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Thursday, June 26, 2014

AGROHA - AGRASEN - AGRAWAL--अग्रोहा अग्रसेन अग्रवाल

अग्र कुल प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन जी 


अग्रोहा में एक विशाल मंदिर 

माता शीला का मंदिर 

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित आग्रेय ही अग्रवालों का उद्‍गम स्थान आज का अग्रोहा है | दिल्ली से १९० तथा हिसार से २० किलोमीटर दूर हरियाणा में महाराजा अग्रसेन राष्ट्र मार्ग संख्या - १० हिसार - सिरसा बस मार्ग के किनारे एक खेड़े के रूप में स्थित है | जो कभी महाराजा अग्रसेन की राजधानी रही, यह नगर आज एक साधारण ग्राम के रूप में स्थित है जहाँ पांच सौ परिवारों की आबादी है | इसके समीप ही प्राचीन राजधानी अग्रेह (अग्रोहा) के अवशेष थेह के रूप में ६५० एकड भूमि में फैले हैं | जो इस महान जाति और नगर के गौरव पूर्ण इतिहास को दर्शाते हैं |

अग्रोहा राज्य की सीमा इतिहासकारों ने उत्तर में हिमालय पर्वत, पंजाब की नदियाँ, दक्षिण और पूर्व में गंगा, पश्चिम में यमुना से लेकर मारवाड़ तक फैला हुआ बताया है | 

भद्रान रोहितकांशचैव आग्रेयान मालवानपि | 

गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत प्रहसन्निव ||

महाभारत, वनपर्व २५५-२०

इतिहासकारों के अनुसार अग्रेह (अग्रोहा) का अस्तित्व महाभारत काल में था | इस श्लोक में जिस आग्रेहगण का उल्लेख किया गया है वह निश्चित रूप से अग्रोहा ही था | उस समय के अग्रोहा के मुख्यनगरों में गौड़ग्राम (गुडगाँव), महाराष्ट्र (मेरठ), रोहितास ( रोहतक), हाँसी, हिसारी देश (हिसार), पुण्यपतन (पानीपत), करनाल, नगरकोट, (कोटकांगडा) लवकोट (लाहौर), मण्डी, विलासपुर, जींद, सफिदौ, नारिनवल (नारनौल) आदि नगर आते थे | 

१९३८ में हुई अग्रोहा की खुदाई ने इतिहास के अनेक दबे हुए तथ्यों को उजागर किया है | खुदाई में बर्तन सिक्के, मूर्तियां प्राप्त हुई हैं | सिक्कों पर " अगोंदक अगाच्च जनपद " लिखा हुआ है और सिक्के की दूसरी तरफ वृषभ या वेदिका की आकृति बनी हुई है | मिट्टी के बने हुए बर्तन, ईंटों के बने मकान, पानी निकलने की समुचित व्यवस्था के लिए नालियां बनी मिली है | खुदाई ने यह साबित कर दिया है कि अपने समय में अग्रोहा एक वैभव शाली - राज्य था |

अग्रोहा और लक्खी तलाब

अग्रोहा में लक्खी तलाब का उल्लेख मिलता है जो मीलों विस्तार में फैला हुआ था | लक्खी नाम का बनजारा आजीविका की खोज में अग्रोहा पहुँचा | अग्रोहा में सेठ हरभजनशाह के विषय में सुना जो इस समय लोक परलोक की शर्त पर ऋण दे रहा था | बगैर सोचे समझे बनजारे ने एक लाख रुपये का ऋण परलोक में चुकाने के करार पर ले लिया | बाद में बनजारे को लगा कि परलोक में ऋण न चुका पाने की हालत में सेठ का बैल बन कर ऋण चुकाना पड़ेगा | इस ग़लती के पश्चाताप स्वरूप बनजारे ने ऋण लौटाने की सौची परन्तु, सेठ ने रुपया वापस नहीं लिया, इस पर बनजारे ने एक विशाल तालाब का निर्माण करवाया और तालाब पर पानी उपयोग हेतु जो भी नर-नारी-पशु आता-बनजारा यह कह कर वापस लौटा देता कि यह तालाब सेठ हरभजनशाह का व्यक्तिगत तालाब है आप इसका उपयोग नही कर सकते | इस बात का पता जब सेठ हरभजनशाह को लगा तो उन्होने लक्खी बनजारे को बुला कर उसे इसी लोक में ऋण से मुक्त कर दिया | इस तालाब के अवशेष अब भी अग्रोहा में देखने को मिलते हैं |

सेठ हरभजनशाह और केसर लदे उँट

किंवदन्ती के अनुसार श्रीचन्द नाम के एक साहूकार ने ११०० उँट केसर के लाद कर बेचने के लिए भेजे | शर्त एक थी कि केसर उसी को बेची जा सकती है जो सभी माल एक साथ खरीदे | जब उँट का काफिला महम पहुँचा तो सेठ हरभजनशाह को पता लगा कि ११०० उँट केसर बिकने आई है और अभी तक कोई भी खरीदार नही मिला है | शेठ हरभजनशाह ने इसे अपनी आन-बान-शान के खिलाफ समझा और सारा केसर ख़रीदवा कर अपने तगार में डलवाने तथा एक ही मुद्रा से भुगतान करने का आदेश दे दिया | उसने कहा कि केसर हवेली को रंग करने के काम आ जाएगी | 

सारी केसर एक ही व्यक्ति सेठ हरभजनशाह द्वारा खरीद लिए जाने का वृतान्त जब श्रीचन्द ने सुना तो वह आश्चर्य - चकित रह गया | जो व्यक्ति अपनी जाती और राज्य की मान मर्यादा की रक्षा के लिए लाखों रुपये खर्च कर सकता है और उसके रहते इसकी पितृ भूमि विरान पड़ी है । श्रीचन्द ने सेठ हरभजनशाह को अग्रोहा की पितृ भूमि विरान पडी़ है का वर्णन पत्र में किया और आग्रह किया कि अग्रोहा को पुन: बसाया जाय | पत्र पढ़ कर सेठ हरभजनशाह ने संकल्प किया कि वह अपनी पितृ भूमि अग्रोहा का पुन: निर्माण करेगा | उन्होने समाज के अन्य लोगों के सहयोग से अग्रोहा पुन: आबाद किया |

शीला माता और अग्रोहा

अग्रोहा की थेह मे सतीओं की मढ़ीयां हैं इन्ही मढ़ीओं में एक मढ़ी शीला माता की है | शीला माता की अग्रवालों में बड़ी मान्यता है और प्रति वर्ष भाद्रपद अमावस्या को दूर दूर से अग्रबन्धु अपने बच्चों के मुंडन के लिए यहां आते हैं | अब इस मढ़ी पर एक भव्य मंदिर बनवा दिया गया है | 

किंवदन्ती के अनुसार शीला सेठ हरभजनशाह की पुत्री थी - शीला का विवाह सियालकोट के दीवान महताशाह से हुआ था | शीला बहुत ही रूपवती, गुणवती, सदाचारिणी व पतिव्रता थी | जब उसकी ख्याति सियालकोट के राजा रिसालु के कानो में पड़ी तो वह मन ही मन शीला को चाहने लगा | रिसालु ने शीला व महेताशाह के सम्बन्धों में जहर घोलना शुरू किया और अंत में राजा रिसालु अपने षडयंत में सफल हो गया | महेताशाह ने शीला का परित्याग कर दिया | शीला एक दिन इसी दुखी अवस्था में पति का घर छोड़ प्राण त्यागने के लिए निकल पड़ी और असुध अवस्था में पितृ - गृह पहुच गई | 

वास्तविकता का बोध होने पर महेताशाह को बड़ा दुख हुआ और शीला की खोज करते करते अग्रोहा के समीप के जंगल में पहुँच गया, जहाँ वह भूख प्यास से व्याकुल मूर्छित हालत में शीला - शीला की रट लगाए जा रहा था | नगर सेविका ने महेताशाह को पहचान लिया और इसकी सूचना शीला को दी परन्तु जब तक शीला वहा पहुँची महेताशाह के प्राण पखेरू उड़ चुके थे | शीला को बड़ा दुख हुआ और उसने भी अपने प्राण वही त्याग दिए | दोनों का अन्तिम संस्कार एक साथ किया गया परन्तु शीला के पवित्र पतिव्रता धर्म, निश्चल प्रेम की गाथा आज भी अग्रोहा की भूमि में गूँज रही है |

अग्रवाल

इतिहासकारों का मत है की भारत की अनेक जातिओं का उद्भव प्राचीन गणराज्यों के जनपदों से हुआ है | इसी के अनुरूप माना जाता है कि अग्रवाल जाति का उद्भव आग्रेय (अग्रोहा) नामक जनपद से हुआ और यहीं से अग्रवाल भारत के भिन्न भिन्न भागों में फैले |

अग्रवाल शब्द की उत्पति के बारे में भिन्न-भिन्न मतकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं | अग्रोहा के निवासी होने के कारण और बाद में अलग अलग स्थानों पर जाने पर इनको अग्रोहा वाले के नाम से संबोधित किया गया जो शब्द बाद में चलकर अग्रवाल हो गया | 

दूसरे मन्तव्य के अनुसार अग्रसेन - अग्रोहा अग्रवाल सभी में अग्र शब्द की प्रधानता है जिसका अर्थ होता है अग्रणी | इस अग्र शब्द से सदा आगे रहने वाली जाति के लोग अग्रवाल कहलाए, जिसका अर्थ होता है सदैव आगे रहने वाले |

अग्रवाल समुदाय जन्म से वैश्य नही है | यह अपने गुण कर्म से कारण वैश्य कहलाते है | प्रारम्भिक काल में अग्रवालों की मुख्य आजीविका कृषि, पशुपालन और व्यापार होता था | परन्तु कालान्तर में वाणिज्य की तरफ ज़्यादा झुकाव होने के कारण इस समुदाय का मुख्य व्यवसाय व्यापार हो गया | आज भी कुछ अग्रवाल खेतीहर हैं |

अग्रवाल समाज केवल अग्रवाल शब्द के उपनाम से ही नहीं सम्बोधित किए जाते है, इसके इलावा भी कई अन्य उपनमों से जाने जाते है जैसे, 

बनिया : जो सभी कार्यों को बनाने की क्षमता रखता हो | जो सब का बन सकता और सब को अपना बना सकता हो | 

वणिक : वणज व्यापार करने के कारण | 

सेठ (श्रेष्ठि) : समाज में श्रेष्ठ आचरण के कारण | 

महाजन : जनों में विशिष्ठ, महान स्थान रखने वाला | 

वैश्य : प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश के कारण, गतिशील होने के कारण | 

गुप्त / गुप्ता : व्यापारिक गूढता को बनाए रखने के कारण | 

शाह : बड़ा - महान - साहुकार | 

अग्रवाल : जो सर्वदा सब कार्यों में अग्रणी रहे | 

अग्रवाल जाति के लोग धर्म परायण, शाकाहारी और अपने ईष्ट देव भगवान में इनका अटूट विश्वास होता है | पूजा पाठ इनके दैनिक जीवन का अंग है | देवी महालक्ष्मी के उपासक और दान व कर्तव्य परायण होते हैं | कर्म में इनका विश्वास होता है | अग्रावालों में उन्‍नत संतति हो इस सिद्धांत को ध्यान में रख कर आदि काल से ही सह गोत्रीय विवाह निषेध है | अग्रवालों के १८ गोत्र निम्न है | 

१ गर्ग २ गोयल ३ कुच्छल ४ कंसल ५ बिंदल ६ धारण ७ सिंधल ८ जिंदल ९ मित्तल १० तिंगल ११ तायल १२ बंसल १३ भंदल १४ नांगल १५ मंगल १६ ऐरण १७ मधुकुल १८ गोयन / गंगल 

एकरूपता व ऐतिहासिक द्रष्टी से अग्रवाल शब्द को हिन्दी में "अग्रवाल" व अँग्रेज़ी में " AGRAWAL " को मान्यता प्रदान की गई है | उपरोक्त के अलावा अग्रवाल लोग अपने नाम के साथ अपने परिवारों के उपनमो का भी प्रयोग करते है जैसे जालान, पौद्दार, सिंघानिया, पित्ती, सुरेका, बुबना, सुल्तानिया, मोदी, बजाज, सेक्सरिया, हरलालका, खेतान आदि | 

अग्रवाल समाज के प्रत्येक सदस्य में महाराजा अग्रसेन का समाजवाद रग - रग में प्रवाहित हो रहा है | इसी कारण से हर अग्रवाल उदार, निष्ठावान, कर्मठ व्यक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहा है | " सादा जीवन उच्च विचार " वाली कहावत हमेशा उस पर चरितार्थ रही है | जो भी उनके पास बचता रहा है उसे उदारतापूर्वक पर हित के लए अर्पित करते रहते हैं |

अग्रोहा पाँचवा धाम

४ अप्रैल १९७६ को अखिल भारतीय अग्रवाल प्रतिनिधि सम्मेलन ने अपने प्रथम सम्मेलन नई दिल्ली में यह प्रस्ताव पारित किया कि अग्रोहा का पुन: निर्माण किया जाए, उसी के अन्तर्गत ९ मई १९७६ को अग्रोहा विकास ट्रस्ट का गठन किया गया और २१ सितम्बर १९७६ को अग्रोहा निर्माण शिलान्यास समारोह का आयोजन किया गया | इसका पूरा श्रेय श्री रामेश्वरदास गुप्ता, धर्म भवन साउथ एक्सटैंशन नई दिल्ली को जाता है | जिनहोने ढाई करोड़ अग्रवालों को एक सूत्र में बाँधने, एक मंच पर एकत्रित करने एवं एक झंडे के नीचे ला कर खड़ा करने का कार्य किया | जिसके कारण एक लम्बे समय से एक खेडे (थेह) के रूप में दबा अग्रोहा पुकार-पुकार कर आर्तनाद कर रहा था, " हे मेरे वंशजो ! तुमने देश के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तुम्हे लक्ष्मीजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है, स्थान स्थान पर मंदिर, धर्मशालाएं शिक्षा संस्थान, चिकित्सालयों की स्थापना की है अत: मेरा भी पुनरूत्थान और पुनःनिर्माण करो " | 

वह सपना आज साकार हो रहा है | अग्रोहा को अग्रवाल समाज के पाँचवें धाम के रूप में विकसित करने का पिछले २० वर्ष से लगातार कार्य चल रहा है, काफी कुछ कार्य हुआ है और हो रहा है | जिसका संक्षिप्त विवरण नीचे प्रस्तुत है | 

१. महाराजा अग्रसेन प्राचीन मन्दिर : वर्तमान परिसर से आगे महाराजा अग्रसेंजी का प्राचीन मन्दिर १९३९ में सेठ रामजीदास बाजोरिया द्वारा बनवाया गया था | मन्दिर का जीर्णोद्घारा किया गया है | 

२. कुल देवी महालक्ष्मी मन्दिर : इस मन्दिर मे कमलासन पर स्थित चतुर्भुजी माँ महालक्ष्मीजी की प्रतिमा बड़ी ही चित्ताकर्षक है | मन्दिर का भव्य १८० फुट उँचा गुंबद | २८ अक्टुबर १९८५ शरद पूर्णिमा के दिन मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा सिद्ध पीठ के रूप हुई | यहाँ मनौती - मनाने से ईष्ट सिद्धि होती है | ऐसा लोगों का विश्वास है | 

३. प्राचीन गौशाला : १९१५ में सेठ भोलाराम डालमिया तथा लाला सांवरमल के प्रयत्नो से गौशाला की स्थापना की गई । गौशाला का आधुनिक साज सज्जा से युक्त नया भवन दर्शनीय है | 

४. महाराजा अग्रसेन मन्दिर : महाराजा अग्रसेनजी का नया मन्दिर जिसमें अग्रसेनजी की राजसी वेश में प्रतिमा अत्यंत ही मनोहारी एवं चित्ताकर्षक है | 

५. वीणावादिनी सरस्वती का मन्दिर : लक्ष्मी के साथ सरस्वती की आराधना अपेक्षित है | बिना विवेक व बुद्धि के लक्ष्मी स्थायी नही रहती | महालक्ष्मी मन्दिर के पास वीणावादिनी सरस्वती माँ का मन्दिर है । सरस्वती की प्रतिमा दिव्य तेज से युक्त है | 

६. शक्ति सरोवर : ३००-४०० फुट आकार का विशाल शक्ति सरोवर जो निर्मल जल से भरा रहता है | सरोवर के मध्य भाग में समुद्र - मंथन के दृश्य की झांकी देखने योग्य है | शेषशायी भगवान विष्णु, गजेन्द्र - मोक्ष, गंगा - यमुना एवं महाराजा अग्रसेन को लक्ष्मीजी का वरदान की सुन्दर झांकियाँ जो मन्दिर परिसर के आस पास लगाई गई हैं | 

७. हनुमान मन्दिर : ७० फुट उँची भगवान मारुति कि प्रतिमा जो विश्‍व की विशालतम प्रतिमाओं में से एक है | 

८. शीला माता मन्दिर : शीला माता का भव्य मन्दिर बनाया गया है | अग्रोहा पधारने वाले तीर्थ यात्रियों के दर्शन का विशिष्ट श्रद्धा केन्द्र है | मन्दिर में राधा कृष्ण, सीताराम, अष्टभुजाधारी दुर्गा, शिव, गणेश, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, हनुमानजी आदि देवी - देवताओ के भव्य विग्रह बने हैं | 

महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज, अस्पताल एवं शोध - संस्थान : २७७ एकड़ भूमि में फैला विशाल अस्पताल व मेडिकल कॉलेज | 

९. प्राचीन थेह : अग्रोहा किसी समय महाराजा अग्रसेन के राज्य की राजधानी थी | कालान्तर मे विदेशी आक्रमणों से यह नष्ट हो गई | इसी नगर के ध्वंस थेह की रेत में ५६६ एकड़ जमीन में फैले पड़े है | खेडे के उपर दिवान नन्नुमल के किलों के खंडहर प्राचीन नगर के अवशेष, ईंटों से बने मकान आदि स्पष्ट दिखाई देते हैं | वर्षा के समय मूर्तियाँ, सिक्के, मिट्टी के पात्र आदि निकलते हैं | थेह की १९३८ - ३९, १९७५, १९८०-८१ में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की और से खुदाई करवाई गई जिस में पुरातात्विक द्रष्टी से महत्वपूर्ण अनेक प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं | इसी थेह पर अग्रवाल वीर ललनाओं की प्राचीन मढीया हैं, जिन्होने आत्म - सम्मान की रक्षार्थ कभी जौहर की ज्वाला में अपने प्राणों की आहुति दी थी | 

महाराजा अग्रसेन ज्योति रथ यात्रा ने १४ अप्रैल १९९५ को अग्रोहा से शुरू होकर पूरे देश का भ्रमण किया है | 

अग्रोहा के मेल

चैत्र शुदी पूर्णिमा : हनुमानजी का मेला 

भाद्रपद अमावस्या : सतीओं का मेला - शीला माता मन्दिर परिसर 

अश्विन पूर्णिमा : शरद पूर्णिमा को अग्रवालों के कुम्भ का हर वर्ष आयोजन होता है | 

आप भी अग्रोहा धाम की यात्रा कीजिए | अपने परिवार सहित वर्ष में एक बार अवश्य अग्रोहा जाकर अपनी पवित्र - पावन भूमि की रज को अपने मस्तक पर लगाएं और अग्रसेनजी के आदशों को अपनाकर कुल व समाज की सेवा करें | अग्रोहा - कवि के शब्दों में 

जिसमें गंगा की पावनता और गीता सी निश्छलता है | 

जहाँ तनिक उलीचो माटी तो समता का दीपक जलता है | 

उस अग्रसेन का अग्रोहा, जिससे अंधियारी छांटी थी | 

जिसे के आगे श्रद्धा से टेक दिया था माथा 

वह अग्रोहा की धरती है .................................

जय अग्रसेन-जय अग्रोहा

कुल देवी महालक्ष्मीजी की .................................................. जय हो 

महाराजा अग्रसेनजी की ...................................................... जय हो 

अग्रोहा धाम की ................................................................ जय हो 

श्री राम की ...................................................................... जय हो 

यह संकल्प हमारा है ......................................................... अग्रोहा धाम बनाना है 

जब तक सूरज चाँद रहेगा, ................................................. श्री अग्रसेन का नाम रहेगा 

अग्रसेन कुल की रीत ......................................................... एक रुपया एक ईट 

अग्रवाल की क्या पहचान .................................................... दानी, धर्मी, निष्ठावान 

एक, दो, तीन, चार ............................................................ अग्रसेन की जय जयकार 

अग्रोहा, अग्रवाल का यह सन्देश ........................................... एक रहेगा भारत देश

http://www.agrasensamaj.org

Wednesday, June 25, 2014

MAHAJAN VAISHYA SAMAJ - महाजन वैश्य समाज

Mahajan is an Indian surname or title, (e.g., Chaitanya Mahajan) found among several castes and communities. The word "Mahajan" is an amalgam of two Sanskrit words: Maha meaning great, and Jan meaning people or individuals (Respectful people). Over the years, the word Mahajan has become a common generic job title used to describe people involved in money lending and financial services.
CASTE

Mahajans originally are believed to be descendants of King Kuru who were Chandravanshi. He was very religious, just, fair and good administrator. Chandravanshi ruled entire Aryavrat Region. They were descendants of Pandavas & Kauravas. Mahajan word is a very respectable word, meaning high in knowledge, religion and actions. According to Vaman Puran - "Mahajano si mahalroshi mahajano yen gataa sa pantha." God Vishnu was pleased with King Kuru, and King was shifted to Vaishya. God Vishnu said to King Kuru that he has done great job and he is great person. Therefore, your dynasty will be called MAHAJAN and all rulers will be known as Vaishya, because doing agriculture, you have accepted Vaishya. They migrated from central India to Rajasthan and then to Punjab region several hundred years back. A renowned social reformer Lala Hans Raj Mahajan urged people to replace "Gupt" by 'Mahajan' as their surname in the early 20th century as Mahajan word denotes respectable community. The Mahajan community of North India was based in the undivided Punjab region. They are in money lending activities for centuries within the Punjab and nearby areas such as Himachal, Jammu and Kashmir, the present-day state of Punjab, the Punjab province and the North West Frontier area. Most of these Mahajans speak Punjabi and Dogri, and reside in the regions of the Punjab, Jammu, Kashmir and Himachal Pradesh. Mahajans are landlords, traders and business men who were highly respected and have a major influence in the society.

Gujrat and Madhya Pradesh Some People in Gujarat Madhya Pradesh's Nimar region also bear Mahajan as a surname. They also use other common surnames such as Nema. They believe in Srinathji at Nathdwara (Rajasthan) and are staunch vegetarians. In Gujarat, the Bhatia caste also use the "Mahajan" surname, as the Mahajan community was traditionally associated with money lending.

SUB CASTE

In North India Mahajans surname have been found in many sub castes such as Mahotra, Swaar, Beotra, Sanghois, Phagetra, Jandials, Vaid, Bangwathiya, Langars, Rarotra, Fave (Phave), Padotra, Kubre, Piddu, Gadhede, Chunne, Manath, Karmotra, Kankaal, Lamhe, Khadyals, Kanghal/kaag, Sadad, Paba, Jugnal, Ukhalmunde, Bucche, Gadri, Laira, Kalsotra, Chapate, Bharray, Jadyal, Parru, Rometra, Malguria, Chukarne, Iddar, Chogga, Thathar and Lamma, Makhirru, Bichchu, Thapre, Tathyan, . Mahajans from these sub castes observe annual mail on Sri Guru Nanak Dev's Birthday, usually in November and gather at their respective religious places located in J&K, Punjab, HP and seek blessings of their devta/deity. Family ceremonies such as sutra and mundan are also organised. Prasad is distributed through langars (community food). Each sub caste believes in its own deity, known as devte.

Mahajans are prohibited to marry into the same sub caste because they are considered as brother and sister, according to their belief. Some Mahajans use the castes of Gupta and Jandiyals. The Gupta surname is mostly used by the Mahajans of the Jammu region.

Mahajan as a generic title Mahajan is also used a generic job title referring to people involved in money lending. In this case, a person involved in money lending is referred to as a Mahajan whether or not he is a Mahajan by caste.


































Sunday, June 22, 2014

मारवाड़ी वैश्य समाज की संस्थाएं

कोलकाता:

1. हरियाणा भवन, 40-ए, विवेकानंद रोड, कलकत्ता-7, 2. डागा धर्मशाला, 41, कालीकृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 3. नंदराम नेतराम बजाज की धर्मशाला, 23, बड़तल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 4. माहेश्वरी सदन, 34-बी, रतु सरकार लेन (मित्र परिषद के पीछे), कलकत्ता-7, 5. टिबड़ेवाल भवन (जमनादास), 164, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 6. बाजोरिया भवन, 212, विधान सरणी (वीणा सिनेमा के पास), कलकत्ता-6, 7. ओसवाल भवन, 2-बी, नंदो मल्लिक लेन, कलकत्ता-7, 8. गोविंद भवन, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 9. (मथुरादास) बिनानी धर्मशाला, 31, पथरिया घाट स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 10. बांगड़ धर्मशाला, 65-ए, पथरिया घाट स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 11. महेश्वरी भवन, 4, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 12. श्री दिगंबर जैन भवन, मछुआ, 10-1,मदन मोहन बर्मन स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 13. श्री अग्रसेन स्मृति भवन, पी-30, कलाकार स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 14. हजारीमल दूधवेवाला धर्मशाला (चोर बागान), 19, मुक्ताराम बाबू स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 15. कच्छी जैन भवन, 59, इजरा स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 16. सेठ सागरमल लुहारीवाला स्मृति भवन, 36-1, जितेंद्र मोहन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 17. भारतीय धर्मशाला (सेठ चिमन लाल), 44, जितेंद्र मोहन स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 18. राजस्थान ब्राह्मण संघ भवन, 14-2, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 19. श्रीमती केसरी देवी कानोड़िया हॉल, 123, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-29, 20. भोतिका धर्मशाला (श्यामदेव गोपीराम), 150, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 21. दौलतराम नोपानी धर्मशाला, 2, नंदो मल्लिक स्ट्रीट, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 22. मित्र परिषद, 115, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 23. श्री जालान स्मृति भवन, 168, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 24. जैन श्वेतांबर तेरापंथी भवन, 3, पोर्तुगीज स्ट्रीट, कलकत्ता-1, 25. ब्राह्मणबाड़ी, सैयद अली लेन, कलकत्ता-7, 26. पोद्दार छात्रावास भवन (छात्रावास), 150. चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 27. हलवासिया छात्रावास भवन (छात्रावास), ब्रजदुलाल स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 28. शार्दुल पुस्करण हाई स्कूल भवन, 1-ए, सिकदर पाड़ा लेन, कलकत्ता-7, 29. बाबू लक्ष्मी नारायण बागला धर्मशाला, 51, सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 30. बाबू लाल अग्रवाल स्टेट, 169, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 31. भगवानदास बलदेव दास धर्मशाला, 9, चोरबागान लेन, कलकत्ता-7, 32. मारवाड़ी पंचायत धर्मशाला, 51, सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 33. नवल किशोर डागा (बीकानेर वाला), धर्मशाला, 41, काली कृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 34. फूलचंद मुकिम चंद जैन धर्मशाला (श्वेतांबर-जैन), पी-30बी, कालाकार स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 35. रामचंद्र गोयनका धर्मशाला, 361, कालीघाट रोड, कलकत्ता-26, 36. मूँधड़ा धर्मशाला, 20-1, रतन सरकार गार्डन स्ट्रीट, कलकत्ता-7।

हावड़ा:

1. गोपाल भवन, 3 गुड़ गोला घाट रोड, बांधाघाट, हावड़ा-6, 2. श्री सत्यनारायण धर्मशाला (सुरेका) 1, सत्यनारायण टेंपल रोड, बांधाघाट, हावड़ा, 3. साधुराम तोलाराम गोयनका धर्मशाला, मटरुमल लोहिया लेन, बांधाघाट, हावड़ा, 4. अग्रसेन भवन, 2, डोबर लेन (लिलुआ स्टेशन रोड), हावड़ा, 5. माधोगढ़ नागरिक परिषद, डबसन रोड (नीयर ए.सी. मार्केट), हावड़ा।

चिकित्सालय-औषधालय:

1. मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी, 227, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 2. श्री विशुद्धानंद सरस्वती मारवाड़ी हास्पीटल, 118, राजा राम मोहन राय सरणी, कलकत्ता-7, 3. रामरिकदास हरलालका अस्पताल, 104, आषुतोश मुखर्जी रोड, कलकत्ता-7, 4. लोहिया मातृ सेवा सदन, 43, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 5. मातृमंगल प्रतिष्ठान, 228, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 6. आशाराम भिवानीवाल अस्पताल, 55, काली कृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 7. बागला अस्पताल, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 8. घासीराम बूबना आंख अस्पताल, 138, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 9. विशुद्धानंद सरस्वती दातव्य औषधालय, 35-37, बड़तल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 10. दिगंबर जैन दातव्य औषधालय, 25, गोयनका लेन, कलकत्ता-6, 11. अम्बिका आयुर्वेद भवन, 6-1, बाबू लाल लेन, कलकत्ता-6, 12. गोविन्द दातव्य औषधालय, बांसतल्ला लेन, कलकत्ता-7, 13. आनंदलोक, सी.के. 44, साल्टलेक सिटी, कलकत्ता-91, 14.माहेश्वरी दातव्य औषधालय, 23, कालीकृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 15. रामकृष्ण दातव्य औषधालय, 4, गोयनका लेन, कलकत्ता-7, 16. हनुमान हास्पीटल, घुसड़ी, हावड़ा, 17. मारवाड़ी आरोग्य भवन, जसीडीह

पुस्तकालय:

1. श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय, 1-सी, मदनमोहन बर्मन स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 2. मारवाड़ी सभा पुस्तकालय, बड़ाबाजार, कलकत्ता-7, 3. श्री तरुण संघ पुस्तकालय, 126, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 4. मारवाड़ी छात्र संघ पुस्तकालय, 150, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 5. श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी पुस्तकालय, 3, पोर्तुगीज स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 6. श्री फतेहपुर ब्राह्मण पंचायत पुस्तकालय, तीसी बाड़ी, तुलापट्टी, कलकत्ता-7, 7. श्री हनुमान पुस्तकालय, 76-जे.एम.मुखर्जी रोड, घुसड़ी, हावड़ा, 8. महावीर पुस्तकालय, 10-ए, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 9. सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय, 186, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 10. बड़ाबाजार लाइब्रेरी, 10-1-1, सैयद अली लेन, कलकत्ता-73, 11. माहेश्वरी पुस्तकालय, 4, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 12. भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपीयर सरणी, कलकत्ता-17।

क्लब:

1. श्री माहेश्वरी क्लब, 2. नीबूतल्ला स्पोर्टिंग क्लब, 3.श्री पुष्टिकर क्लब, 4. नवजीवन क्लब, 5. फ्रेंड्स मुनिमन क्लब, 6. हिंदुस्तान क्लब, 7. बंगाल र्रोइंग क्लब, 8. राजस्थान नवयुवक क्लब, 9. जोधपुर एसोसिएशन, 10. बिड़ला क्लब।

सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं:

1. अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन (मारवाड़ी समाज की प्रतिनिधि संस्था) 152-बी, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-700007, 2. अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच (मारवाड़ी युवकों की प्रतिनिधि संस्था) 3432-13, हसन बिल्डिग, निकलसन रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006, 3. मित्र परिषद, 4. अग्रसेन भवन, 5. राणीसती प्रचार समिति, 6. श्री श्याम मित्र मण्डल, 7. नागरिक स्वास्थ्य संघ, 8. झुन्झूंनू प्रगति संघ, 9. माहेश्वरी पंचायत, 10. ओसवाल नवयुवक संघ, 11. सेठ सूरजमल जालान वस्तु भण्डार, 12. राजस्थान जन सम्पर्क समिति, 13. कुम्हारटोली सेवा समिति, 14. ओसवाल भवन, 15. काशी विश्वनाथ सेवा समिति, 16. श्री दिगम्बर जैन मन्दिर , 17. श्री श्याम प्रेम मण्डल, 18. अग्रवाल सेवा संघ, 19. रतनगढ़ नागरिक परिषद, 20. केडिया समाज, 21. बजाज भरतिया सभा, 22. श्री राणीसती भक्त मण्डल, 23. श्री श्याम सत्संग मण्डल, 24. श्री शिव शक्ति सेवा समिति, 25. पुष्टिकर सेवा समिति, 26. हनुमान परिषद, 27. माहेश्वरी नवयुवक सेवा समिति, 28. अहिंसा प्रचारक समिति, 29. मारवाड़ी सेवा समिति, 30. श्री बजरंग परिषद, 31. माहेश्वरी सेवा समिति, 32. माहेश्वरी एजुकेशन बोर्ड, 33. जन सेवा संघ, 34. जैन श्वेताम्बर मित्र मण्डल, 35. माहेश्वरी महिला समिति, 36. मारवाड़ी युवा मंच, 37. कलकत्ता पिंजरापोल सोसाइटी, 38. पश्चिम बंगाल मारवाड़ी सम्मेलन 39.भारतीय भाषा परिषद, 40. भारतीय संस्कृति संसद, 41.परिवार मिलन, 42. विकास, 43. अर्चना (नाट्या मंच), 44. अनामिका (नाट्या मंच), 45. पदातिका (नाट्या मंच), 46. माहेश्वरी संगीतालय, 47. हिंदी नाट्या परिषद, 48. संगीत कला मन्दिर, 49. रामगढ़ महाजन संघ, 50. खण्डेलवाल परिषद, 51. श्री माली ब्राह्मण युवक मण्डल, 52. तरुण संघ, 53. दधीच सभा, 54. राजस्थान परिषद, 55. साल्टलेक संस्कृति संसद, 56. विधान नगर संस्कृति संसद, 57. पूर्वांचल कल्याण आश्रम, 58. माहेश्वरी समाजोत्थान समिति, 59. हावड़ा जिला मारवाड़ी सम्मेलन, 60. कलकत्ता मारवाड़ी सम्मेलन, 61. श्री मैढ़ क्षत्रिय सभा, 62. विद्यालय विकास समिति, 63. शक्ति दल, 64. कलकत्ता नागरिक संघ, 65. मानव सेवा संघ, 66. रिसड़ा जन सेवक संघ, 67. माहेश्वरी भवन (रिसड़ा), 68. मिलनश्री 69.सलकिया सेवा संघ, 70. ब्राह्मण (राजस्थान हरियाणा) संघ, 71. सरदार शहर परिषद, 72. बीदासर नागरिक परिषद, 73. नागौर नागरिक संघ, 74. कौटपुतली नागरिक परिषद, 75. लक्ष्मणगढ़ नागरिक परिषद, 76. विकास परिषद चाडवास, 77. नीमकाथाना अंचल नागरिक संघ, 78. राजगढ़ सादुलपुर नागरिक परिषद, 79. देशनोक युवा मंच, 80. अलसीसर सेवा संघ, 81. राजलदेसर नागरिक परिषद, 82. गंगाशहर नागरिक परिषद, 83. नापासर युवा मंच, 84. रतनगढ़ नागरिक परिषद, 85. श्री भादरा परिषद, 86. लोसल नागरिक परिषद, 87. श्री माधोपुर नागरिक परिषद, 88. मंड्रेला नगर विकास परिषद, 89. चुरु नागरिक परिषद, 90. तारानगर युवक परिषद, 91. रामगढ़ नागरिक परिषद, 92. रतन नगर परिवार (कलकत्ता), 93. स्टार सिटी यूथ फेडरेशन, 94. बीकानेर अंचल नागरिक परिषद, 95. छापर नागरिक परिषद, 96. हरसोर नागरिक परिषद, 97. नोखा नागरिक परिषद, 98. 

जोधपुर एसोसिएशन, 99. निम्बीजोधां नागरिक परिषद, 100. छोटीखाटू नागरिक परिषद, 101. श्री माधोपुर विकास परिषद, 102. राजस्थान जनकल्याण समिति, 103. सांभर क्लब, 104.मलसीसर चेरिटी ट्रस्ट, 105. लाडनूं नागरिक परिषद, 106. सीकर परिषद, 107. श्री डूंगरगढ़ नागरिक परिषद, 108. अजमेर एसोसिएशन, 109. मेवाड़ मित्र मण्डल, 110. श्री डीडवाना नागरिक सभा, 111. सुजानगढ़ नागरिक परिषद, 112. मुकुन्दगढ़ नागरिक परिषद, 113. खंडेला नागरिक परिषद, 114. भीनासर नागरिक परिषद कलकत्ता, 115. पूर्वांचल नागरिक समिति, 116. महेन्द्र नागरिक परिषद, 117.श्री जैन सभा, 118. भारत रिलिफ सोसाइटी, 119. अग्रवाल परिणय-सूत्र समिति।

विद्यालयों की सूची:

Ashoka Hall, 5A, Sarat Bose Road, Kolkata-20, Daulat Ram Nopany Vidyalaya, 2D, Nando Mullick Lane, Kolkata-6, Birla High School, 1, Moira Street, Kolkata-17, Haryana Vidya Mandir, BA/193, Sector-I, Salt lake City, Kolkata-64, Junior Birla High School, 1, Moira Street, Kolkata-17, Sri Jain Vidyalaya, 25/1, Bon Bihari Bose Road, Howrah, Mahadevi Birla Shishu Vihar, 4, Iron Side Road, Kolkata-19, M.B.Girls High School, 17, Darga Road, Kolkata-17, M.P.Birla Foundation H.S.School, James Long Sarani, Kolkata-34, Modern High School for Girls, 78, Syed Amir Ali Avenue, Kolkata-19, Sri Sikshayatan, 11, Lord Sinha Road, Kolkata-71, South Point School, 87/7A, Ballygunge Place, Kolkata-19, Abhivav Bharati High School, 211, Pritoria Street, Kolkata-71, Balika Siksha Sadan, 87, Vivekananda Road, Kolkata-6, Balika Vidya Bhawan, 41, Brajodulal Street, Kolkata-7, Digambar Jain Vidyalaya, P34/35, Cotton Street, Kolkata-7, Digambar Jain Balika Vidyalaya, 211, M.G.Road, Kolkata-7, Gyan Bharati Vidyapith, 64A, Nimtallaghat Street, Kolkata-6, Gyan Bharati Balika Vidyalay, 64A, Nimtallaghat Street, Kolkata-6, Shree Jain shikshalaya, P-25, Kalakar Street, Kolkata-7, Shree Jain Swetambar Terapanthi Vidyalaya, 3, Portugese Church Street, Kolkata-7, Maheshwari Girls School, 273, Rabindra Sarani, Kolkata-6, Maheshwari Vidyalaya, 4, Sovaram Bysack Street, Kolkata-7, Marwari Balika Vidyalaya, 29, Banstolla Lane, Kolkata-7, Maheshwari Balika Vidyalaya, 4, Sovaram Bysack Street, Kolkata-7, Rajasthan Vidya Mandir, 36, Varanasi Ghosh Lane, Kolkata-7, Saraswat Kshetriya Vidyalaya, 4, Burman Street, Kolkata-7, Set Surajmal Jalan Balika Vidyalaya, 186, Chitaranjan Avenue, Kolkata-7, Tantia High School, 2, Syed sally Lane, Kolkata-73, Visuddanand Saraswati Vidyalaya, 160A, Chittaranjan Avenue, Kolkata-7, Jalan Girls College, College Street, Kolkata-12, Goenka Commerce College, Bow Bazar Street, Kolkata-12.

बम्बई में मारवाड़ी समाज की संस्थाएं

1. मारवाड़ी सम्मेलन, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई- 400002, (क) श्री मती भागीरथीबाई मानमल रुई महिला महाविद्यालय, (ख) सीताराम पोद्दार बालिका विद्यालय, (ग) श्री शिव कुमार भुवालका हिंदी पुस्तकालय। 2. बम्बई अस्पताल, 12, वी. ठाकरसी मार्ग, मुम्बई- 400020, 3. राजस्थानी महिला मण्डल, 12, क्रा. वसंतराव नाईक क्रॉस लेन, फोर्जेट स्ट्रीट, ग्वालियर टैंक, मुम्बई - 400036, 4. राजस्थानी सम्मेलन, मालाड (सर्वोदय बालिका विद्यालय भवन), एस. विही. रोड, मालाड, मुम्बई-400064 (क) सर्वोदय बालिका विद्यालय, (ख) घनश्यामदास सराफ कालेज आँफ आटर््स एण्ड कामर्स (ग) धूड़मल बजाज भवन, 5. मारवाड़ी विद्यालय हाई स्कूल, सरदार बल्लभ भाई पटेल मार्ग, गिरगांव, मुम्बई - 400004, 6. मारवाड़ी कामर्शियल हाई स्कूल, (संचालित-हिंदुस्तान चेम्बर आँफ कामर्स), गजधर गली, चीरा बाजार, मुम्बई-400002, 7. नवजीवन विद्यालय हाई स्कूल, मालाड (संचालित राजस्थान रिलीफ सोसाइटी), राणीसती मार्ग, मालाड (पूर्व), मुम्बई-400057, 8. राजस्थान विद्यार्थी गृह, अंधेरी, लल्लू भाई पार्क, अंधेरी (प.) मुम्बई-400058, 9.बृजमोहन लक्ष्मीनारायण रुईया, बहुद्देश्य हाई स्कूल, विले पार्ले, महंत रोड, विले पार्ले (पूर्व), मुम्बई-400057, 10. श्रीमती दुर्गाबाई, बृजमोहन लक्ष्मी नारायण रुईया, प्राथमिक म्युनिसिपल शाखा, महंत रोड, विलेपार्ले (पूर्व) मुम्बई-400057, 11. जमनादास अड़किया बालिका विद्यालय, कांदिवली, राम गली, विवेकानंद रोड, मुम्बई-400067, 12.हिंदी हाई स्कूल-घाटकोपर, झुनझुनूवाला कालेज के पीछे, घाटकोपर, मुम्बई-400086, 13. रामनिरंजन झुनझुनवाला आटर््स एण्ड र्साइंस कालेज-घाटकोपर, (संचालित-हिंदी विद्या प्रचार समिति), घाटकोपर, मुम्बई-400086, 14. प्रह्लाद राय डालमिया लायंस कालेज आँफ कामर्स, सुन्दर नगर, एस. व्ही. रोड, मालाड (प.), मुम्बई-400064, 15. श्रीमती कमलादेवी गौरीदत्त मित्तल, पुनर्वसु आयुर्वेद कालेज एवं अस्पताल, (संचालक-आयुर्वेद प्रचार संस्था), नेताजी सुभाष रोड, मुम्बई-400019, 16. रामनारायण रुईया कालेज, माटूंगा रेलवे स्टेशन (म.रेलवे), मुम्बई-400019

17.रामदेव आनन्दोलाल पोद्दार आयुर्वेदिक कालेज, वरली नाका, (महाराष्ट्र सरकार द्वारा संचालित), वरली, मुम्बई-18, 18. किशनलाल जालान धमार्थ आयुर्वेदिक औषधालय,किसन रोड, मालाड (प.) मुम्बई-400064, 19.हरियाणा नागरिक संघ, 212-216, रंगमहल, सेम्युअल स्ट्रीट, मुम्बई-400003, 20. हरियाणा मित्र मण्डल, 337, कालवा देवी रोड, मुम्बई-400002, 21. अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी अग्रवाल जातीय कोष, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 22. माहेश्वरी प्रगति मण्डल, 603, जगन्नाथ शेकर सेठ रोड, मुम्बई-400002, 23. राजपूताना शिक्षा मण्डल, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई -400002, 24. राजस्थानी नेशनल ग्रेज्युएट्स एसोसिएशन, 501, निरंजन, 9, मरीन ड्राईव, मुम्बई-400002, 25. राजस्थानी सेवा संघ, जे. बी. नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 26. श्री घनश्यामदास पोद्दार विद्यालय, जे. बी. नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 27. श्री गुरुमुखराय सुखानंद दिगम्बर जैन धर्मशाला, सी. पी. टैंक, मुम्बई-400004, 28. मारवाड़ी फतेहपुरिया पंचायती बाड़ी ट्रस्ट, 41-2, पांजारापोल लेन, मुम्बई-400004, 29. सत्यनारायण गोयनका भवन, (पंचायती सेवा ट्रस्ट), जे.बी.नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 30. नेमानी वाड़ी, 61, ठाकुरद्वार रोड, मुम्बई-400002, 31. नाथूराम पोद्दार बाग ट्रस्ट, 111-119, ठाकुर द्वार रोड, मुम्बई-400002, 32. बिड़ला वाड़ी, आर-6-30, सीताराम पोद्दार मार्ग, मुम्बई-400002, 33. दाखीबाई सिंघानिया धर्मशाला वाड़ी ट्रस्ट, 18, दादीशेठ अग्यारी लेन, मुम्बई-400002, 34. सराफ मातृ मंदिर, मालाड, (मालाड को-आ. हॉ. सोसाइटी के सामने), पोद्दार रोड, मुम्बई-400097, 35. रुईया वाड़ी, मालाड, (मालाड स्टेशन के पास), कस्तूरबा रोड, मालाड, मुम्बई-400064, 36. राजपुरिया बाग (मदनलाल राजपुरिया ट्रस्ट), नवीनभाई ठक्कर मार्ग, विले पार्ले (पूर्व), मुम्बई- 400057, 37. अग्रवाल सेवा समाज, अग्रसेन भवन, 251, ठाकुरदास रोड, मुम्बई-400002, 38. झुंझुनू प्रगति संघ, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 39. राजस्थानी सेवा समिति, 1-ए. 22, नालन्दा एवरशाईन नगर, मुम्बई -400064, 40. राणीसती सार्वजनिक औषधालय, 508, मालाड को.आ.हा.सो., मालाड, मुम्बई-400097, 41. राजस्थानी वेल्फेयर एसोसिएशन, 22, बी. देसाई रोड, मुम्बई-400026, 42. नवलगढ़ नागरिक संघ, 307-309, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 43. बिड़ला ब्राह्मण वाड़ी, 98, व्ही.पी.रोड, मुम्बई-400004, 44. बिड़ला चैरिटेबल डिस्पेंसरी, 18, व्ही.पी.रोड, मुम्बई-400004, 45. फतेहपुर शेखावटी प्रगति संघ, 212, कालबा देवी रोड (2 माला), मुम्बई-400002, 46. राजस्थान कला केंद्र, नीलम मेंशन, भडकमकर मार्ग, मुम्बई-400004।

मारवाड़ी समाज द्वारा अन्य प्रांतों में किए गए सेवा कार्यों की एक झलक

उड़ीसा प्रांत:

1. हिन्दी विद्यालय, जटनी, 2. वैश्य विद्यालय, कटक, 3. हिन्दी बालिका विद्यालय, बरगढ़, 4. हिन्दी एम.ई.स्कूल, सम्बलपुर, 5. हिन्दी स्कूल खेतराजपुर, सम्बलपुर, 6. हिन्दी स्कूल, बरगढ़, 7. हिन्दी विद्यालय, बलांगीर, 8. महाबीर हिन्दी विद्यालय, टीटलागढ़, 9. कौशल हिन्दी विद्यालय, तुसरा पटना स्टेट, 10. वीर प्रताप हिन्दी विद्यालय, तरमा, 11. ओरिएण्ट पेपर मिल हाई स्कूल, वृजराज नगर, 12. मारवाड़ी विद्या मन्दिर, झारसुगड़ा, 13. हिन्दी विद्यालय, जूनागढ़, 14. मारवाड़ी विद्यालय, खड़गप्रसाद, 15. राष्ट्रीय हिन्दी विद्यालय, 16. श्री मुकुन्दीलाल अग्रवाल महिला महाविद्यालय, 17. चमेली देवी महिला महाविद्यालय 1998 में।

पुस्तकालय:

1. हिन्दी साहित्य समिति पुस्तकालय, कटक, 2. हिन्दी पुस्तकालय, जटनी, 3. राष्ट्रीय पुस्तकालय, बालेश्वर, 4.श्री कृष्ण पुस्तकालय, सम्बलपुर, 5. हनुमान पुस्तकालय, सम्बलपुर, 6. हिन्दी छात्र संघ पुस्तकालय, बरगढ़, 7. कस्तूरबा पुस्तकालय, खेतराजपुर।

धर्मशालाएं:

1. रामचन्द्र गोयनका धर्मशाला, पुरी, 2. देवीदत्त दूधवेवाला धर्मशाला, पुरी, 3. कन्हैयालाल बागला धर्मशाला, पुरी, 4. गनपतराम खेमका धर्मशाला, पुरी, 5. आज्ञाराम मोतीराम कोठारी धर्मशाला, पुरी, 6. चिमनलाल गनेड़ीवाला धर्मशाला, पुरी, 7. सूरजमल नागरमल गेस्ट हाउस, पुरी, 8. हलवासिया धर्मशाला, साखी गोपाल, भुवनेश्वर, 9. दूधवेवाला धर्मशाला, भुवनेश्वर, 10. मारवाड़ी धर्मशाला, सोनपुर, 11. घासीराम जी भोलानाथ धर्मशाला, कटक, 12. इच्छाराम जी बदरी प्रसाद धर्मशाला, कटक, 13. गोपीनाथ जी की धर्मशाला, कटक (दो धर्मशाला), 14. पंचायती मारवाड़ी धर्मशाला, अंगुल, 15. मारवाड़ी धर्मशाला, जाजपुर, 16. बदरीप्रसाद पतंगिया धर्मशाला, भुवनेश्वर, 17. मारवाड़ी धर्मशाला, रायरंगपुर, 18. मारवाड़ी धर्मशाला, सम्बलपुर, 19. पालीराम जी की धर्मशाला, सम्बलपुर, 20. मामचन्द मूलचन्द जी की धर्मशाला, झाड़सुगड़ा, 21. मारवाड़ी धर्मशाला, झारसुगुड़ा, 22. जानकीदास गणपत राम की धर्मशाला, झारसुगुड़ा, 23. मारवाड़ी धर्मशाला, बलांगीर, 24. मारवाड़ी पंचायती धर्मशाला, बरागढ़, 25. मारवाड़ी धर्मशाला, टीटलागढ़, 26. मारवाड़ी धर्मशाला, कांटाबाजी, 27. मारवाड़ी धर्मशाला, तुसरा, 28. मारवाड़ी धर्मशाला, तरभा, 29. हरिभवन (धर्मशाला), 30. श्री गोपाल गोशाल, 31. सेठ बालकिशन दास अग्रवाल (धर्मशाला) 32. श्री अग्रसेन भवन कम्पलेक्स, 33. श्री राम मंदिर, 34. श्री राधाकृष्ण मंदिर, 35. श्री दुर्गा पूजा पंडाल भवन, 36. श्री जैन भवन, 37. श्री ब्राह्मण 

धर्मशाला (निर्माणाधीन) है। 38. पुरानी धर्मशाला 1955 में, 39. न्यू धर्मशाला 1975 में, 40. अग्रसेन भवन 2010 में, 41. गायत्री मन्दिर 2000 में, 42. अग्रसेन भवन मारवाड़ी धर्मशाला, 43. गुलाब भवन मारवाड़ी धर्मशाला।

गौशाला:

सम्बलपुर, बरगढ़, झाड़सुगुड़ा, बालेश्वर, राजगांगपुर, भद्रक, सोरों, कटक।

डिब्रूगढ़ (असम):

1. सेठ रामेश्वर सहरिया स्मृति भवन, 2. भगवानदास गाड़ोदिया स्मृति भवन, 3. सूरजमल जालान बालिका शिक्षा सदन, 4. श्री मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, 5. लाल चन्द कनोई मेमोरियल आँडिटोरियम, 6. श्री गोपाल गोशाला, 7. मनोहर देवी कनोई महिला महाविद्यालय, 8. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई वाणिज्य महाविद्यालय, 9. श्री राधाकृष्ण देवस्थानम (मन्दिर) जालान नगर, 10. श्री वेंकटेश देवस्थानम (मन्दिर), 11. मारवाड़ी आरोग्य भवन, अस्पताल, 12. श्री विश्वनाथ मारवाड़ी दातव्य औषधालय, 13. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई महाविद्यालय, 14. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई, कानून महाविद्यालय, 15. मारवाड़ी हिन्दी हाई स्कूल, 16. मारवाड़ी हिन्दी प्राइमरी स्कूल (जालान नगर) 17. श्री अग्रसेन मिलन मन्दिर, 18. श्री राधाकृष्ण मन्दिर, 19. श्रीदेरगाँव मारवाड़ी पंचायत धर्मशाला (तीन मंजिली), 20. श्रीमारवाड़ी सत्यनारायण ठाकुरबाड़ी, 21. श्रीशिवलाल बाँयवाला बी.एड.कालेज, 22. सार्वजनिक हिंदी पुस्तकालय (दो मंजिल), 23. मारवाड़ी दातव्य औषधालय (होम्योपैथी), 24. शिशुभारती नामक अंग्रेजी बाल विद्यालय हेतु श्री मोहनलाल बाँयवाला द्वारा दो बीघा भूमि दान, 25. देरगाँव के लुकुमोय में उच्च विद्यालय हेतु श्रीजयनारायण काबरा द्वारा दो बीघा भूमि दान, 26. देरगाँव के रांगामाटी में मंदिर हेतु स्व. गणपतलाल काबरा द्वारा एक बीघा भूमि दान, 27. मारवाड़ी युवा मंच संगठन द्वारा समाज सेवा, 28. मारवाड़ी संमेलन की देरगाँव शाखा संचालित, 29. माहेश्वरी सभी की देरगाँव शाखा संचालित।

मणिपुर (इम्फाल):

1. चिकित्सा आवास भवन, 2. भगवानलाल पाटनी चिकित्सा आवास भवन (मणिपुर मेडिकल कालेज के पास), 3. मारवाड़ी धर्मशाला।

कानपुर:

1.राधाकृष्ण मन्दिर, कमला नगर, 2. कमलेश्वर मन्दिर, परमट, 3. द्वारिकाधीश मन्दिर, कमला नगर, 4. लाला लक्ष्मीपत सिंघानिया इन्स्टीट्यूट आँफ कार्डियोलाजी, गुरैया, 5. लाला कैलाशपत सिंघानिया इन्स्टीट्यूट आँफ मेडिसीन, मोतीझील, 6. लाला कमलपत मेमोरियल हास्पिटल, बिरहाना रोड, 7. जुहारी देवी कन्या महाविद्यालय, केनाल रोड, 8. जी.एन.के.इण्टर कालेज, सिविल लाइंस, 9. सर पद्मपत सिंघानिया एजुकेशन सेण्टर, 10. श्री मारवाड़ी पुस्तकालय तथा वाचनालय, बिरहाना रोड, 11. जे.के. इंस्टीट्यूट आँफ कैंसर रिसर्च।

भागलपुर:

1. मारवाड़ी महाविद्यालय, 2. यतिन्द्र नारायण आयुर्वेद महाविद्यालय, 3. मारवाड़ी पाठशाला, 4. बाल सुबोधिनी पाठशाला, 5. मारवाड़ी कन्या पाठशाला, 6. भजनाश्रम पाठशाला, 7. सरस्वती विद्या- शिशु मन्दिर, नाथनगर, 8. शारदा देवी झुनझुनवाला महाविद्यालय, 9. सरस्वती विद्या मन्दिर, 10. हनुमान विद्यालय, 11. रावतमल छात्रावास, 12.मोती मातृ सेवा सदन, 13. रुक्मिणी मातृ सेवा सदन, 14. जगदीश बुधिया नेत्र चिकित्सालय, 15. श्रीमती मन्नी बाई पोद्दार नेत्र चिकित्सालय, 16. जैन चिकित्सालय, 17. साह चिकित्सालय, 18. आनन्द चिकित्सालय, 19. महिला धर्म संघ, 20. सत्संग भवन, 21. स्व. देवी प्रसाद ढंढानिया धर्मशाला, 22. दिलसुख राम धर्मशाला, 23. डोकानिया धर्मशाला, 24. कमला कानोड़िया धर्मशाला, 25. टिबड़ेवाल धर्मशाला, 26. राणीसती धर्मशाला, 27. मारवाड़ी मण्डल धर्मशाला, 28. साह चैरिटेबुल ट्रस्ट, 29. जैन धर्मशाला (श्वेताम्बर), 30. जैन धर्मशाला (दिगम्बर), 31. अग्रसेन भवन धर्मशाला, 32. जिलोका धर्मशाला, 33. गोशाला, 34. मारवाड़ी सुधार समिति, 35. मारवाड़ी व्यायामशाला, 36. ज्ञानदीप (शैक्षणिक संस्थान)।

बिहार में मारवाड़ी समाज द्वारा स्थापित महाविद्यालय

1. मारवाड़ी कालेज, किशनगंज, 2. फारबिसगंज कालेज, 3. मोहन लाल जिलोका मेमोरियल कालेज, कटिहार, 4. टाटा कालेज, चाईबासा, 5. महिला कालेज, चाईबासा, 6. राजस्थान बिहार मन्दिर रात्रि कामर्स कालेज, गया, 7. ज्ञान चन्द जैन कामर्स कालेज, चाईबासा, 8. महिला महाविद्यालय, झरिया, 9. मारवाड़ी कालेज, दरभंगा, 10. जे.जे. कालेज, हजारीबाग, 11. चतरा कालेज, 12. झुमरीतलैया कालेज, 13. रामगढ़ कालेज, 14. एस. आर. के. गोयनका कालेज, सीतामढ़ी, 15. भरतिया महिला कालेज, पटना सिटी, 16. राम निरंजन दास संस्कृत महाविद्यालय, पटना सिटी, 17. एस. पी. जैन कालेज, सासाराम, 18. मारवाड़ी संस्कृत महाविद्यालय, मझौलिया, 19.मारवाड़ी संस्कृत महाविद्यालय, छपरा, 20. मझौलिया संस्कृत महाविद्यालय, मझौलिया, 21. गया कालेज (गोपीराम डालमिया), गया, 22. गिरीडीह कालेज (चान्दमल जी राजगढ़िया), गिरीडीह, 23. सहरसा कालेज (शंकर प्रसाद टेकरीवाल परिवार), सहरसा, 24.धरान मोरान नेपाल महाविद्यालय, नेपाल।


आन्ध्र प्रदेश (हैदराबाद):

1. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, हश्मतगंज, 2. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, हश्मतगंज, 3. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, सिकन्दराबाद, 4. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, कसार हट्टा, 5. राजस्थानी विद्यार्थी गृह, हैदराबाद, 6. राजा बहादुर सर बंसीलाल मोतीलाल हॉस्पीटल, हैदराबाद, 7. श्री जैन पुस्तकालय- वाचनालय, सिकन्दराबाद, 8. सुख भवन, चारकमान, 9. राम भवन, घांसी बाजार, 10. हरि भवन, काली कमान, 11. भानमल लूणिया धर्मशाला, हनुमान टेड़ी, 12. श्री महावीर जैन छात्रालय, हनुमान टेड़ी, 13. अग्रवाल सेवा समिति, गांधी नगर, 14. राम प्रताप कन्हैयालाल पित्ती धर्मशाला, 15. जगदीश कन्या पाठशाला, महबूबगंज, 16. राजाबहादुर सर बंसीलाल बालिका विद्यालय, 17. गुरुकुल घटकेश्वर (पुस्तकालय, गोशाला), 18. सनातन धर्मशाला, बेगम बाजार, 19. मारवाड़ी हिन्दी विद्यालय, बेगम बाजार, 20. ज्ञान प्रकाश पुस्तकालय, उर्दू शरीफ, 21. एस.एस.जैन विद्यालय, सिकन्दराबाद, 22. शांतिलाल जैन के. जी. एण्ड प्राइमरी स्कूल, 23. वैदिक वाचनालय, गांधी नगर, 24. मदन भवन, चारकमान, 25. पूनमचन्द गांधी जैन धर्मशाला, काचीमुड़ा स्टेशन, 26. बंसीलाल भवन, आफजलगंज, 27. महावीर जैन पुस्तकालय, हबीरपुरा, 28. बाल विद्या मन्दिर, शमशेर गंज, 29. घासीलाल तोषनीवाल भवन, शमशेरगंज, 30. श्री अम्बा सदन, गोविन्दवाड़ी, 31. शिव भवन, चारकमान, 32. शिवनाथ दरक स्मारक विद्यालय, दारुलशफा, 33. श्री माहेश्वरी भवन, बेगम बाजार, 34. श्री सिखपाल सेवा संघ भवन, फीलखाना, 35. राम गोपाल बाहेती भवन, सिद्धि अम्बर बाजार, 36. लक्ष्मी बाल पुस्तकालय, चारकमान, 37. साधना मन्दिर, बोलाराम, 38. शिवदत्त राय हाई स्कूल, लाड़ बाजार, 39. अग्रवाल सभा भवन, सिद्ध अम्बर बाजार, 40. जगदीश भवन, गांधी नगर, 41. अग्रसेन वाचनालाय, सिद्ध अम्बर बाजार, 42. राजस्थानी नवयुवक मण्डल पुस्तकालय, कबूतरखाना, 43. रुपचन्द मेघाज कोचर भवन, 44. जैन भवन, महाराजगंज, 45. राजस्थान भवन ट्रस्ट, 46. श्री पद्मश्री नैनसी भवन ट्रस्ट, 47. श्री रामनाथ आश्रम ट्रस्ट, 48. हरि प्रसाद स्मारक अस्पताल, पत्थर गट्टी, 49. गोपीकृष्ण मलाणी भवन ट्रस्ट, 50. राजस्थानी हिन्दी पुस्तकालय, बेगम बाजार, 51. बद्रुका वाणिज्य एवं कला महाविद्यालय, 52. अमृत कपाड़िया नवजी वन वीमेन्स कालेज, 53. चाचा नेहरु बाल केन्द्र एवं फिल्म सेन्टर, 54. शिशु सुरक्षा केन्द्र, 55. नवजीवन बालिका विद्यालय, 56. श्री कृष्ण मोरक्षिणी सभा (गोशाला), 57. अग्रवाल शिक्षा समिति भवन, 58. शंकर लाल धनराज सिंगनोदिया महिला कला महाविद्यालय, पत्थरागट्टी 59. श्री सत्यनारायण मन्दिर, गुंटुर, 60. श्री महावीर जैन विद्यालय व स्थानक, गोशाला, 61. अग्रवाल शिक्षा समिति के अन्तर्गत चलने वाले संस्थान, 1. अग्रवाल हाई स्कूल, 2. अग्रवाल जूनियर कालेज, 3. अग्रवाल बालिका विद्यालय हाई स्कूल, 4. अग्रवाल बालिका जूनियर कालेज, 5. नानकराम भगवानदास विज्ञान महाविद्यालय, 6. अग्रवाल विज्ञान एवं वाणिज्य सायंकालीन महाविद्यालय, 62. श्रीराम हिन्दी भवन (हैदराबाद हिन्दी प्रचार सभा), 63. श्री वेंकटेश्वर मन्दिर भवन, चारकमान, 64. हरिचरण मारवाड़ी हिन्दी विद्यालय, निजामाबाद, 65. राजस्थानी भवन, निजामाबाद, 66. श्रीमती अशरफ देवी अग्रवाल जूनियर महाविद्यालय, निजामाबाद, 67. श्री लक्ष्मी नारायण मन्दिर, मंचरियाल, 68. पन्नालाल हीरालाल हिन्दी विद्यालय, बीदर, 69. राजस्थान सेवा भवन, सिरपुर-कागजनगर, 70. राजस्थानी विद्यार्थी गृह, नान्देड़, औरंगाबाद, विजयवाड़ा, 71. मारवाड़ी पंचायत भवन (धर्मशाला), आदिलाबाद, 72. राष्ट्रभाषा हिन्दी विद्यालय, मंचरियाल, 

73. श्री मारवाड़ी राजस्थान शिक्षण संस्था, लातूर के अन्तर्गत चलने वाले शिक्षण संस्थान:

1. श्री मारवाड़ी राजस्थान बहुउद्देशीय विद्यालय, 2. श्री गोदावरी देवी लाहोटी कन्या विद्यालय-दो शाखाएं, 3. श्री सूरजमल लाहोटी पाठशाला, 4. एस.टी.सी. इन्स्टीट्यूट

74. मारवाड़ी युवक वाचनालय, लातूर, 

75. जालना एजुकेशन सोसायटी, जालना के अन्तर्गत चलने वाली संस्थायें:

1. आर.जी. बगड़िया आट्र्स कालेज, 2. एस.वी. लाखोटिया कामर्स कालेज, 3. आर. वंसजी साइन्स कालेज एवं 4. श्रीमती राम प्यारी बाई बंसीलाल जी लाखोटिया डिपार्टमेंट आँफ पोस्ट ग्रेज्युएट टीचिंग संस्थान, 76. राष्ट्रीय हिन्दी विद्यालय, जालना, 77. श्रीमती दान कंवर देवी कन्या विद्यालय हाई स्कूल, जालना, 78. महावीर स्थानक वासी जैन विद्यालय, जालना, 79. हिन्दी प्राथमिक पाठशाला, बारंगल, 80. राजस्थानी सेवा समाज भवन, सिरपुर कागजनगर, 81. हनुमान मन्दिर, आदिलाबाद, जलगांव, पेट्टापल्ली, 82. राजस्थानी रिलीफ सोसायटी, रामावरम।

मारवाड़ी अस्पताल ‘वाराणसी’

आज से 90 वर्ष पूर्व सन् 1916 में कोलकाता के कानोड़िया परिवार द्वारा मारवाड़ी अस्पताल का शिलान्यास व उद्घाटन तत्कालीन गर्वनर सर जेम्स वेस्टन ने 12 अगस्त 1916 को किया गया। अस्पताल के लिए स्थान का चयन बड़ी दूरदर्शिता से काशी आने वाले पर्यटक एवं यात्रियों का मुख्य आकर्षण माँ गंगा का दर्शन एवं स्नान तथा बाबा भोलेनाथ का दर्शनपूजन को ध्यान में रख कर किया गया। काशी शहर में व्यस्ततम चैराहे गोदौलिया पर स्थित अस्पताल माँ गंगा व भोलेनाथ से पाँच मिनट की दूरी पर है। संस्थापकों की ऐसी मान्यता थी कि अगर मर्ज है तो उसका इलाज भी है। निदान विधि भिन्न हो सकती है। अतः ऐलोपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद विभाग की स्थापना सन् 1921 में की गई तत्पश्चात् 1936 में होम्योपैथी विभाग की स्थापना की गई। मरीजों को शुद्ध एवं प्रमाणिक आयुर्वेदिक दवा प्राप्त हो इसके उद्देश्य से निर्माण शाला की स्थापना की गई। जिसमें योग्य वैद्यों की निगरानी में शत् प्रतिशत शुद्ध दवाओं का निर्माण होता है। अतः यहाँ मर्ज ठीक करने वाली तीनों विधाएँ उपलब्ध हैं।

अस्पताल में प्रातः दूध एवं बिस्कुट तथा दोपहर एवं शाम को पवित्रता से बना हुआ सुपाच्य गरम भोजन ही रोगियों को निःशुल्क दिया जाता है और साथियों को मात्र 10/- रुपये में।

इस चिकित्सा संस्थान ने आजादी के पहले स्वंत्रता संग्राम सेनानियों की निर्भीकता से चिकित्सा सेवा की जबकि उनकी चिकित्सा करना अंग्रेजों की नजर में अपराध माना जाता था।

भारत के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 में अस्पताल के महिला एवं बाल चिकित्सा विभाग का उद्घाटन किया एवं विभिन्न अवसरों पर देश के शीर्ष नेतागण डॉ. सम्पूर्णानन्द, डॉ. रघुनाथ सिंह, श्री श्रीप्रकाश जी, श्री मोहन लाल सुखाड़िया, श्री दाऊदयाल खन्न, श्री चन्द्रभान गुप्ता आदि ने अस्पताल में पधार कर इसके विकास में अमूल्य योगदान किया। पं. कमलापति त्रिपाठी जी का उपाध्यक्ष के रूप में अन्तिम सांस तक अस्पताल के उत्थान में पूरा मार्गदर्शन एवं योगदान मिला। सेवा क्षेत्र में नये आयामों को प्राप्त करते हुए अपनी लम्बी सेवा अवधि में अस्पताल काफी उतार-चढ़ाव देखा फलस्वरूप संस्थापकों ने अस्पताल में नया संचार प्रदान करने हेतु नये ट्रस्ट बोर्ड एवं प्रबन्ध समिति गठन किया गया।

महाराजा अग्रसेन इन्टर कॉलेज, झरिया

विगत कई वर्षों से दशम उत्तीर्ण छात्राओं एवं इनके अभिभावकों के समक्ष एकादश में नामांकन की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। झरिया मारवाड़ी सम्मेलन ट्रस्ट द्वारा संचालित महिला महाविद्यालय की स्थापना के उपरान्त बालिकाओं एवं इनके अभिभावकों को बहुत बड़ी राहत मिली। इस विद्यालय में एकादश (इन्टर) से स्नातक तक केवल दो संकायों (वाणिज्य एवं कला) में ही एकमात्र छात्राओं के लिए ही शिक्षा की व्यवस्था है। विगत कई वर्षों से इस महाविद्यालय में अध्ययनरत छात्राओं को अन्य कॉलेजों से परीक्षा का फार्म भराये जाने के कारण तरह तरह की परेशानी हो रही थी। चूंकि इस महाविद्यालय की प्रबंध समिति द्वारा किसी बोर्ड अथवा विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की जा रही थी। किन्तु छात्रों के समक्ष इस प्रकार की शिक्षण संस्था का अभाव काफी खल रहा था, जहाँ महिला महाविद्यालय की भांति ही अन्य कोई दूसरा शिक्षण संस्थान विकल्प के रूप में हो, जहां छात्र भी दशम उत्तीर्णता के पश्चात छात्राओं की भांति ही एकादश में अपना नामांकन करा सकें। इन सारे बिन्दुओं पर गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए झरिया मारवाड़ी सम्मेलन ट्रस्ट कार्यसमिति के सदस्य सह बालिका मंदिर प्रबंध समिति के 

अध्यक्ष श्री राजेन्द्र प्रसाद अग्रवाल द्वारा इस अहम मुद्धे को सम्मेलन कार्य समिति की बैठक में उठाते हुए अपने इस ट्रस्ट के अन्तर्गत यथाशीघ्र एक ऐसे शिक्षण संस्थान की स्थापना पर जोर दिया जहां छात्र-छात्राओं को एकादश में मामांकना कराने में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़े तथा उक्त शिक्षण संस्थान में तीनों संकायों (वाणिज्य, कला एवं विज्ञान) की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था हो। विद्यालय प्रबंध समिति ने 14.12.2004 को झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल, रांची से महाराजा अग्रसेन इन्टर कॉलेज के नाम से मान्यता प्राप्त करने की दिशा में आवश्यक प्रक्रियायें पूर्ण कर लेने के पश्चात उक्त कौंसिल कार्यालय रांची में आवेदन समर्पित कर दिया। 

इस महाविद्यालय की स्थापना से झरिया मारवाड़ी सम्मेलन ट्रस्ट के इतिहास में एक नई लोकप्रिय शिक्षण संस्थान का नाम जुड़ जाने से सामाजिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में सम्मेलन की बढ़ती हुई लोकप्रियता एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है। यह समाज एवं सम्मेलन के लिए गौरव की बात है। इस कॉलेज के प्रारंभ किये जाने में कोलफिल्ड कॉलेज भागा के प्रोफेसर माननीय पी.के.गजरे का अहम योगदान रहा है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। प्रारंभ से ही इनका कुशल नेतृत्व एवं मार्गदर्शन इस कॉलेज को प्राप्त होता रहा है।

श्री माहेश्वरी विद्यालय, कोलकाता

लगभग 85 वर्ष पूर्व की बात है। वे शताब्दी की तरुणाई के दिन थे। सामाजिक जागरण के लिये बहुमुखी रचनात्मक कार्यों को संपन्न करने के लिए यत्र तत्र ऐसे धरातल निर्मित किये जा रहे थे, जहां आत्मविश्वास जी सके, आस्था पनप सके और स्वप्न फल फूल सके। इस दिशा में प्रयास करने वाले लोगों में माहेश्वरी जाति के कर्मठ पुरुष भी थे। जागृति की इसी भावना से बंगाल में सन् 1914 में माहेश्वरी सभा को प्रगति के नये आयाम देने का गुरुतर दायित्व रामकृष्णजी मोहता ने ग्रहण किया। उनमें माहेश्वरी जाति को शिखर पर देखने की महत्वाकांक्षा थी। एक बैठक में जब पुस्तकालय विषयक विचार विमर्श चल रहा था, उन्होंने प्रसंगवश एक बात प्रभावशाली तरीके से कही कि पहले पढ़ना तो सीख लें। ये गिने चुने शब्द उनकी वाणी से जिस कटु सत्य को लेकर प्रकट हुए। उससे उपस्थित जनों को गहन चिन्तन का विषय मिला। यह सत्य नकारने योग्य नहीं था। शिक्षा के लिए चाहिए विद्यालय और विद्यालय के लिए चाहिए साधन स्थान सहयोग और अटूट संकल्प मोहताजी ने अपने विचारों को सबसे पहले सभा के कर्मठ कर्णधार जुगल किशोरीजी बिड़ला के सामने रखा। उन्होंने भी इसका समर्थन किया परिणाम स्वरूप 24 मार्च 1916 ई. को सभा की एक बैठक बुलाई गयी, जिसमें विद्यालय की स्थापना का संकल्प विधिवत प्रस्ताव रूप में स्वीकृत किया गया। 5 मई 1916 को इसी अक्षय तृतीया के दिन रामानुज संप्रदाय के आचार्य व कांचीवरम् के पीठाधीश्वर श्रीमद अनताचार्य जी महाराज ने अपराह्न एक बजे गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में जगद्गुरू ने श्री माहेश्वरी विद्यालय को अपने आशीषों से अभिसिक्त करके उसका उद्घाटन किया। 

18 फरवरी 1926 को कलकता विश्वविद्यालय से पुनःहाई स्कूल की मान्यता प्राप्त की गयी। अब स्थिति यह थी कि प्रतिवर्ष अनेक छात्रों को स्थानाभाव के कारण प्रवेश पाने से वंचित रहना पड़ता था। कार्यकर्तागण इस विषय में चिंतित थे। 1950 तक विद्यालय में उन्नीस सौ छात्र हो गये थे।

1950 के बाद एक नया दौर प्रारंभ हुआ। हाई स्कूल की परिपाटी समाप्त करके माध्यमिक शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित किया जाने लगा। मुदालियर आयोग ने सिफारिश की कि इंटरमीडिएट शिक्षा समाप्त की जाये और उसे ऐंन्ट्रेंस के साथ मिश्रित किया जाये एवं उसे उच्चतर माध्यमिक परीक्षा का नाम दिया जाये। परिणामस्वरूप जनवरी 1955 में हिन्दी भाषी विद्यालयों में श्री माहेश्वरी विद्यालय को ही प्रथम बहुद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय घोषित किया गया। यह निश्चय ही एक बड़ी उपलब्धि थी। विद्यालय की प्रबंध समिति ने सन् 1957 ई. में विज्ञान विभाग के लिए सामग्री खरीदी जिसमें बहुमूल्य उपकरण भी थे। इन विगत वर्षों में छात्रों की क्रमशः बढ़ती हुई संख्या पर नजर डालें तो विद्यालय की लोकप्रियता, उसकी उच्चस्तरीय शिक्षा और प्रगति का अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं होगी। सन् 1916 में मात्र पच्चीस छात्रों से शुरू होने वाली इस विद्यालय में पहली कक्षा से बारहवीं तक के लगभग पांच हजार छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं एवं 120 शिक्षक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।

श्री माहेश्वरी विद्यालय न केवल पश्चिम बंगाल के हिन्दी भाषी विद्यालयों के सर्वोच्च आदर्शों का अपितु माहेश्वरी समाज की आदर्श संस्था माहेश्वरी सभा, कोलकाता के भी सर्वोच्च आदर्श का सफल प्रतिनिधित्व करता है। माहेश्वरी समाज द्वारा प्रतिष्ठित इस विद्यालय की अपने स्थापना काल से ही ऐतिहासिक एवं विशिष्ट परंपराएं रही हैं, जो उत्तरोत्तर विकसित होकर निखरती गयी हैं।

टांटिया हाईस्कूल

कोलकाता के हिन्दी भाषी जगत में अच्छे स्कूलों का अभाव रहा है, दो सैयद अली स्ट्रीट, कोलकाता-73 में स्थित टांटिया हाईस्कूल ने इस अभाव को दूर करने की एक ईमानदार कोशिश की है। सन् 1953 में बसंत पंचमी के दिन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. हरेन्द्र नाथ मुखर्जी ने इस स्कूल का शिलान्यास किया था। डॉ. मुखर्जी स्वयं एक शिक्षक थे। उनका जीवन संत व ऋषि जैसा था। पुण्यात्मा के हाथों स्कूल का शिलान्यास होना स्कूल के लिए शुभ होना था। स्कूल अनवरत उन्नति करता चला आया है।

एक वर्ष बाद जनवरी 1954 में 500 छात्रों को लेकर स्कूल बाकायदा खुल गया। आज 47 वर्ष बाद छात्रों की संख्या तिगुनी से भी अधिक लगभग 1800 और अध्यापक-अध्यापिकाओं की संख्या 61 हो गयी है। 

टांटिया स्कूल की सफलता की एक कसौटी यह मानी जा सकती है। पश्चिम बंगाल बोर्ड की माध्यमिक परीक्षाओं में उसके छात्रों का परीक्षाफल कैसा रहा है। पिछले 50 वर्षों से स्कूल का परीक्षाफल 95 प्रतिशत से कभी कम नहीं रहा और हाल के दस वर्षों में तो यह शत प्रतिशत की सीमा तक पहुंच गया है। यही नहीं जो छात्र उत्तीर्ण हुए हैं उनमें से 60 प्रतिशत तक प्रथम श्रेणी में और बाकी द्वितीय श्रेणी में तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या नगण्य है।

मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी

227, रविन्द्र सरणी, कोलकाता - 700007, स्थित पांच तल्ला भवन

उन्नीसवीं सदी में उद्दोग व्यापार में मारवाड़ियों का वर्चस्व बंगाल और खासकर कलकत्ता महानगर में कायम होने लगा। व्यापार उद्योग में अद्वितीय सफलता प्राप्त करने के साथ ही साथ उपार्जन और विसर्जन का अर्थात् परहित में धन का कुछ अंश लगाना अनिवार्य मानते थे एवं अपने जन्म स्थान में ही नहीं बल्कि अपने उद्योग व्यापार के क्षेत्र में भी अनेकों धर्मशालायें, स्कूल, कालेज एवं अस्पताल आदि का निर्माण किया। मारवाड़ी समाज में सार्वजनिक उपयोग की अनेकों संस्थायें कायम की उन्हीं एक कड़ियों में है मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी जिसका विकास क्रम विशाल वट वृक्ष की तरह उन्मुख होकर आज सेवा के विभिन्न आयामों की भूमिका में सन्निहित है। कलकत्ते के बड़ाबाजार अंचल में एक ऐसी घटना घटी कि मारवाड़ी सहायता समिति (जो बाद मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी बनी) की स्थापना का अवसर उपस्थित हो गया। कलकत्ते के बड़ाबाजार जन स्कूल क्षेत्र में एक व्यक्ति मकान से गिर पड़ा और उसे सांघातिक चोट लगी। कुछ व्यक्ति उस घायल व्यक्ति को लेकर चिकित्सा हेतु कई अस्पतालों में भटकते रहे, पर उसकी समुचित चिकित्सा की व्यवस्था नहीं हो पायी। उसी क्षण मन में एक विचार आया कि इस अंचल में एक अस्पताल की व्यवस्था होनी चाहिये जिससे भविष्य में इस प्रकार आकस्मिक दुर्घटनाओं के शिकार व्यक्तियों को भटकना न पड़े। इस कार्य को साकार रुप देने के लिये 2 मार्च 1913 को काटन स्ट्रीट स्थित जोड़ा कोठी की एक बैठक में जुगल किशोर बिड़ला, ओंकारमल सराफ, हरखचन्द मोहता के प्रयास से मारवाड़ी सहायता समिति नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के प्रथम अध्यक्ष बने जुगल किशोर बिड़ला एवं प्रथम मंत्री बने ओंकारमल सराफ। इस संस्था का उद्देश्य सहायता करना एवं जन साधारण की सेवा करना रखा गया। अंग्रेजों के शासन काल में मारवाड़ी सहायक समिति के अधिकांश कार्यकर्ता ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन बन गए। वे या तो नजरबंद हो गये या उन्हें कलकत्ते से निष्कासित कर दिया गया।

मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी अस्पताल (रानीगंज), मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी (कोलकाता) की एक शाखा है। रानीगंज शहर में अस्पताल की स्थापना की कल्पना जगन्नाथ झुनझुनवाला चैरिटी ट्रस्ट के तात्कालिक पदाधिकारियों ने की थी, जिन्होंने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए तात्कालीन ट्रस्ट की चल व अचल सम्पत्ति को सोसाइटी के नाम स्तानांतरित कर दिया। इस कल्पना को साकार रुप देने का श्रेय मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी (कलकत्ता) को है। प्रारम्भिक योजना के सहयोगी डॉ.स्व. जगन्नाथ बेरीवाल, स्व.नन्दलाल जालान, बनवारी लाल भालोटिया, श्री गोवर्द्धनलाल झुनझुनवाला, श्री चिरंजीलाल केजरीवाल, श्री गोविन्दराम खेतान, श्री जे.एन.गुप्ता एवं स्व. भानु प्रसाद खेतान के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

रानीगंज अस्पताल की आधारशीला, दिनांक 28 मार्च 1961 को डॉ. विधानचन्द्र राय ने रखी। अस्पताल भवन का निर्माण कार्य दिनांक 2 अगस्त 1961 से सक्रिय रुप से चालू कर दिया गया जो 1963 तक निरन्तर चलता रहा एवं अप्रैल 1964 में अस्पताल जनता की सेवा के लिये खोल दिया गया। इस अस्पताल का विधिवत उद्घाटन 23 मार्च 1968 को श्री कृष्ण कुमार बिड़ला ने किया।

श्री विशुद्धानन्द सरस्वती मारवाड़ी अस्पताल

स्वामी श्री विशुद्धानन्द सरस्वतीजी महाराज की प्रेरणा सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की भावना से प्रेरित होकर हमारे पूर्वजों ने सन् 1919 में इस अस्पताल की स्थापना की। इस अस्पताल के संस्थापक थे डॉ.स्व. जुहारमलजी खेमका, डॉ.स्व. रामजीदासजी बाजोरिया, डॉ.स्व. रामेश्वर दासजी दुदवेवाला, डॉ.स्व.केशोरामजी पोद्दार, एवं चिमनलालजी गनेरीवाल। इन लोगों ने समाज के सभी वर्गों से सहयोग लेकर इस अस्पताल का निर्माण किया। सहयोग दाताओं की सूची आज भी अस्पताल में सूचनापट्ट पर अंकित है। उस वक्त अंग्रेजों के शासनकाल में कलकत्ते के बड़े अस्पतालों में श्री विशुद्धानन्द सरस्वती मारवाड़ी अस्पताल एक था। यह अस्पताल 118, अम्हस्ट्र स्ट्रीट (वर्तमान में राजा राममोहन राय सरणी) में करीबन 3 एकड़ जमीन पर स्थित है। इसके उत्तर भाग में केबिन एवं दवा विभाग, पश्चिम भाग में वातानुकूलित केबिन, रसायन, मलमूत्र परिक्षण विभाग, एवं मन्दिर तथा मध्य भाग में प्रशासनिक एवं अन्य समूचे विभाग अवस्थित है। इस अस्पताल में करीबन 200 रोगियों के इन्डोर इलाज की व्यवस्था है। इसके वार्ड में जितने खुले एवं हवादार कमरों की व्यवस्था है उतनी कलकत्ते के और अस्पतालों में नहीं है। जब से इस अस्पताल की स्थापना हुई तबसे डॉ.स्व. रामजीदासजी बाजोरिया, डॉ.स्व. केदारनाथजी पोद्दार नित्यप्रति रोगियों के समक्ष जाकर उनकी सुख सुविधाओं का ध्यान रखते थे, तत्पश्चात श्री पुरुषोत्तमजी पोद्दार एवं डॉ.स्व. पुरुषोत्तमजी हलवासिया ने यह भार संम्भाला एवं नित्यप्रति सेवा भाव से समर्पित होकर रोगियों के समक्ष जाने लगे। कतिपय कारणों की वजह से यह अस्पताल सन् 1981 से सन् 1983 तक बन्द रहा एवं तत्पश्चात् डॉ.स्व. पुरुषोत्तमदासजी हलवासिया के प्रसर प्रयत्नों से यह अस्पताल पुनः चालू हुआ जिसमें स्व. सत्यनारायणजी टांटिया अध्यक्ष एवं स्व. पुरुषोत्मजी हलवासिया मंत्री बने एवं यह अस्पताल सुचारु रुप से चलने लगा। 

वर्तमान में इस अस्पताल के उत्तरी भाग में एक तिमंजिला मकान है जिसमें प्रथम मंजिल में 20 साधारण केबिन है। द्वितीय मंजिल में 20 स्पेशल केबिन है एवं तृतीय मंजिल में डिलक्स वातानुकूलित केबिन 20 है। अस्पताल के मध्य भाग में आउट डोर विभाग है जिसके अर्न्तगत सर्जीकल, मेडिकल, कैंसर, ओर्थोपेडिक, महिला चिकित्सा, डायविटिज कार्डियोलोजी, शिशु चिकित्सा, होमियोलोजी, आयुर्वेदिक एवं परिवार नियोजन विभाग है। इस आउट डोर विभाग में 80 से ऊपर डॉक्टर नित्यप्रति बैठते हैं। इसके प्रथम तल्ले पर पूर्ण आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति एवं यंत्रों से लैस 3 आपरेशन थियेटर है जिसमें एक ही समय में एक साथ 3 आपरेशन किया जाता है। साथ ही 25 बेडों से युक्त खुला हवादार सर्जीकल पुरुष वार्ड है एवं संलग्न 25 बेडों का मेडिकल पुरुष वार्ड भी है। इसी प्रथम तल्ले के पश्चिम भाग आई टी यु युनिट (इन्टेनसीन थेरेपी युनिट) अवस्थित जिसमें 10 बेड हैं एवं आधुनिक यन्त्रों से लैस है तथा सम्पूर्ण वातानुकूलित है। इसके दूसरी मंज़िल पर 25 बेडों का महिला सर्जीकल वार्ड एवं 25 बेडों का महिला मेडिकल वार्ड है। भवन के मध्य भाग में फूलों से लैस एक लान भी है। पश्चिमी भाग में रायबहादुर हजारीमल दुदवेवाला की धर्मपत्नी द्वारा निर्मित सत्यनारायण भगवान मन्दिर है, एवं शिव मन्दिर जहां सुबह एवं सायंकाल नित्यप्रति पूजा होती है। मंदिर के संलग्न रसायन विभाग है। यहां पर आयुर्वेदिक पद्धतियों के द्वारा शुद्ध आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण सुदक्ष निरीक्षकों की देखरेख में किया जाता है।

श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय, गुवाहाटी

प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर, माँ कामख्या के आगोश में बसे असम प्रदेश को सदियों पूर्व मारवाड़ी समाज ने अपनी संपर्क 

साधनों से विहीन एक अनजाने प्रदेश में अपने अथक श्रम, लगन के साथ न केवल स्वयं को स्थापित किया बल्कि प्रदेश को भी आर्थिक संबल प्रदान करने में सहयोग दिया। परोपकार, दानशीलता, और सेवाभाव मारवाड़ी समाज के वंशानुगत गुण रहे हैं, उन्हीं भावनाओं के परिणाम है आज सारे देश में मारवाड़ी समाज द्वारा स्थापित व संचालित अनगिनत संस्थायें कार्यरत है। श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय, गुवाहाटी (असम) उसी की एक कड़ी है श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय अपने जीवन के 95 साल पूरे कर चुका है। इन 9 दशकों का एक गौरवशाली इतिहास भी है। इस संस्था ने जहां लाखों पीड़ित मानवों को न सिर्फ सेवा की, साथ ही साथ इस दीर्घ काल में समाज में अपनी एक पहचान भी कायम की है। जहां औषधालय ने समय के अनुसार अपनी सेवाओं का विस्तार किया वहीं समाज के सहयोग से दो नये हॉस्पिटल का निर्माण कर यह प्रमाणित भी कर दिखाया कि असम का मारवाड़ी समाज भी व्यवसाय के साथ सेवा के क्षेत्र में भी अपनी अग्रणी भूमिका निभाने में देश के अन्य भाग से किसी भी तरह कमजोर नहीं है।

औषधालय का इतिहास-यह औषधालय बंगला तारीख 1 जेठ संवत् 1973 साल में स्थापित किया गया था जिसमें स्व.नागरमलजी केजड़ीवाल, स्व.लक्ष्मीनारायणजी लोहिया व स्व.कामख्यालालजी सीकरिया जी के नामों का विशेष उल्लेख मिलता है। संस्था के संक्षिप्त इतिहास से पता चलता है कि संवत् 1973 से लेकर संवत् 1976 तक इस औषधालय का कार्य स्व.कामख्यालालजी सीकरिया जी के व्यापारिक स्थल से चलता रहा प्रारम्भ में इसका नाम श्री श्री कमक्षा भगवती दातव्य मारवाड़ी औषधालय का उल्लेख मिलता है। 

इस क्षेत्र में अस्पताल की प्रतिष्ठा का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि केन्द्रीय सरकार के स्वास्थ और शिशु कल्याण विभाग द्वारा मारवाड़ी मेटरनिटी हॉस्पिटल को सर्वोत्तम शिशु मित्र के पुरस्कार से सम्मानित किया है। इस प्रसुतिगृह अस्पताल में शिशु मृत्युदर राष्ट्रीय औसत के समक्ष नगण्य ही नहीं, प्रायः शून्य ही माना जाएगा।

मारवाड़ी मेटरनिटी हॉस्पिटल की सफलता ने समाज के कई लोगों को प्रभावित किया। जिसका परिणाम रहा संस्था की एक ओर एक संतान। मारवाड़ी हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर स्व. हरिबक्स जी नन्दलाल जी खाकोलिया द्वारा प्रदत्त भूमि पर आज मारवाड़ी हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर स्थित है। पूर्व संयुक्तमंत्री श्री किशनलाल बीदासरिया ने इस भूदान हेतु एक सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया था। स्व. बेणी प्रसाद शर्मा एवं उनके कई सहयोगियों के नेतृत्व में उपरोक्त भूमि पर बहुमंजिला भवन के निर्माण की आधारशिला रखी गयी एवं निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया। तत्कालीन महामंत्री श्री लोकनाथ मोर, जो वर्तमान में संस्था के अध्यक्ष हैं का पूर्ण सहयोग रहा। इस निर्माण कार्य में चार वर्ष का समय लगा। श्री प्रमोद सराफ, श्री सज्जन जैन एवं अनेकों सहयोगियों के सहनेतृत्व में इस भवन के कार्यों को पूरा किया गया।

गुवाहाटी गोशाला असम का ऐतिहासिक धरोहर

गाय की महत्ता, उसकी सेवा से प्राप्त आशीर्वाद जीवन को सुखमय बनाते हैं। इन्हीं सब बातों से प्रेरणा लेकर श्री गुवाहाटी गोशाला की स्थापना हुई थी। आज श्री गुवाहाटी गोशाला भारत की ऐतिहासिक गोशालाओं में आज भी सर्वोपरि है। गोशाला के वर्तमान मंत्री श्री जयप्रकाश गोयनका के अनुसार सन् 1916 में स्थापित गुवाहाटी पिंजरापोल (वर्तमान में गुवाहाटी गोशाला) की स्थापना के लिये सबसे पहले यहाँ का अग्रवाल समाज आगे आया। भूमिदाताओं में सर्वश्री हुकमीचन्दजी, रामरिखदासजी अजितसरिया (गुवाहाटी), लालचन्दजी कन्हीरामजी चैधरी (कोलकाता), रामलालजी लालचन्दजी गोयनका (गुवाहाटी), हुकमीचन्दजी बशेशरलाल अजितसरिया (गुवाहाटी) प्रमुख थे। उपरोक्त कोलकाता वाले चौधरियों ने मालीगाँव गोशाला की जमीन दी थी यह जानकारी मुझे श्री पुरुषोत्तमजी अजितसरिया से प्राप्त हुई।

इस गोशाला में कुल छोटे-बड़े बछड़े गायें, सांड आदि मिलाकर 1360 गो वंश हैं। 300 गऊएँ बीमार अपंग तथा बृहत गो वंशों की मालीगाँव गोशाला में गोशाला के निजी डाक्टर, तीन कम्पाउन्डरों द्वारा चिकित्सा सेवा भी की जाती है। गोशाला में दुधारु गायों द्वारा 1300 लीटर दूध उत्पादन होता है जो 1/2-1/2 लीटर के कूपनों द्वारा छोटे-छोटे परिवारों में उचित मूल्य पर वितरित किया जाता है।

गोशाला की निजी Water supply तथा पावरफुल जेनेरेटिंग रूम है तथा खेड़-घास आदि लाने के लिये, गोबर ढोने के लिये निजी ट्रकें, ट्रेक्टर, ट्रेलर, गाड़ियाँ आदि हैं। यह सब पूर्ण व्यवस्थित रूप से कमिटि द्वारा संचालित होता है।

बड़ाबाजार लाइब्रेरी

10-1-1, सैयद साली लेन, कोलकाता-700073

पं0 केशवप्रसाद मिश्र ने सन् 1900 ई. में बड़ाबाजार लाइब्रोरी के नाम से कलकत्ता के हिन्दी भाषियों की प्रथम संस्था का बीजारोपण किया एवं इसके प्रथम मंत्री बने। इम्पीरियल लाइब्रेरी (अब नेशनल लाइब्रेरी ) का जन्म तो इसके दो वर्ष बाद हुआ। बड़ाबाजार लाइब्रेरी की स्थापना में उस समय के साहित्यिक दिग्गज पण्डित प्रवर गोविन्द नारायण मिश्र, पं0 छोटूलाल मिश्र, पं0 दुर्गाप्रसाद मिश्र, लक्ष्मीनारायण बर्मन एवं पं0 कालीप्रसाद तिवारी आदि का भरपूर सहयोग था। इसकी स्थापना के अवसर पर बंगाल के लेफ्टीनेंट गवर्नर सर जोह्न वुड बने स्वयं उपस्थित हुए थे एवं हिन्दी प्रेमी बंगाली सर गुरदास बनर्जी एवं जस्टिस शारदा चरण मित्र इसकी साहित्यिक सभाओं में बराबर भाग लेते थे एवं हिन्दी को प्रोत्साहित करते रहते थे।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं महाकवि निराला का भी इस पुस्तकालय से घनिष्ट सम्बन्ध रहा। 1912 इं0 मे हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अखिल भारतीय अधिवेशन इसी के प्रयत्न से कोलकाता में हुआ।

आरंभ में इसकी स्थापना हरीसन रोड (अब महात्मा गांधी रोड) के पारख कोठी के पास के कटरे में की गई एवं कई स्थानों पर स्थानान्तरित होते हुए जब घनश्यामदासजी बिड़ला इसके संरक्षक बने तो उन्होंने अपनी बनाई ब्राह्मण बाड़ी (10-1-1 सैयद साली लेन) का एक भाग पुस्तकालय को निःशुल्क प्रदान कर दिया और कुछ वर्ष पूर्व तो पूरा भवन ही इसे दे दिया है। आडी बांसतल्ला में लाइब्रेरी की शाखा हेतु भी बिड़ला परिवार ने ही काफी बड़ा स्थान इसे निःशुल्क प्रदान कर रखा है जहां विशेषतः उच्चस्तर शिक्षा के पाठ्यक्रम का केन्द्र चलता है। 

विविध साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ सी.ए. एवं कम्पनी सेक्रेटरी जैसे उच्चस्तर शिक्षा के कार्यक्रम तीन स्थानों पर संचालित हो रहे हैं। लगभग 1500 विद्यार्थी इसका लाभ उठा चुके हैं।

इधर के तीन दशकों में आचार्य विष्णुकान्त शास्त्रीजी का पूरा मार्ग दर्शन मिला। पांच वर्ष पूर्व उनके देहावासन के बाद उनकी स्मृति में लाइब्रेरी में एक सभागार भी स्थापित किया गया। पुस्तकालय के रजत, स्वर्ण, कौस्तुभ एवं शताब्दी समारोहों में देश के श्रेष्ठ विद्वान सम्मिलित हुए। समय-समय पर साहित्यिक एवं राष्ट्रीय चेतना के विषयों पर गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। 

लाइब्रेरी में वर्तमान में 25 हजार के लगभग पुस्तकें हैं। इसके 266 आजीवन, 570 साधारण 233 सहायक एवं 4000 के लगभग विद्यार्थी सदस्य हैं। इसका वाचनालय भी पत्र-पत्रिकाओं से समृद्ध हैं।

इसकी वर्तमान कार्यसमिति में विशिष्ट साहित्यिक एवं सेवाभावी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। इनमें प्रमुख हैं सर्वश्री विमल लाठ, डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, नेमचन्द कन्दोई, जुगलकिशोर जैथलिया, महावीर प्रसाद अग्रवाल, जयगोपाल गुप्ता, अशोक गुप्ता, अरुण मल्लावत एवं कुसुम लूंडिया एडवोकेट प्रस्तुति।

श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय

1-सी, मदन मोहन बर्मन स्ट्रीट (1 तल्ला), कोलकाता-700007

संक्षिप्त परिचय:

अपनी साहित्यिक गतिविधियों, अनूठे साहित्यिक प्रकाशनों एवं राष्ट्रीय स्तर के दो पुरस्कारों (सम्मानों) के लिए देश भर में सुप्रसिद्ध श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय की स्थापना सन् 1916 ई. में बालसभा के रुप में वरिष्ठ समाजसेवी एवं स्वतन्त्रता सेनानी श्री राधाकृष्ण नेवटिया ने की एवं दो वर्ष पश्चात् इसका नाम बालसभा से बदलकर कुमारसभा कर दिया। तबसे यह संस्था निरन्तर गतिशील हैं।

1920 के आसपास स्वदेशी आन्दोलन से अनुप्राणित होकर यह संस्था विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, चरखा आन्दोलन एवं राष्ट्रीय शिक्षा की विभिन्न गतिविधियों तथा राष्ट्रीय जागरण के साहित्य प्रकाशन की केन्द्र बनी, साथ ही इसके कार्यकर्ता बालविवाह, मृतकभोज एवं विधवा विवाह निषेध की रुढ़ियों के विरुद्ध भी संघर्ष में आगे रहे। 1928 ई. में ब्रिटिश पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध मिट्टी के मॉडलों का एक प्रदर्शनी लगाई जिसका उद्धघाटन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने किया।

1975 ई. में आपातकाल के विरुद्ध जनजागरण का शंखनाद करते हुए हल्दीघाटी शताब्दी समारोह एवं वीर रस काल सन्ध्या के माध्यम से तानाशाही को ललकारा एवं उससे उत्पन्न कष्टों को कलकार बदलने तक सहा। 1987 ई. में राष्ट्रीय स्तर पर सेवाभावी कार्यकर्ताओं का सम्मान करने हेतु स्वामी विवेकानन्द सेवा सम्मान एवं 1990 ई. में सांस्कृतिक मेधा सम्पन्न व्यक्तियों को सम्मानित करने हेतु डॉ.हेडगंवार प्रज्ञा सम्मान प्रांरभ किये जो लगातार प्रतिवर्ष दिये जाते हैं।

1994 ई. में अपने 75 वर्ष पूरे होने पर कौस्तुभ जयन्ती वर्ष में पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी के एकल काव्य पाठ ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन किया एवं उसी वर्ष स्वदेशी विषयक समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर सहित देश के शीर्ष चिन्तकों ने अपने विचार रखे। इस क्रम में आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री के द्वारा ईशोपनिषद एवं भगवत् गीता पर मासिक प्रवचन का कार्यक्रम प्रांरभ हुआ जो लागातार 6 वर्ष चला एवं प्रवचन पुस्तकाकार भी छपे एवं प्रशंसित हुए।

कुमारसभा ने महापुरुषों के जीवन एवं महत्व की राष्ट्रीय घटनाओं पर संग्रहणीय स्मृतिकायें एवं दर्जनों पुस्तकें भी प्रकाशित की। आज भी यह पुस्तकालय साहित्यिक गतिविधियों के केन्द्र के रुप में देश भर में विख्यात है।

इसमें 22 हजार से अधिक हिन्दी पुस्तकें है एवं सौ के लगभग पत्र पत्रिकाओं से इसका वाचनालय समृद्ध हैं। आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री इससे सदैव जुड़े रहे एवं मार्गदर्शक रहे।

वर्तमान में सर्वश्री जुगलकिशोर जैथलिया, विमल लाठ, डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, महावीर बजाज, नन्दकुमार लढ़ा, अरुण प्रकाश मल्लावत, दाऊलाल कोठारी एवं दुर्गा व्यास प्रभूति कार्यकर्ता के रुप में सक्रिय हैं।

बालिका विद्या मन्दिर, झरिया

बालिका विद्या मंदिर झरिया के इतिहास में श्रीमती काशीबाई पढ़ियार का नाम चिरस्मरणीय रहेगा। इनके द्वारा प्रदत्त जमीन पर इस संस्था का भव्य भवन सर ऊँचा किये खड़ा है। छठे दशक के प्रारंभ में झरिया की श्रीमती काशीबाई ने अपने स्वर्गीय पति रतिलाल नानजी पढ़ियार की पुण्य स्मृति में नारी शिक्षा हेतु दस कट्ठा जमीन लोक शिक्षा समाज को प्रदान की। लोक शिक्षा समाज ने स्थानीय दानी-मानी सज्जनों के आर्थिक सहयोग से इस भूमि पर एक भव्य तिमंजिले भवन का निर्माण पूर्ण कराकर मारवाड़ी सम्मेलन, झरिया को सौंप दिया। मारवाड़ी सम्मेलन ने इस भवन में दिनांक 1.1.1961 से बालिका विद्या मन्दिर का संचालन प्रारंभ किया। कालक्रम से विद्यालय की लोकप्रियता के साथ-साथ छात्राओं की संख्या बढ़ती गई, जिसके कारण उक्त विद्यालय भवन में सुचारू रूप से अध्यापन और पाठ्येत्तर कार्यक्रमों के संचालन में स्थानाभाव की समस्या खलने लगी। 

दिनांक 7.2.2002 को विद्यालय से सटी तीन कट्ठा जमीन श्रीमती तारा देवी पत्नी स्व.श्रवण अग्रवाल से खरीद कर विद्यालय के चाहरदिवारी के भीतर लिया गया। आज उक्त जमीन पर सुन्दर एवं आकर्षक बगीचा बना हुआ है। जिसके चारों ओर तरह-तरह के फूल, पौधे एवं गमले गलाए गये हैं। विगत कई वर्षों से प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त एवं 26 जनवरी के समारोह के अवसर पर उक्त जमीन पर ही झण्डोत्तोंलन का कार्यक्रम संपादित कराया जाता है।

माहेश्वरी पुस्तकालय

माहेश्वरी भवन, 4, शोभाराम बैशाख स्ट्रीट, कोल-7

माहेश्वरी पुस्तकालय की स्थापना 8 अगस्त 1914 ई. को 20 बाँसतल्ला स्ट्रीट में हुई। बड़ाबाजार लाईब्रेरी (1900 ई.) के बाद इस अंचल का यह दूसरा पुस्तकालय प्रारम्भ हुआ। सात वर्ष बाद इसे 4, शोभाराम बैशाख स्ट्रीट में माहेश्वरी सभा भवन में स्थानान्तरित किया गया, जो अभी तक उसी स्थान पर चल रहा है।

इसकी रजत जयन्ती 1943 ई., स्वर्ण जयन्ती 1966 ई., हीरक जयन्ती 1975 ई. व अमृत महोत्सव 1991 ई. में उत्साह पूर्वक मना चुके हैं। इसमें 22 हजार के लगभग पुस्तकों के अलावा बीसों पुरानी पत्रिकाएँ फाइलें भी शोधार्थियों हेतु उपलब्ध हैं।

वर्तमान में सोलह हिन्दी, अंग्रेजी अखबार व पच्चीस पत्रिका पढ़ने हेतु उपलब्ध हैं।

दाऊलाल कोठारी (सभापति), बलदेवदास बाहेती (उप-सभापति), अशोक कुमार सोनी (मंत्री), शिवकुमार बिन्नानी (उप-मंत्री), मदनमोहन कोठारी (कोषाध्यक्ष)।

कार्यकारिणी सदस्य: अरुण कुमार सोनी, आनन्द पचीसिया, संजय कुमार बिन्नानी, मनोज कुमार लाहोटी, मनोज कुमार झँवर, गोपालदास कोठारी।

सदस्य प्रतिनिधि: मनमोहन सोनी, नवरतन झँवर, गोपालदास लाखोटिया, किशन कुमार भंडारी, मदन मोहन कोठारी, लक्ष्मीनारायण सोनी, पदेन मंत्री, नरेन्द्र कुमार करनानी, सभा प्रतिनिधि।

सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय

186, चित्तरंजन एवंन्यू, कोलकाता-700007

सेठ सूरजमल जालान स्मृति भवन के अन्तर्गत सेठ सूरजमल जालान ट्रस्ट द्वारा संचालित सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय की स्थापना सेठ मोहनलाल जालान द्वारा सन् 1941 ई. में की गयी थी। आज यह कोलकाता का ही नहीं अपितु पूर्वी भारत के हिन्दी एवं संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठतम पुस्तकालयों में से एक है। पुस्तकालय में शोधकर्ताओं के लिए विशेष व्यवस्था है। वाचनालय में बाल-विभाग की भी सुव्यवस्था है, जिसमें सत्-साहित्य के द्वारा बालकों के आदर्श चरित्र निर्माण का प्रयास किया जाता है।

पुस्तकालय में संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी, अंग्रेजी तथा हस्तलिखित कुल 31870 पुस्तकें हैं। दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक एवं त्रैमासिक कुल 75 पत्र-पत्रिकाएँ नियमित आती हैं। साधारण एवं आजीवन सदस्यों की कुल संख्या 1222 हैं।

पुस्तकालय कार्यकारिणी समिति-श्री तुलाराम जालान-अध्यक्ष, श्री सागरमल गुप्त-मंत्री, श्री बजरंग प्रसाद जालान-सदस्य, श्री जुगलकिशोर जैथलिया-सदस्य, डॉ.प्रेमशंकर त्रिपाठी-सदस्य, श्री विश्वम्भर नेवर-सदस्य, श्री अरुण प्रकाश मल्लावत-सदस्य, श्री विधुशेखर शास्त्री-सदस्य, एवं श्रीमती दुर्गा व्यास-सदस्य।

लगभग 60 से अधिक वर्षों से पुस्तकालय के तत्वावधान में तुलसी जयंती समारोह प्रति वर्ष भव्य रुप से संपन्न होता रहा है। इस आयोजन को देश के लगभग सभी शीर्षस्थ विद्वानों ने संबोधित किया है।


साभार: श्री शम्भु चौधरी http://samajvikas.blogspot.in/2010/12/blog-post.html