Monday, April 18, 2011

चन्द्र गुप्त मौर्य एक महान वैश्य-CHANDRAGUPTA MOURYA A GREAT VAISHYA




सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य  एक वैश्य जाति माहुरी से सम्बन्ध रखता था। गुजरात का राज्यपाल पुष्पगुप्त जो की उसका बहनोई था वह भी एक वैश्य था। गुप्त या गुप्ता उपनाम केवल वैश्य ही प्रयोग करते थे , ओर करते हैं । चन्द्रगुप्त ने बाद में जैन धर्म अपना लिया था, जैन पूरी तरह से एक वैश्य जाती हैं. १००% जैन वैश्य हैं।



 माहुरी जाति अपने आप को चन्द्रगुप्त का वंशज मानती हैं। जो की बिहार के गया जिले में निवास करती हैं। मौर्य उपनाम चन्द्रगुप्त को चाणक्य ने दिया था। क्योंकि चन्द्रगुप्त कि माँ का नाम मुरा था। मुरा से ही मौर्य बना। चन्द्रगुप्त की पत्नी एक वैश्य नगर सेठ की पुत्री थी। चन्द्रगुप्त की कुलदेवी माता लक्ष्मी थी। जो की वैश्य समुदाय की कुल देवी मानी जाती हैं। चन्द्रगुप्त के समय में जो विदेशी इतिहासकार भारत में आयें उन्होंने भी चन्द्रगुप्त को वैश्य ही बताया था। इतिहास में उसका कही भी क्षत्रिय होने का प्रमाण नहीं मिलता हैं। नाही शुद्र होने का, क्योंकि एक ब्रहामण चाणक्य कभी भी एक शुद्र को शिक्षा नहीं दे सकते थे।


राजा को हमेशा क्षत्रिय माना गया हैं, वैश्य समुदाय की अधिकतर जातियों की उत्पत्ति क्षत्रियो से ही हुईं हैं। जो की एक इतिहास हैं। भारत मैं हर जाति व समुदाय का शासन रहा हैं। आधुनिक इतिहासकारों को कोई भी राजा व सम्राट,  वैश्य व शुद्र होना हज़म नहीं होता हैं। चन्द्रगुप्त के पोते सम्राट अशोक की पत्नी भी एक वैश्य पुत्री थी। ज़ाहिर हैं रिश्ते नाते आदमी अपने वर्ण या जातिं में ही करते रहे हैं। ये प्रमाण सिद्ध करते हैं। कि चन्द्रगुप्त मौर्या और सम्राट अशोक वैश्य ही थे।

31 comments:

  1. कुछ आपने बताया, कुछ हमें मालूम था,

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  2. No Doubt ChandraGupta was a Brave Vaish.
    India has seen best time during his rule.

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  3. Mahesh ji I am allready join your blog

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    1. Aap nai sahi kaha hai pahale hami apana ghar bachana hoga our sath me use bhi use ki bhasha me strong jabab dena hoga,kaha bhi gaya hai ke "ATTACK IS THE BEST DEFENCE".aap ko aek bat batata hu ake bar ake hindu (mai bhi hindu hu)friend ne mughsey kaha ke yeha par ake hindu larke nai ake sunder muslim larki se shaddi kar leya aur use bhi hindu bana daya,kahaker use par wayang kashana lagha, mai ne kaha ke jab aap koi muslim larka koi hindu larki ko preme jal me phasa ker usese nekha(shaddi)kar lata hai to aaploge kuch bhi nahi boeltay,mai ne kaha use hindu larke ne thike keya(done right thing).kahi na kahi mare friend ko sanatan hindu culture ko bachne ke parti lagaw aur bhear gaya.

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  5. mai MA(history) NOU PATNA ka student hu. haa ye sahi hai ki chandragupt vaishy tha. lekin abhi ye vivadit hai.fir bhi vaishy hone ka praman history me adhik bataya gaya hai...

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    1. can you please provide some evidences which you talked in this comment ("fir bhi vaishy hone ka praman history me adhik bataya gya hai")? on the basis you made comment .... some letters ... some book comments snap shots ... some antiques pic ???

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    2. Gupta , Maurya and mangur all are same
      All are Kshatriya

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    3. Gupta , Maurya and mangur all are same
      All are Kshatriya

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  6. अरविन्द जी, ये विवाद हमेशा बना रहेगा. क्योंकि अधिकतर वैश्यों की उत्पत्ति क्षत्रियों से ही हुई हैं. कोई जाति यदि किसी राज्य में वैश्य हैं तो दूसरे राज्य में क्षत्रिय कही जाती हैं. भारत में सभी जातियों के राजा हुए हैं. और राजा कोई भी हो उसे क्षत्रिय ही कहा जायेगा.

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  7. Dear Arvid ,
    If Chandra Gupt Mourya was Vaisya then all "Mourya" caste comes under VAISHYA ? Its means that "Mourya/Maurya" must come under general caste ? can you please provide me some information in which Indian states "Mourya/Maurya" comes in general caste ?

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    1. प्रशांत जी गुप्त उपनाम भारतीय समाज में वैश्यों के लिए प्रयुक्त हुआ हैं. चन्द्रगुप्त की माता का नाम मुरा था. इसीलिए चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मुरा का बेटा "मौर्य", इस उप नाम से अलंकृत किया था. बाकी ऐतिहासिक तथ्य मैंने अपनी पोस्ट में दिए हैं. और यह जरुरी नहीं की चन्द्रगुप्त के वंशजो ने आगे वैश्य कर्म ही अपनाया हो. वैश्य के कर्म गीता में स्पष्ट हैं. व्यापार, गोउ पालन, कृषि. इसी कारण से कृषि पर आधारित जातिया भी वैश्य ही हुई.

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    2. श्री प्रवीण जी,
      गुप्ता तो सिर्फ अंग्रेजी में होता है फिर आप हिंदी में भी गुप्ता क्यों लिखते हैं
      कृपया आप हिंदी में नाम लिखते समय गुप्त उपनाम का उपयोग कीजिए

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  8. तो वैश्य चन्द्रगुप्त मौर्या की जयंती क्यूँ नहीं मनाते

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    1. संतोष जी राम राम, यह जरुरी नहीं है की जयंती ही मनाई जाए, वैश्य कभी जातिवादी नहीं रहा हैं, वह सबको जोड़कर चला हैं, सबके साथ चला हैं. धर्म कर्म के कार्य में हमेशा वैश्य ही सबसे आगे रहा हैं. चाहे मंदिर हो धर्मशालाए हो, रामलीलाए हो, तीर्थ स्थान हो, शिक्षण संस्थान हो, इन सबके लिए वैश्य ही सबसे आगे रहता हैं. रही बात जातीय उत्पत्ति की, एक वंश की एक शाखा क्षत्रिय कहलाई, दूसरी शाखा वैश्य कहलाई, सब कर्म पर आधारित हैं. वैश्यों की ९५% जातीय पहले क्षत्रिय ही थी. वन्देमातरम...

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    2. Jati keval char hi tho Brahman shaktriya vaisya shudra Chandragupt ek shakya shaktriya the

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    3. Chandragupta hota hai English me
      Aur apne bilkul thik kaha ki woh ek Kshatriya hi the
      Gupta koyi vaishya caste nhi thi
      Pahle Gupta, Singh, Pal, Dev jaise surname Kshatriya hi use karte the

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    4. गुप्त उपनाम आदिकाल से वैश्यों के लिए प्रयुक्त होता रहा हैं. विष्णु पुराण के एक श्लोक में गुप्त वैश्य के लिए, वर्मा क्षत्रिय के लिए, और शर्मा ब्राह्मणों के लिए लिखा गया हैं. हिंदी या संस्कृत में गुप्त, और इंग्लिश में गुप्ता लिखा जाता हैं.

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    Ye sab karne se pehele kya hum apne baccho ko Ved path gita path karaye to sab assan nahi ho sakta kya??? ved vani bhagvat gita gyan ka aisa bhandar jisme samast vishwa ka gyan hai. or agar hum apna gyan apne bacchon ko bhi de to sab kuch sahi ho sakta hai.

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  12. Thanks for providing knowledge abt this topic

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  14. ५वीं शताब्दी ईसा०पू० उत्त्तर भारत आठ छोटे-छोटे गणराज्यो में बटा था । भारत की प्राचीन भाषा पालि के साहित्य में आठ गणराज्यो का उल्लेख मिलता है।

    १.कपिलवस्तु के शाक्य २.पिप्पलिवन के मोरिय (मौर्य) ३.रामग्राम के कोलिय (कुर्मी) ४.कुशीनगर के मल्ल पावा के मल्ल ५.अल्लकप्प के बूल्लि ७.वैशाली के लिच्छवी ८.वेठद्वीप के द्रोण ৷

    अस्सेसु खो पिप्पलिवानिया मोरिया—”भगवा किर कुसिनाराकं परिनिब्बुतो’ति ।अथ खो पिप्पलिवानिया मोरिया कुसिनारकान मल्लनं दूत पहेसूं — भगवापि खत्तियो मायम्पि खत्तिया। भगवा अम्हाकं ञातिसेट्टो। “

    महापरिनिब्बानसुत्त-डॉ भिक्खु धर्मरक्षित (पृष्ट स०-१९६)

    भगवान बुद्ध के महापरिनिब्बान ४८३ ईसा०पू० वैसाख पूर्णिमा के समय जब उनकी अस्थियो का बटवारा हुआ,तब मोरिय गणराज्य पिप्पलिवन (वर्तमान उत्तर प्रदेश,जिला-गोरखपुर से विहार राज्य के पश्चिम चम्पारण जिला-लौरिया-नन्दंगढ़) के मोरिय (मौर्य) राजा अपना आमात्य (मंत्री) कुशीनगर के मल्लो के पास भेज कर आग्रह किया। “भगवान क्षत्रिय थे,मै भी क्षत्रिय भगवान हमारे जाति कुल के हम उनके जाति कुल के अतः भगवान बुद्ध के शरीर अस्थियो में मेरा वाजिब भाग है हम भी भगवान के शरीर अस्थियो पर स्तूप बनवाकर पूजा करुंगा” किन्तु वे कुच्छ देर से वहा पहुचे तब तक अस्थियो का बटवारा हो चूका था । जिससे उन्हें भगवान के शरीर अस्थियो के शेष भाग अंगार से ही संतोष करना पड़ा मोरिय गणराज्य के राजाओ ने इन अंगारों पर अपने नगर पिप्पलिवन में एक स्तूप का निर्माण किया जो आज भी अंगार स्तूप के नाम से जाना जाता है ।

    महावंश द्वीपवंश भद्रबाहु का कल्पसुत्त आदि जैन व बौद्ध पालिसाहित्य के प्राचीन ग्रंथ उत्तरविहारट्टकथायं-थेरमहिंद से ज्ञात होता है कि पिप्पलिवन के मोरिय (मौर्य) शाक्य-क्षत्रियो की उप शाखा थी ।

    मोरियनगरे चन्दवड्ढनो खत्तिया राजा नाम राज्ज करेसि। तेन तस्स नगरस्स समिनो साक़िया च तेस पुत्तपुत्ता च सकलजम्बुदिपे मोरिया नाम’ति पाकटा जाता। ततो पभुति तेस वंसो मोरियवंसो’ति। वुच्चति,तेन वुच्च”मोरियान खात्तियान वंसजात’ति।

    चन्दवड्ढनो राजस्स मोरिय रञ्ञो सा अहू ।

    राजमहेसी धम्ममोरिया पुत्तातस्सासि चन्दगुप्तो’ति ॥

    उत्तरविहारट्टकथायंथेरमहिंद-सिद्धार्थ वर्द्धन सिंह (पृष्ट स०-६ )

    इन ग्रंथो व टीकाओ में लगभग ३५६ ईसा०पू० पिप्पलिवन के मोरिय-क्षत्रिय राजा चन्द्रवर्द्धन का शासन था,तब उनकी प्रधान महारानी कोलिय गणराज्य(कुर्म-क्षत्रिय) की राजकुमारी धम्ममोरिया बनी उन दोनों से उत्त्पन्न पुत्र चन्द्रगुप्त नाम से जगत में विख्यात हुए। कुछ विद्वानों का मत है की चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम उनके माता-पिता के नाम से परिलक्षित है । राजा चन्द्र तथा महारानी मोरिया देवी का पुत्र चन्द्रगुप्त मौर्य हुए। इस प्रकार पिप्पलिवन मोरियगणराज्य के शाक्य-क्षत्रिय मौर्य कहलाये। इसी कारण उनके राजवंश का नाम मौर्यवंश पड़ा। इसमें कोई संदेह नहीं की भगवान बुद्ध के समकालीन शाक्य-क्षत्रियो ने मौर्यवंश की स्थापना की थी। जिससे चन्द्रगुप्त मौर्य के समय मौर्यसाम्राज्य अपने अस्तित्व में पुनः स्थापित हो गया।

    मोरियवंसजं चन्दगुप्त नामकुमार अहस,

    वेसाखंमासे कण्हंट्ठमी दिवसे उप्पाजित्वा ।

    तं कुमारदिस्वा पुत्तसिंहने नामगहणं दिवसे,

    चन्दोसभेनरक्खिता चन्दगुप्तो’ति नामकत्वा पोसेसि ॥

    उत्तरविहारट्टकथायंथेरमहिंद-सिद्धार्थ वर्द्धन सिंह (पृष्ट स०-६ )

    ज्ञात पिता के विख्यात पुत्र चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग ३४५ ईसा०पू० वैशाख मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को उत्तपन्न होकर राजकुमार कुमार सिंह पुत्र चन्द्रमा के सामान शोभायेमान थे ।

    आदिच्चा नाम गोतेन साकिया नाम जातिया ।

    मोरियनं खत्तियानं वसजातं सिरीधरं,

    चन्द्रगुप्तो’ति पञ्ञातं विण्हुगुप्तो’ति भातुका ततो ॥

    उत्तरविहारट्टकथायंथेरमहिंद-सिद्धार्थ वर्द्धन सिंह (पृष्ट स०-६ )

    आदित्य गोत्र शाक्य जाती मौर्यवंश के क्षत्रियो में प्रज्ञा संपन्न श्रीमान चन्द्रगुप्त राजा हुए तथा उनके भाई विण्हुगुप्त । आधुनिक खोजो से ज्ञात होता है की चन्द्रगुप्त मौर्या के पिता राजा चन्द्रवर्द्धन (लगभग ३४० ईसा०पू०) ३४ वर्ष की अवस्था में मगध के विस्तारवादी सीमा सम्बधि युद्ध करते हुए मरे गए थे।


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  15. प्लूटार्क ने लिखा है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने ६ लाख सेना लेकर समूचे भारत समेत एशिया को रौंद डाला और सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस से युद्ध करके उसे पराजित किया सन्धि स्वरूप ३०५ ईसा०पू० में चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस के चार राज्य काबुल,कंधार,बलूचिस्तान,व हेरात(हिमप्रदेश) को जित कर भारत में मिला लिए व सेल्यूकस ने सन्धि स्वरूप अपनी पुत्री हेलेन का विवाह कर दिया

    महान आचार्य श्रमण विण्हूगुप्त का जन्म ईसा से ३५६ वर्ष पूर्व को हुवा था ৷ इनके जन्म तिथि की कोई अभी सटीक जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी है परन्तु प्राचीन पालि ग्रंथो से संकेत मिले है की इनका जन्म कार्तिक मास के शुक्ल चतुर्दशी को हुवा था ৷
    महान सम्राट अशोक के पुत्र थेरमहिन्द द्वारा लिखित प्राचीन ग्रन्थ पालि उत्तरविहारट्टकथायं के अनुसार विण्हूगुप्त,चन्द्रगुप्त के बड़े भ्राता थे ৷ इस प्रकार उन्होंने आदित्य गोत्र मौर्यवंश के क्षत्रियो में उत्त्पन्न होकर अखण्ड भारत का निर्माण किया ৷

    इनका जन्म मोरिय गणराज्य के पिप्पलिवन में मोरिय राजमहल में हुआ था ৷ उस समय मगध राज्य पर नन्दवंश का शासन था ৷ नन्दों ने शाक्य-क्षत्रियों का विनाश करने के लिए क्षत्रियों को बंदी बनाकर उनकी हत्या कर रहे थे ৷

    पिता की मृत्यु के समय राजकुमार चन्द्रगुप्त की आयु लगभग ५ वर्ष तथा उस समय उनके भ्राता विण्हूगुप्त की आयु मात्र १६ वर्ष की थी ৷ इस घटना के बाद महारानी धम्म मोरिया देवी आपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए पुष्पपुर(पाटलिपुत्र) में शरण-ग्रहण कर अज्ञात वास का जीवन व्यतीत करने लगी ৷

    राजकुमार विण्हुगुप्त ने सम्भवतः आपने राजपरिवार को गुप्त रखते हुए मगध राज्य से दूर श्रमण भेष धारण कर,सम्पूर्ण विधा में पारंगत होने के लिए तक्षशिला विश्वविधालय की ओर रुख किया ৷

    अकुनवीसो वयसा पब्बजितो विप्पस्सिनो पाटगु ৷

    अरियमग्गा कोविदं समचरिया समणा विण्हूगुप्तो”ति ৷৷

    उत्तरविहारट्टकथायं-थेरमहिन्द

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  16. तत्पश्चात विण्हूगुप्त १९ वर्ष की अवस्था में (लगभग ३३५ ईसा०पू०) प्रव्रजित होकर विप्पस्साना में पारंगत,आर्य मार्ग के ज्ञाता समता आचरण श्रमण-ब्राह्मण हुए ৷लगभग ३३० ईसा०पू० में तक्षशिला विश्वविधालय से शिक्षा सम्पूर्ण कर पिता की हत्या,घनानन्द के क्रूर शासन,विदेशी आक्रमण के संकट से उत्तपन्न खतारे को दूर करने,अखंड भारत प्रबुद्ध भारत के निर्माण की परिकल्पना के साथ वह आपने गृह-राज्य पाटलिपुत्र पधारे ৷

    क्या कोई आकलन भी कर सकता है कि जब समाज लगभग आपने आदिम अवस्था में था उस समय एक विशाल साम्राज्य आकर लेगा तथा अराजकता का विनाश हो जायेगा ৷ क्या चक्रवर्ती सम्राट की अवधारणा साकार हो पायेगी और वो भी ऐसे समय में जबकि पश्चिमोत्तर सीमा से विभिन्न आक्रमण हो रहे हो ৷ इन्ही युद्धो के माहौल से पाटलिपुत्र में कुछ ऐसा घटित होने जा रहा था,जो पुरे भारत की अगली कई शताब्दियों की नियति ही बदल कर रख दी ৷

    यही वो समय था जब एक परम मेधा प्रज्ञा सम्पन्न आचार्य विण्हूगुप्त ने राजकुमार चन्द्रगुप्त मौर्य के रण कौशल से अखण्ड भारत की महागाथा रच डाली ৷

    पालि साहित्य उत्तरविहारट्टकथा पर लिखित टीका महावंश ५वी सदी ईस्वी० में उल्लेखित है कि मौर्यवंश के क्षत्रियो में श्रीमान चन्द्रगुप्त राजा तथा प्रज्ञा सम्पन्न चाणक्य,(अवस्था सूचक ब्राह्मण हुए) ৷

    भगवान के आर्य मार्ग पर चल कर न जाने कितने शाक्य,अशाक्य श्रमण-ब्राह्मण की अवस्था को प्राप्त हुए ৷ जाति से नहीं ब्राह्मण होता अपितु कर्म से ब्राह्मण होता है जिसने चार आर्य सत्य को भावित कर लिया ৷

    धम्मपद-अट्टकथा “ब्राह्मणवग्गो”

    मेसोपोटामिया की सभ्यता से आये विदेशी वैदिक समुदाय (जातिया) भारत की मूल सभ्यता संसकृति धम्म को नष्ट कर ब्राह्मण और आर्य शब्द के अवस्था सूचक को जाति सूचक बनाकर प्रकृति के नैसर्गिक कानून को बिगड़ कर वर्ण-व्यवस्था का घृणित तांडव आरम्भ कर मूल भारतीयों को अन्धमायताओ के कर्म-कांड के बल पर मानशिक गुलाम बना डाला ৷पालि साहित्य के अनुसार मेधासम्पन्न चणक (कुशाग्र) बुद्धि होने के कारण विण्हुगुप्त को चाणक्य उपाधि से विभूषित किया गया ৷इस प्रकार उन दिनों के महान विश्वविधालय तक्षशिला में सर्वविद्या सम्पन्न विण्हुगुप्त अर्थात महान आचार्य चाणक्य का जन्म होता है ৷

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  17. सीमांत प्रदेशो में हाहाकार मचा हुआ था ৷ घनान्द के अत्याचार से जनता इतनी दुःखी थी,उससे कही अधिक आतंक अलेक्सजेंड्रीया के सिकंदर ने फैला रखा था ৷ पुरु जसे महान राजवाओ के भी शासन हिल चुके थे तथा सिमवर्ती प्रदेशो पर यूनानी क्षत्रपो का आतंक आपनी बर्बरता के सीमाए तोड़ रही थी ৷

    कुछ भारतीय इतिहासकारो ने सिकंदर और विण्हुगुप्त के मिलाने की चर्चा की है ৷ यदि यह तर्कसंगत है तो यह मिलन लगभग ३२६ ईसा०पू० के आस-पास तक्षशिला विश्वविधालय के अध्ययन-अध्यापन के समय ही सम्भव हुई होगी ৷

    मघध में घनान्द अपने आमात्य (मंत्री) शाकटार के कहने पर समय-समय पर विद्वान् श्रमण-ब्राह्मण ,अरहत (भिक्षुओ) की सभा का आयोजन कर भोजन दान आदि की व्यवस्था करता था ৷ ऐसे ही किसी अवसर पर आचार्य चाणक्य (विण्हुगुप्त) घनान्द के राज दरवार में गुप्तचर की मंशा से पहुचे ৷ इसी बिच चाणक्य अपनी योग्य से स्थानीय लोगो के दिलो में घर कर चुके थे, जिससे विद्वान् सभा में उनको सबसे पहला व उच्च स्थान प्रदान किया गया, परन्तु वह आपने श्यामल वर्ण (सावले रंग) के कारण घनान्द की नजरो में खट्क रहे थे ৷ राजा नन्द ने अपने सेवको से आचार्य चाणक्य को भरी सभा में वृषल (नीच) कह कर निष्काषित कर दिया, तो आचार्य चाणक्य ने अनार्य (धम्म को न जानने वाला) घनान्द के वंश को समूल नष्ट कर एक विशाल चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना करूँगा ऐसी प्रतिज्ञा की ৷

    नवामं घनान्द तं घापेत्वा चणडकोधसा ৷

    सकल जम्बुद्विपसमि रज्जे समिभिसिच्ञ सो ৷৷

    उत्तरविहारट्टकथायं-थेरमहिन्द-महावंस

    महावंश टिका के अनुसार नवे घनान्द चणडक्रोधी राजा को चद्रगुप्त मौर्य के द्वारा मरवाकर विण्हुगुप्त (चाणक्य) ने आपने भाई चन्द्रगुप्त को सकल जम्बुद्वीप का सम्राट बनाया ৷उन्होंने २४ वर्षो तक राज्य किया तथा उनके पुत्र बिन्दुसार ने २८ वर्ष राज्य कर विण्हुगुप्त मौर्य,मौर्यसाम्राज्य में प्रधानमंत्री पद पर विभूषित हुए ৷

    मौर्यकाल में मेगास्थनीज राजदूत ने पाटलिपुत्र की यात्रा में अपना वर्णन मौर्यसम्राज्य की शासन व्यवस्था का किया है ৷ पाटलिपुत्र गंगा के किनारे बसा था ৷ इतिहास के दौर में उसके कई नाम रहे पुष्पपुर,पुष्पनगर,पाटलिपुत्र आदि अब पटना है ৷

    मेगास्थनीज व स्ट्राबो के अनुसार “अग्रोनोमाई” (भुमापकाधिकारी) मौर्यकाल में सड़क निर्माण अधिकारी था ৷ इसने सकल जम्बुद्वीप में सड़क निर्माण कर जनता के लिए आवागमन का मार्ग सुलभ बनाया ৷ एतिहासिक श्रोतो से ज्ञात होता कि आचार्य विण्हूगुप्त (चाणक्य) की महान साम्राज्य निर्माण की परिकल्पना भगवान बुद्ध के राज्य निर्माण सुरक्षा “सुत्त सात-अपरिहाय” नियम से आते है ৷

    दिघनिकाय-महापरिनिब्बनसुत्त

    जब १८४ ईसा०पू० में अनार्य विदेशी वैदिक पुष्यमित्र-शुंग द्वारा मौर्यसाम्राज्य का धोखे से पतन कर दिया गया ৷ तब बहुत बाद के विदेशी वैदिक मनुवादी साजिश के तहत तथाकथित वैदिक-ब्राह्मणों ने दूसरी शताब्दी ईसा०पू० में पातंजलि ने “योगसूत्र” नामक ग्रन्थ की रचना भगवान बुद्ध के “सतिपट्ठानसुत्त” से चुरा कर की उसी काल में प्राचीन पालि भाषा का परिस्कार कर संस्कृत नामक भाषा का निर्माण किया गया ৷

    (सतिपट्ठानसुत्त-पातंजलयोगसूत्र का तुलनातमक ग्रन्थ)-विप्पस्साना विशोधन विन्यास

    ८वी शाताब्दी ई० में रचित प्रबुद्ध भारती संस्कृति विरोधी ग्रन्ध “मुद्राराक्षस” नाटक विशाखदत्त द्वारा तथा उक्त ग्रन्थ पर रचित टिका ११वी शताब्दी ईस्वी० में “डूढीराज-टिका” है ৷

    इन ग्रंथो की प्रमाणिकता व कथानक पुर्णतः काल्पनिक,कलुषित मानशिकता की विरोधी मंशा के है ৷ मूल प्राचीन ग्रन्थों को नष्ट कर ये बहुत बाद के दूषित ग्रन्थों की रचना मात्र है ৷

    भाषा तथा पुरातात्विक शोधो से सिद्ध हो चूका है कि संस्कृत भाषा की रचना मौर्य-काल के बाद की है ৷ यह कहना पुर्णतः असत्य सिद्ध होगा की आचार्य चाणक्य द्वारा किसी ग्रन्थ की रचना संस्कृत में की गयी हो क्योकि जब पालि से संस्कृत भाषा का जन्म दूसरी शताब्दी ईसा०पू० पातंजलि के समय में हुआ,तब मौर्य-काल में संस्कृत भाषा का नमो निशान न था ৷ इतिहासकारों को इसका अध्ययान बखूबी कर लेना चाहिए ৷ तत्पश्चात इसके उल्ट फर्जी इतिहास के अध्ययन-अध्यापन पर शीघ्र रोक लगनी चाहिए ৷

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  18. ये निसंदेह रूप से कहा जा सकता की मौर्यराज वंश से भारत के प्राचीन वैश्य व्यापारी वर्ग की उत्तपति हुई

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