Friday, September 13, 2019

SHUBHAM GUPTA, 2018 IAS TOPPER

Success Story: आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई के साथ किया काम, चौथे अटेंप्ट में बने IAS
शुभम ने यूपीएससी सिविल सर्विस का एग्जाम पहली दफा 2015 में दिया था, तब ये प्रारंभिक परीक्षा में पास नहीं हुए थे.

आर्थिक से जूझते हुए, संघर्ष के दिनों में भी, उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया.

Success Story: आज की सक्सेस स्टोरी के जरिए मिलिए आईएएस बन चुके शुभम गुप्ता से. शुभम गुप्ता 2018 के आईएएस टॉपर हैं. इन्होंने All India Rank 6, हासिल की. शुभम ने ये रैंक चौथे अटेंप्ट में हासिल की. शुभम ने यूपीएससी सिविल सर्विस का एग्जाम पहली दफा 2015 में दिया था, तब ये प्रारंभिक परीक्षा में पास नहीं हुए थे. 2016 में जब दूसरी बार एग्जाम दिया तो सिविल सर्विस एग्जाम के तीनों स्टेप, प्रारंभिक, मेन्स और इंटरव्यू पास कर 366वीं रैंक हासिल की. इस रैंक के आधार पर इनकी भर्ती इंडियन ऑडिट और अकाउंट्स सर्विस में हुई.

शुभम 2016 में 366वीं रैंक पाने के बाद भी एग्जाम देते रहे. इन्होंने 2017 में फिर से एग्जाम दिया और इस बार फिर से, तीसरे अटेंप्ट में भी प्रारंभिक परीक्षा क्लीयर न कर सके. पढ़ें इस मुकाम तक पहुंचने वाले शुभम की कहानी.

शुभम की स्कूली शिक्षा देश के अलग-अलग राज्यों से पूरी हुई. सातवीं तक जयपुर (राजस्थान) से पढ़ाई की. आर्थिक तंगी के कारण उनका परिवार महाराष्ट्र के छोटे से गांंव दहानु में शिफ्ट हुआ. गुजरात के वापी के पास स्थित एक स्कूल से 8वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की. परिवार ने कम समय के लिए लेकिन आर्थित तंगी झेली. परिवार की मदद के लिए वे प्रतिदिन वापी में स्कूल पूरा करने के बाद दहानू रोड स्थित परिवार की ही एक दुकान पर काम करते थे.

शुभम गुप्ता

आर्थिक से जूझते हुए, संघर्ष के दिनों में भी, उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया. स्कूल और दुकान दोनों में समय का उपयोग किया. वे अपनी किताबें दुकान पर ले जाते और काम करते हुए पढ़ाई करते. इसी तरह अपने स्कूल की परीक्षा में अच्छे नंबर पाए.

ऐसे मिली आईएएस बनने की प्रेरणा

शभम बताते हैं, जब मैं 5वीं में था. पिताजी मेरे पास आए और कहा कि वह चाहते हैं कि मैं एक दिन कलेक्टर बनूं. मैंने उनसे पूछा ‘कलेक्टर कौन होते हैं?’ उस घटना ने दिमाग में एक छाप छोड़ी. 11वीं में मैंने महसूस किया IAS अधिकारी बनने की आकांक्षा लक्ष्यों को पाने में मदद करेगी.

शुभम गुप्ता के मुताबिक जब वो पांचवीं में थे, तो उनके पिता ने बताया कि वो भी कभी कलेक्टर बनना चाहते थे. जिस पर मैंने सवाल किया कि क्लेक्टर कौन होता है? उस घटना ने मुझे आईएएस बनने की प्रेरणा दी. शुभम जब 11वीं की पढ़ाई कर रहे थे तब उन्हें समझ आ गया था कि यही प्रेरणा उन्हें उनके गोल को पाने में मदद करेगी.

वे बताते हैं कि उनके रोल मॉडल उनके पिता हैं. उन्होंने बहुत संघर्ष किया. कई बार आर्थिक तंगी का सामना किया लेकिन फिर भी हमारे जीवन में सुधार और संतुलन लाने में कामयाब रहे. 

लेख साभार : जागरण जोश 

Tuesday, September 10, 2019

MAHAJAN - जम्मू, हिमाचल, पंजाब की महाजन वैश्य जाति

Mahajan is an Indian surname or title, (e.g., Chaitanya Mahajan) found among several castes and communities. The word "Mahajan" is an amalgam of two Sanskrit words: Maha meaning great, and Jan meaning people or individuals (Respectful people). Over the years, the word Mahajan has become a common generic job title used to describe people involved in money lending and financial services.

CASTE

Mahajans originally are believed to be descendants of King Kuru who were Chandravanshi. He was very religious, just, fair and good administrator. Chandravanshi ruled entire Aryavrat Region. They were descendants of Pandavas & Kauravas. Mahajan word is a very respectable word, meaning high in knowledge, religion and actions. According to Vaman Puran - "Mahajano si mahalroshi mahajano yen gataa sa pantha." God Vishnu was pleased with King Kuru, and King was shifted to Vaishya. God Vishnu said to King Kuru that he has done great job and he is great person. Therefore, your dynasty will be called MAHAJAN and all rulers will be known as Vaishya, because doing agriculture, you have accepted Vaishya. They migrated from central India to Rajasthan and then to Punjab region several hundred years back. A renowned social reformer Lala Hans Raj Mahajan urged people to replace "Gupt" by 'Mahajan' as their surname in the early 20th century as Mahajan word denotes respectable community. The Mahajan community of North India was based in the undivided Punjab region. They are in money lending activities for centuries within the Punjab and nearby areas such as Himachal, Jammu and Kashmir, the present-day state of Punjab, the Punjab province and the North West Frontier area. Most of these Mahajans speak Punjabi and Dogri, and reside in the regions of the Punjab, Jammu, Kashmir and Himachal Pradesh. Mahajans are landlords, traders and business men who were highly respected and have a major influence in the society.

Gujrat and Madhya Pradesh Some People in Gujarat Madhya Pradesh's Nimar region also bear Mahajan as a surname. They also use other common surnames such as Nema. They believe in Srinathji at Nathdwara (Rajasthan) and are staunch vegetarians. In Gujarat, the Bhatia caste also use the "Mahajan" surname, as the Mahajan community was traditionally associated with money lending.


In North India Mahajans surname have been found in many sub castes such as Mahotra, Swaar, Beotra, Sanghois, Phagetra, Jandials, Vaid, Bangwathiya, Langars, Rarotra, Fave (Phave), Padotra, Kubre, Piddu, Gadhede, Chunne, Manath, Karmotra, Kankaal, Lamhe, Khadyals, Kanghal/kaag, Sadad, Paba, Jugnal, Ukhalmunde, Bucche, Gadri, Laira, Kalsotra, Chapate, Bharray, Jadyal, Parru, Rometra, Malguria, Chukarne, Iddar, Chogga, Thathar and Lamma, Makhirru, Bichchu, Thapre, Tathyan, . Mahajans from these sub castes observe annual mail on Sri Guru Nanak Dev's Birthday, usually in November and gather at their respective religious places located in J&K, Punjab, HP and seek blessings of their devta/deity. Family ceremonies such as sutra and mundan are also organised. Prasad is distributed through langars (community food). Each sub caste believes in its own deity, known as devte.

Mahajans are prohibited to marry into the same sub caste because they are considered as brother and sister, according to their belief. Some Mahajans use the castes of Gupta and Jandiyals. The Gupta surname is mostly used by the Mahajans of the Jammu region.

Mahajan as a generic title Mahajan is also used a generic job title referring to people involved in money lending. In this case, a person involved in money lending is referred to as a Mahajan whether or not he is a Mahajan by caste.

In the coastal state of Goa, Mahajan is not used as a family name. It means elders (Maha — great and Zan — person) or respectable people. The Mahajans originally referred to rich merchants, traders, money lenders and bankers. In later its meaning changed to mean the founders of Hindu temples, their patrons and their descendants, who mostly were descendants of the older Mahajans, mentioned before. 

रियासत काल से ही व्यापार पर महाजन समुदाय का दबदबा रहा है। यही वजह है कि आज मंडी शहर में तो महाजनों के नाम पर एक बाजार का नाम भी महाजन बाजार है। वहीं जरूरत के समय राजा को भी ऋण देना या यूं कहें कि राजाआें के भी फाइनांसर महाजन रहे हैं। हालाकि पिछले चार दशकों में महाजन समुदाय के इस मुख्य कार्य में बदलाव आया है। महाजन समुदाय व्यापार की बुलंदियों तक तो पहुंचा ही है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में महाजन समुदाय की नई पीढ़ी ने नए आयाम स्थापित किए हैं। इस समुदाय के कितने ही लोग अब राजनीति के साथ ही सरकारी व निजी क्षेत्र में ऊंचे ऊंचे पदों पर तैनात हैं।

हिमाचल प्रदेश के विकास में यूं तो सभी समुदाय व वर्गों की अहम भूमिका है, लेकिन कम संख्या के बाद भी प्रदेश में महाजन समुदाय के योगदान को अहम दर्जा प्राप्त है। व्यापार के प्रति संजीदगी, दिन-रात मेहनत, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे व्यापार को बढ़ाना, जरूरत से ज्यादा खर्च न करना, समाज और राजनीति में भी पैठ, यह सब खूबियां महाजन समुदाय में भरी हुई हैं। यही वजह है कि महाजन समुदाय अहम योगदान निभा रहा है। आज के समय में ही नहीं बल्कि रियासत काल से हिमाचल प्रदेश में महाजन समुदाय का रुतबा काफी अहम और ऊपर का रहा है। प्रदेश के महाजन समुदाय को गुप्ता, बोहरा, कायस्था के नाम से भी जाना जाता है। महाजन समुदाय ने प्रदेश को कई बडे़-बडे़ व्यापारी, न्यायाधीश, राजनेता, आईएएस अधिकारी, चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षक दिए हैं। इतना ही नहीं,महाजन समुदाय ने देश की आजादी और इसके बाद हिमाचल प्रदेश के गठन में भी अहम भूमिका निभाई है। सुकेत रियासत को हिमाचल में मिलाने के सत्याग्रह आंदोलन में पांगणा के महाजनों ने अहम भूमिका निभाई थी। आजादी से पहले चंबा रियासत, मंडी रियासत और सुंदरनगर की सुकेत रियासत में महाजनों का अहम कि रदार रहा है। प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में महाजन समुदाय की हस्तियों ने अपनी छाप छोड़ी है। अगर बात हिमाचल प्रदेश की ही करें तो हिमाचल प्रदेश में रियासत काल से चला आ रहा महाजन समुदाय का रुतबा व दमखम आज भी कायम है। रियासत काल में महाजन राजा की व्यवस्था में भी अहम भूमिका निभाते रहे। वहीं प्रदेश का ऐसा कोई मुख्य बाजार नहीं है, जहां पर महाजन समुदाय से जुडे़ लोग न मिलें। प्रदेश के हर शहर और छोटे कस्बे में बडे़ व्यापारियों में पांच नाम महाजन समुदाय के लोगों के जरूर मिलेंगे। इस समय प्रदेश में दो लाख के लगभग महाजन समुदाय के लोगों की जनसंख्या है, जिसका एक बड़ा भाग मंडी जिला के साथ सोलन, कांगड़ा और चंबा में है। इस समय प्रदेश के मंडी, करसोग, सुंदरनगर, शिमला, घणाहट्टी, सुन्नी, हमीरपुर, दियोटसिद्ध, कुल्लू, बंजार, रामपुर, अर्की, नाहन, चंबा, नूरपुर, कांगड़ा, पालमपुर, सरकाघाट, रिवालसर और ऊना में भी महाजन समुदाय के लोग काफी संख्या में हैं।

पहले चीफ जस्टिस डा. मेहर चंद महाजन

कांगड़ा के छोटे से गांव में जन्मे न्यायमूर्ति डा. मेहर चंद महाजन का नाम हिमाचल में गर्व के साथ लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पहले चीफ जस्टिस डा. मेहर चंद महाजन का जन्म कांगड़ा के नगरोटा तहसील नूरपूर के छोटे से गांव टिक्का में 23 दिसंबर 1889 को हुआ था। इनके पिता बृज लाल महाजन भी धर्मशाला के प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। डा. मेहर चंद महाजन न सिर्फ देश के पहले चीफ जस्टिस हुए, बल्कि जम्मू-कश्मीर रियासत को भारत में विलय कराने के मुख्य तारणहार डा. मेहर चंद महाजन ही थे। उन्हें उस समय भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बना कर भेजा था। उन्होंने अपनी कुशल नीति व बुद्धिबल से जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत में करवा दिया। कहते हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर की समस्या को प्रस्तुत करने का दायित्व उस समय भारत सरकार डा. मेहर चंद महाजन को देती तो जम्मू कश्मीर के हालात आज ऐसे नहीं होते।

मंडी की मंजुला गुप्ता पहली आईएएस

हिमाचल से पहली महिला आईएएस होने का गौरव भी महाजन समुदाय की मंजुला गुप्ता को है। मंडी की मंजुला गुप्ता बाद में पश्चिम बंगाल सरकार से मुख्य सचिव के पद पर सेवानिवृत्त हुई हैं।

पुनीत गुप्ता दिल्ली एम्स में कैंसर विशेषज्ञ

चिकित्सा के क्षेत्र में भी महाजन समुदाय के लोग नाम कमा रहे हैं। इस समय मंडी के ही पुनीत गुप्ता एम्स दिल्ली में कैंसर विशेषज्ञ हैं, जबकि आईजीएमसी शिमला में मुनीष गुप्ता कैंसर विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह से शिमला में मेडिकल कालेज में प्रोफेसर डीआर गुप्ता भी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं ओर विदेशों में लेक्चर देने के लिए इन्हें बुलाया जाता है। इसके अलावा अन्य फील्ड में भी महाजन समुदाय कार्यरत है। पुरानी मंडी के ही रहने वाले बीएल महाजन एलआईसी में प्रदेश की सबसे बड़ी पोस्ट से सेवानिवृत्त हुए हैं। बीएल महाजन एलआईसी के वरिष्ठ मंडलीय प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। मंडी के ही राजीव महाजन 15 वर्षों से सीए की प्रैक्टिस कर रहे हैं। वहीं, मंडी के ही व्यवसायी धर्म चंद गुप्ता ने समाजसेवी के रूप में राजगढ़ में क ोयला माता मंदिर का भव्य निर्माण करवाया है।

इंग्लैंड में सर्जन डीके गुप्ता

महाजनों में एक नाम मंडी के चैलचौक से डीके गुप्ता का भी उनकी उपलब्धियों के लिए लिया जाता है। डीके गुप्ता पीजीआई सर्जन रहे हैं और उसके बाद इंग्लैंड सरकार में सर्जन के रूप में अपनी सेवाएं कई वर्षों से दे रहे हैं।

स्व. कैलाश महाजन विद्युत परियोजनाओं के जनक

चंबा के ही पद्मश्री अवार्ड से अंलकृत एवं बिजली बोर्ड के चेयरमैन रहे स्व. कैलाश महाजन का भी चंबा के विकास में अहम योगदान रहा। प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं की रूपरेखा स्वर्गीय कैलाश महाजन के कार्यकाल में बनाई गई, जिसके बाद चंबा में कई विद्युत योजनाओं का निर्माण हुआ।
खेमराज गुप्ता ने लिखा सायं-सायं मत कर राविए गीत

चंबा का प्रसिद्ध लोकगीत सायं-सायं मत कर राविए गीत भी महाजन बिरादरी के स्वर्गीय खेमराज गुप्ता ने लिखकर रावी नदी की खूबसूरती को बयां किया। यह गीत आज भी चंबा में हर मौके पर गूंजता है।
मंगलवार को बकरे न काटने का नियम नानक चंद की देन

मंडी में रहने वाले महाजनों ने व्यापार के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी ऊंचे मुकाम हासिल किए हैं। मंडी के स्वर्गीय डा. नानक चंद महाजन प्रदेश के पहले वैटरिनरी सर्जन थे,जिन्होंने लाहुल से डिग्री लेने के बाद अंग्रेजों की हुकूमत से लेकर प्रदेश सरकार में 1970 तक काम किया और पशुपालन विभाग से हैड ऑफ डिर्पाटमेंट के रूप में सेवानिवृत्त हुए। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि मंगलवार को बकरे न काटने का नियम अंग्रेजी हुकूमत में डा. नानक चंद महाजन के प्रस्ताव पर ही बनाया गया था। इसके लिए उनका काफी विरोध भी हुआ था।

सभी जिला में महाजन सभाएं

इस समय हिमाचल के लगभग सभी जिलों में महाजन सभाएं बनी हुई हैं। इसके साथ ही प्रदेश स्तर पर भी महाजन सभा कार्यरत है। अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा हिमाचल प्रदेश के तहत जिला स्तर की महाजन सभाएं पंजीकृत हैं। वर्तमान में हिमाचल सभा के अध्यक्ष शिमला से हरि चंद गुप्ता हैं। महाजन सभा अब प्रदेश के कुछ बडे़ शहरों में महाजन भवन भी बनाने जा रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर महाजन सभा

वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा का गठन किया गया है, जिसमें पूरे देश से महाजन समुदाय के कई वर्ग शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल प्रदेश की भी अहम हिस्सेदारी है। विशेष यह है कि महाजन सभा के हरिद्वार, चंड़ीगढ़, आगरा, दिल्ली और पंजाब के कुछ शहरों में अपने बडे़ सामुदायिक भवन भी बना चुकी है। हरिद्वार में तो महाजन सभा द्वारा 162 कमरों के आलीशान भवन का निर्माण किया गया है।

महाजन सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अशोक गुप्ता

मंडी के ही रहने वाले एवं बहुत बडे़ स्तर के दवा विक्रेता एनसी टे्रडर के नाम से विख्यात अशोक महाजन इस समय मंडी जिला की महाजन सभा के अध्यक्ष हैं। विशेष बात यह है कि अशोक गुप्ता अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं।

हिमाचल के प्रधान हरि चंद गुप्ता

इस अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा हिमाचल प्रदेश के प्रधान शिमला के हरि चंद गुप्ता हैं। हरि चंद गुप्ता हिमाचल सरक ार में विभिन्न बडे़ पदों पर काम कर चुके हैं। सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी के रूप में हरि चंद गुप्ता ने पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस परमार, सत महाजन, विपल्व ठाकुर और अन्य कई बडे़ नेताओं के साथ काम किया है।

डीडी गुप्ता पहले डीआईजी

डीडी गुप्ता सेवानिवृत्त डीआईजी महाजन समुदाय से एसएसबी में डीआईजी तक पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वह प्रतिष्ठित तपोस्थली जंगम के जीर्णोद्वार समिति के संस्थापक व वर्तमान तक निर्विरोध प्रधान हैं। वह कल्याण गोसदन के दो बार प्रधान तथा महाजन सभा के दो बार प्रधान रहे हैं।

डा. वाईसी गुप्ता को दो राष्ट्रीय पुरस्कार

कृषि, बागबानी एवं औद्यानिकी में भी गुप्ता समुदाय ने खूब नाम कमाया है। समुदाय के लोग हिमाचल के दोनों विश्वविद्यालयों में उच्च पदों पर आसीन हैं और कई राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। ऐसा ही एक नाम है प्रोफेसर डा. वाईसी गुप्ता का। डा. वाईसी गुप्ता मूलतः बल्हघाटी के थटा के रहने वाले हैं और नौणी विश्वविद्यालय के फ्लोरिकल्चर एंड लैंडस्केप आर्किटेक्चर विभागाध्यक्ष हैं। डा. वाईसी गुप्ता फूल उत्पादकों के बीच मशहूर नाम हैं। चंबा के चौगान और कल्पा के खेल के मैदानों के पुनर्जीवन की योजना को अंजाम देने वाले डा. वाईसी गुप्ता ही हैं। इनके साथ ही डा. वीके गुप्ता, डा. डारेन गुप्ता, डा. रजंना गुप्ता और डा. राधना गुप्ता पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में शोध कार्य में अहम भूमिका निभा रही हैं।

पवन गुप्ता का सोलन नगर परिषद अध्यक्ष तक का सफर

पवन गुप्ता सोलन का एक जाना-माना नाम है। पवन गुप्ता मूलतः हरियाणा के हैं, लेकिन जन्म और कर्मभूमि अब सोलन ही है। 1999 में बघाट बैंक में दाखिल हुए पवन गुप्ता तीन साल के भीतर ही चेयरमैन बन गए। उन्होंने दो बार यह पद संभाला। फिलहाल वह बघाट बैंक के डायरेक्टर हैं। यही नहीं, उन्होंने सोलन नगर परिषद के चुनाव भी लड़े और उपाध्यक्ष से लेकर अध्यक्ष तक का सफर तय किया।

राजनीतिज्ञ सत महाजन

प्रदेश की राजनीति में महाजन समुदाय का काफ ी प्रभाव रहा है और स्वर्गीय सत महाजन को प्रदेश की राजनीति में फ ील्ड मार्शल के नाम से जाना जाता था। सत महाजन वर्ष 1977, 1982, 1985, 1993, 2003 में नूरपुर विधानसभा के विधायक चुने गए और वह एक बार कांगड़ा-चंबा लोकसभा क्षेत्र के भी सांसद रहे।

अजय महाजन

नूरपुर विधानसभा क्षेत्र से सत महाजन के बेटे अजय महाजन वर्ष 2012 में विधायक बने। अजय महाजन ने भी राजनीति में अपनी सियासी पकड़ बना कर इस क्षेत्र में महाजन समुदाय का नाम ऊंचा किया है।

पहली सांसद लीला देवी

स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार के समय हिमाचल प्रदेश से पहली महिला के रूप में राज्यसभा सांसद लीला देवी बनी थीं। उस समय हिमाचल में टेरीटोरियल काउंसिल हुआ करती थी और स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें राज्य सभा के लिए भेजा था।

आरके महाजन का भी बड़ा रुतबा

नूरपुर नगर परिषद में भी महाजन समुदाय का काफ ी प्रभाव रहा है और शहर की राजनीति में आरके महाजन परिवार का काफ ी रुतबा रहा है। आरके परिवार नगर परिषद नूरपुर में पांच बार अध्यक्ष पद पर रहे हैं। जिसमें नगर परिषद नूरपुर में दो बार आरके महाजन अध्यक्ष बने व तीन बार उनकी पत्नी कृष्णा महाजन अध्यक्ष बनीं।

सियासत में मजबूत पकड़

चंबा जिला की कुल आबादी का 0.5 फीसदी हिस्सा होने के बावजूद महाजन बिरादरी के लोगों ने व्यापार के अलावा राजनीति व प्रशासनिक कार्यकुशलता में प्रतिभा का लोहा मनवाया है। महाजन बिरादरी के धुंरधर नेता रहे स्व. देशराज महाजन, स्व. किशोरी लाल वैद्य और हर्ष महाजन ने वर्षों तक सदर हलके का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा स्व. दौलत राम गुप्ता ने हिमाचल की पहली विधानसभा में पांगी का प्रतिनिधित्व किया। इन नेताओं ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री पद का निर्वहन भी किया। इसके साथ ही महाजन बिरादरी ने व्यापार के क्षेत्र में भी खासा नाम कमाया है। चंबा जिला के अधिकांश कारोबार पर महाजन बिरादरी का ही आधिपत्य है। चंबा की रियासत में भी महाजनों का अहम योगदान रहा। रियासत काल में राज दरबार में महाजन समुदाय की अच्छी पैठ पर अधिकार थे। कुलमिलाकर महाजन समुदाय ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी विशेष पहचान छोड़ी है।

ये भी रहे खास

इसके अलावा केके महाजन ने आईपीएच विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ के पद से रिटायर हुए। सुभाष कल्सोत्रा ने एचएएस अधिकारी पद का मान बढ़ाया। आईएएस अधिकारी नंदिता गुप्ता भी प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता का लोहा मनवा रही हैं और वर्तमान में कांगड़ा जोन की कमिश्नर हैं। इसके अलावा नंदिता गुप्ता के पिता स्वर्गीय नरेंद्र गुप्ता भी आईएएस अधिकारी के तौर पर उत्कृष्ट सेवाएं दे चुके हैं।

मेहनत के बल पर छुआ शिखर

नूरपुर शहर में महाजन समुदाय का काफी महत्त्व है और समुदाय ने अपनी मेहनत से ऊंचे मुकाम हासिल किए हैं। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में महाजन बिरादरी की प्रतिशतता भले ही बेहद कम है परंतु शहर में इनकी संख्या काफ ी अधिक है। इस बिरादरी ने हमेशा अपनी मेहनत के बल पर सफलताओं के शिखर छुए हैं और अन्य समुदाय के लोगों को भी सफ लता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। इस समुदाय के कई व्यक्ति अपनी मेहनत के दम पर व्यवसाय,राजनीति,प्रशासन आदि में ऊंचे मुकाम पर पहुंचे हैं। इस समुदाय के लोगों ने समाजसेवा में भी उलेखनीय कार्य किए हैं, जिससे उन्होंने समुदाय का नाम ऊंचा किया है।

चंबा से चमके कई महाजन सितारे

स्व. देशराज महाजन ने परिवहन व राजस्व मंत्री का दायित्व बखूबी निभाया। वहीं स्व किशोरी लाल वैद्य ने उद्योग व पीडब्ल्यूडी समेत कई अहम विभागों की जिम्मेदारी बतौर कैबिनेट अदा की। स्व. किशोरी लाल ने न केवल चंबा बल्कि भटियात व बनीखेत हलके से भी चुनाव जीता। हर्ष महाजन, जो कि वर्तमान में को-आपरेटिव बैंक के चेयरमैन पद पर आसीन हैं, ने लगातार तीन बार चंबा सदर हलके का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्य संसदीय सचिव के अलावा पशुपालन मंत्री के पद का कैबिनेट मंत्री के तौर पर क ाम संभाला।

स्वतंत्रता सेनानियों का गांव पांगणा

मंडी जिला का पांगणा एक ऐसा गांव है, जहां के पूरे महाजन समुदाय ने आजादी व सुकेत सत्याग्रह में अहम योगदान दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता व पीएल गुप्ता ने बताया कि समाज का उच्च मार्गदर्शन व सहयोग, आजादी में महाजनों की सराहनीय भूमिका रही है। आजाद हिंद फ ौज में पांगणा के सितलु राम महाजन, लुहारू राम महाजन, धरनीधर महाजन, लटुरिया राम महाजन, कालूराम महाजन आदि ने लाहौर, रंगून, मुल्तान और रावलपिंडी की काल कोठरियों में कैद काटी, लेकिन सरकार द्वारा पेंशन व मान-सम्मान प्राप्त करने से वंचित रहे । सुकेत सत्याग्रह के अनाम स्वतंत्रता सेनानियों में चंद्रमणी महाजन, मणिराम महाजन, नंदलाल महाजन, हरि सिंह महाजन, लीपटीराम महाजन, माधव गुप्ता, गौरीदत महाजन, तुलसीराम महाजन और द्रौपदी महाजन सहित कुछ अन्य पांगणा छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं, लेकिन पांगणा गांव के महाजन समुदाय के लोगों की यादें आज भी जिंदा हैं।


लेख साभार: दिव्य हिमाचल, अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा

Vaniya Nair - A KERALA VASHYA COMMUNITY

Vaniya Nair

Vaniya Nairs/Vaniya Chettiars are old Nair sub-caste among Nairs in northern Malabar.

They engaged in production and selling of oil. Vaniyar of north Malabar are believed to be the immigrants from sourashtra(In which they are part of Baniya Caste)& came to kolathunadu(Which is present North Malabar) for trade purposes and settled here. They widely belonged to Vaishya Varna among four varnas but since Vaishya varna didn't existed in Malabar they were granted to use 'Nair' title by kolathiri rajas of kolathu nadu,They also use chettiar as their surname. Vaniyars are endogamous in nature and usually they don't inter-marry with other Nairs sub-castes of Kerala.

The chief goddess of vaniya community is Muchilot Bhagavathi and there are 118 muchilot temples in Malabar spread across Kasaragod, Kannur, and Kozhikode districts

Muchilot bhagavathi got that name from Muchilottu PadaNair who was a vaniya nair and chieftain of local king's Army

Vaniyars have 9 illams or clans namely Muchilot,thachilam,Pallikkara,Chorulla,Chanthamkulangara,Kunjoth,Nambram,Naroor,&Valli

Modh ghanchi community of Gujarat are north Indian counterpart of vaniya caste of Malabar

Vaniyars of Malabar have sole organisation for the upliftment of vaniya community in their socio, economic, educational, cultural, employment fields and to strengthen,protect the unity and cultural heritage of the community, It is named vaniya samudaya samithi. The comnunity also runs a school 'Thunchathacharya Vidyalaya' in chovva,Kannur

Famous businessman C. P. Krishnan Nair
Former calicut district collector-Prasanth Nair IAS 
Founder of gemini circus-M.V Shankaran 
T.Raghavan Nair IPS 

Sunday, August 25, 2019

उदयपुर की 'जलपरी' गौरवी सिंघवी ने 'इंग्लिश चैनल' पार करके रचा नया कीर्तिमान

उदयपुर की 'जलपरी' गौरवी सिंघवी ने 'इंग्लिश चैनल' पार करके रचा नया कीर्तिमान


उदयपुर/लंदन। लेक सिटी उदयपुर की 'जलपरी' गौरवी सिंघवी ने शुक्रवार को 'इंग्लिश चैनल' पार करके नया कीर्तिमान रच डाला है। 16 साल की गौरवी इस वर्ष इंग्लिश चैनल पार करने वाली दुनिया की सबसे युवा तैराक बन गई हैं। उन्होंने 38 समुद्री मील की दूरी 13 घंटे 26 मिनट में पूरी की और देश का नाम रोशन किया।

भारत में जब सुबह हो रही थी, तब लंदन में रात को 2.30 से 3 बजे का वक्त था और तब भारत की इस प्रतिभाशाली तैराक का खुली आंखों से देखा हुआ सपना पूरा हो चुका था। इंग्लिश चैनल के अपने अभियान में गौरवी ने समुद्र की तेज लहरों का बहादुरी से सामना किया और अपने लक्ष्य को हासिल किया। गौरवी 2019 में दुनिया की सबसे कठिन 'इंग्लिश चैनल' को पार करने वाली विश्व की सबसे युवा तैराक बन गई हैं।

गौरवी की दादी श्रीमती उषा सिंघवी ने 'वेबदुनिया' को बताया कि गौरवी ने बचपन से इंग्लिश चैनल पार करने का सपना संजोया था। 14 साल की उम्र में जब उसने मुंबई में खार डांडा से गेटवे ऑफ इंडिया तक की 47 किलीमोटर की दूरी लगातार 9 घंटे 23 मिनट में पूरी करने कीर्तिमान बनाया तो तभी वह चाहती थी कि इंग्लिश चैनल को पार करने जाए लेकिन तब उम्र आड़े आ गई, क्योंकि इसके लिए कम से कम प्रतियोगी को 16 वर्ष का होना चाहिए।


उषाजी ने बताया कि गौरवी इसके लिए 5 से 6 घंटे तक तैराकी का अभ्यास करती रहती थी। इस वक्त गौरवी अपने पिता अभिषेक और मां शुभ सिंघवी के साथ लंदन में ही हैं और सभी 5 सितंबर तक उदयपुर लौटेंगे। 

उन्होंने यह भी बताया कि गौरवी में इंग्लिश चैनल का जुनून इस कदर हावी था कि उसने पहले ही दिन से ही कहा था कि मैं यह कर सकती हूं। वह तो 38 मील की दूरी तय करने के बाद वापसी भी करना चाहती थी लेकिन इसके लिए उसे इजाजत नहीं मिली।

गौरवी ने आज जो कामयाबी हासिल की है, उसका पूरा श्रेय उसकी मम्मी को जाता है जिन्होंने उसे प्रोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी बेटी के लिए बहुत मेहनत की है। इस कामयाबी में कोच महेश पालीवाल भी बराबर के हिस्सेदार हैं।

अदम्य इच्छाशक्ति से पाया लक्ष्य : महज 16 साल की उम्र में गौरवी ने इंग्लिश चैनल पार करने का जो लक्ष्य हासिल किया है, वह उसकी अदम्य इच्छाशक्ति और खेल के प्रति समर्पण भावना का ही परिणाम है। लगातार 5 से 6 घंटे तक स्वीमिंग करना आसान नहीं होता। वह भी एक लड़की के लिए, लेकिन गौरवी ने जो मिसाल कायम की है, वह दूसरों के लिए प्रेरणादायक साबित होगी।

लंदन और डोवर में प्रेक्टिस : गौरवी 11 जुलाई से लंदन में ही रहीं और कड़ा अभ्यास किया। लंदन में गौरवी ने गिनीज रिकॉर्ड होल्डर केविन ब्लिक, 15 बार इंग्लिश चैनल पार कर चुके निक एडम और 2 बार इंग्लिश चैनल पार कर चुके डिएडरा के साथ प्रेक्टिस की। वह 17 डिग्री तापमान वाले पानी में इंग्लिश चैनल को पार करके राजस्थान की दूसरी तैराक बन गई। उससे पहले 2003 में उदयपुर की ही भक्ति शर्मा ने यह कामयाबी हासिल की थी।

पढ़ाई में भी गौरवी अव्वल : गौरवी की दादी श्रीमती उषा के मुताबिक उनकी पोती न सिर्फ खेल, बल्कि पढ़ाई में भी अव्वल है। सीबीएसई की 10वीं बोर्ड की परीक्षा गौरवी ने 93 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की। वह पहले डीपीएस स्कूल में पढ़ती थी लेकिन 11वीं कक्षा के लिए उसने जयपुर के जयश्री पेरीवाल स्कूल में दाखिला लिया है।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जीते कई पदक :

गौरवी ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैराकी की फ्रीस्टाइल और लांग डिस्टेंस रेस में राजस्थान को कई पदक दिलाए हैं।

वह टैडेक्स की स्पीकर भी रही है।

गौरवी सिंघवी के शौक : गौरवी को ट्रेवल करना और पिज्जा के साथ ही देशी खाने का शौक है। उनका 10 साल का छोटा भाई भी है, जो एयरो मॉडलिंग में माहिर है। उसने हाल ही में एबी वैली में आयोजित प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और देश का दूसरा सबसे युवा फ्लाइटर बनने का सम्मान पाया। गौरवी के पिता अभिषेक सिंघवी का राजस्थान में माइनिंग का व्यवसाय है। वे बेराइट्‍स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टर हैं।

साभार: hindi.webdunia.com/sports-news/gauravi-singhvi-119082300094_1.html

VAISHYA STUDENTS TOPPERS, CA INTERMEDIATE EXAM

ICAI CA exams 2019: Akshat Goyal from Jaipur topped the Institute of Chartered Accountancy of India (ICAI) Chartered Accountancy (CA) intermediate examinations (new course), the results of which was declared on Friday, August 23, 2019. Mumbai boy Anil Shah secured the second position followed by Panipat girl Anjali Goyal.

CA TOPPER AKSHAT GOYAL



इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI) ने सीए इंटरमीडिएट परीक्षा 2019 के परिणाम की घोषणा कर दी है। इस परीक्षा में 18 साल के अक्षत गोयल टॉपर बने हैं। उन्हें पहली रैंक हासिल हुई है। लेकिन अक्षत ने जिस तरह से इस परीक्षा के लिए तैयारी की, वह सामान्य से अलग और अनोखा है।

अक्सर टॉपर्स अपनी बेहतर तैयारी का श्रेय कड़ी मेहनत के अलावा सोशल मीडिया और मोबाइल फोन से दूरी बनाए रखने को देते हैं। लेकिन अक्षत गोयल की रणनीति इससे बिल्कुल अलग रही। कहां के रहने वाले हैं अक्षत? कहां से की है पढ़ाई? क्या रहा उनकी तैयारी का तरीका? ये सब हम आपको आगे की स्लाइड्स में बता रहे हैं।

अक्षत जयपुर (राजस्थान) के रहने वाले हैं। वहीं रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की है। इंडिया इंटरनेशल स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद सीए की तैयारी में जुट गए।

अक्षत गोयल कहते हैं कि अगर आपको अच्छे परिणाम चाहिए तो आपका सकारात्मक रहना जरूरी है। उन्हें स्पोर्ट्स में क्रिकेट पसंद है। वह फोटोग्राफी का भी शौक रखते हैं। आगे जानें स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया को अक्षत ने कैसे बनाया तैयारी का जरिया?

दरअसल, अक्षत कॉमेडियन जाकिर खान के बड़े फैन हैं। वह कहते हैं, 'सीए के लिए मैं रोजाना 14 से 16 घंटे तैयारी करता था। पढ़ाई करते-करते जब मैं थक जाता था, तो अपने दिमाग को रिलैक्स करने के लिए स्टैंड-अप कॉमेडी देखता था। खास कर जाकिर खान के शो। मेरा ज्यादातर खाली समय स्टैंड-अप कॉमेडी देखने में ही बीतता था।'

इतना ही नहीं, अक्षत न पारंपरिक तरीकों से हटकर सोशल मीडिया को अपनी तैयारी की रणनीति में जोड़ा। इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर ग्रुप्स का इस्तेमाल किया। वह कहते हैं, 'मैं फेसबुक, इंस्टाग्राम से लेकर अन्य कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय ऐसे कई ग्रुप्स का सक्रिय सदस्य बना। इन ग्रुप्स में सीए और इसकी तैयारी को लेकर कई तरह की चर्चाएं होती थीं। इससे मुझे अलग-अलग तरह की खबरों और दुनिया भर में होने वाली घटनाओं की पूरी जानकारी मिलती रहती थी।'

इसके अलावा अक्षत ने कई मॉक टेस्ट दिए। वह बताते हैं कि 'एक साल तक बिना एक भी दिन गंवाए मैं रोज पढ़ाई करता रहा। आईसीएआई द्वारा दिए गए स्टडी मैटेरियल्स को फॉलो किया। परीक्षा से एक सप्ताह पहले से मॉक टेस्ट्स की पूरी सीरीज की प्रैक्टिस की।'

अक्षत ने सीबीएसई बोर्ड से 12वीं की परीक्षा पास की थी। कॉमर्स संकाय से पढ़ते हुए उन्होंने देश में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। उन्हें 98.8 फीसदी अंक मिले थे। मैथ्स उनका पसंदीदा विषय है। जब भी मौका मिलता है अक्षत मैथ्स के सवाल हल करते हैं। उनके पिता भी एक सीए हैं।

लेख साभार: अमरउजाला 

Friday, August 16, 2019

गुप्त वंश के अग्रवाल वैश्य होने के प्रमाण


साभार: वैश्य भारती , मुदित मित्तल 

CA रिजल्ट में वैश्य समाज का फिट जलवा

Here's a list of CA Final toppers 2019

CA final toppers 2019 (old syllabus)

Ajay Agarwal from Kotputli (Rajasthan) has topped the CA finals (old syllabus) 2019, followed by Radhalakshmi V P from Hyderabad. The third place in Old Syllabus Exam was secured by Umang Gupta from Thane, Maharashtra. Ajay secured 650 marks (81.25 percent) in CA Final (old syllabus).

CA final toppers 2019 (new syllabus)

Nayan Goyal from Bhopal emerged as the topper with 607 marks (75.88 percent), followed by Kavya S from Bengaluru and Arpit Chittora from Jaipur.

CA Foundation toppers 2019

Rajat Sachin Rathi from Pune secured the top honors with 85.70% marks. The second rank in CA Foundation was secured by Kalivarapu Sai Srikar from Srikakulam in Andhra Pradesh. The 3rd Rank was jointly secured by Priyanshi Saboo from Bhopal and Minal Agarwal from Surat.

SQN-LDR MINTI AGRWAL- युद्ध सेवा मेडल

Yudh Seva Medal award: युद्ध सेवा मेडल पाकर स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल ने कहा, 'मौका मिला तो फिर उन्हें मार गिराएंगे' - squadron leader minty agarwal says if chance given we will shoot them again

युद्ध सेवा मेडल पाकर स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल ने कहा, 'मौका मिला तो फिर उन्हें मार गिराएंगे'
विंग कमांडर अभिनंदन की मददगार स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल को उनकी वीरता के लिए युद्ध सेवा मेडल दिया जा रहा है। महिला स्क्वॉड्रन लीडर ने कहा कि एयर स्ट्राइक वह मौका था जिसका सबको इंतजार था। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मौका मिले तो वह भी ऐसे अभियान में हिस्सा लेना चाहेंगी।

Image result for minti agarwal

स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल

स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल ने कहा, 'एयर स्ट्राइक का मौका फिर मिले तो हम फिर उन्हें मार गिराएंगे' 
विंग कमांडर अभिनंदन की मददगार स्क्वॉड्रन लीडर को भी वीरता के लिए युद्ध सेवा मेडल मिल रहा है 
स्क्वॉड्रन लीडर अग्रवाल ने कहा कि विंग कमांडर की सुरक्षित वतन वापसी की खुशी पूरे देश को थी 

बालाकोट एयर स्ट्राइक के अगले दिन ही बौखलाए पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना के विमानों पर हमला किया था। इस दौरान ड्यूटी पर मौजूद स्कवॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल ने अद्भुत सूझबूझ का परिचय दिया। अग्रवाल की इस बहादुरी के लिए उन्हें युद्ध सेवा मेडल भी दिया जा रहा है। स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी कहती हैं कि अगर फिर 27 फरवरी जैसा मौका मिले तो मैं भी उसमें हिस्सा लेना चाहूंगी। हम उन्हें फिर से दोगुनी ताकत से मार गिराएंगे।

27 फरवरी को भारतीय वायु सेना ने एयर स्ट्राइक किया था और अगले ही दिन पाकिस्तान के 20 एयरफोर्स फाइटर्स ने धावा बोल दिया। स्क्वॉड्रन लीडर मिटीं अग्रवाल आकाश में हो रही इस डॉगफाइट की साक्षी थीं और उन्होंने भी कंट्रोल रूम से इसमें साहसिक भागीदारी निभाई। इसी भिड़ंत में विंग कमांडर अभिनंदन ने पाक F-16 को मार गिराया था। 

स्क्वॉड्रन लीडर की ड्यूटी कंट्रोल रूम में थी

स्कवॉड्रन लीडर मिंटी कहती हैं, 'मेरे पास उस दिन के अनुभव को बताने के लिए शब्द नहीं हैं।' 31 साल की अग्रवाल ने बताया कि कंट्रोल रूम में जब पीएएफ की ओर से रेड शुरू हुई तो अचानक ही मेरी पूरी स्क्रीन पर लाइट्स नजर आने लगीं। उन्होंने कहा, 'स्क्रीन पर काफी सारे रेड लाइट्स थे जिसका मतलब है दुश्मन का एयरक्राफ्ट था।' 

फाइट कंट्रोलर की भूमिका में थीं मिंटी

उस दिन की घटना के बारे में कहते हैं, 'फाइट कंट्रोलर के तौर पर यह मेरी ड्यूटी थी कि मैं अपने एयरक्राफ्ट को गाइड करूं... इसके साथ ही मुझे पायलट्स को यह जानकारी भी देनी थी कि वह किन हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं। उन्हें कब और कहां से मिसाइल लॉन्च करना चाहिए। ठीक उसी वक्त मेरा पूरा ध्यान इस पर था कि भारतीय एयरक्राफ्ट पूरी तरह से सुरक्षित रहने चाहिए।'

विंग कमांडर अभिनंदन के मिग को कंट्रोल कर रही थीं अग्रवाल 

स्क्वॉड्रन लीडर ने बताया, 'मैं विंग कमांडर अभिनंदर को भी निर्देश दे रही थी। मैंने उन्हें हवा में क्या स्थिति है पूरी तरह से समझाया। इसी दौरान पाकिस्तानी एयरक्राफ्ट की स्थिति के बारे में उन्हें बताया और उन्होंने अपने टार्गेट पर अचूक निशाना साधा। मैंने अपनी आंखों के सामने ही स्क्रीन पर F-16 को हवा में गिरते हुए देखा था। मुझसे पूछा गया कि क्या स्क्रीन पर से रेड लाइट गायब हो गया और मैंने कहा- हां, लेकिन हमारे पास सेलिब्रेशन का कोई मौका नहीं था।'

इसी हवाई भिड़ंत के दौरान विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में चले गए। स्क्वॉड्रन लीडर ने कहा, 'इस ऑपरेशन में भारतीय सेना का और कोई नुसकान नहीं हुआ। जब हमें पता चला कि विंग कमांडर अभिनंदन सुरक्षित हैं और उनकी वतन वापसी हो रही है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। यह सिर्फ मेरे लिए राहत और खुशी का मौका नहीं था पूरे देश के लिए बहुत खुशी का मौका था।' 

बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसा मौका मिले मुझे' 

27 फरवरी को भारतीय सेना ने एयर स्ट्राइक किया था और स्वक्वॉड्रन लीडर कहती हैं कि मुझे पता है कि यह कोई पहली बार नहीं था। उन्होंने कहा, 'एयर स्ट्राइक वह मौका था जिसके लिए हम सब इंतजार कर रहे थे। मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं... अगर मुझे मौका मिले... हम एक बार उन लोगों को फिर मार गिराएंगे और हम उन्हें फिर से शूट करेंगे।' 

साभार:   नवभारत टाइम्स

Tuesday, July 16, 2019

वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा


◆ वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा

★ महाराज अग्रसेन ने अपने नगर अग्रोहा में बसने वाले नए शख्श के लिए एक निष्क और एक ईंट हर परिवार से देने का नियम बनाया था। ताकि अग्रोहा में आने वाले हर शख्श के पास व्यापार के लिए पर्याप्त पूंजी हो और वो अपना घर बना सके।

★ जगतसेठ भामाशाह कांवड़िया महाराणा प्रताप के सलाहकार, मित्र व प्रधानमंत्री थे। इन्होंने हिन्दवी स्वराज के महाराणा प्रताप के सपने के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था । जिसके बाद महाराणा ने एक के बाद एक किले फतेह किये ।

★ एक घटना है जब गुरुगोविंद सिंहः के बच्चो की मुसलमानो ने निर्मम हत्या कर दी, मुसलमान यह दवाब डाल चुके थे, के उनका दाह संस्कार भी नही होने देंगे !! सभी सिख सरदार भी बस दूर खड़े तमाशा देख रहे थे !!

तब एक हिन्दू बनिया टोडरमल जी आगे आये, उन्होंने जमीन पर सोने के सिक्के बिछाकर मुसलमानो से जमीन खरीदी , जिन पर गुरु गोविंद सिंह के बच्चो का दाह संस्कार हो सके !!

आज उनकी कीमत लगभग 150 से 180 करोड़ रुपये तक बेठती है !!

★ बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के निर्माण के समय महामना मदन मोहन मालवीय सेठ दामोदर दास राठी (माहेश्वरी) जी से मिले थे। उस समय सेठ जी ने BHU के निर्माण के लिए महामना को 11000 कलदार चांदी के सिक्कों की थैली भेंट की जिसकी कीमत आज 1 हज़ार करोड़ रुपये बैठती है।

★ आजादी के दीवानों में अग्रवाल समाज के सेठ जमनालाल बजाज का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए 

यह रहते महात्मागांधी के साथ थे, लेकिन मदद गरमदल वालो की करते थे ! जिससे हथियार आदि खरीदने में कोई परेशानी नही हो !!

इनसे किसी ने एक बार पूछा था, की आप इतना दान कैसे कर पाते है ?

तो सेठजी का जवाब था ---मैं अपना धन अपने बच्चो को देकर जाऊं, इससे अच्छा है इसे में समाज और राष्ट्र के लिए खर्च कर देवऋण चुकाऊं ।

★ रामदास जी गुड़वाला अग्रवाल समाज के गौरव हैं । जगतसेठ रामदास जी गुरवाला एक बड़े बैंकर थे जिन्होंने 1857 की गदर में सम्राट बहादुर शाह जफर (जिनके नेतृत्व में 1857 का आंदोलन लड़ा गया था ) को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। वे चाहते थे देश आजाद हो ।

सम्राट दीवाली समारोह पे उनके निवास पे जाते थे और सेठ उन्हें 2 लाख अशरफी भेंट करते थे ।

उनका प्रभाव देखते हुए अंग्रेजों ने उनसे मदद मांगी लेकिन उन्होंने मना कर दिया था ।

बाद में अंग्रेजों ने उन्हें धोके से शिकारी कुत्तों के सामने फिकवा दिया और उसी घायल अवस्था मे चांदनी चौक के चौराहे पे फांसी पे चढ़ा दिया था ।

लेख साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल सभा 













सेठ रामदास जी गुड़वाला-1857 के महान क्रांतिकारी व दानवीर


सेठ रामदास जी गुड़वाला दिल्ली के अरबपति सेठ और बैंकर थे और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर के गहरे दोस्त थे। इनका जन्म #अग्रवाल परिवार में हुआ था। इनके परिवार ने दिल्ली क्लॉथ मिल्स की स्थापना की थी। उस समय मुग़ल दरबार की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। अधिकांश मुग़ल सरदार बादशाह को नीचा दिखाने वाले थे । अनेक मुस्लिम सरदार गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिले हुए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के कुचक्रों से बादशाह बेहद परेशान थे। एक दिन वे अपनी खास बैठक में बड़े बेचैन हो उदास होकर घूम रहे थे। उसी समय सेठ रामदास गुड़वाला जी वहाँ पहुंच गए और हर प्रकार से अपने मित्र बादशाह को सांत्वना दी। उन्होंने बादशाह को कायरता छोड़कर सन्नद्ध हो क्रांति के लिए तैयार किया, परंतु बादशाह ने खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए असमर्थता प्रकट की। सेठ जी ने तुरंत 3 करोड़ रुपये बादशाह को देने का प्रस्ताव रखा। इस धन से क्रांतिकारी सेना तैयार की।

सेठ जी जिन्होंने अभी तक साहूकारी और व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया। उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी दंग हो गए लेकिन दुःख है की बादशाह के अधिकांश दरबारी दगाबाज निकले जो अंग्रेजों को सारा भेद बता देते थे। फिर भी वे निराश नहीं हुए। सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया और अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया। उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की इस संकट काल में सम्राट की मदद कर देश को स्वतंत्र करवाएं।

सेठ रामदास गुड़वाला जी ने अंग्रेजों की सेना में भारतीय सिपाहियों को आजादी का संदेश भेजा और क्रांतिकारियों ने निश्चित समय पर उनकी सहायता का वचन भी दिया। यह भी कहा जाता है की क्रांतिकारियों द्वारा मेरठ व दिल्ली में क्रांति का झंडा खड़ा करने में गुड़वाला का प्रमुख हाथ था।

गुड़वाला की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत चिंतित हुए। सर जॉन लॉरेन्स आदि सेनापतियों ने गुड़वाला को अपनी तरफ मिलने का बहुत प्रयास किया लेकिन वो अग्रेंजो से बात करने को भी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज़ अधिकारियों ने मीटिंग बुलाई और सभी ने एक स्वर में कहा की गुड़वाला की इस तरह की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से हमारे भारत पर शासन करने का स्वप्न चूर ही जाएगा । अतः इसे पकड़ कर इसकी जीवनलीला समाप्त करना बहुत जरूरी है ।

सेठ रामदास जी गुड़वाला को धोके से पकड़ा गया और जिस तरह मारा गया वो क्रूरता की मिसाल है। पहले उनपर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी घायल अवस्था में चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।

इस तरह अरबपति सेठ रामदास गुड़वाला जी ने देश की आजादी के लिए अपनी अकूत संपत्ति और अपना जीवन मातृभूमि के लिए हंसते हंसते न्योछावर कर दिया । सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है - "सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे। अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उसकी साहूकारी का डंका बजता था।"

परंतु भारतीय इतिहास में उनका जो स्थान है वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है। वह मंगल पांडेय से भी पहले देश की आजादी के लिए शहीद हुए थे इस तरह उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखने योग्य है। दिल्ली की विधानसभा के गलियारे में उनके बलिदान के बारे में चित्र लगा है।

साभार- पं गोविंद लाल पुरोहित जी की पुस्तक 'स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास'

Bhartendu Hariachandra ~ Father of Mordern Hindi Literature .



भारतेन्द्र हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं।भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। जिस समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अविर्भाव हुआ, देश ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ी चरमोत्कर्ष पर थी। शासन तंत्र से सम्बन्धित सम्पूर्ण कार्य अंग्रेज़ी में ही होता था। अंग्रेज़ी हुकूमत में पद लोलुपता की भावना प्रबल थी। भारतीय लोगों में विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण था। ब्रिटिश आधिपत्य में लोग अंग्रेज़ी पढ़ना और समझना गौरव की बात समझते थे। हिन्दी के प्रति लोगों में आकर्षण कम था, क्योंकि अंग्रेज़ी की नीति से हमारे साहित्य पर बुरा असर पड़ रहा था। हम ग़ुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर किये गये थे। हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था। ऐसे वातावरण में जब बाबू हरिश्चन्द्र अवतारित हुए तो उन्होंने सर्वप्रथम समाज और देश की दशा पर विचार किया और फिर अपनी लेखनी के माध्यम से विदेशी हुकूमत का पर्दाफ़ाश किया।

युग प्रवर्तक बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी नगरी के प्रसिद्ध 'सेठ अमीचंद' के वंश में 9 सितम्बर सन् 1850 को हुआ। इनके पिता 'बाबू गोपाल चन्द्र' भी एक कवि थे। इनके घराने में वैभव एवं प्रतिष्ठा थी। जब इनकी अवस्था मात्र 5 वर्ष की थी, इनकी माता चल बसीं और दस वर्ष की आयु में पिता जी भी चल बसे। भारतेन्दु जी विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। इन्होंने अपने परिस्थितियों से गम्भीर प्रेरणा ली। इनके मित्र मण्डली में बड़े-बड़े लेखक, कवि एवं विचारक थे, जिनकी बातों से ये प्रभावित थे। इनके पास विपुल धनराशि थी, जिसे इन्होंने साहित्यकारों की सहायता हेतु मुक्त हस्त से दान किया।

बाबू हरिश्चन्द्र बाल्यकाल से ही परम उदार थे। यही कारण था कि इनकी उदारता लोगों को आकर्षित करती थी। इन्होंने विशाल वैभव एवं धनराशि को विविध संस्थाओं को दिया है। इनकी विद्वता से प्रभावित होकर ही विद्वतजनों ने इन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि प्रदान की। अपनी उच्चकोटी के लेखन कार्य के माध्यम से ये दूर-दूर तक जाने जाते थे। इनकी कृतियों का अध्ययन करने पर आभास होता है कि इनमें कवि, लेखक और नाटककार बनने की जो प्रतिभा थी, वह अदभुत थी। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार थे।

इनकी #मातृभाषा_के_प्रति रचना की कुछ पंक्तियां

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"

 भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अग्रवालों की उत्पत्ति नाम से भी एक ग्रंथ रचना की थी 

साभार: राष्ट्रीय  अग्रवाल सभा 

उत्तर प्रदेश का गौरव अग्रवाल समाज


Image may contain: 7 people, people smiling, text

उत्तर प्रदेश जो जनसंख्या के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा सूबा है उसके उत्थान में अग्रवालों का योगदान। उत्तर प्रदेश से अग्रवाल समाज का गहरा संबंध है। महाराज अग्रसेन का जन्म काशी विश्वनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। महाभारत युद्ध में उन्हें श्री कृष्ण ने भारत वर्ष के पुनरुत्थान का आशीर्वाद दिया था। गुप्त वंश जो धारण गोत्रीय अग्रवाल था उसकी राजधानी पश्चिम उत्तर प्रदेश थी। उत्तर प्रदेश में राजनीति, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, धर्म, उद्योग समाजसेवा लगभग हर क्षेत्र में अग्रवालों का अग्रणी स्थान रहा है । UP के अग्रवालों ने देश और अग्रवाल समाज को कई नगीने दिए हैं। उत्तर प्रदेश को इन्होंने अपने ज्ञान, बुद्धि और मेहनत से सींचा है। कुछ प्रमुख अग्रवाल नाम और घराने जिनकी जन्मभूमि/कर्मभूमि/ मूलभूमि उत्तर प्रदेश थी -

धर्म -

★ गोरखपुर जिले में दो अग्रवालों घनश्याम दास जालान और जयदयाल गोयनका ने हिंदुओं की सबसे बड़ी धार्मिक प्रेस गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की थी।

★विहिप के पूर्व अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल जी जिन्होंने राम जन्मभूमि के लिए सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया और रामलला के लिए चोटिल हुए वो आगरा उत्तर प्रदेश से थे।

★ प्रसिद्ध पर्यावरणविद्य व iit के पूर्व प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद(GD Aggarwal) उत्तर प्रदेश से थे। जिन्होंने माँ गंगा की निर्मलता और शुद्धता के लिए अपने प्राण त्याग दिए।

★अग्रवाल जैन मुग़ल कालीन आगरा के साहू टोडर ने 500 से अधिक जैन स्तूपों का निर्माण किया था।

★सिंघानिया परिवार ने कानपुर में भव्य JK मंदिर का निर्माण किया था ।

★ शिव प्रसाद गुप्त ने काशी का मशहूर भारत माता मंदिर का निर्माण किया था।

उद्योग पति व मीडिया घराने-

★ साहू जैन परिवार - देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी The Times Group की मालिक । ये अग्रवाल जैन परिवार से हैं । यह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बिजनोर से हैं।

★ सिंघानिया परिवार - देश के सबसे बड़े आद्योगिक घराने में से एक सिंघानिया परिवार का मूल उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले का है।

★बड़े हिंदी समाचार पत्र - दैनिक भास्कर के फाउंडर रमेश चंद्र अग्रवाल का जन्म झांसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था व दैनिक जागरण के फाउंडर पुराण चंद गुप्ता का जन्म कालपी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।

★ अमित अग्रवाल - देश का टॉप ब्लॉगर; ये उत्तर प्रदेश के आगरा शहर से है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश की अनेक यूनिवर्सिटी, इंडस्ट्री आदि के मालिक अग्रवाल हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीती - राजनीति में उत्तर प्रदेश के अग्रवालों का अग्रणी स्थान रहा है। उत्तर प्रदेश ने तीन अग्रवाल मुख्यमंत्री(चंद्र भानु गुप्ता, बाबू बनारसी दास, राम प्रकाश गुप्त) दिए हैं। जिन्होंने प्रदेश के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई है। डॉ राम मनोहर लोहिया जिन्हें अग्रवालों का नवरत्न कहा जाता है वो भी उत्तम प्रदेश से थे। उनके नाम पर लखनऊ में एक पार्क और हॉस्पिटल है। उत्तर प्रदेश के वर्तमान वित्त मंत्री भी अग्रवाल समाज से आते हैं । उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं अग्रवालों की कुलभूमि अग्रोहा होकर आये हैं ।

लेखक -

आधुनिक हिंदी के जनक कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी में हुआ था। इन्होंने ही हिंदी में नाटक विधा की शुरुवात की थी। पद्मश्री काका हाथरसी का असली नाम प्रभुदयाल गर्ग था। इनका जन्म हाथरस में हुआ था। इन्हें हास्य सम्राट कहा जाता है। प्रसिद्ध लेखक बाबू गुलाबराय भी उत्तर प्रदेश के अग्रवाल समाज से हैं।

अग्रवाल नवरत्न - विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय 9 अग्रवालों को अग्रवाल नवरत्नों का दर्जा हासिल है। अग्रवालों के 9 में से 5 अग्रवाल नवरत्न की जन्मभूमि या कर्म भूमि उत्तर प्रदेश है । जिनमे शुमार हैं - राम मनोहर लोहिया(भारतीय समाजवाद को दिशा दिखाने वाले), डॉ भगवान दास(भारत रत्न), भारतेंदु हरिश्चन्द्र(आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक), शिव प्रसाद गुप्त(काशी विद्यापीठ के जनक), हनुमान प्रसाद पोद्दार(गीताप्रेस के जनक)।

अग्रवालों के इतिहास लेखन- अग्रवालों का सर्वप्रथम इतिहास भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अग्रवालों की उत्पत्ति के नाम से लिखा था । महालक्ष्मी व्रत कथा का खोज भी इन्होंने ही किया था । अग्रवालों पे इतिहास पे ऐतिहासिक ग्रंथ अग्रसेन अग्रोहा अग्रवाल लिखने वालीं स्वराज्यमानी अग्रवाल जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयाग में हुआ था।

साभार: Prakhar Agrawal, अग्रवाल चिंतक, राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

अग्रोहा_की_कुलदेवी_विष्णुप्रिया_श्री_महालक्ष्मी



हरियाणा में  अग्रोहा नामक स्थान पर महालक्ष्मीमाता भव्य मन्दिर है। अग्रोहा पुरातात्त्विक महत्त्व वाला प्राचीन सभ्यता केन्द्र है जहाँ अनेक पुरावशेष उपलब्ध हुए हैं। पुरातात्त्विक अनुसन्धान से पता चला है कि वहाँ पहले एक नगर था जो सरस्वती नदी के किनारे बसा था। उसका नाम प्रतापनगर था और वह  ब्रह्मावर्त देश के दक्षिण में अवस्थित था।

प्राचीनकाल में भारतवर्ष अनेक जनपदों में विभक्त था। सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच का क्षेत्र ब्रह्मावर्त कहलाता था। महाराज अग्रसेन ने प्रतापनगर को अपनी राजधानी बनाया तो प्रतापनगर अग्रोहा नाम से विख्यात हुआ। महाराज अग्रसेन ने अग्रवाल समाज के वंशप्रवर्तक आदिपुरुष थे। वे सूर्यवंश की वंशपरम्परा में महाराज वल्लभ के पुत्र थे। महाराज अग्रसेन के बाद उनका कुल कुलदेवी महालक्ष्मी के वरदान से उनके ही नाम से अग्रवाल कहलाने लगा।

नागराज कुमुद की पुत्री माधवी से विवाह करने के कारण महाराज अग्रसेन की इन्द्र से शत्रुता हो गई। तब उन्होंने गुरु गर्ग मुनि से मन्त्रदीक्षा प्राप्त कर महालक्ष्मीमाता की आराधना की। महालक्ष्मीमाता ने उन्हें अजेय होने का प्रथम वरदान दिया तथा कुलदेवी के रूप में उनके तथा उनके वंश के संरक्षण करने का द्वितीय वरदान दिया। महाराज अग्रसेन ने अपनी राजधानी अग्रोहा में महालक्ष्मीमाता का भव्य मन्दिर बनवाया। महाराज अग्रसेन के बाद उनकी अनेक पीढ़ियों ने अग्रोहा का शासन किया।

सिकंदर के भारत आक्रमण तक अग्रोहा व्यापार की दृष्टि से सबसे बड़ा केंद्र था। कालान्तर में अनेक कारणों से उजड़ कर वह नगरी ध्वस्त हो गई। फलस्वरूप अग्रवंश का प्रवास देश के विभिन्न राज्यों में हो गया।

आधुनिक युग में अग्रवाल वैश्यों ने अपनी उद्गमस्थली अग्रोहा के संरक्षण और विकास में रूचि ली। वहाँ पुरातत्त्वज्ञों की देख-रेख में उत्खनन कराया गया तथा पुरावशेषों को संरक्षित किया गया। वहाँ कुलदेवी महालक्ष्मीमाता के मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया गया। अब अग्रोहा का महालक्ष्मीमन्दिर अग्रवाल-समाज का प्रमुख श्रद्धाकेन्द्र है।

महाराज अग्रसेन को कुलदेवी महालक्ष्मी के वरदान के विषय में अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इनमें महालक्ष्मीव्रतकथा नामक एक संस्कृत रचना तथा श्री भारतेन्दु द्वारा रचित पुस्तक ‘अग्रवाल की उत्पत्ति’ प्रमुख है। प्रस्तुत कथा इन्हीं प्राचीन कथाओं के मुख्य बिन्दुओं पर आधारित है। इसकी रचना में ऐतिहासिक व पुरातात्त्विक साहित्य तथा जनश्रुति का भी आश्रय लिया गया है।

जय जय श्रीलक्ष्मीनारायण जय महाराज अग्रसेन जय अग्रोहा 

साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा












Anamika Jain Ambar (Poetess) - अनामिका जैन अम्बर




डॉ. अनामिका जैन अम्बर देश की विख्यात हिंदी कवयित्री हैं. हिंदी-उर्दू कवि सम्मेलन, मुशायेरे में उनका नाम इन दिनों सबसे ऊपर आता है. मौलिकता, कवित्व, चरित्र, सौम्यता, नैतिक मूल्यों के प्रति उनका समर्पण आदि उनकी प्रमुख विशेषताएं हैं. अनेक टीवी सीरियल्स में हिंदी कविता को समर्पित उनके काव्य पाठ आते रहते हैं. आइये जानते हैं कुछ देश की इस बड़ी कवयित्री के विषय में...

काव्य परिचय:

अनामिका जैन अम्बर बाल कवयित्री हैं. बचपन से ही उनको कविता लिखने एवं बोलने का शौंक था. उनकी कविता "शहीद के बेटे की दीपावली" से उन्हें खूब पहचान मिली. छोटी सी बच्ची जब काव्य मंचों से देश के सैनिकों का दर्द गाती थी तो सबकी आँखे नम हो जाया करती थी. इस कविता के बाद उनका लेखन दिन दुनी रात चौगुनी गति से बढ़ता गया. वर्तमान हिंदी काव्य मंचों पर मौलिकता की दृष्टि से सबसे ऊपर यदि किसी कवयित्री का नाम लिया जाता है तो वह निर्विवाद डॉ. अनामिका जैन अम्बर का नाम होता है. 

उनकी कुछ प्रमुख रचनाओ में

शहीद के बेटे की दीपावली

दामिनी (दिल्ली बलात्कार कांड पर आधारित कविता)

रुक्मणी (भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी के पत्नी अधिकार को लेकर लिखी कविता)

कंगना (बिटिया की विदाई पर)

महाराणी पद्मावती (पद्मिनी)

पी संग खेले होली रे...

आँखों के रस्ते मेरे दिल में समां गया...

पतझर में जो बसंत की बहार कर गए....

आँखों के इस कारोबार में....

अपने मोहन की मैं संवरी हो गई...

आओ झूमो नाचो गाओ....

बंद पिंजरे के कैद परिंदे....

आदि न जाने कितनी कवितायेँ उनकी कलम से निकली जिन्होंने उनकी जिव्हा से श्रोताओं के दिलों तक का सफ़र तय किया....


डॉ अनामिका अम्बर ने पहला मंच सन 1997 में चौदह वर्ष की अल्पायु में पढ़ा था. उसके बाद अनवरत उनकी काव्य यात्रायें जारी हैं. देश भर के बड़े मंचों पर उनको जनता का अपार नेह मिलता रहा है. कविता का उनके जीवन में इतना प्रभाव था की उन्होंने जीवनसाथी के रूप में भी हिंदी काव्य मंचों के लाडले कवि सौरभ जैन सुमन को अपना जीवन साथी चुना. 

माँ शारदे की कृपा स्वयं पर मानने वाली डॉ अनामिका अम्बर ने माँ को समर्पित "माँ शारदे वंदना" का ऐसा सृजन किया की यदि अब वह मंच पर हों तो सरस्वती वंदना करने का अवसर किसी अन्य को देना संचालक के लिए संभव ही नहीं हो पाता. माँ सरस्वती के 108 नामो को आधार बनाते हुए गढ़ी हुई स्तुति का कोई तोड़ नहीं है.

डॉ अनामिका जैन अम्बर के काव्य उपलब्धियों के विषय में जितना कहा जाए कम है...उनकी पहचान उनकी कविता है....उनकी शाश्वत प्रस्तुति है....उनकी वाक्पटुता, उनकी मुखरता, उनकी सादगी, उनकी कवितव् पर पकड़ है....

टीवी पर अनामिका:

यूँ तो अनेक चैनल डॉ अनामिका अम्बर की कविताओं को दिखाते रहते हैं किन्तु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

सब टीवी का प्रसिद्ध शो "वाह वाह क्या बात है"

जीवन परिचय:

डॉ अनामिका अम्बर का जन्म सन 1983 में बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के धनगौल ग्राम में हुआ. उनके पिता श्री उत्तम चंद जैन ललितपुर शहर के नामी वकील हैं. उनकी माता श्रीमती गुणमाला जैन गृहणी हैं. अनामिका की आरंभिक शिक्षा ललितपुर के कोंवेंट विद्यालय में हुई. एक ओर जहाँ उन्होंने लौकिक शिक्षा ग्रहण की वहीँ माता जी के धार्मिक संस्कार भी उनमे कूट कूट के समा रहे थे. बचपन से ही हिंदी के प्रति उनकी रूचि उन्हें हिंदी कविताओं की ओर खींचने लगी. उनको संगी साथी भी ऐसे ही मिल गए जो कविता के प्रति रुचिकर थे. उनका साथ अनामिका को और अधिक बल देने लगा. धीरे धीरे उनकी रूचि उनको हिंदी कविता के मंच तक ले आयी. बाल कवयित्री के रूप में उन्हें श्रोता मन से सुनने लगे. पारिश्रमिक के रूप में मिलने वाला बहुत थोडा मान उन्हें प्रेरक पुरस्कार सा लगने लगा.

बारवी कक्षा के बाद उनका चयन सी.पी.एम.टी. में हो गया. किन्तु पूरे खानदान में इकलौती बेटी होने के कारण परिवार ने उन्हें डाक्टरी की पढाई के लिए दूर भेजना उचित नहीं समझा इसलिए उन्होंने ग्वालियर के जीवाजी विश्व् विद्यालय से विज्ञान में स्नातक एवं परास्नातक पास किया. पढाई के प्रति उनकी निष्ठां उन्हें वाचस्पति की डिग्री की ओर ले गई. जीवाजी यूनिवर्सिटी से ही उन्होंने Ph.D. किया. 

इसी मध्य हिंदी काव्य मंचों के युवा कवि सौरभ जैन सुमन के साथ उनकी भेंट हुई. दोनों की जोड़ी को हिंदी मंचो पर पसंद किया जाने लगा. 6 वर्ष अनवरत उनके साथ कविता के मंच करने के बाद सन 2006 में दोनों ने घर वालों की सहमती से विवाह किया. उसके बाद हिंदी काव्य मंचों का प्रथम विख्यात कवियुगल होने का गौरव भी प्राप्त किया. यूँ तो कुछ और भी नाम ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी मंचों पर एक दुसरे को जीवन साथी के रूप में चुना है किन्तु सौरभ सुमन-अनामिका अम्बर में विशेष ये रहा की विवाह के उपरांत भी दोनों मंच पर अपनी प्रस्तुति देते रहे और सफलता के शिखर की ओर अग्रसित होते रहे. आज कवि सम्मेलनों के मंच पर एक मात्र युगल दंपत्ति के रूप में दोनों स्थापित हैं.


सौरभ-अनामिका के इस पुनीत युगल को दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम क्रमशः काव्य-ग्रन्थ रखा गया. दोनों बेटो में भी शुरू से कविता के गुण हैं. काव्य जहाँ छोटी सी आयु में शब्द संयोजन में विशेष रूचि रखता है वहीँ छोटा बेटा ग्रन्थ प्रस्तुति के मैदान में तेजी से आगे बढ़ रहा है. 

डॉ अनामिका अम्बर ने मेरठ में अपना एक निजी प्ले-स्कूल भी खोला हुआ है. जिसका सञ्चालन वह स्वयं करती हैं. लगातार बाहर रहने के कारण प्राचार्य एवं संचालक मंडल स्कूल देखता अवश्य है किन्तु व्यस्त रहते हुए भी अनामिका अपना पूरा समय स्कूल को देती हैं.

साभार: anamikajainambar.blogspot.com/2017/10/profile-anamika-jain-ambar-poetess.html