव्य है –

"युवा मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविद: ।
सर्वानेव निजग्राह चकार निरुत्तरम् ॥"

जैमिनीजी कहते हैं – श्री अग्रसेन युवा होकर भी , श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त तथा ज्ञान विज्ञान में प्रवीण थे, इसलिये अपने तर्क पूर्ण आग्रह वचनों से, उन्होंने नागलोक के उन सभी को निगृहीत करते हुए, निरुत्तर कर दिया ।

महामानव श्री अग्रसेन ने ‘वैष्णव-शैव’ परस्पर विरोधी संस्कृतियों में समन्वय स्थापित करने का जो अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह साम्प्रदायिक सदभाव की प्रेरक शक्ति बने। दो भिन्न संस्कृतियों के इस गंगा-जमुनी मिलन के अनुपम ‘श्री अग्रमाधवी’ विवाहोत्सव के रोचक प्रसंग दृष्टव्य हैं-

वर्गावुभौ नागनराधिपानां व्दारेऽपिधाने ह्युभयप्रदेशात्‌।
समीयतुर्व्दावपि भिन्नवेषौ भन्नैकसेतू पयसामिवोघौ ॥

जब, वर और कन्या दोनों पक्ष वाले, वे ( दो भिन्न संस्कृतियां) नाग और नर एक द्वार पर आकर मिले, तो ऐसा लगने लगा कि जैसे – बांध के टूट जाने पर अलग – अलग नदियों की दो धाराएं आकर परस्पर मिल गई हों ।

वैवाहिके कौतुक संविधाने वर्गावुभौ नागनराधिपानाय् ।
एकीकृतौ सानुमतोऽनुरागादस्तान्तरावेक कुलोपमेयम् ॥

विवाह के इस उत्सव में, नाग और नर दोनों ही वर्ग, वहां प्रेममय, एकरस होकर इस प्रकार मिल रहे थे, कि सभी विभेद मिट गए। तब ऐसा लगने लगा कि जैसे वे एक ही कुल के हों। दो संस्कृतियों के, दो सभ्यताओं के, ऐसे मनोहारी मिलन की स्मृति को जीवंत रखने हेतु, नागराज महीधर ने अपने नागलोक के तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, और पाताल इन सात लोकों में से एक तल (राज्य) सांस्कृतिक समन्वय के पुरोधा श्री अग्रसेन के नाम से ”अग्रतल” के रुप में घोषित कर दिया –

अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम्‌ ॥

नागराज महीधर ने कहा – ” अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम् ” इस नागलोक का यह उत्तम तल (राज्य) आज से श्री अग्रसेन के नाम से पुकारा जाएगा ।

"सुसंस्कृतेभ्य: सर्वेभ्य: रमणीयो भविष्यति ।
इदमग्रतलं नाम्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ ॥"

दोनों संस्कृतियों (शैव और वैष्णव संस्कृति) का यह सम्मलित केन्द्र अत्यंत मनोहर प्रदेश ”अग्रतल” के नाम से (देवलोक,नागलोक,मानवलोक) तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा ।

"सर्वरत्नाकरवती सर्वकामफलद्रुमा ।
सर्वाश्रमाधिवासा साऽग्रतलाख्य गुणैर्युता ॥"

इस तल पर जो नगर बसेगा (बसाया जाएगा) वह सब प्रकार के रत्नों की खान होगा। यहां के वृक्ष सम्पूर्ण मनोवांच्छित कामनाओं को, फल के रूप में प्रदान करने वाले होंगे सभी आश्रमों के लोग यहां निवास करेंगे, और यह नगर समस्त अभिलाषित गुणों से परिपूर्ण होगा।

सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक वह श्री अग्रसेन जी का विवाह स्थल ”अग्रतल” आज भी अगरतला के रूप में विद्यमान है और वर्तमान में त्रिपुरा की राजधानी है।

श्री अग्रसेन जी के इस सांस्कृतिक सामन्जस्य के ऐतिहासिक प्रयास ने वैष्णव एवं शैव संस्कृतियों तथा विचारधारओं को एक नए दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जो सारे विश्व के विभिन्न दर्शनों में अद्वितीय है एवं आज के विषैले साम्प्रदायिक तथा धर्मान्ध वातावरण से ग्रसित विश्व के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक व मार्गदर्शक भी ।

साभार:  ©- रामगोपाल ‘बेदिल’, 'अग्रभागवत के आधार पर संकलित', Prakhar Agrawal की फेसबुक वाल से

Monday, September 24, 2018

रामभक्त वैश्य समाज के शहीद कारसेवक


मारवाड़ी हूँ मैं तो लेखनी की इस श्रृंखला की शुरुवात मारवाड़ से ही करता हूँ ....
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकत्ता कहने तो बंगाल की राजधानी है किंतु विश्व में सबसे ज्यादा मारवाड़ी अगर किसी जगह रहते हैं तो वो जगह है कोलकत्ता ....
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही कोलकत्ता मारवाड़ी उद्यमियों का गढ़ बना हुआ है .... कोलकत्ता का शायद ही ऐसा कोई हिन्दू मोहल्ला गली कॉलोनी सड़क बाजार उपनगर हो जहां हम मारवाड़ियों के घर गोदाम दुकान ऑफिस गद्दी प्रतिष्ठान ना हो ....
पश्चिम राजस्थान में मेरा पड़ौसी जिला है बीकानेर ....
इसी बीकानेर जिले के एक कोठारी जी करीब डेढ़ शताब्दी पूर्व कोलकत्ता गए उदर पूर्ति (नौकरी/उद्यम) हेतु .... और कोठारी जी कोलकत्ता में ही रच बस गए ....
कालांतर में उन कोठारी जी के वारिश हुए श्री हीरालाल जी कोठारी ....
हीरालाल जी कोठारी के परिवार में कुल जमा पांच सदस्य थे .... एक हीरालाल जी कोठारी स्वयं यानी परिवार के मुखिया .... हीरालाल जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुमित्रा कोठारी .... हीरालाल जी की ज्येष्ठ पुत्री पूर्णिमा कोठारी और उसके बाद हीरालाल जी के दो पुत्र .... बड़े पुत्र 22 वर्षीय शरद कोठारी और छोटे पुत्र 20 वर्षीय राम कोठारी ....
कोठारी बांधूओं (शरद/राम) को बचपन से ही देशभक्ति और हिंदुत्व के संस्कार अपने धर्मनिष्ठ माता-पिता से मिले थे .... दोनों भाइयों ने कोलकत्ता में संघ की शाखा जाना शुरू किया और देखते ही देखते कड़ी मेहनत और लगन से संघ शिक्षा के दो वर्ष भी पूर्ण किये ....
देश में ये वो दौर था जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने उफान पर था .... आडवाणी जी रथयात्रा के माध्यम से गांव-गांव शहर-शहर डगर-डगर घर-घर हिंदुत्व और राम जन्मभूमि पुनर्निर्माण की लौ प्रज्वलित कर रहे थे ....
आडवाणी जी की रथ यात्रा और परिवार से मिले हिंदुत्व के संस्कारों से वशीभूत नव-युवा कोठारी बन्धु काफी प्रभावित हुए और अपने पिता हीरालाल कोठारी से कार सेवा हेतु अयोध्या जाने की ज़िद करने लगे .... पिता ने अपने दोनों मासूम पुत्रों को समझाया कि 8 दिसम्बर को तुम्हारी बड़ी बहन पूर्णिमा की शादी है और दोनों भाइयों की घर मे उपस्थिति अनिवार्य है .... किंतु दोनों भाइयों की ज़िद के आगे पिता को झुकना पड़ा और इस वादे के साथ कि दोनों भाई नित्य पिता को एक पत्र लिखेंगे और 8 दिसम्बर को बहन पूर्णिमा ( Purnima Kothari ) की शादी से पहले कार सेवा समाप्त कर के कोलकत्ता लौट आएंगे अनुमति दी ....
22 अक्टूम्बर 1990 .... शरद और राम बजरंगी (कोठारी) खूब सारे पोस्टकार्ड ले के अपने एक और मित्र राजेश अग्रवाल के साथ कोलकत्ता से अयोध्या के लिए रवाना होते हैं ....
27 अक्टूम्बर 1990 .... हीरालाल जी कोठारी को अपने पुत्रों द्वारा इस तारीख को लिखित एक पत्र प्राप्त होता है जिसमें लिखा होता है कि .... मुलायम सिंह सरकार द्वारा ट्रैन रोक के कार सेवकों को मुगलसराय में ही गिरफ्तार कर लिया गया है .... किंतु कार सेवा को प्रतिबद्ध दोनों कोठारी बन्धु अपने मित्र राजेश अग्रवाल के साथ उत्तरप्रदेश पुलिस को चकमा दे कर किसी तरह अयोध्या को रवाना होते हैं .... और 200km पैदल यात्रा कर के पुलिस से छुपते छुपाते तीनों मित्र अयोध्या पहुंचते है ....
2 नवम्बर 1990 .... अयोध्या के वाल्मीकि भवन के सामने मणि रामदास जी की चॉनी सड़क के सामने प्रचंड भीड़ एकत्रित हो जाती है .... भीड़ के इस जत्थे का नेतृत्व दो नवयुवक कोठारी बन्धु कर रहे होते हैं ....
पुलिस की कड़ी चेतावनी के बावजूद कोठारी बन्धु अपने जत्थे के साथ विवादित ढांचे की और तेज़ी से बढ़ते है ....
कोठारी बंधुओं ने पुलिस की चेतावनी के बावजूद विवादित ढांचे के ऊपर चढ़ के भगवा ध्वज को ऊपर लहराने का दृढ़ संकल्प कर लिया था ....
राजेश अग्रवाल आज भी याद करते हैं .... दोनों कोठारी बन्धु भगवा ध्वज हाथ मे लिए बाबरी मस्ज़िद के सामने खड़े थे .... उत्तरप्रदेश की मुलायम सरकार और प्रशासन को मानो कोठारी बन्धु खुली चुनौती दे रहे थे ललकार रहे थे कि आओ हमें रोको .... भीड़ द्वारा जय श्री राम का उद्घोष गगन तक गुंजायमान हो रहा था ....
तभी ....
धाँय .... धाँय .... धाँय .... धाँय ....
कोठारी बन्धु श्री राम के उद्घोष और भगवा ध्वज के साथ बलिदानी हो चुके थे ....
6 दिन बाद .... दिनांक 8 नवम्बर 1990 .... उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा श्री हीरालाल जी कोठारी को सूचना प्राप्त होती है कि उनके दोनों पुत्र कार सेवा में उत्तरप्रदेश पुलिस जी हां मुलायम सिंह यादव की उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा फायरिंग में मार दिए गए हैं .... और उनका अंतिम संस्कार अयोध्या के सरयू तट पर किया जा रहा है ....
हुतात्मा कोठारी बंधुओं की मौत की सूचना जब उनके घर बंगाल पहुंची तो समूचा बंगाल सड़कों पर उतर पड़ा और अपने लाडले सपूतों कोठारी बंधुओं को छलकते नैनों से अश्रुपूरित श्रद्धासुमन अर्पित किए ....
क्या आप विश्वास करेंगे ?? .... 6 दिसम्बर 1992 को जब बाबरी विध्वंस हुआ तब अपने दो नौजवान पुत्रों को कार सेवा में खोने वाले श्री हीरालाल और सुमित्रा कोठारी अयोध्या में मौजूद थे और कार सेवा की परिक्रमा पूर्ण कर रहे थे ....
मैं सजल नेत्रों से बीकानेर राजस्थान के .... बंगाल के कोठारी बंधुओं को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ....
धन्य है बंगाल की और राजस्थान की वो माटी जहां ऐसा धर्मपरायण परिवार और धर्मपरायण सपूत पैदा हुए .... जिन्होंने अपने आराध्य श्री राम के चरणों में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया ....
(छायाचित्र में बड़ी बहन पूर्णिमा कोठारी अपने बलिदानी भाइयों के चित्र के साथ) ....
हर साल यह अमर गाथा सुनाता हूँ ....
6 दिसंबर को कोठारी बजरंगियों के चित्र सजाता हूँ ....
पटाखे फोड़ हिन्दू शौर्य दिखाता हूँ ....
पर हर सांस घुट-घुट मरता जाता हूँ ....
ना राम ना कृष्ण की याद रही ....
सत्ता के गलियारों में कोई हिन्दू फ़रियाद ना रही ....
जूझ रहा हूँ खुद को इस भ्रम से बचा निकलूँ ....
वर्ना लाशों की इस मंडी में मेरी भी औकात नही रही ....
कोठारी बन्धु अमर रहे .... अमर रहे ....
अधिकाधिक शेयर कॉपी पेस्ट का आग्रह है !!!! ....

साभार: 
#Ram_Mandir
#राम_मंदिर
रितेश प्रज्ञांश

THE GREAT AGRAWAALS - महान अग्रवाल



साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

स्वाभिमानी व सशक्त वैश्य समुदाय

सेठों की नगरी कोलकाता में भारत के सबसे बड़े होलसेल मार्केट में एक है 100 साल पुराना बागडी मार्केट। अधिकतर दुकानें-ऑफिस मारवाड़ीयों की फिर गुजरातियों की। जिन्हें तीसरी पीढ़ी चला रही है। पता नहीं कितने व्यापारियों के संघर्ष की गाथायें यहाँ राख के ढेर में चिंगारी बनके धधक रही हैं!!!

राख-चिंगारी ??? हाँ सब जल कर राख !!!

शनिवार 15 सितंबर भोर 2:30 पर जब पूरा कोलकाता गहरी नींद सो रहा था कि बागड़ी मार्केट में आग लग गयी। सैंकड़ों दुकानें और ऑफ़िस इसकी लपेट में आ गए और जलने लगा तीन हज़ार परिवारों का भविष्य। 2 दिन बीत गए, तीसरे दिन तक आग नहीं बुझी पर जो बदला, वो था वहाँ के मालिकों का हौसला...

टूट गया???? न न न न न... राजस्थान के तपतपाते धोरों और जलती रेत में तपे उन लोगों के चेहरे पर बजाय मायूसी के एक अलग सी दृढ़ता झलकने लगी। झलकने लगा वो ओज जो उनके पुरखों के चेहरे पर था तीनसौ चारसौ साल पहले जब वो बैलगाड़ी में बैठकर प्यासी राजस्थान की धरती से यहाँ आए।

रिश्तेदारों और परिचितों ने द्वार खोल दिए। भाई जब तक तेरी दुकान प्रारम्भ नहीं होती मेरे यहाँ बैठ जाना। मेरे कार्यालय से काम कर लेना। मेरा लेपटोप ले जा। एक बार कुछ हाथ उधारी की आवश्यकता हो तो बता देना। कोई किसी सरकार के पास नहीं गया। सब कुछ जल गया तो मुआवज़े के दरवाज़े नहीं खटखटाये। रास्ते नहीं रोके। बच्चों के लिये नोकरियाँ नहीं माँगी। हड़ताल नहीं की। अपनों की शक्ति से सब अपने काम में जुट गए हैं।

कौनसी शक्ति है वो? कौनसा नियम कानून सिद्धांत है जिसके बल पर आजतक भारत का वैश्य नहीं झुका। हज़ारों आक्रांताओं ने राष्ट्र के धनकोष "वैश्य" पर हमला किया पर वह नहीं रुका। बढ़ता गया। कौन सा आशीर्वाद है वो पूर्वजों का?

वह है "महाराजा अग्रसेन" का जीवन आदर्श, महाराजा अग्रसेन की प्रेरणा, महाराजा अग्रसेन का सन्देश।

"समता सर्वभूतेषु” की भावना से समाज संरचना करने वाले महाराजा अग्रसेन ने प्राणीमात्र के उत्थान के लिए सामाजिक विषमता नाशक आदर्श प्रस्तुत किया। दुर्भाग्यवश किसी व्यक्ति के विपन्न हो जाने पर, उसके स्वाभिमान की सुरक्षा के साथ उसके उत्थान की व्यवस्था करने हेतु आग्रेय गणराज्य में लागू किया गया ”समता का नियम” सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के इतिहास में अद्वितीय है।

महाराजा अग्रसेन कहते हैं कि –

"कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सुव्रत ।

क्रिया नियमिता: कार्या: पुत्रैर्दारैश्च सीदते ॥

अयाचमाना: सर्वज्ञा: सर्वोपायै: प्रयत्नत: ।

ते रक्षणीया विव्दांस: सर्वकामसुखावहै: ॥"

"जो व्यक्ति विद्वान अथवा योग्य होने के बावजूद, भाग्यवशात् अपनी आजीविका के क्षीण हो जाने के कारण दीन (निर्धन) हो जाते हैं, तथा स्त्री पुत्रादिकों के पालन कर सकने में असमर्थ हो जाने के कारण, अनेकों कष्ट उठाते हैं। तथापि किसी से याचना नहीं करते ऐसे (स्वाभिमानी) पुरुषों को प्रत्येक उपाय से सहयोग देने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। उनकी उपयुक्त आवश्यकताओं की जानकारी लेकर, उनके सुख की स्थापना हेतु, समुचित कर्म करना चाहिये।

महाराजा अग्रसेन ने निर्देश देते हुए स्पष्ट इंगित किया है, कि दान देने से भी श्रेष्ठ कृत्य, दूसरों की आजीविका का प्रबंध करना है, और यह कर्म उपकार की नहीं, कर्तव्य की भावना से किया जाना चाहिये। कारण –

"अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे।
कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना बन्धुराश्रय: ॥"

जो छोटे, बड़े तथा जो बड़े से भी बड़े हैं, या उनसे भी आगे हैं, परस्पर बन्धुजनों के आश्रय बिना, उनके जीवन का क्या प्रयोजन है? अर्थात् – ऐसे लोग जो छोटे-बड़े, अमीर- गरीब, के विभेद के कारण परस्पर सौजन्य से हीन हों उनका जीवन निरर्थक ही है।

प्रत्येक समाज में अपने अपने भाग्य के अनुकूल, व्यक्ति सम्पति, ज्ञान, बल, ऐश्वर्य आदि से कम ज्यादा होते ही हैं। कुछ निर्धन, अज्ञानी, कमजोर, होते हैं। और कुछ उनसे सशक्त, धनवान, ज्ञानी, कुछ उन सबसे आगे और कोई विशिष्ट श्रेयता को प्राप्त सबसे आगे। किन्तु परस्पर अपने दीन हीन बन्धुओं के प्रति श्रेयता प्राप्त लोगों में बन्धुत्व भाव का अभाव होने पर, सौजन्यता बिना उनका जीवन निरर्थक समान है। अतः समाज में कभी भी विभेद की परिस्थिति पैदा न होने देना चाहिए, अतः कहा,

"सर्वोत्थानाय सश्रद्धं भ्रातृभावेन चावह ।

योगं क्षेमञ्च मन्वान: गृह्णीयुस्तेऽभिमानत: ॥"

सर्वोत्थान की दृष्टि से, बंधुभाव से, श्रद्धायुक्त (ऐहसान जताते हुए नहीं) और पवित्र मन से (लोकेषणा के स्वार्थ से रहित) ‘योगक्षेम’ की (यह मेरा कर्तव्य है इस प्रकार मानकर) कर्तव्य बुद्धि से, सामुदायिक विकास की दृष्टि से, परस्पर सहयोग का निर्देश करते हुए, महाराजा अग्रसेन ने ”आग्रेय गणराज्य” में ”समता का नियम” लागू करने हेतु आह्वान किया –

"देयानि वृत्तिक्षीणाय पौरैरेकैकश: क्रमात् ।

गत्वा निष्केष्टिकां दद्यु: जनः कुर्यान्नयाचनाम् ॥"

इसलिये, आज से इस राष्ट्र (आग्रेय गणराज्य) में, जो भी व्यक्ति भाग्यवशात यदि आजीविका से हीन हों, उन्हें बिना याचना किए ही, राज्य के सभी निवासी (निष्क = रुपया) और एक एक ईंट स्वयं उनके पास जाकर भेंट स्वरुप दें।

"एष ते विततं वत्स सर्वभूतकुटुम्बकम् ।
विशिष्ट: सर्वयज्ञानां नित्यमत्र प्रवर्तताम् ॥"

इस प्रकार सब प्राणियों के प्रति परिवार समान समत्व स्थापना के इस पुनीत कार्य का जो विस्तार होगा, वह सभी यज्ञों से बढ़कर है। अतः तुम लोगों को, इस ”कर्मयज्ञ” को सदैव गतिशील रखना चाहिए। हे मानवों ! यदि तुम इस प्रकार करोगे तो वह निश्चय ही जगत में तुम्हारे लिये व जगत के लिए परम कल्याणकारी होगा।

आज भी उन्हीं पितृपुरुष भगवान महाराजा अग्रसेन के महान आदर्श वैश्यों के जीवन प्रशस्त करके उन्हें उज्ज्वल और यशस्वी बना रहे हैं। ऐसे महाराजाश्री अग्रसेन को शीश नवाता हूँ जिनके प्रताप से सनातन धर्म का मजबूत खम्भा "वैश्य", अपने धर्म पर अविचलित स्थिर खड़ा हुआ है..

एक ईंट और एक रुपैय्या।
जनहित नियम लक्ष्मी मैय्या।

॥ जय महाराजा अग्रसेन ॥
॥ जय श्री राम ॥

साभार: राष्ट्रीय वैश्य सभा 
श्री अग्रभागवत
~ मुदित मित्तल

Tuesday, September 18, 2018

CA की परीक्षा 2 बार टॉप करने वाली तनु गर्ग

CA की परीक्षा 2 बार टॉप करने वाली तनु गर्ग

Image may contain: 1 person, smiling, text

इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेकेट्रीज ऑफ इंडिया की ओर से कुछ समय पहले सीएस प्रोफेशनल और एग्जीक्यूटिव का रिजल्ट जारी हुआ। इसमें खंडार निवासी तनु गर्ग ने प्रोफेशनल प्रोगाम में ऑल इंडिया में पहली रैंक हासिल की है। तनु गर्ग के ताऊ गिरधर गर्ग ने बताया कि बचपन से ही मेधावी रही तनु ने वर्ष 2014-15 में सीए के परिणाम में भी ऑल इंडिया में पहली रेंक प्राप्त की थी। तनु ने बचपन से ही जयपुर में रहकर अपने पिता सुरेश गर्ग, जो कि स्वयं भी सीए है तथा माता इंद्रा देवी के मार्ग दर्शन में अपनी पढ़ाई कर यह मुकाम हासिल किया है।
साभार: 

Sunday, September 16, 2018

Marwari community and the brains behind the business

Marwari community and the brains behind the business



When speaking of communities that are deeply rooted and firmly seated in folklore, one cannot miss but mention the gregarious Marwari community that is synonymous with business in India. From starting out as traders and graduating to a flourishing industrious community, the Marwaris played a pivotal role in changing the face of independent India. Saluting the contribution of this traditional yet progressive community, Society lets some of India’s prominent Marwaris do the talking...


India is a mixed bag of culture. One that not only holds within it a myriad of communities, but one that has also continually reaped the benefits from its multi-cultural existence. One community that pays the perfect ode to the business of India—the Marwaris—cannot be skipped. Geographically, Marwaris are people who belong to the western region of Rajasthan, particularly the areas in and around Jodhpur (Marwar), Pali and Nagaur and other adjoining regions of the state. While all Marwaris are Rajasthanis, all Rajasthanis are not Marwaris. The term ‘Marwar’ dates back to the Sanskrit word ‘Maruwat’ in which ‘Maru’ means desert. Although Marwaris can be baniyas (business community), Brahmins or even Jains, it’s the Marwari baniyas who travelled to other states and even countries and developed successful businesses, thus gaining popularity over the other Marwari sects.

HISTORY

The Marwaris have had a long standing association with Bengal. In fact, the term ‘Marwari’ was coined by the Bengalis for these inhabitants of Rajasthan when they were brought into the state by the Mughal emperor, Akbar. Circa 1564, when, as a part of Akbar’s camp, the Rajput soldiers were in Bengal, the contract of supplying the essentials lay with the merchants of Marwar. They often sported a pagri (turban) because of which they were also referred to as the pagridhari Marwari (turbaned Marwari).


This merchant class commanded a great deal of respect in its hometown. Often, rulers of different states would vie for their attention and lure them to their own state with fertile land that these merchants could till, without paying taxes. Under a similar circumstance, Maharaja Ranjit Singh had then extended an invitation to the Marwaris to settle in Amritsar. As a response to which, 32 businessmen shifted base to Amritsar and were given one shop each to form the Batti Hattan, a mini market that exists till date in Guru Bazaar in Amritsar. Ranjit Singh wanted his city to benefit from the assiduousness and the business skills of the Marwaris, a trait that has stuck with the community even today. Owing to the economic support the rulers drew from the Marwaris, their opinion was given due weightage when it came to the governance of the states. Such was the clout of this emerging trading community even before the British era. The community in turn would offer extended loans to rulers and even invest in the various public projects.

Around the same time, the Shekhawati region of Rajasthan was battling a combined force of war between capitalism and feudalism, where capitalism dominated. The internal strife amongst the Rajput had weakened them, and the impoverished Thakurs had begun resorting to looting the caravans of the Marwari traders. As their trade routes became more and more unsafe, and fear and insecurity gripped the trading community, they needed very little encouragement to venture out and explore safer terrains in the country. Thus began the spread of this enterprising community to the different parts of the country, regions that soon became home grounds to them. Their accepting ways merged them with their new homes effortlessly. Some more progressive Marwaris like Bhagwandas Bagla, one of the first known Marwari millionaires, even proceeded to Burma and settled in Rangoon.

By the early 20th century, apart from most domestic trade routes that were in the hands of the Marwaris, they also had the opium trade, bank


business and selling of clothes in their control. By 1911, Surajmull Nagarmull established the first jute factory, following suit, the Birlas opened the first Indian jute export office in London in 1917; while the Sekserias set up textile mills, Ramkrishna Dalmia established cement factories. Soon, the Marwaris even replaced the Khatris and the Bengalis as brokers.


The Marwaris now worked diligently towards strengthening their hometowns by building schools, temples, wells, hospitals and colleges—all in the memory of their forefathers, primarily for the development of its people. Institutions like the Birla Institute of Technical Training, the IITs, Ruia College, Poddar School are all by-products of their sentiments towards charity and their acts of generosity.

By 1947, when the British were booted out of the country, the new-found India had already found its new breed of business tycoons who were set to change the fate of the country. The rise of independent India saw this peace-loving community, with its water-like property to fit into any given mould and an astute sense of business, resurrect its own economy and industries. Families like the Birlas (now Kumar Mangalam Birla of the Aditya Birla Group and Yash Birla of the Yash Birla Group), the Goenkas (RPG Group), Dalmias, Poddars (Siyaram Silk Mills) and the Singhanias (Raymond Group) began their lives parallel with India and continue to form an integral part of our lives even in modern day India.

BUSINESS

As an old saying goes, “Jahan naa pahunche rail gaadi, wahan pahunche bail gaadi, aur jahan naa pahunche bail gaadi, wahan pahunche Marwari... (Implying that nothing comes in the way of the Marwaris and their business, not in the least, the inaccessibility of a place…). The saying stands true to the fact that nothing can shake the grit and determination of a Marwari. Hailing from the Dhoot family that successfully runs the industrial conglomerate, Videocon, the scion Anirudh Dhoot says about the Marwari business sense, “The men of our community were mostly farmers, traders or merchants and they could never compromise with their business acumen. This unparalleled acumen is passed on to generations and that’s how our knack for business can be justified.”

Contrarily, Ajay Nahar, Managing Director of Nahar Projects, part of the Nahar Group, believes that it is not the caste, community or background that makes for a successful businessman, but a person’s education, IQ, intelligence and upbringing that does. But, having said that, he also observes, “I also think that most Marwaris that I have come across are excellent in negotiations while doing business, have the confidence to crack great business deals and are able to take calculated risks in their projects, thus giving themselves the business community tag.”

Adding that the children in Marwari households often grow up listening to business talks between the elders of a family, Nirati Agarwal, Deputy Editor of Marwar magazine says, “It is no wonder they (Marwari youngsters) excel when they take the helm, after all, they’ve practised thinking like business owners for at least 10 years more than the average businessperson from any other community. It’s simply that the Marwaris are very practical about business and treat it as an important part of day to day life.”

Highlighting Videocon’s remarkable contribution to India’s growth since the industrial revolution, Anirudh elaborates, “The name Videocon is synonymous with every household in India. Ranging from consumer durables to digital broadcast, Videocon has enhanced the growth of the country by actively making innovations with a consumer-centric approach.”

The Nahar Group, founded by Sukhraj Nahar, championed the cause of the growth of their native place, Bhinmal in Rajasthan. Says Ajay, “I am working towards new ventures such as developing a 75-bed charitable hospital, spread across one lakh sq ft, while also already running another set up there for medical needs. In Rajasthan and Mumbai, we have also built many Jain temples like the famous Sarvodaya Nagar Jain Derasar at Mulund West in Mumbai, where I am an active trustee.”

It’s not only holding key business houses that has helped the community sail through, but also their “hard work, perseverance and their undeniable ability to dream and achieve, while maintaining respect and order that has helped them carve a niche for themselves,” says ace Marwari fashion designer Raghavendra Rathore. Speaking of the ‘Marwari ways of business’ that have guided them, while Ajay owes his success to being ethical and a man of his words, and delivering exactly what they promise their buyers, Anirudh says, “Ethics like leadership, accountability, reputation and morale, abiding by the law, respect for others and loyalty have helped Videocon sail through. All the individuals in the organisation follow these ethics, resulting in tremendous success.”

Some of the other prominent names that cannot be missed and have contributed to the business of India include Lakshmi Mittal of ArcelorMittal, Indian telecom mogul, Sunil Mittal of Bharti Enterprises, Subhash Chandra (Zee Network), the Lodhas, Piramals, Naresh Goyal of Jet Airways, the Jindals, Hindujas, Bajajs, Kajarias, Dokanias of Durian, Firodias of Kinetic, Biyanis of the Future Group, Motilal Oswal of Motilal Oswal Securities, RK Somany of Hindustan Sanitaryware and Industries Limited (HSIL) and Hindware, Atul Ruia of High Street Phoenix and the Kasliwals of S Kumars (a business that split in 2008). Not only businessmen, the corporate world has also seen successful Marwaris like Chanda Kochhar, CEO of ICICI Bank.


ENTERTAINMENT

While Bollywood isn’t particularly known for being communal or discriminating, the community seems to have given the industry a miss, what with only a handful of them making their presence felt over the years. Even if films religiously had Marwari characters playing the loyal munshis to the umpteen thakurs, the industry itself doesn’t boast of many Marwaris. A few names that feature on the charter are Bharat Bhushan, yesteryear singer Hemlata, Anu Agarwal, Rajeev Khandelwal, the Barjatyas, Sachiin Joshi, Ram Gopal Varma’s protégé Nisha Kothari, late film director Jag Mundhra, and singer Roopkumar Rathod. On being a Marwari, actor and businessman, Sachiin Joshi, says, “Being a Marwari makes me feel royal. It brings a lot of cultural values and belief. People feel Marwaris are conservative. But it is not so. They are very open-minded, but at the same time, value their beliefs and follow their principles.”


FASHION

Over the years, the community has shed a considerable bit of its image of being traditional and orthodox and has subscribed to a lifestyle that is chic and modern. Fashion forms an integral part of this chic life. The fashion industry on the whole has seen a number of Marwari fashion designers like Surily Goel, the Delhi-based Ravi Bajaj, Sangita Kathiwada, Hyderabad-based Anand Kabra, Kolkata-based designers Ekta Jaipuria Kandhari, Ruchira Kandhari and Shantanu Goenka, Shraddha Murarka of Vizyon, Payal Singhal, Divya Mohta and Anju Modi, among others. Speaking of some of the distinct qualities of being a Marwari, Raghavendra says, “An inherent characteristic of people from Rajasthan is a deep sense of connection with their roots, culture and heritage. Somehow, it is reflected in our work ethics and the relationship that we share with peers. I believe in culture and tradition, however, I also believe in the need to adapt with changing times.”

Raghavendra also adds that his brand Rathore Jodhpur itself is a reflection of the ethos of his community. He emphasises, “The genesis of every design idea born in the design studio draws the heritage of a bygone era.” He also believes that many of the clothing traditions, old-fashioned motifs and other elements from the community’s rich culture have been readapted in modern fashion statements. “It is encouraging to see the new generation resurrecting old techniques not only in clothing, but also in textiles, home furnishing and furniture,” says the designer with a vision who holds the fond memories of spending Holi and Diwali with his family closest to his heart.

JOURNALISM

As Nirati likes to put it, “What really distinguishes the Marwaris is that for them, business is inseparable from life. Whether they view it as a passion or a reality is up to the individual in question.” Nirati believes that an insatiable appetite for risk, a proclivity with all things numerical, especially demand and supply, are qualities ingrained in the Marwaris. However, despite such deep-seated sentiments, when it came to profession, Nirati chose journalism as her driving force.


Her editorship has made her realise that the Marwaris today are traditional but not stodgy. they are creative. “I’ve met filmmakers, artists and graphic designers who are Marwaris, they are open to new ideas, they are generous and they care about social change and want to make a difference in the lives of others. I’ve also noticed another side to this community: their love for luxury and art! They are connoisseurs and hold workmanship and exclusivity in high regard.” Other prominent Marwaris in the field of journalism include Ramnath Goenka and his son, Viveck Goenka of the Indian Express, Shobhana Bhartia of the Hindustan Times, Gulab Kothari (and his father Karpoor Chandra Kulish) of Rajasthan Patrika, Kamal Morarka of the Afternoon Despatch and Courier and the Jains of The Times of India group. Other Marwaris who have made a mark on the literary front include Himani Dalmia, who wrote Life is Perfect, Neelima Dalmia Adhar of the bestseller Father Dearest and Ashwin Sanghi of The Krishna Key.

ART

The Marwaris have also had their fair share in the field of art. Some of the prominent names in the field are Lekha and Anupam Poddar, the well-known mother-son art collector duo, Abhishek Poddar of India’s first photogallery, the Tasveer Art Gallery, and art curator Priyasri Patodia.

Speaking of the Marwaris’ contribution to art, Priyasri speaks of the popularity of miniature paintings that have continued to fascinate art lovers in India and across the world. She says, “From 16th century onwards, there flourished different schools of paintings like the Mewar School, the Bundi-Kota kalam, the Jaipur, Bikaner, Kishengarh and the Marwar schools. In fact, frescoes were initially introduced by the Shekhawat Rajputs in their forts and palaces.”

POLITICS AND SPORTS


Since their migration from their hometowns in Rajasthan to the various states across India, the Marwaris have worked hard towards


making India a stronger nation. Their contribution, therefore, is remarkable even in politics and top government positions. Some prominent faces in the political sphere include Arvind Kejriwal, one of the prominent faces of Anna Hazare’s Lokpal campaign and now a founder of the Aam Aadmi Party, Bimal Jalan—former Governor of the Reserve Bank of India, Bijoy Singh Nahar—former Deputy Chief Minister of West Bengal and Puranmal Lahoti, the first member of the Rajya Sabha representing the business community. The world of sports also boasts of chess champion Abhijeet Gupta and table tennis champion Niraj Bajaj, besides Lalit Modi, the former head of the Indian Premier Cricket League.

Professions apart, the Marwaris are known to be a community that loves their traditional fill of mouth-watering delicacies. Ajay, Anirudh and Sachiin in unison name the good old dal-baati choorma, gatte ki sabzi, kher sangari, papad ki sabzi and bajra roti kadi while speaking of traditional Marwari delicacies they savour and mention sweet delicacies such as mawa, besan laddoos, ghewar and moong dal ka halwa, generously topped with desi ghee.


About the communities’ love for its daughters, Priyasri informs, “Girls are thoroughly pampered by the Marwaris. We have a separate festival called the Sindhara to pamper them. Mehendi (henna) is applied on the hands of the girls and their favourite cuisine is also cooked. Brahmin women or the misranis, as they are called, come and sing to the girl while her mehendi dries. And finally, she is gifted with jewellery and clothes. My fondest memory of childhood is of the Sindhara festival celebrated at my naani’s (grandmother) in Ajmer.”
Another notion that is synonymous with the community is that they are careful how they spend their money. While Anirudh believes it is the quality to not spend a penny more than required that gives people such a notion, Nirati insists, “Marwaris came from Marwar, the land of ‘death’, located in south-west Jodhpur today. The harsh climate and the lack of opportunity drove the Marwari migration at the beginning of the 19th century and I think, ‘conservation’ became the key word for the community, and with good cause.” Echoing similar sentiments, Priyasri adds, “They came from the land of the desert with economic hardships, accustomed to limited resources. I think this makes them genetically sharp to acquire the best in the least. The Marwaris learnt to live frugally and can’t be called stingy.”

Despite changing times, the Marwaris have held onto traditions while still progressing with the generation of today. Nirati says, “A Marwari’s respect for his family and his forefathers encourages him to respect traditions; after all, those are all he has left—a sort of legacy if not in gold then in riches far greater. But, they may be traditional in manner and speech, but they certainly aren’t in terms of thought
and perception.”

Marwaris in Bengaluru

The earliest Marwaris settled in Bengaluru about 60 years ago. Coming mainly from Rajasthan and Haryana, the Marwari communities are now settled all over the city in areas like Vijaynagar, Sanjaynagar, JP Nagar, HSR Layout, Basaveshwarnagar, Kumara Park, Basvangudi, Yeshwantpur and Banasvadi. Explains Ravi Singhania, a businessman, who has been a Bengaluru resident for the past 17 years, “Marwari is an umbrella term which includes Agrawals, Sharmas, Jains, Maheshwaris and Oswals, among others. This difference in surnames is based only on location of origin and the deity they worship.” Bengaluru also has more than 100 Marwari associations like the Karnataka Marwari Samaj, Marwari Yuva Manch, Maheshwari Samaj, Agarwal Mahila Mandal, Jagriti Mahila Mandal and above 10,000 Marwari residents.


The Marwari community is known not only for its business acumen, but also for its humble and charitable nature. The older generations are mostly engaged in family run businesses and are into trading and manufacturing. The younger generation is taking up jobs in fields like IT, real estate, law and medicine. “The community, for the past many years, has been organising various charitable events like donation drives, eye and artificial limb camps for the underprivileged,” says Vimal Saraogi, who runs a family-owned textile business in Bengaluru and is also the Programme Director of the Karnataka Marwari Samaj. The Manav Vidya Kendra, adopted by members of the Marwari community, provides free education to over 100 underprivileged students.

Being a very traditional and custom-oriented community, festivals and other religious occasions hold great importance among the community members. Says Manoj Poddar, a Chartered Accountant living in Bengaluru for the past 11 years, “For the Marwaris, some customs are deeply attached with the native place. For example, a child’s mundan ceremony (when the baby’s hair is shorn off for the first time) will only be done at the family’s native place. This is a custom which every Marwari follows.”
Holi and Diwali are two major festivals celebrated by the Marwaris. While during Holi, the members of associations gather at their respective associations to celebrate, Diwali sees families visiting each other’s homes. Besides these, the women of the community celebrate Karva Chauth, Sawan Jhula Puja and gangor (celebrated only by newly married girls). A majority of the Marwaris are strict vegetarians.


Marwaris in Chennai

When the first families moved out of the drought hit Marwar state in Rajasthan almost 180 years ago, one would not have imagined the impact they would have in shaping Tamil Nadu. “There are (Marwari) families living in small villages and towns all over; their forefathers set up pawn broking businesses. My family came 90 years ago to Madhuranthakam, where I grew up,” says J Jayantilal Challani of Challani Jewellery Mart and President of the Chennai Jewellers and Diamond Merchants Association. “With our honest reputation and fair trade, we have become well-respected and an integral part of Chennai. One thing that sets our community apart is that many of us speak fluent Tamil and have absorbed Tamil customs. When in school, my Tamil pundit would scold other boys stating my example—a Marwari doing better in Tamil than them!”


The Marwaris have also played a big role in the fields of cinema, media, shipping, education and banking sectors. With a presence already in the Sowcarpet area of the city, there are now urban Marwaris dotting even the northern parts of the city. Many prominent business houses and institutions were promoted by famous Rajasthani residents of Chennai. The Indian Express Group was founded from Chennai by Ramnath Goenka. Rated as the richest Indians in the world, Shashi and Ravi Ruia of the Essar Group, whose origins are in Chennai, still nurse a penchant for idlis and dosas. The Marwari community is also known for the abundant charity it does. “The leaders of charity have been the Chordia family, starting with Agurchand Manmull, for having set up the AM Jain College 60 years ago,” says Jayantilal Challani. “We also sponsor free operations, medical treatment, scholarships, etc. But, our focus is education and we sponsor poor students through books and clothes banks. During disasters like the tsunami, and even recently when a fire gutted parts of north Chennai, our people were the first to respond to rally aid. We receive a lot of goodwill from people because of this.”

Living in Chennai since her marriage a couple of decades ago, Divya Solanki, a legal journalist, says, “The people of Chennai really embrace us and this is the friendliest city I have lived in. I don’t feel like an outsider here or that I am Marwari.” Before parting, she mentions her love for spicy Chennai delicacies. “I love going to south Indian weddings, especially for the Tamil food and the yummy sambar. We enjoy south Indian food just as all my friends here wait for our sweets!”

Marwaris in Delhi

Delhi encompasses a lot of India’s prominent Marwaris who have excelled in the fields of business, art, culture, fashion, politics, sports, writing and medicine. Some of Delhi’s famous Marwaris are Sameer and Vineet Jain (owners of Times of India), Harshpati Singhania (MD, JK Paper), Abhishek Manu Singhvi (politician and senior lawyer), Naveen Jindal (MP from Kurukshetra, Chairman, Jindal Steel and Power Ltd and polo player), Shallu Jindal (Kuchipudi danseuse), Sunil Mittal (Bharti Telecom), Deepika Jindal (MD, art d’inox), Rashmi Poddar (artist), Dr Kiran Lohia (Dermatologist) and others. 


Hailing from Rajasthan, their close proximity to the capital gave way to a lot of Marwaris in Delhi decades ago. Also, the arrival of the Delhi-Calcutta railway in the 1860s facilitated their migration from Calcutta to Delhi. The archetypal Marwari business class of brokers, traders, financiers and businessmen has a major hold in Delhi. As philanthropy is a prominent quality of the Marwaris, the well-known Delhi Marwaris are considerably involved in charity and community service.

Although perceived as conservative in their approach, the Delhi Marwaris are flexible and progressive. They have not confined themselves to traditional, old-economy businesses and are joining the new age ones. “They are active in every field, be it art, culture, writing or entrepreneurship. They have actively contributed to the Indian society right from the freedom struggle and even after independence,” says Shallu Jindal. She is a Kuchipudi danseuse and social activist. Fashion designer Anju Modi agrees, “Their root lies in Shekhawati, an arid part of Rajasthan. Hailing from this hot region, the Marwaris are persistent and patient. They do not leave anything incomplete. All these qualities make them the best in every field, especially business.” Jindal insists, “The key ingredient of a Marwari is hard-work. They are very down-to-earth and grounded. I have seen my family and my husband Naveen Jindal working hard day and night and being passionate about what he does. We have been nurtured this way,” she continues, adding, “There are no boundaries for Marwari women too. If they are passionate about something, they are free to pursue it.” Modi says, “The Marwaris are progressive people and that is the reason they have been successful.” They have blended well in the Delhi culture and happily share their festivals and cuisine with the cosmopolitan culture of the city.

Religion is an essential part of Marwari life. Marwari festivals like teej and chhoti holi are also celebrated by the other communities in Delhi. Being staunch vegetarians, there are a number of Marwari restaurants like Rajdhani, Suruchi, Thaal Vaadi and the newly opened Shraman at The Ashok Hotel that cater to Marwari cuisine. Modi says, “Marwari food is liked by the Delhiites as it’s different. It’s time consuming to cook Marwari dishes, hence a lot of people don’t know how to make them.”

Delhi’s old Marwari Library, built in 1915 in Chandni Chowk, is a piece of Marwari history that stands tall as one of the oldest public libraries in Delhi.

Making a Mark in Hyderabad

No city or town can do without a Marwari grocery shop; but of late, the Marwaris have moved on to bigger arenas and with a keen business sense, have conquered that too. The Marwaris came to Hyderabad around 200 years ago. According to Vinita Pittie, a well-known designer, who belongs to one of the first families that made Hyderabad their home, “They were mainly five to six families like the Pitties, Ganeriwals, Lahotis, Badruka and Malanis who decided to make Hyderabad their home. Most of the Marwaris are mainly involved in trading and finance. Now, their population has risen to around 10 lakhs. The Pitties and Malanis also had titles bestowed on them by the Nizam of Hyderabad.” The very notable families in Hyderabad are the Patodias of GTN Textiles, Surekas of Hartex Rubber and Construction Activities, the Suranas of the Surana Udyog, the Agarwal family of the Suryalata and Suryalakshmi Mills, MK Agarwal of GATI and Transport Corporation of India and Prashant Lahoti, one of the well-known businessmen, who also runs an art gallery and has been honoured by a prestigious French order. The Pittie family too is involved in various philanthropic activities and is involved in the maintenance of heritage temples.


साभार : magnamags.com/society/features/marwari -community-and-the-brains-behind-the-business/507, By Ujwal Salokhe