Monday, December 11, 2017

PUKHRAJ DAGA - पुखराज डागा

Monday, December 4, 2017

SALIL PAREKH - INFOSYS - सलिल एस पारेख

अपनी अभूतपूर्व दूरदर्शिता से इस IITian ने 2 लाख करोड़ की कंपनी के सर्वोच्च पद पर जमाया कब्जा

देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी इंफोसिस ने सलिल एस पारेख को अपना सीईओ और एमडी नियुक्त किया है। पिछले साढे तीन महीने से प्रवीण सिक्का के इस्तीफा देने के बाद से यह पद खाली था। 2 जनवरी 2018 को अगले 5 साल तक के लिए पारेख इस पद को संभालेंगे। इंफोसिस कंपनी की वर्तमान मार्केट वैल्यू करीब 2 लाख 31 हजार 9 सौ करोड़ है। देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी का अहम पदभार संभालने पर एकाएक सुर्खियों में आए सलिल एस पारेख के बारे में जानने के लिए लोगों के भीतर जिज्ञासा बढ़ गई। आइये जानते हैं कैसे पारेख की दूरदर्शिता और काबिलियत ने उन्हें इंफोसिस के सर्वोच्च पद पर बिठा दिया


1 मई 1965 को जन्मे सलिल पारेख ने आईआईटी मुंबई से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री लेने के बाद, न्यूयॉर्क की कार्नेल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर की डिग्री हासिल की। 53 साल के पारेख इस समय कैपजेमिनी जो एक इंटरनेशनल कंसल्टिंग और आउटसोर्सिंग कंपनी है, इसके बोर्ड मेंबर है। इससे पहले वह कंपनी में एप्लीकेशन सर्विस बिज़नेस यूनिट के सीईओ भी रहे। लगभग 8 साल तक अर्नेस्‍ट एंड यंग्स के कार्यक्रम से भी जुड़े रहे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी सलिल जेपी मॉर्गन चेस, गोल्डमैन, मेरिल लिंच, जैसी इंटरनेशनल फाइनेंसियल कंपनीज के साथ काम कर चुके हैं। इतना ही नहीं फिलिप्स, लाइफसाइंसेस, और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी दिग्गज कंपनियों में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इसके अलावा बहुत सी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में भी अपनी सेवाएं दी है।


लगभग 25 साल के आईटी क्षेत्र के अनुभव के साथ इंफोसिस कंपनी के घरेलू आर्थिक, वैश्विक, मैटर्स को सुलझाने की क्षमता भी सलिल रखते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्था टैड एक्‍स के एक यूथ शो के दौरान सलिल पारेख की अभूतपूर्व दूरदर्शिता को आंका जा सकता है जिसमें उन्होंने भारत के युवाओं को बताया कि 2000 में वाय टू के बग के समाधान के रूप में भारत में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर क्रांति के युग ने जन्म लिया था जो आज तक चल रहा है। भविष्य में टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में अपार अवसर मिलने के बारे में उनका मानना है: 
इंटरनेटल वस्तुएं जिसमें सभी काम चिप से किए जा सकेंगे। 
बिग डाटा 2020 तक विश्व में 50 खरब GB डाटा इकट्ठा हो जाएगा, जिससे अविष्कारक ऐप्स बनाई जा सकेंगी, विश्लेषण किए जाएंगे। 
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के द्वारा भविष्य में अपार प्रगति करने के मौके मिलेंगे। 
क्लाउड कंप्यूटर का संसार जहां डाटा को स्टोर कर सकते हैं जिसे एक सरवर द्वारा ऑर्गेनाइज करके भविष्य में कंप्यूटर यूसेज ऐप्स को हायर कर सकेंगे। 
सिक्योरिटी कंप्यूटर का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ सुरक्षा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं आ रही है। 
हानिकारक उत्पादन जैसे ड्राइवरलेस वाहन, 3D गेमिंग इत्‍यादि का प्रयोग भी भविष्य में बढ़ेगा। 

पारेख के अनुसार तकनीक के विकास के साथ-साथ उसका व्यवसायिक ढांचे में उचित प्रयोग आपकी सफलता को निर्धारित करता है। भारत के युवाओं में वह बड़े पैमाने पर यह प्रतिभा देख पाते हैं। इसलिए उनका मानना है कि भारतीय युवाओं को अपनी प्रतिभा को सही दिशा में मोड़ने के लिए बदलती टेक्नोलॉजी को समझना और परखना बहुत जरूरी है क्‍योंकि आज हम जिस दुनिया में रह रहे हैं वहां तकनीक ने इतना विकास कर लिया है कि आई फोन 6 पचास साल पहले बने स्‍पेस शिप से 120 लाख गुना ज्‍यादा पावरफुल है।

बदलती टेक्नोलॉजी के साथ सलिल जितनी तेजी से अपने विचारों एवं स़ृजनात्‍मक सोच से आगे बढ़ रहे हैं उनकी जीवन शैली इसका सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण है।

DEVENDRA JAIN-INOX - देवेन्द्र जैन

18 की उम्र में कारोबारी दुनिया में रखा कदम, दोस्त के सुझाए एक आइडिया से बन गए 13,000 करोड़ के मालिक

जब अंदर जुनून और जज्बा हो तो इंसान अपना रास्ता खुद बनाता है। हमारी आज की कहानी के नायक भी इसी किस्म के हैं जिन्होंने लिक से हटकर खुद को स्थापित करने का फैसला किया और आज वे देश के एक नामचीन उद्यमी हैं। उनके खून-पसीनों से सींची हुई कंपनी आज भारत के शीर्ष उद्योगों इंडस्ट्री में शुमार होती है।

जी हाँ, एंटरटेनमेंट सेक्टर से लेकर इंजीनियरिंग वर्क्स तक में अपनी कामयाबी का डंका बजाने वाले देवेन्द्र जैन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। आइनॉक्स समूह की आधारशिला रखने वाले इस 88 वर्षीय उद्यमी की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक है। करीब 13,000 करोड़ की संपत्ति के धनी इस शख्स की गिनती आज देश के 100 सबसे अमीर लोगों में होती है।

देवेन्द्र जैन ने महज़ 18 वर्ष की उम्र से ही बिज़नस में अपनी रूचि दिखाना शुरू कर दिया था। उनके पिता सिद्धमोल जैन का पेपर व न्यूज़ प्रिंटिंग का बिज़नेस था। पिता की ही राह पर चलते हुए देवेन्द्र ने कारोबार की बारीकियों को सीखा और साथ-ही-साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी की। दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से उन्होंने अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की।

ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी करने के बाद उनका रुझान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ओर बढ़ने लगा। उनके एक दोस्त जोकि ब्रिटिश ऑक्सीजन में कार्यरत थे उन्होंने उन्हें प्राकृतिक वायु से गैस को निकलने व तरलीकरण करने की सलाह दी। देवेन्द्र जैन को भी वायु से गैसों का निष्कर्षण व तरलीकारण कर बेचने के कारोबार में फायदा नज़र आया। क्योंकि उनदिनों औद्योगिक गैसों का इस्तेमाल इस्पात, विनिर्माण और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में व्यापक रूप से हो रहा था। इसलिए इस क्षेत्र में फायदे ही फायदे थे।

देवेन्द्र को अपने आईडिया पर यक़ीन था इसलिए उन्होंने अपने भाई ललित के साथ मिलकर जर्मनी व अमेरिका की यात्रा की ताकि इसे और गहराई से समझा जा सके। वहाँ उन्होंने औद्योगिक गैस बनाने वाली कंपनियों को देखा और साथ ही ज़र्मनी से एक ऑक्सीजन संयंत्र भी खरीदकर भारत लाए।


सन 1963 में उन्होंने पुणे में ऑक्सीजन बनाने के लिये इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन कंपनी बनाई। उनकी कंपनी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के साथ दवा उद्योग और हॉस्पिटल में भी ऑक्सीजन का सप्लाई करनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे कारोबार फैलता चला गया और देवेन्द्र एक बाद एक छलांग लगाते चले गये। आइनोक्स ने इसके अलावा और भी अलग-अलग क्षेत्रों में अपने पैर फ़ैलाने शुरू किये। आज आइनॉक्स भारत का सबसे लोकप्रिय मल्टीप्लेक्स श्रृंखला है जिसके 120 से ज्यादा शहरों में सिनेमाघर हैं।

आज उनकी कंपनी की बागडोर उनके परिवार के तीसरी पीढ़ी सिद्धार्थ के हाथों में है। देश में आइनोक्स इकलौता ऐसा ग्रुप है जो रेफ्रिजेन्ट गैस के साथ-साथ इसके सिलेंडर भी बनाता है। वर्तमान में समूह के औद्योगिक गैस, फ्लोरोकार्बन, क्रोयोज़ेनिक इंजीनियरिंग और मल्टीप्लेक्स के बिज़नेस में बड़ा नाम बन चुकी है।

साभार:  hindi.kenfolios.com

Sunday, December 3, 2017

SHUBHANGI SWARUP - शुभांगी स्वरुप गुप्ता बनी नेवी की पहली महिला पायलट

माहोर वैश्य समाज की शुभांगी स्वरुप गुप्ता बनी नेवी की पहली पाइलट 




भारतीय नौसेना ने शुभांगी स्वरूप को पहली महिला पायलट के तौर पर कमीशन कर इतिहास रच दिया है। इस कमीशनिंग के साथ शुभांगी को भारतीय नौसेना के पहली महिला पायलट बनने का गौरव प्राप्त हो गया है। 

केरल के कन्नूर के एझीमाला में आयोजित इंडियन नेवल अकेडमी की पासिंग आउट परेड में शुभांगी स्वरूप के साथ आस्था सहगल, रूपा ए और शक्तिमाया एस भी शामिल थीं। लेकिन पहली महिला पायलट बनने का गौरव शुभांगी को हांसिल हुआ और माना जा रहा है कि उनकी तैनाती टोही विमानों के लिए हो सकती है।


बुधवार को आयोजित इस परेड में 328 कैडेट शामिल हुए इसमें इंडियन कोस्ट गार्ड सहित दो ओवरसीज कैडेट भी शामिल हुए। ओवरसीज कैडेट में तंजानिया और मालदीव के कैडेट शामिल थे। पहली महिला पायलट बनने के बाद उत्तर प्रदेश के बरेली की रहने वाली शुभांगी स्वरूप ने कहा कि मुझे मालूम है कि यह सिर्फ एक रोमांचक अवसर नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है. शुभांगी हैदराबाद के दुंदीगल एयर फोर्स अकादमी भी विशेष ट्रेनिंग के लिए जाएंगी। 

आस्था सहगल ने कहा कि नेवी के इतिहास में यह भी पहलीबार होगा जब नेवल अर्मामेंट इंसपेक्सन ब्रांच में अधिकारी के तौर पर शामिल किया जाएगा। इस बदलाव के बाद भारतीय महिलाओं को एक अलग तरह की पहचान मिलेगी।

महिलाओं को मिल रही जिम्मेदारियों के बाद चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल सुनील लांबा ने कहा कि वैसे तो इंडियन नेवी में महिलाओं की एंट्री 1991 में ही मिल गई थी लेकिन शुभांगी, आस्था सहित नई लड़कियों की इस पहल के बाद महिलाएं तेजी से शामिल होंगी। कार्यक्रम में एडमिरल ने 9 बेहतरीन मिडशिपमेन और कैडेट को मेडल भी दिया। 

Thursday, November 16, 2017

GOPINATH SAHA - देशभक्त क्रान्तिकारी गोपीनाथ साहा


गोपीनाथ साहा का जन्म पश्चिम बंगाल में ज़िला हुगली के सरामपुर में सन् 1901 में पिता विजय कृष्ण साहा के घर में हुआ था। प्रतिष्ठित परिवार ने स्कूल की शिक्षा भी दी। परन्तु उन्होंने देशभक्ति का मार्ग चुन लिया और 1921 के असहयोग आन्दोलन में तन, मन, धन से समर्पित होकर कार्य किया। इसके बाद वे देवेन डे, हरिनारायण और ज्योशि घोष क्रान्तिकारियों के संपर्क में आकर ‘युगान्तर दल’ के सक्रिय सदस्य बन गए। उन दिनों कलकत्ता में पुलिस के डिटेक्टिव डिपार्टमेन्ट के मुखिया चार्ल्स टेगार्ट ने क्रान्तिकारियों के ख़िलाफ़ बहुत सख्ती से मोर्चा खोला हुआ था। देशभक्तों के ऊपर बहुत ज़ुल्म किया जा रहा था। टेगार्ट के सख्त रवैये के चलते बहुत से क्रान्तिकारियों को फाँसी पर लटकाया जा चुका था। बहुतेरे जेलों में सड़ रहे थे। ऐसे में ‘युगान्तर दल’ ने यह निर्णय लिया कि टेगार्ट का काम तमाम कर दिया जाए। इससे क्रान्तिकारियों का मनोबल बढ़ेगा और पुलिस का टूटेगा तथा शहीद क्रान्तिकारियों का बदला भी लिया जा सकेगा । उसको ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी गोपीनाथ साहा को दी गई। दिनाँक 12 जनवरी 1924 को चौरंगी रोड पर टेगार्ट के आने की भनक थी। घात लगाकर गोपीनाथ ने आने वाले अंग्रेज पर फॉयर किया। उनका ख़्याल था कि वह चार्ल्स टेगार्ट है। परन्तु बाद में पता चला कि मारा जाने वाला एक सिविलियन अंग्रेज था जो किसी कम्पनी में कार्य करता था। उसका नाम अर्नेस्ट डे था। लोगों ने उनका पीछा किया और गोपीनाथ साहा पकडे ग़ए। गोपीनाथ के ऊपर मुक़द्दमा दर्ज़ करके न्यायलय में केस चलाया गया। 21 जनवरी, 1924 को पेशी पर उन्होंने जज से मुख़ातिब होकर बड़ी बेबाक़ी और बहादुरी से कहा, ‘कंजूसी क्यों करते हैं, दो-चार धाराएँ और भी लगाइए’। बहुत ही साहस और दिलेरी से उन्होंने केस का सामना किया।

उच्च अदालत में पेशी पर उन्होंने कहा; मैं तो चार्ल्स टेगार्ट को ठिकाने लगाना चाहता था क्योंकि उसने देश-प्रेमी क्रान्तिकारियों को काफी तंग कर रखा था। लेकिन उसकी क़िस्मत अच्छी थी कि वह बच निकला और इस बात का दु:ख है कि एक मासूम व्यक्ति मारा गया। परन्तु मुझे विश्वास है कि कोई न कोई क्रान्तिकारी मेरी इस इच्छा को ज़रूर पूरी करेगा। अदालत ने उनके इस बयान पर 16 फरवरी को उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई। सज़ा सुनते ही वे खिलखिलाकर हँसे और बोले; मैं फाँसी की सज़ा का स्वागत करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूंद भारत के प्रत्येक घर में आज़ादी के बीज बोए। एक दिन आएगा जब ब्रिटिश हुक़ूमत को अपने अत्याचारी रवैये का फल भुगतना ही पड़ेगा।

1 मार्च 1924 को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। और एक साहसी वीर देश के लिए 23 वर्ष की आयु में शहीद हो गया। फाँसी के तख्ते पर वह प्रसन्न मुद्रा में पहुँचा। काल-कोठरी से लाने से कुछ क्षण पहले ही उन्होंने अपनी माँ को पत्र लिखा; तुम मेरी माँ हो यही तुम्हारी शान है। काश! भगवान हर व्यक्ति को ऐसी माँ दे जो ऐसे साहसी सपूत को जन्म दे। गोपीनाथ साहा की बहादुरी, संकल्प, दृढ़-निश्चय और शहादत की दास्तान तब तक ज़िन्दा रहेगी जब तक संसार चलता रहेगा। हमारी आज़ादी जो उन जैसे अनगिनत शहीदों के बलिदान से मिली है, उसकी सार्थकता और औचित्य को और मज़बूत बनाएँ और देश में ‘सबसे पहले देश’ के मनोभाव के साथ सामाजिक तथा आर्थिक विषमताएँ दूर कर भारत को एक समृद्ध-शक्तिशाली देश बनाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

साभार: saadarindia.com/


Friday, November 10, 2017

SHRIPRAKASH LOHIYA - श्रीप्रकाश लोहिया

19 वर्ष की उम्र में विदेशी धरती पर शून्य से शुरुआत कर ऐसे बनाया 67,000 करोड़ का साम्राज्य


एक बहुमुखी व्यक्तित्व वाले प्रवासी भारतीय ने भारतीय उद्यमिता के उत्साह और जोश में और भी वृद्धि की है। 2017 मेें फोर्ब्स पत्रिका के प्रकाशन के वक्त 5 बिलियन डाॅलर की संपत्ति के साथ वे विश्व के 288वें धनकुबेरों की सूची में शामिल थे। मगर फोर्ब्स के ही रियल टाईम डेटा के अनुसार उनकी संपत्ति 2017 में ही 6.3 बिलियन डाॅलर हो गई। यह शख्स कोई और नहीं बल्कि श्री प्रकाश लोहिया हैं, जिनकी गिनती इण्डोनेशिया के चौथे सबसे रईस इंसान के रूप में होती है।


विश्व के वृहत्तम पाॅलिस्टर निर्माता कंपनी इण्डोरामा कार्पोरेशन के प्रबंध निदेशक श्री लोहिया जब 1975 में अपने पिता मोहन लाल लोहिया के साथ इण्डोनेशिया की धरती पर अपने सपनों को पूरा करने आए थे तो उन्हें भी गुमान न था कि सफलता उनका इस कदर स्वागत करेगी। इण्डोरामा दो शब्दों के मेल से बनी है इण्डो इण्डोनेशिया को प्रतिक करता है जबकि रामा भगवान श्री राम को प्रस्तुत करता है। कंपनी तेजी से अफ्रिकी देशों में विस्तार कर रही है। हाल ही में उन्होंने नाइजिरिया में एक उर्वरक कंपनी स्थापित किया है। इण्डोरामा का लक्ष्य अफ्रिका महादेश में साल 2020 तक 2 बिलियन डाॅलर का निवेश बढ़ाकर 4.2 बिलियन डाॅलर करना है। इसी कड़ी में उन्होंने सेनेगल में सबसे बड़ा उर्वरक सयंत्र स्थापित किया है। मैक्सिको में भी उन्होंने औद्योगिक ईकाई की स्थापना की है।

कैसे हुई शुरुआत

कोलकत्ता में जन्में श्री प्रकाश लोहिया की यह यात्रा 40 साल पूर्व तब शुरु हुई थी जब 19 वर्ष की अवस्था में उन्होंने इण्डोनेशिया का रुख किया। उन्होंने साल 1971 में वाणिज्य की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की। साल 1973 में पिता संग इण्डोनेशिया की धरती पर कदम रखा। नए देश में नई संभावनाओं को देखते हुए उनके पिता ने एक रासायनिक वस्त्र उद्योग की आधारशिला रखी। शुरुआत के कुछ वर्षों तक उन्होंने इंडस्ट्री को चलाया और 1976 में सूत निर्माण की प्रक्रिया शुरू की। इण्डोरामा सिंथेटिकस के बैनर तले उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स को बाज़ार में उतारा।

दरअसल इस फर्म की शुरुआत एक सूत कताई ईकाई की रूप में हुई थी और समय के साथ-साथ कंपनी इण्डोनेशिया की सबसे बड़ी टेक्सटाईल कंपनी बन गई। उन्होंने अपनी उत्पादन ईकाई का विस्तार इण्डोनेशिया के बाद उजबेकिस्तान और थाईलैण्ड तक पहुँचाया। 1980 के दशक के अंत में मोहन लाल लोहिया ने कंपनी को भविष्य में परिवार के विवादों से बचाने के लिए अपने तीन बेटों के बीच विभाजित कर दिया।

अधिग्रहण के जरिए नए क्षेत्रों में बढ़ाया कारोबार


साल 1990 में कंपनी के कार्यक्षेत्र में विविधता करते हुए श्री प्रकाश ने पाॅलीथिन और टेराफेटलेट का उत्पादन शुरु किया जिससे कोक और पेेप्सी जैसे पेयपदार्थ का बोतलबंद किया जाता है। 2006 में इण्डोरामा सिन्थेटिक्स अफ्रिकी देशों में निवेश करना शुरु किया। उन्होंने नाइजिरिया की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एलमा पेट्रोकैमिक्ल्स का 225 मिलियन डाॅलर में अधिग्रहण कर अपना दायरा बढ़ाया। अपनी सफलता के रथ पर सवार श्री प्रकाश लोहिया की कंपनी इण्डोरामा कार्पोरेशन पेट्रोकैमिकल्स में 2 बिलियन डाॅलर के निवेश के साथ पश्चिमी अफ्रिकी देशों में इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विदेशी निवेशक बन गयी।

64 की उम्र में भी वह सक्रिय रुप से अपनी कंपनी का संचालन देखते हैं। 57 फैक्ट्रीयों के साथ वर्तमान में 21 देशों में फैली इस कंपनी का सालाना टर्नओवर 10 बिलियन डाॅलर (67,000 करोड़ रूपये) के करीब है। हाल ही में उन्होंने ड्यूपाॅन्ट के साथ भी साझा व्यपार के समझौते किए हैं।

प्रकाश लोहिया ने कंपनी का भाग अपने बेटे अमित को सौंप दिया है। जो अभी सिंगापुर में रहते हैं। परंतु नाइजिरिया ईकाई का संचालन वे स्वयं करते हैं। वार्टन स्कूल आॅफ बिजनेस से ग्रेजुएट अमित को फोब्स पत्रिका ने ‘प्रिंस आॅफ पाॅलिस्टर’ कहा है। श्री प्रकाश के छोटे भाई आलोक भी इण्डोनेशिया के रईसों में एक है।

सामाजिक कार्यों में भी दिल खोल कर लेते हैं हिस्सा

श्री प्रकाश लोहिया इण्डोनेशिया के सामाजिक क्षेत्र के लिए भी बहुत कुछ कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज और पर्यावरण के क्षेत्र में भी उन्होंने काफी योगदान दिया है। कई स्कूल, अस्पताल और स्वास्थ्य केन्द्र खोलने में आर्थिक सहायता प्रदान की है।

श्री लोहिया कला के भी एक दिलेर कद्रदान हैं। उनके पास दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह भी है जिसमे 16वीं सदी का ‘बाईबल’ और 18वीं सदी का लिखा गया ‘कुरान’ है। उनके पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा लिथोग्राफ का संग्रह है। जिनमें कुछ तो 17वीं सदी के हैं। उन्होंने 75 मिलियन डाॅलर से 245 वर्ष पुराने ‘मेफेयर मेंशन’ का जिर्णोद्धार कराया। इसके लिए कई इतिहासकार, कलाकार और शिल्पकारों को लगाया गया। उनके इस कार्य के लिए उन्हें ‘मेफेयर का महाराज’ भी कहा जाता है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा 2012 में उन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से भी नवाजा गया था।

एक प्रवासी भारतीय द्वारा विदेशों में अपनी सफलता का परचम लहराना पूरे देश के लिए एक गर्व का विषय है। अपनी मेहनत और लगन से श्री प्रकाश लोहिया ने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया। उनकी कामयाबी युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो किसी भी उद्यमिता के पहल से घबराते हैं।

साभार: 
hindi.kenfolios.com/sri-prakash-lohia-indorama-corporation/

by Amit Kumar,11/11/2017





Friday, October 20, 2017

TARUN GOYAL - तरुण गोयल

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अग्रभाग्वत - अदृश्य स्याही वाली प्राचीन कला की अनसुलझी पहेली

अदृश्य स्याही वाली प्राचीन कला की अनसुलझी पहेली


प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं. रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का यह रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.

जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है? अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली, जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं. 

आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुडी हुई. इस गांव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं. घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं. रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं. एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है. अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया, इसका कोई कारण उनके पास नहीं था. यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं. असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं. मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.

‘ब्रम्ह्कुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है. भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी. उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्ह्कुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है. हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्ह्कुंड दर्शन की..! वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्ह्कुंड पहुंच गए. दुसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ. रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्ह्सरोवर के तट पर एक वटवृक्ष हैं, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं. इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..! दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्ह्सरोवर के तट पर गये, तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी. रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपडे में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा, “जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.” वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१. 

आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है, लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही... असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहां वे रुके थे. उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बांधकर रखे थे. इन पर कुछ भी नहीं लिखा था. एकदम कोरे..! इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं, इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी. अब इसका क्या करे..? उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गांव, आमगांव, लेकर आये. लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे. बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गांव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे. रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?” गुरु ने जवाब दिया, “तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.” अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए. रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..! उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.

कुछ दिन बीत गए. एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..! जहां पर पानी गिरा था, वहां पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..! उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा. अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था. कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए. अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया. यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था. यह काम कुछ वर्षों तक चला. जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया, तब समझ में आया, की भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं. लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था. उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ. पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय. इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.

रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई. इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ. ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए. इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की. यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया. इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी. आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं. रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.

यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं. जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..? इसका उपयोग कैसे किया जाता था..? कहां उपयोग होता था, इस तकनीक का..? भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं. ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.

मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था. यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं. इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था. उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था. फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बांधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था. यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे. भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था. भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं. लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं. भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है. परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पध्दतियां थी, जिनकी जानकारी मिली हैं. आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था. चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं. केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.

मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था. कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे. पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था. फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपडे में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे. और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी. बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे. काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है. आश्चर्य इस बात का हैं, की जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं. जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं. पानी से मिटती नहीं. उलटें, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं. इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था. यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे. अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा. इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं. उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ. लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूं कहे, "आजकल का शास्त्रशुध्द विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है. स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिध्द हो चुका है..! दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है. यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके. 

साभार : 

desicnn.com/news/ancient-indian-knowledge-about-chemicals-and-colours-are-excellent-till-today-science-could-not-match-this By प्रशांत पोळ



THE DIAMOND KING - NEERAV MODI - नीरव मोदी

पढ़ाई छोड़ लौटे भारत, 19 की उम्र में कारोबारी दुनिया में रखा कदम, आज हैं सबसे रईस जौहरी


यह कहानी है उस शख्स की जिनके नाम से हम अपरिचित हैं लेकिन देश की आभूषण इंडस्ट्री में उनकी तूती बोलती है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देश की डायमंड इंडस्ट्री में सबसे बड़े नाम नीरव मोदी की। एक समय राजा-महाराजा, रानियों के गले, बाजूओं और मुकुट को सुशोभित करने वाले हीरे आजकल हर ज्वैलरी की दूकान में मिलने लगे हैं। यह इकॉनमी का असर है। पूरी दुनिया में हीरे की बढ़ती डिमांड जा रही और इसी डिमांड को पूरा करते हैं नीरव मोदी जैसे डायमंड मर्चेन्ट।

कौन हैं नीरव मोदी


46 साल के नीरव मूल रुप से गुजरात के रहने वाले है, जिनकी प्राइमरी शिक्षा बेल्जियम में हुई। उनके गुजराती पिता हीरे के व्यापार से जुड़े थे और इसी धंधे को नीरव मोदी ने पेशा बनाया। नीरव देश ही नहीं, दुनिया के पहले डायमंड बिजनेसमैन हैं, जो अपनी डिजाइंड ज्वैलरी का ब्रांडनेम भी है। लेकिन गुजरात के इस हीरे व्यापारी को शोहरत तब मिली जब क्रिस्टी ज्वैलरी आॅक्शन (2010) में नीरव मोदी की कंपनी फायर स्टार डायमंड का गोलकोंडा नेकलेस 16.29 करोड़ रुपए में बिका और नीरव मोदी ब्रांड को ग्लोबल पहचान मिली। उनके एक और हार ने तहलका तब मचाया जब उसकी कीमत 50 करोड़ रुपये लगाई गई, नीरव मोदी ने अपने ही नाम से 25 बड़े लग्जरी स्टोर दिल्ली से हांगकांग और मुंबई से लेकर न्यूयार्क में खोला है। 2016 की फोब्स सूची के मुताबिक 11,237 करोड़ की संपत्ति के मालिक नीरव देश के सबसे रईस लोगों की गिनती में 46वें पायदान पर खड़े हैं।

कैसे हुई सफ़र की शुरुआत

नीरव मोदी हीरा व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। किशोर उम्र में वे पढ़ाई के लिए व्हॅार्टन स्कूल (यूएस) गए थे, पर 1990 में मामा मेहुल चौकसी का बुलावा आ गया। मात्र 19 साल की उम्र में वह अपने मामा मेहुल चौकसी के पास हीरे के व्यापार का गूढ़ मंत्र सीखने मुंबई पहुंच गए थे। गीतांजलि ग्रुप के सीएमडी मेहुल चौकसी देश में तब ज्वैलरी फैक्ट्री लगा रहे थे। नीरव ने पढ़ाई को अलविदा कहा और गीतांजलि ग्रुप में ज्वैलरी मैन्यूफैक्चरिंग व मार्केटिंग के नुस्खे सीखे।

कारोबारी बारीकियों को सीखने के बाद उन्होंने डायमंड उद्योग में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का निर्णय लिया और स्थापित की फायर स्टार डायमंड। उन्हाेंने अमेरिकन ज्वैलर्स को लूज डायमंड्स सप्लाय से कारोबार की शुरुआत की पर लक्ष्य था, अपना लग्जरी डायमंड ज्वैलरी ब्रांड बनाना। 1999 में नीरव ने खुद कुछ बड़ा करने की ठानी। उन्होंने दुनिया के नायाब हीरों की खोज शुरू कर दी। सिएरा लियोन से लेकर रूस तक के हीरे की खदानों से उन्होंने हीरे जुटाए और बन गए रेयर डायमंड के सबसे बड़े जौहरी।

खुद के नाम ही है एक ब्रांडनेम


नीरव की कंपनी का नाम यूँ तो फायरस्टार डायमंड के नाम से है पर उनके द्वारा तैयार किये गए डिज़ाइन्स नीरव मोदी के नाम से ही बिकते हैं। लोग उनके द्वारा तैयार किये डिज़ाइन को ख़ास तौर पर पसंद करते हैं और उनकी कीमत भी करोड़ों में होती है। आर्ट व म्यूजिक के शौकीन नीरव अपनी ज्वैलरी खुद डिजाइन करते हैं। उनके कारीगर इस डिजाइन से प्रोटाेटाइप बनाते हैं और अंतिम मैन्यूफैक्चरिंग नीरव के अप्रूवल के बाद ही होती है।

बड़े- बड़े सेलेब्स और बिज़नेसमैन हैं ग्राहक


मौजूदा समय में मुंबई में रह रहे मोदी दुनिया के बड़े डायमंड मार्केट में अपने ज्वेलरी की नुमाइश लगाते हैं। यहां खरीदारों की पहली शर्त यह होती है कि वह कोई खरबपती हो। नीरव मोदी ब्रांड ज्वैलरी की मूल्य रेंज 10 लाख से 50 करोड़ है। उनके ग्राहक हैं दुनिया के रईस और सेलिब्रिटीज। इसकी पुष्टि इसी बात से हो जाती है कि भारत के ही टॉप 10 अमीरों में से 6 उनके नियमित ग्राहक हैं। बॉलीवुड के भी बड़े-बड़े नामचीन कलाकार उनकी ज्वेलरी के मुरीद हैं। उनकी कंपनी फायर स्टार की दुनियाभर में ऑफिस हैं। कंपनी का मौजूदा टर्नओवर 10 हजार करोड़ से ज्यादा हो चुका है।

नीरव चाहते तो उनके पास पिता का बना बनाया कारोबार था लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से अपना नाम बनाया और आज देश के सबसे बड़े जौहरी की फेहिस्त में शामिल हैं।

साभार: 


hindi.kenfolios.com/nirav-modi-diamond-merchant/by Sandeep Kapoor10/20/2017

Tuesday, October 17, 2017

SOURAV MODI - सौरव मोदी



बहुत कम लोग ही हैं जो अपनी अच्छी-खासी कॉर्पोरेट नौकरी को छोड़कर एक उद्यमी बनने का ख्वाब देखते हैं, लेकिन बेंगलुरु के 23 साल के सौरव मोदी ने बिलकुल कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट की जॉब छोड़कर बिसनेस में हाथ आजमाने की कोशिश की और आज एक सफल उद्यमी हैं।

13 साल बाद आज जब वे पलट कर पीछे देखते हैं तो अपने 2015-16 के 6.5 करोड़ के टर्न-ओवर के साथ उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। आज उनकी कंपनी बैग्स, बेल्ट, वॉलेट्स जैसे जूट प्रोडक्ट्स और कॉर्पोरेट गिफ्ट्स बनाती है। उनके प्रोडक्ट्स भारत के लगभग सभी रिटेल चेन में उपलब्ध हैं और कुछ यूरोपियन देशों में भी ये प्रोडक्ट निर्यात किये जाते हैं। बिना किसी शुरूआती अनुभव के शुरू कर उन्होंने धीरे-धीरे खुद से ही सब-कुछ सीखा और आज सफ़लता उनकी कदम चूम रही।

सौरव एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं और उन्होंने अपना बिज़नेस सिर्फ 8000 रूपये से शुरू किया वो भी अपनी माँ से कर्ज लेकर। उन्होंने सबसे पहले 1800 रुपये की एक सेकंड-हैण्ड सिलाई मशीन खरीदकर और एक पार्ट टाइम टेलर को जॉब में रखकर एक किराये के 100 स्क्वायर फीट के गेराज से अपना यह बिज़नेस शुरू किया। उनका यह शुरुआती दौर काफी मुश्किलों भरा था। सौरव 2007 में बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, जब उनके 30 काम करने वालों ने स्ट्राइक कर दी पर उन्होंने इस कठिन समय को भी अपने साहस और मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर झेल गए। आज उनके पास करीब 100 से ज्यादा काम करने वाले लोग हैं और उनकी यह फैक्ट्री बेंगलुरु के कामाक्षीपाल्या में 10,000 स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैल चुका है।

क्राइस्ट कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन करने के पश्चात् सौरव ने अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी में टैक्स एनालिस्ट की नौकरी ज्वाइन की और वहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल गुजारे। इसके बाद वे यूएस से एमबीए करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उनका सपना अधूरा ही रह गया।

मैंने कैलिफ़ोर्निया की यूनिवर्सिटी से एमबीए के लिए अपनी सीट सुरक्षित कर रखा था पर पीछे मुड़कर देखने से यह लगता है कि शायद यही मेरी नियति थी – जूट के सामान बनाना — सौरव मोदी

कुछ दिनों तक कॉर्पोरेट जॉब करने के बाद सौरव अपने पिता के बिज़नेस में लग गए। दो साल पिता के साथ काम करने के बाद कुछ नया करने की चाह में उन्होंने पिता का बिज़नेस छोड़ दिया। पिता ने भी उनके इस निर्णय का सम्मान किया क्योंकि वे खुद भी एक सेल्फ-मेड आदमी थे।


अपने पिता के सुझाव पर उन्होंने जूट के बिज़नेस में अपना भाग्य आजमाया क्योंकि बेंगलुरु में एक भी जूट प्रोडक्ट्स का उद्योग नहीं था और फिर उनका यह आईडिया जस्ट जूट के नाम से उभर कर सामने आई। पिता के कस्टमर के द्वारा ही उनकी कंपनी को पहला ऑर्डर 500 जूट बैग बनाने का मिला। उनका सबसे बड़ा ऑर्डर 70,000 रूपये का था जो एक कैंडल एक्सपोर्टर ने उन्हें दिया और फिर इस तरीके से उनका यह बिज़नेस चल पड़ा। और जैसे-जैसे उनके पास पैसे आते गए उनका बिज़नेस बढ़ता चला गया।

किसी भी बिज़नेस में बने रहने के लिए चीज की गुणवत्ता का होना अति आवश्यक है। एक खुश ग्राहक दस संभावित ग्राहक के बराबर होता है। — सौरव मोदी

साल 2008 में उनका विवाह निकिता नाम की एक लड़की से हुआ, जो डिजाईन बैकग्राउंड से ताल्लुक रखती थी और इसलिए निकिता ने भी इस बिज़नेस को आगे बढ़ाने में सौरव की पूरी मदद की। आज उनके इस जूट बिज़नेस में विस्तृत कलेक्शन के हैंडबैगस, स्लिंग्स, वॉलेट्स, लैपटॉप बैग्स, और ऐसे बहुत सारे जरूरतमंद प्रोडक्ट्स हैं। इसके अलावा कुछ ऑर्गेनिक कॉटन और पोल्यूरेथेन जैसे फैब्रिक्स में प्रयोग करके उन्होंने और भी बहुत सारे प्रोडक्ट्स बनाये हैं। सौरव ने अपना बिज़नेस जस्ट जूट का लक्ष्य निर्धारित किया है कि आने वाले दस सालों में उनकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 100 करोड़ हो जायेगा।

साभार: hindi.kenfolios.com/saurav-modi-ceo-of-just-jute/by Anubha Tiwari

Wednesday, October 4, 2017

DEVITA SHROFF - देविता श्रॉफ -24 वर्ष में बनीं नामचीन उद्यमी




24 वर्ष में बनीं नामचीन उद्यमी, बदली टीवी की परिभाषा, आज है 500 करोड़ का टर्नओवर

कभी टीवी को बुद्धू बक्से के नाम से जाना जाता था। यह बुद्धू बक्सा पहले के समय में बहुत कम लोगो के घरो में होता था और छुट्टी वाले दिन सब लोग एक साथ बैठ कर टीवी देखा करते थे। बदलते वक्त के साथ तकनीकी विकास तेज़ी से हुआ और हर घर में टीवी नज़र आने लगा। लेकिन हम अगर आज की बात करें तो टीवी प्रत्येक परिवार की ज़रुरत बन गया है।

इसी ज़रुरत को समझते हुए एक महिला उद्यमी ने अपनी काबिलियत से कंप्यूटर व टीवी के बीच के भेद को ही खत्म कर दिया है। जी हां, आज हम बात कर रहे है VU टेलीविजेन्स नामक कंपनी की जिसने टीवी शब्द की परिभाषा ही बदल दी है। इसका सारा श्रेय जाता है देविता श्रॉफ को, जोकि VU टेलेविजेन्स की फाउंडर, सीईओ और डिजाइन हेड हैं। हम हमेशा से ही देखते आये हैं कि कोई भी बढ़िया तकनीक विदेशो में बनती है और बाद में भारत आती है। लेकिन देविता ने इस प्रक्रिया को ही बदल कर रख दिया है। आज उनकी कंपनी द्वारा बनाई गई टीवी विदेशो में भी धूम मचा रही है।

देविता मुंबई की रहने वाली हैं। इनके पिता राजकुमार श्रॉफ जेनिथ कंप्यूटर के चेयरमैन हैं। देविता मानती हैं कि उनके अंदर जो भी बिज़नेस स्किल्स है वो उनके दादा जी से आये हैं। मुंबई से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त कर देविता आगे की पढाई के लिए विदेश चली गईं। वहां से बीबीए की डिग्री हासिल कर जब वे भारत आईं तो उन्होंने अपने पिता की कंपनी ज्वाइन की। साल 2006 में जब टेक्नोलोजी का तेज़ी से विकास हो रहा था और बाहरी कंपनियां मोबाइल और कम्प्यूटर के बीच के फर्क को मिटाने में लगी थी, तब देविता ने कुछ नया करने की ठानी। और उन्होंने इसके लिए टीवी को चुना। इस कड़ी में उन्होंने VU टेक्नोलॉजीज नाम से लक्ज़री टेलीविज़न की रेंज निकाली जोकि टीवी और सीपीयू का मिला-जुला रूप है। यह टीवी वाटरप्रूफ, डिजिटल फोटोफ्रेम के साथ ही टचस्क्रीन से युक्त है। इन टीवी पर हॉटस्टार और यूट्यूब जैसे ऐप भी आसानी से चलाये जा सकते हैं। साथ ही इनकी कंपनी एंड्राइड पर चलने वाले हाई डेफिनिशन टीवी भी बनाती है। बड़ी स्क्रीन के अलावा इनके पास कॉर्पोरेट यूज़ के टीवी भी हैं। देविता बताती हैं कि इनकी कंपनी की कुल सेल में करीब 40 फ़ीसदी कॉर्पोरेट टीवी बिकते हैं।

शुरू में कंपनी चलने में देविता को थोड़ी दिक्कतें आयी लेकिन बाद में कंपनी ने तेज़ी पकड़ी। 2015 -16 में वीयू टेक्नोलॉजीज ने लगभग 2 लाख टीवी बेचे, जिसका रेवेनुए 275. 8 करोड़ रहा। वर्तमान में लगभग 1 मिलियन से अधिक टीवी बिक चुके हैं और इनका टर्नओवर करीब 540 पहुंच गया है। आज पूरे भारत में इनके 10 लाख से अधिक कस्टमर हैं और 60 देशो में इनके टीवी धूम मचा रही है।


देविता का मानना है कि जो भी काम करो बड़ा करो। जब वे बिज़नेस के सिलसिले में किसी डीलर से मिलती थी तो लोग उन्हें काफी छोटा मानते थे क्यूंकि वे मात्र 24 वर्ष की थी। शुरू में लोगो को उनपर विश्वास करने में समय लगा लेकिन देविता ने उनकी बातों को नज़रअंदाज़ कर बस आगे बढ़ना ही ज़रूरी समझा। उनकी तरक्की के साथ लोगो की सोच भी बदलती चली गयी।

इनकी कंपनी ने हाल ही में 3 नए ज़माने के टीवी लांच किये हैं जिनका नाम पोपसमार्ट, ऑफिस समार्ट और प्रीमियम स्मार्ट है। 2016 में देविता को अपने बेहतरीन कार्यो के लिए बिज़नेस वीमेन ऑफ़ द ईयर का अवार्ड भी मिला है।

इतनी कम उम्र में बिज़नेस की बारीकियों को सीखते हुए देविता ने सफलता का जो कीर्तिमान स्थापित किया है, वह वाकई बेहद प्रेरणादायक है।

लेख साभार: 


by Mitali Saxena10/5/2017




Wednesday, September 27, 2017

Tuesday, September 26, 2017

भारत के सौरव कोठारी ने पूर्व विश्व चैंपियन को हराकर जीता स्वर्ण पदक






कोठारी का क्यूस्पोर्ट में इस साल यह पहला खिताब है, जिसे जीतने के लिए उन्होंने धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया।

एशगाबात (तुर्कमेनिस्तान), पीटीआइ। भारत के बिलियर्ड्स खिलाड़ी सौरव कोठारी ने एशियन इंडोर खेलों में पूर्व वर्ल्ड बिलियर्ड चैंपियन थाईलैंड प्राप्रुत चैतानासकुन को 3-1 से पराजित कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। कोठारी का क्यूस्पोर्ट में इस साल यह पहला खिताब है, जिसे जीतने के लिए उन्होंने धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया। 

कोठारी ने पहले दो फ्रेम 100-80 और 101-0 से जीते। लेकिन प्राप्रुत ने तीसरा फ्रेम 101-29 से अपने नाम किया। चौथे फ्रेम में प्राप्रुत की गलती का फायदा उठाते हुए कोठारी ने 101-88 से बाजी मारकर मैच जीत लिया।

कोठारी ने तीसरे गेम में अच्छा मौका गंवाया और प्राप्रुत को जीतने का अवसर उपलब्ध कराया, जिसकी मदद से वह लगातार 57 अंक लेने में सफल रहे और इस गेम को उन्होंने 101-29 से अपने नाम किया। 

इसके बाद कोठारी ऑफ गार्ड पाए गए और प्राप्रुत के अच्छा खेल दिखाने से उनपर दबाव आ गया। प्राप्रुत ने अच्छी शुरुआत की लेकिन चौथे गेम में दोनों खिलाड़ियों ने मौके गंवाने का काम किया। प्राप्रुत के पास चौथे गेम को जीतकर मैच को अगले गेम में ले जाने का मौका था, लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित गलती करते हुए कोठारी को जीत सौंप दी। इसके बाद कोठारी ने शांत स्वभाव दिखाते हुए इस गेम को 101-88 से अपने नाम किया और स्वर्ण पदक भी जीत लिया। 

साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, September 13, 2017

ASHA KHEMKA - BUSINESS WOMEN OF THE YEAR - आशा खेमका


नहीं आती थी अंग्रेजी, आज बिहार की इस बेटी को पूरी दुनिया कर रही सलाम

बिहार के सीतामढ़ी की रहनेवाली आशा खेमका को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित बिजनेस वूमेन पुरस्कार से नवाजा गया है। आशा की शादी 15 साल की आयु में ही हो गई थी। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी।

बिहार की एक बेटी ने दुनिया में फिर से राज्य का नाम रौशन किया है। सीतामढ़ी की रहनेवाली भारतीय मूल की महिला शिक्षाविद् को ब्रिटेन का प्रतिष्ठित एशियन बिजनेस वूमेन पुरस्कार दिया गया है। 65 वर्षीय आशा को शुक्रवार को यहां एक समारोह में सम्मानित किया गया।

इससे पहले बिहार के सीतामढ़ी में जन्मीं आशा वर्ष 2013 में ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर' का सम्मान भी पा चुकी हैं। इससे पूर्व भारतीय मूल की धार स्टेट की महारानी लक्ष्मी देवी बाई साहिबा को 1931 में डेम पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

नहीं आती थी अंग्रेजी

सीतामढ़ी की रहने वाली आशा खेमका का अंग्रेजी से कोई सरोकार नहीं रहा था। आशा खेमका की सफलता की कहानी भी काफी दिलचस्प है। शादी के बाद आशा जब ब्रिटेन गईं, तो उसे अंग्रेजी तक नहीं आती थी। लेकिन अाशा ने हार नहीं मानी और अंग्रेजी की पढ़ाई शुरु कर दी।

इसके बाद फिर क्या था खेमका ने जज्बे के दम पर अंग्रेजी को अपने वश में कर लिया।लेकिन उसने अपनी काबिलियत से अपना यह मुकाम तय किया है। 65वर्षीय आशा को शुक्रवार को यह पुरस्कार दिया गया है। आशा खेमका ब्रिटेन के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज की प्रिंसिपल हैं।

दिलचस्प रहा है सफलता का सफर

आशा 13 वर्ष की कम उम्र में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। 15 साल की उम्र में आशा की शादी डॉक्टर शंकर अग्रवाल से हो गयी। घर परिवार वालों ने उसकी शादी कर दी। शादी के बाद घर परिवार संभालते 25 की उम्र में वो ससुराल पहुंच गयी।

डॉक्टर पति ने इस बीच इंगलैंड में अपनी नौकरी पक्की कर ली थी। फिर वो अपने पति के पास अपने बच्चों के साथ ब्रिटेन पहुंचीं। अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं होने के कारण उसे काफी परेशानी होती थी। तब आशा ने टीवी पर बच्चों के लिए आने वाले शो को देख अंग्रेजी सीखने शुरू किया।

टूटी-फूटी अंग्रेजी से पाया अंग्रेजी पर फतह

शुरुआत में टूटी-फूटी अंग्रेजी में ही सही, साथी युवा महिलाओं से बात करती थीं। लेकिन वो इससे परेशान नहीं होती और फिर वो हर दिन आगे बढ़ती गयी। इससे उसका आत्मविश्र्वास बढ़ता गया।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों बाद कैड्रिफ विवि से बिजनेस मैनजमेंट की डिग्री ली और ब्रिटेन के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज में व्याख्याता के पद पर योगदान दिया। अब वो इसी कॉलेज की प्रिसिंपल हैं।


यह विश्वास करना कि इतनी कम शिक्षा के बावजूद कोई कैसे ऐसी सफलता हासिल कर सकता है आसान नहीं है लेकिन आशा खेमका की कहानी ही इस सवाल का जवाब है। आशा सीतामढ़ी बिहार की निवासी हैं। पुराने ज़माने में ग्रामीण इलाकों में जब लड़कियों का मासिक-धर्म शुरू होता था, तब उन्हें उनके माता-पिता स्कूल से निकाल दिया करते थे। आशा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। तेरह वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ देने के बाद उनकी शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में एक 19 वर्षीय लड़के के साथ कर दी गई। उनके पति शंकर खेमका उस समय एक मेडिकल के विद्यार्थी थे। 25 वर्ष की उम्र में वे अपने बच्चों और पति के साथ इंग्लैंड चली गईं। यह परिवर्तन उनके लिए बहुत बड़ा था। कुछ समय के बाद वे उस माहौल में ढलने सी लगी।

वे अपने बच्चों के साथ किड्स शो देखती और कुछ-कुछ अंग्रेजी समझने का प्रयास करती। अपनी स्पोकन स्किल को बढ़ाने के लिए साहस जुटाकर वे दूसरे बच्चों की माताओं से अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करतीं। लगातार कोशिश और अंग्रेजी सीखने का उनका हठ ही उनके बदलाव का कारण बना। कुछ सालों में आशा धारा-प्रवाह अंग्रेजी बोलने लगी। बाद में जब उनके बच्चे स्कूल जाने लगे तब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे भी आगे पढ़ाई करेंगी। उन्होंने बिज़नेस डिग्री के लिए कार्डिफ यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया।

आशा एक शिक्षाविद बनीं और वे व्याख्याता के तौर पर काम करने लगीं। साल 2006 में आशा ने वेस्ट नोटिंघमशायर कॉलेज, जो यूके का जाना-माना कॉलेज है, में प्रिंसिपल और सीईओ का पद संभाला। 2008 में डेम आशा ने द इंस्पायर एंड अचीव फाउंडेशन की स्थापना की। इसके द्वारा, जिन्होंने कोई भी शिक्षा या ट्रेनिंग नहीं ली है ऐसे युवा लोगों के जीवन को संवारने का प्रयास किया जाता है और लोगों की जरूरत के हिसाब से स्पेशल वॉकेशनल प्रोग्राम बना कर हजारों लोगों की मदद भी करता है।

69 वर्षीय आशा खेमका को 2013 में उनके काम के लिए ब्रिटेन टॉप सिविलियन अवार्ड से सम्मानित किया गया। उसी साल उन्होंने प्रतिष्ठित बिज़नेस वुमन का ख़िताब भी जीता। खेमका ने बच्चों के टेलीविज़न शो के जरिये और दूसरी माताओं के साथ बातचीत कर अपनी अंग्रेजी सुधारी। उन्हें कोई भी अवसर आसानी से नहीं मिला परन्तु उन्होंने अपने रास्तों में आए सारे अवसरों को अपना बना लिया।

साभार: दैनिक जागरण, केन फोलिओस  हिंदी.



AJAY AGRAWAL - MAX MOBILE - अजय अग्रवाल मैक्स

9वीं फैल होने के बाद छोड़ी पढ़ाई, शुरू किया कारोबार, 10 वर्ष के भीतर ही बना ली 1500 करोड़ की कंपनी


ब्रांड का नाम तभी बड़ा होता है जब उसके प्रचार के लिए बड़े से बड़े लोकप्रिय चेहरों का इस्तेमाल किया जाए। जब महेंद्र सिंह धोनी ने साल 2009 में मैक्स मोबाईल के साथ करार कर उनके ब्रांड एम्बेसडर बने तब सभी लोग जान गए कि वे प्रोडक्ट की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित होकर रहेंगे। टी-20 विश्व कप के दौरान इसका प्रचार -प्रसार इतना जोर-शोर से हुआ कि यह सभी की नजरों में आ गया और उसकी बिक्री में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई जैसा कि अजय अग्रवाल चाहते थे। परन्तु इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए उन्होंने बिज़नेस की फील्ड में महारत हासिल की।



मैक्स मोबाइल के संस्थापक और प्रबंध निदेशक अजय अग्रवाल आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने चौदह वर्ष की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। चिल्ड्रन अकादमी स्कूल में पढ़ते हुए जब वे नवमीं कक्षा में फेल हो गए तब उन्होंने इस औपचारिक शिक्षा प्रणाली को छोड़ने का तय किया। बाद में वे मुंबई स्थित अपने पिता के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेड बिज़नेस के साथ काम करने लगे। इसलिए नहीं कि कोई आर्थिक संकट था या परिस्थितियों के दबाव में आकर, बल्कि अजय को बिज़नेस से लगाव था और वे अपना पूरा समय इसे देना चाहते थे।


वे अपने पिता के बिज़नेस में एकाउंट्स सँभालते थे और उन्हें इसके लिए महीने में 4000-5000 रूपये दिए जाते थे। वे समझते थे कि आज के तकनीकी क्रांति के समय वे अपने पिता की मदद करें और उनके बिज़नेस को बढ़ाने के लिए म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स, मोबाइल फ़ोन एक्सेसरीज, गैजेट्स आदि की शुरुआत करें। बिज़नेस को सीखने और समझने के लिए उन्होंने मलेशिया और चीन का दौरा भी किया।

2004 में अजय ने यह निश्चय किया कि वे उत्पादन के क्षेत्र में हाथ आज़माएंगे और उन्होंने मोबाइल एक्सेसरीज जैसे चार्जर, बैटरीज, इयरफोन आदि का उत्पादन करना शुरू किया। पहले साल उनकी कमाई पाँच लाख रूपये हुई जो अजय को यह महसूस कराने के लिए काफ़ी था कि इस इंडस्ट्री में क्षमता और अवसर दोनों हैं। उन्होंने अपनी सारी बचत, लाभ और अपने दोस्तों, परिवार वालों और पिता से उधार लेकर बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया। 2006 में उनका लाभ 50 करोड़ रूपये था। सभी के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि उन्होंने दो वर्ष के भीतर ही 5 लाख रूपये से 50 करोड़ बना लिए।

उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया कि वे मोबाइल फ़ोन का उत्पादन शुरू करेंगे और उन्होंने 2008 में मैक्स मोबाइल की नींव रखी। उस समय बहुत कम हीभारतीय इस उद्योग में थे। शुरू के 6 महीने उन्होंने अपने वितरण चैनल्स और ग्राहकों से फीडबैक लेने में लगा दिया। इस फीडबैक के आधार पर उन्होंने अगले 6 महीनों में मोबाइल के 20 मॉडल्स बाजार में उतारे। उन्होंने दो सिम स्लॉट वाले फ़ोन लांच किये जो उस समय नया-नया था। यह लोगों के बीच बहुत ही लोकप्रिय रहा।


बिज़नेस करते-करते उन्होंने यह सीखा कि अगर उसमें उपयोग के सामान की कीमत कम हो जाये तो लाभ ज्यादा मिलेगा। शुरू में 95% पुर्जा आयात किया जाता था पर धीरे-धीरे वे देश के भीतर ही इन सामानों को खरीदने लगे और बाद में तो अजय लगभग 50% पुर्जों का उत्पादन खुद ही करने लगे। अजय ने अपनी पहली फैक्ट्री मुंबई में शुरू की, उसके बाद उन्होंने हरिद्वार में खोली और उनकी तीसरी फैक्ट्री 2009 में फिर से मुंबई में ही शुरू की। धीरे -धीरे पूरे भारतीय बाज़ार में उन्होंने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। अब इनके उत्पाद की बिक्री भारतीय उप महाद्वीप, दक्षिण एशिया और अफ्रीका में भी शुरू हो गई। अब वे भारतीय बाज़ार के धुरंधर खिलाड़ी बन चुके हैं। उनके फ़ोन की 80% बिक्री उनके फीचर फ़ोन की वजह से हुई है।

मैक्स मोबाइल को उस व्यक्ति ने ईजाद किया जो हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली के पैमाने पर दसवीं कक्षा में पढ़ने के काबिल नहीं थे। उनका लगाव बिज़नेस से था और वे उससे ज्यादा लाभ कमाना चाहते थे और उन्होंने यह कर दिखाया। अजय की कंपनी का यह विश्वास है कि 2017 के अंत तक उनका टर्न-ओवर 1500 करोड़ रूपये का हो जायेगा।

साभार: ntnews 


http://ntinews.com/9th-class-failure-made-1500-crore-business-empire

Tuesday, September 12, 2017

RITU MAHESHWARI IAS - देश में अरबों रुपयों की बिजली चोरी रोकने का रास्ता दे गई यह महिला आईएएस


गाजियाबाद की डीएम रितु माहेश्वरी।

देश में हर साल करीब 64,000 करोड़ रुपये की बिजली चोरी हो जाती है। रितु माहेश्वरी नाम की एक महिला नौकरशाह सरकारी खजाने को हो रहा इतना बड़ा नुकसान रोकने में दिलोजान से जुट गईं। साल 2011 में उनकी नियुक्ती कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाइ कंपनी में हुई। तब से उन्होंने कंपनी के एक तिहाई ग्राहकों के यहां नए स्मार्ट मीटर लगा दिए। ये मीटर बिजली खपत को डिजिटली रिकॉर्ड करते हैं जिससे बिजली वितरण प्रणाली में पल-पल हो रहे घपले उजागर हो रहे हैं। लेकिन, महज 11 महीने के बाद ही उनका ट्रांसफर गाजियाबाद हो गया।

पिछले छह साल से भ्रष्टाचार और स्त्रि विरोधी माहौल के खिलाफ जंग लड़ रही 39 साल की रितु बड़े पैमाने पर हो रही बिजली चोरी को रोकने के लिए टेक्नॉलजी की जरूरत पर जोर दे रही हैं। कुछ दिनों पहले तक वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को घाटे से उबारकर करोड़ों घरों, किसानों और फैक्ट्रियों को लगातार बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिशों को बल दे रही थीं।

उन्होंने बताया, 'मैंने बिजली चोरी करनेवाले ग्राहकों के विरोध के बावजूद 5 लाख में से 1 लाख 60 हजार मीटर बदल दिए। इससे शहर (कानपुर) में बिजली चोरी की घटना बहुत कम हो गई जो पहले 30 प्रतिशत थी।' बिजली मंत्रालय की वेबसाइट से पता चलता है कि रितु की रणनीति से कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाइ कंपनी या केस्को का वितरण घाटा आधा होकर 15.6 प्रतिशत पर आ गिरा।

बिजली चोरी के खिलाफ अभियान छेड़ने का नतीजा यह हुआ कि रितु बड़े-बड़े लोगों की नजरों में चढ़ गईं। कुछ नेता उनके दफ्तर में आकर धमकियां देने लगे। यहां तक कि उनके अपने ही स्टाफ बिजली चोरी की जांच की योजना पहले ही लीक कर देते थे। इससे बिजली चोर सर्च टीम के पहुंचने से पहले ही अवैध कनेक्शन उतार लेते।

उन्होंने कहा, 'जो कदम उठाए जा रहे थे, उससे छोटे-बड़े स्टाफ सारे स्टाफ खुश नहीं थे, वह चाहे नए मीटर लगाने की बात हो या छापेमारी की। हमारे लोग ही बिजली चोरों को राज बता देते थे।' रितु माहेश्वरी कहती हैं, 'लोगों को लगता था कि मुझे इसलिए आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है या बहकाया जा सकता है क्योंकि उनकी नजर में एक महिला को बिजली और जटिल ग्रीड्स के बारे में कुछ पता नहीं होता।'

साल 2000 में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने 2003 में आईएएस जॉइन कर ली। जुलाई 2017 तक वह केंद्र सरकार के बिजली मंत्रालय के अधीन ग्रामीण विद्युतीकरण निगम की कार्यकारी निदेशक रहीं। इस दौरान वह उस कार्यक्रम से जुड़ी रहीं जिसका मकसद अन्य माध्यमों के साथ-साथ तकनीक के इस्तेमाल से साल 2019 तक कुल टेक्निकल और कमर्शल लॉस घटाकर औसतन 15 प्रतिशत पर लाना है, ताकि बिजली वितरण कंपनियों को घाटे से उबारा जा सके। पिछले सप्ताह उन्हें गाजियाबाद का डीएम बना दिया गया है। रितु कहती हैं, 'अगला दो साल बहुत महत्वूर्ण है क्योंकि कई राज्यों को मौजूदा कमजोर मीटरिंग व्यवस्था से स्मार्ट मीटरिंग सिस्टम में शिफ्ट होना है।'

गौरतलब है कि बिजली वितरण कंपनियां और सरकारें डिजिटाइजेशन पर जोर दे रही हैं। नई दिल्ली में बिजली वितरण करनेवाली कंपनी टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लि. मार्च 2018 से एक साल के अंदर 2.5 लाख स्मार्ट मीटर लगाएगा। कंपनी का लक्ष्य 2015 तक 18 लाख घरों में स्मार्ट मीटर लगाने का है। इधर, सरकार ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लिए 50 लाख स्मार्ट मीटर खरीदने का पहला टेंडर निकल चुका है। देश में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम संचालित करने की जिम्मेदारी वाली सराकारी एजेंसी एनर्जी एफिशंसी सर्विसेज लि. स्मार्ट मीटर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोलियां मंगवाने जा रही है।

दरअसल, मोदी सरकार पांच सालों में पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन इंडस्ट्री में करीब 3 लाख 30 हजार करोड़ रुपये निवेश करने पर विचार कर रही है। बिजली उपकरण बनानेवाली फ्रांसीसी कंपनी की भारतीय यूनिट स्नेइडर इलेक्ट्रिक के मुताबिक, भारत में अब तक कुल बिजली खपत के महज 10 प्रतिशत हिस्से का ही डिजिटाइजेशन हो पाया है। कंपनी के वाइस प्रेजिडेंट और एमडी प्रकाश चंद्राकर ने कहा, 'एक राज्य बिजली वितरण कंपनी ने मुझसे कहा कि ग्रामीण इलाकों में उनका ट्रांसमिशन और कमर्शल लॉस 25 से 30 प्रतिशत है, जिसमें 1 प्रतिशत की भी कटौती हो जाए तो उनका करीब 12 हजार करोड़ रुपये बच सकता है।' 

साभार: नवभारत टाइम्स