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Sunday, January 30, 2022

AKSRSH SHROFF - UNO AWARD WINNER

AKSRSH SHROFF - UNO AWARD WINNER



CHAMELI DEVI AGRAWAL ANNKSHETRA UJJAIN

 CHAMELI DEVI AGRAWAL ANNKSHETRA UJJAIN 



IVF - RAJASTHAN

IVF - RAJASTHAN


 

PROUD TO BE A MARWADI - मुझे मारवाड़ी होने का गर्व क्यों है

PROUD TO BE A MARWADI - मुझे मारवाड़ी होने का गर्व क्यों है

1. मारवाड़ी धर्मपरायण होते हैं. उन्होंने भारतवर्ष में कई मंदिर और गौशालाएं बनवाईं हैं. हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी धार्मिक प्रेस #गीताप्रेस_गोरखपुर दो #मारवाड़ी अग्रवाल जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार की देन थी.
2. हम #नास्तिक बनकर अपने देवी देवताओं को गाली नहीं देते.
3. मारवाड़ी धर्म निरपेक्ष नहीं होते. कट्टर साम्प्रदायिक हिन्दू होते हैं.
4. मारवाड़ी ने कभी धर्म परिवर्तन नहीं किया। (मारवाड़ियों के धर्म परिवर्तन के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है आज भी मुसलमानों में कोई मारवाड़ी या अग्रवाल नहीं मिलता)
5. मारवाड़ी महाराज अग्रसेन और महावीर स्वामी के सिद्धान्तों पर चलते हुए शुद्ध #शाकाहारी होते हैं.
6. मारवाड़ियों ने कभी आरक्षण नहीं मांगा, न ही कोई हिंसक आंदोलन कर आम जनता को नुकसान पहुंचाया.
7. हमें कोई अपनी चालाकी भरी बातों से मूर्ख नहीं बना सकता. हम तार्किक होते हैं. 52 बुद्धि बनिया की इसीलिए कहा जाता है.
8. मारवाड़ीदेश धर्म के लिए अपने प्राण न्योछावर करने से पीछे नहीं हटते उधारणतः लाला लाजपत राय, सेठ रामजीदास गुड़वाला, भामाशाह, लाला झनकुमल सिंघल, कोठारी बंधु आदि
10. भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है मारवाड़ी. भारत के अधिकांश उद्योग मारवाड़ियों द्वारा स्थापित किये गए हैं.
11. आखिरी मारवाड़ी भारत की सबसे #समृद्ध जाती है जो अपने #दान के लिए मशहूर हैं.. मारवाड़ियों के द्वारा स्थापित कई उद्योग और उनकी द्वारा बनवाई हवेलियां,जोहड़, बावड़ी, पौशालायें, धर्मशालाएं, गौशालाएं, मंदिर इत्यादि इसके प्रतीक हैं..


चित्र - मारवाड़ियों के महाराजा अग्रसेन की एक रुपया और एक ईंट की परंपरा

Saturday, January 29, 2022

TAKHTMAL JAIN, A GREAT LEADER

TAKHTMAL JAIN, A GREAT LEADER

28 मई 1948 को पश्चिम-मध्य भारत की 25 रियासतों को जोड़कर मालवा संघ राज्य बनाया गया जिसे मध्य भारत के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत की आजादी से पहले सेंट्रल इंडिया एजेंसी का एक हिस्सा था, जिसके जीवाजीराव सिंधिया राजप्रमुख थे और वह इस पद पर 31 अक्तूबर 1956 तक रहे। राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट के बाद 1 नवंबर 1956 को इसका विंध्य प्रदेश और भोपाल के साथ विलय करके मध्य प्रदेश राज्य बना दिया गया।

मध्य भारत की विधानसभा में 99 सदस्य होते थे। इस क्षेत्र से लोकसभा के लिये 9 सदस्य चुने जाते थे। श्री तख्तमल जैन (जालोरी) इस राज्य के अंतिम मुख्यमंत्री पद पर 31 अक्तूबर 1956 तक रहे। वैसे श्री जैन ने इस राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में 18 अक्तूबर 1950 की पद संभाला था।

श्री तख्तमल जैन का जन्म विदिशा जिले के भिलसा में जनवरी 1895 को श्री के परिवार में हुआ था। इनका विवाह श्रीमती दाखबाई के साथ हुआ और परिवार में एक बेटा और एक बेटी हैं। इन्होंने 1913 में वकालत की परीक्षा पास की थी। श्री जैन ने वकालत को अपना पेशा बनाया। इन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन 1924 में भिलसा नगरपालिका के सदस्य के तौर पर प्रारंभ किया। श्री जैन 10 साल से अधिक भिलसा नगरपालिका के उपाध्यक्ष और 1939-40 में अशासकीय अध्यक्ष बने इनके नगरपालिका के उपाध्यक्ष और अध्यक्षता के दौरान
नगरपालिका की कार्य प्रणाली में सुधार और सार्वजनिक हित की अनेक योजनाओं को क्रियान्वनित किया गया। श्री जैन 1940-41 में ग्वालियर राज्य के ग्राम सुधार और स्वायत्त शासन विभाग के प्रथम लोकप्रिय मंत्री रहे। 1942 में इन्होंने 'भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। श्री जैन कई साल तक ग्वालियर राज्य हरिजन बोर्ड के सदस्य रहे और भिलसा में व्यायामशाला, सार्वजनिक पुस्तकालय आदि कई सार्वजनिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की है। ये एस.एल. जैन इंटर कॉलेज के संस्थापक और ग्वालियर मजलिस ग्राम एवं मजलिस खास के कई साल तक सदस्य तथा सिक्योरिटी ऑफ सर्विसेज, लैंड रिफॉर्म आदि अनेक समितियों के सदस्य रहे। इन्होंने 1947 में ग्वालियर राज्य के मंत्रिमंडल में मंत्री पद संभाला ग्वालियर राज्य उत्तरदायी शासन संबंधी समझौता समिति का सदस्य होने के साथ इन्होंने मध्य भारत के निर्माण में एमुख रूप से भाग लिया।


ये मध्य भारत के निर्माण के समय केन्द्र द्वारा स्थापित प्रारंभिक एकीकरण शासकीय समिति के सदस्य भी थे। 1948 में मध्य भारत के प्रथम मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी के मंत्रिमंडल में श्री तख्तमल जैन ने वित्त मंत्री का पद संभाला। श्री जोशी जनवरी 1948 से मई 1949 तक मुख्यमंत्री रहे और उनके बाद गोपीकृष्ण विजयवर्गीय मुख्यमंत्री पद पर 17 अक्तूबर 1950 तक रहे। इनके बाद श्री तख्तमल जैन 18 अक्तूबर 1950 से 3 मार्च 1952 मध्य भारत के मुख्यमंत्री रहे। 1952 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद श्री जैन प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष पद 1954 तक रहे। इस दौरान इन्होंने विभिन्न समितियों की स्थापना, प्रदेश कांग्रेस अधिवेशन शिवपुरी आदि कार्यों द्वारा प्रांत में कांग्रेस पार्टी को सुदृढ़ एवं नई दिशा में कार्य करने की प्रेरणा दी। इस बीच कांग्रेस हाईकमान ने श्री जैन को पेप्स प्रदेश कांग्रेस के झगड़े की जांच समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। इसके अलावा श्री जैन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त भूमि सुधार समिति, वेतन समानीकरण, हरिजन अयोग्यता निवारण जांच समिति आदि अनेक महत्वपूर्ण समितियों के अध्यक्ष रहे। भिलसा उपचुनाव के बाद मध्य भारत विधानसभा के सदस्य और 16 अप्रैल 1955 से 31 अक्तूबर 1956 तक दोबारा मुख्यमंत्री पद संभाला। नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश बन जाने के बाद श्री जैन प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के मंत्रिमंडल के भी सदस्य रह चुके हैं। 1958 में श्री जैन को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सचिव नियुक्त किया गया। 2 जनवरी 1975 को इनका निधन हो गया।

साभार : वैश फेडरेशन 

VAISHYA VARNA IN STATES

VAISHYA VARNA IN STATES


ये बड़े गर्व से कहा जा सकता है कि देश और विदेश में विद्यालय, अस्पताल, धर्मशालाए, वैश्य समाज की देन है। अपनी व्यावहिरकता से वैश्य समाज ने दुनिया को जीने का तरीका और कमाने का तरीका सिखाया है।
भारत में वैश्य समाज विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

वैश्य समुदाय का राज्यवार विभाजन-



Tuesday, January 25, 2022

RADHESHYAM KHEMKA JI - PADAM VIBHUSHAN

RADHESHYAM KHEMKA JI - PADAM VIBHUSHAN 

पद्म विभूषण  राधेश्याम खेमका, जि‍न्‍होंने गीताप्रेस के लिए समर्पित कर दिया था जीवन, मुंगेर से है नाता


पद्म विभूषण 2022 राधेश्याम खेमका को भारत सरकार ने पद्म पुरस्‍कार देने की घोषणा की है। उनका जन्‍म मुंगेर बिहार में हुआ था। वारणसी में रहते थे। जीवन के अंतिम दिन तक वे लगातार गीता प्रेस को अपनी सेवा करते रहे। बीएचयू से की थी पढ़ाई।

 राधेश्याम खेमका को वर्ष 2022 में पद्म पुरस्‍कार दिया जाएगा। उनका चयन पद्म विभूषण के लिए हुआ है। वे मूलत: मुंगेर के रहने वाले थे। हालांक‍ि उनका ज्‍यादातर समय बनारस में बीता है। उन्‍होंने अपना जीवन गीता प्रेस के लिए समर्पित कर दिया था। कल्‍याण पत्रिका का काफी समय तक उन्‍होंने संपादन किया था।

राधेश्याम खेमका गीता प्रेस, गोरखपुर के अध्यक्ष रहे थे। सनातन धर्म की प्रसिद्ध पत्रिका 'कल्याण' के संपादक उन्‍होंने काफी समय तक किया था। उन्‍हें पद्म विभूषण देने की घोषणा से मुंगेर ही नहीं बल्कि बिहार के लोग गौरव महसूस कर रहे हैं।

राधेश्याम खेमका के पिता सीताराम खेमका बिहार के मुंगेर जिले से उत्‍तर प्रदेश वाराणसी आए थे। राधेश्‍याम ने स्वामी करपात्री जी, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ और वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद, कथा व्यास रामचन्द्र डोंगरे जैसे संतों के संपर्क में रहे। लगातार उनका उन्‍हें सानिध्य मिलता रहा। राधेश्याम खेमका ने बीएचयू से पढ़ाई की थी।

अप्रैल 2021 में केदारघाट स्थित अपने आवास पर राधेश्याम खेमका का निधन हो गया। उन्‍होंने गीता प्रेस में अनेक धार्मिक पत्रिकाओं और पुस्तकों का संपादन किया। उन्‍होंने वाराणसी में मारवाड़ी सेवा संघ, मुमुक्षु भवन, श्रीराम लक्ष्मी मारवाड़ी अस्पताल गोदौलिया, बिड़ला अस्पताल मछोदरी, काशी गोशाला ट्रस्ट से भी सेवा की। इन संगठनों से वे जुड़े रहे।

राधेश्याम खेमका ने गीताप्रेस के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण सम्मान देने की घोषणा की तो मुंगेर, बनारस और गीताप्रेस खुशियों में डूब गया।

गीताप्रेस के ट्रस्टी देवीदयाल अग्रवाल व प्रबंधक लालमणि तिवारी ने खुशी जताते हुए कहा कि राधेश्याम खेमका ने गीताप्रेस के शताब्दी वर्ष की तैयारियों के क्रम में पिछले साल सात मार्च को वाराणसी में गीताप्रेस प्रबंधन के साथ बैठक की थी। गीताप्रेस में कर्मकांड व संस्कारों से संबंधित पुस्तकों का प्रकाशन राधेश्याम खेमका के सुझाव पर किया गया।

सादगी जीवन का उनका

राधेश्याम खेमका धार्मिक व सात्विक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने हमेशा पत्तल में खाना खाया। कुल्हड़ में पानी पीते थे। उन्होंने कभी चर्म वस्तुओं का उपयोग नहीं किया। कपड़े के जूते पहनते थे।

राधेश्याम खेमका का एक परिचय

राधेश्याम खेमका के पिता सीताराम खेमका थे। उनका जन्म 12 दिसंबर 1935 को मुंगेर, बिहार में हुआ था। बाद में वे वाराणसी में रहने लगे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एमए व साहित्य रत्न। 1982 में वे गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका के संपादक बने। तीन अप्रैल 2021 को काशी में उनका निधन हो गया।

साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, January 12, 2022

Saturday, January 8, 2022

VAISHYA MAHARATAN

VAISHYA MAHARATAN

अक्सर लोग बणियों के बारे में बकवास करते हैं कि इन्होंने देश को लूट लिया.. और सरकारी कंपनी का प्रयोग करो प्राइवेट सेक्टर की कंपनी का नहीं... भारत सरकार ने 11 कंपनियों को महारत्न माना है.. उसके बाद आती हैं 13 कंपनियां जिन्हें सरकार ने नवरत्न माना है..

सरकार के 11 महारत्नों में 5 को बनियों ने ही संभाल रखा है.. लगभग आधी यानी..

BHEL - नलिन सिंहल
ONGC - अलका मित्तल
CIL - प्रमोद अग्रवाल
GAIL - मनोज जैन
HPCL- एम. के. सुराणा

बनियों को भारतीय अर्थव्यवस्था का कर्णधार इसीलिए कहा जाता है क्योंकि अर्थव्यवस्था टिकी ही उनके कंधों पर है... चाहे वो कोई से भी सेक्टर हो.. सरकारी कंपनियों में भी हम वैश्य ऊंचे पदों पर काम करते हैं और हमारी ही मेहनत से वो उपक्रम सफल होकर महारत्न, नवरत्न आदि बनते हैं... वैश्यों ने अपनी काबिलियत से ही प्राइवेट फर्म्स भी खड़ी की हैं लेकिन मूर्ख लोगों को समझ नहीं आता.. उन्हीं मूर्खों को तमाचा मारती पोस्ट है ये..

SATI OF AGRAWALS - अग्रवाल वंश की सतिया

SATI OF AGRAWALS - अग्रवाल वंश की सतिया 

अग्रवाल वंश (गोत्र/ जात) की सतीयों के नाम :

*बंसल / जालान* : श्री राणी सती दादीजी(झुंझुनू ), श्री सीता सती, श्री महादेई सती, श्री मनोहारी सती, श्री मनभावनी सती, श्री यमुना सती, श्री ज्ञानी सती, श्री पुरा सती, श्री वीरागी सती, श्री जीवनी सती, श्री टीला  सती, श्री बाली सती, श्री गुजरी सती(फतेहपुर)
(13 सती एक कुल में )

*जिंदल गोत्र सती * ( जिंदल गोत्र कुलदेवी ) :श्री महारानी कल्याणी सती दादीजी ,(भादवा पंचमी संवत 1118) ,लिजवाना धाम जिला जींद , हरियाणा 

*मुरारका* : श्री जेतल सती दादीजी, (लछमनगढ़)

*गोयनका*  : श्री बीरा, बरजी , बरजल दादीजी (फतेहपुर)

*पोद्दार* : श्री मादल सती दादीजी (लछमनगढ़)

*गर्ग गोत्र* : श्री पाली सतीजी(नुआ)

*मंगल गोत्र* : श्री राजल बिंदल दादीजी (जुगलपुरा )

*सर्राफ (बिंदल गोत्र )* : श्री धोली सती दादीजी (फतेहपुर )

*केडीया* : श्री केड सती (खेमी - तोली- ठुकरी- संतोखी सती) दादीजी (केड, झुंझुनू )

*माखरिया* : श्री वीणा सती दादीजी (माखर, झुंझुनू )

*सिंघल गोत्र* : श्री हरबी डाली सती दादीजी (दिसणाऊ)

*धानुका* : श्री सावा सती दादीजी (फतेहपुर )

*बजाज / भरतीया* : श्री टिड़ा गेला दादीजी (ढांढण )

*डालमिया* : श्री नानू सती दादीजी (सुहासरा )

*रूंगटा/ खेतान/ भोजंगरवाल* : श्री चावो वीरों दादीजी (बग्गड़)

*चामडिया* : श्री चामडिया सती (4 सती दादीजी)(फतेहपुर )

*तिब्रेवाल* : श्री खेमी मोली सती दादीजी (झुंझुनू )

*खेमका* : श्री उदो -मादो-संतोष सती दादीजी (बुहाना )

*चौधरी* : श्री छाजल अमरी सती दादीजी (फतेहपुर-रामगढ़ )

*चौधरी* : श्री लाडो-सरो सती दादीजी  (झुंझुनू श्री मंदिर )

*तोड़ी* : श्री माना सती दादीजी (भडुन्दा )

*सरावगी* : श्री राजुल दे सती जी (फतेहपुर )

*सुरेका* : श्री उदी सती दादीजी जी (ठेलासर)

*लाठ* : श्री गिलो सती दादीजी (मंन्द्रेला )

*हरलालका* : श्री बरजल सती दादीजी(सांखुगढ़)

*केशान/भवसिंहका* : श्री पारा सारा सती दादीजी (फतेहपुर )

*डीडवानिया* : श्री रुक्मा सतीजी (जयपुर )

*मित्तल गोत्र* : श्री बुची सती दादीजी  (रींगस )

*धेलिया(मित्तल गोत्र )*: श्री चावल सती दादीजी (फतेहपुर )

*मोदी (मंगल गोत्र )* : श्री आली -पाली-माली सती दादीजी(जिल्ला झुंझुनू )

*मोदी (गर्ग गोत्र)* : श्री पाली सती दादीजी एवं श्री गुलाब सती दादीजी  (फतेहपुर )

*केजरीवाल* : श्री चिरी- मोली सती दादीजी (फतेहपुर )

*लोहिया* : श्री जीवनी सती दादीजी(फतेहपुर )

*गौरीसरिया* : श्री गौरी-सरो सती जी

*कानोड़िया* : श्री कमला सती दादीजी (फतेहपुर )

*गोयल/ तोलासरिया/ चूड़ीवाल* : श्री मौली सती दादीजी (उदयपुरवाटी )

*सिंघानिया* : श्री डेडल सती दादीजी (सिंघाना और फतेहपुर )

*गिनोडिया* : श्री मंचूई सती दादीजी (झुंझुनू )

*बायला* : श्री बायली सती दादीजी (फतेहपुर )

*बंसल* : श्री सतवंती सती दादीजी 

*मोर* : श्री सेजल-देशल सती दादीजी(फतेहपुर )

*छितरका/भोतिका(गोयल गोत्र)* : श्री मुक्ता सती दादीजी (डीडवाना )

*लुहारुका* : श्री माली सती जी (मलसीसर, चिड़ावा )

*परसरामपुरिया/ सोनथालिया* : श्री मोहिनी सती दादीजी(झाझर)

*महिपाल* : श्री कुलदे सती दादीजी

*टाईंवाला(सिंघल गोत्र )* : श्री करमा पीरागी सती जी(टाईं)

*टाईंवाला(गर्ग गोत्र )* : श्री राजल- नूरल सती दादीजी(टाईं)

*कसेरा* : श्री राजल सती जी(फतेहपुर )

*मरदा* : श्री महासती जी(चूरू )

*सरिया* : श्री नौरंग - श्री सरिया सतीजी - श्री जाटनी सती दादीजी(लूणकरणसर)

*गाडोडिया (गर्ग गोत्र )* :  श्री कुम्पावत सतीजी - श्री कुंवारी सती जी (डीडवाना )

*यह जानकारी सभी अग्रवाल भाइयो तक पंहुचाइये 🙏 सभी अग्र वंशी अपने कुल की सती दादी को पहचाने और सबसे पहले उनकी पूजा करे 🙏🏻जो जिस कि गोत्र(कुल) सती होती हे। वो ही उनकी कुलदेवी होती हैं।  🙏यह सभी अग्रवाल भाइयो का कर्तब्य है ।