Pages

Sunday, December 8, 2019

MILKBASKET- चार दोस्तों ने शुरू की थी कंपनी, आज कर रहे हैं करोड़ों का कारोबार

चार दोस्तों ने शुरू की थी कंपनी, आज कर रहे हैं करोड़ों का कारोबार

बिजनेस में दो बार की असफल कोशिशों, लाखों रुपए गंवा बैठने के बाद, तीसरे दौर में गुरुग्राम के चार दोस्तों की कंपनी 'मिल्क बास्केट' ने बाजार का विश्वास जीत लिया है। कंपनी अब एक अरब डॉलर के लक्ष्य की ओर है। दो दिन पहले ही कंपनी ने 72.73 करोड़ रुपए और जुटा लेने का ऐलान कर अपने कम्पटीटर्स को चौंका दिया है। 

मिल्कबास्केट की फाउंडिंग टीम 

बिजनेस के कठिन इम्तिहान में बार-बार फेल होने के बावजूद कोई, इतनी बड़ी कामयाबी हासिल कर ले कि बाकी बिजनेसमैन उसकी नकल करने लगें, बाजार में उसके अंदाज में सक्सेस होने के सपने देखने लगें और उन सब के देखते-देखते वह एक दिन उनसे और बड़ी कोई बाजी मार ले जाए, एक झटके में 72 करोड़ से ज्यादा रुपए जुटा ले, फिर तो मान लेना चाहिए कि असली चैम्पियन तो वही है, बाकी उसके पीछे-पीछे। और वह सफल कंपनी है गुरुग्राम (हरियाणा) की 'मिल्क बॉस्केट', जिसे कभी चार दोस्तों ने मिलकर शुरू की थी।

वर्ष 2015 में चार व्यवसायी साथियों अनंत गोयल (कंपनी के वर्तमान सीईओ), आशीष गोयल, अनुराग जैन और यतीश तालवडिया ने 'मिल्कबास्केट' की नींव डाली थी। इससे पहले कठिन हालात में उनके दो वेंचर फेल हो चुके थे, जिनमें उनके लाखों रुपए डूब गए थे, लेकिन उससे हार मान लेने की बजाय उन्होंने अपनी असफलताओं के नए सबक लिए, बिजनेस के नए-नए पाठ पढ़े, नफा-नुकसान के हिसाब-किताब लगाए, कंज्यूमर्स के फीडबैक लिए। अब कंपनी प्रबंधन वर्ष 2021 तक एक अरब डॉलर के वार्षिक आवर्ती राजस्व प्राप्त करने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। मिलबॉक्सेट ने अब तक मेफील्ड एडवाइजर्स, बेनेक्स, कलारी कैपिटल, यूनिलीवर वेंचर्स, लेनोवो कैपिटल, ब्लूम वेंचर्स आदि से लगभग 180 करोड़ रुपए जुटाए हैं।

इन चारो दोस्तों अनंत, आशीष, अनुराग, यतीश ने सबसे पहले वर्ष 2012 में ऑन-डिमांड सर्विस देने के लिए एक पेंट कंपनी की शुरुआत की और छह लाख रुपए लगाकर तीन महीने के भीतर लगभग चालीस-बयालीस घरों और फर्मों को ऑन-डिमांड पेंट भी कराया लेकिन कंपनी बैठ गई। उनका सर्विस मॉडल फेल हो गया। उससे सबक मिला कि बाजार के हाव-भाव ठीक से पढ़ लेने के बाद ही किसी बिजनेस में हाथ डालना चाहिए। आज के दौर में अपने प्रॉडक्ट या काम की बेहतर ब्रान्डिंग के बिना सक्सेस मिलना असंभव है।

उसके बाद चारों दोस्तों ने पुराने खराब अनुभवों और नए सबक के साथ, प्रॉपर्टी प्रबंधन और किराये पर उपलब्ध कराने का दूसरा बिजनेस शुरू किया। इसमें तो एक ही साल में 25 लाख रुपए डूब गए। फेल्योर की वजह थी, बिना ठीक से जाने-बूझे ऐसा काम शुरू कर देना, जिसकी किसी को जरूरत ही न हो। दो बार असफल होने के बाद चारो दोस्तों ने अपने पहले के कामों के चयन को लेकर आपस में काफी माथापच्चियां कीं, कुछ ही वर्षों में इतने रूपए गंवा बैठने का काफी अफसोस किया, फिर भी सफर जारी रखते हुए वर्ष 2015 में तीसरी कोशिश में उन्होंने 'मिल्क बास्केट' कंपनी से अपनी सफलता की इबारत लिख डाली।

अब तो कई कंपनियां 'मिल्क बास्केट' को फॉलो करने लगी हैं। अब उनके निवेशक आंख मूंदकर उनके किराना डिलिवरी स्टार्टअप 'मिस्क बॉस्केट' पर भरोसा करने लगे हैं। उसी भरोसे के कारण दो दिन पहले उन्हें इतनी बड़ी कामयाबी मिली है। उनकी कंपनी ने यूनिलीवर वेंचर्स की अगुवाई में मेफील्ड इंडिया, कलारी कैपिटल, ब्लूम वेंचर्स आदि की इंडियन यूनिटों से लगभग 72.73 करोड़ रुपए जुटा लिए हैं। मिल्कबास्केट के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा निवेश है। मिल्कबास्केट का साढ़े आठ हजार से अधिक स्टॉक कीपिंग इकाइयों की वृहद श्रृंखला से गैर-दुग्ध उत्पादों से 70 प्रतिशत से अधिक राजस्व आता है। इसके साथ ही कंपनी ने पिछले छह-सात महीनों के भीतर देश के चार शहरों में अपनी सेवाएं शुरू कर दी हैं। अब तो देश की इस पहली माइक्रो डिलिवरी प्ले टफॉर्म कंपनी की पचास हजार से अधिक परिवारों तक रोजाना की सीधी पहुंच है।

कंपनी को उम्मीद है कि वह वर्ष 2022 तक रोजाना करीब 10 लाख लोगों को अपनी सर्विस देने लगेगी। कंपनी का ध्यान निवेश के साथ ही अपनी टीम मजबूत और बड़ी करने पर भी है। उसने अपनी टीम में दो हजार और कर्मचारी जोड़ लिए हैं, जिनमें डेढ़ हजार फुल टाइम और पांच सौ पार्टटाइम काम पर हैं। कंपनी पार्ट टाइम कर्मचारियों के तौर पर स्टूडेंट्स और माइक्रोआन्त्रापेन्योीर्स की मौका दे रही है। ये कर्मचारी गुरुग्राम में रोजाना मॉर्निंग डिलीवरी कर रहे हैं। कंपनी ने पिछले साल ही करीब 30 लाख डॉलर की फंडिंग जमा कर ली थी। उससे पहले उसने चाइनीज और देसी वेंचर कैपिटल फर्म्स। से 10 लाख डॉलर की फंडिंग पहले चरण में ही जुटा ली थी।

साभार: yourstory.com/hindi/the-four-friends-started-the-company-are-doing-bus

Saturday, December 7, 2019

दो आइआइटीयन, मेरठ के सौरभ गर्ग और हापुड़ के अमित अग्रवाल की सफलता की कहानी


नो ब्रोकर! अदद कमरे की तलाश में शुरू किया स्टार्टअप

दो आइआइटीयन, मेरठ के सौरभ गर्ग और हापुड़ के अमित अग्रवाल की सफलता की कहानी

महानगरों में उपलब्ध करा रहे सुविधा, नहीं लेते कोई कमीशन, पांच साल में जुटाया 850 करोड़ का निवेश

दो आइआइटीयंस मेरठ के सौरभ गर्ग और हापुड़ के अमित अग्रवाल का बिजनेस आइडिया कम समय में ही 850 करोड़ रुपये का बड़ा निवेश जुटा चुका है। इनका स्टार्टअप ‘नो ब्रोकर’ महानगरों में उन लोगों के लिए मददगार बना है, जो किराए का कमरा, मकान, दुकान, ऑफिस के लिए बिचौलियों के चक्कर काट कर थक जाते हैं। उन्हें यह सरल, सुरक्षित और बड़ा प्लेटफार्म उपलब्ध करा रहा है। सबसे बड़ी बात, बिना कमीशन लिए।

किराए के कमरे की तलाश में सौरभ और अमित को भी अन्य छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं की तरह बिचौलियों (ब्रोकर) के चक्कर लगाने पड़े थे। कमीशन पर भी भारी भरकम खर्च करना पड़ता था। सौरभ बताते हैं, तब हमने सोचा कि क्यों न इसी विषय में बिजनेस की संभावना खोजी जाए। कुछ ऐसा किया जाए कि महानगरों में पहुंचे बाहरी छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को किराए के कमरे की तलाश में बिचौलियों के चक्कर में न पड़ना पड़े।

अमित कहते हैं, महानगरों में रेंट और प्रॉपर्टी एजेंट्स की भरमार है, लेकिन इनमें से अनेक इस विधा के आदर्श तौर-तरीकों को अमल में नहीं लाते हैं। कमीशन भी इतना, कि जेब ढीली हो जाए। वहीं, रेंट एग्रीमेंट, सेल डीड, रजिस्ट्री आदि के लिए भी भटकना पड़ता है। इसका भी भारी चार्ज वसूलते हैं। लिहाजा, हमने सर्वे किया। पाया कि महानगरों में इस काम का बहुत बड़ा बाजार है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा सुव्यवस्थित नहीं है। यहां से हमें अपना बिजनेस फामरूला मिल गया।

सौरभ मेरठ, उप्र से हैं और आइआइटी मुंबई से पढ़ाई की है। जबकि अमित अग्रवाल भी उप्र के हापुड़ से हैं और आइआइटी कानपुर से उन्होंने पढ़ाई की है। इनके साथ ही एक अन्य दोस्त निखिल भी जुड़े। आइआइटी के बाद सौरभ, अमित और निखिल आइआइएम अहमदाबाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई के दौरान मिले और दोस्त बने। इसके बाद नौकरी के सिलसिले में अलग-अलग जब एक शहर से दूसरे शहर गए तो किराए के कमरे की तलाश में वही परेशानी रही। आखिरकार, जमा किए कुछ पैसों से तीनों ने मिलकर वर्ष 2014 में अपना यह स्टार्टअप शुरू किया। बेंगलुरु प्रयोग स्थल बना। यहां से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद मुंबई, चेन्नई और पुणो तक विस्तार किया। अब दिल्ली-एनसीआर में भी उन्हें अच्छा अनुभव हो रहा है।

अमित अग्रवाल बताते हैं कि उनके स्टार्टअप नोब्रोकर.कॉम ने बिचौलियों की जरूरत को खत्म कर दिया है। एपबेस्ड इस प्लेटफार्म पर या तो किराया पर कमरा देने वाले मकान मालिक हैं या कमरे की तलाश करने वाले लोग। दोनों से कोई कमीशन नहीं लिया जाता है, लिहाजा यूजर्स की संख्या हजारों पहुंच गई है। उपयोगकर्ताओं की यही विशाल संख्या इन्हें बड़ा बिजनेस दिलाती है। अमित ने बताया, हम दोनों ओर से कोई कमीशन नहीं लेते हैं, लेकिन रेंट एग्रीमेंट, सेल डीड, रजिस्ट्री और लोन दिलाने जैसे सहायक कामों के जरिये हमें इन सेवाओं को उपलब्ध कराने वाली कंपनियों, बैंक, लॉ फर्म जैसे सेवाप्रदाताओं से थोक बिजनेस देने के बदले मोटा कमीशन मिल जाता है।

इन दोस्तों ने बताया कि इनके स्टार्टअप को अब तक विदेशी कंपनियों से 850 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्राप्त हो चुका है। स्टार्टअप को मिल रहे बिजनेस और मुनाफे को देखते हुए अन्य बड़ी कंपनियां भी निवेश के लिए रुचि दिखा रही हैं।

साभार: दैनिक जागरण 



SWATI MALIWAL - एक जुझारू व्यक्तित्व

Swati Maliwal



Chairperson Of Delhi Commission for Women 

Swati Maliwal (born 15 October 1984) is an Indian activist and politician. She is the current Chairperson of Delhi Commission for Women.
Personal life

Maliwal was born in Ghaziabad, Uttar Pradesh on 15 October 1984,[1] in a Maheswari family. She went to Amity International School and then received a bachelor's degree in Information Technology at the JSS Academy of Technical Education.[1] She is married to Pandit Naveen Jaihind of Aam Aadmi Party who was born on 1 June 1981 in Bhainsru Kalan village of Rohtak district in Haryana.


Political career


Maliwal started her first term as Chairperson of Delhi Commission for Women in July 2015.[3] At the time, she was the Aam Aadmi Party leader.[3] Her tenure in the position was extended another three years in July 2018.[4] She is the youngest person to hold the role of commissioner for women.

In 2018, she went on a 10-day hunger strike which started on April 13. She had several demands, including the passage of an ordinance requiring the death penalty for individuals who rape children under age 12, recruiting police under United Nations standards and demanding accountability of the police. Maliwal sent her demands to Prime Minister Narendra Modi. Her strike took place during a series of protests surrounding two alleged rapes of girls ages 16 and 8. Members of an organization, Rape Roko (Stop Rape) were supportive of Maliwal.

SABHAR: WIKIPEDIA

Monday, December 2, 2019

PRIYAM GARG - INDIA'S UNDER 19 CAPTAIN

अंडर 19 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय टीम की कप्तानी करेंगे मेरठ के प्रियम गर्ग

प्रियम गर्ग - फोटो : अमर उजाला

अंडर-19 क्रिकेट से लेकर यूपी रणजी टीम में अपनी पहचान बना चुके मेरठ के दाएं हाथ के बल्लेबाज प्रियम गर्ग को नई जिम्मेदारी मिली है। प्रियम को जनवरी में साउथ अफ्रीका में होने वाले अंडर-19 वर्ल्डकप में इंडिया की कप्तानी सौंपी गई है। 
मुंबई में आयोजित बीसीसीआई की एजीएम बैठक में टीम चयन को लेकर मंथन हुआ। जिसमें यूपीसीए सचिव युद्धवीर सिंह सहित अन्य राज्यों के क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारी मौजूद रहे। जिनमें पूर्व क्रिकेटर मौ. अजहरुद्दीन भी शामिल थे। बैठक में इंडिया अंडर-19 टीम के लिए सदस्यों का चयन कर लिया गया। जिसके बाद बीसीसीआई द्वारा अधिकारिक घोषणा की गई। 


प्रियम के पिता नरेश गर्ग, दो बड़ी बहनें और भाई शिवम - फोटो : अमर उजाला

अंडर-19 विश्वकप की कप्तानी प्रियम गर्ग के हाथों में रहेगी जबकि मेरठ के कार्तिक त्यागी भी टीम में शामिल किए गए हैं। वहीं मुरादाबाद से ध्रुव चंद जुयाल उपकप्तान बने हैं। रविवार देर रात तक क्रिकेट कोच संजय रस्तोगी से लेकर प्रियम गर्ग के किला परीक्षितगढ़ निवासी परिजन बीसीसीआई की वेबसाइट पर चयनित टीम की सूची अपलोड होने का इंतजार करते रहे। 

प्रियम के पिता नरेश गर्ग ने बताया कि प्रियम के कप्तान बनने की उम्मीद तो पूरी थी, क्योंकि इंडिया अंडर-19 टीम में प्रियम को लगातार कप्तानी मिली है, जिसमें वो कामयाब भी रहा है। जबकि वर्तमान में यूपी रणजी टीम की कमान भी प्रियम को सौंपी गई है। कोच संजय रस्तोगी ने बताया कि प्रियम को वर्ल्डकप में इंडिया अंडर-19 टीम की कप्तानी मिली है, ये मेरठ के साथ उत्तर प्रदेश के लिए गौरव की बात है। 

ये हैं प्रियम गर्ग की उप्लब्धियां
भुवनेश्वर कुमार के कोच संजय रस्तोगी के अंडर में प्रशिक्षण लेकर प्रियम गर्ग ने अंडर-14, 16 ,19 व यूपी की रणजी टीम में शानदार प्रदर्शन किया। हाल में इंग्लैंड में आयोजित त्रिकोणीय श्रृंखला में प्रियम की कप्तानी में ट्रॉफी पर कब्जा किया गया। प्रियम ने यूपी अंडर-14, 16, 19 व रणजी मैचों में कई दोहरे शतक जमाए हैं। अंडर-19 वर्ग में यूपी की ओर से दो बार डबल शतक लगा चुके हैं।

साभार:  अमर उजाला, मेरठ

SUNITA SRAVAGI - GOOGLE EXPERT

साभार : नवभारत टाइम्स 

Monday, November 4, 2019

NITIN SHAH - नितिन शाह

सगे भाई से धोखा खाने के बाद महज 20 रुपये से शुरू किया कारोबार, आज हैं 1,000 करोड़ के मालिक

यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिन्होंने कड़ी मेहनत, लगन और संघर्ष के साथ सफलता की सीढ़ी पर पहला कदम रखा और लगातार कड़ी मेहनत करते हुए आज जो मुकाम हासिल किया, वह ज्यादातर लोगों के लिए एक सपना सा है। बड़े भाई से धोखा खाने के बाद इस शख्स के जेहन में जब ख़ुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा प्रकट हुई तो, जेब में पड़े महज़ 20 रुपये की रकम ने सपनों पर पानी फेर दिया। लेकिन हार न मानते हुए 500 रुपये उधार लेकर उन्होंने अपने सपने की नींव रखते हुए 1000 करोड़ के विशाल साम्राज्य की स्थापना कर डाली।

सफलता की यह कहानी है भारत के दिग्गज कारोबारी नितिन शाह की। महाराष्ट्र के छोटे कारोबारी परिवार में पैदा लिए नितिन के पिता जीनीथ फायर सर्विसेज नाम से एक छोटी सी अग्नि शमन यंत्र बनाने की दुकान चलाते थे। नितिन पढ़ाई से वक्त निकाल कर छोटी उम्र से ही अपने पिता के साथ काम किया करते थे।


फ़ोटो साभार: फोर्ब्स

कॉलेज में दाख़िला लेने के बाद भी नितिन अक्सर छुट्टियों में पिता के साथ ही काम करते। लेकिन परिवार में सबसे छोटा होने की वजह से उनके बड़े भाई ने उन्हें दखलंदाज़ करते हुए पैत्रिक कारोबार पर कब्ज़ा जमा लिया। बचपन से ही व्यापार में दिलचस्पी रखने वाले नितिन को बेहद दुखी हुए और उन्होंने ख़ुद का कारोबार शुरू करने की ठान ली। लेकिन दुर्भाग्य से व्यापार शुरू करने के लिए उनके जेब में उस वक़्त महज 20 रुपये थे।

अपने शुरूआती संघर्ष को याद करते हुए नितिन बताते हैं कि “मैंने दोस्त से 500 रूपए उधार लिए और उसके ऑटो गराज में काम करना शुरू किया। यह बात जनवरी 1984 की है, तब तक मैं मेकैनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर चुका था। पिता के साथ काम करते-करते कुछ कॉन्टेक्ट भी बनाए थे, उनमें से एक डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (डीएई) में सीनियर एडवाइजर थे। उन्होंने मुझे डिपार्टमेंट में फायर एकस्टिंगुइशर की मेंटेनेंस का कॉन्ट्रेक्ट दिया।

इस कॉन्टेक्ट के मिलने के बाद नितिन को शुरूआती सफ़लता मिली। इस काम के लिए उन्होंने तीन लोगों को अपने साथ रखा और काम शुरू किया। शुरूआत में उनके पास काफी कम इक्विपमेंट्स थे, लेकिन उन्होंने उसी से शुरूआत करते हुए अपना काम जारी रखा।

छह-सात माह में ही नितिन ने 20 लाख रूपए जमा कर लिए और 1200 स्क्वायर फीट जमीन खरीदकर नितिन फायर प्रोडक्शन इंडस्ट्री नाम से एक कंपनी की शुरुआत की। कई छोटे-छोटे काम के आधार पर कंपनी को 1986 में ओएनजीसी में मेंटेनेंस का कॉन्ट्रेक्ट भी मिल गया। यह कॉन्ट्रेक्ट कंपनी को एक नए पायदान पर पहुंचाने में कारगर साबित हुआ।

वर्ष 1986 के अंत तक कंपनी का टर्नओवर 7 करोड़ रूपए के पार हो गया। वर्ष 1987 में कंपनी का विस्तार करते हुए नितिन ने 1 करोड़ रूपए में गुजरात के उमरगांव में 50,000 स्क्वायर फिट जमीन खरीदी और यहां 25 कर्मचारियों के साथ अग्नि शमन यंत्र बनाने की शुरूआत की। हालांकि उस समय उनके मुंबई का कारोबार छोटा ही था।

फ़ोटो साभार: बिज़नेस स्टैंडर्ड

नितिन ने बिना रुके बिना थके अपने कारोबार को आगे बढ़ाते हुए साल 1988 में गोआ में ऑफिस खोला और इक्विपमेंट्स की डिजाइनिंग, मैन्यूफैक्चरिंग और मेंटेनेंस जैसी सुविधाएं देना शुरू किया। इसके बाद 1989 में यूके की कंपनी अपोलो फायर डिटेक्टर्स से साथ हाथ मिलाते हुए जून 2007 को 65 करोड़ रूपए का आईपीओ लाए।

साल 2008 में इन्होनें नितिन वेंचर्स के माध्यम से एक एक 30 साल पुरानी संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी न्यू एज कंपनी में हिस्सेदारी खरीदने शुरू कर दिए। 2010 में उन्होंने कंपनी को पूरी तरह से अधिगृहित कर लिया। इस कंपनी के अबू धाबी, दुबई और शारजाह में कार्यालय के साथ सभी जगहों पर अग्नि सुरक्षा प्रणाली भी स्थापित है।

हाल ही में यूरोपीय बाजार में अपनी पैठ जमाने के उद्देश्य से नितिन ने एक यूरोपियन वेंचर की स्थापना की है। आज यह दुनिया की एकमात्र कंपनी है जो अक्रिय गैसों, रासायनिक गैसों और पानी सहित सभी प्रकार के अग्नि सुरक्षा उत्पादों की पेशकश कर रहे हैं। महज़ 500 रूपये की मामूली रकम से शुरू होकर आज कंपनी का टर्नओवर 1,000 करोड़ रूपए के पार है। 

kenfolios.com/page/view-post

NEERA ARYA - वैश्य गौरव


 Image may contain: 5 people, drawing



नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी | नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -



5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था।

इन्हें नीरा ​नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनके भाई बसंत कुमार भी आजाद हिन्द फौज में थे। इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई।

नीरा नागिन और इनके भाई बसंत कुमार के जीवन पर कई लोक गायकों ने काव्य संग्रह एवं भजन भी लिखे | 1998 में इनका निधन हैदराबाद में हुआ।

नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी।

आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।

आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की। नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -

‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?

जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया। अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।

‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।

मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्याअंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’ उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ...’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’

जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’ ‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’ ‘‘नेताजी जिंदा हैं....झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा। ‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’ ‘‘तो कहाँ हैं...।’’ ‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’

जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया...लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था...लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे...’’

उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।

जय हिन्द, जय माँ भारती, वन्देमातरम !!!

पढ़ने के बाद ही रूह कांप जाती है जिन पर बीती होगी उसका दर्द वही जानते होंगे नमन हैं ऐसे क्रांतिवीरों को!

TELI VAISHYA SUB CASTE - तेली वैश्य समाज की उपजातिया

No photo description available.
साभार: चेतना सन्देश 

जज अग्रवाल ने रचा इतिहास

लेख साभार : नवभारत, नागपुर 

Friday, October 18, 2019

MODH VANIK_मोध वैश्य

Lord Brahma, Vishnu and Mahesh created Brahmins who were master in Vedas. So that they can turn Dharmaranya in a centre of veda sanshkriti. The lords asked to Vishwakarma to build houses forts and temples reside for the Brahmins. Brahma, Vishnu and Mahesh created six thousand Brahmins each. They also gave them gotras and gotrasdevi. According to historians the people created by vishnu were sober and honest nature, the people created by Brahma were of rajas nature and people created by Shiva were of angry nature. 

Brahmin could consented on their work, Brahma created kamdhenu caw and on order of Brahma kamdhenu created 36000 people by digging earth by her nails. Those were known as gobhuja or gobhva. They settled in nearest Modhera so that village known by Gabhu. Brahma gave the responsibility of protection of Dharmaranya to his daughter Shreemata.

{From Wikipedia, the free encyclopedia, Source : http://en.wikipedia.org/wiki/Modh}

Modh are the followers of Modheshwari Maa (also known as Matangi Maa), a form of Amba Maa with eighteen hands. They lived in a town called Modhera in Patan District in the northern part of Gujarat. The name of the town Modhera was adopted by the community living around the temple of Modheshwari Mata. The residents of Modhera were from the four caste systems, the Brahmins (priests), Kshatriyas (warriors), Vaishyas (merchants), and the Shudras (services providers). Later on, after 10th century onwards, the predominant community of Modhera consisted of the Brahmins and the Banias. The residents of Modhera migrated to other parts of Gujarat and Maharashtra states to towns such as Surat, Bulsar, Navsari, Mandvi, Bharuch, Ankaleshwar, Bardoli, Billimora, Chikhli, Gandevi, Dharampur, Bombay, Varanasi etc. Hence, the descendants who originated from the township of Modhera whether they are Brahmins, Vanias, Kshatriyas or Harijans are all referred to as Modhs.It is believed that the Modhs are further divided into Dasha and Visha like any other Gujarati nyat (community). The residents of satellite townships of Modhera like Mandal,adalaj,Gobha also prefixes their town name like Mandaliya Modh, Adalja Modh, Gobhva Modh. The residents who lived on right (dakshin bhag) of townships are called Dasha and those living on left flank (vaam bhag)are called visha. While Dasa Modhs are essentially in business. a subsect of Visha Modhs are called as “GOWBHUJA”. Reference is made in Ramayan that during fight between Viswamitra and Vashisht muni – On Order of Vashisth muni Sabala cow created an army from her arms to defend herself & ashram of Vashist muni and the descendents of these soldiers are also referred to as ‘Gowbhuja’. Visha Modhs are in Land & Jewellary Business.In the past century, many folks from the Modh community have migrated to countries such as East Africa, South Africa, United Kingdom, United States of America, Canada, Fiji and the gulf countries.

 Modh Vanik 

Adalja, Mandaliya, Madhukara, Teli Modi, Modh Modi, Champaneri Modi, Prema Modi, Modh Patel all are parts of Modh Vaniks. 

Dasa vaniks started work of physically serve and Visa vaniks started financial sponsorships. 

When Rama was reconstruction of Dharmaranya, Rama donated talvar and two chammars to Modh Vaniks. 

When Modh Vanik goes to marriage he put talvar and flays two chammars. 

Allouddin Khilji concord Gujarat in 10th century and looted the temples of Gujarat. When he used to attach the temples, Modhs faced him very bravely. But they could not defeat Muslims and migrated to different places and settled in different places.

Some modh Vaniks went to Adalaj so they known Adalja

The one who went to Mandal they known as Mandaliya.

In the third yuga the reinsertion of Vishnu Lord Ram his wife sita and his brothers came here to offer. Their repentance as Ram had killed devil the raven who was also a Brahmin. Ram saw the people of Dharmaranya have migrated to other places and the Brahmins also had left the town. 

One day Ram heard a sound of woman’s crying. He sent his people to find out who she is. The lady refused to say anything except for Ram. So Ram went to her, consoled her and asked her problem. She said though you have come here, this town will remain as it is without people. The well were people used to have a holy deep, today pigs are swims are messing up the place. So please reestablish this town and oblige me. Ram agreed to do so and called back all the Brahmins who had left the town. He got houses and temples reconstructed. Hanuman also went around and asked Baniyas to resettle in Dharmaranya. About 1, 25, 000 Baniya settled in the town from Mandal with blessing of Ram. They all were known Mandaliya.

Modh Vaniks have two by caste Dasa and Visa. Who established of right hand of Kamdhenu, they known Dasa and who established of left hand of Kamdhenu they known Visa. Actually all are Gaubhuja Vaniks. Modh Vaniks are prayers to little Lord Krishna Lalaji Thakorji. Lord Ram is istadev of Modh Vaniks.

The one who worked of farms they known Modh Patel. Maximam people of Modh Patels in Sabarkatha district in Gujarat. 

Importantly: We Modh Gandhi belongs to –
Vaishyas (merchants) – subcaste of Modh Vanik***


*** according to Historians

The famous AcharyaHemachandra (1089 – 1172), advisor to ChalukyaKumarpal
BhattarakaKumudachandra of Bardoli of Mula Sangh, reigned during 1599-1630. He wrote 28 texts and was the composer of 30 padas. His main disciples were Abhayachandra (who succeeded him), Bramhasagar, Dharmasagar, Sanyamsagar etc. He wrote in Rajasthani with a touch of Gujarati. He also wrote in Marathi. 

Seth Laxmidas & Laxmandas 1812 – 1857) Hyderabad – Deccan. Top financier to Nizam 
Mahatma Gandhi, philosopher, humanitarian and the leader of India’s swarajya movement. Father of Nation. 

Sir Purshottam Das, a member in Nehru‘s Cabinet. 
Devkaran Nanji founder of Dena Bank. 
Dhirubhai Ambani, founder of Reliance Industries. 
Rachit Dalal, founder of Ray Vision. 

While most Modhs remained shiv / Mata upasak few of them became Vaishnava Hindus or occasionally Jains.

Needless to say:
India’s Current Prime Minister Mr. Narendra Modi is from Our Own Community,
as we all knows the fact...

‘WE PROUD AS GANDHI’

लेख साभार : modhgandhisamaj.wordpress.com/history/we-as-modhs


रियासत कालीन भारत की अर्थव्यवस्था और मारवाड़ी व्यापारियों का महत्व

रियासत कालीन भारत की अर्थव्यवस्था और मारवाड़ी व्यापारियों का महत्व


बचपन से ही राजस्थान के किले, हवेलियाँ आदि देखने के बाद मन सोचता था कि उस राजस्थान में जहाँ का मुख्य कार्य कृषि ही था और राजस्थान में जब वर्षा ही बहुत कम होती थी तो कृषि उपज का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि कितनी उपज होती होगी? सिंचाई के साधनों की कमी से किसान की उस समय क्या आय होती होगी? जो किसी राजा को इतना कर दे सके कि उस राज्य का राजा बड़े बड़े किले व हवेलियाँ बनवा ले| जिस प्रजा के पास खुद रहने के लिए पक्के मकान नहीं थे| खाने के लिए बाजरे के अलावा कोई फसल नहीं होती थी| और बाजरे की बाजार वेल्यु तो आज भी नहीं है तो उस वक्त क्या होगी? राजस्थान में कर से कितनी आय हो सकती थी उसका अनुमान शेरशाह सूरी के एक बयान से लगाया का सकता है जो उसने सुमेरगिरी के युद्ध में जोधपुर के दस हजार सैनिको द्वारा उसके चालीस हजार सैनिको को काट देने के बाद दिल्ली वापस लौटते हुए दिया था – “कि एक मुट्ठी बाजरे की खातिर मैं दिल्ली की सल्तनत खो बैठता|”


मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जिस राज्य की प्रजा गरीब हो वो राजा को कितना कर दे देगी ? कि राजा अपने लिए बड़े बड़े महल बना ले| राजस्थान में देश की आजादी से पहले बहुत गरीबी थी| राजस्थान के राजाओं का ज्यादातर समय अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को रोकने के लिए आत्म-रक्षार्थ युद्ध करने में बीत जाता था| ऐसे में राजस्थान का विकास कार्य कहाँ हो पाता ? और बिना विकास कार्यों के आय भी नहीं बढ़ सकती| फिर भी राजस्थान के राजाओं ने बड़े बड़े किले व महल बनाये, सैनिक अभियानों में भी खूब खर्च किया| जन-कल्याण के लिए भी राजाओं व रानियों ने बहुत से निर्माण कार्य करवाये| उनके बनाये बड़े बड़े मंदिर, पक्के तालाब, बावड़ियाँ, धर्मशालाएं आदि जनहित में काम आने वाले भवन आज भी इस बात के गवाह है कि वे जनता के हितों के लिए कितना कुछ करना चाहते और किया भी|

अब सवाल ये उठता है कि फिर उनके पास इतना धन आता कहाँ से था ?

राजस्थान के शहरों में महाजनों की बड़ी बड़ी हवेलियाँ देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी कई सेठों के पास तो राजाओं से भी ज्यादा धन था और जरुरत पड़ने पर ये सेठ ही राजाओं को धन देते थे| राजस्थान के सेठ शुरू ही बड़े व्यापारी रहें है राजा को कर का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं व्यापरियों से मिलता था| बदले में राजा उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराते थे| राजा के दरबार में सेठों का बड़ा महत्व व इज्जत होती थी| उन्हें बड़ी बड़ी उपाधियाँ दी जाती थी| सेठ लोग भी अक्सर कई समारोहों व मौकों पर राजाओं को बड़े बड़े नजराने पेश करते थे| कालेज में पढते वक्त एक ऐसा ही उदाहरण सुरेन्द्र सिंह जी सरवडी से सीकर के राजा माधो सिंह के बारे में सुनने को मिला था- राजाओं के शासन में शादियों में दुल्हे के लिए घोड़ी, हाथी आदि राजा की घुड़साल से ही आते थे| राज्य के बड़े उमराओं व सेठों के यहाँ दुल्हे के लिए हाथी भेजे जाते थे|


सीकर में राजा माधोसिंह जी के कार्यकाल में एक बार शादियों के सीजन में इतनी शादियाँ थी कि शादियों में भेजने के लिए हाथी कम पड़ गए| जन श्रुति है कि राजा माधो सिंह जी ने राज्य के सबसे धनी सेठ के यहाँ हाथी नहीं भेजा बाकि जगह भेज दिए| और उस सेठ के बेटे की बारात में खुद शामिल हो गए जब दुल्हे को तोरण मारने की रस्म अदा करनी थी तब वह बिना हाथी की सवारी के पैदल था यह बात सेठजी को बहुत बुरी लग रही थी| सेठ ने राजा माधो सिंह जी को इसकी शिकायत करते हुए नाराजगी भी जाहिर की पर राजा साहब चुप रहे और जैसे ही सेठ के बेटे ने तोरण मारने की रस्म पूरी करने को तोरण द्वार की तरफ तोरण की और हाथ बढ़ाया वैसे ही तुरंत राजा ने लड़के को उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया और बोले बेटा तोरण की रस्म पूरी कर| यह दृश्य देख सेठ सहित उपस्थित सभी लोग आवक रह गए| राजा जी ने सेठ से कहा देखा – दूसरे सेठों के बेटों ने तो तोरण की रस्म जानवरों पर बैठकर अदा की पर आपके बेटे ने तो राजा के कंधे पर बैठकर तोरण रस्म अदा की है| इस अप्रत्याशित घटना व राजा जी द्वारा इस तरह दिया सम्मान पाकर सेठजी अभिभूत हो गए और उन्होंने राजा जी को विदाई देते समय नोटों का एक बहुत बड़ा चबूतरा बनाया और उस पर बिठाकर राजा जी को और धन नजर किया| इस तरह माधोसिंह जी ने सेठ को सम्मान देकर अपना खजाना भर लिया|

इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है कि राजस्थान के राजाओं के पास धन कहाँ से आता था| राजाओं की पूरी अर्थव्यवस्था व्यापार से होने वाली आय पर ही निर्भर थी न कि आम प्रजा से लिए कर पर|

व्यापारियों की राजाओं के शासन काल में कितनी महत्ता थी सीकर की ही एक और घटना से पता चलता है- सीकर के रावराजा रामसिंह एक बार अपनी ससुराल चुरू गए| चुरू राज्य में बड़े बड़े सेठ रहते थे उनके व्यापार से राज्य को बड़ी आय होती थी| चुरू में उस वक्त सीकर से ज्यादा सेठ रहते थे| जिस राज्य में ज्यादा सेठ उस राज्य को उतना ही वैभवशाली माना जाता था| इस हिसाब से सीकर चुरू के आगे हल्का पड़ता था| कहते है कि ससुराल में सालियों ने राजा रामसिंह से मजाक की कि आपके राज्य में तो सेठ बहुत कम है इसलिए लगता है आपकी रियासत कड़की ही होगी| यह मजाक राजा रामसिंह जी को चुभ गई और उन्होंने सीकर आते ही सीकर राज्य के डाकुओं को चुरू के सेठों को लूटने की छूट दे दी| डाकू चुरू में सेठों को लूटकर सीकर राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते और चुरू के सैनिक हाथ मलते रह जाते| सेठों को भी परिस्थिति समझते देर नहीं लगी और तुरंत ही सेठों का प्रतिनिधि मंडल सीकर राजाजी से मिला और डाकुओं से बचाने की गुहार की|

राजा जी ने भी प्रस्ताव रख दिया कि सीकर राज्य की सीमाओं में बस कर व्यापार करो पूरी सुरक्षा मिलेगी| और सीकर राजा जी ने सेठों के रहने के लिए जगह दे दी, सेठों ने उस जगह एक नगर बसाया , नाम रखा रामगढ़| और राजा जी ने उनकी सुरक्षा के लिए वहां एक किला बनवाकर अपनी सैनिक टुकड़ी तैनात कर दी| इस तरह सीकर राज्य में भी व्यवसायी बढे और व्यापार बढ़ा| फलस्वरूप सीकर राज्य की आय बढ़ी और सेठों ने जन-कल्याण के लिए कई निर्माण कार्य यथा विद्यालय, धर्मशालाएं, कुँए, तालाब, बावड़ियाँ आदि का निर्माण करवाया| जो आज भी तत्कालीन राज्य की सीमाओं में जगह जगह नजर आ जाते है और उन सेठों की याद ताजा करवा देते है|

इस तरह के बहुत से सेठों द्वारा राजाओं को आर्थिक सहायता देने या धन नजर करने के व जन-कल्याण के कार्य करवाने के किस्से कहानियां यत्र-तत्र बिखरे पड़े| बुजुर्गों के पास सुनाने के लिए इस तरह की किस्सों की कोई कमी ही नहीं है| अक्सर राजा लोग ही इन धनी महाजनों से जन-कल्याण के बहुत से कार्य करवा लेते थे| बीकानेर के राजा गंगासिंह जी के बारे में इस तरह के बहुत से किस्से प्रचलित है कि कैसे उन्होंने धनी सेठों को प्रेरित कर जन-कल्याण के कार्य करवाये| वे किसी भी संपन्न व्यक्ति से मिलते थे तो वे उसे एक ही बात समझाते थे कि इतना कमाया, नाम किया पर मरने के बाद क्या ? इसलिए जीते जी कुछ जन-कल्याण के लिए कर ताकि मरने के वर्षों बाद तक लोग तुझे याद रखे| और उनकी बात का इतना असर होता था कि कुछ धनी सेठों ने तो अपना पुरा का पुरा धन जन-कल्याण में लगा दिया|


राजा गंगासिंह जी के मन में जन-कल्याण के लिए कार्य करने का इतना जज्बा था कि उन्होंने आजादी से पहले ही भांकड़ा बांध से नहर ला कर रेगिस्तानी इलाके को हराभरा बना दिया था| रेवाड़ी से लेकर बीकानेर तक उन्होंने अपने खजाने व सेठों के सहयोग से रेल लाइन बिछवा दी थी| दिल्ली के स्टेशन पर बीकानेर की रेल रुकने के लिए प्लेटफार्म तक खरीद दिए थे| और यही कारण है कि आज भी बीकानेर वासियों के दिलों में महाराज गंगासिंह जी के प्रति असीम श्रद्धा भाव है|

उपरोक्त कुछ किस्सों व राजस्थान में सेठों व राजाओं के संबंध में बिखरे पड़े किस्सों कहानियों से साफ़ जाहिर है कि राजाओं के पास जो धन था वह गरीब प्रजा का शोषण कर इकट्ठा नहीं किया जाता था बल्कि राज्य के व्यवसायियों द्वारा किये जाने वाले व्यापार से मिलने वाले कर से खजाने भरे जाते थे।

लेख साभार - हुकुम रत्न सिंह शेखावत

GAHOI VAISHYA - गहोई वैश्य

जिसको निज जाति निज देश पर, नहीं हुआ अभिमान | वह नर नहीं, नर पशु निरा है, और है मृतक समान ||

उक्त पंक्तियाँ पढ़ते ही दद्दा का नाम से विख्यात स्व श्री मैथलीशरण गुप्त को स्मरण करने मात्र से ही गहोई उपजाति के कौशल को भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में अपनी दक्षता का कौशल प्रर्दशित करते समस्त गहोई बंधूजन आज भी गौरव का अनुभव करते हैं |

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्व श्री मैथलीशरण गुप्त का राष्ट्र कवि होना गहोई उपजाति नहीं वरन सम्पूर्ण वैश्य जाति का माथा गर्व से ऊपर उठा देता है | दद्दा कि उपजाति का संछिप्त परिचय इसी लेख का हिस्सा है | गहोई उपजती की देश व विदेश में लगभग प्रत्येक क्षेत्र में महान विभूतियाँ रही हैं परन्तु निर्विवादित रूप से राष्ट्रकवि की पदवी से सम्मानित श्री मैथलीशरण गुप्त का नाम सबसे प्रथम स्थान पर लिया जाता है |
हिन्दू धर्म - चार युग - वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा :

हिन्दू धर्म के अनुसार चार युगों सतयुग ( १७२८००० वर्ष), त्रेतायुग ( १२९६००० वर्ष), द्वापरयुग (८६४००० वर्ष) के उपरांत हम वर्तमान में कलयुग (४३२००० वर्ष) में हैं, जिसमें से अभी ५००० से अधिक वर्ष व्यतीत हुए हैं | वेद और गीता भारतीय आर्यों के प्राचीनतम एवं अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं |

गीता में भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशानुसार " चातुर्वन्य मया सृष्टा गुण कर्म विभागश:" से स्पष्ट है की कर्मानुसार ही वर्ण व्यवस्था महाभारतकाल से पूर्व ही उत्तर वैदिक काल में भी वर्ण व्यवस्था थी | कालांतर में वर्ण व्वयस्था ही जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गयी | दोनों में प्रमुख रूप का यह अंतर है की वर्ण का निश्चय व्यवसाय अथवा कर्म से होता था परन्तु जाति का निश्चय जन्म से अथवा कुल से होने लगा | समय बीतने के साथ ही जाती व्यवस्था का वर्ण व्यवस्था पर भारीपन आम व्यक्ति के व्यवहार व सामाजिक ताने बाने के रूप में परिलक्षित होने लगा था | एक वर्ण के लोग एक ही व्यवसाय करते थे परन्तु एक ही जाति के लोग अनेकों व्यवसाय कर सकते थे |

वर्ण व्यवस्था में सहभोज, यहाँ तक की विवाहों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था, अपितु जाती व्यवस्था में सहभोज व अंतरजातीय विवाह भी प्रतिबंधित हैं |

वर्ण व्यवस्थ व जाती प्रथा के अंतर को समझने के लिए दोनों के बीच मौलिक अंतर समझना जरूरी है | जाती व्यवस्था की जटिलताओं के चलते समाज में संकीर्णताएं आती गयीं एवं अनेक उपजातिओं नें भी जन्म ले लिया | जाने माने लेखक श्री नेत्र पाण्डेय की "भारत वर्ष का सम्पूर्ण इतिहास" नामक पुस्तक के अनुसार भी भारत में जाति प्रथा को २००० वर्ष से अधिक प्राचीनतम माना गया है |

वैश्य जाति की उपजातियों में अग्रवाल, गहोई, खंडेलवाल, पुरवार, बाथम, गुलहरे, ओमरे, डिढोमर, कोसर, ओसवाल व खारव्वापुर्वर आदि प्रमुख हैं | वैसे भी उपजातियों के गोत्र व आंकनों में कालांतर के साथ हुए उप्भ्रंशों के बाद भी समानताएं स्पस्ट रूप से परिलक्षित होती हैं |

वैश्य जाति की प्रमुख उपजाति 'गहोई' के बारे में सटीकतम व तथ्य परक अवधारणाओं को सूक्ष्म एवं रुचिपरक विधि से यहाँ पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है |
गहोई वैश्य कौन हैं ??

परिचय

वर्तमान समय में विभिन् क्षेत्रों में अपनी काबलियत का डंका बजाने वाले भारतीयों में वैश्य वर्ग की एक उपजाति 'गहोई वैश्य' के बारे में संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है |

गहोई समाज में प्रचलित परिपाटियों के आधार पर यह स्थापित है की प्राचीनकाल से गहोई वैश्य महाराज दशरथ के मंत्री श्री सुमंत जी के वंसज हैं | हिन्दू धर्म में विवाह के समय मंडप, तेल चढ़ना, कंगन बांधना व खुलना जैसे प्रमुख नेग प्रचलित हैं | विभिन्न वैश्य वर्गों में यह नेग लड़के वाला अपने ही घर पर करने के बाद ही बारात ले जाता है | केवल गहोई वैश्यों के उपरोक्त नेग-संस्कार वधु पक्ष के घर पर ही संपन्न होते हैं | तथ्य परक है की प्रभु श्री रामचन्द्र जी के विवाह वर्णनअनुसार, भगवान श्री राम का मुन्ड़प, तेल चढ़ना, कंगन बंधना, व खुलना आदि संस्कार / नेग राजा जनक के द्वार पर ही हुए थे एवं उन्ही नेग / संस्कारों का अनुकरण श्री सुमंत्र जी नें अपने वंश में अपना लिया था |

इस सम्बन्ध में स्व. श्री राधेश्याम गुप्त (झुंदेले), सेंथल, बरेली उ.प्र. द्वारा लिखित उपलब्ध लेखों का उपसगाहर भी मानने योग्य है की "गहोई वैश्य, वैदिक वर्ण व्यवस्था युग की वैश्य जाति है | गहोई शब्द किसी संस्कृत वैदिक शब्द से बना है एवं कालांतरवश, वर्तमान में अपभ्रंश रूप में गहोई बोला जाता है |

श्री राधेश्याम गुप्त लिखित " जातीय इतिहाश और वंशावली सम्बन्धी आवश्यक द्रष्टव्य नोट्स" में ही उक्त संस्कृत वैदिक शब्द 'गुहा' के बारे में भी काफी प्रकाश डाला है | इसके अतिरिक्त विद्वान मनीषियों में प्रमुख श्री जानकी प्रसाद जी गुप्त (झुंदेले), सेंथल नें भी गहोई विषयों के जातीय इतिहास में "गहोई शब्द की मूल खोज" नामक शीर्षक में गहोई शब्द के संदर्भ में महाभारत के अंतर्गत विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र में भगवान विष्णु के नामों में " करणं कारणं कर्ता विकार्तांग हनो गुह: गुह्यो गभीरो गहनों गुप्तश्च्चक गधाधर:" पाठ पढने का भी उल्लेख किया गया है |

गहोई समाज के प्रमुख लेखक एवं विद्वान मनीषियों - गहोई समाज के इतिहास व गोत्रों इत्यादि के बारे में लेखक अथवा संकलनकर्ता के रूप में अपनी कृतियों को प्रकाशित करवाने वाले मुख्य विद्वान मनीषीगण निम्नानुसार हैं: 
श्री गोपीलाल (गोपीनाथ) जी सेठ, जबलपुर, म.प्र. 
श्री जानकी प्रसाद जी गुप्त (झुंदेले), सेंथल, बरेली, उ.प्र. 
श्री पन्ना लाल जी पहारिया, कोंच, उ.प्र. 
श्री राधेश्याम गुप्ता (झुंदेले), सेंथल, बरेली, उ.प्र. 
श्री झुंडीलाल जी मिसुरह, उरई, जालौन, उ.प्र. 
श्री नारायण दास जी कनकने, लश्कर, ग्वालियर, म.प्र. 
श्री गोविन्द दास जी सेठ, (झाँसी वाले), कोलकत्ता, प. बं. 
श्री राम दास जी नीखरा, झाँसी, उ.प्र. 
श्री मुक्ता प्रसाद जी तरसौलिया, कानपुर, उ.प्र. 

श्री झुंडीलाल जी की पुस्तक "गहोई वैश्य जाति का सचित्र इतिहास".में गहोई जाति की जन्मभूमि, गोत्र, आंकने, गहोई जाति के जैनियों से सम्बन्ध, वेशभूषा, प्रमुख संपत्तियां व ट्रस्ट, गहोई सती स्थान व शिक्षा प्रसार समितियों आदि विषयों पर तथ्य परक विवरण दिया है | इन्होनें सन् १९२० ई. में वकालत की परीक्षा पास करने के उपरांत वकालत के साथ साथ सन् १९२१ ई. में सामाजिक विकास की कड़ी में जुड़ते हुए " गहोई वैश्य के सेवक " नाम से मासिक पत्र भी निकला | आज के समय में यह जानकार आश्चर्य ही होगा की श्री झुंडीलाल जी नें श्री रासिकेंद्र जी को साथ लेकर आजादी से २४ वर्ष पूर्व, १९२४ में कालपी में ' महासभा का राष्ट्रीय अधिवेशन' आहूत किया था |

राष्ट्रीय स्तर पर संचालित होने वाले गहोई महासभा को वर्ष १९१४ ई. में जन्म देने वाले श्री नाथूराम रेजा को समस्त गहोई समाज की ओर से ननम प्रेषित करने का प्रयास कर रहा हूँ | गहोई महासभा के वर्तमान कार्य शैली, पदाधिकारियों का विवरण एवं सूक्ष्म संविधान भी पाठकों को उपलब्ध कराने का प्रयास रहेगा |

महासभा के वर्ष १९२४ ई. में कालपी में हुए विराट अधिवेशन से ही समाज एवं संगठन में एक नई स्फूर्ति का संचार हुआ था | उल्लेखनीय है की सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के प्रयास उसी समय प्रारंभ किये गए थे एवं इसी कारण गहोई उपजाति के वर्तमान विकास का श्रेय उनके पूर्वजों को ही जाता है |

वर्ष १९२४ ई. में हुए अधिवेशन में लिए गए क्रांतिकारी निर्णय आज की पीढी को अवगत करने हेतु कृम्बद्ध रूप का PTO लिखा है

गहोई उपजाति के गोत्र व आंकने:

गोत्र व आंकने के सन्दर्भ में "जाति भास्कर" नामक पुस्तक के अतिरिक्त अन्य प्रमुख लेखकों द्वारा गोत्र व आंकनों के विवरणिका निम्नानुसार ही प्रतीत होती है | क्षेत्रानुसार उच्चारण व प्रचिलित लेखन में कालातर में हुए अपभ्रंश के कारण अश्पष्ठ्ता की श्तिति में निकटतम शब्द को चुनना ही उचित प्रतीत होता है |
गहोई जाति जन्म स्थान, कर्म भूमि एवं वर्तमान मुख्य निवास स्थान:

प्रत्येक मनुष्य को अपनी जन्मभूमि पर गर्व होना तो स्वाभाविक है | निर्विवादित रूप से गहोई वैश्यों की उत्पत्ति बुंदेलखंड में ही रही है | गहोई जाति के पूर्वज यहीं जन्मे एवं तदुपरांत यहीं से ही अन्यत्र स्थानों को गए |

आज पूरे भारतवर्ष में फैले गहोई परिवार कालांतर में बुंदेलखंड से जाकर ही वहाँ बसे हैं | बुंदेलखंड का विस्तार मध्य भारत के उत्तरी भाग में है | गहोई जाति का उत्पत्ति स्थल बुंदेलखंड होने के कारण ही इस जाति के महाराज दशरथ के मंत्री श्री सुमंत जी के वंसज होने के तर्क को और बल मिलता है | यह तो निर्विवादित ही है की वनवास को जाते समय भगवान् श्रीराम को अयोध्या की सीमापार कर चित्रकूट तक श्री सुमंत जी ही विदा करने गए थे | ऐसा भी माना जाता है की चित्रकूट के निकट श्री सुमंत के परिजन निवास करते थे एवं सामने न रहकर भी प्रभु श्रीराम नें सेवाभाव से अभिभूत होकर वनवास का अधिकतम समय चित्रकूट में ही काटा था |

गहोई जाति के शिरोमणी कवि सम्राट श्री मैथिलीशरण गुप्त (कनकने), एवं प्रख्यात कवि श्री द्वारका प्रशाद जी रासिकेंद्र की जन्मभूमि एवं क्रीडा स्थली बुंदेलखंड ही रही है | इसी कड़ी में लगभग ४०० वर्ष पूर्व श्री सुखदेव बडेरिया (भांडेर निवासी) की 'वनिक प्रिया' नाम की पुस्तक अपने समय की श्रेष्ठतम रचनाओं में गिनी जाती थी |
"कृषि, वाणिज्य, गो-रक्षा वैश्य कर्म स्वभावजय" को मानने वाली गहोई जाति के वीरों का इतिहास में खूब बखान किया गया है | गहोई वीरों में लाला हरदौल, चिरस्मरणीय श्री हरजूमल गहोई (महाराजा छत्रसाल के सर्वाधिक विश्वशनीय सेनापति), श्री गंगाराम चउडा की वीरता के कारण ही बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों में इनके चबूतरे बने हुए हैं एवं घर घर आज भी पूजे जाते हैं | गहोई वीरों की चर्चा हो तो गहोई वीर नवलसिंह गोहद को गहोई समाज के साथ-साथ उस समय के शक्तिशाली महाराजा सिंधिया के परिजन भी सदैव याद रखते हैं |

महाराजा सिंधिया की फौज से मुकाबला करते समय रण में शीश कर जाने पर गहोई वीर नवलसिंह का रुंद लड़ता रहा था | "ग्वालियर नामे" नामक पुस्तक में लिखे दोहे को पढने मात्र से ही गौरव का अनुभाग होता है :

" नवल सिंह से सूर जो " लून्वें बीस पचास ते पटेल के काक को करते निपट विनास "

कृषि क्षेत्र में गाहोई जाति का लोहा मानना पड़ेगा की यहाँ कई अंचल तो ऐसे भी हैं की एक ही गाव की जमीन में सभी प्रकार की फसलें पैदा की जाती हैं | गेहूं, चना, जौ, मटर, मसूर, लाही, अलसी, धान, जीरा, गन्ना, आलू, मूंगफली, शकरकंद, आदि सभी वस्तुएं कई गाओं में पैदा होती हैं |

कालांतर में व्यवसाय आदि की द्रष्टि से कई गहोई परिवार देश के विभिन्न भागों में पुनर्स्थापित हो गए एवं समस्त भारतवर्ष में अपनी कार्य कुशलता, कृषि एवं व्यापर के क्षेत्र में डंका बजाया | इनमें कलकत्ता, बम्बई, बंगलोर, दिल्ली, नागपुर, इंदौर, कानपुर, आगरा, सीतापुर, बरेली ( सेंथल व नवाबगंज), पूरनपुर, ओयल, लखीमपुर खीरी, मुरादाबाद, फर्रुखाबाद, पटना, मद्रास, सहारनपुर, मेरठ, आदि स्थानों पर कम संख्या में होने के बाद भी गहोई जाति के लोगों नें अपना विशिष्ठ स्थान सदैव स्थापित रखा है |

वर्तमान में गहोई परिवारों के युवा वर्ग नें शिक्षा के क्षेत्र में ऊंची बुलंदियों को छूने के बाद देश ही नहीं वरन विदेशों में भी विज्ञानं, शिक्षा, कंप्यूटर, तकनीकी, वित्त, चिकित्सा व प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी अपने झंडे गाड रखे हैं |

जिन जिलों में गहोईयों की जनसँख्या अधिक है वहाँ पर ये राजनितिक रूप से भी समर्थ हैं | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है की उरई, मऊरानीपुर, कटनी, डबरा आदि नगर पालिकाओं के अध्यक्ष समय-समय पर गहोई रहे हैं |

गहोई उपजाति के " गई वैश्यों" के नाम से मुरादाबाद और आसपास के क्षेत्रों में " गई वैश्यों" के नाम से बसे कई गहोई परिवार सभासदों के रूप में राजनितिक रूप से भी समाज का नेतृत्व करते हैं |

इस कड़ी में ९५% से अधिल मुस्लिम आबादी वाले क़स्बे - सेंथल (बरेली) में रहने वाले गहोई परिवार पूरे जनपद में एक विशिष्ठ प्रतिष्ठा रखते हैं | उल्लेखनीय है की सेंथल कस्बे में गहोई परिवारों के पूर्वजों नें उच्च न्यायलय में मुकदमा जीतकर मस्जिद के ठीक बराबर में "श्री राधा कृष्ण मंदिर" का निर्माण करवाया था जिसमें आज भी अनवरत रूप से पूजा अर्चना की जाती है |

इसी प्रकार कलकत्ता, दिल्ली, पटना, नागपुर, व इंदौर में अग्रणी व्यवसाइयों में स्थापित गहोई परिवारों को कौन नहीं जानता |

विकाशशील देशों के आर्थिक व सामाजिक मामलों के जानकार, भारतीय विदेश सेवा से सेवानिवृत डा. लक्ष्मी नारायण पिपरसैनियाँ की ख्याति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है | डा. पिपरसैनियाँ भी गहोई समाज में वांछित जाग्रति हेतु सदैव अमूल परिवर्तन के कट्टर पक्षधर रहे हैं | वर्तमान में वयोवृद्ध रूप में भी समाज को दिशा देने का इनका प्रयास सतत जारी रहता है |

साभार:gahoi.org/historyhindi.aspx


MADHESHIYA VAISHYA - मधेशिया वैश्य



मधेशिया का संक्षिप्त अर्थ है- मध्य + एशिया, अर्थात मध्य- एशिया के वासी. अर्थात नेपाल या उसकी तराई में संभवतः मध्य एशिया से आकर बसे लोग या प्रवासी जिन्हें यहां मधेशिया कानू या मधेशिया वैश्य कहा जाने लगा.

भारत में मधेशिया (बनिया) जाति देश के पूर्वी हिस्सों में जैसे पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और आसाम में ज्यादातर रहते हैं. वे सभी हिंदू धर्म के धन-संरक्षक समुदाय के रूप में माना जाता है जो “वैश्य ” समुदाय के हैं .पारंपरिक रूप से वे अच्छी मिठाई बनाने वाले होते हैं. वे अपने स्वयं के भगवान की पूजा करते हैं जो गणीनाथ बाबा के रूप में जाना जाता है. उनके अपने तौर -तरीके और परंपराएँ है. आमतौर पर वे अपनी ही जाति में शादी करतें हैं, लेकिन शादी के लिए अपने मूल के मिलान को तरजीह देते हैं और यदि मूल का मिलान नहीं होता हैं तो वे शादी के लिए योग्य नहीं माना जाता है.

वे गुप्ता, प्रसाद, साह, शाह, साव, मधेशिया आदि उपनाम का प्रयोग करते हैं, कुछ कानू शब्द भी नाम के आगे लिखना पसंद करते हैं. वे सभी भारत ही नहीं अपितु विश्व के कई देशों में फैले हुए हैं. वे अंगिका, हिंदी, भोजपुरी बोली आदि बोलते हैं. उनका मुख्य पेशा प्रधान रसोईया , व्यापार , व्यवसाय की है . बिहार जमींदारी उन्मूलन अधिनियम ( 1959) में संशोधन से पहले कई परिवार जमींदार थे जो बिहार में जमींदारी करते रहे थे. मधेसिया वैश्य विभिन्न वर्गों में बांटे गए हैं: मधेसिया, बालतिरिय या भर्त्रीय, कनौजिया, हलवाई, करोंच, मघैया, कानू.

सन 1893 में बसंतपुर (बिहार) के निपटान के समय मुख्यतः यह बताया गया है कि उस समय व्यापार में मुख्य रूप से लगे हुए लगभग सोलह सौ निवासी थे और केवल नाममात्र लोग ही खेती में सलंग्न था. इसकी जनसंख्या के 50 प्रतिशत से अधिक लोग व्यापारियों के रूप में पहचाना जाते थे.

लेख साभार:
mainekahaa.wordpress.com/2014/04/10/31

अग्रवाल सभा बलरामपुर

Image may contain: 2 people

Image may contain: one or more people, people standing and text

Image may contain: 2 people

Image may contain: 3 people, text

Image may contain: 2 people, people standing and food


Friday, September 13, 2019

SHUBHAM GUPTA, 2018 IAS TOPPER

Success Story: आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई के साथ किया काम, चौथे अटेंप्ट में बने IAS
शुभम ने यूपीएससी सिविल सर्विस का एग्जाम पहली दफा 2015 में दिया था, तब ये प्रारंभिक परीक्षा में पास नहीं हुए थे.

आर्थिक से जूझते हुए, संघर्ष के दिनों में भी, उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया.

Success Story: आज की सक्सेस स्टोरी के जरिए मिलिए आईएएस बन चुके शुभम गुप्ता से. शुभम गुप्ता 2018 के आईएएस टॉपर हैं. इन्होंने All India Rank 6, हासिल की. शुभम ने ये रैंक चौथे अटेंप्ट में हासिल की. शुभम ने यूपीएससी सिविल सर्विस का एग्जाम पहली दफा 2015 में दिया था, तब ये प्रारंभिक परीक्षा में पास नहीं हुए थे. 2016 में जब दूसरी बार एग्जाम दिया तो सिविल सर्विस एग्जाम के तीनों स्टेप, प्रारंभिक, मेन्स और इंटरव्यू पास कर 366वीं रैंक हासिल की. इस रैंक के आधार पर इनकी भर्ती इंडियन ऑडिट और अकाउंट्स सर्विस में हुई.

शुभम 2016 में 366वीं रैंक पाने के बाद भी एग्जाम देते रहे. इन्होंने 2017 में फिर से एग्जाम दिया और इस बार फिर से, तीसरे अटेंप्ट में भी प्रारंभिक परीक्षा क्लीयर न कर सके. पढ़ें इस मुकाम तक पहुंचने वाले शुभम की कहानी.

शुभम की स्कूली शिक्षा देश के अलग-अलग राज्यों से पूरी हुई. सातवीं तक जयपुर (राजस्थान) से पढ़ाई की. आर्थिक तंगी के कारण उनका परिवार महाराष्ट्र के छोटे से गांंव दहानु में शिफ्ट हुआ. गुजरात के वापी के पास स्थित एक स्कूल से 8वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की. परिवार ने कम समय के लिए लेकिन आर्थित तंगी झेली. परिवार की मदद के लिए वे प्रतिदिन वापी में स्कूल पूरा करने के बाद दहानू रोड स्थित परिवार की ही एक दुकान पर काम करते थे.

शुभम गुप्ता

आर्थिक से जूझते हुए, संघर्ष के दिनों में भी, उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया. स्कूल और दुकान दोनों में समय का उपयोग किया. वे अपनी किताबें दुकान पर ले जाते और काम करते हुए पढ़ाई करते. इसी तरह अपने स्कूल की परीक्षा में अच्छे नंबर पाए.

ऐसे मिली आईएएस बनने की प्रेरणा

शभम बताते हैं, जब मैं 5वीं में था. पिताजी मेरे पास आए और कहा कि वह चाहते हैं कि मैं एक दिन कलेक्टर बनूं. मैंने उनसे पूछा ‘कलेक्टर कौन होते हैं?’ उस घटना ने दिमाग में एक छाप छोड़ी. 11वीं में मैंने महसूस किया IAS अधिकारी बनने की आकांक्षा लक्ष्यों को पाने में मदद करेगी.

शुभम गुप्ता के मुताबिक जब वो पांचवीं में थे, तो उनके पिता ने बताया कि वो भी कभी कलेक्टर बनना चाहते थे. जिस पर मैंने सवाल किया कि क्लेक्टर कौन होता है? उस घटना ने मुझे आईएएस बनने की प्रेरणा दी. शुभम जब 11वीं की पढ़ाई कर रहे थे तब उन्हें समझ आ गया था कि यही प्रेरणा उन्हें उनके गोल को पाने में मदद करेगी.

वे बताते हैं कि उनके रोल मॉडल उनके पिता हैं. उन्होंने बहुत संघर्ष किया. कई बार आर्थिक तंगी का सामना किया लेकिन फिर भी हमारे जीवन में सुधार और संतुलन लाने में कामयाब रहे. 

लेख साभार : जागरण जोश 

Tuesday, September 10, 2019

MAHAJAN - जम्मू, हिमाचल, पंजाब की महाजन वैश्य जाति

Mahajan is an Indian surname or title, (e.g., Chaitanya Mahajan) found among several castes and communities. The word "Mahajan" is an amalgam of two Sanskrit words: Maha meaning great, and Jan meaning people or individuals (Respectful people). Over the years, the word Mahajan has become a common generic job title used to describe people involved in money lending and financial services.

CASTE


Mahajans originally are believed to be descendants of King Kuru who were Chandravanshi. He was very religious, just, fair and good administrator. Chandravanshi ruled entire Aryavrat Region. They were descendants of Pandavas & Kauravas. Mahajan word is a very respectable word, meaning high in knowledge, religion and actions. According to Vaman Puran - "Mahajano si mahalroshi mahajano yen gataa sa pantha." God Vishnu was pleased with King Kuru, and King was shifted to Vaishya. God Vishnu said to King Kuru that he has done great job and he is great person. Therefore, your dynasty will be called MAHAJAN and all rulers will be known as Vaishya, because doing agriculture, you have accepted Vaishya. They migrated from central India to Rajasthan and then to Punjab region several hundred years back. A renowned social reformer Lala Hans Raj Mahajan urged people to replace "Gupt" by 'Mahajan' as their surname in the early 20th century as Mahajan word denotes respectable community. The Mahajan community of North India was based in the undivided Punjab region. They are in money lending activities for centuries within the Punjab and nearby areas such as Himachal, Jammu and Kashmir, the present-day state of Punjab, the Punjab province and the North West Frontier area. Most of these Mahajans speak Punjabi and Dogri, and reside in the regions of the Punjab, Jammu, Kashmir and Himachal Pradesh. Mahajans are landlords, traders and business men who were highly respected and have a major influence in the society.



Gujrat and Madhya Pradesh Some People in Gujarat Madhya Pradesh's Nimar region also bear Mahajan as a surname. They also use other common surnames such as Nema. They believe in Srinathji at Nathdwara (Rajasthan) and are staunch vegetarians. In Gujarat, the Bhatia caste also use the "Mahajan" surname, as the Mahajan community was traditionally associated with money lending.




In North India Mahajans surname have been found in many sub castes such as Mahotra, Swaar, Beotra, Sanghois, Phagetra, Jandials, Vaid, Bangwathiya, Langars, Rarotra, Fave (Phave), Padotra, Kubre, Piddu, Gadhede, Chunne, Manath, Karmotra, Kankaal, Lamhe, Khadyals, Kanghal/kaag, Sadad, Paba, Jugnal, Ukhalmunde, Bucche, Gadri, Laira, Kalsotra, Chapate, Bharray, Jadyal, Parru, Rometra, Malguria, Chukarne, Iddar, Chogga, Thathar and Lamma, Makhirru, Bichchu, Thapre, Tathyan, . Mahajans from these sub castes observe annual mail on Sri Guru Nanak Dev's Birthday, usually in November and gather at their respective religious places located in J&K, Punjab, HP and seek blessings of their devta/deity. Family ceremonies such as sutra and mundan are also organised. Prasad is distributed through langars (community food). Each sub caste believes in its own deity, known as devte.



Mahajans are prohibited to marry into the same sub caste because they are considered as brother and sister, according to their belief. Some Mahajans use the castes of Gupta and Jandiyals. The Gupta surname is mostly used by the Mahajans of the Jammu region.



Mahajan as a generic title Mahajan is also used a generic job title referring to people involved in money lending. In this case, a person involved in money lending is referred to as a Mahajan whether or not he is a Mahajan by caste.



In the coastal state of Goa, Mahajan is not used as a family name. It means elders (Maha — great and Zan — person) or respectable people. The Mahajans originally referred to rich merchants, traders, money lenders and bankers. In later its meaning changed to mean the founders of Hindu temples, their patrons and their descendants, who mostly were descendants of the older Mahajans, mentioned before. 



रियासत काल से ही व्यापार पर महाजन समुदाय का दबदबा रहा है। यही वजह है कि आज मंडी शहर में तो महाजनों के नाम पर एक बाजार का नाम भी महाजन बाजार है। वहीं जरूरत के समय राजा को भी ऋण देना या यूं कहें कि राजाआें के भी फाइनांसर महाजन रहे हैं। हालाकि पिछले चार दशकों में महाजन समुदाय के इस मुख्य कार्य में बदलाव आया है। महाजन समुदाय व्यापार की बुलंदियों तक तो पहुंचा ही है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में महाजन समुदाय की नई पीढ़ी ने नए आयाम स्थापित किए हैं। इस समुदाय के कितने ही लोग अब राजनीति के साथ ही सरकारी व निजी क्षेत्र में ऊंचे ऊंचे पदों पर तैनात हैं।



हिमाचल प्रदेश के विकास में यूं तो सभी समुदाय व वर्गों की अहम भूमिका है, लेकिन कम संख्या के बाद भी प्रदेश में महाजन समुदाय के योगदान को अहम दर्जा प्राप्त है। व्यापार के प्रति संजीदगी, दिन-रात मेहनत, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे व्यापार को बढ़ाना, जरूरत से ज्यादा खर्च न करना, समाज और राजनीति में भी पैठ, यह सब खूबियां महाजन समुदाय में भरी हुई हैं। यही वजह है कि महाजन समुदाय अहम योगदान निभा रहा है। आज के समय में ही नहीं बल्कि रियासत काल से हिमाचल प्रदेश में महाजन समुदाय का रुतबा काफी अहम और ऊपर का रहा है। प्रदेश के महाजन समुदाय को गुप्ता, बोहरा, कायस्था के नाम से भी जाना जाता है। महाजन समुदाय ने प्रदेश को कई बडे़-बडे़ व्यापारी, न्यायाधीश, राजनेता, आईएएस अधिकारी, चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षक दिए हैं। इतना ही नहीं,महाजन समुदाय ने देश की आजादी और इसके बाद हिमाचल प्रदेश के गठन में भी अहम भूमिका निभाई है। सुकेत रियासत को हिमाचल में मिलाने के सत्याग्रह आंदोलन में पांगणा के महाजनों ने अहम भूमिका निभाई थी। आजादी से पहले चंबा रियासत, मंडी रियासत और सुंदरनगर की सुकेत रियासत में महाजनों का अहम कि रदार रहा है। प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में महाजन समुदाय की हस्तियों ने अपनी छाप छोड़ी है। अगर बात हिमाचल प्रदेश की ही करें तो हिमाचल प्रदेश में रियासत काल से चला आ रहा महाजन समुदाय का रुतबा व दमखम आज भी कायम है। रियासत काल में महाजन राजा की व्यवस्था में भी अहम भूमिका निभाते रहे। वहीं प्रदेश का ऐसा कोई मुख्य बाजार नहीं है, जहां पर महाजन समुदाय से जुडे़ लोग न मिलें। प्रदेश के हर शहर और छोटे कस्बे में बडे़ व्यापारियों में पांच नाम महाजन समुदाय के लोगों के जरूर मिलेंगे। इस समय प्रदेश में दो लाख के लगभग महाजन समुदाय के लोगों की जनसंख्या है, जिसका एक बड़ा भाग मंडी जिला के साथ सोलन, कांगड़ा और चंबा में है। इस समय प्रदेश के मंडी, करसोग, सुंदरनगर, शिमला, घणाहट्टी, सुन्नी, हमीरपुर, दियोटसिद्ध, कुल्लू, बंजार, रामपुर, अर्की, नाहन, चंबा, नूरपुर, कांगड़ा, पालमपुर, सरकाघाट, रिवालसर और ऊना में भी महाजन समुदाय के लोग काफी संख्या में हैं।

पहले चीफ जस्टिस डा. मेहर चंद महाजन


कांगड़ा के छोटे से गांव में जन्मे न्यायमूर्ति डा. मेहर चंद महाजन का नाम हिमाचल में गर्व के साथ लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पहले चीफ जस्टिस डा. मेहर चंद महाजन का जन्म कांगड़ा के नगरोटा तहसील नूरपूर के छोटे से गांव टिक्का में 23 दिसंबर 1889 को हुआ था। इनके पिता बृज लाल महाजन भी धर्मशाला के प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। डा. मेहर चंद महाजन न सिर्फ देश के पहले चीफ जस्टिस हुए, बल्कि जम्मू-कश्मीर रियासत को भारत में विलय कराने के मुख्य तारणहार डा. मेहर चंद महाजन ही थे। उन्हें उस समय भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बना कर भेजा था। उन्होंने अपनी कुशल नीति व बुद्धिबल से जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत में करवा दिया। कहते हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर की समस्या को प्रस्तुत करने का दायित्व उस समय भारत सरकार डा. मेहर चंद महाजन को देती तो जम्मू कश्मीर के हालात आज ऐसे नहीं होते।

मंडी की मंजुला गुप्ता पहली आईएएस


हिमाचल से पहली महिला आईएएस होने का गौरव भी महाजन समुदाय की मंजुला गुप्ता को है। मंडी की मंजुला गुप्ता बाद में पश्चिम बंगाल सरकार से मुख्य सचिव के पद पर सेवानिवृत्त हुई हैं।

पुनीत गुप्ता दिल्ली एम्स में कैंसर विशेषज्ञ


चिकित्सा के क्षेत्र में भी महाजन समुदाय के लोग नाम कमा रहे हैं। इस समय मंडी के ही पुनीत गुप्ता एम्स दिल्ली में कैंसर विशेषज्ञ हैं, जबकि आईजीएमसी शिमला में मुनीष गुप्ता कैंसर विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह से शिमला में मेडिकल कालेज में प्रोफेसर डीआर गुप्ता भी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं ओर विदेशों में लेक्चर देने के लिए इन्हें बुलाया जाता है। इसके अलावा अन्य फील्ड में भी महाजन समुदाय कार्यरत है। पुरानी मंडी के ही रहने वाले बीएल महाजन एलआईसी में प्रदेश की सबसे बड़ी पोस्ट से सेवानिवृत्त हुए हैं। बीएल महाजन एलआईसी के वरिष्ठ मंडलीय प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। मंडी के ही राजीव महाजन 15 वर्षों से सीए की प्रैक्टिस कर रहे हैं। वहीं, मंडी के ही व्यवसायी धर्म चंद गुप्ता ने समाजसेवी के रूप में राजगढ़ में क ोयला माता मंदिर का भव्य निर्माण करवाया है।

इंग्लैंड में सर्जन डीके गुप्ता


महाजनों में एक नाम मंडी के चैलचौक से डीके गुप्ता का भी उनकी उपलब्धियों के लिए लिया जाता है। डीके गुप्ता पीजीआई सर्जन रहे हैं और उसके बाद इंग्लैंड सरकार में सर्जन के रूप में अपनी सेवाएं कई वर्षों से दे रहे हैं।

स्व. कैलाश महाजन विद्युत परियोजनाओं के जनक


चंबा के ही पद्मश्री अवार्ड से अंलकृत एवं बिजली बोर्ड के चेयरमैन रहे स्व. कैलाश महाजन का भी चंबा के विकास में अहम योगदान रहा। प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं की रूपरेखा स्वर्गीय कैलाश महाजन के कार्यकाल में बनाई गई, जिसके बाद चंबा में कई विद्युत योजनाओं का निर्माण हुआ।
खेमराज गुप्ता ने लिखा सायं-सायं मत कर राविए गीत



चंबा का प्रसिद्ध लोकगीत सायं-सायं मत कर राविए गीत भी महाजन बिरादरी के स्वर्गीय खेमराज गुप्ता ने लिखकर रावी नदी की खूबसूरती को बयां किया। यह गीत आज भी चंबा में हर मौके पर गूंजता है।
मंगलवार को बकरे न काटने का नियम नानक चंद की देन



मंडी में रहने वाले महाजनों ने व्यापार के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी ऊंचे मुकाम हासिल किए हैं। मंडी के स्वर्गीय डा. नानक चंद महाजन प्रदेश के पहले वैटरिनरी सर्जन थे,जिन्होंने लाहुल से डिग्री लेने के बाद अंग्रेजों की हुकूमत से लेकर प्रदेश सरकार में 1970 तक काम किया और पशुपालन विभाग से हैड ऑफ डिर्पाटमेंट के रूप में सेवानिवृत्त हुए। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि मंगलवार को बकरे न काटने का नियम अंग्रेजी हुकूमत में डा. नानक चंद महाजन के प्रस्ताव पर ही बनाया गया था। इसके लिए उनका काफी विरोध भी हुआ था।

सभी जिला में महाजन सभाएं


इस समय हिमाचल के लगभग सभी जिलों में महाजन सभाएं बनी हुई हैं। इसके साथ ही प्रदेश स्तर पर भी महाजन सभा कार्यरत है। अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा हिमाचल प्रदेश के तहत जिला स्तर की महाजन सभाएं पंजीकृत हैं। वर्तमान में हिमाचल सभा के अध्यक्ष शिमला से हरि चंद गुप्ता हैं। महाजन सभा अब प्रदेश के कुछ बडे़ शहरों में महाजन भवन भी बनाने जा रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर महाजन सभा


वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा का गठन किया गया है, जिसमें पूरे देश से महाजन समुदाय के कई वर्ग शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल प्रदेश की भी अहम हिस्सेदारी है। विशेष यह है कि महाजन सभा के हरिद्वार, चंड़ीगढ़, आगरा, दिल्ली और पंजाब के कुछ शहरों में अपने बडे़ सामुदायिक भवन भी बना चुकी है। हरिद्वार में तो महाजन सभा द्वारा 162 कमरों के आलीशान भवन का निर्माण किया गया है।

महाजन सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अशोक गुप्ता


मंडी के ही रहने वाले एवं बहुत बडे़ स्तर के दवा विक्रेता एनसी टे्रडर के नाम से विख्यात अशोक महाजन इस समय मंडी जिला की महाजन सभा के अध्यक्ष हैं। विशेष बात यह है कि अशोक गुप्ता अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं।

हिमाचल के प्रधान हरि चंद गुप्ता


इस अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा हिमाचल प्रदेश के प्रधान शिमला के हरि चंद गुप्ता हैं। हरि चंद गुप्ता हिमाचल सरक ार में विभिन्न बडे़ पदों पर काम कर चुके हैं। सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी के रूप में हरि चंद गुप्ता ने पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस परमार, सत महाजन, विपल्व ठाकुर और अन्य कई बडे़ नेताओं के साथ काम किया है।

डीडी गुप्ता पहले डीआईजी


डीडी गुप्ता सेवानिवृत्त डीआईजी महाजन समुदाय से एसएसबी में डीआईजी तक पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वह प्रतिष्ठित तपोस्थली जंगम के जीर्णोद्वार समिति के संस्थापक व वर्तमान तक निर्विरोध प्रधान हैं। वह कल्याण गोसदन के दो बार प्रधान तथा महाजन सभा के दो बार प्रधान रहे हैं।

डा. वाईसी गुप्ता को दो राष्ट्रीय पुरस्कार


कृषि, बागबानी एवं औद्यानिकी में भी गुप्ता समुदाय ने खूब नाम कमाया है। समुदाय के लोग हिमाचल के दोनों विश्वविद्यालयों में उच्च पदों पर आसीन हैं और कई राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। ऐसा ही एक नाम है प्रोफेसर डा. वाईसी गुप्ता का। डा. वाईसी गुप्ता मूलतः बल्हघाटी के थटा के रहने वाले हैं और नौणी विश्वविद्यालय के फ्लोरिकल्चर एंड लैंडस्केप आर्किटेक्चर विभागाध्यक्ष हैं। डा. वाईसी गुप्ता फूल उत्पादकों के बीच मशहूर नाम हैं। चंबा के चौगान और कल्पा के खेल के मैदानों के पुनर्जीवन की योजना को अंजाम देने वाले डा. वाईसी गुप्ता ही हैं। इनके साथ ही डा. वीके गुप्ता, डा. डारेन गुप्ता, डा. रजंना गुप्ता और डा. राधना गुप्ता पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में शोध कार्य में अहम भूमिका निभा रही हैं।

पवन गुप्ता का सोलन नगर परिषद अध्यक्ष तक का सफर


पवन गुप्ता सोलन का एक जाना-माना नाम है। पवन गुप्ता मूलतः हरियाणा के हैं, लेकिन जन्म और कर्मभूमि अब सोलन ही है। 1999 में बघाट बैंक में दाखिल हुए पवन गुप्ता तीन साल के भीतर ही चेयरमैन बन गए। उन्होंने दो बार यह पद संभाला। फिलहाल वह बघाट बैंक के डायरेक्टर हैं। यही नहीं, उन्होंने सोलन नगर परिषद के चुनाव भी लड़े और उपाध्यक्ष से लेकर अध्यक्ष तक का सफर तय किया।

राजनीतिज्ञ सत महाजन


प्रदेश की राजनीति में महाजन समुदाय का काफ ी प्रभाव रहा है और स्वर्गीय सत महाजन को प्रदेश की राजनीति में फ ील्ड मार्शल के नाम से जाना जाता था। सत महाजन वर्ष 1977, 1982, 1985, 1993, 2003 में नूरपुर विधानसभा के विधायक चुने गए और वह एक बार कांगड़ा-चंबा लोकसभा क्षेत्र के भी सांसद रहे।

अजय महाजन


नूरपुर विधानसभा क्षेत्र से सत महाजन के बेटे अजय महाजन वर्ष 2012 में विधायक बने। अजय महाजन ने भी राजनीति में अपनी सियासी पकड़ बना कर इस क्षेत्र में महाजन समुदाय का नाम ऊंचा किया है।

पहली सांसद लीला देवी


स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार के समय हिमाचल प्रदेश से पहली महिला के रूप में राज्यसभा सांसद लीला देवी बनी थीं। उस समय हिमाचल में टेरीटोरियल काउंसिल हुआ करती थी और स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें राज्य सभा के लिए भेजा था।

आरके महाजन का भी बड़ा रुतबा


नूरपुर नगर परिषद में भी महाजन समुदाय का काफ ी प्रभाव रहा है और शहर की राजनीति में आरके महाजन परिवार का काफ ी रुतबा रहा है। आरके परिवार नगर परिषद नूरपुर में पांच बार अध्यक्ष पद पर रहे हैं। जिसमें नगर परिषद नूरपुर में दो बार आरके महाजन अध्यक्ष बने व तीन बार उनकी पत्नी कृष्णा महाजन अध्यक्ष बनीं।

सियासत में मजबूत पकड़


चंबा जिला की कुल आबादी का 0.5 फीसदी हिस्सा होने के बावजूद महाजन बिरादरी के लोगों ने व्यापार के अलावा राजनीति व प्रशासनिक कार्यकुशलता में प्रतिभा का लोहा मनवाया है। महाजन बिरादरी के धुंरधर नेता रहे स्व. देशराज महाजन, स्व. किशोरी लाल वैद्य और हर्ष महाजन ने वर्षों तक सदर हलके का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा स्व. दौलत राम गुप्ता ने हिमाचल की पहली विधानसभा में पांगी का प्रतिनिधित्व किया। इन नेताओं ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री पद का निर्वहन भी किया। इसके साथ ही महाजन बिरादरी ने व्यापार के क्षेत्र में भी खासा नाम कमाया है। चंबा जिला के अधिकांश कारोबार पर महाजन बिरादरी का ही आधिपत्य है। चंबा की रियासत में भी महाजनों का अहम योगदान रहा। रियासत काल में राज दरबार में महाजन समुदाय की अच्छी पैठ पर अधिकार थे। कुलमिलाकर महाजन समुदाय ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी विशेष पहचान छोड़ी है।

ये भी रहे खास


इसके अलावा केके महाजन ने आईपीएच विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ के पद से रिटायर हुए। सुभाष कल्सोत्रा ने एचएएस अधिकारी पद का मान बढ़ाया। आईएएस अधिकारी नंदिता गुप्ता भी प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता का लोहा मनवा रही हैं और वर्तमान में कांगड़ा जोन की कमिश्नर हैं। इसके अलावा नंदिता गुप्ता के पिता स्वर्गीय नरेंद्र गुप्ता भी आईएएस अधिकारी के तौर पर उत्कृष्ट सेवाएं दे चुके हैं।

मेहनत के बल पर छुआ शिखर


नूरपुर शहर में महाजन समुदाय का काफी महत्त्व है और समुदाय ने अपनी मेहनत से ऊंचे मुकाम हासिल किए हैं। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में महाजन बिरादरी की प्रतिशतता भले ही बेहद कम है परंतु शहर में इनकी संख्या काफ ी अधिक है। इस बिरादरी ने हमेशा अपनी मेहनत के बल पर सफलताओं के शिखर छुए हैं और अन्य समुदाय के लोगों को भी सफ लता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। इस समुदाय के कई व्यक्ति अपनी मेहनत के दम पर व्यवसाय,राजनीति,प्रशासन आदि में ऊंचे मुकाम पर पहुंचे हैं। इस समुदाय के लोगों ने समाजसेवा में भी उलेखनीय कार्य किए हैं, जिससे उन्होंने समुदाय का नाम ऊंचा किया है।

चंबा से चमके कई महाजन सितारे


स्व. देशराज महाजन ने परिवहन व राजस्व मंत्री का दायित्व बखूबी निभाया। वहीं स्व किशोरी लाल वैद्य ने उद्योग व पीडब्ल्यूडी समेत कई अहम विभागों की जिम्मेदारी बतौर कैबिनेट अदा की। स्व. किशोरी लाल ने न केवल चंबा बल्कि भटियात व बनीखेत हलके से भी चुनाव जीता। हर्ष महाजन, जो कि वर्तमान में को-आपरेटिव बैंक के चेयरमैन पद पर आसीन हैं, ने लगातार तीन बार चंबा सदर हलके का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्य संसदीय सचिव के अलावा पशुपालन मंत्री के पद का कैबिनेट मंत्री के तौर पर क ाम संभाला।

स्वतंत्रता सेनानियों का गांव पांगणा


मंडी जिला का पांगणा एक ऐसा गांव है, जहां के पूरे महाजन समुदाय ने आजादी व सुकेत सत्याग्रह में अहम योगदान दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता व पीएल गुप्ता ने बताया कि समाज का उच्च मार्गदर्शन व सहयोग, आजादी में महाजनों की सराहनीय भूमिका रही है। आजाद हिंद फ ौज में पांगणा के सितलु राम महाजन, लुहारू राम महाजन, धरनीधर महाजन, लटुरिया राम महाजन, कालूराम महाजन आदि ने लाहौर, रंगून, मुल्तान और रावलपिंडी की काल कोठरियों में कैद काटी, लेकिन सरकार द्वारा पेंशन व मान-सम्मान प्राप्त करने से वंचित रहे । सुकेत सत्याग्रह के अनाम स्वतंत्रता सेनानियों में चंद्रमणी महाजन, मणिराम महाजन, नंदलाल महाजन, हरि सिंह महाजन, लीपटीराम महाजन, माधव गुप्ता, गौरीदत महाजन, तुलसीराम महाजन और द्रौपदी महाजन सहित कुछ अन्य पांगणा छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं, लेकिन पांगणा गांव के महाजन समुदाय के लोगों की यादें आज भी जिंदा हैं।




लेख साभार: दिव्य हिमाचल, अखिल भारतीय महाजन शिरोमणि सभा