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Thursday, July 2, 2026

SETH JWALA PRASAD BHARTIYA

SETH JWALA PRASAD BHARTIYA

इतिहास के झरोखे से_ कान के अंदर चना फंसने के बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने लिया अस्पताल बनाने का संकल्प, जयपुर बीकानेर के बीच रास्ते में था एकमात्र अस्पताल।

 



फतेहपुर। सैकड़ो वर्ष पुराना इतिहास संजोए अपने विराट स्वरूप को लिए आज 100 साल बाद भी अडिग खड़ा फतेहपुर कस्बे का भरतीया अस्पताल जिसका निर्माण आज से 100 वर्ष पूर्व हुआ लेकिन 1985 के दौर में अस्पताल वापस बंद हो गया था

1923 में सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने बताया था अस्पताल।

एक सामान्य घर में जन्मे सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया जब 12 साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया जिसके बाद वह नौकरी करने कोलकाता चले गए कोलकाता में जब वह खेल रहे थे तब उनके कान में एक चना फस गया जिससे उनको काफी पीड़ा हुई जब अस्पताल गए और वहां पर लोगों को पीड़ित अवस्था में देखा तो उनके मन में ख्याल आया कि जब भी ईश्वर उन्हें धनवान बनाएगा तो सबसे पहले वह अपना घर बाद में और अस्पताल पहले बनाएंगे और हुआ भी ऐसा ही कुछ साल नौकरी करने के बाद ज्वाला प्रसाद भरतीया कपड़े की ट्रेडिंग और शेयर मार्केट का काम की शुरुआत कर दी जिससे उनका काफी फायदा हुआ इसके बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने 1923 में अस्पताल बनाने के लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया चैरिटेबल ट्रस्ट का निर्माण करवाया जिसमें उन्होंने उसे समय 40 लाख़ रुपए जमा करवाएं।

1923 में रखी अस्पताल की नीव।
कोलकाता से फतेहपुर आने के बाद सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने 6 एकड़ जगह लेकर उसमें अस्पताल बनाने की नींव रखी उसके बाद अस्पताल के सामने ही अपने खुद के रहने के लिए अपनी हवेली की नीव रखी, उस दौर में निर्माण कार्य में लोहे का इस्तेमाल बहुत कम हुआ करता था लेकिन इस अस्पताल में लोहे का भारी भरकम इस्तेमाल किया गया जिसके लिए उस समय की दो बड़ी कंपनी टाटा स्टील और इंडियन आयरन स्टील दोनों कंपनियों ने अस्पताल को लोहा देने के लिए अपने कार्यालय अस्पताल के बाहर खोलकर उनमें मैनेजर बैठाया।

विद्युत सप्लाई के लिए जनरेटर अमेरिका आर्मी से लिया।
1923 के दौर में फतेहपुर में विद्युत के सप्लाई नहीं थी अस्पताल में विद्युत की सप्लाई के लिए अमेरिकन आर्मी से तीन जनरेटर खरीदे गए तो वहीं अस्पताल में विद्युत की फिटिंग का सामान इंग्लैंड से मंगवाया गया और अस्पताल में लगी सभी टाइल इटली से मंगवाई गई।

जर्मन से मंगवाया ऑपरेशन का सामान।
अस्पताल में ऑपरेशन और डॉक्टर के उपकरण के लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने अस्पताल के डॉक्टर बद्री नारायण शर्मा को जर्मन भेजा वहां से अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सारी मशीन और उपकरण खरीद कर लाए गए।

अस्पताल में इलाज खाना ऑपरेशन सब था फ्री।

अस्पताल शुरू होने के बाद अस्पताल में मरीज के लिए इलाज ऑपरेशन की सुविधा खाना और रहने की सुविधा के अलावा मरीज के साथ आने वाले एक व्यक्ति के खाने पीने और रहने की सुविधा भी फ्री थी इसके अलावा अस्पताल में भर्ती मरीजों को अच्छे दूध मिले इसके लिए सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने अस्पताल के पास ही एक गौशाला भी बनवाई।

100 बेड का अस्पताल बनाया।

आसपास के क्षेत्र में अस्पताल नहीं होने को देखते हुए सेठ ज्वाला प्रसाद उस दौर में 100 बेड का अस्पताल बनवाया जिसमें 6 बड़े वार्ड सहित डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ के रहने के लिए अस्पताल में ही
उनके क्वार्टर भी बनवाए

अस्पताल के सर्जन डॉक्टर को जब खुद मुख्यमंत्री ने बुलाया।

जयपुर से बीकानेर के बीच भरतीया हॉस्पिटल एकमात्र बड़ा हॉस्पिटल था जहां ऑपरेशन हुआ करते थे ऐसे में उस समय के तत्कालीन सरकार के मुखिया मोहनलाल सुखाड़िया अस्पताल से पहले ही तीन मेडिकल सर्जन डॉक्टर को जयपुर ले जा चुके थे ऐसे में उस समय के डॉक्टर इंद्रनाथ सोबती को ले जाने का समाचार जब ज्वाला प्रसाद भरतीया को दिया तो सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया ने मुख्यमंत्री को जवाब देते हुए कहा कि आप चाहो तो मेरी हवेली की रजिस्ट्री बनवा लो लेकिन मैं डॉक्टर इंदर नाथ सोबती को यहां से नहीं ले जाने दूंगा।

Dr. सोबती के जाने के बाद बंद हुआ अस्पताल का दौरा।
डॉक्टर इंदर नाथ सोबती ने 1985 तक अस्पताल में अपनी बेहतर सेवाएं दी यहां तक जयपुर से भी लोग अपना ऑपरेशन करवाने के लिए उनके पास आते थे लेकिन 1974 में डॉक्टर शोभती अस्पताल छोड़ जयपुर और फिर जयपुर से अमेरिका शिफ्ट हो गए इसके बाद अस्पताल बंद हो गया।

परिवार का सपना हुआ फिर से साकार।
सेठ ज्वाला प्रसाद भरतीया के पौत्र राधेश्याम भरतीया ने कहा कि हमारे दादा ने फतेहपुर के आम जन को चिकित्सा का लाभ प्राप्त हो इसके लिए अस्पताल का निर्माण करवाया था लेकिन किसी कारण वंश अस्पताल कई सालो पूर्व बंद हो गया जिसे 2025 में सरकार के साथ एमओयू करके दोबारा शुरू किया गया था यह हमारे भरतीया परिवार के लिए एक सुनहरे सपने से कम नहीं है। 

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