Wednesday, October 17, 2018

सूरत में अग्रसेन जयंती महोत्सव में गरबा नृत्य



साभार : दैनिक भास्कर 

Sunday, October 14, 2018

SAHU TELI VAISHYA HISTORY - साहू तेली वैश्य समाज का इतिहास

विद्धान अभी तक यह मानते हैं कि सिंधु सभ्यता काल जिसे पूर्व वैदिक काल भी कहा जाता है. सप्त सैंघव प्रदेश ( पुराना पंजाब, जम्मू कश्मीर एवं अफगानिस्थात का क्षेत्र) में, जो मनुष्य थे वे त्वचा रंग के आधार पर दो वर्ग में विभाजित थे । श्वेत रंग वाले जो घाटी के विजेता थे आर्य और काले रंग वाले जो पराजित हुये थे दास कहलाये । विद्वान आर्य का अर्थ श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि वे युद्ध के विजेता थे । ये मूलत: पशु पालक ही थे । कालांतर में इन दोनों वर्गो में रक्त सम्मिश्रण भी हुआ और वृहत्तर समाज वर्णे मे बंटते गया, जा संघर्ष की जीविविषा है । जिन्होंने पराजय स्वीकार कर लिशे और विजेता जाति की रिति-निती अपना लिये वे आर्यो के चतुर्वर्णीय व्यवस्था में शामिल हो गये । जिस पराजित समूह ने आर्यें की व्यवस्था स्वीकार नीं किये वे दास, दस्यु, दैत्य, असुर, निषाद इत्यादि कहलाये । तब तक जाति नहीं बनी थी और वर्ण स्थिर नहीं था । 

महाभारत में तुलाधर नामक तत्वादर्शी का उल्लेख लिता है जो तेल व्यवसायी थे किन्तु इन्हें तेली न कहकर वैशस कहा गया, अर्थात तब तक (ईसा पूर्व 3 री - 4 थी सदी) तेली जाति नहीं बनी थी । वाल्मिकी के रमकथा में भी तेली जाति का कोई उल्लेख नहीं है तथा अन्य वैदिक साहित्यों में भी तेल पेरने वाली तेली जाति का प्रय्तक्ष प्रसंग हीं मिलता है । पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में विष्णु गुप्त नाम तेल व्यपारी की विद्धता का उल्लेख है ।

आर्य सभ्यता के चतुर्वर्णीय व्यवस्था में ब्राम्हण, और क्षत्रिय के बीच श्रेष्ठता के लिये स्पर्धा थी । वैश्य के उपर कृषि, पशुपालन एवं व्यपार अर्थात उत्पाद का वितरण का दायित्व था, इन पर यज्ञ एवं दान की अनिवार्यता भी दी गई । जिससे समाज मैं अशांति थी। तब भगवान महावीर आर्य, जो क्षत्रिय थे, जिन्होंने यज्ञों में होने वाले असंख्य पशुयों की हत्या का विरोध किया, साथ ही जबरदस्ती दान की व्यवस्था का विरोध कर अपरिगृह ि सिद्धांत प्रतिपादित किया । इसके बाद शक्य मुनि गौतम बुद्ध हुये, जिन्होंने भगवान महावीरके सिद्धांतो को आगे बढाते हुए, वर्णगत/जातिगत/लिंगगत भेदभाव का विरोध किया । गौतम बुद्ध भी क्षत्रिय थे और उन्हे, क्षकत्रय, वैश्य एवं शुद्र वर्ण का सहज समर्थन मिला । इसी दौरान सिंधु क्षेत्र में ग्रिक आक्रमण हुआ और अतं में चंद्रगुप्त मौर्य मगध के शासक बने। इनके वंशज आशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया , जिसमें एक लाख मनुष्य मारे गये तथा डेढ लाख मनुष्य घायल हुए । युद्ध के विभत्स दृश्य को देखकर सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ और वे बुद्ध धर्म के अनुयायी हो गये थे । महावीर एवं गौतम बुध के कारण प्रचलित चतुर्वर्णीय व्यवस्था की श्रेणी बद्धता में परिवर्तन हुआ । नवीन व्यवस्था में ब्राह्मण के स्थान पर क्षत्रिय श्रैष्ठतम हो गये और ब्राम्हण, वैश्य एवं शुद्र समान स्थरपर आ गये । फलस्वरूप वर्ण मे परिवर्तन तीव्र हो गया । ईसा के 175 वर्ष पूर्व मग के अंतिम सम्राट मौर्य राजा वृहदरथ को मारकर, उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग राजा बने जो ब्राह्मण थै । माना जाता है पुष्पमित्र शुंग के काल में ही किसी पंउीत ने मनुस्मृति की रचना की थी । शुंग वंश का 150 वर्षै में ही पतन हो जाने से मनुस्मृति का प्रभाव मगध तक ही रहा । 

ईसा के प्रथम सदी के प्राप्त शिला लेखों में तेलियों के श्रेणियों / संघों (गिल्ड्स) का उल्लेख मिलता है । ईसा पश्चात महान गुप्त वंश का उदय हुआ। जिसने लगभग 500 वर्ष तक संपुर्ण भारत को अधिपत्य में रखा । इतिहास कारों ने गुप्त वंश को वैश्य वर्ण का माना है । राजा समुद्रगुप्त एवं हर्षवर्धन के काल को साहित्य एवं कला के विकास के लिए स्वर्णिम युग कहा जाता है , गुप्त काल में पुराणों एवं स्मृतियों रचना हुई । गुप्त वंश के राजा बालादित्य गुप्त के काल में नालंदस विश्वविद्यालय के प्रवेश वार पर भव्य स्तूप का निर्माण हुआ, चीनी यात्री व्हेनसांग ने स्तूप के निर्माता बालादित्य को तेलाधक वंश का बताया है । तिहासकार ओमेली एवं जेम्स ने गुप्त वंश को तेली होने का संकेत किया है । इसी के आधार पर उत्तर भारत का तेली समाज गुप्त वंश मानते हुये अपने ध्ज में गुप्तों के राज चिन्ह गरूढ को स्थापित कर लिया । गुप्त काल में सनातन, बौद्ध एवं जैन धर्मालोंबियो समान दर्जा प्राप्त था । इसी काल में 05 वी सदी में अहिंसा पर अधिक जोर देते हुए, हल चलान तथा तेल पेरने को हिंसक कार्यवाही माना जाने लगा, जिससे वैश्य वर्ण में विभाजन प्रारंभ हुवा । हल चलाकर तिलहन उत्पन्न करने वाले तेली जाति को स्मृतिकारों ने शुद्र वर्ण कहा । इतना ही नहीं, तिलहन के दाने में जीव होने तथा तेल पेरने कोभी हिंसक कार्यवाही कहा गया । गुजरात - महाराष्ट्र-राजस्थान का क्षेत्र जहां सर्वाधिक तेल उत्पादन होता था, घांची के नामसे जाना जाता था । जैन मुनियों के चतुर्मास काल में घानी उद्योग को बंद रखने का दबाव बनाय गया फलस्वरूप तेलियों एवं शासकों के मध्य संघर्ष हुआ । जिन तेलियों ने घानी उद्योग को बचाने शस्त्र उछाया वे घांची क्षत्रिय कहलाये गये । जिन्होंने केवल तेल व्यवसाय किया वे तेली वैश्य, तथा जिन्होंने सुगंधित तल का व्यापार किया वे मोढ बनिया कहलाये । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पूर्वज मोढ बनिया थे । जिन्होंने हल चलाकर तिलहन उत्पादन किया । तेली जाती की उत्पत्ति का वर्णन विष्णुधर्म सूत्र, वैखानस स्मार्तसूत्र, शंख एवं सुमंतू मै है । 

साभार: teliindia.com/news.php

Tuesday, October 9, 2018

सूरत में महाराजा अग्रसेन जयंती पर फैशन शो


साभार: दैनिक भास्कर 

अग्रवाल गोत्र परंपरा



साभार: मरुधर के स्वर, पत्रिका, जमशेदपुर 

अग्रसेन जयंती का शुभारम्भ कबसे हुआ?






साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका, जमशेदपुर 

अग्रवाल झंडा गान






साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका

अग्र मंत्र


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

AGROHA - पुण्य धाम अग्रोहा





साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

अग्रोहा के जलने की कथा


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

SHREE AGRASEN CHALISA - श्री अग्रसेन चालीसा


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

महाराजा अग्रसेन का समाज वाद


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

अग्रसेन के वैश्य कुल का इतहास

साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

गर्ग गोत्र के जनक

साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

अग्रसेन जी पर जानकारी


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

माता लक्ष्मी का वरदान



साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

अग्रोहा में ताम्बे का तालाब





साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका

अग्रोहा का विध्वंश और समरजीत



साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

सूर्यवंशी अग्रवाल वैश्य समाज की विशेषताए


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका

अग्रसेन - अग्रोहा - अग्रवाल





साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 







Monday, October 8, 2018

BHAI JI HANUMAN PRASAD PODDAR JI

भाईजी और भारतरत्न (जन्म 6 अक्टूबर)
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इस राष्ट्र में असङ्ख्य "भाई" हुए हैं। यथा : बल्लभ भाई, केशुभाई, धीरूभाई और अंत में में नरेंद्र "भाई"।

"भाई" की सही परिभाषा राष्ट्र के भीतर के ही राष्ट्र "महाराष्ट्र" से अधिक बेहतर कौन जान सकता है।

इतना ही नहीं, "मुम्बई" महाराष्ट्र की राजधानी और राष्ट्र की आर्थिक राजधानी होने के साथ ही "भाइयों" की भी राजधानी है!

बहरहाल, बहरक़ैफ़।

"भाई" असङ्ख्य हुए, किन्तु "भाईजी" सिर्फ एक ही हुए हैं।

वे हैं : "श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार"।

निस्संदेह, वे "भाई" ही हैं सनातन शास्त्र परंपरा के। किसी भी रूप में शास्त्र परिशीलन में संलग्न लोग उन्हें आदर से "भाईजी" का संबोधन देते हैं।

"भाईजी" ने कभी किसी उपाधि या सम्मान का लोभ नहीं किया। उनके लिए सब संगीसाथियों द्वारा दिया गया संबोधन की सबसे बड़ा रहा।

इस संबंध में एक रोज़ एक अनोखी घटना घटी!

ये घटना उन्नीस सौ साठ के आसपास की है।

गीतावाटिका, गोरखपुर के पते पर एक पत्र आया। पत्र का मौजूं कुछ यूँ था :

"श्रीमान हनुमानप्रसाद पोद्दार जी, ये पत्र आपको सूचित करने हेतु है। आपके उत्तर प्रदेश के निवर्तमान मुख्यमंत्री श्री गोविन्द बल्लभ पन्त आपसे भेंट करने के आशय से गोरखपुर आना चाहते हैं। आप अपने उपलब्ध समय के अनुसार दिन दिनाङ्क सूचित कर दीजिये ताकि आप दोनों ही को कोई असुविधा न हो।"

"भाईजी" दिल के धनी थे। वे सामान्य जनों से यों ही घंटों भेंट करते थे। किसी राजनेता के लिए भी कोई रुकावट न थी। उन्होंने लिख भेजा : "जब पन्त जी पास समय हो, पधारें। वाटिका में स्वागत है उनका।"

पन्त जी आये। और बस खो गए उस विराट व्यक्तित्व के सम्मुख!

उनदिनों, गोरखपुर रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर की दूरी पर लगभग छः सात एकड़ भूमि में फैला एक लघु वनस्थल हुआ करता था। उसका नाम था "गीतावाटिका"।

यही था "भाईजी" का निवास और पन्त जी का "डेस्टिनेशन"!

पन्त जी ने चारों ओर से आम्र, अमरुद, लीची, कदली आदि के वृक्षों से घिरी एक सुन्दर, सुव्यवस्थित वाटिका को देखा। वाटिका के मध्य में बने भवन को भी देखा।

इस भवन में ही पत्रिका "कल्याण" और "कल्याण-कल्पतरु" का प्रधान कार्यालय है। कार्यालय में टंगी लालटेनों को देखकर पन्त जी बोले, भाईजी, क्या यहां विद्युत् प्रकाश नहीं पहुंचा है?

"भाईजी" ने विनम्रता से कहा, सम्पूर्ण अवध प्रान्त को विद्युत् से प्रकाशित करने का कार्य चल रहा है। यत्रतत्र प्रकाश पहुंचा भी था, किन्तु सर्वत्र नहीं।

इस भवन के पीछे अनेक कुटियाएँ बनी थीं। जिनमें संपादक विभाग के अनेक लोग व साधकगण रहते थे।

चतुर्दिक सुन्दर वृक्ष, लताएं, पुष्प, कोकिलादिक का गायन!

कुलमिला कर सर्वत्र पूर्ण सात्त्विक वातावरण को देख पन्त जी में परिहास में कहा, भाईजी, इनमें से एक कुटीर मेरे लिए भी शेष रखिये, मैं जल्द अपने भर से मुक्त होकर आऊंगा।

अंततोगत्वा, पन्त जी जिस कार्य से आये थे, उसके लिए "भाईजी" को लेकर उनके कार्यालय में जा बैठे।

"भाईजी" को एक कागज़ देते हुए बोले, हम इस पत्र के संबंध में आपसे स्वीकृति लेने आये हैं।

"भाईजी" ने पत्र खोला तो मालूम हुआ कि ये तो "भारतरत्न" की उपाधि का प्रस्ताव है। एतदर्थ "भाईजी" की अनुमति मांगी गयी है।

"भाईजी" असहमत हो गए। बोले, ये उपाधि मेरे लिए व्याधि है। पन्त जी, आप मेरे सच्चे हितैषी हैं न, आप मुझे इस व्याधि से बचाएं।

पन्त जी में कहा, भाईजी, ये आग्रह न केवल मेरा है बल्कि राजेंद्र बाबू ने विशेष तौर पर आपको सम्मानित करना चाहा है। आपको उनके आग्रह को मनाना ही चाहिए।

किन्तु "भाईजी" निश्चय कर चुके थे। बोले, राजेंद्र बाबू के प्रति मेरे मन में बड़ा आदरभाव है किंतु उनका यह अनुरोध मैं स्वीकार नहीं कर पाऊंगा। यह उपाधि मेरी भावना के प्रतिकूल है।

"भाईजी" के हृदय की व्यथा देख, पन्त जी बोले, अवश्य आग्रह नहीं करेंगे। इसके एवज में आपसे एक प्रसाद लेंगे।

"भाईजी" ने प्रश्नवाचक मुद्रा से देखा।

पन्त जी कहते रहे, भाईजी, आप अपनी लेखनी मुझे देने की कृपा करें। आपका यह पेन ही मुझे प्रसाद के रूप में चाहिए।

"भाईजी" मंदहास के साथ बोले, हां हां ले जाइए, इसमें भी भला पूछना क्या!

पन्त जी चले गए, उनके साथ वही हुआ : "आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास।" पुरस्कार देने आये थे, प्रसाद लेकर गये।

उन्होंने दिल्ली पहुँचकर संबंधित कागज़ी कार्यवाही की और "भाईजी" को एक पत्र लिखा :

"भाईजी! आप इतने महान हैं, इतने ऊंचे महामानव हैं कि भारतवर्ष क्या, सारी दुनिया को इसके लिए गर्व होना चाहिए। मैं आपके स्वरूप को, महत्त्व को न समझकर ही आपको "भारतरत्न" की उपाधि देकर सम्मानित करना चाहता था। आपने इसे स्वीकार नहीं किया, यह बहुत अच्छा किया। आप इस उपाधि से बहुत-बहुत ऊंचे स्तर के हैं। मैं तो आपको हृदय से नमस्कार करता हूँ।"

भाईजी के अनगिनत प्रसङ्ग रसमयी है। उनकी शख्सियत ही रसपूर्ण थी। न मोह, न लोभ, न लालच।

यदि आपको भी रस आया हो तो शनै: शनै: आप लोगों के साथ साझा करूँगा। अभी तो ये शुरुआत है। उनके संस्मरणों से अटा पड़ा है, मेरे दिल का एक कोना!

अस्तु।

प्रखर अग्रवाल जी की फेसबुक वाल से साभार: 
साभार-योगी अनुराग

SHIPRA GOYAL -शिप्रा गोयल, प्रसिद्द गायिका

Shipra Goyal is an Indian singer, popular for her songs like Ishq Bulava, Ungli, Tutti Bole Wedding Di, Yadaan Teriyaan, Lovely VS PU, Mainu Ishq Lagaa, Paro and many more.

Though her paternal roots are in Mansa (Punjab) She was born and brought up in Delhi and belongs to a musical family. Her parents, Subhash and Anju Goyal are renowned Singers from Delhi. She started singing at a very early age and gathered various experiences while attending her parents live shows and recordings. In her school life she was among bright students, Not only in Academics but in music competitions also. Topped her school in 12th standard Board Exams (Arts) and participated in her 1st music competition when studying in 6th standard, for this she won 1st prize on State-level.


Career

All the experience she gained performing in competitions, helped her in doing her first show when she was studying in 12th standard. A regular name in Delhi's music circle, thought of shifting to Mumbai to pursue her career in Bollywood Playback singing when she turned 21 years old. After completing her graduation in classical music from Hindu College ( Delhi ) she then moved to Mumbai in 2013, and soon made her debut with Vishal-Shekhar's 'Ishq Bulaava' since then she has sung many songs in Bollywood and Pollywood.

Songs

SongFilmComposerCo Singer/sAkh Jatti Di Punjabi single Nick Dhammu Veet Baljit

Angreji Wali Madam Punjabi single Dr. Zeus Kulwinder Billa

Ishq Bulava Hasee Toh Phasee Vishal-Shekhar Sanam Puri

Tutti Bole Wedding Di Welcome Back (film) Meet Bros Meet Bros

Paro Pyaar Ka Punchnama 2 Hitesh Sonik Dev Negi

Ungli Pe Nachalein Ungli Aslam Key Dev Negi

Crazy Cukkad Crazy Cukkad Family Sidhartha-Suhaas Shahid Malya

Yeh Dil Jaane Na Crazy Cukkad Family Sidhartha-Suhaas Ankit Dayal

Lovely Vs PU Punjabi Single DJ Flow Ravinder Grewal

Yaadaan Teriyaan Hero (2015 Hindi film) Jassi Katyal Dev Negi

Yadaan Teriyaan Version Hero (2015 Hindi film) Arjuna Harjai Arjuna Harjai

Mainu Ishq Lagaa Shareek Jaidev Kumar Shaukat Ali, Sanj

Pari Punjabi Single DJ Flow Ravinder Grewal

Vela Aa Gaya Hai Chaar Sahibzaade Jaidev Kumar Jaspinder Narula

Goreyan Nu Daffa Karo Goreyan Nu Daffa Karo Jatinder Shah Amrinder Gill

Hatthan Vich Female Version Mr & Mrs 420 Jaidev Kumar NA

Puli Puli Puli (2015 film) Devi Sri Prasad Vijay Prakash

Bullet Nanna Care of Footpath 2 Kishan Shrikanth Girik Aman

Ki Kara One Night Stand Vivek Kar

Awards and nominations

Nominated in the category of Best Duet Vocalist for Lovely Vs PU alongside singer Ravinder Grewal ( PTC Punjab Music Awards 2105 

Nominated in the category of Best Female Singer for Hatthan VIch Luk Luk Ke ( Mirchi Music Awards Punjabi 2014 ) 

Nominated in the category of Most Popular Song Of The Year for Goreyan Nu Daffa Karo ( PTC Punjabi Film Awards 2015 )

Nominated in the category of Best Female Playback Singer for Mainu Ishq Lagga ( Mirchi Music Awards Punjabi 2015 )

Nominated in the category of Best Female Playback Singer for Mainu Ishq Lagga ( PTC Punjabi Film Awards 2016 )

BHAVNA GUPTA - मिसेज इंडिया भावना गुप्ता


साभार: नवभारत समाचारपत्र, नागपुर 

Saturday, October 6, 2018

मालदीव में महाराजा अग्रसेन पर डाक टिकट


साभार: नवभारत टाइम्स 

PORWAL VAISHYA - पोरवाल वैश्य

जांगडा पोरवाल समाज की उत्पत्ति

गौरी शंकर हीराचंद ओझा (इण्डियन एक्टीक्वेरी, जिल्द 40 पृष्ठ क्र.28) के अनुसार आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।

जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। समय-समय पर उन्होंने अपने शौर्य गुण के आधार पर जंग में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और मरते दम तक भी युद्ध भूमि में डटे रहते थे। अपने इसी गुण के कारण ये जांगडा पोरवाल (जंग में डटे रहने वाले पोरवाल) कहलाये। नौवीं और दसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर हुए विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिये एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। दिल्ली में रहनेवाले पोरवाल “पुरवाल”कहलाये जबकि अयोध्या के आस-पास रहने वाले “पुरवार”कहलाये। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गये। यहां ये पोरवाल व्यवसाय /व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा। और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाये। वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 3 लाख 46 हजार (लगभग) है।

आमद पोरवाल कहलाने का कारण

इतिहासग्रंथो से ज्ञात होता है कि रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमदकहलाता था। 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में आमदगढ़ पर चन्द्रावतों का अधिकारथा। बाद में रामपुरा चन्द्रावतों का प्रमुखगढ़ बन गया। धीरे-धीरे न केवलचन्द्रावतों का राज्य ही समाप्त हो गया अपितु आमदगढ़ भी अपना वैभव खो बैठा।इसी आमदगढ़ किले में जांगडा पोरवालों के पूर्वज काफी अधिक संख्या में रहतेथे। जो आमदगढ़ का महत्व नष्ट होने के साथ ही दशपुर क्षेत्र के विभिन्नसुविधापूर्ण स्थानों में जाकर बसते रहे। कभी श्रेष्ठीवर्ग में प्रमुख मानाजाने वाला सुख सम्पन्न पोरवाल समाज कालांतर में पराभव (दरिद्रता) कीनिम्नतम् सीमा तक जा पहुंचा, अशिक्षा, धर्मभीरुता और प्राचीन रुढ़ियों कीइसके पराभव में प्रमुख भूमिका रही। कृषि और सामान्य व्यापार व्यवसाय केमाध्यम से इस समाज ने परिश्रमपूर्वक अपनी विशिष्ठ पहचान पुन: कायम की।किन्तु आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवालकहलाते है ।

गौत्रों का निर्माण

श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगायी जाने वाली 24 गोत्रें किसीन किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल वैश्य अपने- अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाये रखने के लिये इन्होंने अपनेउपनाम (अटके) रख लिये जो आगे चलकर गोत्र कहलाए। किसी समूह विशेष में जोपोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। पोरवालसमाज के जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्षथे वे मेहता कहलाने लगे। यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर परजो लोग अगुवाई (नेतृत्व) करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा कापूरा-पूरा ध्यान रखते वे संघवी कहे जाने लगे। मुक्त हस्त से दान देने वालेपरिवार दानगढ़ कहलाये। असामियों से लेन-देन करनेवाले, वाणिज्य व्यवसाय मेंचतुर, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया और धनवाले धनोतिया पुकारेजाने लगे। कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, राजा पुरु के वंशज्पोरवाल और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए। कुछगौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे उदिया-अंतरवेदउदिया(यमुना तट पर), भैसरोड़गढ़(भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, मंडावलमें मण्डवारिया, मजावद में मुजावदिया, मांदल में मांदलिया, नभेपुर केनभेपुरिया, आदि।

श्री जांगडा पोरवाल समाज की 24 गोत्र

सेठिया, काला, मुजावदिया, चौधरी, मेहता, धनोतिया, संघवी, दानगढ़, मांदलिया, घाटिया, मुन्या, घरिया, रत्नावत, फरक्या, वेद, खरडिया, मण्डवारिया, उदिया, कामरिया, डबकरा, भैसोटा, भूत, नभेपुरिया, श्रीखंडिया

भेरुजी

प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वाराकभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गयी थी। स्थान का चयन पवित्र स्थान के रुपमें अधिकांश नदी के किनारे, बावड़ी में, कुआं किनारे, टेकरी या पहाड़ी परकिया गया। प्रत्येक परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित भेरुजी की वर्षमें कम से कम एक बार वैशाख मास की पूर्णिमा को सपरिवार पूजा करता है।मांगलिक अवसरों पर भी भेरुजी को बुलावा परिणय पाती के रुप में भेजा जाताहै, उनकी पूजा अर्चना करना आवश्यक समझा जाता है। भेरुजी के पूजन पर मालवाकी खास प्रसादी दाल-बाफले, लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।भेरुजी को भगवान शंकर का अंशावतार माना जाता है यह शंकरजी का रुद्रावतारहै इन्हें कुलदेवता भी कहा जाता है। जांगडा पोरवाल समाज की कुलदेवीअम्बिकाजी (महाशक्ति दुर्गा) को माना जाता है।

श्री जांगडा पोरवाल समाज के 24 गोत्रों के भेरुजी स्थान

मांदलिया- अचारिया – कचारिया (आलोट-ताल के पास)

कराड़िया (तहसील आलोट)

रुनिजा

पीपल बाग, मेलखेड़ा

बरसी-करसी, मंडावल

सेठिया- आवर – पगारिया (झालावाड़)

नाहरगढ़

घसोई जंगल में

विक्रमपुर (विक्रमगढ़ आलोट)

चारभुजा मंदिर दलावदा (सीतामऊ लदूना रोड)

काला- रतनजी बाग नाहरगढ़

पचांयत भवन, खड़ावदा

बड़ावदा (खाचरौद)

मुजावदिया- जमुनियाशंकर (गुंदी आलोट)

कराड़िया (आलोट)

मेलखेड़ा

रामपुरा

अचारिया, कचारिया, मंडावल

चौधरी – खड़ावदा, गरोठ

रामपुरा, ताल के पास

डराड़े-बराड़े (खात्याखेड़ी)

आवर पगारिया (झालावाड़)

मेहता- गरोठ बावड़ी में, रुनिजा

धनोतिया- घसोई जंगल में

कबीर बाड़ी रामपुरा

ताल बसई

खेजड़िया

संघवी- खड़ावदा (पंचायत भवन)

दानगढ़- आवरा (चंदवासा के पास)

बुच बेचला (रामपुरा)

घाटिया- लदूना रोड़ सीतामऊ

मुन्या- गरोठ बावड़ी में

घरिया- बरसी-करसी (महिदपुर रोड़)

मंडावल (आलोट)

रत्नावत – पंचपहाड़, भैसोदामंडी

सावन (भादवामाता रोड)

बरखेड़ा पंथ

फ़रक्या- पड़दा (मनासा रोड)

बरखेड़ा गंगासा (खड़ावदा रोड)

घसोई जंगल में

बड़ागांव (नागदा)

वेद- जन्नोद (रामपुरा के पास)

साठखेड़ा

खर्ड़िया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

मण्डवारिया- कबीर बाड़ी रामपुरा

तालाब के किनारे पावटी

दोवरे-पैवर (संजीत)

उदिया- जन्नोद (रामपुरा के पास)

कामरिया- मंडावल (तह. आलोट)

जन्नोद (रामपुरा के पास)

डबकरा- अराडे-बराडे (खात्याखेड़ी, सुवासरा रोड)

सावन, चंदवासा, रुनिजा

भैसोटा- बरसी-करती (महिदपुर रोड के पास)

मंडावल (तह. आलोट)

भूत- गरोठ बावड़ी में

रुनिजा – घसोई

नभेपुरिया – वानियाखेड़ी, (खड़ावदा के पास)

श्रीखंडिया- इन्दौर सेठजी का बाग

श्री जांगडा पोरवाल समाज में प्रचलित उपाधियाँ (पदवियाँ)

पदवी – वास्तविक गोत्र

चौधरी – मांदलिया, काला, धनोतिया, डबकरा, सेठिया, चौधरी या अन्य

मोदी – काला, धनोतिया, डबकरा, दानगढ़

मरच्या – उदिया

कोठारी – मांदलिया, सेठिया या अन्य

संघवी – काला, संघवी

बटवाल – वेद

मिठा – मांदलिया

समाज के प्रति हमारा उत्तरदायित्व

हमजो कुछ भी हैं और जो कुछ भी आगे बनेंगे वह समाज के कारण ही बनेंगे। हमारेये विद्यालय और जीवन की व्यावहारिक शिक्षा समाज के कारण ही हमें प्राप्तहैं। इसलिये हमें धर्म पालना चाहिए अर्थात् अपने कर्त्तव्यों का पालन करनाचाहिए। समाज के हम पर तीन ॠण माने गये हैं-

देवॠण – धरती, वायु, आकाश, अग्नि और जल आदि तत्व देवों की कृपा से ही मिले हैं।

ॠषिॠण – विद्या, ज्ञान और संस्कार ॠषिमुनियों और गुरुजनों की देन हैं।

पितृॠण – यह शरीर, मन बुद्धि अपने पिता की देन हैं।

अतः परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों के पालन से ही इन ॠणों से मुक्त हो सकते हैं।

पोरवाल समाज के महापुरुष

राजा टोडरमल पोरवाल (सन् 1601 से 1666 ई.)

टोडरमल का जन्म चैत्र सुदी नवमी बुधवार संवत् 1658 वि. (सन् 1601, मार्च 18) को बूँदी के एक पोरवाल वैश्य परिवार मे हुआ था। बाल्यकाल से वह हष्टपुष्ट, गौरवर्ण युक्त बालक अत्यन्त प्रतिभाशाली प्रतीत होता था। धर्म के प्रती उसका अनुराग प्रारंभ से ही था। मस्तक पर वह वैष्णव तिलक लगया करता था।

युवावस्था में टोडरमल ने अपने पिता के लेन-देन के कार्य एवं व्यवसाय में सहयोग देते हुए अपने बुद्धि चातुर्य एवं व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया । प्रतिभा सम्पन्न पुत्र को पिता ने बूँदी राज्य की सेवा में लगा दिया । अपनी योग्यता और परिश्रम से थोड़े ही दिनों में टोडरमल ने बूँदी राज्य के एक ईमानदार , परिश्रमी और कुशल कर्मचारी के रुप में तरक्की करते हुए अच्छा यश अर्जित कर लिया।

उस समय मुगल सम्राट जहाँगीर शासन कर रहा था। टोडरमल की योग्यता और प्रतिभा को देखकर मुगल शासन के अधिकारियों ने उसे पटवारी के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही काल में टोडरमल की बुद्धिमत्ता , कार्यकुशलता, पराक्रम और ईमानदारी की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वह तेजी से उन्नति करने लगा।

सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का स्वामी बना। 1639 ई. में शाहजहाँ ने टोडरमल के श्रेष्ठ गुणों और उसकी स्वामी भक्ति से प्रभावित होकर उसे राय की उपाधि प्रदान की तथा सरकार सरहिंद की दीवानी, अमीरी और फौजदारी के कार्य पर उसे नियुक्त कर दिया। टोडरमल ने सरहिंद में अपनी प्रशासनिक कुशलता का अच्छा परिचय दिया जिसके कारण अगले ही वर्ष उसे लखी जंगल की फौजदारी भी प्रदान कर दी गई । अपने शासन के पन्द्रहवें वर्ष में शाहजहाँ ने राय टोडरमल पोरवाल को पुन: पुरस्कृत किया तथा खिलअत, घोड़ा और हाथी सहर्ष प्रदान किये । 16 वें वर्ष में राय टोडरमल एक हजारी का मनसबदार बन गया। मनसब के अनुरुप से जागीर भी प्राप्त हुई। 19वें वर्ष में उसके मनसब में पाँच सदी 200 सवारों की वृद्धि कर दी गई । 20वें वर्ष में उसके मनसब में पुन: वृद्धि हुई तथा उसे ताल्लुका सरकार दिपालपुर परगना जालन्धर और सुल्तानपुर का क्षेत्र मनसब की जागीर में प्राप्त हुए । उसने अपने मनसब के जागीरी क्षेत्र का अच्छा प्रबन्ध किया जिससे राजस्व प्राप्ति में काफी अभिवृद्धि हो गई ।

राय टोडरमल निरन्तर उन्नति करते हुए बादशाह शाहजहाँ का योग्य अधिकारी तथा अतिविश्वस्त मनसबदार बन चुका था । 21वें वर्ष में उसे राजा की उपाधि और 2 हजारी 2हजार सवार दो अस्पा, तीन अस्पा की मनसब में वृद्धि प्रदान की गई । राजा की पदवी और उच्च मनसब प्राप्त होने से राजा टोडरमल पोरवाल अब मुगल सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी बन गया था। 23वें वर्ष में राजा टोडरमल को डंका प्राप्त हुआ।

सन् 1655 में राजा टोडरमल गया। जहाँ उसका एक परममित्र बालसखा धन्नाशाह पोरवाल रहता था। धन्नाशाह एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। आतिथ्य सेवा में वह सदैव अग्रणी रहता था। बूँदी पधारने वाले राजा एवं मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी उसका आतिथ्य अवश्य ग्रहण करते थे। बूँदी नरेश धन्नाशाह की हवेली पधारते थे इससे उसके मानसम्मान में काफी वृद्धि हो चुकी थी। उसकी रत्ना नामक एक अत्यन्त रुपवती, गुणसम्पन्न सुशील कन्या थी। यही उसकी इकलौती संतान थी। विवाह योग्य हो जाने से धन्नाशाह ने अपने समान ही एक धनाढ्य पोरवाल श्रेष्ठि के पुत्र से उसकी सगाई कर दी।

भाग्य ने पलटा खाया और सगाई के थोड़े ही दिन पश्चात् धन्नाशाह की अकाल मृत्यु हो गई । दुर्भाग्य से धन्नाशाह की मृत्यु के बाद लक्ष्मी उसके घर से रुठ गई जिससे एक सुसम्पन्न, धनाढ्य प्रतिष्ठित परिवार विपन्नावस्था को प्राप्त हो गया। धन्नाशाह की विधवा के लिए यह अत्यन्त दु:खमय था। गरीबी की स्थिति और युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उसे रात दिन सताया करती थी । ऐसे ही समय अपने पति के बालसखा राजा टोडरमल पोरवाल के बूँदी आगमन का समाचार पाकर उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ।

एक व्यक्ति के साथ धन्नाशाह की विधवा ने एक थाली मे पानी का कलश रखकर राजा टोडरमल के स्वागत हेतू भिजवाया। अपने धनाढ्य मित्र की ओर से इस प्रकार के स्वागत से वह आश्चर्यचकित रह गया। पूछताछ करने पर टोडरमल को अपने मित्र धन्नाशाह की मृत्यु उसके परिवार के दुर्भाग्य और विपन्नता की बात ज्ञात हुई, इससे उसे अत्यन्त दु:ख हुआ । वह धन्नाशाह की हवेली गया और मित्र की विधवा से मिला। धन्नाशाह की विधवा ने अपनी करुण गाथा और पुत्री रत्ना के विवाह की चिन्ता से राजा टोडरमल को अवगत कराया।

अपने परममित्र सम्मानित धनाढ्य श्रेष्ठि धन्नाशाह की विधवा से सारी बातें सुनकर उसे अत्यन्त दु:ख हुआ। उसने उसी समय धन्नाशाह की पुत्री रत्ना का विवाह काफी धूमधाम से करने का निश्चय व्यक्त किया तथा तत्काल समुचित प्रबन्ध कर रत्ना के ससुराल शादी की तैयारी करने की सूचना भिजवा दी। मुगल साम्राज्य के उच्च सम्मानित मनसबदार राजा टोडरमल द्वारा अपने मित्र धन्नाशाह की पुत्री का विवाह करने की सूचना पाकर रत्ना के ससुराल वाले अत्यन्त प्रसन्न हुए ।

राजा टोडरमल ने एक माह पूर्व शान शौकत के साथ गणपतिपूजन करवा कर (चाक बंधवाकर) रत्ना के विवाहोत्सव का शुभारंभ कर दिया। निश्चित तिथि को रत्ना का विवाह शाही ठाटबाट से सम्पन्न हुआ। इस घटना से राजा टोडरमल की उदारता, सहृदयता और मित्रस्नेह की सारी पोरवाल जाति में प्रशंसा की गई और उसकी कीर्ति इतनी फैली की पोरवाल समाज की स्त्रियाँ आज भी उनकी प्रशंसा के गीत गाती है और पोरवाल समाज का एक वर्ग उन्हें अपना प्रातः स्मरणीय पूर्वज मानकर मांगलिक अवसरों पर सम्मान सहित उनका स्मरण करता है तथा उन्हें पूजता है। इस प्रकार राजा टोडरमल का यश अजर-अमर हो गया। हाड़ौती (कोटा-बूँदी क्षेत्र) तथा मालवा क्षेत्र में जहाँ भी पोरवाल वास करते है, वहाँ टोडरमल की कीर्ति के गीत गाये जाते हैं तथा उनका आदरसहित स्मरण किया जाता है। उनके प्रति श्रद्धा इतनी अधिक रही है कि पोरवाल व्यापारी की रोकड़ न मिलने पर टोडरमल का नाम लिखा पर्चा रोकड़ में रख देने से प्रातःकाल रोकड़ मिल जाने की मान्यता प्रचलित हो गई है।

सम्राट शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दाराशिकोह वेदान्त दर्शन से अत्यन्त प्रभावित उदार विचारों का व्यक्ति था। सन् 1658 से बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रुप से अस्वस्थ हो जाने की अफवाह सुनकर उसके बेटे मुराद और शुजा ने विद्रोह कर दिया। 16 अप्रैल 1658 ई. शुक्रवार को धरमाट (फतियाबाद) के मैदान में औरंगज़ेब की सेनाओं ने शाही सेना को करारी शिकस्त दी। सामूगढ़ के मैदान में पुनः दाराशिकोह के नेतृत्व में शाही सेना को औरंगज़ेब और मुराद की संयुक्त सेना से पराजय का सामना करना पड़ा। दारा युद्ध में पराजित होकर भागा। औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर पिता को किले में कैद किया और फिर आगे बढ़ा। रास्ते में मुराद को समाप्त कर औरंगज़ेब ने पंजाब की ओर भागे दाराशिकोह का पीछा किया।

राजा टोडरमल की प्रारम्भ से ही दाराशिकोह के प्रति सहानुभूति थी। पराजित दारा के प्रति उसकी सहानुभूति में कोई अन्तर नहीं आया। अतः जब दारा लखी जंगल से गुजरा तो राजा टोडरमल ने जो लखी जंगल का फौजदार था, अपने कई मौजें में गड़े धन से 20 लाख रुपये गुप्त रुप से सहायतार्थ प्रदान किये थे।

इसी कारण पंजाब की ओर दारा का पीछा करने के बाद लाहौर से दिल्ली की तरफ लौटते हुए औरंगज़ेब ने अनेक सरदारों और मनसबदारों को खिलअते प्रदान की थी। तब लखी जंगल के फौजदार राजा टोडरमल को भी खिलअत प्राप्त हुई थी।

इटावा का फौजदार रहते हुए राजा टोडरमल ने अपनी पोरवाल जाति को उस क्षेत्र में बसाने तथा उन्हें व्यापार- व्यवसाय की अभिवृद्धि के लिये समुचित सुविधाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था। सम्भवतः इस कारण भी जांगड़ा पोरवाल समाज में इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के उद्देश्य से एक श्रद्धेय पूर्वज के रुप में राजा टोडरमल की पूजा की जाती है ।

राजा टोडरमल अपने अंतिम समय में अपने जन्मस्थल बूँदी में अपना शेष जीवन परोपकार और ईश्वर पूजन में व्यतीत करने लगे तथा समाज के सैकड़ों परिवार इटावा क्षेत्र त्यागकर बून्दी कोटा क्षेत्र में आ बसे। यहीं से ये परिवार बाद में धीरे-धीरे मालवा क्षेत्र में चले आए।

राजा टोडरमल की मृत्यु कहाँ और किस तिथि को हुई थी इस सम्बन्ध में निश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है । किन्तु अनुमान होता है कि सन् 1666 ई. में पोरवाल समाज के इस परोपकारी प्रातः स्मरणीय महापुरूष की मृत्यु बूँदी में ही हुई होगी । कोटा बूँदी क्षेत्र में आज भी न केवल पोरवाल समाज अपितु अन्य समाजों मे भी राजा टोडरमलजी के गीत बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।

साभार: jangdaporwal.wordpress.com

सन्दर्भ ग्रन्थ – पोरवाल समाज का इतिहास

Friday, October 5, 2018

ATUL AGRAWAL - मोदी और पुतिन के सामने बेटे को खड़ा देख रो पड़ी मां.. कहा हमारी हैसियत ही क्या

मोदी और पुतिन के सामने बेटे को खड़ा देख रो पड़ी मां.. कहा हमारी हैसियत ही क्या


नई दिल्ली के आइआइटी भवन में आयोजित इनोवेशन फेस्टिवल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बाल वैज्ञानिक अतुल अग्रवाल से मुखातिब हुए थे।उधर, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में अतुल की विधवा मां टीवी पर यह नजारा टकटकी लगाए देख रही थी। उनके लिए वक्त मानों थम गया था। टीवी पर दिख रहे उस नजारे में मानों जीवन का सार सिमट आया था। बेटे की यह उपलब्धि देख मां की आंखों से आंसू बह रहे थे। एक छोटे से स्कूल में आया का काम करने वाली सरस्वती अग्रवाल का बेटा अतुल मोदी और पुतिन को अपने आविष्कार 'मोक्षा' की बारीकियां समझा रहा था।

सरस्वती को महीने में इतनी तनख्वाह भी नहीं मिलती कि घर का गुजारा चल जाए। वे जैसे-तैसे घर चलाने के साथ ही बेटा अतुल व बेटी अर्पिता को तालीम दे रही हैं। उनकी कड़ी मेहनत और भरोसे पर अतुल खरा उतरता दिखाई दे रहा है।

सरस्वती से जब हमने पूछा, आज कैसा लग रहा है? इतना पूछना था कि उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। खुशी के आसुंओं के बीच उनका गला रुंध आया। पांच मिनट कुछ बोल नहीं पाई। फिर बोलीं, अतुल ने पीढ़ियों का नाम रोशन कर दिया है। हम तो ख्वाब में भी नहीं सोच सकते थे। हमारी हैसियत ही क्या है। हमारे जैसे बेहद साधारण परिवार में रहने वाले किसी मंत्री या ऊंचे ओहदे वालों के साथ बात करने की सोच नहीं सकते। बेटे को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से बात करते देख जीवन सफल हो गया।


संघर्ष से भरा है इन बाल वैज्ञानिकों का सफर

पढ़ाई और घर चलाने में मां की मदद करने के लिए अतुल अखबार बांटने (हॉकर) का काम करता है। सुबह चार बजे उठ अखबार लेकर बांटने के बाद ही स्कूल जाता है। बिलासपुर के गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाई के अलावा लैब में आविष्कार के लिए चार से पांच घंटे का अतिरिक्त समय बिताता है। यही उनकी दिनचर्या है। चिता की राख को जैविक खाद में बदल देने वाला 'मोक्षा' नामक यंत्र अतुल ने अपने मार्गदर्शक संग मिलकर तैयार किया। इसी स्कूल के योगेश मानिकपुरी ने 'ईको जिम' की अवधारणा दी। जिम में मौजूद उपकरणों में एक यंत्र लगा दिया, जिससे व्यायाम करते हुए बिजली तैयार की जा सकती है। योगेश भी साधारण परिवार से ताल्लुक रखता है। उसके माता-पिता रोजी मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। वह भी परिवार की मदद के लिए एक इलेक्ट्रीशियन की दुकान पर काम करता है।


दैनिक जागरण ने प्रकाशित की थी इनकी कहानी

दैनिक जागरण ने 12 फरवरी के अंक में बिलासपुर, छत्तीसगढ़ के बाल वैज्ञानिक अतुल अग्रवाल के आविष्कार 'मोक्षा' और उसके निजी जीवन के संघर्ष पर विशेष स्टोरी प्रकाशित की थी। इसी तरह 19 अप्रैल के अंक में योगेश मानिकपुरी के संघर्ष और आविष्कार को भी देश के सामने रखा था। जिसके बाद नीति आयोग व सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इनकी पड़ताल की और प्रोजेक्ट्स को चुना। अंतत: दोनों आविष्कार देशभर से चुने गए चुनिंदा पांच में जगह बनाने में सफल रहे। भारत-रूस के बीच ऐसे नए आविष्कारों में परस्पर सहयोग बढ़ाने के लिए उपक्रम हुआ है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ रूस से भी बाल वैज्ञानिकों की टीम आई है, जिसने भारतीय बाल वैज्ञानिकों से मुलाकात की।

साभार: jagran.com/politics/national-pm-modi-and-president-putin-applauded-moksha-innovation-and-eco-gym-of-bilaspur-jagran-special-18505217.html
Posted By: Nancy Bajpai

Thursday, October 4, 2018

भारतीय मूल की रीता बरनवाल को अमेरिकी ऊर्जा मंत्रालय में इस पद पर किया नियुक्त



वॉशिंगटन (पीटीआइ)। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऊर्जा मंत्रालय के महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर भारतीय मूल की अमेरिकी नागरिक न्यूक्लियर एक्सपर्ट रीता बरनवाल को नियुक्त करने का फैसला किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने रीता बरनवाल को ऊर्जा मंत्रालय में सहायक ऊर्जा सचिव (परमाणु ऊर्जा) के तौर पर नामित करने की घोषणा की है। कुछ दिन पहले आधुनिक रिएक्टरों के विकास में तेजी लाने के लिए नए कानून पर हुए हस्ताक्षर के बाद उन्होंने यह फैसला लिया।

फिलहाल बरनवाल गेटवे फॉर एक्सीलरेटेड इनोवेशन इन न्यूक्लियर (जीएआईएन) पहल में निदेशक के के पद पर कार्यरत हैं। ट्रंप की इस घोषणा के बाद अगर सीनेट से उनके नाम की पुष्टि होती है, तो सहायक ऊर्जा सचिव के तौर पर बरनवाल महत्वपूर्ण परमाणु ऊर्जा विभाग का नेतृत्व करेंगी। वे इस विभाग के परमाणु प्रौद्योगिकी अनुसंधान और विभाग के परमाणु प्रौद्योगिकी बुनियादी ढांचे के विकास और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होंगी।

इससे पहले रीता बरनवाल वेस्टिंगहाउस में प्रौद्योगिकी विकास और अनुप्रयोग की निदेशक के तौर पर काम कर चुकी हैं। उन्होंने बेशटेल बेटीस में पदार्थ प्रौद्योगिकी में प्रबंधक के तौर पर भी काम किया है। वहां उन्होंने अमेरिकी नौसैनिक रिएक्टरों के लिए परमाणु ऊर्जा में शोध और विकास की अगुवाई की। बरनवाल ने एमआइटी से मैटेरियल्स साइंस एंड इंजीनियरिंग में बीए किया है और मिशिगन विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की है। वह एमआईटी के पदार्थ अनुसंधान प्रयोगशाला और यूसी बर्कले के परमाणु अभियांत्रिकी विभाग के सलाहकार बोर्ड में भी हैं।

पिछले हफ्ते, ट्रंप ने परमाणु ऊर्जा नवोन्मेष क्षमता अधिनियम में कानून पर हस्ताक्षर किया था, जो अमेरिका में उन्नत रिएक्टरों के विकास को तेज करे गा। यह कानून परमाणु नवोन्मेष के रास्ते में खड़े कुछ वित्तीय और तकनीकी बाधाओं को समाप्त करता है।

साभार: दैनिक जागरण 

पृथ्वी शॉ ने डेब्यू में ही पूरी की शतकों की 'हैट्रिक', अपने नाम किए ये रिकॉर्ड



पृथ्वी शॉ ने डेब्यू करते ही राजकोट टेस्ट में शतक जड़ दिया. उन्होंने डेब्यू शतक (134 रन) के साथ कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर लिये. 18 साल 329 दिनों की उम्र में पृथ्वी की उपलब्धियां सुर्खियों में हैं.

पृथ्वी शॉ ने डेब्यू मैचों में ऐसे पूरी की शतकों की हैट्रिक
-पृथ्वी शॉ ने रणजी ट्रॉफी के सेमीफाइनल (जनवरी 2017) में डेब्यू किया और उस मैच में शतक जमाया था.
-दिलीप ट्रॉफी में उन्होंने डेब्यू (सितंबर 2017) किया और फाइनल खेलते हुए शतक जमाया.
- और अब टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू करते हुए शतक बना डाला और अनोखी हैट्रिक पूरी की.


भारतीय बल्लेबाज- सबसे कम उम्र में पहला टेस्ट शतक

17 साल 112 दिन: सचिन तेंदुलकर Vs इंग्लैंड, मैनचेस्टर, 1990
18 साल 329 दिन: पृथ्वी शॉ Vs वेस्टइंडीज, राजकोट, 2018
20 साल 21दिन: कपिल देव Vs वेस्टइंडीज, दिल्ली, 1979
20 साल 131 दिन: अब्बास अली बेग Vs इंग्लैंड, मैनचेस्टर, 1959


पृथ्वी शॉ डेब्यू टेस्ट में शतक लगाने वाले भारत के सबसे युवा बल्लेबाज हैं. पृथ्वी ने 99 गेंदों में अपना पहला टेस्ट शतक लगाया है. 


इसके अलावा पृथ्वी डेब्यू मैच में सबसे तेज शतक जड़ने वाले तीसरे बल्लेबाज बन गए हैं. पृथ्वी शॉ से आगे उनके हमवतन शिखर धवन और वेस्टइंडीज के ड्वेन स्मिथ हैं.


टेस्ट डेब्यू में सबसे कम गेंदों पर शतक, पृथ्वी तीसरे स्थान पर
85 गेंद: शिखर धवन Vs ऑस्ट्रेलिया, मोहाली, 2013
93 गेंद: ड्वेन स्मिथ Vs साउथ अफ्रीका, केपटाउन, 2004
99 गेंद: पृथ्वी शॉ Vs वेस्टइंडीज, राजकोट, 2018


पृथ्वी ने पदार्पण टेस्ट मैच में शतक लगाने वाले युवा बल्लेबाजों की सूची में चौथा स्थान हासिल कर लिया है. इस सूची में पृथ्वी से पहले बांग्लादेश के क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद अशरफुल, जिम्बाब्वे के हेमिल्टन मसाकाद्जा और पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी सलीम मलिक का नाम शामिल है. 


अशरफुल ने कोलंबो में 17 साल और 061 दिन की उम्र में श्रीलंका के खिलाफ पदार्पण टेस्ट मैच में शतक जड़ा था. इसके अलावा हेमिल्टन ने हरारे में वेस्टइंडीज के खिलाफ 17 साल और 352 दिन की उम्र में पहला टेस्ट शतक लगाया.

सलीम ने श्रीलंका के खिलाफ कराची में 18 साल और 323 दिन की उम्र में पदार्पण टेस्ट में शतक जड़ा था. पृथ्वी ने 18 साल और 329 दिन की उम्र में वेस्टइंडीज के खिलाफ पहला टेस्ट शतक लगाकर स्वयं के लिए इस सूची में स्थान हासिल कर लिया.


पृथ्वी शॉ टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू करते हुए शतक जमाने वाले 15वें भारतीय बल्लेबाज हैं. इससे पहले रोहित शर्मा ने नवंबर 2013 में इसी वेस्टइंडीज के खिलाफ कोलकाता के ईडन गार्डन्स में अपने पहले ही टेस्ट में शतक जमाया था. 

फर्स्ट क्लास के डेब्यू में शतक के बाद टेस्ट डेब्यू में भी शतक
-गुंडप्पा विश्वनाथ (भारत)
-डर्क वेल्हम (ऑस्ट्रेलिया)
-पृथ्वी शॉ (भारत)

साभार: आजतक