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Friday, July 28, 2023

SHREE KRISHNA - वैश्यकुल के भूषण नंदनंदन भगवान श्री कृष्ण

SHREE KRISHNA - वैश्यकुल के भूषण नंदनंदन भगवान श्री कृष्ण

वैसे तो अजन्मा भगवान श्रीकृष्ण वर्ण से परे सच्चिदानंदघन परमात्मा हम परन्तु लौकिक अवतार रूप में भगवान श्री कृष्णचन्द्र शास्त्रों और आचार्यों द्वारा वैश्य वर्ण के माने गए हैं। धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज ने भी श्रीकृष्णचन्द्र को वैश्य वर्ण का माना है। भगवान् श्री कृष्णा को सांवरिया सेठ ऐसे ही नहीं कहा जाता हैं. 

जिस प्रकार श्रीभगवान नित्य हैं उस प्रकार उनके धाम, माता पिता, स्वजन भी नित्य हैं। जो पारमार्थिक वृंदावन धाम है वही भगवान के जन्म के समय पर पृथ्वी पर प्रकाशित होता है। उसी प्रकार नन्दबाबा और यशोदा श्रीकृष्ण के सनातन माता पिता हैं जो त्रेता में दशरथ कौशल्या के रूप में अवतरित होते हैं। जबकि वसुदेवजी और देवकी जी ने तपस्या करके श्रीकृष्ण के मातृपितृत्व का औपाधिक सुख पाया था। वसुदेव जी क्षत्रिय वंशी हैं व नंदबाबा वैश्य हैं इसलिए सनातन मातृ पितृत्व नंदबाबा में होने से श्रीकृष्ण का वर्ण वैश्य सिद्ध होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहा है कृषि, गौरक्षा और वाणिज्य वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं और भगवान ने भी इसी धर्म को अपने जीवन में प्रकाशित किया। श्रीभगवान से बड़ा कोई गौभक्त नहीं हुआ।

उपरोक्त बात को अनंदवृन्दावन चंपू में इस तरह लिखा है -- "पूर्वदिशारूप वधु की गोद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात्रि के मध्य भाग में पूर्ण चन्द्रमा की भांति, अपने प्रादुर्भाव को प्रकट करते हुए, पहले पूर्व पूर्वजन्मों में उत्पन्न तपस्यारूप सौभाग्य के फल से, जिनको पितृमातृभाव प्राप्त हुआ है, उन श्रीवसुदेव एवं देवकी के निकट, 'वासुदेव' के स्वरूप से, अपना आविर्भाव प्रकाशित करके, एवं उन दोनों में क्षणभर के लिए पुत्रत्व का अभिमान प्रकट करके, पश्चात जिनका पितृभाव एवं मातृभाव नित्यसिद्ध है, अर्थात अनादिकाल से ही सिद्ध है, उन श्रीनन्द एवं यशोदाजी के भी परिपूर्णतम रूप, श्रीगोविन्द के स्वरूप से, श्रीकृष्ण ने पुत्रभाव को अंगीकार किया।"

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक #भारतेंदु_हरिशचंद्र ने अपनी पुस्तक अग्रवालों की उत्पत्ति की शुरुवात इस दोहे से की है जो कृष्ण जी को वैश्य प्रमाणित करता है-

" विमल वैश्य वंशावली, कुमुदवनी हित चंद।

जय जय गोकुल, गोप, गो, गोपिपति नंदनंद।।

धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज ने अपने ग्रन्थ भक्तिसुधा में लिखा है---

"वैसे तो भगवान का जहाँ ही प्राकट्य हो, वही कुल धन्य है, फिर कोई भी क्यों न हो। परन्तु ‘श्री गोपालचम्पू’ के रचयिता ने तो उन्हें क्षत्रिय से वैश्यकन्या में उत्पन्न, अत: वैश्य माना है। वृष्णिवंश में भूषणस्वरूप देवमीढ़ मथुरापुरी में निवास करते थे। उनकी दो स्त्रियाँ थीं, एक वैश्या-कन्या और दूसरी क्षत्रिय-कन्या। क्षत्रिय-कन्या से शूर हुए जिनके वसुदेवादि पुत्र हुए और वैश्यकन्या से पर्ज्जन्य हुए। अनुलोम संकरों का वही वर्ण होता है, जो माता का होता है। इसी कारण पर्ज्जन्य ने वैश्यता का ही स्वीकार किया और गो-पालन में ही विशेष रूप से प्रवृत हुए, जो कि वैश्यजाति का प्रधान कर्म है, इसीलिए वे गोप भी कहे गये। पर्जन्य बड़े धर्मात्मा और ब्रह्म हरिपूजनपरायण थे। उनका मातृवंश वैश्य सर्वत्र विस्तीर्ण और प्रशंसनीय था, उनमें भी वैश्य में विशेष आभीर वंश था। वैश्य की पुत्री में ब्राह्मण से उत्पन्न पुत्र ‘अम्बष्ठ’ होता है और अम्बष्ठ-कन्या में ब्राह्मण से उत्पन्न ‘आभीर’ होता है। यह आभीर वैश्य ही होता है। ऐसे ही वैश्यकुल की कन्या में देवमीढ़ क्षत्रिय से उत्पन्न पर्ज्जन्य वैश्य थे। यही गोपवंशरूप से कृष्ण-लीला में प्रख्यात हैं, अत: इससे गोप  पृथक है। यह तो वैश्य ही गो-पालन कर्म से गोप कहे गये। अत: ‘भागवत’ में भी गर्ग जी से नन्द जी ने कहा था कि इन दोनों पुत्रों का द्विजातिसंस्कार करो-‘कुरु दि्वजातिसंस्कारम्।’’ 

कृष्ण ने भी “कृषिगोरक्षवाणिज्यं कुसीदं तुर्यमुच्यते। वात्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्।।” इत्यादि से अपने को गोवृत्त वैश्य कहा है।"

- भक्ति सुधा, कृष्णजन्म प्रसङ्ग