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Sunday, October 4, 2020

दिल्ली की नींव में कुछ अंश अग्रवाल समाज_के

दिल्ली की नींव में कुछ अंश अग्रवाल समाज_के


दिल्ली_की_धरोहर_अग्रवाल_समाज

दिल्ली के इतिहास की परतों को पलटेंगे तो उस पर अग्रवाल समाज का गौरवशाली इतिहास सजा नजर आएगा। एक के बाद एक शासक तो दिल्ली की सत्ता हासिल करने की लालसा रही लेकिन अग्रवाल समाज ने दिल्ली को हर तरह समृद्ध, संपन्न व सम्मानित किया। सबरंग के इस अंक में अग्रवाल समाज किस तरह दिल्ली की धरोहर है इसी के बारे में विस्तार से बता रहे हैं संजीव कुमार मिश्र : 
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दिल्ली का बुनियादी विकास हो या धर्म, कर्म, कला, साहित्य, राजनीति और चिकित्सा हर जगह अग्रवाल समाज की उपस्थिति एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में दिखी। सामाजिक सरोकार से जुड़ी दिखी। तभी दिल्ली की गलियों में आज भी इनके किस्से सुनाए जाते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि उप्र, बिहार तक में विकास कार्यों में जिम्मेदारी निभाई। मंदिरों का निर्माण और पुनरुद्धार करवाया। 

#अग्रोतक_होती_थी_राजधानी 

दिल्ली में अग्रवाल समाज का लिखित इतिहास 900 साल पुराना पता चलता है। अग्रवाल जाति के लोग भगवान अग्रसेन के वंशज हैं। इनकी राजधानी अग्रोतक थी, जिसका वर्तमान नाम अग्रोहा है। यह हरियाणा के हिसार में स्थित है। मुहम्मद गोरी के आक्रमण के बाद अग्रवाल यहां से निकलने शुरू हुए और आसपास के क्षेत्रों में निवास स्थान बनाए। निकटवर्ती दिल्ली, हरियाणा के ही विविध हिस्सों, पश्चिमी उप्र और राजस्थान समेत पंजाब में भी गए। अग्रवालों की प्रारंभिक बस्तियां इन्हीं इलाकों में मिलती हैं। दिल्ली में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार जब राजपूत काल चल रहा था तो पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल तोमर के एक मंत्री नट्टल साहू थे। इन्होंने तत्कालीन प्रसिद्ध कवि विबुद्ध श्रीधर से पाश्र्वनाथ चरित्र की रचना करवाई। नट्टल साहू अग्रवाल जैन थे। यह अपभ्रंश भाषा में लिखी गई है। इसी में सबसे पहले हरियाणा स्थित दिल्ली का वर्णन किया गया है, जिससे पता चलता है कि दिल्ली, हरियाणा का भाग था और उसकी राजधानी भी। राजपूत काल, सल्तनत काल, मुगल काल में प्रशासन, राजनीति, समाज सुधार, उद्योग, धार्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में अग्रवालों का अनुपम योगदान रहा है। नट्टल साहू पहले ज्ञात अग्रवाल मंत्री हैं। सल्तनत काल में भी कई अग्रवाल मंत्री बने। मुगल काल में राय रामप्रताप मंत्री बने। ये एरण गोत्र के थे। ये पहले थे जिन्हें मुगलों ने जनाना महल का मंत्री बनाया। अकबर द्वितीय ने इन्हें आली खानदान की उपाधि दी थी। राम प्रताप मूलरूप से गुडग़ांव अब गुरुग्राम के रहने वाले थे। इनकी वंश परंपरा को राय की भी उपाधि मिली थी। इन्हीं की पीढ़ी से राय इंद्रमणि हुए। जिन्हें बिहार में दीवान पद सुशोभित किया। इन्हें बाद में वहां राजा भी बनाया गया। इंद्रमणि के बाद इनके परिवार के ख्याली राम थे। जो गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष थे। इनके बाद पटनिमल का जिक्र आता है। इनके नाम से पुरानी दिल्ली के पहाड़ी धीरज में पटनिमल गली और खिड़की है। ये बादशाहों के खजांची ज्यादा थे शाहजहां के समय में खंजाची बनने शुरू हुए थे और ब्रिटिश काल में भी खजांची थेे। 

#सोने_के_छत्र_वाला_मंदिर :

पुरानी दिल्ली स्थित धर्मपुरा में एक 200 साल पुराना मंदिर है। जिसे अग्रवाल जैनियों ने बनवाया था। इसे नया मंदिर भी कहते है। यह मंदिर उस समय 8 लाख रुपये में बनवाया गया था। इसमें गर्भ गृह की छत सोने की है। हरसुख राय के लड़के थे सुगन राय। ये बादशाह के खजांची थे। इन्होंने 7 लाख रुपये तो खुद दिए जबकि 1 लाख समाज के लोगों से चंदा इक्ट्ठा किया गया था। इसे बनवाने के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। दरअसल, उस समय मुगल मंदिर नहीं बनाने देते थे, खासतौर पर शिखर वाले मंदिर। चूंकि ये खजांची थे तो इन्होंने बादशाह से विशेष अनुमति लेकर मंदिर निर्माण शुरू करवाया। सात लाख रुपये खर्च हो जाने के बाद भी जब मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हुआ तो फिर एक लाख रुपये चंदा एकत्र किया गया। मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद इसे पंचायती घोषित कर दिया गया था। इसमें कहीं भी लाइङ्क्षटग नहीं है। मंदिर दिन में एक बार सिर्फ सुबह खुलता है। राजा हरसुख राय और सगुन चंद्र ने देशभर में 52 जैन मंदिरों का निर्माण करवाया। अकेले दिल्ली में सात मंदिर थे। जिसमें धर्मपुरा, पटपडग़ंज, जयसिंहपुरा स्थित मंदिर हैं। इसके अलावा बाकि मंदिर उप्र, राजस्थान और हरियाणा में थे। इसी तरह राजा पटनिमल ने कालकाजी मंदिर में भी सेवा कार्य किया। 1810 में 50 हजार रुपये दिए थे। इन्हें अकबर द्वितीय ने राजा का खिताब दिया था। 

ख्याली राम शाहजहां के समय में गुप्तचर रहे  इसी तरह एक सेठ सीताराम थे जो मुहम्मद शाह रंगीला के समय खजांची थे। इनके नाम पर #सीताराम_बाजार है। सीताराम ने मुहम्मद शाह रंगीला को 5 लाख रुपये उधार दिए थे। दरअसल नादिरशाह के हमले के बाद बादशाह का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका था। उस समय सेठ ने मदद की थी। बदले में बादशाह ने इनके निवास स्थान को सीताराम और इनके दो भाइयों के नाम पर कूचा घासी राम, कूचा पातीराम नाम रखा। ये ऐरन गोत्रीय थे। इन्होंने भिवानी के पास स्थित चरखी दादरी में एक लाख रुपये से एक 50 फीट गहरा तालाब बनवाया। हरियाणा सरकार ने इसके सुंदरीकरण पर 10 करोड़ खर्च किए। मुगल काल में #दिल्ली_में_पांच_ऐसे_स्थान_हैं_जो_अग्रवालों_के_नाम_पर_हैं। कूचा पाती राम, घासी राम, सीताराम बाजार, पटनिमल खिड़की व गली, कूचा ख्याली राम। ख्याली राम शाहजहां के समय में गुप्तचर विभाग के प्रमुख थे। 

#अग्रसेन_की_बावली 

दिल्ली में अग्रवाल समाज की पुरानी विरासतों का जिक्र करें तो अग्रसेन की बावली सर्वप्रथम आती है। बाराखंभा स्थित यह बावली 800 साल से ज्यादा पुरानी है। बलुआ पत्थर, चूने के पत्थरों से बनी यह बावली व्हेल के आकार की है। इसमें 108 सीढिय़ां हैं। कहते हैं समय के साथ इसमें बहुत से बदलाव किए गए हैं। नट्टल साहू ने इस बावली का पुनरुद्धार करवाया था। 1990 तक यह पानी से भरी थी लेकिन अब सूख चुकी है। 

#कई_बड़े_कॉलेज_भी_इनकी_देन 

अग्रवाल समाज ने दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। जामा मस्जिद इलाके में स्थित इंद्रप्रस्थ गल्र्स स्कूल के संस्थापकों में रहे। सोसायटी के सेक्रेटरी लाला युगल किशोर थे। वे दिल्ली में 1928 में सनातन धर्म सभा के भी अध्यक्ष रहे। मारवाड़ी पुस्तकालय का जिक्र भी जरूरी है। यह दिल्ली के मारवाड़ी अग्रवाल द्वारा स्थापित है, जिसके केदारनाथ गोयनका संस्थापक थे। पुरानी दिल्ली में ही एक बनवारी लाल आयुर्वेद औषधालय भी था। कोतवाल वाले खानदान ने इसे स्थापित किया था। यहां के पढऩे वालों को वैद्यराज की उपाधि दी जाती थी। 1938 तक इससे पढ़कर 1500से अधिक वैद्य निकले थे। लाला श्रीराम की मेहनत और लगन की मिसाल आज तक दी जाती है। इन्होंने दिल्ली कमर्शियल कॉलेज की स्थापना की थी जो आजकल श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के नाम से प्रसिद्ध है। एक लेडी श्री राम कॉलेज भी है जो उनकी पत्नी के नाम पर है। इन्होंने एक इंडस्ट्रियल रिसर्च इंस्टीटयूट भी बनवाया था। 1899 में हिन्दू कॉलेज की स्थापना कृष्णदास गुड़वाले द्वारा की गई थी। इसमें सुल्तान सिंह  जैन भी शामिल थेे।

पहले_स्पीकर_चरती_राम_गोयल_बने 

जिस समय दिल्ली में विधानसभा नहीं थी, उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा थी। 1910 में पंजाब की विधान परिषद थी। उसमें सुल्तान ङ्क्षसह जैन, राय बहादुर, देशबंधु गुप्ता, प्यारेलाल सदस्य बने। दिल्ली की पहली विधानसभा में लाला जगन्नाथ, देशबंधु गुप्ता सदस्य थे। अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई नगर पालिका में भी अग्रवाल लगातार सदस्य बने। रामलाल खेमका 3 बार सदस्य बने। श्यामनाथ मार्ग से दिल्ली के लोग गुजरते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि वो लाल श्यामनाथ के नाम पर है। दिल्ली में विधानसभा के पहले महानगर परिषद होती थी। उसका प्रमुख चीफ काउंसलर होता था। जो वर्तमान सीएम के बराबर होता था। इस पद को राधा रमण अग्रवाल ने सुशोभित किया था। विधानसभा बनी तो पहले स्पीकर भी चरती राम गोयल बने। 

धनवानों_में_दिल्ली_के_अग्रवालों_का_दबदबा

उसमें धनवानों का जिक्र भी आता है। लाला सुल्तान सिंह की चालीस हजार गज से ज्यादा जमीन कश्मीरी गेट पर थी। अपने समय के बहुत बड़े धनवान थे। अंग्रेज अधिकारी भी इनके यहां आते थे। 1920 में इनके बेटे लाला रघुबीर सिंहने मार्डन स्कूल की स्थापना की। स्कूल अब 100 साल का सफर पूरा करने वाला है। दिल्ली के सबसे बड़े धनवान व नगर श्रेष्ठि गुड़वाले थे। रामदास जी गुड़वाले मालीवाड़ा में रहते थे। 1857 के पहले भारत के चार सर्वाधिक धनी व्यक्तियों में इनकी गिनती थी। 1857 के पहले बादशाह बहादुर शाह जफर के विश्वास पात्रों में से एक थे। रामदास के पूर्वजों के नाम के साथ गुड़वाले शब्द जुडऩे का भी दिलचस्प किस्सा है। दरअसल, ये लोग बहुत दानी थे। यात्रियों के लिए जगह जगह पानी और गुड़ की व्यवस्था करते थे। इसलिए गुड़वाले नाम से ही प्रसिद्ध हो गए थे। ये हुंडी पर्ची का काम करते थे। हुंडी पर्ची को दिखाकर पूरे देश में कैश कराया जा सकता था। बादशाह हर दिवाली, ईद इनके आवास पर आते थे और ये, उन्हें एक लाख अशर्फी उपहार में देते थेे। इनकी हवेली इतनी बड़ी थी कि उसमें 12 दरवाजे थे। कहते हैं कि 1857 के विद्रोह के दौरान बादशाह को इन्होंने 3 करोड़ रुपये उधार दिए थेे। विद्रोह विफल होने के बाद लाला रामदास पर अंग्रेजों ने कुत्ता छोड़ दिया, उनकी मौत हो गई। जब बाद में अंग्रेजों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो इनके बेटे को मजिस्ट्रेट, दिल्ली नगर परिषद का सदस्य बनवाया। उनके पास बादशाह का फरमान भी है। रामदास जी किस कदर शक्तिशाली थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उस समय के जारी कई शाही सिक्कों पर एक तरफ बादशाह तो दूसरी तरफ उनके चित्र थेे। गुड़वाले के नाम पर करोल बाग में एक गुड़वाली गली भी है। दिल्ली ट्राम चलाने वाली कंपनी में इसी गुड़वाले के खानदान के लाला श्रीदास डायरेक्टर भी रहे थे। 

कोतवालों_का_खानदान

लाला श्रीराम का परिवार कोतवालों के खानदान के रूप में प्रसिद्ध है। इनके पूर्वज दिल्ली के कोतवाल थे। बाद में फिरोजपुर गए एवं फिर दिल्ली वापस आए। 1882 के आसपास गुड़वाले, कोतवालों के खान और चुनामल के खत्री परिवार ने मिलकर साझेदारी में दिल्ली क्लॉथ मिल की स्थापना की। जो उत्तर भारत की सबसे बड़ी क्लॉथ मिल थी। यह 37 एकड़ में फैली हुई थी। कोतवालों का परिवार दिल्ली में ही रहता था। 1857 में लाला बद्रीदास दिल्ली और फिरोजपुर के कोतवाल बने। 1865- 84 तक ये बैंक ऑफ बंगाल, लाहौर के मुख्य कार्यालय के खजांची भी रहे। फिरोजपुर छावनी भी इन्होंने ही बसाई। इन्हीं के समय में कोतवालों का खानदान कहना शुरू हुआ।

मुगल_बादशाह_के_खजांची_शाहदीप_चंद 

ये मुगल बादशाह शाहजहां के समय में खजांची थे। ये #हिसार से दिल्ली आए थे। इन्हें दरीबाकलां में 5 बीघा जमीन दी गईं थी ताकि इनका परिवार रह सके। कहते हैं, उस समय दरबार में सात तरह के सम्मान से नवाजा जाता था। जामा मतलब गाउन, पाजामा, चद्दर, पगड़ी, कलतुर्रें वाली कली आदि। शाहदीप को इन सातों से नवाजा गया था।

#दिल्ली_के_पुराने_अग्रवाल_संगठन

1-प्राचीन श्री अग्रवाल दिगंबर जैन पंचायत

यह बहुत बड़ी पंचायत है। जिसमें दिल्ली, पानीपत, हिसार की पंचायतें हैं, यह 250 साल पुरानी है। अग्रवाल जैन इसके सदस्य थे। यह पंचायत 22 मंदिरों का प्रबंधन है। जिसमें दिल्ली के भी कई मंदिर हैं।

2-बड़ी पंचायत

1890 के आसपास इस संस्था की स्थापना हुई। यह निगमबोध घाट का प्रबंधन देखती है। यहां विकास कार्य, मूर्तियां समेत अन्य काम करवाते हैं। सीताराम बाजार में इसका ऑफिस है।

3-दिल्ली अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन

यह 1976 से चल रहा है। अग्रवालों के बीच मेल जोल बढ़ाने, समाज में बेहतर कार्य करना मकसद है।

#प्रमुख_कारोबारी

वर्तमान में जयपुरिया परिवार, जिंदल ग्रुप, डीसीएम ग्रुप, बिकानेर, हल्दीराम, हेवेल्स, राजधानी बेसन वाले सरीखे बड़े कारोबारी इसी समाज के हैं।

साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा की फेसबुक वाल से 

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