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Thursday, March 30, 2023

SETH BENIRAM PODDAR HATHRAS WALE

SETH BENIRAM PODDAR HATHRAS WALE
उत्तरप्रदेश में बृज की देहरी हाथरस को मेला और शोभायात्राओं की नगरी भी कहा जाता है।यहां रामनवमी के मौके पर भगवान श्रीराम की चार मंजिला रथयात्रा निकाली जाती है।



इस रथयात्रा का अतीत काफी गौरवशाली है।142 वर्ष पूर्व शहर के प्रतिष्ठित सेठ बैनीराम पोद्दार अपने मित्रों के साथ वृंदावन में रंगनाथ जी की रथयात्रा देखने के लिए गए थे।उनके साथ गए लोगों ने वहां लगी भीड़ में कहा कि हटो-हटो सेठ जी दर्शन करने आ रहे हैं।दर्शन करने आए कुछ लोगों ने कहा कि इतने बड़े सेठ हैं तो अपने शहर में इसे क्यों नहीं निकलवा लेते।

यह बात सेठ बैनीराम पोद्दार को अखर गई।सेठजी ने हाथरस आकर दिन-रात मजदूर लगाकर रथ तैयार कराया।1880 में इस रथयात्रा की शुरुआत हुई।इस रथ में मूंछों वाले रामजी को विराजमान किया गया।इस वर्ष भी श्रीराम नवमी के दिन इस रथयात्रा निकाली जाती है।यह रथयात्रा बैनीराम बाग स्थित श्रीकृष्ण चंद्र महाराज हनुमान जी मंदिर विराजमान प्रबंधक तुलसी प्रसाद पोद्दार की देख-देख शोभायात्रा निकाली जाती है।रामनवमी को निकलने वाली रथयात्रा में शामिल होने वाले रथ की ऊंचाई करीब 35 फीट से अधिक है।इस कारण रास्ते में आने वाले तारों को हटाया जाता हैं,ताकि रथयात्रा सुगमतापूर्वक भ्रमण कर सके।

लेख साभार: नरसिंह सेना 

Wednesday, March 29, 2023

MARWADI OF RAJASTHAN - राजस्थान के इन मारवाड़ियों ने बदल दिया है दुनियाभर में बिजनेस का तरीका

MARWADI OF RAJASTHAN -  राजस्थान के इन मारवाड़ियों ने बदल दिया है दुनियाभर में बिजनेस का तरीका

दुनिया में मारवाड़ी काराेबारियाें का डंका बजता है। लक्ष्मी मित्तल, कुमार मंगलम बिडला, किशाेर बियानी, अजय पीरामल, राहुल बजाज आदि इनमें शामिल है।

पूरी दुनिया में मारवाड़ी काराेबारियाें का डंका बजता है। लक्ष्मी निवास मित्तल, कुमार मंगलम बिडला, किशाेर बियानी, अजय पीरामल आैर राहुल बजाज आदि का नाम इनमें शामिल है। मारवाड़ियों के बिजनेस का तरीका आैर बिजनेस के प्रति उनका लगाव लोगों को प्रोत्‍साहित करता है। मारवाड़ी काराेबारी पैसे का सही प्रबंधन करते हुए लंबे समय के अनुसार सही तरह से निवेश करते हैं। इसके अलावा जिस एंटरप्राइज में उनके शेयर हाेते हैं उसकी वित्तीय स्थिति पर वे पैनी नजर रखते हैं। मारवाड़ी शाॅर्ट टर्म की जगह लाॅन्ग टर्म मुनाफे पर अधिक फाेकस करते हैंं। उन्हें काराेबार में कितना रिटर्न मिल रहा है इसका वे पूरा ध्यान रखते हैं।

लक्ष्मी निवास मित्तल
इंसान अपनी मेहनत से फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है। इसका जीता जागता उदाहरण हैं लक्ष्मी निवास मित्तल। लक्ष्मी निवास मित्तल का जन्म 2 सितंबर, 1950 को राजस्थान के चुरू जिले की राजगढ़ तहसील में हुआ था। लक्ष्मी मित्तल को दुनिया इस्पात जगत के सबसे सफल आैर बड़े कारोबारी के तौर पर जानती है।
मित्तल जितने बड़े उद्योगपति हैं, उतने ही बड़े दिलवाले भी हैं। जरूरत पड़ने पर वो लोगों को करोड़ों रुपए दान कर देते हैं। 2003 में लक्ष्मी निवास मित्तल और उषा मित्तल फाउंडेशन ने राजस्थान सरकार के साथ मिलकर जयपुर में एलएनएम इंस्टिट्यूट आॅफ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी की स्थापना की। यह एक स्वायत्त और लाभ-निरपेक्ष संस्थान है।

2008 में मित्तल ने लंदन स्थित ग्रेट ओरमोंड स्ट्रीट हॉस्पिटल को लगभग डेढ़ करोड़ ब्रिटिश पौंड का चंदा दिया। इस चंदे से अस्पताल में एक नए स्वास्थ्य सुविधा केंद्र की स्थापना हुई। 2015 में उन्हें फोर्ब्स ने सबसे ताकतवर लोगों की सूची में 57वां रैंक दिया। साल 2008 में वे पद्म भूषण से नवाजे जा चुके हैं। मित्तल यूनाइटेड किंगडम में रहते हैं पर उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी है।




कुमार मंगलम बिडला
कुमार मंगलम बिड़ला एक प्रसिद्ध भारतीय उद्योगपति और मशहूर आदित्य बिड़ला ग्रुप के अध्यक्ष हैं। कुमार मंगलम बिड़ला का जन्म 14 जून 1967 राजस्थान के एक मारवाड़ी व्यवसायी बिड़ला परिवार में हुआ था। आदित्य बिड़ला ग्रुप भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक है। ग्रासिम, हिंडाल्को, अल्ट्राटेक सीमेंट, आदित्य बिरला नुवो, आइडिया सेल्युलर, आदित्य बिरला रिटेल, आदित्य बिरला मिनिक्स आदि बिड़ला ग्रुप के अंतर्गत आने वाली कंपनियां हैं।

कुमार मंगलम बिड़ला Birla Institute of Technology & Science (BITS Pilani) के कुलाधिपति हैं। बिट्स पिलानी घनश्याम दास बिड़ला ने स्थापित की थी। 1995 में अपने पिता आदित्य बिड़ला के अकस्मात् निधन के बाद कुमार मंगलम बिड़ला समूह के अध्यक्ष बनाए गए। उस समय उनकी उम्र केवल 28 साल थी। उस समय लोगों ने इतने बड़े बिड़ला साम्राज्य को चलाने में उनकी काबिलियत पर प्रश्न उठाए पर उन्होंने अपने कौशल, लगन, मेहनत और सोच से न सिर्फ आदित्य बिड़ला समूह को आगे बढ़ाया बल्कि नए क्षेत्रों में भी कंपनी का विस्तार किया। भारत के अलावा आदित्य बिड़ला ग्रुप का कारोबार लगभग 40 देशों में फैला है।


राहुल बजाज
राहुल बजाज भारत के सबसे सफल उद्योगपतियों में से एक हैं। वे बजाज समूह के अध्यक्ष हैं। राहुल बजाज का जन्म 10 जून 1938 को बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। बजाज व्यवसायिक घराने की नीव राहुल के दादा जमनालाल बजाज ने रखी थी। जमनालाल बजाज का बजाज का जन्म राजस्थान के सीकर जिले में हुआ था। जमनालाल बजाज भारत के एक उद्योगपति, मानवशास्त्री एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे महात्मा गांधी के अनुयायी थे तथा उनके बहुत करीबी व्यक्ति थे।

गांधीजी ने उन्हें अपने पुत्र की तरह माना। आने वाली पीढ़ियों ने बजाज घराने के व्यवसाय को आगे बढ़ाया। राहुल बजाज ने 1965 में बजाज समूह की बागडोर संभाली। उनके कुशल नेतृत्व में कंपनी ने सफलता के नर्इ बुलंदियों को छुआ। सन 1980 के दशक में बजाज दो पहिया स्कूटरों का शीर्ष निर्माता था। समूह के ‘चेतक’ ब्रांड स्कूटर की मांग इतनी ज्यादा थी की इसके लिए 10 साल तक का वेटिंग-पीरियड था। राहुल कई कंपनियों के बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। आर्थिक क्षेत्र और उद्योग दुनिया में उनके योगदान के लिए उन्हें भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा (2006-2010) के लिए चुना गया। उनको आईआईटी रुड़की सहित 7 विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की गई है।


किशाेर बियानी
किशाेर बियानी फ्यूचर ग्रुप के फाउंडर आैर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ ) हैं। इसके अलावा वे रिटेल बिजनेस Pantaloon Retail and Big Bazaar के फाउंडर है। किशाेर बियानी का जन्म किशाेर का जन्म 9 अगस्त 1961 काे मुंबर्इ में राजस्थान के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। किशाेर के दादा कभी राजस्थान के नागाैर जिले के निम्बी गांव से मुंबई में धोती और साड़ियां का बिज़नेस करने आए थे।

किशाेर बियानी हमेशा कुछ अलग करना चाहते थे आैर उन्हाेंने अपने टेलेंट को पहचाना और उसे एक सही दिशा दी। आज उनकी कंपनी पैंटालून पूरी दुनिया में बिजनेस कर रही है। 22 साल की उम्र में किशाेर का विवाह हाे गया। इसी उम्र में उन्हाेंने ट्राउजर बनाने का काम शुरू किया आैर यह चल निकला। 1987 तक नई कंपनी मैंस वियर प्रा. लि. शुरू की। इसमें कपड़े पैंटालून के नाम से बेचे जाते थे। 1991 में उन्हाेंने गाेवा में पेंटालून शॉप शुरू की और 1992 में शेयर बाजार से पैसा जुटाकर ब्रैंड खड़ा कर दिया। तब से यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है। किशोर बियानी ने अपने टेलेंट को पहचाना और उसे एक सही दिशा दी। उन्हाेंने खुुद के आत्मविश्वास और मेहनत के बलबूते यह सब हासिल किया।


अजय पीरामल
अजय पीरामल भारत के सफल उद्योगपतियों में से एक हैं। उनका जन्म 3 अगस्त 1955 काे राजस्थान में हुआ था। वे पीरामल ग्रुप का नेतृत्व करते हैं। अजय पीरामल, टाटा संस बोर्ड के गैर-कार्यकारी निदेशक हैं। वे भारत के अग्रणी उद्योगपतियों, परोपकारी तथा सामाजिक उद्यमियों में से एक हैं। वे हार्वड बिजनेस स्कूल के डीन के एडवाइज़र के बोर्ड में, बॉम्बे हॉस्पिटल के प्रबंधन बोर्ड में शामिल हैं तथा प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी एनजीओ प्रथम के चेयरमैन हैं।

पीरामल, व्यापार तथा उद्योग पर प्रधानमंत्री की काउंसिल और वाणिज्य मंत्रालय द्वारा निर्मित व्यापार बोर्ड के सदस्य भी हैं। इसके अलावा वे भारत सरकार की फार्मास्युटिकल्स तथा ज्ञान आधारित उद्योगों पर बनी टास्क फोर्स के सदस्य भी रहे है। इसके अलावा उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक के बोर्ड में 12 वर्ष तक अपनी सेवाएं प्रदान की है। अजय पीरामल ने हार्वर्ड से एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम किया है आैर जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से अपनी मास्टर डिग्री हासिल की है। फोर्ब्स ने 2017 में अजय पीरामल की कुल पूंजी 5.6 बिलियन आंकी है।

अजय पीरामल चाहते है कि 2020 तक उनकी कंपनी का वार्षिक राजस्व 20 बलियन डाॅलर हाे। इसके लिए वाे पूरी मेहनत कर रहे हैं। 1988 में जब 33 वर्षीय अजय पीरामल ने ऑस्टे्लियार्इ बहुराष्ट्रीय कंपनी निकोलस लैबोरेटरीज को खरीदने का निर्णय लिया। वह कंपनी उस समय भारत से अपना कारोबार समेटने जा रही थी। 55 साल की आयु में अजय पीरामल ने पीरामल हेल्थकेयर के घरेलू फार्मूलेशन कारोबार को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी एबट को 17,000 करोड़ रुपए में बेच दिया। इतनी बड़ी रकम में कंपनी को बेचकर पीरामल ने सभी को आश्चर्य में डाल दिया।


Tuesday, March 28, 2023

VISHNUDHWAJ NOW KUTUB MINAR A VAISHYA HERITAGE

 VISHNUDHWAJ NOW KUTUB MINAR A VAISHYA HERITAGE


SURNAME 'MODI' - उपनाम मोदी: ये कौन हैं, कहां से आते हैं, क्या करते हैं?

SURNAME 'MODI' - उपनाम मोदी: ये कौन हैं, कहां से आते हैं, क्या करते हैं?

MODH MODI VANIK SAMAJ 

मोदी मोध वनिक घांची या तेली वैश्य घांची समुदाय का हिस्सा हैं, पारंपरिक रूप से व्यापारी तेल निकालने या तेल बेचने में लगे हुए हैं

गुजराती में, 'मोदी' शब्द का शाब्दिक अर्थ एक व्यक्ति है जो पड़ोस की किराने की दुकान का मालिक है और चलाता है - इसका अर्थ 'गांधी' नाम के समान है।

सूरत की एक अदालत ने गुरुवार (23 मार्च) को कांग्रेस नेता राहुल गांधी को 2019 के आपराधिक मानहानि मामले में दो साल की जेल की सजा सुनाई। मामला 2019 में उनकी कथित टिप्पणी को लेकर था, जिसमें पूछा गया था, "सभी चोरों का उपनाम मोदी कैसे है?"

यह 'मोदी' उपनाम पर ध्यान केंद्रित करता है, जो पश्चिमी भारत में काफी आम है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से शुरू होने वाले उपनाम को साझा करने वाली प्रसिद्ध हस्तियों में उनके भाजपा पार्टी के सहयोगी पूर्णेश मोदी और सुशील मोदी के अलावा हीरा कारोबारी नीरव मोदी और व्यवसायी और आईपीएल के संस्थापक ललित मोदी शामिल हैं।

कहां से हैं मोदी?

मोदी उपनाम मोध वनिक घांची या तेली वैश्य घांची समुदाय से संबंधित है, जो पारंपरिक रूप से महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में तेल निकालने या तेल वेंडिंग व्यवसाय में लगे वैश्य बनिया व्यापारी हैं। पश्चिमी भारत का मोध घांची समुदाय मध्य और उत्तर भारत में बनिया जाति के बराबर है।

दिलचस्प बात यह है कि समुदाय, जिसमें परंपरागत रूप से गुजरात में हिंदू तेली वैश्य बनिया समुदाय ने ज्यादातर किराना स्टोर चलाने, चाय की दुकान चलाने या तेल बेचने जैसे व्यवसायों के माध्यम से अपनी आजीविका बनाई। गुजराती में, 'मोदी' शब्द का शाब्दिक अर्थ एक व्यक्ति है जो पड़ोस की किराने की दुकान का मालिक है और चलाता है - इसका अर्थ 'गांधी' नाम के समान है।

मोध-घांची समुदाय को वैश्यों बनियों की उपजाति माना जाता है. , जो एक उच्च जाति समुदाय है जो सामान्य श्रेणी से संबंधित है। विशेष रूप से गुजरात में, घांची समुदाय को पिछड़ी जाति के रूप में नहीं देखा गया था, जब तक कि राज्य के समाज कल्याण विभाग ने 25 जुलाई, 1994 को एक अधिसूचना पारित नहीं की, जिसमें मोध-घांची सहित ओबीसी के रूप में 36 जातियां शामिल थीं। उसी समुदाय के अन्य लोकप्रिय लोग महात्मा गांधी, अंबानी हैं।

2014 में क्या हुआ था

यह पहली बार नहीं है जब 'मोदी' उपनाम सुर्खियों में है। 2014 में, लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी की पिछड़े वर्ग की साख विवाद का विषय बन गई। मोदी ने अपने घोषणापत्र में दावा किया था कि वह ओबीसी समुदाय से हैं। हालांकि, कांग्रेस ने तब आरोप लगाया था कि मोदी एक "फर्जी ओबीसी" हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शक्तिसिंह गोहिल ने यह कहते हुए इस मुद्दे को उठाया था: "मोदी एक वैश्य उपजातियों से संबंधित हैं जो गुजरात में एक सूक्ष्म अल्पसंख्यक हैं और वे सभी समृद्ध व्यापारी हैं।"

मोध घांची  तेली जाति से  हैं, जिन्हें ओबीसी का दर्जा प्राप्त है। हिंदू मोध घांची वैश्य हैं जो एक अमीर उच्च जाति के हैं। उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी मोध वणिक थे।

विशेष रूप से, इस समुदाय को गुजरात में पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल किया गया था, फिर 1953-55 में प्रथम केंद्रीय पिछड़ा वर्ग (काका कालेलकर) आयोग द्वारा सौराष्ट्र, कच्छ और आंशिक रूप से बॉम्बे में विभाजित किया गया था। सूची में घांची, गणिका, तेली और घनचा का उल्लेख है, क्योंकि इसे पश्चिमी भारत के विभिन्न हिस्सों में कहा जाता था।

मोढ बनिया/मोध वाणिक वैश्य समुदाय के तहत सबसे प्रसिद्ध जातियों में से एक है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का संबंध भी इसी महान जाति से है. आइए जानते हैं मोढ मोध वाणिक जाति के बारे में.

मोढेरा के मूल निवासी

मोध समुदाय एक विशाल समुदाय है जिसकी उत्पत्ति गुजरात के मोढेरा से मानी जाती है. मोढेरा के मूल निवासी होने के कारण इन्हें “मोध या मोढ” कहा जाता है. इसमें कई हिंदू समुदाय जैसे कि मोध ब्राह्मण, मोध पटेल, मोध घांची (मोदी) और मोध बनिया आदि शामिल हैं. मोढ बनिया‌ भगवान विष्णु और उनके स्वरूपों को आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय है. भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण में इनकी विशेष आस्था है. मोढ समाज की कुलदेवी मातंगी देवी हैं.

मोध वाणिक वैश्य समाज उत्पत्ति की उत्पत्ति कैसे हुई?

“ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड” नामक पुस्तक के अनुसार मोढ/मोध वाणिक जाति की उत्पत्ति के बारे में निम्नलिखित कथा प्रचलित है. भगवान विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए. भगवान विष्णु के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुए जो ब्रह्मा जी को मारने दौड़े. ब्रह्मा जी की पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने दैत्यों का वध कर दिया और ब्रह्मा जी से वरदान मांगने को कहा. ब्रह्मा जी बोले, इस धर्मारण्य में सर्वोत्तम तीर्थ बने. भगवान विष्णु ने इस कार्य के लिए भगवान शिव को भी प्रेरित किया. भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ने ब्राह्मणों को बनाया, जो वेदों के ज्ञानी थे, ताकि वे धर्मारण्य को वेद संस्कृत के केंद्र में बदल सकें. भगवान विश्वकर्मा को ब्राह्मणों के लिए घर, किले और मंदिर बनाने के लिए कहा गया. विश्वकर्मा जी ने ब्राह्मणों के लिए माहेरपुर/मोढेरा नामक सुंदर नगर का निर्माण किया. ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने छह-छह हजार ब्राह्मण यानी कि कुल 18000 ब्राह्मण बनाए और उन्हें गोत्र और गोत्रदेवी दिया. यह ब्राह्मण मोढ ब्राह्मण कहलाए. किंवदंती के अनुसार, विष्णु द्वारा बनाए गए लोग शांत और ईमानदार थे; ब्रह्मा द्वारा बनाए गए लोगों में रजस गुण की प्रधानता थी; और शिव द्वारा बनाए गए लोग क्रोधी स्वभाव के थे. ब्राह्मणों के सुख-सुविधा के लिए ब्रह्मा जी ने कामधेनु गाय की रचना की और मोढ वैश्यों को उत्पन्न करने को कहा. ब्रह्मा जी के आदेश पर कामधेनु ने अपने आगे के पैर के खुर से पृथ्वी को खुरच कर 36,000 लोगों की रचना की. और इस प्रकार से शिखा और यगोपवितधारी मोढ वैश्यों या मोध वणिकों की उत्पत्ति हुई. कामधेनु गाय की भुजा के प्रताप से उत्पन्न होने के कारण यह गोभुजा भी कहलाए.

मोध वाणिक जाति का इतिहास

मोध वाणिक समाज का इतिहास अत्यंत ही गौरवशाली रहा है. मोढ मोढेरा में बस गए, इसलिए गाँव को गभु के नाम से जाना जाने लगा. कई पत्रकारों का मत है कि यह समुदाय पारंपरिक रूप से समृद्ध रहा है. मुख्य रूप से यह कपड़ा, किराना, वित्त और हीरे के व्यापार में हैं. अधलजा, मांडलिया, मधुकरा, वेनिशा, मोध मोदी, तेली मोदी, चंपानेरी मोदी और प्रेमा मोदी सभी मोध वानिको के समूह थे. मोध किसान मोध पटेल के नाम से जाने जाते थे. कई हिंदू समुदाय मोढेरा से अपना नाम लेते हैं, जैसे मोध ब्राह्मण, मोध पटेल, मोध मोदी और मोध बनिया. इस समाज भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तथा आजादी के बाद देश के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. व्यापार और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देकर भारत को एक आर्थिक शक्ति बनाने में इस जाति का महत्वपूर्ण योगदान है. रिलायंस ग्रुप के संस्थापक धीरूभाई अंबानी इसी जाति से आते थे.

मोध वाणिक वैश्य समाज  के प्रसिद्ध व्यक्ति

महात्मा गांधी:

ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत के अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन के नेता, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शिखर पुरुष महात्मा गांधी, मोध-बनिया जाति के थे.

आचार्य हेमचंद्र:

अपने समकालीनों द्वारा एक विलक्षण के रूप में विख्यात आचार्य हेमचंद्र एक जैन संत, विद्वान, कवि, गणितज्ञ, दार्शनिक, योगी, व्याकरणविद, कानून सिद्धांतकार, इतिहासकार और तर्कशास्त्री थे. इन्हें अपने समय में “सभी ज्ञान के ज्ञाता” की उपाधि प्राप्त थी. इन्हें गुजराती भाषा के पिता के रूप में जाना जाता है.

नरेंद्र मोदी

भारत के 14 वें वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, मोध-घांची जाति के हैं.

अंबानी परिवार

दुनिया के सबसे अमीर परिवारों में से एक अंबानी परिवार का संबंध गुजरात के मोध वाणिक जाति से है.

Monday, March 20, 2023

SHEKHAWATI HAVELIYA - शेखावाटी की प्रसिद्ध हवेलियां व भित्ति चित्र - VAISHYA HERITAGE

SHEKHAWATI HAVELIYA - शेखावाटी की प्रसिद्ध हवेलियां व भित्ति चित्र - VAISHYA HERITAGE


राजस्थान में बड़े–बड़े सेठ साहूकारों तथा धनी व्यक्तियों ने अपने निवास के लिये विशाल हवेलियोंका निर्माण करवाया।ये हवेलियाँ कई मंजिला होती थी । शेखावाटी क्षेत्र की हवेलियाँ अधिक भव्य, स्थापत्य की दृष्टि से भिन्नता लिए हुए हैं। एवं कलात्मक है।शेखावाटी के रामगढ़, मण्डावा, पिलानी, सरदारशहर, रतनगढ़, नवलगढ़, फतेहपुर, मुकुंदगढ़, झुंझुनूं, महनसर, चुरू आदि कस्बों में खड़ी विशाल हवेलियाँ आज भी अपने स्थापत्यका उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। राजस्थान की हवेलियाँ अपने छज्जों, बरामदों और झरोखों पर बारीक व उम्दा नक्काशी तथा भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं।
 
राजस्थान के सीकर, झुंझुनू तथा चूरू को मिलाकर शेखावाटी का नाम दिया गया है।

शेखावाटी के लिखित अलिखित इतिहास के जानकारों के मुताबिक पन्द्रहवीं शताब्दी(1443) से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यानी 1750 तक शेखावाटी इलाके में शेखावत राजपूतों का आधिपत्य था। तब इनका साम्राज्य सीकरवाटी और झुंझनूवाटी तक था। शेखावत राजपूतों के आधिपत्य वाला इलाका शेखावाटी कहलाया, लेकिन भाषा-बोली, रहन-सहन, खान-पान, वेष भूषा और सामाजिकसांस्कृतिक तौर-तरीकों में एकरूपता होने के नाते चुरू जिला भी शेखावटी का हिस्सा माना जाने लगा। इतिहासकार सुरजन सिंह शेखावत की किताब ‘नवलगढ़ का संक्षिप्त इतिहास’ की भूमिका में लिखा है कि राजपूत राव शेखा ने 1433 से 1488 तक यहां शाषन किया। इसी किताब में एक जगह लिखा है कि उदयपुरवाटी (शेखावाटी) के शाषक ठाकुर टोडरमल ने अपने किसी एक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के स्थान पर भाई बंट प्रथा लागू कर दी। नतीजतन बंटवारा इतनी तेजी से हुआ कि एक गांव तक चार-पांच शेखावतों में बंट गया। यही भूल झुंझनू राज्य में भी दोहराई गई। इस प्रथा ने शेखावतों को राजा से भौमिया (एक भूमि का मालिक) बना दिया।


झुंझनू उस वक्त के शाषक ठाकुर शार्दूल सिंह के पांच पुत्रों- जोरावर सिंह, किशन सिंह, अखैसिंह, नवल सिंह और केशर सिंह की भूमियों में बंट गया। नवल सिंह का नवलगढ़ उसी भाई बंट प्रथा का ही एक नमूना है। केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने सेठ-साहूकारों और उद्योगपतियों को खूब फलने फूलने का मौका दिया।




झुंझुनूं में टीबड़ेवाला की हवेली तथा ईसरदास मोदीकी हवेली अपने शिल्प वैभव के कारण अलग ही छवि लिए हुए हैं। मण्डावा (झुंझुनूं) में सागरमल लाडिया, रामदेव चौखाणी तथा रामनाथ गोयनका की हवेली, डूंडलोद (झुंझुनूं) में सेठ लालचन्द गोयनका, मुकुन्दगढ़ (झुंझुनूं) में सेठ राधाकृष्ण एवं केसर देव कानोड़िया की हवेलियाँ, चिड़ावा (झुंझुनूं) में बागड़िया की हवेली, डालमिया की हवेली, महनसर (झुंझुनूं) की सोने -चाँदीकी हवेली, श्रीमाधोपुर (सीकर) में पंसारी की हवेली, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) केडिया एवं राठी की हवेली प्रसिद्ध है।

झुंझुनूं जिले की ये ऊँची-ऊँची हवेलियाँ बलुआ पत्थर, ईंट, जिप्सम एवं चूना, काष्ठ तथा ढलवाँ धातु के समन्वय से निर्मित अपने अन्दर भित्ति चित्रों की छटा लिये हुए हैं।

सीकर में गौरीलाल बियाणी की हवेली, रामगढ़ (सीकर) में ताराचन्द रूइया की हवेली समकालीन भित्तिचित्रों के कारण प्रसिद्ध है। फतेहपुर (सीकर) में नन्दलाल देवड़ा, कन्हैयालाल गोयनका की हवेलियाँ भी भित्तिचित्रों के कारण प्रसिद्ध है।

चुरू की हवेलियों में मालजी का कमरा, रामनिवास गोयनका की हवेली, मंत्रियों की हवेली इत्यादि प्रसिद्ध है। चूरु सुराणा की हवेली में 1100 दरवाजे एवं खिड़कियाँ है।

शेखावाटी की हवेलियाँ अपनी विशालता और भित्ति चित्रकारी के लिए विश्व में प्रसिद्ध है । इन्हें देखनेकेलिए साल भर देशी-विदेशी पर्यटको का ताँता लगा रहताहै।

शेखावाटी की हवेलियाँ के अधिकांश भित्ति चित्र लगभग 125 से 150 वर्ष पूर्व के बने हैं। हवेलियों में अराइस की आलागीला पद्धती और दीवार की सूखी सतह पर भी चित्राकंन मिलते है। अराइस की गीली सतह के चित्रो में स्केच (कुराइ) तकनीक का सुन्दर प्रयोग किया है। अन्दर का हिस्सा आज भी सुरक्षित व सजीव है।

ये भित्ति चित्र 150 से 200 साल पुराने हैं. इन्हें दीवार पर चूने का प्लास्टर करते वक्त बनाया जाता था. पत्थर की पिसाई कर उन्हें पेड़-पौधों की पत्तियों और प्राकृतिक रंगों के साथ गीले प्लास्टर में मिलाकर तालमेल से पेंटिंग हवेली की दीवारों पर उकेरा जाता था. गीले प्लास्टर में ये रंग पूरी तरह समा जाते थे. इस तरह के रंग फैलने की बजाए अंदर तक जड़ पकड़ कर लेते थे. तभी तो 200 वर्ष पुरानी ये पेंटिंग आज भी नयनाभिराम हैं.

अपनी चित्रित हवेलियों, महलों और अन्य कई एतिहासिक धरोंहरों के लिए प्रसिद्ध शेखावाटी को “ऑपन आर्ट गैलरी ऑफ़ राजस्थान” के नाम से भी जाना जाता है। नदीने प्रिंस हवेली, मोरारका हवेली म्यूजियम, डॉ.रामनाथ.ए. पोद्दार हवेली म्यूजियम, जगन्नाथ सिंघानिया हवेली और खत्री महल यहाँ के प्रमुख आकर्षक स्थल है।

1802 में बनाई नदीने प्रिंस हवेली के नये मालिक एक कलाकार ने इसे आर्ट गैलरी औरसांस्कृतिक केंद्र में परिवर्तित कर दिया है।डॉ.रामनाथ.ए.पोद्दार हवेली म्यूजियम में राजस्थानी संस्कृती को दर्शाते कई चित्र मौजूद है। मोरारका हवेली म्यूजियम लगभग 250 साल पुराना किला है, जब की खेत्री महल 1770 में बनी बहुमूल्य एतिहासिक धरोहर है, हम यहाँ प्राचीन वास्तुकला देख सकते हैं।

मंडावा, मुकुंदगढ़ और डूंडलोद के किले शेखावाटी के प्रमुख किलों में से है। पर आजकल मंडावा का किला हेरिटेज होटल बन गया है, जब कि डूंडलोद किला यूरोपियन चित्रों के बहुत बड़े संग्रहालय के रूप मेंपरिवर्तित हो गया है। मुकुंदगढ़ किला 8000 वर्गमीटर में फैला है और इसके विशाल बरामदे, आंगनऔर बारजे देखने लायक है।

पर्यटकों को ऊँटपर सवार होकर पूरे रेगिस्थान की सैर करने में बड़ा मज़ा आता है। यहाँ के कई महल आज हेरिटेज होटलमें तब्दील हो गए हैं, यहाँ सैलानियों को मंत्रमुग्ध करदेने वाला अनुभव प्राप्त होता है।

नवलगढ़ में तकरीबन 700 छोटी-बड़ी हवेलियां हैं। अगर सिर्फ भव्य और बड़ी हवेलियों की बात करें तो भी 200 का आंकड़ा तो पार हो ही जाएगा। दीवारों पर उकरे रंग, छतरियों पर छितरे रंग, छज्जों में छिपते रंग, आलों में खोए रंग, राजा रंग, दासी रंग, सैनिक रंग, सेठिया रंग…… जितने रंग उतनी हवेलियां, जितनी हवेलियां उतनी कलाकारी, और जितनी कलाकारी उतनी कहानियां। मोरारका की हवेली… पोद्दार की हवेली… सिंघानिया की हवेली… गोयनका की हवेली… जबलपुर वालों की हवेली… जोधपुर वालों की हवेली… कलकत्ता वालों की हवेली… सेठ जी की हवेली… सूबेदार की हवेली… राजा की हवेली… हर मौसम की हवेली…।

बगड़। शेखावाटी
बगड़ राजस्थान के शेखावाटी प्रांत का छोटा सा शहर है जो अपनी चित्रित हवेलियों के लिए लोकप्रिय है। इन में से ज्यादातर हवेलियों का निर्माण 20वी सदी में शेखावाटी प्रांत के मारवाड़ी व्यापारियों ने किया था। इन हवेलियों पर बनाये गए चित्रों में कहीं कहीं खरे सोने का इस्तेमाल हुआ है।
रुंगटा और पिरामल मखारिया हवेली यहाँ कि दो प्रमुख आकर्षक हवेलियाँ हैं, जो आज हेरिटेज होटल में परिवर्तित हो गई है। इनके अलावा फतेहसागर वाटर टैंक, मिया साहिब की दरगह और वाइट गेट बगड़ के प्रचलित पर्यटक स्थल है।

अलसीसर और मलसीसर
अलसीसर और मलसीसर झुंझुनू जिले के दो शहर, शेखावाटी प्रान्त के उत्तरी दिशा में स्थित है। इन शहरों का निर्माण 18 वी सदी के मध्य या अंत में हुआ था। इन शहरों की हवेलियों पर कि गई रंग पिरंगी चित्रकला बहुत उत्तम और सुन्दर है, जिन्हें देखने पर्यटक दूर दूर से आते हैं। यहाँ की बावडियों और जलाशयों का निर्माण राजस्थानी शैली में हुआ है।

झुंझुनू से केवल 27 कि.मी दूर अलसीसर शहर की चित्रित हवेलिया और किले इस शहर को लोकप्रिय बनाते हैं। श्री लाल बहादुर मल की हवेली, तेजपाल झुंझुनूवाला की हवेली, लाख की हवेली, महाली दत्त, केतन हवेली, ठाकुर छोटू सिंह की समाधी, श्री लाल बहादूर मल की बावड़ी और जीवन राम मरोडिया का तालाब यहाँ के अन्य मुख्य पर्यटकीय स्थल है।

मलसीसर झुंझुनू से केवल 32 कि.मी दूर एक छोटा सा गाँव है। प्रेम गिरी जी का मठ,बनार्शी दास बांका हवेली, सेढ़ मल सरोगी हवेली, बांका बवाडी, जोखी राम बवाडी, सरोगी बवाडी यहाँ के प्रमुख आकर्षक स्थल है।

मंडावा, शेखावाटी
राजस्थान के झुंझुनू जिले में, और शेखावाटी प्रांत के मध्य में स्थित मांडवा एक छोटा सा शहर है।मंडवा अपने किलों और हवेलियों के लिए प्रसिद्ध है। मंडवा का किला जयपुर की उत्तरी दिशा में 190 कि.मी दूर है, और यहाँ रोड मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।

18 वी सदी में बने मंडवा किले को कैसल मंडवा भी कहा जाता है। यह किला बहुत सुन्दर है और इसके प्रवेश द्वार पर बने भगवन कृष्ण और उनकी गायों की चित्रकलायें और भी सुन्दर है। इस किले का निर्माण 1812 (1755 ए.डी) विर्कम संवत में राजा श्रधुल सिंह के बेटे ठाकुर नवल सिंह ने किया था। इसका निर्माण मध्ययुगीन शैली में हुआ है और किले में बने भित्ति चित्र बहुत सुन्दर है। किले के कमरों में कई तरह की नक्काशियां,आईने पर की गई कारीगरी, भगवन कृष्ण के चित्र मौजूद है। किले के दरबार में मौजूद चित्र और प्राचीन वस्तुवें इसकी शोभा बढ़ाते हैं। पर आज कैसल मंडवा एक हेरिटेज होटल में परिवर्तित हो गया है और इसकी देख रेख मंडवा का शाही परिवार करता है।

होटल में कुल 70 कमरे है जो स्टैण्डर्ड, डीलक्स, लक्जरी सूट, और शाही सूट की श्रेणी में विभाजित है। यहाँ के मल्टी क्युजिन रेस्टोरंट में यात्री पारंपरिक राजस्थानी खाने के साथ साथ और कई व्यंजनों का भी स्वाद चख सकते हैं। इसके अलावा 24 घंटे रूम सर्विस, ट्रेवल डेस्क, विदेशी मुद्रा, स्विमिंग पूल ( यहाँ से 3 कि.मी दूर डेज़र्ट रिसोर्ट में), सांस्कृतिक कार्यक्रम, खाना, घोडा सफारी, ऊंट सफारी, गाँव की सैर आदि मौजूद है।

चुरू, शेखावाटी
शेखावाटी से लग भग 82 कि.मी दूर स्थित चुरू, अपनी आलीशान हवेलियों और किलों के लिए प्रसिद्ध है। जिसका निर्माण पूरी तरह राजस्थानी शैली में किया गया है। इन हवेलियों और किलों की बाहरी दीवारों पर यहाँ के वीरों की वीर गाथाओं के चित्र बनाये गए हैं। कन्हैयालाल बागला हवेली, सुराना हवेली और मालजी का कमरा नमक इन तीनों हवेलियों की दीवारों पर (राजस्थानी कहानियों के कलाकार) डोला और मारू के जीवन के कई हिसों का चित्रण किया गया है।

1739 में ठाकुर कुशल सिंह द्वारा बनाया किला, यहाँ का प्रमुख आकर्षण है। इनके अलावा नगर श्री अजायबघर, लक्ष्मीनारायण चंद्गोथिया हवेली और लक्ष्मीनारायण मंदिर यहाँ के कुछ एतिहासिक स्थल है। अत कंभ छतरी और गोंदिया छतरी यहाँ के प्रसिद्ध एतिहासिक स्थल है।

इन छतरियों की भीतरी दीवारों पर बनाये गए सुन्दर चित्र आखों को सुकून देते हैं। इनके अलावा रघुनाथजी मंदिर, चंद्गोथिया मंदिर, जामा मस्जिद, नाथजी का डोरा, सेठानी का जोहरा और बालाजी मंदिर चुरू के मुख्या आकर्षक स्थान है।

फतेहपुर, शेखावाटी
फतेहपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 11, जयपुर और बीकानेर के मध्य, राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है। इसकी स्थापना 15 सदी के मध्य में कयामखानी के नवाब फ़तेह खान ने की थी। शेखावाटी के अन्य शहरों की तरह फतेहपुर भी अपनी वैभव और चित्रित हवेलियों के लिए प्रसिद्ध है।

1865 में बनाई गई गोयनका हवेली की दीवारों की चित्रकला इसे यहाँ की अन्य हवेलियों में शेष्ट बनाती है। हवेली की छत पर बनाये गए चित्र बहुत सुन्दर है, जो इस हवेली की खूबसूरती को निखरते हैं। इनके अधिक इस शहर में और कई एतिहासिक धरोहरें जैसे नन्द लाल देवरा, सारोगी और सिंघानिया हवेली मौजूद है।

डुण्डलोद
राजस्थान के झुंझुनू जिले के शेखावाटी प्रांत के मध्य में स्थित डुण्डलोद एक छोटा सा शहर है। यह भी अपनी हवेलियों और महलों के लिए प्रसिद्ध है। 16 वी सदी में बना डुण्डलोद किला जिसका निर्माण राजा रावल ने किया था यहाँ का मुख्य आकर्षण है। अब यह किला हेरिटेज होटल में परिवर्तित हो गया है। इनके अलावा सत्यनारायण मंदिर, छोकानी, दीवाने ए खास, लडिया और सर्फ़ हवेली, जगथै और गोयनका हवेली डुण्डलोद के प्रमुख आकर्षक स्थल है।

झुंझुनू
झुंझुनू, राजस्थान के शेखावाटी में स्थित शहर है। यह भी अपनी हवेलियों और उनमें कि गई चित्रकारीता के लिए प्रसिद्ध है। 18 वी सदी में बना खेत्री महल, बिहारीजी मंदिर, और मेर्तानी बोरी यहाँ के पर्यटक स्थल है। सेठ ईश्वर दास मोहन दास मोदी हवेली में कि गई चित्रकारीता इसे शेखावाटी की बेहतरीन हवेलियों में से एक बनती है। 19 वी सदी में बनी टिब्रेवाला हवेली, अपने रंग पिरंगे खिडकियों के शीशों के लिए मशहूर है। जोरावर घर, नवाब समस्खान का मकबरा, खेत्री महल, लक्ष्मीनाथ मंदिर, अजीत सागर और नवाब रोहिला खान का मकबरा यहाँ के पर्यटकीय स्थान है।

मुकुंदगढ़
राजस्थान के झुंझुनू जिले में स्थित मुकुंदगढ़ शहर की स्थापना 18 वी सदी में राजा मुकुंद सिंह ने कि थी। यहाँ की हवेलियाँ अपने दीवान खाने और दीवारों पर कि गई भिन्न भिन्न तरह की चित्रकारीता के लिए प्रसिद्ध है। इन हवेलियों के दीवान खानों में आप को 17 वी और 18 सदी कि पारिवारिक तस्वीरें, लकड़ी का फर्नीचर और दीवारों पर टंगी कई चीजें देखने मिलेंगी। हवेली की छत्रियों पर बने परिवारवालों के चित्र बहुत सुन्दर है। यहाँ के बहुत सारे मंदिर भगवन कृष्णा को समर्पित है, जिन में से विष्णु गोपाल मंदिर और गोपी नाथ मंदिर प्रमुख है। विलियम हवेली, घुवाले वोलों की हवेली, गंगा बक्स सर्फ हवेली और राजकुमार गनेरीवाला कला केंद्र यहाँ के अन्य भ्रमणिक स्थल है।

लक्ष्मणगढ़, शेखावाटी
19 वी सदी में सीकर के राजा, राजा लक्ष्मण सिंह ने लक्ष्मणगढ़ को सिद्ध किया। श्योनारायण क्याल हवेली, चर चौक हवेली और राठी हवेली लक्ष्मणगढ़ के आकर्षक स्थल है।

नवलगढ़
18 वी सदी में ठाकुर नवल सिंह ने इस स्थान की स्थापना की जो आज राजस्थान के शेखावाटी प्रांत में स्थित है। नवल सिंह शेखावाटी के नवलगढ़ और मंडवा प्रांत के शासक थे। 1836 में बनी नवलगढ की हवेलियों पर चित्रकारी बहुत ही कुशलता पूर्वक की है। इसके अलावा 1920 में बनी आनंदी लाल पोद्दार की हवेली और बाला किला जिसकी दीवारों पर लोक कहानियां चित्रित है, सैलानियों को अपनी और आकर्षित करती है। इसके अतिरिक्त जोधराज पटोडिया हवेली, बंसीधर भगत हवेली, चोखानी हवेली, रूप निवास महल, गंगा मैया मंदिर, और ब्रिटिश क्लॉक टावर नवलगढ़ के अन्य भ्रमणिक स्थल है।









नवलगढ़ तथा मंडावा की हवेलियों में अब तक अनेक हिंदी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है


हेमराज हवेली नवल गढ़


हवेलियों के रंग पहले संपन्नता के प्रतीक बने, और फिर परंपरा बन गये। खेती करते हुए किसान से लेकर युद्ध करते सेनानी तक, रामायण की कथाओं से लेकर महाभारत के विनाश तक, देवी- देवताओं से लेकर ऋषि-मुनियों तक, पीर बाबा के इलाज से लेकर रेलगाड़ी तक….. हवेली की हर चौखट, हर आला रंगा-पुता। इंसान की कल्पना जितनी उड़ान भर सकती है, इन हवेली की दीवारों पर उड़ी। जो कहानी चितेरे के दिमाग पर असर कर गई वो दीवार पर आ गई; जो बात दिल में दबी रह गई, उसे हवेली की दीवारों पर रंगीन कर दिया गया… लेकिन एक दिन तेज़ हवा चली और उस रंगीन किताबों के कुछ पन्ने जल्दी जल्दी वक्त के साथ उड़ गए. हवेली मालिकों ने हवेलीयाँ छोड़ दीं; कोई विदेश चला गया तो कोई हवेली अनाथ हो गई। जैसे एक हवेली को देखकर दूसरी बनी थी; बिल्कुल उसी तरह एक पर ताला जड़ा तो दूसरी हवेलियों के दरवाजे भी धड़ाधड़ बंद होने लगे। शेखावाटी की हवेलियों के रंग फीके पड़ने लगे हैं।

SABHAR: hariskamma.wordpress.com/2017/01/22/शेखावाटी-की-प्रसिद्ध-हवेHarish KumarJanuary 22, 2017

CHURU KA TAJMAHAL ~ चूरू का ताजमहल - A VAISHYA HERITAGE

CHURU KA TAJMAHAL ~ चूरू का ताजमहल - A VAISHYA HERITAG

श्रापित गाँव में सेठ सेठानी के प्यार के अमर प्रेम का प्रतीक ~ चूरू का ताजमहल

चूरू; वह स्थान सर्दी और गर्मी दोनों अपने परवान पर रहती है। सर्दियों में खैसला और गर्मियों में सैंडो बनियान में गांव गुवाड़ में लोग टहलते दिखे जहां।इसी चूरू में अनेक प्रसिद्ध जगह हैं जिनमें एक नाम दूधवाखारा के महल का भी आता है जिसे लोक शैली में ‘चुरु का ताजमहल’ भी कहा जाता है।चूरू से लगभग पैंतीस-चालीस किलोमीटर की दूरी पर दूधवाखारा स्थित है।यह वही दूधवाखारा है जहां से मघाराम जैसे आंदोलनकारियों ने एक बड़ा किसानों आंदोलन लडा़।स्वतंत्रता सेनानी हेमाराम बुडा़निया इसी दूधवाखारा के रहनेवाले थे। अब बात शुरू करते हैं दूधवाखारा के महल की।हमारे लोक में ऐसी तमाम बातें प्रचलित हैं कि यहाँ प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं के नाम पर खूब निर्माण करवाये।महल बनवाये, नक्काशीदार इमारतें बनवाई।




यथा – शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में आगरा में ताजमहल बनवाया।ठीक वैसी ही याद में निर्माण करवाया एक महल का थार के एक इलाके में।वह इलाक़ा दूधवाखारा।पर यहाँ मामला सेठ सेठाणी का था और मामला आगरा के ताजमहल के व्युत्क्रम सा था।मतलब कि यहाँ सेठ हजारीमल की याद में उनकी पत्नी सरस्वती देवी और दत्तक पुत्र ने सत्तर-इकहत्तर साल पहले इस महल का निर्माण करवाया।ताजमहल जैसी बनावट और वही संगमरमर लगे होने होने के कारण इसे चूरू का ताजमहल कहा जाने लगा।विशेषताएं महत्वपूर्ण होती थीं इन इमारतों की।इस महल में सीमेंट और बजरी जैसा कोई तत्व काम में नहीं लिया गया।महल के अंदर शिव भगवान का मंदिर है जहां खासकर सावन महीने में और शिवरात्रि को श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रहती है और जब शिवलिंग की स्थापना की गई तो भोले बाबा का इत्र से अभिषेक हुआ था और वो इत्र नालियों में बहा था जिसे ग्रामीणों ने पवित्र द्रव मानकर बोतलों में भरकर अपने घरों में रख दिया था।

महल परिसर में ही सेठ हजारीमल की समाधि बनी हुई है और वहीं निकट दूरी पर उनकी पत्नी सरस्वती देवी की प्रतिमा भी लगी हुई हैं।स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जहां हजारीमल का दाह संस्कार हुआ ठीक उसी के ऊपर इस महल का निर्माण किया गया है।चूरू का आधा मामला शेखावटी जैसा है।यहां के सेठों ने जितना सर्व समाज के लिए किया उतना नेता-न्यांगली लोग ने शायद ही किया हो।हजारीमल भी भामाशाह थे।अपने गांव में कूंड, बावड़ी हवेलियों आदि का निर्माण उन्होंने करवाया।स्थानीय अस्पतालों में धर्मशालाएं भी जिवित कीं।विद्यालय निर्माण और दूधवाखारा रेलवे स्टेशन की पुरानी बिल्डिंग भी उन्हीं की देन है।ग्रामीण बताते हैं कि सेठ सामान्य नहीं थे, उनका कलकत्ते में व्यापार था और वहां शेयर मार्केट के वे बड़े व्यावसायी थे।बकौल एक व्यक्ति किंग थे हजारीमल शेयर मार्केट के।और आज भी कलकत्ता में किसी स्थान पर उनका नाम स्वर्ण आखरों में लिखा हुआ है – ‘दूधवाखारा वाले सेठ हजारीमल’।अंग्रेजों के समय में उनको अपने तीन साथियों के साथ रामबहादुर की उपाधि दी गयी थी।तारानगर, राजगढ और चूरू तीनों रूट से जुड़े दूधवाखारा में विदेशी भी भ्रमण करने आते हैं।सेठों की विरासत और सामाजिक कार्यों को देख खुश होते हैं।

इसी दूधवाखारा में एक मंदिर है सती माता का।मंदिर की कहानी का अपना एक रोचक पहलू है।सदियों पहले सात बारातें इस गांव से होकर गुज़री थीं।बीच में रातीढोल दूधवाखारा में भी हुआ और लूटपाट के उद्देश्य से यहाँ लड़ाई हुई और सातों दुल्हनें सतीं बन गईं जिसमें एक का मंदिर दूधवाखारा में निर्मित है।और इसी घटना के बाद सती माता ने श्राप भी दिया कि इस गांव में जिस भी लकड़ी लड़की की शादी होगी वो चूड़ा और चूड़ी के धोक लगाएगी और फिर विदा होगी।और यह भी कि इस दूधवाखारा में कभी मीठा पानी नहीं निकलेगा।मान्यता का खंडन करने के लिए कुछ लोगों ने दूधवाखारा नाम से हरिद्वार में भी बोरिंग करके परीक्षण किया लेकिन वहाँ भी पानी खारा ही निकला।

धन संचय करना ठीक बात है लेकिन उसे समाज उपयोगी कार्यों में कैसे लगाया जाये ये शेखावटी और चूरू के सेठों से सीखने को मिलता है।

KOTHARI HAWELI CHURU - कोठारी हवेली चुरू - VAISHYA HERITAGE

 KOTHARI HAWELI CHURU - कोठारी हवेली चुरू - VAISHYA HERITAGE 

कोठारी हवेली चुरू जिले में स्थित एक आकर्षक और प्रसिद्ध संरचना है जिसका निर्माण 1925 में एक सेठ ओसवाल जैन कोठारी ने करवाया था।










इस हवेली का निर्माण वहां के प्रसिद्ध सेठ ओसवाल जैन कोठारी ने करवाया था। इस हवेली पर की गई चित्रकारी काफी सुंदर है। कोठारी हवेली में एक बहुत कलात्मक कमरा है, जिसे मालजी का कमरा कहा जाता है। इसका निर्माण उन्होंने सन 1925 में करवाया था।

सबसे प्रसिद्ध हवेली 'मालजी का कामरा' है जिसे मालजी कोठारी ने 1925 ई. में बनवाया था जब चुरू बीकानेर राज्य का हिस्सा था। इसे शुरू में एक गेस्ट हाउस के रूप में बनाया गया था लेकिन जल्द ही यह कलाकारों के लिए एक मनोरंजन स्थल बन गया।हवेली प्रसिद्ध इतालवी और शेखावाटी वास्तुशिल्प डिजाइनों पर बनाई गई है।

J K TEMPLE - KANPUR - सेठ कमलापति सिंघानिया द्वारा निर्मित कानपुर का जे.के. मंदिर

J K TEMPLE - KANPUR - सेठ कमलापति सिंघानिया द्वारा निर्मित कानपुर का जे.के. मंदिर

कानपुर के जे के मंदिर को श्री राधा कृष्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।इस मंदिर का निर्माण 50 साल पूर्व सिंघानिया परिवार की जे.के. ट्रस्ट ने करवाया था।इस कारण इसे जे. के. मंदिर कहा जाता है।इस मंदिर को गोलूबांसी सेठ कमलापति सिंघानिया की धर्मपत्नी श्रीमती रामप्यारी देवी के कहने पर बनवाया गया था। जब उन्होंने अपने पति से इस बारे में चर्चा की तब उनके द्वारा जे. के. ट्रस्ट को इस मंदिर को बनाने का दायित्व दिया।इस मंदिर का शिलान्यास सिंघानिया परिवार के सुपुत्री श्री पद्मावती सिंघानिया के द्वारा समिति श्रावण शुक्ल 8 विक्रमी संवत 1668 दिनांक गुरुवार 25 जुलाई सन 1942 को शाम 7:26 पर किया गया।

इस मंदिर में स्थापित सभी मूर्तियों को अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा स्थापित कराया गया है।मंदिर की प्रमुख मूर्ति श्री राधा कृष्ण जी की है।इसकी प्रतिष्ठा श्रीमती राम प्यारी देवी जी के द्वारा ही कराई गई थी।इस मंदिर की छत बहुत ऊंची है,जिससे हवा और प्रकाश आसानी से आ जा सकता है।इस मंदिर का निर्माण सन 1953 में हो गया था,लेकिन जनता के लिए यह मंदिर सन 1960 में खोला गया।सन 2010 में इसकी 50 वीं सालगिरह भी मनाई गई थी।




पंच तत्वों का सही सयोंजन
मंदिर का निर्माण पंचतत्व की सही क्रम से किया गया है।यह पंचतत्व पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश है।मंदिर के मुख्य द्वार से राधा कृष्ण साफ नजर आते हैं।ऐसा माना जाता है, कि मुख्य द्वार प्रथ्वी को प्रदर्शित करता है।इसके बाद आता है, जल तत्व मुख्य द्वार से थोड़ी दूर चलते ही जैसे ही आप आगे बढ़ेंगे तो शानदार फव्वारा आपका मन प्रसन्न कर देगा।

जल तत्व के बाद अग्नि तत्व का स्थान आता है, मंदिर में थोड़ा घूमने के बाद आप जैसी ही मंदिर की सीढ़ियां आगे चलेंगे तो आपको यज्ञ आदि के लिए स्थान नजर आएगा यह स्थान अग्नि तत्व को प्रदर्शित करता है।इसके बाद जब आप मंदिर के अंदर प्रवेश करेंगे तो आपको एक बहुत बड़ा शानदार हॉल नजर आएगा यह हॉल मंदिर में वायु तत्व का प्रदर्शक है।मंदिर की इस विशाल हॉल में जब आप ऊपर की तरफ देखेंगे तो एक विशाल गुंबद आपको नजर आएगा यह विशाल गुंबद आपको आकाश तत्व की अनुभूति कराता है।इन सभी तत्वों को देख कर आपको सभी तत्वों का एक सही क्रम में प्रयोग किया जाना प्रदर्शित होगा।

दिशाओं का सही सयोंजन
मंदिर के शिखर के ठीक नीचे राधा कृष्ण जी की एक शानदार मूर्ति विराजमान है।कानपुर गंगा तट पर बसा है, कानपुर की सड़कों के समांतर बने भवनों का मुख्य मुख्य रूप से उत्तर पूर्व दिशा की ओर है।इन मकानों का 2 दिशाओं में होने के कारण जब इन मकानों की खिड़की से जे. के. मंदिर को देखा जाता है, तो वह थोड़ा तिरछा नजर आता है।जे. के. मंदिर का निर्माण सभी दिशाओं को सीध में रखकर किया गया है,अर्थात पूरब,पश्चिम,उत्तर और दक्षिण सभी दिशाएं अलग अलग है।कहीं भी दो दिशाएं एक साथ नहीं मिलती।
जे. के. मंदिर का मुख पूरी तरह से पूर्व दिशा की तरफ है, मंदिर में स्थित राधा कृष्ण की मूर्ति मंदिर के केंद्र में स्थापित की गई है और राधा कृष्ण की मूर्ति का मुख पूर्व दिशा की ओर है।मूर्ति के ठीक पीछे पश्चिम दिशा, बाएं हाथ पर उत्तर और दाहिने हाथ पर दक्षिण दिशा है।इस मंदिर कि बनावट के कारण यहां पर अपार सकारात्मक ऊर्जा हमेशा बनी रहती है।

मंदिर परिसर
इस मंदिर में प्रमुख हिंदू देवी देवताओं को समर्पित पांच मंदिर है,जिसमें से राधा और कृष्ण का मंदिर प्रमुख है। इसके अलावा अन्य चार मंदिर हनुमान जी, लक्ष्मीनारायण, अर्धनारीश्वर और नर्मदेश्वर को समर्पित है।श्री राधा कृष्ण मंदिर एक शानदार पार्क और झील के पास स्थित है।रात में मंदिर पूर्ण तरीके से रोशनी से नहा जाता है और रोशनी के कारण झील के पानी में मंदिर का एक सुहावना दृश्य प्रस्तुत होता है।

श्री राधा कृष्ण जी के मंदिर में जन्माष्टमी के दिन अत्यधिक मात्रा में श्रद्धालुओं का आना जाना रहता है। कानपुर स्थित जे के टेंपल प्रत्येक दिन सुबह 5:00 बजे से 12:00 बजे तक और शाम 4:00 से 10:00 बजे तक खुला रहता है।जन्माष्टमी के दिन हिंदू मान्यता के अनुसार कृष्ण का जन्म हुआ था, इस दिन जे. के. मंदिर में एक मेले का आयोजन किया जाता है।इस मेले के दौरान भारतवर्ष से लोग यहां घूमने आते हैं‌।

Sunday, March 19, 2023

TRILOK TEERTH BADAGAON - त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव

TRILOK TEERTH BADAGAON - त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव


त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव या बड़ा गांव जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है। यह स्थान दिल्ली सहारनपुर सड़क मार्ग उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेडका कस्बे के पास रावण उर्फ बड़ा गांव नामक स्थान पर स्थित है। खेडका से बड़ा गांव जाने के लिए 4 किमी की पक्की सड़क है। यहा से रिक्शा, आटो, तांगा आदि आसानी से बड़ागांव के लिए मिल जाते है। बड़ागांव से होकर त्रिलोक तीर्थ धाम के लिए रास्ता जाता है। त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव के बिल्कुल पास है। यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यहां 16 मंजिला 317 फुट ऊंचा विशाल मंदिर है। जिसके ऊपर भगवान आदिनाथ जी की पद्यासन 31 फिट ऊंची प्रतिमा दार्शनिक है। तथा 41 फिट ऊंचा मान स्तंभ भी चित्ताकर्षक है। त्रिलोक तीर्थ धाम लगभग 50 हजार वर्ग गज फैला हुआ एक मनोरम ऐतिहासिक धार्मिक स्थान है।

त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव का इतिहास – बड़ा गांव जैन मंदिर का इतिहास

इस मंदिर की प्रसिद्धि अतिशय क्षेत्र के रूप में है। कुछ वर्षो पहले यहां एक टीला था। जिस पर झाड़ झंखाड़ उगे हुए थे। गांव देहात के लोग यहां मनौती मनाने आते रहते थे। अपने जानवरों की बीमारियों या उन्हें नजर लगने पर वे बड़ी श्रद्धा से आते थे और टीले पर दूध चढाकर मनौती मनाते और उनके पशु रोग मुक्त हो जाते थे। बहुत से लोग अपनी बीमारी, पुत्र प्राप्ति और मुकदमों की मनौती मनाने भी आते थे। और इस टीले पर दूध चढाते थे, इससे उनके विश्वास के अनुरूप उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती थी। संभंवतः किसी जमाने में यहां विशाल मंदिर था। किंतु मुस्लिम काल में धर्मान्धता अथवा प्राकृतिक प्रकोप (जो भी कारण हो) के कारण यह नष्ट हो गया और एक टीले का रूप बन गया।

त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव के सुंदर दृश्य

एक बार ऐलक अनन्तकीर्ति जी खेड़का ग्राम में पधारे। उस समय प्रसंगवश वहां के लोगों ने उनसे इस टीले की तथा उसके अतिशयों की चर्चा की। फलतः वे उसे देखने गये। उन्हें विश्वास हो गया कि इस टीले में अवश्य ही प्रतिमाएं दबी होगी। उनकी प्रेरणा से वैसाखी 7 संवत् 1976 को इस टीले की खुदाई कराई गई। खुदाई होने पर प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष निकले और उसके बाद बड़ी मनोज्ञ 10 दिगंबर जैन प्रतिमाएं निकली थी। किंतु वह बुरी तरह खंडित हो चुकी थी। अतः यमुना नदी में प्रवाहित कर दी गई। धातु प्रतिमाओं पर कोई लेख नहीं था। किंतु पाषाण प्रतिमाओं पर मूर्ति लेख था। उससे ज्ञात होता है कि इन प्रतिमाओं में कुछ 12वी शताब्दी की थी। और कुछ 16वी शताब्दी की। इससे उत्साहित होकर यहां एक विशाल दिगंबर जैन मंदिर का निर्माण किया गया और ज्येष्ठ शुक्ल 9 संवत् 1979 को यहां भारी मेला हुआ, इसके बाद संवत् 1979 में यहां समारोह पूर्वक शिखर की प्रतिष्ठिता हुई। तथा यहां विभिन्न स्थानों की मूर्तियों को लाकर प्रतिष्ठित किया गया।त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव के सुंदर दृश्य

जिस स्थान पर खुदाई की गई थी, वहां एक पक्का कुआं बना दिया गया। कुआं 17 फिट गहरा है। इस कुएँ का जल अत्यंत शीतल स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक था। इसके जल से अनेक रोग दूर हो जाते थे। धीरे धीरे इस कुएँ की ख्याति दूर दूर तक फैल गई। और यहां बहुत से रोगी आने लगें। इतना ही नहीं इस कुएँ का जल कनस्तरों में रेल द्वारा बाहर जानें लगा। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि खेडका के स्टेशन पर प्रतिदिन 100-200 कनस्तर जाते थे। वहां से उन्हें बाहर भेजा जाता था। अब उसके जल में वह विशेषता नहीं रह गई है। मंदिर में मनौती मनाने वाले जैन और अजैन बंधु अब भी आते है। जिनके जानवर बिमार पड़ जाते है वे भी यहाँ मनौती मनाने आते है।
बड़ा गांव जैन मंदिर स्थापत्य व प्रतिमाएं

यह मंदिर शिखर बद है। शिखर विशाल है। उसका निचला भाग कमलाकर है। मंदिर में केवल एक हॉलनुमा मोहन गृह है। हॉल के बीच तीन कटनी वाली गंधकुटी है। गंधकुटी एक पक्के चबुतरे पर बनी हुई है। वेदी में मूलनायक भगवान पार्शवनाथ की श्वेत पाषाण की पद्यासन प्रतिमा विराजमान है। इसकी अवगाहन एक हाथ के लगभग है। प्रतिमा सौम्य और चित्ताकर्षक है। इसकी प्रतिष्ठा भट्टारक जिनचन्द्र ने की थी। इस प्रतिमा के अतिरिक्त एक पीतल की प्रतिमा इस वेदी विराजमान है।

मंदिर के चारों ओर बरामदा बना हुआ है। बरामदे के चारो कोनो पर शिखरबद्ध छोटे मंदरिया बनी हुई है। पूर्व की वेदी में ऋषभदेव भगवान की मटमैले रंग की पद्यासन प्रतिमा विराजमान है। इसकी अवगाहना डेढ़ हाथ की है। यह प्रतिमा 15वी शताब्दी की है। तथा यह भूगर्भ से निकली थी। दक्षिणी वेदी में मूलनायक भगवान विमलनाथ की भूरे पाषाण की पद्यासन प्रतिमा है। नीचे के हाथ की उंगलियां खंडित है। इसका लाछन मिट गया है। किंतु परम्परागत मान्यता के अनुसार इसे विमलनाथ की मूर्ति कहा जाता है। मूर्ति के नीचे इतना लेख स्पष्ट पढ़ने में आया है।

संवत् 1127 माघ सुदी 13 श्रीशं लभेथे।।इसी वेदी में भगवान पार्श्वनाथ की एक कृष्ण पाषाण की मूर्ति है। यह पद्यासन है, अवगाहना एक फुट है, हाथ खंडित है। इस पर कोई लेख नहीं है। पालिश कही कही उतर गई है। यह मूर्ति विमलनाथ की प्रतिमा के समकालीन लगती है। ये दोनों भूगर्भ से निकली थी।

त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव के सुंदर दृश्य

पश्चिम की वेदी में भगवान पार्श्वनाथ की श्वेत पाषाण की एक हाथ अवगाहना वाली पद्यासन प्रतिमा है। पीतल की छः इंच वेदी में चारो दिशाओं में पीतल की चार खडगासन चतुर्मुखी प्रतिमाएं है। पीतल की दो प्रतिमाएं और है। जो क्रमशः सवा दो इंची और डेढ़ इंची है। ये सभी भूगर्भ से निकली थी।
उत्तर की वेदी में भगवान महावीर की मटमैले रंग की पद्यासन प्रतिमा है। इसकी अवगाहना डेढ़ हाथ है। यह पूर्व की वेदी भगवान ऋषभनाथ की प्रतिमा के समकालीन है तथा दोनों का पाषाण एक ही है। यह भी भूगर्भ से प्राप्त हुई थी। इन प्रतिमाओं के अतिरिक्त सभी वेदियों में पीतल की एक एक प्रतिमा और यंत्र है जो सभी आधुनिक है।

मंदिर के चारों ओर धर्मशाला है। जिसका द्वार पूर्व दिशा में है। धर्मशाला के बाहर पक्का चबुतरा और एक पक्का कुआँ है। जो मंदिर की संम्पत्ति है। धर्मशाला के दक्षिण की ओर के कमरों के बीच में एक कमरे मे नवीन मंदिर है। जिसमें दो वेदियां है। बडी वेदी में मूलनायक चन्द्रप्रभु भगवान की प्रतिमा है। इनके अतिरिक्त तीन पाषाण की तथा एक धातु की प्रतिमा है। इनमे एक पाषाण प्रतिमा भूगर्भ से निकली थी। यह एक भूरे पाषाण में उकेरी हुई है। जो प्राय पांच अंगुली की है। छोटी वेदी में शीतलनाथ भगवान की खडगासन पाषाण की दो पद्यासन और एक पीतल की खडगासन प्रतिमा विराजमान है।

मानस्तम्भ का शिलान्यास

लगभग कुछ वर्षों पहले यहा क्षुल्लक मुभति सागर जी पधारे थे। उन्होंने इस क्षेत्र पर मान स्तंभ के निर्माण की प्रेरणा दी। किंतु उस समय यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सका। सन् 1971 में स्वर्गीय आचार्य शिव सागर जी के शिष्य मुनि श्री वृषभ सागर जी महाराज ने दिल्ली चतुर्मास के समय लोगों को इस कार्य के लिए पुनः प्रेरित किया। जिसके फलस्वरूप 7 नवंबर सन् 1971 को महारज जी के तत्वावधान में मंदिर के सामने मान स्तंभ का शिलान्यास हो गया। और फिर धीरे धीरे संगमरमर से 41 फिट ऊंचा मान स्तंभ तैयार हो गया। इसके अलावा भी धीरे धीरे त्रिलोक तीर्थ धाम में अनेक निर्माण, व समाजिक कार्यो का आयोजन निरंतर होता रहा है। जिसके फलस्वरूप आज त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव एक भव्य तीर्थ बन चुका है।

बड़ा गांव जैन मंदिर का वार्षिक मेला

यहा प्रति वर्ष फाल्गुन शुल्क को मेला लगता है। और आसोज कृष्ण को जल यात्रा होती है।

Friday, March 10, 2023

SHIVAM PORWAL A GREAT TRAVELLER - शिवम् पोरवाल

SHIVAM PORWAL A GREAT TRAVELLER - शिवम् पोरवाल

हौंसले की आग धधक रही है निगाहों में।
अब मुश्किलों में इतना दम नहीं की हमे रोक दे राहों में।।
क्या बुलेट से रोडट्रिप करना दिव्यांगजनों का काम नहीं?



मध्य प्रदेश में महिदपुर नाम के एक छोटे से शहर से ताल्लुक रखने वाले 26 वर्षीय शिवम् पोरवाल, बचपन से ही फोकोमेलिया सिंड्रोम से प्रभावित हैं। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें नवजात के जन्म से ही हाथ या पैर नहीं होते या फिर अक्षम होते हैं।बचपन से ही शिवम पोरवाल रोमांच के शौकीन है लेकिन दिव्यांग होने के बावजूद भी अपने शौक को पूरा किया।शिवम ने शारीरिक कमी को अपने शौक के आड़े नहीं आने दिया।

26 वर्षीय दिव्यांग सेठ युवा शिवम पोरवाल ने पत्नी के साथ पूरा किया लद्दाख ट्रिप।
घरवालों से लेकर दोस्तों तक, सबने कहा कि लद्दाख रोड ट्रिप उनके बस की बात नहीं। लेकिन शिवम् ने ठान लिया था कि पैर नहीं हैं तो क्या, मैं अपने जज्बे के दम पर अपने सभी शौक़ पूरे करूंगा। हाल ही में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ लद्दाख की बाइक ट्रिप पूरी की है।

बाइक ट्रिप पर लद्दाख जाना कइयों का सपना होता है। लेकिन वहां की पतली सड़कों और ख़राब मौसम में बाइक चलाना सबके बस की बात नहीं। ऐसे में जब आप वहां बाइक ट्रिप पर किसी ऐसे दिव्यांग को देखते हैं जिनके दोनों पैर नहीं हैं और दाहिने हाथ में केवल तीन उंगलियां और बाएं हाथ का अंगूठा उँगलियों से जुड़ा है, तो ज्यादातर लोग या तो आश्चर्य करते हैं या रुककर उनके जज्बे को सलाम करते हैं।

ऐसा ही कुछ अनुभव था शिवम् पोरवाल का भी,जब वह जून महीने में अपनी बाइक ट्रिप पर अपनी पत्नी प्रीति के साथ लद्दाख गए थे। अपनी शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हुए शिवम् अपने मन की ताकत पर ज्यादा विश्वास करते हैं और किसी भी एडवेंचर को दिल खोलकर बिना डरे अनुभव करते हैं।
 
इसके साथ-साथ वह अपने शौक़ को भी पूरा करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। शिवम् कहते हैं, “मैं 26 साल का हो गया हूं, अभी कितना कुछ करना बाकी है। मैंने ज़िप लाइनिंग का अनुभव किया है, लम्बी बाइक ट्रिप भी कर ली, लेकिन अभी पैराग्लाइडिंग और स्काई डाइनिंग करना बाकी है।”

बचपन से देखते थे बाइक चलाने और हवा में उड़ने के सपने
शिवम् जब छोटे थे तब से उन्हें बाइक चलाने का ख्याल बेहद रोमांचित करता था। उस समय जब वह साइकिल भी नहीं चला पाते थे, तब उन्हें सपने में दिखता था की वह तेज़ रफ़्तार से बाइक चला रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्हें तो सुपरमैन की तरह उड़ने के सपने भी आते थे।
 
जब वह कॉलेज में थे, तभी उनके पिता ने आर्थिक तंगी के बावजूद, शिवम् को स्कूटर खरीदकर दिया था। यह उनके जीवन का एक अहम मोड़ था, क्योंकि अब वह कहीं आने-जाने के लिए किसी पर निर्भर नहीं थे। अहमदाबाद बीएसएनएल में नौकरी लगने के बाद भी शिवम्,इसी स्कूटर से उन्होंने सबसे पहली बार अपनी पत्नी के साथ अहमदाबाद से उदयपुर की 260 किमी की रोड ट्रिप भी की थी।

शिवम ट्रिप पर छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हैं, जैसे- वह कभी रात को गाड़ी नहीं चलाते और हर 50 किमी में एक ब्रेक भी लेते हैं।
 
शिवम् अपना स्पेशल स्कूटर बड़े आराम से चला लेते हैं और इस तरह उन्हें नई जगहें घूमने में आसानी भी लगने लगी। उन्हें लगता था कि वह अहमदाबाद में ही स्कूटर चला रहे हैं, जिसके बाद उन्होंने पूरी प्लानिंग के साथ 2021 जनवरी में गोवा ट्रिप किया। अहमदाबाद से गोवा पहुंचने में उन्हें पांच दिन लग गए थे। लेकिन चूंकि उनके पास खुद का स्कूटर था, इसलिए वह गोवा की उन जगहों पर भी घूम सकें,जहां कार से नहीं जाया जा सकता।
इसी तरह वह सितम्बर 2021 में जोधपुर भी गए थे। इस ट्रिप के कुछ समय पहले ही उन्होंने एक नई एक्टिवा खरीदी थी।लेकिन जोधपुर ट्रिप पर उन्हें कई छोटी-छोटी दिक्कतें आईं।उन्हें एक अनजान गांव में रात को रुकना भी पड़ा,क्योंकि खाली रास्तों पर भी वह स्कूटर की स्पीड को ज्यादा नहीं बढ़ा सकते थे। कई बार ऐसा करने पर स्कूटर बंद हो जाता था, जिसके बाद शिवम् ने सोच लिया कि अगर ऐसी ही और लम्बी ट्रिप करनी है, तो बाइक लेनी पड़ेगी।
 
उसी दौरान शिवम् और प्रीति लद्दाख ट्रिप पर जाने की भी प्लानिंग कर रहे थे। लद्दाख यात्रा की प्लानिंग करते हुए वे यही सोच रहे थे कि कार से जाना यूं तो आरामदायक होगा, लेकिन शिवम् को अपनी व्हीलचेयर साथ रखनी होगी, क्योंकि कार पार्किंग अक्सर काफी दूर होती है। लेकिन शिवम् मन ही मन बुलेट से रोड ट्रिप करके लद्दाख जाने के बारे में सोच रहे थे।
 
पत्नी से मिला हौसला और पूरा साथ
शिवम् बताते हैं, “तब मेरे पास न बुलेट थी, न ही बुलेट लेने के पैसे। मैं यह भी जानता था कि मेरे पापा इस बात की अनुमति नहीं देंगे। लेकिन मैंने सपना तो देख लिया था बस उसे पूरा करना बाकी था।” एक समय पर उन्होंने सोचा कि कुछ साल बाद लद्दाख जाने की प्लानिंग करते हैं, लेकिन तभी उनकी पत्नी ने कहा कि अगर आप बाइक से यह सफर करना चाहते हैं, तो अभी ही करना चाहिए। एक उम्र के बाद शायद इस ट्रिप पर जाना हमारे लिए मुश्किल हो जाएगा।
 
बस फिर क्या था, शिवम् ने फैसला कर लिया कि जितनी जल्दी हो सके उन्हें बुलेट लेनी है।दिसम्बर 2021 में उन्होंने आख़िरकार बिना पापा को बताए एक बुलेट बुक कराई।हालांकि अपनी माँ को उन्होंने बता दिया था। करीबन, एक महीने में ही उनकी बुलेट आ गई। अब शिवम् को अपने हिसाब से इसे डिज़ाइन भी कराना था। जो काम बिल्कुल भी आसान नहीं था। स्थानीय मैकेनिकों को शिवम् के अनुसार इसे तैयार करने में करीबन दो महीने का समय लगा।
 
शिवम् कहते हैं, “आमतौर पर बुलेट यूं ही काफी भारी होती है, ऊपर से हमने इसमें साइड व्हील्स लगवाए थे। जो ऑल्टो गाड़ी के व्हील थे। इसलिए यह गाड़ी बहुत भारी हो गई थी। पहली बार जब मैं इसे अहमदाबाद की सड़कों पर लेकर निकला, तो मैं इसे चला ही नहीं पा रहा था। फिर हमने रॉयल एनफील्ड की ओर से आयोजित एक छोटी सी ग्रुप ट्रिप में हिस्सा लिया। तब हाईवे पर यह बुलेट चलाने का अनुभव बिल्कुल अलग था। तभी मुझे लगा कि यह गाड़ी लद्दाख जाने के लिए बनी है।”

आसान नहीं थी लद्दाख यात्रा की प्लानिंग
कुछ महीने की प्रैक्टिस के बाद, शिवम् को लगने लगा कि अब वह लद्दाख ट्रिप पर जाने के लिए तैयार हैं। तैयारी करने से पहले उन्होंने हिम्मत करके पापा को बता दिया। शिवम् ने बताया, “पापा को एक अंदाजा हो गया था कि मैं जिद्दी हूँ और एक बार ठान लेने के बाद मैं ज़रूर वह काम करके रहता हूँ। उन्होंने कई तरह से मुझे समझाने की कोशिश की। ‘यह खतरनाक ट्रिप है, तुम नहीं कर पाओगे।’ उन्होंने यहां तक कहा कि हमारा एक ही बेटा है, अगर तुमको कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे?”

शिवम् ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह एक ग्रुप के साथ जाएंगे और सुरक्षा का ध्यान रखेंगे। इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर बाइक ट्रिप से जुड़े ग्रुप्स के बारे में पता करना शुरू किया।
 
आखिरकार, उन्हें अहमदाबाद का ही एक ग्रुप मिला, जो श्रीनगर से लेह जा रहा था, जिसमें एक बैकअप वाहन और मैकेनिक भी साथ में था। इस ग्रुप ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह उनके साथ रहेंगे और भले दूसरे बाइकर्स आगे चले जाएं, लेकिन बैकअप वाहन हमेशा उनके साथ रहेगा।
 
जब स्टेशन मास्टर ने कहा दिव्यांग कब से बुलेट चलाने लगे?
शिवम् कहते हैं, “मैं कश्मीर से ट्रिप वालों से जुड़ने वाला था। जम्मू तक हम ट्रेन से ही जाने वाले थे, इसलिए जब हम अपनी बुलेट को ट्रेन में लोड करवाने गए, तो स्टेशन मास्टर ने यह कहकर मना कर दिया कि यह गाड़ी बहुत भारी है और इसे दिव्यांग श्रेणी में डिस्काउंट भी नहीं मिलेगा। क्योंकि दिव्यांग बुलेट नहीं चलाते। यहां तक की उन्हें जब पता चला कि मैं लद्दाख रोड ट्रिप पर जा रहा हूँ, तो उन्होंने मुझे इस यात्रा पर न जाने की सलाह देते हुए कहा कि यह एक खतरनाक ट्रिप है। तुम्हारे पास जो है वह भी खो दोगे। यह ट्रिप दिव्यांगजनों के लिए नहीं है।”
आख़िरकार स्टेशन मास्टर ने तीन गाड़ियों का पैसा लेकर बुलेट के ट्रांसपोर्ट की बुकिंग की। ट्रिप पर जाने से पहले, उन्होंने हर तरह के सेफ्टी उपकरणों को अपने साथ रखा था। उन्होंने अपने साथ बाइक यात्रा के लिए राइडिंग जैकेट, हेलमेट,सैडल बैग, टैंक बैग, ट्रेकिंग बैग जैसी कई चीज़ें खरीदी थीं। इस तरह दो जून को उन्होंने अहमदाबाद से जम्मू की ट्रेन ली, जिसमें उनकी बुलेट भी रखी गई थी।

जम्मू पहुंच कर उन्हें अपने ग्रुप से मिलने के लिए श्रीनगर जाना था। शिवम् ने बताया,“श्रीनगर की वह यात्रा मेरे लिए काफी चुनौतियों से भरी थी।वह रास्ता बेहद खराब था। हम सुबह से निकले थे और वह 300 किमी की यात्रा हमने रात को एक बजे पूरी की।रास्ते इतने ख़राब थे कि मैं ब्रेक नहीं लगा पा रहा था, हमारा ढेर सारा सामान भी हमारे साथ बाइक पर था।”

यात्रा शुरू होने से पहले ही मुसीबतें शुरू हो गईं। लेकिन शिवम् ने रास्ते में मिलनेवाले लोगों से मदद लेते हुए श्रीनगर की वह यात्रा पूरी की। उनकी पत्नी पीछे ढेर सारा सामान लिए बैठी थीं।

हजारों किमी का कठिन सफर हिम्मत के साथ हुआ तय
उन्होंने तीन जून से लेकर 23 जून तक लगातार हर दिन बुलेट चलाई। हालांकि, जम्मू से कश्मीर पहुंचने के बाद, वह कुछ दिन कश्मीर में रुके और आठ जून को वह अपने ग्रुप से मिले। ग्रुप में ज्यादातर लोग बाइकर थे, लेकिन शिवम् का जज्बा देखकर सभी ने उनकी खूब तारीफ की। न सिर्फ उनके ग्रुप के लोग, बल्कि उनके पास से गुजरता हर इंसान यहां तक कि आर्मी के जवानों ने भी उनके साथ फोटो खिंचवाई।
 
जहां भी वह रुकते लोगों का जमावड़ा लग जाता। कई लोग उन्हें अपने साथ खाना खाने को भी कहते, तो कई चाय पीने की ज़िद करते। लोगों का इतना प्यार शिवम् की हिम्मत बढ़ाने का काम करता था।
 
वह कहते हैं, “लद्दाख बाइक ट्रिप पर मेरी स्पेशल बुलेट को देखकर हर कोई एक बार रुककर मुझसे बात करता। जब उन्हें पता चलता कि मैं बिना पैरों के ही बाइक चलाता हूँ, तो वे सभी मेरा उत्साह बढ़ाते। इस तरह ट्रिप पर सैकड़ों लोग मुझसे मिले और मेरे साथ फोटो भी क्लिक कराई।”

मुश्किलों को अनुभव समझकर आगे बढ़ते रहे
शिवम और प्रीति ने सबसे मुश्किल खारदुंग ला दर्रा पास की यात्रा भी आराम से तय कर ली, जिसमें ज्यादातर लोगों को ऑक्सीज़न की दिक्कत होने लगती है। लेकिन उन्होंने अपने आप को हाइड्रेट रखने के लिए पानी और एल्क्ट्रॉल नियमित रूप से लिया। हालांकि कई बार उनकी गाड़ी गड्डे में भी अटक गई और लोगों को उनकी मदद के लिए आना पड़ता था।
 
यात्रा की इन सभी मुश्किलों को अनुभव समझकर वह आगे बढ़ते रहे और इस तरह उन्होंने 23 जून को अपनी बाइक ट्रिप मनाली में खत्म कर दी। हालांकि वह वापस अहमदाबाद बुलेट से ही आना चाहते थे, लेकिन मौसम ख़राब होने के कारण उन्होंने बाइक को ट्रांसपोर्ट में देने और ट्रेन से वापस आने का फैसला किया।
 
शुरुआत से ही लोगों की ना और अपनी अक्षमताओं को दरकिनार करके, शिवम पोरवाल ने सिर्फ अपने सपनों को पूरा करने पर ध्यान दिया और यही वजह थी कि मुश्किलें भी उनके जज्बे के सामने टिक नहीं पाईं। शिवम पोरवाल की कहानी हम सभी को मुश्किलों को भूलकर सपनों पर ध्यान देने की प्रेरणा देती है।
अपना बुलेट से लद्दाख जाने का सपना पूरा करने के लिए शिवम पोरवाल को बहुत-बहुत
बधाई