Tuesday, March 8, 2016

HISTORY OF ROUNIYAR VAISHYA - रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा

हम रौनियार वैश्य और हमारा वैश्य वंश

हमारी रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा के प्रथम पुरुष सम्राट चन्द्रगुप्त बिक्रमादित्य हैं,जो गुप्त बंश के संस्थापक  थे । इनकी शादी    नेपाल   की राज कुमारी  "कुमारदेवी" से हुआ था ,नेपाल हमारे बंश का ननिहाल है । हमारी राजधानी पटलिपुत्रा थी जो आज पटना कहलाता है । हमारे ही समय में स्वेत हूँण का आक्रमण हुआ था जिसका लोहा हमारे पूर्वज सम्राट स्कन्द गुप्त ने लिया था । हम ही सम्राट हेमचन्द्र बिक्रमादित्य के बंशज है जिसे हेमू के नाम से पुकारते है जो दिल्ली से भारत देश चलाता था ।मध्यकाल में हमें अपमानित करने के लिए "रनहार" (रण +हार) कहा गया जो आधुनिक काल तक आते -आते अपभ्रंश" रौनियार "प्रचलित हो गया ।प्राचीन काल मे भी मुझे करास्कर (कड़कश आबाज मे बात करने वाला ,कड़ी संघर्ष ,कड़ी मेहनत करनेवाला )कहा गया । हमसे अत्याचार बर्दास्त नहीं होता ,अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाना डीएनए में है। 

ऋग्वेद का दसवां मण्डल के पुरुष सूक्त मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य की उत्पाती की गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र- कौटिल्य का निर्देश है की गंधी , कारस्कर,माली ,धान्य के व्यापारी और प्रधान शिल्पी, क्षत्रियों के साथ राजमहल से पूर्वी भागो में निवास करें ,पक्वान्न ,मदिरा और मांस के बिक्रयी वैश्य राजप्रासाद से दक्षिण के भागों में रहे ,ऊनी और सूती बस्त्रों के शिल्पी तथा जौहरी ब्रहमानों के संग उत्तर दिशा में रहें । 

हजारो वर्षो से खेती ,पशुपालन ,बाणिज्य ,कारीगरी ,उद्धोग-धंधा तथा अन्य प्रकार के स्वरोजगार व्यापार श्रेणी के मेहनतकश और कड़ी मेहनत से जीविका उपार्जन करने बालो की अपमान जनक स्थिति से गुजरना पड़ा है। ये सभी व्यापारी की श्रेणी में आते है यानि कमेरा(काम काजी लोग ) वर्ग जिसे वैश्य कहते हैं । इसी श्रेणी की एक वैश्य की जाती “कारस्कर “था । जिसका गोत्र कश्यप था । इस समुदाय के लोग फेरि लगाकर नमक व अन्य बस्तुए बेचते थे ,जो नमक बनाकर एवं उत्खनन करके उससे खड़िया नमक ,साधारण नमक एवं सेंधा नमक आदि गाँव –शहर ,देश –विदेश मे बेचते थे । अन्नय आदि बस्तु के बदले बिक्रय करते थे ,इस तरह मुख्य व्यावसाय नमक उत्पादन से लेकर वितरण था । कड़ी मेहनत ,संघर्सशील और बस्तुएँ बेचने के क्रम मे चिल्लाने के कारण प्राचीन काल मे इस जाती को “कारस्कर ”( कड़ी मेहनत,संघर्षशिलता, जुझारूपन और कर्कस आवाज में बोलने बाला )बताया और नीची जाती कहाँ ,एवं अपमानित किया जाता था। कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार [सभी वैश्य जाती ]का सम्बोधन हो गया बताया है । (अर्थशास्त्र पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ फीक पृष्ट 303-4) वह आज भी रौनियार प्रचलित है । मेहनती कामों में लगे हुये लोगों को शुरू से लांछित और अपमानित किया जाता रहा है ,जबकि देश के आर्थिक स्थिति मजबूत करने में रौनियार समुदाय की अहम भूमिका थी । सदियों से देशहित ,समाजहित एवं धार्मिकहित में इस समुदाय के लोगों ने अग्रिणी भूमिका निभाते आया है । 

विक्रमादित्य सम्राट चन्द्रगुप्त को कौन नहीं जानता है । अगर भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ कहा गया था तो वह काल चन्द्रगुप्त बंश का था।किन्तु उस समय भी इस समुदाय के लोगों को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा था । “कौमुदी महोत्सव नामक प्राचीन नाटक “में चन्द्रगुप्त को “कारस्कर” बताकर ऐसे नीच जाती के पुरुष को राजा होने के अयोग्य बताया है । जबकि वकाटक महारानी प्रभावती गुप्ता के अभिलेख (महरौली और प्रयाग लौह स्तम्भ लेख )में गुप्तों की वंशावली दी गई है । गुप्त अभिलेखों में जो वंश वृक्षों में सर्वप्रथम नाम ‘श्री गुप्त ‘ का आता है ।“ श्री “शब्द सम्मानार्थ है “गुप्त ”का शाब्दिक अर्थ संरक्षित है । “श्री गुप्त ” का अर्थ लक्ष्मी व्दरा रक्षित (लक्ष्मी पुत्र ) है । चन्द्रगुप्त ,समुद्रगुप्त ,कुमारगुप्त तथा कार्तिकय व्दरा रक्षित हुआ । जो किसी प्रतापी राजा के लिए अत्यंत उपयुक्त है । चीनी यात्री इत्सिंग ने भी यात्रा वृतांत में “चे –लि –कि –तो”(लक्ष्मी पुत्र) बताया है । स्वयं समुद्रगुप्त कि प्रयाग प्रशस्ति –महाराजा श्री गुप्त प्रपौत्रस्य महाराजा घटोत्कच पौत्रस्य महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त पुत्रस्य .....श्री समुद्रगुप्तस्य ......क्रमशः ! (1)कुमार गुप्त प्रथम ,स्कन्ध गुप्त ,पुरू गुप्त ,नरसिंह गुप्त बालादित्य ,कुमार गुप्त व्दितिये ,बुध्द गुप्त ,तथागत गुप्त ,बज्रगुप्त ,भानु गुप्त वैन्य गुप्त व्दादशादित्य गुप्त ........परमभट्टारिकायां राजां महादेव्यां श्री श्रीमती देवयामुतपन्ना ।  मेहरौली एवं प्रयाग प्रशस्ति से स्पष्ट है कि चन्द्रगुप्त के विरासत लक्ष्मी पुत्र “चे –लि –कि –तो” है । जो सम्मानजनक नमक के व्यापार में लगी जाती का वंशज है । चन्द्रगुप्त की एक स्वर्णमुद्रा है जिस पर एक ओर लिच्छवियः तथा दूसरी ओर चन्द्रगुप्त तथा कुमार देवी उत्कीर्ण है एवं दोनों का चित्र उस पर अंकित है । लिच्छवियों के वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त के साथ था ,इस कारण इस समुदाय के वंशज को क्षत्रिय भी माना जाने लगा था ,और उत्तर का भू-भाग तथा पश्चिम बंगाल के भू-भाग गुप्तो के अधिकार मे था एवं उत्तर बिहार (वैशाली तक )जो लिच्छवियों की राजकुमारी कुमार देवी के अधिकार मे था । दोनों वंशों का एकीकरण हो गया तथा चन्द्रगुप्त प्रथम ने प्रराक्रम से अन्य राज्यों को जीत कर पाटलीपपुत्र मे फिर से एक साम्राज्य की नींव डाली एवं शुभ अवसर पर महाराजाधिराज की पदवि धारण किया । .........वायुपुराण में ’भोक्षन्ते गुप्त –वंशजाः’ एवं अपने राज्याभिषेक की तिथि को नए संवत ‘गुप्त संवत ‘का घोषणा किए जो तिथि 20 दिसंबर 318 ई॰ अथवा 26 फरवरी 320 ई॰ निश्चित होती है । लगभग 319-320 ई॰ से गुप्त संवत का श्रीगणेश होता है । इस समय तक आते-आते भारत का नक्शा चतुर्भुज की तरह हो गया था तथा भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ नाम से संबोधित किया जाने लगा था । सम्राट स्कन्ध गुप्त के समय भारत पर कई वार श्वेत हूणों का भयानक आक्रमण हुआ था ,जिसमे गुप्त वंश विजय प्रप्त किया था। इन आक्रमणों ने स्कन्ध गुप्त की शक्ति को झकझोर दिया तथा काफी धन-जन की हानी उठाना पड़ा था। (बिष्णु स्तम्भ-कंधार –हुणेयस्य समागतस्य समरे दोभर्या धरा कंम्पित भीमावर्तकस्य) सम्राट बुद्ध गुप्त तक अपने साम्राज्य की सुरक्षा में लगा रहा ,किन्तु बार-बार हूण आक्रमण जारी रहा । एरण अभिलेख बुद्ध गुप्त ने 484-85ई॰ में प्रसारित किया था। इनके मृत्यु के बाद हूणों ने कब्जा कर लिया । बुद्ध गुप्त के पश्चात उत्तराधिकारी तथागत गुप्त ,नरसिंह गुप्ता ,वैन्य गुप्त तक आते-आते अपने साम्राज्य को एक नहीं रख पायेँ । प्रायः सभी लड़ाई हारते चले गए । छोटे-छोटे राज्यों में देश का विघटन हो गया । छोटे-बड़े सामंतों ने भी कब्जा कर लिया । इस तरह से लंबे समय से गुप्त वंशों का विघटन होते चला गया । सभी लड़ाईयाँ हारते-हारते गुप्त सम्राट के वंशज को मध्यकाल आते आते रणहार (रण +हार)कहा जाने लगा । जो प्राचीन काल मे कारस्कर वंशबृक्ष का था । कारस्कर जाती नमक के व्यापारी थे,अब मध्यकाल मे इनका सम्बोधन रणहार जो काफी प्रचलित हो गया । उस समय अपमान सूचक था । मध्यकाल में सम्राट हेमचन्द्र हेमू जो 1556 में दिल्ली के साशक थे उन्हे भी हारना पड़ा था ,हेमू के बाद के समय तक आते-आते रणहार (रण +हार) शब्द का मध्य –आधुनिक काल में अपभ्रंस रौनियार ,रोनियार ,नूनियार ,नूनिया ,लानियार (सभी वैश्य वर्ग ) गुप्त वंशजों को कहा जाने लगा , जो आज उस गुप्त वंश के समुदाया का जाती सूचक हो गया है। वर्त्तमान में इस जाती का नाम हीं रौनियार हो गया है ।.( कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार लानियार जाती का सम्बोधन हो गया बताया है ।

हम अपने विरासत के इतिहास की छान-बिन करने पर पाते है की शुरू में कारस्कर जाती जिसका गोत्र कश्यप थी , लिच्छवि राजकुमारी ‘कुमार देवी ‘से वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त से होना ,चीनी यात्री व्हेनसांग का विवरण ,नेपाल की वंशावली ,प्राचीन तिब्ती ग्रन्थ ‘दुल्व ‘आदि से भी प्रमाणित है । उक्त वैवाहिक संबंध से लिच्छवि तथा गुप्त राज्य का एकिकारण हो सका ,उस समय उत्तर का कुछ भू-भाग तथा पश्चिमी बंगाल पर गुप्तों का अधिकार था और उत्तर बिहार लिच्छवियों के अधिकार में था ,चन्द्रगुप्त ने पराक्रम से अन्य राज्यों को भी जीत कर पाटलीपुत्र में फिर से एक साम्राज्य की नींव रखी तथा उस शुभ अवसर पर ‘महाराजाधिराज ‘की उपाधि धारण किया ,इसका प्रमाण स्वयं चन्द्रगुप्त की है । 

साभार : श्री कामेश्वर गुप्ता  ( रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा)

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