Sunday, May 20, 2018

उत्तर गुप्त राजवंश

उत्तर गुप्त राजवंश

सुप्रसिद्ध गुप्त राजवंश का अवसान 550-51 ईस्वी में हुआ और इसके साथ ही उत्तर भारतीय राजनीति में रिक्तता के साथ-साथ अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण भी उत्पन्न हुआ। गुप्त सम्राटों के अधीन उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले अनेक स्थानीय राजवंश इस रिक्तता को भरने के लिए अपनी शक्ति के संवर्धन में लग गये। परिणामतः उनमें प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुयी, जिसने पारस्परिक संघर्षों को जन्म दिया। कतिपय सामन्त राजवंश मगध और उसके पार्श्ववर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्यवादी शक्ति बनने का स्वप्न देखने लगे इनमें उत्तर गुप्त, मौखरि एवं थानेश्वर के पुष्यभूति राजवंश का नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सभी राजवंशों के सन्दर्भ में प्रचुर सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं तथापि आभिलेखिक एवं साहित्यिक स्रोतों से उत्तर गुप्त, मौखरी एवं पुष्यभूति राजवंश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएं उपलब्ध हैं। अतएव इतिहासकारों ने इन राजवंशों का इतिहास उपलब्ध साक्ष्यों के समवेत विवेचन के आधार पर प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। गुप्तोत्तरकालीन इतिहास का विवरण प्रस्तुत करते हुए इस आलेख में भी क्रमशः उत्तरगुप्त राजवंश का इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं।

उत्तर गुप्त राजवंश के इतिहास को प्रकाशित करने वाले अभिलेखों में आदित्यसेन का अफसढ़ अभिलेख तथा जीवित गुप्त द्वितीय का देववर्णाक अभिलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त आदित्यसेन के समय के दो अभिलेख शाहपुर और मन्दार नामक स्थानों तथा विष्णुगुप्त के काल का एक अभिलेख मंगराव नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से ये विशेष सूचना प्रदायी नहीं हैं। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ये सभी लेख बिहार प्रान्त से प्राप्त हुए हैं। उदाहणार्थ अफसढ़ अभिलेख गया जिले में स्थित अफसढ़ नामक स्थान में मिला है, जो इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त से लेकर आदिसेन तक के काल के ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करता है। इससे हमें आदित्यसेन तक उत्तरगुप्त राजवंशावली का ज्ञान तो होता ही है साथ ही इससे उत्तरगुप्त मौखरी सम्बन्धों पर भी रोचक प्रकाश पड़ता है। देववर्णाक अभिलेख बिहार प्रान्त के शाहाबाद (आरा) जिले के देववर्णाक नामक स्थान से मिला है।

इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय कनिंघम महोदय को है। उन्होंने 1880 ईस्वी में इसे प्राप्त किया था। इस अभिलेख से उत्तरगुप्त राजवंश के अंतिम तीन शासकों देव गुप्त, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के काल के इतिहास के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं। इस प्रकार अफसढ़ एवं देववर्णाक से प्राप्त अभिलेख एक साथ दृष्टि में रखने पर हमें इस वंश के ग्यारह शासकों का अविच्छिन्न इतिहास ज्ञात हो जाता है। चूँकि कृष्ण गुप्त इस वंश का प्रथम शासक तथा जीवित गुप्त द्वितीय इस वंश का अन्तिम शासक था। अतः सम्प्रति इस राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास न्यूनाधिक रूप से ज्ञात है, तथापि इस वंश के इतिहास के सम्बन्ध में अभी भी अनेक ऐसी सूचनाएँ हैं जो विवादस्पद बनी हुई हैं। जिनके सम्बन्ध में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णायक मत व्यक्त करना दुष्कर है।

उत्पत्ति एवं आदि राज्य

उत्तर गुप्त राजवंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त को अफसढ़ अभिलेख में ‘सदवंश’ में उत्पन्न बताया गया है। इससे केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह किसी उच्चकुल से सम्बद्ध था। इससे अधिक उत्तर गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में हमें कोई सूचना नहीं मिलती। इस वंश के अधिकांश शासकों के नाम के साथ ‘गुप्त’ शब्द जुड़ा हुआ है। अतः कतिपय विद्वानों के द्वारा यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि ये चक्रवर्ती गुप्त राजवंश से सम्बन्धित रहे होंगे। किंतु यह सम्भावना निर्मूल प्रतीत होती है। क्योंकि यदि ये चक्रवर्ती गुप्तों से सम्बद्ध होते तो इनके लेखों में निश्चय ही गर्व पूर्वक इस बात का उल्लेख किया गया होता। तो भी उल्लेखनीय है कि इस वंश के सभी राजाओं के नाम के अन्त में गुप्त शब्द नहीं मिलता।

ध्यातव्य है कि इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक का नाम आदित्यसेन मिलता है। सम्भवतः उत्तर गुप्त राजवंश, सम्राट गुप्तों के आधीन शासन करने वाला एक सामन्त राजवंश था। क्योंकि इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त को केवल नृप उपाधि प्रदान की गई है तथा इसके उत्तराधिकारी हर्ष गुप्त के नाम के साथ केवल आदर सूचक ‘श्री’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि चक्रवर्ती गुप्तों से पृथक करने के लिए ही इतिहासकारों ने इस वंश को परवर्ती गुप्त वंश अथवा उत्तर गुप्त वंश कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इस नामकरण पर आपत्ति भी की है। सुधाकर चट्टोपाध्याय का सुझाव था कि इस वंश का नामकरण उनके संस्थापक कृष्ण गुप्त के नाम पर करना चाहिए तथा इसे ‘कृष्ण गुप्तवंश’कहा जाना चाहिए।

गुप्त राजवंश अथवा उत्तर गुप्त राजवंश अब इतिहासकारों के बीच अधिकांशतः स्वीकृत और बहुमान्य हो चुका है। उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र कौन सा था ? यह विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है। इस राजवंश के पश्चात्वर्ती शासकों आदित्यसेन, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के अभिलेख मगध क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह इंगित है कि इन तीन शासकों का शासन मगध क्षेत्र पर व्याप्त था। अतः फ्लीट आदि विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस राज्यवंश का मूल क्षेत्र भी मगध ही रहा होगा।1 इसके विपरीत डी. सी. गांगुली, आर. के. मुकर्जी, सी. बी. वैद्य, हार्नले एवं रायचौधरी आदि अनेक विद्वानों का यह विचार है कि इस वंश के लोग मूलतः मलवा के निवासी थे जो हर्षोत्तर काल में मगध के शासक बने।2 मालवा को उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानने वाले विद्वान का मुख्य तर्क यह है कि हर्षचरित में माधव गुप्त का उल्लेख मालवराज पुत्र के रूप में हुआ है। जबकि अफसढ़ अभिलेख में माधव गुप्त को महासेन गुप्त का पुत्र कहा गया है। दोनों को ही स्रोतों में माधव गुप्त को हर्ष का मित्र कहा गया है।

हर्षचरित के अनुसार वह हर्ष का बाल सखा था जबकि अफसढ़ अभिलेख के अनुसार वह हर्ष देव के निरन्तर साहचर्य का आकांक्षी था। इन दोनों स्रोतों को साथ-साथ देखने से हर्षचरित के मालवराज और आदित्यसेन के पितामह महासेन गुप्त की एकरूपता प्रमाणित होती है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि जीवित गुप्त द्वितीय के देववर्णाक अभिलेख के अनुसार मगध पर पहले मौखरी सर्ववर्मा और अवन्तिवर्मा का अधिकार था, जो उत्तर गुप्त वंश के शासक दामोदर गुप्त और महासेन गुप्त के समकालीन थे। इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि मगध का क्षेत्र सर्ववर्मा के पिता ईशानवर्मा के भी आधीन रहा हो, जो उत्तर गुप्त वंशी शासक कुमार गुप्त का समकालीन था। क्योंकि ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख में ईशानवर्मा को आन्ध्रों, शूलिकों तथा गौड़ों का विजेता कहा गया है और गौड़ की विजय मगध क्षेत्र पर अधिकार के बिना सम्भव नहीं प्रतीत होती। इन सभी तथ्यों को दृष्टि में रखने पर पूर्वी मालवा के क्षेत्र को ही उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानना युक्ति संगत लगता है।

कृष्ण गुप्त 

असफढ़ अभिलेख के अनुसार उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक कृष्ण गुप्त था। अभिलेख के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासनकाल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता तथापि इस दिशा में हमें ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है। ईशानवर्मा उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासनकाल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमार गुप्त के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासनकाल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

अफसढ़ अभिलेख में कृष्ण गुप्त को ‘नृप’ उपाधि से विभूषित किया गया है।1 इस समय गुप्त साम्राट बुध गुप्त शासन कर रहा था जिसका राजनैतिक प्रभाव मालवा क्षेत्र तक निश्चित रूप से व्याप्त था। बुध गुप्त के शासनकाल में ही हूण नरेश तोरमाण का पश्चिमी भारत पर आक्रमण हुआ। तोरमाण के शासन का प्रथम वर्ष का अभिलेख एरण से प्राप्त हुआ है। इससे यह विदित होता है कि 490 ईस्वी और 510 ईस्वी के बीच किसी समय तोरमाण का अधिकार मालवा क्षेत्र पर स्थापित हुआ। उसने बुध गुप्त के एरण क्षेत्र पर शासन करने वाले सामन्त मातृविष्णु के अनुज धान्यविष्णु को अपनी ओर से इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया। किंतु मालवा क्षेत्र में हूणों की यह सत्ता निर्विध्न नहीं रही। क्योंकि एरण से ही प्राप्त 510 ईस्वी के भानु गुप्त के अभिलेख से ज्ञात होता है कि भानु गुप्त ने, जो एक महान योद्धा था एरण में एक भीषण युद्ध किया, जिसमें उसका मित्र गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ था और उसकी पत्नी अपने पति के शव के साथ सती हो गई थी।

समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भानु गुप्त और गोपराज ने यह युद्ध हूण नरेश तोरमाण के विरूद्ध ही किया होगा। स्पष्टतः मालवा क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में तेजी के साथ परिवर्तन हो रहा था जिससे मध्य भारत के परिव्राजक, उच्चकुल तथा एरण क्षेत्र के धान्यविष्णु जैसे सामन्त कुलों की गुप्त सम्राटों के प्रति स्वामिभक्ति शिथिल और संदिग्ध होती जा रही थी। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए कृष्ण गुप्त ने पूर्वी मालवा में अपना छोटा सा राज्य स्थापित किया। यद्यपि अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि उसकी सेना में सहस्रों की संख्या में हाथी थे तथा वह असंख्य युद्धों का विजेता था एवं विद्वानों से सदैव वह घिरा रहता था, किन्तु इसे औपचारिक प्रशंसा मात्र ही समझना चाहिए।

हर्ष गुप्त

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था। इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था। अफसढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त किया था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरूद्ध संघर्षरत था।

अफसढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थित एक सामान्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोधर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसकी बहन हर्ष गुप्ता का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

जीवित गुप्त प्रथम 

हर्ष गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जीवित गुप्त प्रथम था। इसने लगभग 520 ईस्वी से 540 ईस्वी तक शासन किया। अफसढ़ अभिलेख से उपलब्ध सूचनओं से यह संकेत मिलता है कि यह अपने पिता एवं पितामाह की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। इसे अभिलेख में ‘क्षितीशचूड़ामणि’1 उपाधि से विभूषित किया गया है। अफसढ़ अभिलेख में इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि ‘वह समुद्रतटवर्ती हरित प्रदेश तथा हिमालय के पार्शववर्ती शीत प्रदेश के शत्रुओं के लिए दाहक ज्वर के सदृश था।’1 ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त-साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण एवं मालवा शासक यशोवर्धन के दिग्विजय के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक अव्यवस्था की भयावह स्थिति उतपन्न हो चुकी थी।

गुप्त सम्राटों का प्रताप-सूर्य अस्त हो रहा था और हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित उत्तरी बंगाल के क्षेत्रों से गुप्त सत्ता का प्रभाव समाप्त हो चला था। असम्भव नहीं है कि जीवित गुप्त प्रथम ने समकालीन गुप्त सम्राट, जो सम्भवतः कुमार गुप्त तृतीय था, के सामन्त के रूप में पूर्वी भारत में विद्रोहों का दमन करने के लिए यह अभियान किया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभियान में समकालीन मौखरी नरेश ईश्वर वर्मा ने भी उसका सहयोग किया। क्योंकि जौनपुर शिलालेख में यह कहा गया है कि ईश्वर वर्मा ने उत्तर की दिशा में हिमालय तक के क्षेत्रों (प्रालेयाद्रि) पर विजय प्राप्त की थी। इन विजयों के परिणाम स्वरूप जीवित गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्तों के राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि हुई। इसलिए अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि ‘उसका पराक्रम पवन पुत्र हनुमान द्वारा समुद्र लंघन के समान अमानुषिक था।

कुमार गुप्तः

जीवित गुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुमार गुप्त हुआ। इसका शासनकाल लगभग 540 ईस्वी से से 560 ईस्वी तक माना गया है। इसके शासन के प्रायः मध्यकाल में (550-51ईस्वी) गुप्त सम्राट विष्णु गुप्त की मृत्यु हुई एवं गुप्त राजवंश का पूर्णतः अंत हो गया। गुप्त राजवंश के पतन का लाभ उठाने की दिशा में उत्तर गुप्त और मौखरी दोनों ही राजवंश सक्रिय हो उठे। परिणामतः इन दोनों राजकुलों का पारस्परिक मैत्री सम्बन्ध समाप्त हो गया। अफसढ़ अभिलेख से दोनों कुलों के बीच शत्रुता एवं संघर्ष की स्पष्ट सूचना मिलती है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त एवं उसके समकालीन मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कदाचित इस संघर्ष का उद्देश्य मगध के क्षेत्र पर, जो साम्राज्य सत्ता का प्रतीक था, अधिकार स्थापित करना था।

उत्तर गुप्त नरेश कुमार गुप्त एवं मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच संघर्ष की सूचना देने वाला एकमात्र स्रोत अफसढ़ अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त ने ‘राजाओं में चन्द्रमा के समान शक्तिशाली ईशानवर्मा के सेना रूपी क्षीरसागर का, जो लक्ष्मी की सम्प्राप्ति का साधन था, मन्दराचल पर्वत की भाँति मंथन किया। इस श्लोक में निहित अर्थ को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। रायचौधरी का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त की विजय हुई तथा ईशानवर्मा पराजित हुआ। क्योंकि मौखरियों द्वारा इस युद्ध में विजय का कोई दावा नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि ईशानवर्मा के 554 ईस्वी के हड़हा अभिलेख में इस युद्ध का कोई वर्णन नहीं है। अतः इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह युद्ध 554 ईस्वी के बाद किसी समय हुआ होगा। अफसढ़ अभिलेख के आगे के श्लोक में यह कहा गया है कि इस युद्ध के बाद कुमार गुप्त ने प्रयाग में अग्निप्रवेश कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।1 निहाररंजन राय और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त पराजित हुआ था और उसने पराजय जनित ग्लानि के कारण प्रयाग में आत्महत्या की थी।

साभार: vimitihas.wordpress.com/tag/उत्तर-गुप्त-राजवंशसंपादक- मिथिलेश वामनकर


झारखण्ड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक

रजरप्पा: झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक, 27% आरछण की मांग को लेकर आंदोलन तेज करने का निर्णय

आज 20 मई को रजरप्पा मंदिर मिलन चौक स्थित संस्कार होटल सभागार में झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की एक विस्तारित बैठक हुई। इस बैठक में पूरे प्रदेश से वैश्य मोर्चा के पदाधिकारी और सदस्य शामिल होने आए। इस बैठक की अध्यछता केंद्रीय अध्यछ श्री महेश्वर साहु एवं संचालन उप-प्रधान महासचिव श्री राजीव राज एवं केंद्रीय महासचिव श्री बिरेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से किया। इस बैठक में मुख्यातिथि के बतौर मोर्चा के मुख्य संरछक शान-ए-वैश्य श्री गोपाल प्रसाद साहु उपस्थित थे। यह बैठक मोर्चा के मुख्य मुद्दों, यथा- पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन करने, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को भी तत्काल राष्ट्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने, शून्य जिलों में भी एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने, सांगठनिक सुदृढ़ीकरण व विस्तार, सिल्ली एवं गोमिया उपचुनाव, आगे की रणनीति व कार्यक्रम आदि मुद्दों रखी गई थी।

सर्वप्रथम रामगढ़ जिलाध्यछ रामदेव प्रसाद द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। तत्पश्चात केंद्रीय अध्यछ महेश्वर साहु द्वारा विषय प्रवेश कराया गया। तब केंद्रीय समिति की बैठक में उपरोक्त मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई और कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गए। तत्पश्चात बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि -

◆पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, बिजली विभाग की मनमानी और व्यवसायियों की परेशानी आदि मुद्दों को लेकर पूरे प्रदेश में जोरदार आंदोलन चलाया जायेगा। जिसके तहत आगामी 12 जून को हजारीबाग में तथा 18 जून को मेदिनीनगर में प्रमंडलीय स्तर पर प्रदर्शन व महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा और मुख्यमंत्री के नाम आयुक्त को स्मार-पत्र सौंपा जायेगा। जबकि 1 जुलाई से 3 जुलाई तक राजभवन (रांची) के समछ तीन दिवसीय महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। इसके बाद भी सरकार मोर्चा की मांगों पर पहल नहीं करती है तो क्रांति दिवस के अवसर पर 9 अगस्त को राज्य के सभी जिलों में वैश्य क्रांति सम्मेलन का आयोजन कर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई की घोषणा की जायेगी।

◆ बैठक में प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि वैश्य समाज अब राजनीति में भागीदारी और दावेदारी के लिए पूरे प्रदेश में जागरूकता अभियान चलायेगी और बुद्धिजीवियों तथा पढ़े-लिखे नवजावनों से भी राजनीति के छेत्र में उतरने का आह्वान करेगी, ताकि आने वाली पीढ़ी को उनका वाजिब हक-अधिकार दिलाया जा सके।

◆ बैठक में तय किया गया कि गोमिया एवं सिल्ली में उसी दल/उम्मीदवार को समर्थन किया जायेगा जो वैश्य मोर्चा के मुद्दों,यथा-पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को पुनः राष्ट्रीय ओ बी सी सूची में शामिल करवाने, शून्य जिलों में एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने आदि को स्वीकार करेगा। बिना बातचीत किये जबरन एवं बेवजह हम किसी दल को समर्थन नहीं करेंगें।

◆ संगठन विस्तार के तहत कई लोगों को केंद्रीय समिति में बतौर सदस्य शामिल किया गया, जैसे- सुरेश प्रसाद (गिरिडीह), डॉ आर. एन. प्रसाद (भुरकुंडा), सुमंत साह (केरेडारी)। इनकी कार्यछमता और संगठन के प्रति समर्पण को देख कर पदाधिकारी बनाया जायेगा।

इस अवसर पर बैठक को संबोधित करते हुए मोर्चा के मुख्य संरछक व मुख्य अतिथि गोपाल प्रसाद साहु ने कहा कि संगठन में बड़ी ताकत होती है। जब से वैश्य मोर्चा का गठन किया गया है, मोर्चा ने कई उपलब्धियां हाशिल की है और वैश्य समाज को लाभ दिलाया है। अगर वैश्य समाज के लोग इसी तरह संगठित होकर रहें और अपने मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहें तो आगे भी इसका लाभ मिलेगा। मुख्य अतिथि श्री साहु ने कहा कि झारखंड में पिछड़ों का आरछण कम कर देना, उनके अधिकारों को छीनना है। इससे लाखों छात्रों एवं बेरोजगारों को नुकशान हो रहा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल पिछड़ों को 27% आरछण की व्यवस्था कर दे, अन्यथा सड़क पर उतर कर आंदोलन का ही एकमात्र रास्ता बचता है। हमें आंदोलन के लिए सरकार मजबूर न करे। श्री साहु ने कहा कि मैं हमेशा समाज के साथ हूँ और आगे भी रहूँगा।

इस बैठक को मोर्चा के कार्यकारी अध्यछ पंचानन साहु (बुंडू), केंद्रीय उपाध्यछ श्रीमती रेखा मंडल (धनबाद), सुरेश प्रसाद आदि नेताओं ने भी संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन गुलाब प्रसाद साहु ने किया।



Friday, May 18, 2018

जब सब कहते हैं अच्छे बनिये, फिर इनकी भागीदारी के अनुसार हर क्षेत्र में हिस्सेदारी क्यों नही

आदिकाल से लेकर मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के हर क्षेत्र में वैश्य समाज यानी बनिये का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं महाराणा प्रताप के समय में यह बात उस समय सिद्ध हो गई जब राणा जी पर परेशानी पड़ी और सेना एकत्रित करने के लिये पैसा चाहिये था तो भामाशाह ने अशरफियों का ढेर उनके सामने लगा दिया। इसी प्रकार अन्य शासकों के शासनकाल में भी वैश्य समाज के योगदान को बादशाओं व राजाओं ने खूब सराहा और फिर उन्हे बड़ी बड़ी पदवियां भी दी।

समाज सुधार और समाजवाद की व्यवस्था बनाने के क्षेत्र में महाराजा अग्रसेन जी का बड़ा योगदान रहा। साफ सफाई के लिये उनके समय में कई व्यवस्थाएं की गई बताई जाती हैं। तो समाज में सबको बराबर का दर्जा भी प्राप्त हो और हर व्यक्ति के पास घर और रोटी तथा व्यापार उपलब्ध हो इसके लिये उन्होंने अपने समय में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को एक रूपया एक ईंट देने का प्रचलन शुरू किया जिससे ईंटो से घर बनाया जा सकें और रूपयों से व्यवसाय हो सके और इसके लिये समाज का हर संपन्न व्यक्ति जिसके पास जितना होता था वो सबको एक एक ईंट देता था लेकिन अगर कम भी है तो एक रूपया एक ईंट सब दे देते थे।
राष्टपिता महात्मा गांधी के समाज में योगदान और आजादी में उनके कार्याें एक कुर्बानियों को कोई भी भुला नहीं सकता। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि वैश्य समाज बनियों का मानव जाति के उत्थान में बहुत बडा योगदान रहा है।

वर्तमान समय में तो अब जो भी कोई व्यवसाय कर रहा है चाहे वो किसी जाति से संबंध क्यों न हों वो व्यवसाय होने की वजह से हर व्यक्ति के लिये व्यापारी वैश्य की श्रेणी मे आता है। और जो नहीं जानता उसे बनिया कहकर ही पुकारता है।

आप गाडी या बस में यात्रा करते है तो वहां श्लोगन लिखा मिलता है अच्छे यात्री बनिए की बात पढाई की चली तो अभिभावक व हर बुजुर्ग कहता है अच्छे छात्र बनिए। राजनेता की बात चलती है तो भी एक जुमला हर जगह सुनने को मिलता है अच्छा नेता बनिये और अच्छा जनसेवक बनिये अच्छा व्यापारी बनिये और अब तो कितने ही स्थानों पर सुनने को मिलता है अच्छे ज्योतिषी बनिये और अच्छे पूजारी बनिये पुलिस वाले हर सम्मेलन और विचार गोष्ठी में कहते सुनाई देंगे अच्छे वाहन चालक बनिये अच्छे इंसान बनिये।

जब सवाल यह उठता है कि सर्वमान्य शब्द बनिये को प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों से कहा जाता है कि अच्छे बनिये तो फिर आलोचना क्यों? कितनी ही जगह जब कोई किस्सा या बात होती है तो घूमा फिराकर व्यापारियों या बनियों की आलोचना करने का मौका कोई नहीं चूकता। कुछ लोग तो राजनीति हो या कोई ओर क्षेत्र। सीधे सीधे या घूमा फिराकर व्यापारी और बनिया कहकर इनकी आलोचना करने में कोई कसर नहंी छोड़ते। कितने ही अफसर तो जब अकेले बैठकर बात करते हैं तो अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिये यह कहने से नहंीं चूकते कि वो बनिये वो ऐसा ऐसा वो तो वैसा हैं ।

मेरा मानना है कि हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनिया आखिर खराब कैसे हो सकते हैं। अगर कुछ लोगों को कमी दिखाई देती है तो वो पहले अपने अंदर झांककर देखे और जब वो एक उंगली दूसरे पर उठाता है तो तीन उंगूलियां उस पर उठ रही हैं। तो भैया मेरे कहने का मतलब यह है कि बनियों की आलोचना छोड़ उनके द्वारा जो हर मंच और हर क्षेत्र में उन्हे प्रमुख स्थान देने की बात उठ रही है उसमे अब कोताही न कर जितनी जिसकी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धांत को मानकर और वैश्य समाज बनियों के योगदान को देखते हुए उन्हे हर क्षे में अब समाज को प्रगति विकास को गति तथा जरूरतमंदों की मदद करने वाले इस समाज के लोगों को उनकी योगता और काबलीयत के आधार पर बढ़ावा देने में अब कोई कोताही किसी को नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह जब अच्छा बनिया है और हर कोई उसके जैसा बनना चाहता है तो उसकी अवहेलना ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है और जो उनको अधिकार नहीं देगा वो देर सवेर पिछड़ता ही रहेगा।

क्योंकि कुछ भी कह लों जिस प्रकार अन्नदाता किसान के योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता उसी प्रकार वैश्य व्यापारी और बनिया के योगदान को किसी भी क्षेत्र में कोई भी नकारने की स्थिति में सही मायनों में नहीं हैं। और गलत तरीके से किसी को परेशान करना अपनी ही हानि के मार्ग को खोलना ही कहा जा सकता है।

साभार: – रवि कुमार विश्नोई

राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना

सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com



Monday, May 14, 2018

लिपिका अग्रवाल - यूपी की बेटी ने किया कमाल, 12वीं क्लास में किया अॉल इंडिया टॉप




लखीमपुर खीरी- 'पसीने की स्याही से जो लिखते हैं अपने सपनों को, उनके किस्मत के पन्ने कभी कोरे नहीं हुआ करते।' किसी ने ठीक कहा है कि मेहनत ही सफलता की पूंजी होती है और आप अपनी मेहनत से असंभव को भी संभव बना सकते हैं। कुछ ऐसा ही कारनामा लखीमपुर खीरी की लिपिका अग्रवाल ने कर दिखाया है। 

शहर के गढ़ी रोड पर टिम्बर व्यवसाय दीपक अग्रवाल की बेटी लिपिका अग्रवाल ने ISC क्लास 12 की परीक्षा में 99.50 परसेंट से अॉल इंडिया टॉप किया है। अब वह बेहद खुश हैं और आगे डॉक्टर बनना चाहती हैं।

लखनऊ पब्लिक स्कूल की छात्रा लिपिका की उपलब्धि पर स्कूल और परिवार में खुशी का माहौल है। सभी एक दूसरे को मुंह मीठा करा खुशी का इजहार कर रहे हैं। 

टॉपर लिपिका ने बताया कि मुझे इतने प्रतिशत की उम्मीद नहीं थी। हमने 97 प्रतिशत तक अनुमान लगाया था। वहीं मेहनत के सवाल पर उन्हाेंने कहा कि हमने इस हिसाब से तैयारी की थी कि कुछ छूट न जाए। लिपिका ने इस उपलब्धि के लिए परिजनाें आैर स्कूल का विशेष याेगदान हैं।