Tuesday, June 20, 2017

बनिया तो चतुर ही होगा


अब मेरी समझ में आया कि शब्दकोष में हर शब्द के कई मायने क्यों दिए जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि उसका इस्तेमाल करने वाले लोग अलग-अलग राजनीतिक दल विविध सोच लिए होते हैं और वे अपनी जरूरत के अनुसार किसी शब्द का अर्थ गढ़ सकते है। इसमें शब्दकोष उनकी मदद करता है। ठीक वैसे ही जैसे कि जब कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में दोनों पक्षों के बीच जमकर जुतम पैजार हुई, जूते चप्पल और माइक तक एक दूसरे पर खींच कर मारे गए तो एक कार्टून में किसी नेता को हाथ में जूता व माइक लिए यह कहते दिखाया गया कि यह चलने और बोलने के काम भी आते है।

जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो पार्टी ने अपने अंदरूनी हालात जानने के लिए एक सर्वे करवाया। सर्वे करवाने वाली कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि “कांग्रेंस लीडरशिप इज एजेड एंड जेडेड” मैने तुरंत शब्दकोष का सहारा लिया तो वहां जेडेड शब्द के कई अर्थ दिए गए थे। इसका एक अर्थ मरियल घोड़ा भी था। मेरी मनोकामना पूरी हो गई और मैंने अखबार में खबर छाप दी कि कांग्रेस द्वारा कराए गए सर्वे का अपना मानना है कि पार्टी नेतृत्व बूढ़ा व मरियल घोड़े जैसा है।

इस पर जबरदस्त हंगामा हुआ और सीताराम केसरी ने मुझे नींद से जगा कर जमकर खरी खोटी सुनाते हुए कहा कि सामने तो मुझे चचा कहते हो और अखबार में मुझे बुढ़ा मरियल घोड़ा बताते हो।

अब ठीक वैसा ही विवाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा हाल ही में महात्मा गांधी को बहुत चतुर बनिया बताते हुए कहा कि उन्होंने ठीक ही कहा था कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए क्योंकि न तो यह पार्टी किसी सिद्धांत पर आधारित थी और न ही उसकी कोई विचारधारा थी। वह तो आजादी हासिल करने के लिए गठित की गई स्पेशल परपज वैहिकिल की तरह थी।

उनके यह कहने के बाद हंगामा खड़ा हो गया। महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी से लेकर जाने-माने इतिहासकार व गांधी विशेषज्ञ रामचंद गुहा ने उनके इस बयान की निंदा की। कांग्रेंस से लेकर तृणमुल कांग्रेस तक ने गांधी को चतुर बताए जाने पर शाह को घेरने की कोशिश की। यह सब देख व पढ़ कर मुझे याद आया कि जब हम छोटे थे तो अक्सर पर्यायवाची शब्द याद करते थे। तब चतुर का मतलब होशियार होता था। किसी फिल्म में महमूद ने एक गीत भी गाया था जिसके बोल थे एक चतुर नार बड़ी होशियार। हां, जब पंचतंत्र की कहानियों में लोमड़ी के लिए चतुर शब्द का इस्तेमाल किया जाता तब जरूर उसका अर्थ चालाक हो जाता था। वैसे चालाक होना बहुत बुरी बात नहीं है। खासतौर से जब तक कि कोई किसी को अपनी चालाकी से नुकसान न पहुंचाए। अगर बापू को चालाक भी कहा जाए तो उसमें कोई गलती नहीं है।

एक समय अंग्रेज दुनिया की सबसे चालाक कौम हुआ करती थी। उन्होंने अपनी चालाकी के चलते ही कुछ सौ सैनिकों को साथ ला कर भारत पर राज किया। उनके साम्राज्य में सूरज डूबता ही नहीं था। भारत को गुलाम बनाने और उसे जम कर लूटने के बाद भी वे बड़े मजे से हमें टा टा करते हुए इस देश से रवाना हुए। अपने शर्मनाक कारनामों के बावजूद उन्हें गुलाम देशों का क्लब राष्ट्रमंडल बनाया जिसके आयोजन पर भारत सरीखे देश भी खुद को गौरांवित महसूस करते हैं। जब राष्ट्रमंडल खेल होते है तो हम चाहते है कि हमारे पुराने आंका ब्रिटेन की महारानी उसका उद्घाटन करे। अगर वे नहीं आ सकती हो तो कम से कम अपने किसी प्रतिनिधी को भेज दे। तब उन अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए बाध्य कर देने वाले गांधी उनसे ज्यादा चालाक व चतुर कहे जाएंगे या नहीं?

आकार पटेल ने महात्मा गांधी को चतुर बनाए जाने पर अपने कॉलम में लिखा कि गुजरात में चतुर एक अच्छा सम्मानवाचक शब्द माना जाता है। वहां की जनसंख्या में महज दस फीसदी लोग ही बनिए है जो कि सांस्कृतिक दृष्टि, उदारता, अहिंसा, गोरक्षा व्यापार, शाकाहारी होने सरीखे गुणों के कारण पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। वहां बनियों की अहमियत तो उन ब्राह्मणों से भी ज्यादा है जो कि उत्तर भारत से आए थे। आजादी के आंदोलन में पहले मराठी व बंगाली ब्राह्मण हावी थे बाद में उस पर गुजराती बनिए, गांधी, पटेल, जिन्ना हावी हो गए। जिन्ना खोजा मुसलमान थे जोकि वहां का व्यापारी समुदाय है। अमित शाह तो खुद भी बनिया (जैन) है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मोध बनिए है।

गुजराती के कहावत कोष में लिखा है कि बनिए की मूंछ नीची होती है। वह कभी ठाकुरों की तरह अपनी मूंछे मरोड़ कर किसी को चुनौती नहीं देता है बल्कि बड़ी विनम्रता से अपना काम निकाल लेता है। उसका मानना है कि महज दिखावे के लिए अभिमान या झूठी शान जताने से क्या फायदा? बनिए अपनी बुद्धि और कंजूसी दोनों के लिए प्रसिद्ध है। मैं इसी कॉलम में लिख चुका हूं कि पहले बनियों को व्यापार के लिए ही जाना जाता था मगर अब वे हर क्षेत्र में हावी हो चुके हैं। आप किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम दिखाने वाला विज्ञापन देखिए उसमें हर तीसरा प्रतियोगी बनिया नजर आएगा। आईआईटीजी हो, पीएमटी हो, सिविल सेवा हो या कुछ और आपको बंसल, अग्रवाल, जिंदल, मोदी, गुप्ता आदि ही नाम नजर आएंगे। उनकी बुद्धि का जवाब नहीं। सीए, कंपनी सेक्रेटरी से लेकर डाक्टर व आईपीएस तक सभी क्षेत्रों में उन्होंने धूम मचा कर रख दी है।

पिछले साल महज 250 रुपए में सेल फोन देने के लिए बुकिंग करने वाला रिगिंग टोन कंपनी का मालिक मोहित गोयल भी कोई युवा बनिया ही था। देश के तमाम बड़े समाचार पत्रों के मालिक बनिए ही है। चाहे वह हिंदुस्तान टाइम्स हो, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया अथवा जागरण, अमर उजाला या भास्कर। महात्मा गांधी तो खुद भी अखबार निकाल चुके थे। जयशंकर से लेकर मैथलीशरण गुप्त सरीखे साहित्यकार भी बनिए ही थे। अपना मत है कि बनिए कंजूस होते हैं मगर वे दान पुण्य में काफी आगे रहते हैं। शादी और मकान बनाने में अपनी थैलियां खोल देते हैं। पिछले दिनों श्मशान घाट जाना पड़ा। वहां खड़े-खड़े नजर दौड़ाई तो पता चला कि हर घाट, कमरे वातानुकूलित हाल पर किसी न किसी बनिए का नाम लिखा था। मैं सोच में पड़ गया कि अगर बनिए नहीं होते तो शायद हिंदुओं का अंतिम क्रिया कर्म भी ढंग से नहीं हो पाता।

वृंदावन जाने वाले 80 फीसदी लोग बनिए होते हैं। वे धर्मशालाएं, मंदिर, कुंए, बावड़ी बनवाते हैं। अगर बनिए न होते तो वृदावन मथुरा के पुजारी अन्ना बन कर रह जाते। व्यापारी, बैकर, साहूकार सभी बनिए ही तो हैं। अगर बनिया चालाक नहीं होगा तो कौन होगा? आकार पटेल ने खुलासा किया है कि गुजरात में मोदी मोध बनिए होते हैं। जोकि वितरक व एक दाम पर काम करने वाले होते हैं। उनमें लचीलापन या किसी को अपने में समाहित करने का गुण नहीं होता है।

बनियों पर खोज करते हुए किसी ने एक चुटकुला सुनाया। एक बार अरब का कोई शेख बहुत बीमार पड़ गया। उसे खून की सख्त जरूरत थी। उसके बनिया दोस्त ने उसे अपना खून दिया। शेख ठीक हो गया और उसने कृतज्ञता जताते हुए उसे अपनी मर्सीडीज कार उपहार में दे दी। कुछ साल बाद शेख बीमार पडा और बनिया ने उसे पुनः खून दिया। जब वह उसके ठीक होने पर उससे मिलने गया तो चलते समय शेख ने उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा पकड़ा दिया। बनिए ने इसकी वजह पूछते हुए कहा कि पिछली बार तो तुमने मुझे कार उपहार में दी थी। शेख ने मुस्कुराते हुए कहा ‘अब मेरी रगों’ में तुम्हारा खून दौड़ रहा है।

अमित शाह का महात्मा गांधी को चतुर बनिया कहना देश में हंगामे की वजह बन गया, लेकिन गुजरात के लोगों को अंचभा हो रहा है. जाने-माने स्तंभकार आकार पटेल ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भले ही देश में ‘बनिया’ शब्द लेकर आपत्ति हो रही हो, लेकिन गुजरात के बनियों को इससे कोई दिक्कत नहीं है.

चतुर का मतलब होता है चालाक, सतर्क , कुशाग्र. हालांकि चतुर बनिया कहने पर धूर्तता के हल्के तत्व का आभास होता है, लेकिन इसमें शेक्सपियर के पात्र शाइलॉक जैसी धूर्तता नहीं है. बनिया शब्द में कठोरता नहीं एक तरह का लचीलापन है. बनिया जाति के लोग सेना में सबसे कम है. इसका मतलब क्या वे कायर होते हैं. बिल्कुल नहीं.

बनिया दांव लगाता है, सोच-समझकर, ऐसा दांव, जिसे जाट भी लगाने से घबराएगा. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी, जिन्ना और पटेल जैसे गुजरातियों से पहले मराठी और बंगाली ब्राह्मणों का वर्चस्व था. लेकिन गुजरात की संस्कृति की लोच और अहम को किनारे रखने के गुण के जरिए सौदेबाजी की कला ने उन्हें अपरिहार्य कर दिया.

3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. वाह ! रोचकता से भरपूर..

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