Sunday, May 20, 2018

उत्तर गुप्त राजवंश

उत्तर गुप्त राजवंश

सुप्रसिद्ध गुप्त राजवंश का अवसान 550-51 ईस्वी में हुआ और इसके साथ ही उत्तर भारतीय राजनीति में रिक्तता के साथ-साथ अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण भी उत्पन्न हुआ। गुप्त सम्राटों के अधीन उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले अनेक स्थानीय राजवंश इस रिक्तता को भरने के लिए अपनी शक्ति के संवर्धन में लग गये। परिणामतः उनमें प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुयी, जिसने पारस्परिक संघर्षों को जन्म दिया। कतिपय सामन्त राजवंश मगध और उसके पार्श्ववर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्यवादी शक्ति बनने का स्वप्न देखने लगे इनमें उत्तर गुप्त, मौखरि एवं थानेश्वर के पुष्यभूति राजवंश का नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सभी राजवंशों के सन्दर्भ में प्रचुर सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं तथापि आभिलेखिक एवं साहित्यिक स्रोतों से उत्तर गुप्त, मौखरी एवं पुष्यभूति राजवंश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएं उपलब्ध हैं। अतएव इतिहासकारों ने इन राजवंशों का इतिहास उपलब्ध साक्ष्यों के समवेत विवेचन के आधार पर प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। गुप्तोत्तरकालीन इतिहास का विवरण प्रस्तुत करते हुए इस आलेख में भी क्रमशः उत्तरगुप्त राजवंश का इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं।

उत्तर गुप्त राजवंश के इतिहास को प्रकाशित करने वाले अभिलेखों में आदित्यसेन का अफसढ़ अभिलेख तथा जीवित गुप्त द्वितीय का देववर्णाक अभिलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त आदित्यसेन के समय के दो अभिलेख शाहपुर और मन्दार नामक स्थानों तथा विष्णुगुप्त के काल का एक अभिलेख मंगराव नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से ये विशेष सूचना प्रदायी नहीं हैं। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ये सभी लेख बिहार प्रान्त से प्राप्त हुए हैं। उदाहणार्थ अफसढ़ अभिलेख गया जिले में स्थित अफसढ़ नामक स्थान में मिला है, जो इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त से लेकर आदिसेन तक के काल के ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करता है। इससे हमें आदित्यसेन तक उत्तरगुप्त राजवंशावली का ज्ञान तो होता ही है साथ ही इससे उत्तरगुप्त मौखरी सम्बन्धों पर भी रोचक प्रकाश पड़ता है। देववर्णाक अभिलेख बिहार प्रान्त के शाहाबाद (आरा) जिले के देववर्णाक नामक स्थान से मिला है।

इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय कनिंघम महोदय को है। उन्होंने 1880 ईस्वी में इसे प्राप्त किया था। इस अभिलेख से उत्तरगुप्त राजवंश के अंतिम तीन शासकों देव गुप्त, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के काल के इतिहास के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं। इस प्रकार अफसढ़ एवं देववर्णाक से प्राप्त अभिलेख एक साथ दृष्टि में रखने पर हमें इस वंश के ग्यारह शासकों का अविच्छिन्न इतिहास ज्ञात हो जाता है। चूँकि कृष्ण गुप्त इस वंश का प्रथम शासक तथा जीवित गुप्त द्वितीय इस वंश का अन्तिम शासक था। अतः सम्प्रति इस राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास न्यूनाधिक रूप से ज्ञात है, तथापि इस वंश के इतिहास के सम्बन्ध में अभी भी अनेक ऐसी सूचनाएँ हैं जो विवादस्पद बनी हुई हैं। जिनके सम्बन्ध में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णायक मत व्यक्त करना दुष्कर है।

उत्पत्ति एवं आदि राज्य

उत्तर गुप्त राजवंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त को अफसढ़ अभिलेख में ‘सदवंश’ में उत्पन्न बताया गया है। इससे केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह किसी उच्चकुल से सम्बद्ध था। इससे अधिक उत्तर गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में हमें कोई सूचना नहीं मिलती। इस वंश के अधिकांश शासकों के नाम के साथ ‘गुप्त’ शब्द जुड़ा हुआ है। अतः कतिपय विद्वानों के द्वारा यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि ये चक्रवर्ती गुप्त राजवंश से सम्बन्धित रहे होंगे। किंतु यह सम्भावना निर्मूल प्रतीत होती है। क्योंकि यदि ये चक्रवर्ती गुप्तों से सम्बद्ध होते तो इनके लेखों में निश्चय ही गर्व पूर्वक इस बात का उल्लेख किया गया होता। तो भी उल्लेखनीय है कि इस वंश के सभी राजाओं के नाम के अन्त में गुप्त शब्द नहीं मिलता।

ध्यातव्य है कि इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक का नाम आदित्यसेन मिलता है। सम्भवतः उत्तर गुप्त राजवंश, सम्राट गुप्तों के आधीन शासन करने वाला एक सामन्त राजवंश था। क्योंकि इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त को केवल नृप उपाधि प्रदान की गई है तथा इसके उत्तराधिकारी हर्ष गुप्त के नाम के साथ केवल आदर सूचक ‘श्री’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि चक्रवर्ती गुप्तों से पृथक करने के लिए ही इतिहासकारों ने इस वंश को परवर्ती गुप्त वंश अथवा उत्तर गुप्त वंश कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इस नामकरण पर आपत्ति भी की है। सुधाकर चट्टोपाध्याय का सुझाव था कि इस वंश का नामकरण उनके संस्थापक कृष्ण गुप्त के नाम पर करना चाहिए तथा इसे ‘कृष्ण गुप्तवंश’कहा जाना चाहिए।

गुप्त राजवंश अथवा उत्तर गुप्त राजवंश अब इतिहासकारों के बीच अधिकांशतः स्वीकृत और बहुमान्य हो चुका है। उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र कौन सा था ? यह विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है। इस राजवंश के पश्चात्वर्ती शासकों आदित्यसेन, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के अभिलेख मगध क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह इंगित है कि इन तीन शासकों का शासन मगध क्षेत्र पर व्याप्त था। अतः फ्लीट आदि विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस राज्यवंश का मूल क्षेत्र भी मगध ही रहा होगा।1 इसके विपरीत डी. सी. गांगुली, आर. के. मुकर्जी, सी. बी. वैद्य, हार्नले एवं रायचौधरी आदि अनेक विद्वानों का यह विचार है कि इस वंश के लोग मूलतः मलवा के निवासी थे जो हर्षोत्तर काल में मगध के शासक बने।2 मालवा को उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानने वाले विद्वान का मुख्य तर्क यह है कि हर्षचरित में माधव गुप्त का उल्लेख मालवराज पुत्र के रूप में हुआ है। जबकि अफसढ़ अभिलेख में माधव गुप्त को महासेन गुप्त का पुत्र कहा गया है। दोनों को ही स्रोतों में माधव गुप्त को हर्ष का मित्र कहा गया है।

हर्षचरित के अनुसार वह हर्ष का बाल सखा था जबकि अफसढ़ अभिलेख के अनुसार वह हर्ष देव के निरन्तर साहचर्य का आकांक्षी था। इन दोनों स्रोतों को साथ-साथ देखने से हर्षचरित के मालवराज और आदित्यसेन के पितामह महासेन गुप्त की एकरूपता प्रमाणित होती है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि जीवित गुप्त द्वितीय के देववर्णाक अभिलेख के अनुसार मगध पर पहले मौखरी सर्ववर्मा और अवन्तिवर्मा का अधिकार था, जो उत्तर गुप्त वंश के शासक दामोदर गुप्त और महासेन गुप्त के समकालीन थे। इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि मगध का क्षेत्र सर्ववर्मा के पिता ईशानवर्मा के भी आधीन रहा हो, जो उत्तर गुप्त वंशी शासक कुमार गुप्त का समकालीन था। क्योंकि ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख में ईशानवर्मा को आन्ध्रों, शूलिकों तथा गौड़ों का विजेता कहा गया है और गौड़ की विजय मगध क्षेत्र पर अधिकार के बिना सम्भव नहीं प्रतीत होती। इन सभी तथ्यों को दृष्टि में रखने पर पूर्वी मालवा के क्षेत्र को ही उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानना युक्ति संगत लगता है।

कृष्ण गुप्त 

असफढ़ अभिलेख के अनुसार उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक कृष्ण गुप्त था। अभिलेख के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासनकाल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता तथापि इस दिशा में हमें ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है। ईशानवर्मा उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासनकाल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमार गुप्त के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासनकाल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

अफसढ़ अभिलेख में कृष्ण गुप्त को ‘नृप’ उपाधि से विभूषित किया गया है।1 इस समय गुप्त साम्राट बुध गुप्त शासन कर रहा था जिसका राजनैतिक प्रभाव मालवा क्षेत्र तक निश्चित रूप से व्याप्त था। बुध गुप्त के शासनकाल में ही हूण नरेश तोरमाण का पश्चिमी भारत पर आक्रमण हुआ। तोरमाण के शासन का प्रथम वर्ष का अभिलेख एरण से प्राप्त हुआ है। इससे यह विदित होता है कि 490 ईस्वी और 510 ईस्वी के बीच किसी समय तोरमाण का अधिकार मालवा क्षेत्र पर स्थापित हुआ। उसने बुध गुप्त के एरण क्षेत्र पर शासन करने वाले सामन्त मातृविष्णु के अनुज धान्यविष्णु को अपनी ओर से इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया। किंतु मालवा क्षेत्र में हूणों की यह सत्ता निर्विध्न नहीं रही। क्योंकि एरण से ही प्राप्त 510 ईस्वी के भानु गुप्त के अभिलेख से ज्ञात होता है कि भानु गुप्त ने, जो एक महान योद्धा था एरण में एक भीषण युद्ध किया, जिसमें उसका मित्र गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ था और उसकी पत्नी अपने पति के शव के साथ सती हो गई थी।

समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भानु गुप्त और गोपराज ने यह युद्ध हूण नरेश तोरमाण के विरूद्ध ही किया होगा। स्पष्टतः मालवा क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में तेजी के साथ परिवर्तन हो रहा था जिससे मध्य भारत के परिव्राजक, उच्चकुल तथा एरण क्षेत्र के धान्यविष्णु जैसे सामन्त कुलों की गुप्त सम्राटों के प्रति स्वामिभक्ति शिथिल और संदिग्ध होती जा रही थी। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए कृष्ण गुप्त ने पूर्वी मालवा में अपना छोटा सा राज्य स्थापित किया। यद्यपि अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि उसकी सेना में सहस्रों की संख्या में हाथी थे तथा वह असंख्य युद्धों का विजेता था एवं विद्वानों से सदैव वह घिरा रहता था, किन्तु इसे औपचारिक प्रशंसा मात्र ही समझना चाहिए।

हर्ष गुप्त

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था। इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था। अफसढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त किया था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरूद्ध संघर्षरत था।

अफसढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थित एक सामान्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोधर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसकी बहन हर्ष गुप्ता का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

जीवित गुप्त प्रथम 

हर्ष गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जीवित गुप्त प्रथम था। इसने लगभग 520 ईस्वी से 540 ईस्वी तक शासन किया। अफसढ़ अभिलेख से उपलब्ध सूचनओं से यह संकेत मिलता है कि यह अपने पिता एवं पितामाह की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। इसे अभिलेख में ‘क्षितीशचूड़ामणि’1 उपाधि से विभूषित किया गया है। अफसढ़ अभिलेख में इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि ‘वह समुद्रतटवर्ती हरित प्रदेश तथा हिमालय के पार्शववर्ती शीत प्रदेश के शत्रुओं के लिए दाहक ज्वर के सदृश था।’1 ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त-साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण एवं मालवा शासक यशोवर्धन के दिग्विजय के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक अव्यवस्था की भयावह स्थिति उतपन्न हो चुकी थी।

गुप्त सम्राटों का प्रताप-सूर्य अस्त हो रहा था और हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित उत्तरी बंगाल के क्षेत्रों से गुप्त सत्ता का प्रभाव समाप्त हो चला था। असम्भव नहीं है कि जीवित गुप्त प्रथम ने समकालीन गुप्त सम्राट, जो सम्भवतः कुमार गुप्त तृतीय था, के सामन्त के रूप में पूर्वी भारत में विद्रोहों का दमन करने के लिए यह अभियान किया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभियान में समकालीन मौखरी नरेश ईश्वर वर्मा ने भी उसका सहयोग किया। क्योंकि जौनपुर शिलालेख में यह कहा गया है कि ईश्वर वर्मा ने उत्तर की दिशा में हिमालय तक के क्षेत्रों (प्रालेयाद्रि) पर विजय प्राप्त की थी। इन विजयों के परिणाम स्वरूप जीवित गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्तों के राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि हुई। इसलिए अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि ‘उसका पराक्रम पवन पुत्र हनुमान द्वारा समुद्र लंघन के समान अमानुषिक था।

कुमार गुप्तः

जीवित गुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुमार गुप्त हुआ। इसका शासनकाल लगभग 540 ईस्वी से से 560 ईस्वी तक माना गया है। इसके शासन के प्रायः मध्यकाल में (550-51ईस्वी) गुप्त सम्राट विष्णु गुप्त की मृत्यु हुई एवं गुप्त राजवंश का पूर्णतः अंत हो गया। गुप्त राजवंश के पतन का लाभ उठाने की दिशा में उत्तर गुप्त और मौखरी दोनों ही राजवंश सक्रिय हो उठे। परिणामतः इन दोनों राजकुलों का पारस्परिक मैत्री सम्बन्ध समाप्त हो गया। अफसढ़ अभिलेख से दोनों कुलों के बीच शत्रुता एवं संघर्ष की स्पष्ट सूचना मिलती है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त एवं उसके समकालीन मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कदाचित इस संघर्ष का उद्देश्य मगध के क्षेत्र पर, जो साम्राज्य सत्ता का प्रतीक था, अधिकार स्थापित करना था।

उत्तर गुप्त नरेश कुमार गुप्त एवं मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच संघर्ष की सूचना देने वाला एकमात्र स्रोत अफसढ़ अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त ने ‘राजाओं में चन्द्रमा के समान शक्तिशाली ईशानवर्मा के सेना रूपी क्षीरसागर का, जो लक्ष्मी की सम्प्राप्ति का साधन था, मन्दराचल पर्वत की भाँति मंथन किया। इस श्लोक में निहित अर्थ को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। रायचौधरी का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त की विजय हुई तथा ईशानवर्मा पराजित हुआ। क्योंकि मौखरियों द्वारा इस युद्ध में विजय का कोई दावा नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि ईशानवर्मा के 554 ईस्वी के हड़हा अभिलेख में इस युद्ध का कोई वर्णन नहीं है। अतः इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह युद्ध 554 ईस्वी के बाद किसी समय हुआ होगा। अफसढ़ अभिलेख के आगे के श्लोक में यह कहा गया है कि इस युद्ध के बाद कुमार गुप्त ने प्रयाग में अग्निप्रवेश कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।1 निहाररंजन राय और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त पराजित हुआ था और उसने पराजय जनित ग्लानि के कारण प्रयाग में आत्महत्या की थी।

साभार: vimitihas.wordpress.com/tag/उत्तर-गुप्त-राजवंशसंपादक- मिथिलेश वामनकर


झारखण्ड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक

रजरप्पा: झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक, 27% आरछण की मांग को लेकर आंदोलन तेज करने का निर्णय

आज 20 मई को रजरप्पा मंदिर मिलन चौक स्थित संस्कार होटल सभागार में झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की एक विस्तारित बैठक हुई। इस बैठक में पूरे प्रदेश से वैश्य मोर्चा के पदाधिकारी और सदस्य शामिल होने आए। इस बैठक की अध्यछता केंद्रीय अध्यछ श्री महेश्वर साहु एवं संचालन उप-प्रधान महासचिव श्री राजीव राज एवं केंद्रीय महासचिव श्री बिरेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से किया। इस बैठक में मुख्यातिथि के बतौर मोर्चा के मुख्य संरछक शान-ए-वैश्य श्री गोपाल प्रसाद साहु उपस्थित थे। यह बैठक मोर्चा के मुख्य मुद्दों, यथा- पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन करने, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को भी तत्काल राष्ट्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने, शून्य जिलों में भी एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने, सांगठनिक सुदृढ़ीकरण व विस्तार, सिल्ली एवं गोमिया उपचुनाव, आगे की रणनीति व कार्यक्रम आदि मुद्दों रखी गई थी।

सर्वप्रथम रामगढ़ जिलाध्यछ रामदेव प्रसाद द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। तत्पश्चात केंद्रीय अध्यछ महेश्वर साहु द्वारा विषय प्रवेश कराया गया। तब केंद्रीय समिति की बैठक में उपरोक्त मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई और कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गए। तत्पश्चात बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि -

◆पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, बिजली विभाग की मनमानी और व्यवसायियों की परेशानी आदि मुद्दों को लेकर पूरे प्रदेश में जोरदार आंदोलन चलाया जायेगा। जिसके तहत आगामी 12 जून को हजारीबाग में तथा 18 जून को मेदिनीनगर में प्रमंडलीय स्तर पर प्रदर्शन व महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा और मुख्यमंत्री के नाम आयुक्त को स्मार-पत्र सौंपा जायेगा। जबकि 1 जुलाई से 3 जुलाई तक राजभवन (रांची) के समछ तीन दिवसीय महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। इसके बाद भी सरकार मोर्चा की मांगों पर पहल नहीं करती है तो क्रांति दिवस के अवसर पर 9 अगस्त को राज्य के सभी जिलों में वैश्य क्रांति सम्मेलन का आयोजन कर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई की घोषणा की जायेगी।

◆ बैठक में प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि वैश्य समाज अब राजनीति में भागीदारी और दावेदारी के लिए पूरे प्रदेश में जागरूकता अभियान चलायेगी और बुद्धिजीवियों तथा पढ़े-लिखे नवजावनों से भी राजनीति के छेत्र में उतरने का आह्वान करेगी, ताकि आने वाली पीढ़ी को उनका वाजिब हक-अधिकार दिलाया जा सके।

◆ बैठक में तय किया गया कि गोमिया एवं सिल्ली में उसी दल/उम्मीदवार को समर्थन किया जायेगा जो वैश्य मोर्चा के मुद्दों,यथा-पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को पुनः राष्ट्रीय ओ बी सी सूची में शामिल करवाने, शून्य जिलों में एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने आदि को स्वीकार करेगा। बिना बातचीत किये जबरन एवं बेवजह हम किसी दल को समर्थन नहीं करेंगें।

◆ संगठन विस्तार के तहत कई लोगों को केंद्रीय समिति में बतौर सदस्य शामिल किया गया, जैसे- सुरेश प्रसाद (गिरिडीह), डॉ आर. एन. प्रसाद (भुरकुंडा), सुमंत साह (केरेडारी)। इनकी कार्यछमता और संगठन के प्रति समर्पण को देख कर पदाधिकारी बनाया जायेगा।

इस अवसर पर बैठक को संबोधित करते हुए मोर्चा के मुख्य संरछक व मुख्य अतिथि गोपाल प्रसाद साहु ने कहा कि संगठन में बड़ी ताकत होती है। जब से वैश्य मोर्चा का गठन किया गया है, मोर्चा ने कई उपलब्धियां हाशिल की है और वैश्य समाज को लाभ दिलाया है। अगर वैश्य समाज के लोग इसी तरह संगठित होकर रहें और अपने मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहें तो आगे भी इसका लाभ मिलेगा। मुख्य अतिथि श्री साहु ने कहा कि झारखंड में पिछड़ों का आरछण कम कर देना, उनके अधिकारों को छीनना है। इससे लाखों छात्रों एवं बेरोजगारों को नुकशान हो रहा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल पिछड़ों को 27% आरछण की व्यवस्था कर दे, अन्यथा सड़क पर उतर कर आंदोलन का ही एकमात्र रास्ता बचता है। हमें आंदोलन के लिए सरकार मजबूर न करे। श्री साहु ने कहा कि मैं हमेशा समाज के साथ हूँ और आगे भी रहूँगा।

इस बैठक को मोर्चा के कार्यकारी अध्यछ पंचानन साहु (बुंडू), केंद्रीय उपाध्यछ श्रीमती रेखा मंडल (धनबाद), सुरेश प्रसाद आदि नेताओं ने भी संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन गुलाब प्रसाद साहु ने किया।



Friday, May 18, 2018

जब सब कहते हैं अच्छे बनिये, फिर इनकी भागीदारी के अनुसार हर क्षेत्र में हिस्सेदारी क्यों नही

आदिकाल से लेकर मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के हर क्षेत्र में वैश्य समाज यानी बनिये का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं महाराणा प्रताप के समय में यह बात उस समय सिद्ध हो गई जब राणा जी पर परेशानी पड़ी और सेना एकत्रित करने के लिये पैसा चाहिये था तो भामाशाह ने अशरफियों का ढेर उनके सामने लगा दिया। इसी प्रकार अन्य शासकों के शासनकाल में भी वैश्य समाज के योगदान को बादशाओं व राजाओं ने खूब सराहा और फिर उन्हे बड़ी बड़ी पदवियां भी दी।

समाज सुधार और समाजवाद की व्यवस्था बनाने के क्षेत्र में महाराजा अग्रसेन जी का बड़ा योगदान रहा। साफ सफाई के लिये उनके समय में कई व्यवस्थाएं की गई बताई जाती हैं। तो समाज में सबको बराबर का दर्जा भी प्राप्त हो और हर व्यक्ति के पास घर और रोटी तथा व्यापार उपलब्ध हो इसके लिये उन्होंने अपने समय में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को एक रूपया एक ईंट देने का प्रचलन शुरू किया जिससे ईंटो से घर बनाया जा सकें और रूपयों से व्यवसाय हो सके और इसके लिये समाज का हर संपन्न व्यक्ति जिसके पास जितना होता था वो सबको एक एक ईंट देता था लेकिन अगर कम भी है तो एक रूपया एक ईंट सब दे देते थे।
राष्टपिता महात्मा गांधी के समाज में योगदान और आजादी में उनके कार्याें एक कुर्बानियों को कोई भी भुला नहीं सकता। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि वैश्य समाज बनियों का मानव जाति के उत्थान में बहुत बडा योगदान रहा है।

वर्तमान समय में तो अब जो भी कोई व्यवसाय कर रहा है चाहे वो किसी जाति से संबंध क्यों न हों वो व्यवसाय होने की वजह से हर व्यक्ति के लिये व्यापारी वैश्य की श्रेणी मे आता है। और जो नहीं जानता उसे बनिया कहकर ही पुकारता है।

आप गाडी या बस में यात्रा करते है तो वहां श्लोगन लिखा मिलता है अच्छे यात्री बनिए की बात पढाई की चली तो अभिभावक व हर बुजुर्ग कहता है अच्छे छात्र बनिए। राजनेता की बात चलती है तो भी एक जुमला हर जगह सुनने को मिलता है अच्छा नेता बनिये और अच्छा जनसेवक बनिये अच्छा व्यापारी बनिये और अब तो कितने ही स्थानों पर सुनने को मिलता है अच्छे ज्योतिषी बनिये और अच्छे पूजारी बनिये पुलिस वाले हर सम्मेलन और विचार गोष्ठी में कहते सुनाई देंगे अच्छे वाहन चालक बनिये अच्छे इंसान बनिये।

जब सवाल यह उठता है कि सर्वमान्य शब्द बनिये को प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों से कहा जाता है कि अच्छे बनिये तो फिर आलोचना क्यों? कितनी ही जगह जब कोई किस्सा या बात होती है तो घूमा फिराकर व्यापारियों या बनियों की आलोचना करने का मौका कोई नहीं चूकता। कुछ लोग तो राजनीति हो या कोई ओर क्षेत्र। सीधे सीधे या घूमा फिराकर व्यापारी और बनिया कहकर इनकी आलोचना करने में कोई कसर नहंी छोड़ते। कितने ही अफसर तो जब अकेले बैठकर बात करते हैं तो अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिये यह कहने से नहंीं चूकते कि वो बनिये वो ऐसा ऐसा वो तो वैसा हैं ।

मेरा मानना है कि हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनिया आखिर खराब कैसे हो सकते हैं। अगर कुछ लोगों को कमी दिखाई देती है तो वो पहले अपने अंदर झांककर देखे और जब वो एक उंगली दूसरे पर उठाता है तो तीन उंगूलियां उस पर उठ रही हैं। तो भैया मेरे कहने का मतलब यह है कि बनियों की आलोचना छोड़ उनके द्वारा जो हर मंच और हर क्षेत्र में उन्हे प्रमुख स्थान देने की बात उठ रही है उसमे अब कोताही न कर जितनी जिसकी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धांत को मानकर और वैश्य समाज बनियों के योगदान को देखते हुए उन्हे हर क्षे में अब समाज को प्रगति विकास को गति तथा जरूरतमंदों की मदद करने वाले इस समाज के लोगों को उनकी योगता और काबलीयत के आधार पर बढ़ावा देने में अब कोई कोताही किसी को नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह जब अच्छा बनिया है और हर कोई उसके जैसा बनना चाहता है तो उसकी अवहेलना ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है और जो उनको अधिकार नहीं देगा वो देर सवेर पिछड़ता ही रहेगा।

क्योंकि कुछ भी कह लों जिस प्रकार अन्नदाता किसान के योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता उसी प्रकार वैश्य व्यापारी और बनिया के योगदान को किसी भी क्षेत्र में कोई भी नकारने की स्थिति में सही मायनों में नहीं हैं। और गलत तरीके से किसी को परेशान करना अपनी ही हानि के मार्ग को खोलना ही कहा जा सकता है।

साभार: – रवि कुमार विश्नोई

राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना

सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com



Monday, May 14, 2018

लिपिका अग्रवाल - यूपी की बेटी ने किया कमाल, 12वीं क्लास में किया अॉल इंडिया टॉप




लखीमपुर खीरी- 'पसीने की स्याही से जो लिखते हैं अपने सपनों को, उनके किस्मत के पन्ने कभी कोरे नहीं हुआ करते।' किसी ने ठीक कहा है कि मेहनत ही सफलता की पूंजी होती है और आप अपनी मेहनत से असंभव को भी संभव बना सकते हैं। कुछ ऐसा ही कारनामा लखीमपुर खीरी की लिपिका अग्रवाल ने कर दिखाया है। 

शहर के गढ़ी रोड पर टिम्बर व्यवसाय दीपक अग्रवाल की बेटी लिपिका अग्रवाल ने ISC क्लास 12 की परीक्षा में 99.50 परसेंट से अॉल इंडिया टॉप किया है। अब वह बेहद खुश हैं और आगे डॉक्टर बनना चाहती हैं।

लखनऊ पब्लिक स्कूल की छात्रा लिपिका की उपलब्धि पर स्कूल और परिवार में खुशी का माहौल है। सभी एक दूसरे को मुंह मीठा करा खुशी का इजहार कर रहे हैं। 

टॉपर लिपिका ने बताया कि मुझे इतने प्रतिशत की उम्मीद नहीं थी। हमने 97 प्रतिशत तक अनुमान लगाया था। वहीं मेहनत के सवाल पर उन्हाेंने कहा कि हमने इस हिसाब से तैयारी की थी कि कुछ छूट न जाए। लिपिका ने इस उपलब्धि के लिए परिजनाें आैर स्कूल का विशेष याेगदान हैं। 



Wednesday, April 4, 2018

उत्तरप्रदेश में वैश्य समाज अत्याचार का शिकार

‘महाराज जी ने कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी’: योगी के पास फरियाद लेकर गया बिजनेसमैन रोते हुए बोला

‘महाराज जी ने कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी’: योगी के पास फरियाद लेकर गया बिजनेसमैन रोते हुए बोलामीडिया को अपना रोते-रोते अपना बयान देते हुए आयुष सिंघल ने कहा कि जब से यह सरकार बनी है वह दौड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पहले भी सीएम से दो बार मिल चुके हैं। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।


बिजनेसमैन आयुष सिंघल का आरोप है कि उन्हें धक्का मारकर बाहर कर दिया गया।

लखनऊ के एक बिजनेसमैन ने कहा है कि जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास एक फरियाद लेकर गोरखपुर गया तो सीएम ने डांटकर उसे भगा दिया और उसका आवेदन पत्र फेंक दिया। लखनऊ के अलीगंज के रहने वाले आयुष सिंघल युवा बिजनेसमैन हैं। आयुष सिंघल का आरोप है कि उसकी जमीन पर यूपी के पूर्व बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी और उनके बेटे और नौतनवां के निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी ने कब्जा कर लिया है। आयुष ने कहा कि जब वह इस बात की शिकायत लेकर सीएम के पास पहुंचे तो सीएम ने उन्हें धक्का मारकर भगा दिया। आयुष सिंघल ने रोते हुए कहा कि मेरी क्या गलती है, हम तो व्यापारी आदमी हैं।

आयुष ने कहा, “सीएम साहब को मिला मैने, कागज दिया, ब्रीफ करना शुरू किया कि अमनमणि त्रिपाठी ने हमारी जमीन कब्जा कर रखी है…कागज नचा के फेंक दिया, कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी।” जब पत्रकारों ने पूछा कि ऐसा किसने कहा तो, आयुष सिंघल ने कहा कि महाराज जी ने। मीडिया को अपना रोते-रोते अपना बयान देते हुए आयुष सिंघल ने कहा कि जब से यह सरकार बनी है वह दौड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पहले भी सीएम से दो बार मिल चुके हैं। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।

आयुष सिंघल ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि इस बार कुछ एक्शन लिया जाएगा लेकिन उन्हें धक्का मारकर भगा दिया गया, कागज नचा कर फेंक दिया। आयुष सिंघल के मुताबिक अमरमणि त्रिपाठी के लोग उन्हें जान से मारने की धमकी देते हैं। वहीं इस मामले में लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने कहा कि करीब 6-7 महीने पहले आयुष सिंघल उनसे मिलने आए थे। उन्होंने कहा कि जमीन का मामला होने की वजह से उन्होंने इस मुद्दे पर कलेक्टर साहब से बात की थी, इसके बाद राजस्व विभाग की टीम मौके पर गई और जमीन का सीमांकन किया।

एसएसपी के मुताबिक विवादित जमीन का कुछ हिस्सा सिंचाई विभाग का है। एसएसपी ने कहा कि आयुष सिंघल चाहते हैं कि पुलिस विवादित जमीन पर पहुंचे और जिस जमीन को वह अपना कहते हैं उस पर घेराबंदी करवा दे, लेकिन नैसर्गिक न्याय कहता है कि इस जमीन के जो भी 12 खातेदार हैं उनकी चौहद्दी एसडीएम कोर्ट में ही तय होगी। बता दें कि नौतनवां से निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है।
आयुष सिंघल का आवेदन

साभार: 

Monday, March 19, 2018

SANJANA SANGHI - 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' के रीमेक में नजर आएंगी संजना सांघी



मुंबई। संजना सांघी को 2014 की हॉलीवुड फिल्म 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' के हिंदी रीमेक के लिए चुना गया है। फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा बनाई जा रही इस फिल्म की शूटिंग 2018 के मध्य में शुरू होगी। इस फिल्म से कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा बतौर निर्देशक आगाज कर रहे हैं। इस रोमांटिक फिल्म में ऑस्कर विजेता ए.आर. रहमान संगीत देंगे।

छाबड़ा ने एक बयान में कहा, "मैं 'रॉकस्टार' की कास्टिंग के दौरान संजना से पहली बार मिला था। वह ऊर्जा से भरपूर युवती थीं। कुछ सालों बाद वह कुछ विज्ञापनों के लिए कास्टिंग के काम से फिर जुड़ी। वह एक परिपक्व युवती के रूप में नजर आईं और मैं देखकर हैरान रह गया कि वह एक बैहतरीन कलाकार हैं। उन्होंने कहा, "मैं फौरन इस बात को लेकर सुनिश्चित हो गया कि मैं एक दिन उसके साथ फिल्म बनाना पसंद करूंगा।

जैसे ही 'फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' की पटकथा तैयार हुई, मुझे वह इसके लिए बिल्कुल उपयुक्त लगीं। मैं इस प्रतिभाशाली लड़की के साथ मिलकर करिश्मा दिखाने का और इंतजार नहीं कर सकता। फॉक्स स्टार स्टूडियोज की चीफ क्रिएटिव ऑफिसर रुचा पाठक ने कहा कि वह मुकेश निर्देशित पहली फिल्म में इस प्रतिभाशाली युवती को लॉन्च करने के लिए उत्सुक हैं। 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' जॉन ग्रीन्स के उपन्यास पर आधारित है। इस हॉलीवुड फिल्म में शैलेन वूडली और एंसेल एलगोर्ट ने काम किया है।



GATE Result 2018: लखनऊ के प्रशांत गुप्ता ने केमिस्ट्री में किया ऑल इंडिया टॉप




संक्षेप: 
किसान के बेटे ने केमिस्ट्री में किया टॉप 
986 स्कोर पाकर यह सफलता प्राप्त की 
ये किताब लिखना है नेक्स्ट टारगेट 

लखनऊः इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) गुवाहाटी ने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग गेट-2018 का रिजल्ट घोषित कर दिया. इसमें किसान के बेटे प्रशांत गुप्ता ने केमेस्ट्री सब्जेक्ट में देश में पहला स्थान हासिल किया है. प्रशांत गुप्ता यूपी की राजधानी लखनऊ के इटौंजा के रहने वाले हैं. प्रशांत ने गेट में 986 स्कोर पाकर यह सफलता प्राप्त की है. उनके पिता अविनाश गुप्ता किसान हैं और मां मधु गुप्ता गृहणी हैं.

प्रशांत ने NYOOOZ को बताया कि वो हमेशा से टॉप 10 में रैंक हासिल करना चाहते थे, पर उन्हें नहीं पता था कि वो पहला स्थान भी हासिल कर सकते हैं. प्रशांत ने बताया कि उन्हें किताबें पढ़ना और क्रिकेट खेलना पसंद है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह GATE का एग्जाम कैसे पास किया जाए इस पर किताब लिखना चाहते हैं.

प्रशांत का कहना है, ``मैं नहीं चाहता कि GATE का एग्जाम देने वाले किसी भी स्टूडेंट को इसके बारे में जानने में परेशानी हो. GATE के लिए तमाम परेशानियां झेलने के बाद मैंने `हाउ टू क्रेक द एग्जामिनेशन किताब लिखने का फैसला किया है.``

प्रशांत ने आगे कहा, ``मुझे इस बात की खुशी है कि यूपी बोर्ड से पढ़ने के बावजूद में इस एग्जाम में टॉप कर पाया.`` बता दें कि प्रशांत ने 2015 में BHU से ग्रेजुएशन किया है जबकि 2017 में IIT दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएशन पास किया.

अपने पिता के बारे में बात करते हुए प्रशांत ने कहा, ``उन्होंने किसान होने के बावजूद मेरे सपनों को पूरा करने में साथ दिया. अब मेरे लिए मौका है कि मैं अपनी खुशी उनके साथ बांट पाऊं.``



Sunday, March 11, 2018

PARAG AGRAWAL - पराग अग्रवाल

आईआईटी के पराग अग्रवाल बने ट्विटर के नए चीफ टेक्नीकल ऑफिसर


माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने पराग अग्रवाल को अपना नया चीफ टेक्नीकल ऑफिसर (सीटीओ) नियुक्त किया है। उन्हें 2016 में कंपनी छोड़ने वाले एडम मेसिंगर के बदले यह जिम्मेदारी दी गई है। आईआईटी बॉम्बे के छात्र पराग ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की है। ट्विटर की वेबसाइट के मुताबिक, सीटीओ के रूप में पराग कंपनी की तकनीकी रणनीति का नेतृत्व करेंगे। उनके जिम्मे मशीन लर्निंग, ट्विटर के ग्राहक एवं राजस्व उत्पाद और इंफ्रास्ट्रक्चर टीम की देखरेख होगी। पराग 2011 में बतौर एड इंजीनियर ट्विटर से जुड़े थे। उन्हें हाल ही प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर इंजीनियर का खिताब दिया गया था। इसके बाद उन्होंने एड सिस्टम बढ़ाने के प्रयासों की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने ऑनलाइन मशीन लर्निंग के लिए भी एक प्लेटफार्म तैयार किया। पराग ने बड़े पैमाने पर डाटा रिसर्च के क्षेत्र में काम किया है। वह माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च, याहू रिसर्च और एटीएंडटी लैब्स जैसी दिग्गज कंपनियों से जुड़े रहे। ट्विटर ज्वाइन करने से पहले उन्होंने एटी एंड टी, माइक्रोसॉफ्ट और याहू में रिसर्च इंटर्नशिप की हैं। 


ट्विटर में पराग के योगदानों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से ट्विटर यूजर्स की टाइमलाइंस में ट्वीट्स के औचित्य बढ़ाने के प्रयास भी शामिल हैं। ट्विटर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से खुद के गलत इस्तेमाल को भी रोकता है। ट्विटर के प्रवक्ता ने बताया- सीटीओ के तौर पर उनका काम मशीन लर्निंग और एआई सीखाने पर केंद्रित होगा। इसके अलावा राजस्व उत्पाद और बुनियादी ढांचा टीमों की स्केलिंग करना भी होगा। ट्विटर ने इस हफ्ते घोषणा की थी कि वह अपने प्लैटफॉर्म पर 'सामूहिक स्वास्थ्य, खुलापन और सार्वजनिक बातचीत में शिष्टाचार बढ़ाने' के मकसद से समाज विज्ञान का एक निदेशक नियुक्त करना चाहता है।

साभार: 
amarujala.com/technology/twitter-appoints-iit-bombay-amlumnus-parag-agarwal-as-its-new-cto

KAJAL AGRAWAL - काजल अग्रवाल

काजल अग्रवाल


काजल अग्रवाल (जन्म: 19 जून, 1985) एक भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री है, जों अधिकतर तेलगू फ़िल्मों में कार्य कर चुकी है। वे तमिल और हिन्दी सिनेमा में भी पदार्पण कर चुकी हैं। इन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत एक हिन्दी फिल्म क्यों! हो गया ना... से शुरू की। जिसमें इन्होंने अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय के साथ अभिनय किया था। यह फिल्म 11 अगस्त 2004 को प्रदर्शित हुई थी। इसके बाद ही यह तेलुगू फिल्मों में भी काम करने लगीं।

सफर

अभिनय की शुरुआत (2004 - 08)

काजल ने पहली बार अभिनय वर्ष 2004 में क्यों! हो गया ना... नामक एक हिन्दी फिल्म में दीया की बहन के रूप में एक छोटा सा किरदार निभाकर किया था। इस फिल्म में इनके साथ अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय भी थे। उसके बाद तमिल फिल्म निर्देशक भारतीराजा के बोम्मलत्तममें अर्जुन सरजा के साथ अभिनय किया था। यह फिल्म तय समय से काफी देर में 2008 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी।


काजल ने पहली बार तेलुगू फिल्म में अभिनय 2007 में तेजा की फिल्म लक्ष्मी कल्याणम में कल्याण राम के साथ मुख्य किरदार के रूप में कार्य किया था,लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस में असफल रही। इसके अगले वर्ष में कृष्णा वाम्सि के द्वारा निर्देशित फिल्म 'चन्दामामा' में यह दिखाई दी। यह फिल्म सकारात्मक समीक्षा के साथ ही इनकी पहली सफल फिल्म बनी।

वर्ष 2008 में इनकी पहली तमिल फिल्म 'पजनी' भी प्रदर्शित हुई,जो पेरारसु द्वारा निर्देशित थी| जिसमें यह सह-कलाकार भरत के साथ दिखाई दी। इसी वर्ष इनकी दो और तमिल फिल्म भी प्रदर्शित हुईं। वेंकट प्रभु की कॉमेडी-थ्रिलर सरोज़ा में काजल ने अथिति भूमिका निभाई और भारतीराजा की फ़िल्म 'बोम्मलत्तम' में भी कार्य किया। यह दोनों ही फिल्म सफल रहीं लेकिन काजल के अभिनय के सफर को और आगे पहुँचाने में असफल रहीं क्योंकि दोनों ही फिल्मों में उनका किरदार कमजोर था। 2008 में रिलीज इनकी दो तेलुगु फिल्में 'पौरुडू' एवं 'अट्टादिसता' बॉक्स ऑफिस में सफल रहीं|

सार्वजनिक मान्यता एवं आलोचनात्मक प्रशंसा (2009 - 11)

काजल अग्रवाल की चार फिल्में 2009 में प्रदर्शित हुईं। सर्वप्रथम इन्होंने तमिल फिल्म 'मोधि विलायुडु' में अभिनय किया जो कि बॉक्स ऑफिस पर असफल रही| इसके बाद काजल ने एस. एस. राजामौली द्वारा निर्देशित उच्च बजट तेलुगु फ़िल्म मगधीरा में राम चरण तेजा के साथ दोहरी भूमिका निभाई। काजल के राजकुमारी के रूप में अभिनय को विशेष प्रशंसा मिली।

तेलुगू फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए इन्हें नामित किया गया था।मगधीरा अधिक कमाई करने में पूरी तरह से सफल हुआ। इसने कई फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। यह तेलुगू भाषा का अब तक का सबसे अधिक कमाई करने वाले फिल्मों में सबसे ऊपर आ गया। इस फिल्म की सफलता ने काजल को तेलुगू सिनेमा के मुख्य कलाकारों के स्थान पर पहुँचा दिया। यह फिल्म तमिल भाषा में मावीरन नाम से 2011 में प्रदर्शित हुआ और यह भी कमाई करने में सफल रहा।

Raj Kumar Gupta - Film Director

Raj Kumar Gupta

Director Raj Kumar Gupta during the shoot of Raid in Lucknow.

Raj Kumar Gupta made his debut as a writer & director with the critically acclaimed and commercially successful 'Aamir' (2008). Shot with a shoestring budget, guerilla style on the streets of Mumbai, this edgy thriller established Raj Kumar as a filmmaker to look out for and garnered several award nominations in the Best Debut Director category that year. After penning the screenplay of 'Barah Aana' (2009), Raj Kumar Gupta wrote and directed 'No One Killed Jessica' (2011), based on the true story of the murder of Jessica Lal and the controversial trial of the case. This powerful drama featuring Rani Mukerjee and Vidya Balan drew rave reviews and set the box-office ringing. Nominated for several awards including the prestigious Filmfare & Screen Awards in the Best Film, Best Director and Best Screenplay categories, 'No One Killed Jessica' catapulted the filmmaker into the big league. In 2013, Raj Kumar Gupta shifted gears by surprising his audience with the suspense comic caper 'Ghanchakkar'. Starring Emraan Hashmi and Vidya Balan, the film drew an extremely divided response from both critics and viewers, but confirmed that the filmmaker wasn't going to play by the conventional rules set by the industry. Raj Kumar Gupta made his debut as a producer in 2016 with a short film titled "Aaba" under his production house Raapchik Films Pvt. Ltd. which premiered at Berlin Film Festival 2017 in the Generation K Plus Category and went on to win the prestigious International Jury Prize for Best Short film in its category.



Saturday, March 10, 2018

Rajeev Khandelwal- राजीव खंडेलवाल

राजीव खंडेलवाल 



राजीव खंडेलवाल (उद्घोष 16 अक्टूबर 1 9 75) एक भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेता, गायक और मेजबान है। सबसे लोकप्रिय भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेताओं में से एक ने हिंदी टेलीविजन शो और फिल्मों में अपना करियर स्थापित किया है। वह अपने विभिन्न प्रदर्शनों के लिए कई पुरस्कार प्राप्तकर्ता हैं

उन्होंने टीवी श्रृंखला के साथ अपने अभिनय करियर की शुरुआत की, "क्या हद्सा क्या हकीकत" (2002) जहां उन्होंने कहानियों में से एक में नकारात्मक भूमिका निभाई। उनकी पहली दैनिक धारावाहिक जहां उन्होंने पुरुष की भूमिका निभाई है, Kahiin to Hoga (2003-2005)। इसके बाद उन्होंने कई टेलीविज़न शो में अभिनय किया जिसमें टाइम बम 9/11 (2005), सन लेना (2006), वाम राइट लेफ्ट (2007) शामिल हैं। 2008 में, उन्होंने बॉलीवुड की पहली फिल्म आमिर से बनाई, जो अपने करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद वह शैतान (2011), साउंडट्रैक (2011), टेबल नंबर 21 (2013), सम्राट एंड कंपनी (2015) और अन्य जैसी कई फिल्मों का हिस्सा बन गए।

अभिनय के अलावा उन्होंने कई रियलिटी शो की मेजबानी की है जिसमें डील हां नो डील, सचे का सामना, सुपर कारें और मेरी एंडेवर शामिल हैं। 2015 में, वह सोनी टीवी के शो रिपोर्टर के साथ टेलीविजन पर लौट आए
जीवन और परिवार


खंडेलवाल का जन्म 16 अक्टूबर 1 9 75 को जयपुर, राजस्थान, भारत में एक मारवाड़ी परिवार में हुआ था। वह लेफ्टिनेंट कर्नल सी.एल. का दूसरा बेटा है। खंडेलवाल (सेवानिवृत्त) और श्रीमती विजय लक्ष्मी खंडेलवाल उनका बड़ा भाई संजीव खंडेलवाल और राहुल खंडेलवाल उनके छोटे भाई हैं। उन्होंने केन्द्रीय विद्यालय, जयपुर से उनकी पढ़ाई की। बाद में उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, अहमदाबाद से रसायन विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

2007 में उन्होंने मुस्काण नामक संस्थान से स्वाती नाम की पांच वर्षीय लड़की को अपना लिया था। 7 फरवरी, 2011 को खंडेलवाल ने अपने लंबे समय से प्रेमिका मंजीरी कामतिकार से शादी की। उन्होंने कहा है कि वह नास्तिक है, लेकिन वह किसी भी धर्म का पालन करने वाले लोगों के खिलाफ नहीं है। वह वर्तमान में गोरेगाँव, मुंबई, भारत में रहता है।
अभिनय कैरियर
2000-2007: टेलीविजन की शुरुआत और सफलता


उन्होंने दिल्ली आधारित प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करना शुरू किया और एलएमएल, ग्रीन लेबल व्हिस्की, वीडियोकॉन और कई अन्य ब्रांडों के लिए भी तैयार किया गया। उन्होंने अपने टीवी कैरियर की शुरुआत कया हससा क्या हकीकत (2002) में एक नकारात्मक भूमिका के साथ की। 2002 में उन्हें बालाजी टेलिफिल्म्स की 'करीन टू होगा' की पेशकश की गई, जो रोमांटिक नाटक था। उन्होंने सुजल गरेवाल के चरित्र को चित्रित किया, जो लंबा, गहरे सुंदर और अमीर, एक मिल्स एंड बूनी नायक और एक तिरस्कारयुक्त प्रेमी है। सुजल गरेवाल को चित्रित करने के लिए, वह सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए कई पुरस्कार और प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। 2005 में, केतन मेहता की एक्शन टेलीविजन श्रृंखला, टाइम बम 9/11 में रॉ फील्ड फील्ड अधिकारी वरुण अवस्थी के रूप में उन्हें देखा गया था। 2006 में, उन्होंने सीआईडी ​​में एसीपी पृथ्वीराज के रूप में प्रवेश किया और पाकिस्तानी शो में सनिम के रूप में काम किया, सन लेना 2006-2007 में उन्होंने युवा आधारित नाटक श्रृंखला में कप्तान राजवीर सिंह शिखावत के रूप में वाम दाएं वामपंथ दिखाया; चरित्र बाद में बंद कर दिया गया था। इस चरित्र के उनके चित्रण को दर्शकों और आलोचकों से प्रशंसा मिली।
2008-2015: बॉलीवुड की शुरुआत और टीवी से तोड़ दिया


खंडेलवाल ने रोनी स्क्रूवाला के तंग थ्रिलर आमिर (2008) के साथ अपनी बॉलीवुड की शुरुआत की। वह डॉ। आमिर अली के रूप में डाली गईं, जो इंग्लैंड से भारत लौटते हैं और एक आतंकवादी समूह के अनिच्छुक मोहरा बन जाते हैं। बॉलीवुड की फिल्म स्टैमडामी ताराण आदर्श ने समीक्षा की, "राजीव खंडेलवाल शीर्षक भूमिका में उल्लेखनीय हैं। यह फिल्म फ्लैट में गिर जाएगी, यह एक अवर अभिनेता को सौंपी गई थी, लेकिन राजीव राइट रंगों को उधार देता है और विजयी हो जाता है। सीएनएन-आईबीएन के राजीव मसंद ने कहा, "बिना असहनीय, सहज और अचूक उपस्थिति के साथ धन्य, खंडेलवाल एक अनुभवी कलाकार की तरह स्क्रीन रखती है।" भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए एक कैनवास के रूप में उनका चेहरा, वह इस छोटी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभर आता है। " फिल्म ने घरेलू स्तर पर 18 मिलियन (यूएस $ 280,000) की कमाई की। फिल्म में उनके काम के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुरुष पदार्पण के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड का नामांकन मिला। 2011 में, खंडेलवाल के दो फिल्म रिलीज़ थे। उनका पहला प्रदर्शन बेजोय नांबियार की थ्रिलर फिल्म शैतान (2012) में था, जिसमें सह-अभिनीत कल्कि कोलीन शामिल थे। उन्होंने इंस्पेक्टर अरविंद माथुर की भूमिका निभाई, जिसे अनौपचारिक मामले को सुलझाने के लिए पुलिस आयुक्त द्वारा नियुक्त किया गया है, क्योंकि एक महिला को कथित रूप से मारने के लिए अपने घर की पहली मंजिल से एक नगर निगम को फेंकने के बाद उसे निलंबित कर दिया गया है। बॉलीवुड हुमामा के मनोरंजन पोर्टल के तारन आदर्श ने अपने प्रदर्शन के बारे में लिखा: "राजीव खंडेलवाल, एक पुलिस अफसर खेलते हैं जो अपने भीतर के राक्षसों से लड़ रहे हैं, भूमिका की नाखूनें, एक तंग, केंद्रित प्रदर्शन दे रहे हैं"

बाद में खांदलेवाल को सोहा अली खान के सामने संजीव गोयनका के साउंडट्रैक में देखा गया था। उन्होंने डीजे, राउनाक की भूमिका निभाई जो ड्रग्स और अल्कोहल के आदी हो गए और उनकी सुनने की क्षमता खो दी। उनका करियर नापसंद है, लेकिन संगीत के लिए उनका प्यार उन्हें खुद को जीवित करने में मदद करता है एनडीटीवी के सुभाष के झा ने समीक्षा की, "उनका प्रदर्शन इतने पूरा हुआ है कि वह पहली बार नहीं साबित करता है कि आज वह सबसे आकर्षक कलाकारों में से हैं। पैसे, समय और ध्यान के लिए, वह सही रॉक स्टार है।" तरन आदर्श ने कहा, "भावनात्मक रूप से अस्थिरता वाला चरित्र हमेशा किसी भी अभिनेता के लिए टैक्सिंग होता है और एक खास यात्रा होती है, लेकिन राजीव एक शानदार प्रदर्शन से विजयी हो जाते हैं।" फिल्म ने घरेलू स्तर पर 5.3 करोड़ (83,000 अमेरिकी डॉलर) की कमाई की। बाद में खांदेलावल ने रोमांटिक कॉमेडी में श्रेयस तलपदे और मुग्धा गोडसे के साथ खेला, विल विल मैरी मी? (2012)। हालांकि फिल्म को बहुत अच्छी समीक्षा प्राप्त नहीं हुई। तरन आदर्श ने खंडेलवाल की प्रशंसा की: "राजीव खंडेलवाल ने अपना हिस्सा उत्साह से किया।" इस फिल्म ने घरेलू स्तर पर 1.03 करोड़ (यूएस $ 50,000) कमाई की थी। उनकी अगली रिलीज परेश रावल और तेना देसाई के साथ मनोवैज्ञानिक रहस्य थ्रिलर, टेबल नंबर 21 (2013) थी, जहां उन्होंने विवन आगाशी की भूमिका निभाई थी। ज़ी न्यूज ने अपने प्रदर्शन की समीक्षा की, "इस फिल्म में, राजीव ने साबित किया है, फिर भी, वह सीमा जिसकी उनके अभिनय कौशल तक पहुंच जाती है, जिसके बारे में कोई संदेह नहीं है - वह आकाश है।" इस फिल्म ने घरेलू स्तर पर 10.9 करोड़ (यूएस $ 1.7 मिलियन) कमाई की।

वह अगले रोमांटिक कॉमेडी फिल्म इश्क वास्तविक (2013) में नेहा आहुजा के सामने दिखाई दिए उन्होंने नील के चरित्र को चित्रित किया, जो गिया नाम की लड़की के लिए पूरी भावना में आती है। कई समीक्षकों ने फिल्म पर हस्ताक्षर करने के कारण खंडेलवाल पर सवाल उठाया और इसे "बोरडोम" कहा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने प्रदर्शन का हवाला दिया: "राजीव खंडेलवाल अपनी उपस्थिति महसूस करते हैं, जबकि शेष औसत दर्जे का है।" फिल्म ने करोड़पति (53,000 अमेरिकी डॉलर) घरेलू स्तर पर खण्डेलवाल ने अगली फिल्म साहसिक में अभिनय किया, पीटर गया काम से, लेक्खा वाशिंगटन और प्रशांत नारायणन के साथ, फिल्म की रिलीज हो रही है, खंडेलवाल ने फिल्म में पीटर रॉड्रिग्ज का किरदार निभाया। राजश्री प्रोडक्शंस नाटक थ्रिलर सम्राट मैंडलस शर्मा के साथ सहभागिता मंडल शर्मा की अगली रिलीज थीं। उन्होंने एक जासूस सम्राट तिलकधरी की भूमिका निभाई जो एक अजीब मामला वाली महिला से संपर्क में आई। सीएनएन-आईबीएन ने इस फिल्म की आलोचना की: "राजीव खंडेलवाल, गिरीश कर्नाड, स्मिता जयक और इंद्रनील सेनगुप्ता इस फिल्म को करने के लिए सहमत हुए हैं जो एक रहस्य है जो हम हल नहीं कर पाए हैं। "इंडिया टुडे की फहीम रुहानी ने समीक्षा की:" इस फिल्म को देखने के बाद आप राजीव खंडेलवाल को याद करते हैं जिन्होंने शानदार बनाया आमिर (2008) सम्राट और उनकी कंपनी से ग्रस्त टीवी पर अधिक रोमांचक सीआईडी ​​देखने के लिए बेहतर। फिल्म ने घरेलू स्तर पर 1.29 करोड़ (यूएस $ 200,000) कमाई की।
2015-वर्तमान: टीवी पर वापसी और हालिया काम


2015 में, खांदेलाल इंडो-ऑस्ट्रेलिया की फिल्म सॉल्ट ब्रिज में उपस्थित हुए जहां उन्होंने बसंत की भूमिका निभाई, जो एक भारतीय प्रवासी है जो ऑस्ट्रेलिया में आती है और ऑस्ट्रेलियाई महिला से मिलती है यह फिल्म ऑस्कर के लिए एक प्रतियोगिता में थी और आलोचकों से प्रशंसा मिली है। फरवरी 2015 में, खंदेलवाल ने सात साल बाद श्रृती आर्य और गोल्डी बहल के मीडिया नाटक आधारित टेलिविज़न शो के साथ टीवी पर रिव्यू किया, पत्रकारों के विपरीत संवाददाता उन्होंने केकेएन के संपादक-इन-चीफ कबीर शर्मा की भूमिका निभाई थी, जो एक भयंकर पूर्व के साथ जूनियर रिपोर्टर अनन्या कश्यप के लिए जोरदार आती है। इस शो को अच्छी समीक्षा मिली और 1 9 अक्टूबर 2015 को समाप्त हो गया। खंडलेवाल जल्द ही राजीव जावेरी के बुखार और रेमो डिसूजा की डीओए डेथ ऑफ़ अमर सह-अभिनीत जरीन खान में दिखाई देंगे। उन्होंने वीरेन्द्र अरोड़ा की रोमांटिक फिल्म पर भी हस्ताक्षर किए हैं, अभी भी तो कभी नहीं।
अन्य काम


खंडेलवाल के मीडिया कैरियर में वृत्तचित्र बनाने, लिपियों को लिखना और उन निर्देशन के साथ शुरू हुआ। उनके एक वृत्तचित्र, समापन नामक एक काल्पनिक श्रृंखला दूरदर्शन पर प्रदर्शित किया गया था। इसकी कहानी भारत में पारा सैन्य बलों के आसपास घूमती है और यह भी एक पुरस्कार जीता है। खंडेलवाल ने भी कुछ वास्तविकता दिखाने की मेजबानी की है। 2006 में उन्होंने मंडीरा बेदी के साथ डील या नो डील के भारतीय संस्करण शो डील हां नो डील की मेजबानी की। उन्होंने 2007 और 2008 में सच्चाई के सामयिक साक्षात्कार कार्यक्रम के दो सत्रों की मेजबानी की। वे नेशनल जियोग्राफिक चैनल के सुपर कारों के ब्रांड एंबेसडर भी बन गए थे और उन्होंने इसे होस्ट किया था। 2016 में, खंडेलवाल ने एक वृत्तचित्र फिल्म द लेजेंड ऑफ़ जगन्नाथ की मेजबानी की, जो पीछे-पीछे के दृश्यों को रथयात्रा के भारतीय धार्मिक उत्सव को देखते हैं। 2016 में, उन्होंने अपनी फिल्म बुखार से गीत "तेरी याद" के प्रचार संस्करण के लिए गाया था

साभार: notedlife.com/hi/Rajeev-Khandelwal-biography-in-hindi

Thursday, March 8, 2018

JAIKI SHROFF - जैकी श्रॉफ

जैकी श्राफ


जैकी श्रॉफ (जयकिशन काकूभाई श्रॉफ) भारतीयों फिल्‍मों के अभिनेता हैं और लगभग भारत की 9 भाषाओं की फिल्‍मों में काम कर चुके हैं।

पृष्‍ठभूमि-
जैकी का जन्‍म एक गुजराती वैश्य परिवार में महाराष्‍ट्र के लातूर शहर के उदगीर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम काकूभाई श्रॉफ और मां का नाम रीता श्रॉफ है। उन्‍होंन कुछ विज्ञापनों में मॉडल के तौर पर भी काम किया है।

शादी-
जैकी ने लंबे समय से उनकी गर्लफ्रेंड रहीं आएशा दत्‍त से शादी की जो कि बाद में फिल्‍म निर्माता बन गईं। यह जोड़ा एक मीडिया कंपनी चलाता है जिसका नाम जैकी श्रॉफ एंटरटेनमेंट लिमिटेड है। उनके दो बच्‍चे हैं- एक लड़का जिसका नाम टाईगर श्रॉफ (हेमंत जय) है और एक लड़की जिसका नाम कृष्‍णा है।

करियर-
श्रॉफ ने अपने फिल्‍मी करियर की शुरूआत 1982 में आई फिल्‍म 'स्‍वामी दादा' से की थी। अगले साल सुभाष घई ने उन्‍हें अपनी फिल्‍म 'हीरो' में लीड रोल के तौर पर कास्‍ट किया जिसमें जैकी की हीरोईन मीनाक्षी शेषाद्रि थीं। यह फिल्‍म बड़ी हिट हुई और इसके बाद जैकी ने कई छोटी-बड़ी फिल्‍मों में काम किया जिसमें उन्‍होंने लगभग हर शैली की भूमिकाएं निभाईं।

प्रसिद्ध फिल्‍में- 

स्‍वामी दादा, हीरो, अंदर बाहर, युद्ध, तेरी मेहरबानियां, पाले खां, अल्‍लाह रख्‍खा, कर्मा, जवाब हम देंगे, काश, राम लखन, परिंदा, मैं तेरा दुश्‍मन, त्रिदेव, वर्दी, दूध का कर्ज, सौदागर, किंग अंकल, खलनायक, गर्दिश, त्रिमूर्ति, रंगीला, बंदिश, अग्निसाक्षी, बॉर्डर, बंधन, रिफयूजी, मिशन कश्‍मीर, फर्ज, यादें, लज्‍जा, देवदास, ऑन-मेन एट वर्क, हलचल, क्‍योंकि, भूत अंकल, भागमभाग, किसान, वीर, शूटआऊट एट वडाला, धूम 3, हैप्‍पी न्‍यू ईयर, डर्टी पॉलीटिक्‍स।

आने वाली फिल्‍में-
ब्रदर्स में वे अक्षय कुमार और सिद्धार्थ मल्‍होत्रा के साथ दिखाई देंगे।

जैकी श्रॉफ से जुड़ी कुछ और बातें-

- फिल्‍मों में आने से पहले जैकी ट्रक ड्राईवर हुआ करते थे।

- फिल्‍म इंडस्‍ट्री में उन्‍हें काम करते हुए लगभग चार दशक का वक्‍त हो चुका है।

- उन्‍हें करीब 175 से ऊपर फिल्‍मों में काम किया है जिसमें हिन्‍दी, तमिल, बंगाली, तेलगु, मलयालम, कन्‍नड़, मराठी, पंजाबी, ओडि़या फिल्‍में शामिल हैं।

- वो डायरेक्‍टर सुभाष घई ही थे जिन्‍होंने श्रॉफ को 'जैकी' नाम दिया था।

- जैकी और उनकी पत्‍नी की एक मीडिया कंपनी भी है जिसका नाम जैकी श्रॉफ एंटरटेनमेंट लिमिटेड है। सोनी टीवी में उनका 10परसेंट शेयर था लेकिन 2012 में उन्‍होंने अपने शेयर को बेंचने का निर्णय लिया और सोनी अीवी के साथ अपने 15 साल पुराने रिश्‍ते को खत्‍म कर लिया।

- 1990 के बाद वे लीड रोल से ज्‍यादा सह-अभिनेता के तौर पर मजबूत रोल में दिखने लगे।

- जैकी को फिल्‍म 'परिंदा' के लिए सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार मिला तो वहीं फिल्‍म 'खलनाय‍क' के लिए उन्‍हें फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार में सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता के तौर पर नामां‍कित किया गया। इसके अलावा भी कई बार उन्‍हें पुरस्‍कारों से नवाजा जा चुका है।

- 2007 में जैकी को भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए विशेष न्यायाधीश जूरी पुरस्कार से भी सम्‍मानित किया गया।

- उन्‍होंने स्‍टार वन पर प्रसारित हुए मैजिक शो 'इंडियाज मैजिक स्‍टार' में जज की भूमिका भी निभाई। यह शो 3 जुलाई 2010 से 5 सितम्‍बर 2010 तक चला।

साभार: hindi.filmibeat.com/celebs/jackie-shroff/biography.html

Wednesday, March 7, 2018

SHAILESH LODHA - शैलेश लोधा

शैलेश लोधा जीवन परिचय 

शैलेश लोढा एक भारतीय अभिनेता तथा कवि है इनका जन्म राजस्थान के जोधपुर जिले के मारवाड़ी वैश्य परिवार में हुआ हैं वर्तमान में तारक मेहता का उल्टा चश्मा में "तारक मेहता" किरदार निभा रहे हैं।


टेलिविज़न
2008 कॉमेडी सर्कस
2008-अब तक तारक मेहता का उल्टा चश्मा तारक मेहता
2012-2013 वाह! वाह! क्या बात हैi!
2014 अजब गजब घर जंवाई विशेष उपस्थिति


व्यक्तिगत जीवन

शैलेश एक प्रबंधन लेखक स्वाती लोढ़ा से विवाहित हैं और उनकी बेटी स्वारा लोढ़ा है। चूंकि उनके पिता को विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरित किया गया था, शैलेश ने बहुत कुछ किया उनकी मां पढ़ना पसंद करती थी और हिंदी में एक अच्छी शब्दावली थी 9 वर्ष की आयु में शैलेश को "बाल कावी" नाम से जाना जाता था। शैलेश के पास भी एक कार्यालय का काम था, लेकिन उन्होंने अपने जुनून का पालन करने के लिए इसे छोड़ दिया, मैं कविताएं लिख रहा हूं।

जबकि वाह के लिए लाइव प्रदर्शन! वाह! क्या बात है! अनुसूचित जनजाति पर एंड्रयूज कॉलेज, असित कुमार मोदी ने शैलेश से पहली बार मुलाकात की और उन्हें ताराक मेहता का उल्टा चश्मा में ताराक मेहता की भूमिका की पेशकश की।
व्यवसाय

वह पहली बार कॉमेडी सर्कस में प्रतियोगी के रूप में और बाद में कॉमेडी का महूकुला में दिखाई दिया। 28 जुलाई 2008 के बाद से, वह ताराक मेहता का उल्टा चश्मा में वास्तविक जीवन स्तंभकार ताराक मेहता के रूप में प्रदर्शित हुए हैं। वह साजिश का एक चरित्र होने के अलावा, एक कथानक भी है जो शो की घटनाओं के बारे में बताता है, साथ ही जीवन की चुनौतियों जैसे मुद्रास्फीति, प्रत्येक प्रकरण के अंत में एक व्यंग्यपूर्ण तरीके से भ्रष्टाचार। वह जोधपुर, राजस्थान से हैं। वे वाहा नामक एक टीवी कार्यक्रम में मुख्य प्रस्तोता थे! वाह! क्या बात है! 2012-13 के दौरान एसएबी टीवी पर प्रसारित

शैलेश ने विपणन में बीएससी और पीजी को पूरा किया है
लेखक

लोढ़ा ने चार पुस्तकें लिखी हैं: पहले दो व्यंग्यपूर्ण हास्य हैं, तीसरी पत्नी अपनी पत्नी के साथ सह-लिखित एक स्वयं सहायता पुस्तक है, और उनकी सबसे हाल की किताब, दिलजले का फेसबुक स्टेटस, कविताओं का संग्रह है एक jilted प्रेमी के
कविता या साहित्य में योगदान के लिए पुरस्कार
राष्ट्रीय श्रीजन पुरस्कार
इंटरनेशनल वैश फेडरेशन द्वारा सम्मानित किया गया।
भारत गौरव
राजस्थान गौरव
टीवी पुरस्कार
2014 - ज़ी गोल्ड अवार्ड्स (सर्वश्रेष्ठ एंकर)

साभार: notedlife.com/hi/Shailesh-Lodha-biography-in-hindi

Tuesday, March 6, 2018

Sanjay Leela Bhansali



संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) एक फिल्म निर्देशक , निर्माता और संगीत निर्देशक है | इंडियन सिनेमा में कई फिल्मो में जादू बिखेरा है जिसके कारण उन्होंने अब तक दस फिल्मफेयर अवार्ड और चार राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड मिल चुके है | 2015 में उन्हें भारत के चौथे सबसे बड़े अवार्ड पद्मश्रीसे सम्मानित किया गया | संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) का जन्म 24 फरवरी 1963 को मुम्बई की एक गुजराती वैश्य परिवार में हुआ था | उन्हें पिता नवीन भंसाली भी एक फिल्म निर्देशक थे | माता का नाम लीला भंसाली था | भंसाली के पिता को शराब की लत थी जिसकी वजह से उनकी मौत हो गयी | भंसाली के एक बहन बेला सहगल है | भंसाली अविवाहित है |

भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) ने अपने करियर की शुरुवात विधु विनोद चोपड़ा के साथ बतौर सहायक शुरू की थी जब वो परिंदा , 1942 लव स्टोरी और करीब फिल्म बना रहे थे | हालांकि उनका साथ उस समय टूट गया जब भंसाली ने करीब फिल्म का निर्देशन करने से मना कर दिया | 1996 में “खामोशी-द म्यूजिकल” फिल्म से निर्देशन की शुरुवात की | हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नही रही लेकिन इस फिल्म को सराहना काफी मिली | इसके बाद “हम दिल दे चुके सनम” फिल्म ने उनको रातो-रात के जाना माना निर्देशक बना दिया जो बॉक्स ऑफिस पर भी काफी हिट रही | इस फिल्म में चार नेशनल अवार्ड और नौ फिल्मफेयर अवार्ड जीते थे |

2002 में शाहरुख ,ऐश्वर्या और माधुरी को लेकर उन्होंने शरतचंद के उपन्यास पर आधारित फिल्म देवदास बनाई | जो बॉक्स ऑफिस पर इतनी सफल रही कि इसे फिल्मफेयर में सबसे ज्यादा अवार्ड पाने का खिताब प्राप्त है जो DDLJ के बराबर भी है | इसके बाद 2005 में भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) ने अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी को लेकर Black फिल्म बनाई जिसके लिए उनको जीवन का दूसरा नेशनल अवार्ड मिला | 2007 में उन्होंने रणवीर कपूर को लेकर साँवरिया फिल्म बनाई . जो बॉक्स ऑफिस पर तो फ्लॉप रही लेकिन रणवीर कपूर का करियर सँवार दिया | 2010 में ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या को लेकर गुजारिश फिल्म बनाई और इसी फिल्म से उन्होंने म्यूजिक डायरेक्शन में भी कदम रखा | ये फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर नही चली लेकिन फिल्म को सराहना काफी मिली |

2012 में अक्षय कुमार की फिल्म राउडी राठोड के निर्माता बने जिसका निर्देशन प्रभु देवा ने किया था | इसी साल वो एक फ्लॉप फिल्म शिरीं फरहाद की निकल पड़ी के निर्माता बने | 2013 में रोमियो और जूलियट पर आधारित “गोलियों की रासलीला -रामलीला” फिल्म का निर्देशन किया | ये उनकी पहली फिल्म थी जिसका कुछ धार्मिक दलों ने विरोध किया था जिसके बाद तो उनकी हर फिल्म धार्मिक मुद्दे पर उलझी है | पहले इस फिल्म का टाइटल केवल रामलीला था जिसे विवाद के चलते “गोलिया की रासलीला -रामलीला” करना पड़ा | रणवीर सिंह के साथ उनकी यह पहली फिल्म थी | ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और रणवीर सिंह स्टार बन गये | इसी साल भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) ने टीवी पर “सरस्वतीचंद्र” शो के जरिये डेब्यू किया था जो कुछ एपिसोड के बाद उन्होंने छोड़ दिया था |

2013 में मैरीकॉम फिल्म के प्रोडूसर बने जिसके लिए उन्हें एक ओर नेशनल अवार्ड मिला था | 2015 में गब्बर इस बेक के निर्माता बने | 2015 में उनका ड्रीम प्रोजेक्ट “बाजीराव मस्तानी” फिल्म आइये | इस फिल्म का विचार उनके दिमाग में 2003 से था लेकिन अनंत: रणवीर सिंह को इस महान किरदार को निभाने का मौका मिला | मस्तानी का किरदार दीपिका पादुकोण ने जबकि काशी बाई का किरदार प्रियंका चोपड़ा ने निभाया था | इस फिल्म का भी बाजीराव और मस्ताने के वंशजो में विरोध किया था लेकिन कोई नतीजा नही निकला | विवाद के बावजूद ये फिल्म भारतीय इतिहास की सबसे ज्यादा कमाने वाली फिल्मो में से एक बनी | इस फिल्म को सात फिल्मफेयर अवार्ड और भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) को बेस्ट डायरेक्टर का नेशनल अवार्ड मिला |
साभार: biographyhindi.com/algo.html
















Saturday, February 24, 2018

हरिश्चंद्र वंशीय समाज - RASTOGI-RUSTAGI-ROHTAGI



साभार: वैश्य भारती 

मयंक अग्रवाल के बल्ले से बरसी ‘आग’, इतने रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी बने

मयंक अग्रवाल के बल्ले से बरसी ‘आग’, इतने रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी बने

मयंक अग्रवाल विजय हजारे ट्रॉफी के 7 मैचों में 102 की औसत से 633 रन बना चुके हैं। इससे पहले रणजी ट्रॉफी में 8 मैचों में मयंक अग्रवाल ने 1160 रन बनाए थे।


कर्नाटक के बल्लेबाज मयंक अग्रवाल के बल्ला आग उगल रहा है। दाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने एक बार फिर से अपने बल्ले से घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन किया है। मयंक अग्रवाल की धमाकेदार बल्लेबाजी की बदौलत कर्नाटक की टीम ने सेमीफाइनल में महाराष्ट्र की टीम को हराकर विजय हजारे ट्रॉफी टूर्नामेंट के फाइनल में जगह पक्की कर ली है। मयंक अग्रवाल के साथ करुण नायर की साझेदारी के चलते कर्नाटक ने महाराष्ट्र को 9 विकेट से हराकर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली। इसके साथ ही मयंक अग्रवाल ने विजय हजारे ट्रॉफी टूर्नामेंट में एक नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। वह इस ट्रॉफी में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी बन गए हैं। उन्होंने इस रेस में टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी पीछे छोड़ दिया है। सिर्फ कोहली ही नहीं मयंक ने दिनेश कार्तिक, रॉबिन उथप्पा जैसे खिलाड़ियों को भी पछाड़ा है।

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मयंक इस पूरे सत्र में शानदार फार्म में रहे हैं। उन्होंने खूबसूरत कवर और ऑन ड्राइव से शानदार पारी खेली जिससे वह 633 रन बनाकर राष्ट्रीय एकदिवसीय चैम्पियनशिप के एक सत्र में सबसे ज्यादा रन जुटाने वाले खिलाड़ी भी बन गए।

मयंक अग्रवाल विजय हजारे ट्रॉफी के 7 मैचों में 102 की औसत से 633 रन बना चुके हैं। इससे पहले रणजी ट्रॉफी में 8 मैचों में मयंक अग्रवाल ने 1160 रन बनाए थे। इसमें उन्होंने एक तिहरा शतक भी जड़ा था। वहीं मुश्ताक अली ट्रॉफी में भी उन्होंने 9 मैचों में 258 रन बनाए थे।


Sunday, February 11, 2018

नरेश अग्रवाल का गलत व्यवहार



यह वैश्य समाज का दुर्भागय हैं, जो नरेश अगरवाल जैसे नेता हैं, जो की वैश्य समाज को एक करना तो दूर बांटने का काम कर रहे हैं, साहू, तेली, घांची समाज वैश्य समाज का प्रमुख अंग हैं, हमें गर्व हैं की नरेन्द्र मोदी जी वैश्य समाज से आते हैं...

Friday, February 9, 2018

मराठा साव तेली समाज के सरनेम ( कुलनाम )

मराठा साव तेली समाज मे आने वाले कुछ कुलनाम, कुळनाम, सरनेम ( आडनाव) की जानकारी.

१) सातपुते २) किरमे ३) घोगडे ४) बारसागढे ५) भुरसे ६) बोदलकर ७) चापळे ८) भांडेकर ९) कुकडकर १०) कुनघाडकर ११) सोनटके १२) देवरमले १३) दुधबडे १४) दुधबावरे १५) सोमनकर १६) लटारे १७) जुआरे १८) चलाख १९) बुरांडे २०) वासेकर २१) टिकले २२) वैरागडे २३) चिलांगे २४) खोबे २५) कोहळे २६) कोठारे २७) सहारे २८) नरताम २९) शेटे ३०) धोडरे ३१) वासकर 3२) येलोरे ३३) पिपरे ३४) चिचघरे ३५) सोनवाने ३६) काटवे ३७) उरकुडे ३८) येलोरे ३९) पिपंले ४०) भुरे ४१) झाडे ४२) गोहने ४३) मोगककर ४४) गडेकर ४५) गडकरी ४६) सुरजागढे ४७) गव्हारे ४८) नैताम ४९) बोबाटे ५०) भुरले ५१) देवतळे ५२) उडान ५३) खोडवे ५४) खोडतकर ५५) बोटरे ५६) डहाके ५७) गाजरे ५८) डोबरे ५९) हडदे ६०) भोवरे ६१) मिसाळ ६२) बाराहाते ६३) कुकडे ६४) चापेकर ६५) चिखलखुदे ६६) लिडबे

साभार: teliindia.com


ORIGIN OF TELI VAISHYA CASTE - तेली साहू जाति की उत्पत्ति संबंधित प्रचलित कथाएं

तेली साहू जाति की उत्पत्ति संबंधित प्रचलित कथाएं

अंग्रेज इतिहासकार श्री आर. व्ही. रसेल एवं राय बहाद्दुर हीरालाल ने वृहद ग्रंथ में तेली जाति का वर्णन किया है । इसमें उत्पति संबंधित चार कथाएं दी गई है :- 

1) एक बार भगवान शिव महल (कैलाश पर्वत) से बाहर गये थे । महल की सुरक्षा की सुरक्षा के लिए कोई द्वारपाल नही थे, जिसके कारण माता पार्वती चिंतित हुई और आपने शरीर के पसीने की मैल से गणेश जी को जन्म देकर महल के दक्षिण द्वार पर तैनात किया । भगवान शिव, जब महल लौटे तब गणेश जी ने उन्हें नही पहचाना और महल में प्रवेश से रोक दिया, जिससे क्रोधित होकर,. भगवान शिव ने गणेश जी का सिर तलवार से काटकर मस्तक को भस्म कर दिया । जब रक्तरंजीत तलवार को माता पार्वती देखी ओर अपने पुत्र की हत्या की बात सुनी, तब वे दुखी हुई । माता पार्वती ने भगवान शिव से अपने पुत्र को जीवित करने का अग्रह किंया किन्तु भगवान शिव ने मस्तक के भस्म हो जाने से जीवित कर पाने में असमर्थता बताई किन्तु अन्य उपाय बताया कि यदि कोई पशु दक्षिण दिशा मे मुंह किया मिला जाये तो गणेश जी को जीवित किया जा सकता है । उसी समय महल के बाहर एक व्यापारी अपने हाथी सहित विश्राम कर रहा था और हाथी का मुंह क्षिण दिशा में थे । भगवान शिव ने तत्काल हाथी का सिर काट गणेश जी के धड से जोडकर जीवित कर दिये । हाथी के मर जाने से व्यपारी दुखी हुआ तब भगवान शिव ने मुसल एंव ओखली से एक यंत्र बनाया (कोल्हू) और उससे तेल पेरने की विधि बताई । व्यपारी उस यंत्र से तेल पेरने लगा, वही प्रथम तेली कहलाया ।

2) अंग्रेज इतिहासकार, श्री क्रूक ने मिर्जापर में प्रचलित कहानी को उल्लेखित किया है कि एक किसान के परास 52 महुआ के वृक्ष और 03 पुत्र थे । किसन ने अपने तीनों पुत्रों से इस संपत्ति का बंटवारा कर लेने कहा, तीनों पुत्र आपस बातचीत कर वृक्षों का बंटवारा न कर उत्पाद का बंटवारा कर लिया । जिसे पत्ती मिला वह पत्तिसों से भट्टी जला कर अन्न भुनने का काम किया और भडभुजा कहलाया । जिसे फुल मिला वह फूलों से रस निकालकर शराब बनाया, और कलार कहलाया । जिसे फल मिला वह फल से तेल निकाला और तेली कहलाया ।

3) मंडला के तेली व्यपारियों ने लेखक को बताया कि वे राठोर राजपूतों के वंशज है, जिन्हे मुसलमान शासकों ने पराजित कर, तलवार छिनकर निर्वासित कर दिया था ।

4) निमाड के तेली व्यपारियों ने लेखक को बताया कि वे गुजरात के मोड बनिया के वशंज है, जिन्हे मुसलमान शासको ने तेल पेरने का कार्य दिया था । 

साभार: teliindia.com