Tuesday, October 17, 2017

SOURAV MODI - सौरव मोदी



बहुत कम लोग ही हैं जो अपनी अच्छी-खासी कॉर्पोरेट नौकरी को छोड़कर एक उद्यमी बनने का ख्वाब देखते हैं, लेकिन बेंगलुरु के 23 साल के सौरव मोदी ने बिलकुल कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट की जॉब छोड़कर बिसनेस में हाथ आजमाने की कोशिश की और आज एक सफल उद्यमी हैं।

13 साल बाद आज जब वे पलट कर पीछे देखते हैं तो अपने 2015-16 के 6.5 करोड़ के टर्न-ओवर के साथ उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। आज उनकी कंपनी बैग्स, बेल्ट, वॉलेट्स जैसे जूट प्रोडक्ट्स और कॉर्पोरेट गिफ्ट्स बनाती है। उनके प्रोडक्ट्स भारत के लगभग सभी रिटेल चेन में उपलब्ध हैं और कुछ यूरोपियन देशों में भी ये प्रोडक्ट निर्यात किये जाते हैं। बिना किसी शुरूआती अनुभव के शुरू कर उन्होंने धीरे-धीरे खुद से ही सब-कुछ सीखा और आज सफ़लता उनकी कदम चूम रही।

सौरव एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं और उन्होंने अपना बिज़नेस सिर्फ 8000 रूपये से शुरू किया वो भी अपनी माँ से कर्ज लेकर। उन्होंने सबसे पहले 1800 रुपये की एक सेकंड-हैण्ड सिलाई मशीन खरीदकर और एक पार्ट टाइम टेलर को जॉब में रखकर एक किराये के 100 स्क्वायर फीट के गेराज से अपना यह बिज़नेस शुरू किया। उनका यह शुरुआती दौर काफी मुश्किलों भरा था। सौरव 2007 में बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, जब उनके 30 काम करने वालों ने स्ट्राइक कर दी पर उन्होंने इस कठिन समय को भी अपने साहस और मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर झेल गए। आज उनके पास करीब 100 से ज्यादा काम करने वाले लोग हैं और उनकी यह फैक्ट्री बेंगलुरु के कामाक्षीपाल्या में 10,000 स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैल चुका है।

क्राइस्ट कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन करने के पश्चात् सौरव ने अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी में टैक्स एनालिस्ट की नौकरी ज्वाइन की और वहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल गुजारे। इसके बाद वे यूएस से एमबीए करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उनका सपना अधूरा ही रह गया।

मैंने कैलिफ़ोर्निया की यूनिवर्सिटी से एमबीए के लिए अपनी सीट सुरक्षित कर रखा था पर पीछे मुड़कर देखने से यह लगता है कि शायद यही मेरी नियति थी – जूट के सामान बनाना — सौरव मोदी

कुछ दिनों तक कॉर्पोरेट जॉब करने के बाद सौरव अपने पिता के बिज़नेस में लग गए। दो साल पिता के साथ काम करने के बाद कुछ नया करने की चाह में उन्होंने पिता का बिज़नेस छोड़ दिया। पिता ने भी उनके इस निर्णय का सम्मान किया क्योंकि वे खुद भी एक सेल्फ-मेड आदमी थे।


अपने पिता के सुझाव पर उन्होंने जूट के बिज़नेस में अपना भाग्य आजमाया क्योंकि बेंगलुरु में एक भी जूट प्रोडक्ट्स का उद्योग नहीं था और फिर उनका यह आईडिया जस्ट जूट के नाम से उभर कर सामने आई। पिता के कस्टमर के द्वारा ही उनकी कंपनी को पहला ऑर्डर 500 जूट बैग बनाने का मिला। उनका सबसे बड़ा ऑर्डर 70,000 रूपये का था जो एक कैंडल एक्सपोर्टर ने उन्हें दिया और फिर इस तरीके से उनका यह बिज़नेस चल पड़ा। और जैसे-जैसे उनके पास पैसे आते गए उनका बिज़नेस बढ़ता चला गया।

किसी भी बिज़नेस में बने रहने के लिए चीज की गुणवत्ता का होना अति आवश्यक है। एक खुश ग्राहक दस संभावित ग्राहक के बराबर होता है। — सौरव मोदी

साल 2008 में उनका विवाह निकिता नाम की एक लड़की से हुआ, जो डिजाईन बैकग्राउंड से ताल्लुक रखती थी और इसलिए निकिता ने भी इस बिज़नेस को आगे बढ़ाने में सौरव की पूरी मदद की। आज उनके इस जूट बिज़नेस में विस्तृत कलेक्शन के हैंडबैगस, स्लिंग्स, वॉलेट्स, लैपटॉप बैग्स, और ऐसे बहुत सारे जरूरतमंद प्रोडक्ट्स हैं। इसके अलावा कुछ ऑर्गेनिक कॉटन और पोल्यूरेथेन जैसे फैब्रिक्स में प्रयोग करके उन्होंने और भी बहुत सारे प्रोडक्ट्स बनाये हैं। सौरव ने अपना बिज़नेस जस्ट जूट का लक्ष्य निर्धारित किया है कि आने वाले दस सालों में उनकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 100 करोड़ हो जायेगा।

साभार: hindi.kenfolios.com/saurav-modi-ceo-of-just-jute/by Anubha Tiwari

Wednesday, October 4, 2017

DEVITA SHROFF - देविता श्रॉफ -24 वर्ष में बनीं नामचीन उद्यमी




24 वर्ष में बनीं नामचीन उद्यमी, बदली टीवी की परिभाषा, आज है 500 करोड़ का टर्नओवर

कभी टीवी को बुद्धू बक्से के नाम से जाना जाता था। यह बुद्धू बक्सा पहले के समय में बहुत कम लोगो के घरो में होता था और छुट्टी वाले दिन सब लोग एक साथ बैठ कर टीवी देखा करते थे। बदलते वक्त के साथ तकनीकी विकास तेज़ी से हुआ और हर घर में टीवी नज़र आने लगा। लेकिन हम अगर आज की बात करें तो टीवी प्रत्येक परिवार की ज़रुरत बन गया है।

इसी ज़रुरत को समझते हुए एक महिला उद्यमी ने अपनी काबिलियत से कंप्यूटर व टीवी के बीच के भेद को ही खत्म कर दिया है। जी हां, आज हम बात कर रहे है VU टेलीविजेन्स नामक कंपनी की जिसने टीवी शब्द की परिभाषा ही बदल दी है। इसका सारा श्रेय जाता है देविता श्रॉफ को, जोकि VU टेलेविजेन्स की फाउंडर, सीईओ और डिजाइन हेड हैं। हम हमेशा से ही देखते आये हैं कि कोई भी बढ़िया तकनीक विदेशो में बनती है और बाद में भारत आती है। लेकिन देविता ने इस प्रक्रिया को ही बदल कर रख दिया है। आज उनकी कंपनी द्वारा बनाई गई टीवी विदेशो में भी धूम मचा रही है।

देविता मुंबई की रहने वाली हैं। इनके पिता राजकुमार श्रॉफ जेनिथ कंप्यूटर के चेयरमैन हैं। देविता मानती हैं कि उनके अंदर जो भी बिज़नेस स्किल्स है वो उनके दादा जी से आये हैं। मुंबई से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त कर देविता आगे की पढाई के लिए विदेश चली गईं। वहां से बीबीए की डिग्री हासिल कर जब वे भारत आईं तो उन्होंने अपने पिता की कंपनी ज्वाइन की। साल 2006 में जब टेक्नोलोजी का तेज़ी से विकास हो रहा था और बाहरी कंपनियां मोबाइल और कम्प्यूटर के बीच के फर्क को मिटाने में लगी थी, तब देविता ने कुछ नया करने की ठानी। और उन्होंने इसके लिए टीवी को चुना। इस कड़ी में उन्होंने VU टेक्नोलॉजीज नाम से लक्ज़री टेलीविज़न की रेंज निकाली जोकि टीवी और सीपीयू का मिला-जुला रूप है। यह टीवी वाटरप्रूफ, डिजिटल फोटोफ्रेम के साथ ही टचस्क्रीन से युक्त है। इन टीवी पर हॉटस्टार और यूट्यूब जैसे ऐप भी आसानी से चलाये जा सकते हैं। साथ ही इनकी कंपनी एंड्राइड पर चलने वाले हाई डेफिनिशन टीवी भी बनाती है। बड़ी स्क्रीन के अलावा इनके पास कॉर्पोरेट यूज़ के टीवी भी हैं। देविता बताती हैं कि इनकी कंपनी की कुल सेल में करीब 40 फ़ीसदी कॉर्पोरेट टीवी बिकते हैं।

शुरू में कंपनी चलने में देविता को थोड़ी दिक्कतें आयी लेकिन बाद में कंपनी ने तेज़ी पकड़ी। 2015 -16 में वीयू टेक्नोलॉजीज ने लगभग 2 लाख टीवी बेचे, जिसका रेवेनुए 275. 8 करोड़ रहा। वर्तमान में लगभग 1 मिलियन से अधिक टीवी बिक चुके हैं और इनका टर्नओवर करीब 540 पहुंच गया है। आज पूरे भारत में इनके 10 लाख से अधिक कस्टमर हैं और 60 देशो में इनके टीवी धूम मचा रही है।


देविता का मानना है कि जो भी काम करो बड़ा करो। जब वे बिज़नेस के सिलसिले में किसी डीलर से मिलती थी तो लोग उन्हें काफी छोटा मानते थे क्यूंकि वे मात्र 24 वर्ष की थी। शुरू में लोगो को उनपर विश्वास करने में समय लगा लेकिन देविता ने उनकी बातों को नज़रअंदाज़ कर बस आगे बढ़ना ही ज़रूरी समझा। उनकी तरक्की के साथ लोगो की सोच भी बदलती चली गयी।

इनकी कंपनी ने हाल ही में 3 नए ज़माने के टीवी लांच किये हैं जिनका नाम पोपसमार्ट, ऑफिस समार्ट और प्रीमियम स्मार्ट है। 2016 में देविता को अपने बेहतरीन कार्यो के लिए बिज़नेस वीमेन ऑफ़ द ईयर का अवार्ड भी मिला है।

इतनी कम उम्र में बिज़नेस की बारीकियों को सीखते हुए देविता ने सफलता का जो कीर्तिमान स्थापित किया है, वह वाकई बेहद प्रेरणादायक है।

लेख साभार: 


by Mitali Saxena10/5/2017




Wednesday, September 27, 2017

Tuesday, September 26, 2017

भारत के सौरव कोठारी ने पूर्व विश्व चैंपियन को हराकर जीता स्वर्ण पदक






कोठारी का क्यूस्पोर्ट में इस साल यह पहला खिताब है, जिसे जीतने के लिए उन्होंने धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया।

एशगाबात (तुर्कमेनिस्तान), पीटीआइ। भारत के बिलियर्ड्स खिलाड़ी सौरव कोठारी ने एशियन इंडोर खेलों में पूर्व वर्ल्ड बिलियर्ड चैंपियन थाईलैंड प्राप्रुत चैतानासकुन को 3-1 से पराजित कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। कोठारी का क्यूस्पोर्ट में इस साल यह पहला खिताब है, जिसे जीतने के लिए उन्होंने धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया। 

कोठारी ने पहले दो फ्रेम 100-80 और 101-0 से जीते। लेकिन प्राप्रुत ने तीसरा फ्रेम 101-29 से अपने नाम किया। चौथे फ्रेम में प्राप्रुत की गलती का फायदा उठाते हुए कोठारी ने 101-88 से बाजी मारकर मैच जीत लिया।

कोठारी ने तीसरे गेम में अच्छा मौका गंवाया और प्राप्रुत को जीतने का अवसर उपलब्ध कराया, जिसकी मदद से वह लगातार 57 अंक लेने में सफल रहे और इस गेम को उन्होंने 101-29 से अपने नाम किया। 

इसके बाद कोठारी ऑफ गार्ड पाए गए और प्राप्रुत के अच्छा खेल दिखाने से उनपर दबाव आ गया। प्राप्रुत ने अच्छी शुरुआत की लेकिन चौथे गेम में दोनों खिलाड़ियों ने मौके गंवाने का काम किया। प्राप्रुत के पास चौथे गेम को जीतकर मैच को अगले गेम में ले जाने का मौका था, लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित गलती करते हुए कोठारी को जीत सौंप दी। इसके बाद कोठारी ने शांत स्वभाव दिखाते हुए इस गेम को 101-88 से अपने नाम किया और स्वर्ण पदक भी जीत लिया। 

साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, September 13, 2017

ASHA KHEMKA - BUSINESS WOMEN OF THE YEAR - आशा खेमका


नहीं आती थी अंग्रेजी, आज बिहार की इस बेटी को पूरी दुनिया कर रही सलाम

बिहार के सीतामढ़ी की रहनेवाली आशा खेमका को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित बिजनेस वूमेन पुरस्कार से नवाजा गया है। आशा की शादी 15 साल की आयु में ही हो गई थी। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी।

बिहार की एक बेटी ने दुनिया में फिर से राज्य का नाम रौशन किया है। सीतामढ़ी की रहनेवाली भारतीय मूल की महिला शिक्षाविद् को ब्रिटेन का प्रतिष्ठित एशियन बिजनेस वूमेन पुरस्कार दिया गया है। 65 वर्षीय आशा को शुक्रवार को यहां एक समारोह में सम्मानित किया गया।

इससे पहले बिहार के सीतामढ़ी में जन्मीं आशा वर्ष 2013 में ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर' का सम्मान भी पा चुकी हैं। इससे पूर्व भारतीय मूल की धार स्टेट की महारानी लक्ष्मी देवी बाई साहिबा को 1931 में डेम पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

नहीं आती थी अंग्रेजी

सीतामढ़ी की रहने वाली आशा खेमका का अंग्रेजी से कोई सरोकार नहीं रहा था। आशा खेमका की सफलता की कहानी भी काफी दिलचस्प है। शादी के बाद आशा जब ब्रिटेन गईं, तो उसे अंग्रेजी तक नहीं आती थी। लेकिन अाशा ने हार नहीं मानी और अंग्रेजी की पढ़ाई शुरु कर दी।

इसके बाद फिर क्या था खेमका ने जज्बे के दम पर अंग्रेजी को अपने वश में कर लिया।लेकिन उसने अपनी काबिलियत से अपना यह मुकाम तय किया है। 65वर्षीय आशा को शुक्रवार को यह पुरस्कार दिया गया है। आशा खेमका ब्रिटेन के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज की प्रिंसिपल हैं।

दिलचस्प रहा है सफलता का सफर

आशा 13 वर्ष की कम उम्र में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। 15 साल की उम्र में आशा की शादी डॉक्टर शंकर अग्रवाल से हो गयी। घर परिवार वालों ने उसकी शादी कर दी। शादी के बाद घर परिवार संभालते 25 की उम्र में वो ससुराल पहुंच गयी।

डॉक्टर पति ने इस बीच इंगलैंड में अपनी नौकरी पक्की कर ली थी। फिर वो अपने पति के पास अपने बच्चों के साथ ब्रिटेन पहुंचीं। अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं होने के कारण उसे काफी परेशानी होती थी। तब आशा ने टीवी पर बच्चों के लिए आने वाले शो को देख अंग्रेजी सीखने शुरू किया।

टूटी-फूटी अंग्रेजी से पाया अंग्रेजी पर फतह

शुरुआत में टूटी-फूटी अंग्रेजी में ही सही, साथी युवा महिलाओं से बात करती थीं। लेकिन वो इससे परेशान नहीं होती और फिर वो हर दिन आगे बढ़ती गयी। इससे उसका आत्मविश्र्वास बढ़ता गया।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों बाद कैड्रिफ विवि से बिजनेस मैनजमेंट की डिग्री ली और ब्रिटेन के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज में व्याख्याता के पद पर योगदान दिया। अब वो इसी कॉलेज की प्रिसिंपल हैं।


यह विश्वास करना कि इतनी कम शिक्षा के बावजूद कोई कैसे ऐसी सफलता हासिल कर सकता है आसान नहीं है लेकिन आशा खेमका की कहानी ही इस सवाल का जवाब है। आशा सीतामढ़ी बिहार की निवासी हैं। पुराने ज़माने में ग्रामीण इलाकों में जब लड़कियों का मासिक-धर्म शुरू होता था, तब उन्हें उनके माता-पिता स्कूल से निकाल दिया करते थे। आशा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। तेरह वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ देने के बाद उनकी शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में एक 19 वर्षीय लड़के के साथ कर दी गई। उनके पति शंकर खेमका उस समय एक मेडिकल के विद्यार्थी थे। 25 वर्ष की उम्र में वे अपने बच्चों और पति के साथ इंग्लैंड चली गईं। यह परिवर्तन उनके लिए बहुत बड़ा था। कुछ समय के बाद वे उस माहौल में ढलने सी लगी।

वे अपने बच्चों के साथ किड्स शो देखती और कुछ-कुछ अंग्रेजी समझने का प्रयास करती। अपनी स्पोकन स्किल को बढ़ाने के लिए साहस जुटाकर वे दूसरे बच्चों की माताओं से अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करतीं। लगातार कोशिश और अंग्रेजी सीखने का उनका हठ ही उनके बदलाव का कारण बना। कुछ सालों में आशा धारा-प्रवाह अंग्रेजी बोलने लगी। बाद में जब उनके बच्चे स्कूल जाने लगे तब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे भी आगे पढ़ाई करेंगी। उन्होंने बिज़नेस डिग्री के लिए कार्डिफ यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया।

आशा एक शिक्षाविद बनीं और वे व्याख्याता के तौर पर काम करने लगीं। साल 2006 में आशा ने वेस्ट नोटिंघमशायर कॉलेज, जो यूके का जाना-माना कॉलेज है, में प्रिंसिपल और सीईओ का पद संभाला। 2008 में डेम आशा ने द इंस्पायर एंड अचीव फाउंडेशन की स्थापना की। इसके द्वारा, जिन्होंने कोई भी शिक्षा या ट्रेनिंग नहीं ली है ऐसे युवा लोगों के जीवन को संवारने का प्रयास किया जाता है और लोगों की जरूरत के हिसाब से स्पेशल वॉकेशनल प्रोग्राम बना कर हजारों लोगों की मदद भी करता है।

69 वर्षीय आशा खेमका को 2013 में उनके काम के लिए ब्रिटेन टॉप सिविलियन अवार्ड से सम्मानित किया गया। उसी साल उन्होंने प्रतिष्ठित बिज़नेस वुमन का ख़िताब भी जीता। खेमका ने बच्चों के टेलीविज़न शो के जरिये और दूसरी माताओं के साथ बातचीत कर अपनी अंग्रेजी सुधारी। उन्हें कोई भी अवसर आसानी से नहीं मिला परन्तु उन्होंने अपने रास्तों में आए सारे अवसरों को अपना बना लिया।

साभार: दैनिक जागरण, केन फोलिओस  हिंदी.



AJAY AGRAWAL - MAX MOBILE - अजय अग्रवाल मैक्स

9वीं फैल होने के बाद छोड़ी पढ़ाई, शुरू किया कारोबार, 10 वर्ष के भीतर ही बना ली 1500 करोड़ की कंपनी


ब्रांड का नाम तभी बड़ा होता है जब उसके प्रचार के लिए बड़े से बड़े लोकप्रिय चेहरों का इस्तेमाल किया जाए। जब महेंद्र सिंह धोनी ने साल 2009 में मैक्स मोबाईल के साथ करार कर उनके ब्रांड एम्बेसडर बने तब सभी लोग जान गए कि वे प्रोडक्ट की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित होकर रहेंगे। टी-20 विश्व कप के दौरान इसका प्रचार -प्रसार इतना जोर-शोर से हुआ कि यह सभी की नजरों में आ गया और उसकी बिक्री में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई जैसा कि अजय अग्रवाल चाहते थे। परन्तु इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए उन्होंने बिज़नेस की फील्ड में महारत हासिल की।



मैक्स मोबाइल के संस्थापक और प्रबंध निदेशक अजय अग्रवाल आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने चौदह वर्ष की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। चिल्ड्रन अकादमी स्कूल में पढ़ते हुए जब वे नवमीं कक्षा में फेल हो गए तब उन्होंने इस औपचारिक शिक्षा प्रणाली को छोड़ने का तय किया। बाद में वे मुंबई स्थित अपने पिता के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेड बिज़नेस के साथ काम करने लगे। इसलिए नहीं कि कोई आर्थिक संकट था या परिस्थितियों के दबाव में आकर, बल्कि अजय को बिज़नेस से लगाव था और वे अपना पूरा समय इसे देना चाहते थे।


वे अपने पिता के बिज़नेस में एकाउंट्स सँभालते थे और उन्हें इसके लिए महीने में 4000-5000 रूपये दिए जाते थे। वे समझते थे कि आज के तकनीकी क्रांति के समय वे अपने पिता की मदद करें और उनके बिज़नेस को बढ़ाने के लिए म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स, मोबाइल फ़ोन एक्सेसरीज, गैजेट्स आदि की शुरुआत करें। बिज़नेस को सीखने और समझने के लिए उन्होंने मलेशिया और चीन का दौरा भी किया।

2004 में अजय ने यह निश्चय किया कि वे उत्पादन के क्षेत्र में हाथ आज़माएंगे और उन्होंने मोबाइल एक्सेसरीज जैसे चार्जर, बैटरीज, इयरफोन आदि का उत्पादन करना शुरू किया। पहले साल उनकी कमाई पाँच लाख रूपये हुई जो अजय को यह महसूस कराने के लिए काफ़ी था कि इस इंडस्ट्री में क्षमता और अवसर दोनों हैं। उन्होंने अपनी सारी बचत, लाभ और अपने दोस्तों, परिवार वालों और पिता से उधार लेकर बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया। 2006 में उनका लाभ 50 करोड़ रूपये था। सभी के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि उन्होंने दो वर्ष के भीतर ही 5 लाख रूपये से 50 करोड़ बना लिए।

उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया कि वे मोबाइल फ़ोन का उत्पादन शुरू करेंगे और उन्होंने 2008 में मैक्स मोबाइल की नींव रखी। उस समय बहुत कम हीभारतीय इस उद्योग में थे। शुरू के 6 महीने उन्होंने अपने वितरण चैनल्स और ग्राहकों से फीडबैक लेने में लगा दिया। इस फीडबैक के आधार पर उन्होंने अगले 6 महीनों में मोबाइल के 20 मॉडल्स बाजार में उतारे। उन्होंने दो सिम स्लॉट वाले फ़ोन लांच किये जो उस समय नया-नया था। यह लोगों के बीच बहुत ही लोकप्रिय रहा।


बिज़नेस करते-करते उन्होंने यह सीखा कि अगर उसमें उपयोग के सामान की कीमत कम हो जाये तो लाभ ज्यादा मिलेगा। शुरू में 95% पुर्जा आयात किया जाता था पर धीरे-धीरे वे देश के भीतर ही इन सामानों को खरीदने लगे और बाद में तो अजय लगभग 50% पुर्जों का उत्पादन खुद ही करने लगे। अजय ने अपनी पहली फैक्ट्री मुंबई में शुरू की, उसके बाद उन्होंने हरिद्वार में खोली और उनकी तीसरी फैक्ट्री 2009 में फिर से मुंबई में ही शुरू की। धीरे -धीरे पूरे भारतीय बाज़ार में उन्होंने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। अब इनके उत्पाद की बिक्री भारतीय उप महाद्वीप, दक्षिण एशिया और अफ्रीका में भी शुरू हो गई। अब वे भारतीय बाज़ार के धुरंधर खिलाड़ी बन चुके हैं। उनके फ़ोन की 80% बिक्री उनके फीचर फ़ोन की वजह से हुई है।

मैक्स मोबाइल को उस व्यक्ति ने ईजाद किया जो हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली के पैमाने पर दसवीं कक्षा में पढ़ने के काबिल नहीं थे। उनका लगाव बिज़नेस से था और वे उससे ज्यादा लाभ कमाना चाहते थे और उन्होंने यह कर दिखाया। अजय की कंपनी का यह विश्वास है कि 2017 के अंत तक उनका टर्न-ओवर 1500 करोड़ रूपये का हो जायेगा।

साभार: ntnews 


http://ntinews.com/9th-class-failure-made-1500-crore-business-empire

Tuesday, September 12, 2017

RITU MAHESHWARI IAS - देश में अरबों रुपयों की बिजली चोरी रोकने का रास्ता दे गई यह महिला आईएएस


गाजियाबाद की डीएम रितु माहेश्वरी।

देश में हर साल करीब 64,000 करोड़ रुपये की बिजली चोरी हो जाती है। रितु माहेश्वरी नाम की एक महिला नौकरशाह सरकारी खजाने को हो रहा इतना बड़ा नुकसान रोकने में दिलोजान से जुट गईं। साल 2011 में उनकी नियुक्ती कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाइ कंपनी में हुई। तब से उन्होंने कंपनी के एक तिहाई ग्राहकों के यहां नए स्मार्ट मीटर लगा दिए। ये मीटर बिजली खपत को डिजिटली रिकॉर्ड करते हैं जिससे बिजली वितरण प्रणाली में पल-पल हो रहे घपले उजागर हो रहे हैं। लेकिन, महज 11 महीने के बाद ही उनका ट्रांसफर गाजियाबाद हो गया।

पिछले छह साल से भ्रष्टाचार और स्त्रि विरोधी माहौल के खिलाफ जंग लड़ रही 39 साल की रितु बड़े पैमाने पर हो रही बिजली चोरी को रोकने के लिए टेक्नॉलजी की जरूरत पर जोर दे रही हैं। कुछ दिनों पहले तक वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को घाटे से उबारकर करोड़ों घरों, किसानों और फैक्ट्रियों को लगातार बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिशों को बल दे रही थीं।

उन्होंने बताया, 'मैंने बिजली चोरी करनेवाले ग्राहकों के विरोध के बावजूद 5 लाख में से 1 लाख 60 हजार मीटर बदल दिए। इससे शहर (कानपुर) में बिजली चोरी की घटना बहुत कम हो गई जो पहले 30 प्रतिशत थी।' बिजली मंत्रालय की वेबसाइट से पता चलता है कि रितु की रणनीति से कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाइ कंपनी या केस्को का वितरण घाटा आधा होकर 15.6 प्रतिशत पर आ गिरा।

बिजली चोरी के खिलाफ अभियान छेड़ने का नतीजा यह हुआ कि रितु बड़े-बड़े लोगों की नजरों में चढ़ गईं। कुछ नेता उनके दफ्तर में आकर धमकियां देने लगे। यहां तक कि उनके अपने ही स्टाफ बिजली चोरी की जांच की योजना पहले ही लीक कर देते थे। इससे बिजली चोर सर्च टीम के पहुंचने से पहले ही अवैध कनेक्शन उतार लेते।

उन्होंने कहा, 'जो कदम उठाए जा रहे थे, उससे छोटे-बड़े स्टाफ सारे स्टाफ खुश नहीं थे, वह चाहे नए मीटर लगाने की बात हो या छापेमारी की। हमारे लोग ही बिजली चोरों को राज बता देते थे।' रितु माहेश्वरी कहती हैं, 'लोगों को लगता था कि मुझे इसलिए आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है या बहकाया जा सकता है क्योंकि उनकी नजर में एक महिला को बिजली और जटिल ग्रीड्स के बारे में कुछ पता नहीं होता।'

साल 2000 में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने 2003 में आईएएस जॉइन कर ली। जुलाई 2017 तक वह केंद्र सरकार के बिजली मंत्रालय के अधीन ग्रामीण विद्युतीकरण निगम की कार्यकारी निदेशक रहीं। इस दौरान वह उस कार्यक्रम से जुड़ी रहीं जिसका मकसद अन्य माध्यमों के साथ-साथ तकनीक के इस्तेमाल से साल 2019 तक कुल टेक्निकल और कमर्शल लॉस घटाकर औसतन 15 प्रतिशत पर लाना है, ताकि बिजली वितरण कंपनियों को घाटे से उबारा जा सके। पिछले सप्ताह उन्हें गाजियाबाद का डीएम बना दिया गया है। रितु कहती हैं, 'अगला दो साल बहुत महत्वूर्ण है क्योंकि कई राज्यों को मौजूदा कमजोर मीटरिंग व्यवस्था से स्मार्ट मीटरिंग सिस्टम में शिफ्ट होना है।'

गौरतलब है कि बिजली वितरण कंपनियां और सरकारें डिजिटाइजेशन पर जोर दे रही हैं। नई दिल्ली में बिजली वितरण करनेवाली कंपनी टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लि. मार्च 2018 से एक साल के अंदर 2.5 लाख स्मार्ट मीटर लगाएगा। कंपनी का लक्ष्य 2015 तक 18 लाख घरों में स्मार्ट मीटर लगाने का है। इधर, सरकार ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लिए 50 लाख स्मार्ट मीटर खरीदने का पहला टेंडर निकल चुका है। देश में ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम संचालित करने की जिम्मेदारी वाली सराकारी एजेंसी एनर्जी एफिशंसी सर्विसेज लि. स्मार्ट मीटर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोलियां मंगवाने जा रही है।

दरअसल, मोदी सरकार पांच सालों में पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन इंडस्ट्री में करीब 3 लाख 30 हजार करोड़ रुपये निवेश करने पर विचार कर रही है। बिजली उपकरण बनानेवाली फ्रांसीसी कंपनी की भारतीय यूनिट स्नेइडर इलेक्ट्रिक के मुताबिक, भारत में अब तक कुल बिजली खपत के महज 10 प्रतिशत हिस्से का ही डिजिटाइजेशन हो पाया है। कंपनी के वाइस प्रेजिडेंट और एमडी प्रकाश चंद्राकर ने कहा, 'एक राज्य बिजली वितरण कंपनी ने मुझसे कहा कि ग्रामीण इलाकों में उनका ट्रांसमिशन और कमर्शल लॉस 25 से 30 प्रतिशत है, जिसमें 1 प्रतिशत की भी कटौती हो जाए तो उनका करीब 12 हजार करोड़ रुपये बच सकता है।' 

साभार: नवभारत टाइम्स 


वैश्य समाचार



साभार: दैनिक भास्कर सूरत 

RITU JAYASWAL - ऋतू जायसवाल - वैश्य गौरव



साभार: दैनिक जागरण 

Wednesday, August 30, 2017

साकेत मोदी, सायबर सिक्यूरिटी प्रोवाइडर



बात दो साल पहले की है। सीआईआई में सायबर सिक्युरिटी पर एक काॅन्फ्रेंस थी और उसमें सबसे कम उम्र के स्पीकर थे, साकेत मोदी। आज साकेत मोदी ही वह शख्स हैं, जो कई बैंकों को सायबर सिक्युरिटी प्रदान करते हैं। आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा, स्टेन्डर्ड चार्टर्ड बैंक, टाटा स्काय, इंडिगो के अलावा उनकी बनाई कंपनी केंद्रीय गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, कंपनी मामले और रक्षा मंत्रालय को भी वे ही सायबर सिक्युरिटी प्रदान करती हैं।

नेशनल पेमेंट काॅर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) का उनके बिना काम नहीं चलता है। एनपीसीआई के रिस्क मैनेजमेंट प्रमुख भारत पांचाल कहते हैं कि इतनी कम उम्र में साकेत मोदी के पास जो नॉलेज है, वह आज तक उनके देखने में नहीं आया। एनपीसीए को रिजर्व बैंक ने ही स्थापित किया है, जो देश में रिटेल पेमेंट सिस्टम की जिम्मेदारी संभालता है और उसने यह जिम्मेदारी साकेत की कंपनी ल्यूसिडस को सौंपी है।

साकेत का बचपन कोलकाता में बीता। पिता की वहां पर एप्टेक की फ्रैंचाइजी है। वहां लक्ष्मीपंत सिंघानिया एकेडमी में पढ़ते हुए साकेत कभी भी दूसरे सब्जेक्ट में पास नहीं हो पाते थे, लेकिन मैथ्स और फिजिक्स में हमेशा टॉप करते थे। जियोग्राफी और कैमेस्ट्री के कारण हमेशा ही परेशान रहते थे। कंप्यूटर में रुझान इतना था कि दिनभर उस पर बिताया करते थे। धीरे-धीरे कंप्यूटर हैक करना सीख गए। कैमिस्ट्री कमजोर थी, तो एग्जाम से पहले स्कूल का कंप्यूटर हैक कर लिया और कैमिस्ट्री का पेपर मिल गया, लेकिन जो संस्कार घर पर मिले, उसके चलते स्कूल में बता दिया कि कंप्यूटर हैक कर कैमिस्ट्री का पेपर पता कर लिया है। लिहाजा स्कूल वालों ने साकेत को माफ कर दिया और नया पेपर सैट कर दिया। जहां तक खेल की बात है तो टेबल टेनिस और शतरंज दोनों में नेशनल्स खेल चुके हैं। रुचि कंप्यूटर में थी, तो पढ़ना भी कंप्यूटर ही था, लिहाजा जयपुर के एलएन मित्तल कॉलेज में एडमिशन मिला और वहां से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया। पढ़ाई के दौरान ही वे देशभर के कॉलेजों में सायबर सिक्युरिटी के लिए ट्रेनिंग देने जाते थे। देखते ही देखते उनका नाम एथिकल हैकर के रूप में आने लगा। कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने में साल भर बचा था, तभी 2012 में उन्होंने सायबर सिक्युरिटी और हैंकिंग से बचाने के लिए अपनी कंपनी शुरू कर दी। वे बताते हैं कि मैंने कभी इस फील्ड को प्लान नहीं किया, बस होते चला गया। मेरा एक बैण्ड भी है, जिसमें हम लोग बजाते भी हैं, मेरी पियानो में रुचि है। भारत में जब भी होता हूं तो अपने रूम में रखा पियानो जरूर बजाता हूं।

साभार: Bhaskar News Network 













Tuesday, August 29, 2017

DHRUV GARG - ध्रुव गर्ग - आइंस्टीन से भी तेज इस भारतीय बच्चे का दिमाग


ब्रिटेन में रह रहे भारतीय मूल के 13 वर्षीय छात्र ध्रुव गर्ग ने लंदन में आयोजित मेन्सा आईक्‍यू टेस्‍ट में सर्वाधिक संभव अंक प्राप्‍त किए हैं। उसे इस टेस्ट में 162 अंक मिले जो महान वैज्ञानिक आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंस से भी ज्यादा है। हालांकि आइंस्टीन और हॉकिंस ने कभी आईक्यू टेस्ट नहीं दिया, लेकिन उनका अनुमानित आईक्यू लेवल 160 माना जाता है। इस उपलब्धि के साथ ध्रुव ने दुनिया के सबसे तेज दिमाग वाले शार्ष एक फीसदी लोगों में अपनी जगह बना ली है। वह इस साल मेन्सा आईक्‍यू टेस्‍ट में सबसे ज्यादा अंक पाने वाला प्रतिभागी है। मेन्सा की सदस्यता उन्हीं को मिलती है जो इसके तय इंटेलिजेंस टेस्ट में उच्च दो फीसदी का स्कोर हासिल करते हैं। इस टेस्ट में कुल 150 प्रश्न होते हैं।

‘कल्‍चर फेयर स्‍केल’ में भी अव्वल

दक्षिण पूर्व इंग्लैंड के वकिंगघम में रहने वाला ध्रुव गर्मी की छुट्टियों के दौरान बोरियत से बचने और अपना समय बिताने का विकल्प तलाश रहा था, तभी उसने फैसला किया कि वह मेन्सा के इस बौद्धिक समाज में शामिल होने की कोशिश करेगा। इसके बाद उसने इस टेस्ट के लिए आवेदन किया और मेन्सा में सर्वोच्च अंक हासिल कर सबको चकित कर दिया। इसके अलावा उसने एक दूसरे टेस्ट ‘कल्‍चर फेयर स्‍केल’ में 152 अंक प्राप्‍त किए जो इस साल सर्वाधिक है। मेन्सा में सर्वोच्च अंक पाने के बाद ध्रुव ने कहा, ‘मैं टेस्ट के परिणाम से हैरान हूं। गर्मी की छुट्टियों में कुछ अलग करने की चाह में मैंने यह टेस्ट दिया था लेकिन ऐसे नतीजे की कल्पना नहीं की थी।’

अकेलेपन के शिकार लोगों के लिए बना रहा एप

ध्रुव सामाजिक रूप से अलग-थलग हुए अकेलेपन के शिकार लोगों के लिए एक एप बना रहा है जिससे उनकी तन्हाई और सामाजिक अकेलेपन को दूर किया जा सके। इस एप की मदद से एक क्षेत्र में रहने वाले लोग नए लोगों से मिलना पसंद करेंगे और आपस में जुड़ सकेंगे। ध्रुव की मां दिव्‍या ने कहा कि पूरे परिवार को उस पर गर्व है क्योंकि वह समाज के लिए कुछ करना चाहता है। 

100 सेकेंड में रयूबिक क्‍यूब सॉल्व

ध्रुव का पसंदीदा विषय मैथ्सऔर केमिस्‍ट्री है। क्रिकेट और टेबल टेनिस खेलने का शौकीन ध्रुव किताबें और साइंस जर्नल पढ़ना पसंद करता है। वह पहेलियों को आसानी से हल कर लेता है और कोडिंग का उस्ताद है। उसका दिमाग इतना तेज है कि 100 सेकेंड के भीतर ही रयूबिक क्‍यूब को पूरी (सॉल्व) कर लेता है। 

साभार: हिन्दुस्तान लाइव 

Tuesday, August 1, 2017

Thursday, July 27, 2017

SUSHEEL KUMAR MODI - सुशील कुमार मोदी


बिहार के उप मुख्यमंत्री

सुशील कुमार मोदी (जन्म 5 जनवरी 1952) भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिज्ञ और बिहार के तीसरे उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। वे बिहार के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं।

शुरुआती जीवन

मोदी का जन्म 5 जनवरी 1952 को एक वैश्य मारवाड़ी परिवार में पटना में हुआ था। इनके माता का नाम रत्ना देवी तथा पिता का नाम मोती लाल मोदी था। इनका विद्यालय जीवन पटना के सेंट माइकल स्कूल में हुई। इसके बाद इन्होने बी.एस.सी. की डिग्री बी.एन. कॉलेज, पटना से प्राप्त की। बाद में इन्होने एम.एस.सी. का कोर्स छोड़ दिया और जय प्रकाश नारायण द्वारा चलाये गए आंदोलन में कूद पड़े।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ

भारत-चीन युद्ध, 1962 के दौरान मोदी खासे सक्रिय थे और आम नागरिकों को शारीरिक फिटनेस व परेड आदि का प्रशिक्षण देने के लिये सिविल डिफेंस के कमांडेंट नियुक्त किये गये थे। उसी साल नौजवान सुशील ने आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता ज्वाइन की। 1968 में उन्होंने आरएसएस का उच्चतम प्रशिक्षण यानी अधिकारी प्रशिक्षण कोर्स ज्वाइन किया जो तीन साल का होता है। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आरएसएस के विस्तारक (पूर्ण कालिक वर्कर) की भूमिका में दानापुर व खगौल में काम किया और कई स्थानों पर आरएसएश की शाखाएं शुरु करवायीं। बाद में उन्हें पटना शहर के संध्या शाखा का इंचार्ज भी बनाया गया। मोदी के परिवार का रेडीमेड वस्त्रों का पारिवारिक कारोबार था और घर वाले चाहते थे कि वे कारोबार संभालें, लेकिन उन्होंने इस इच्छा के विपरीत जाकर सेवा का रास्ता चुना।

Wednesday, July 19, 2017

ARPAN DOSHI - ब्रिटेन में सबसे कम उम्र का डॉक्टर बना भारतीय



भारतीय मूल के डॉक्टर अर्पण दोषी उत्तर-पूर्वी इंग्लैंड के यॉर्क टीचिंग हॉस्पिटल में जूनियर डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस शुरू करेंगे।

लंदन, प्रेट्र : भारतीय मूल के डॉक्टर अर्पण दोषी उत्तर-पूर्वी इंग्लैंड के यॉर्क टीचिंग हॉस्पिटल में जूनियर डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस शुरू करेंगे। यह प्रैक्टिस दो साल तक चलेगी। माना जा रहा है कि वे ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के डॉक्टर हैं।शेफील्ड यूनिवर्सिटी से अर्पण ने सोमवार को 21 साल और 335 दिन की उम्र में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की। इससे पहले रसेल फेहिल सबसे कम उम्र के डॉक्टर के रूप में मशहूर थे। लेकिन, अर्पण ने उनसे 17 दिन कम उम्र में डिग्री ली है।

अर्पण कहते हैं कि मैं हमेशा से डॉक्टर बनना चाहता था। मुझे पढ़ाई के दौरान उम्र को लेकर किसी तरह की कोई परेशानी नहीं आई। मानव शरीर आखिर काम कैसे करता है, इसे बारे में मैं बचपन में अक्सर सोचता था। डॉक्टर बनकर दूसरों की मदद करने की भी सोच थी।साल 2009 में अर्पण भारत से फ्रांस चले गए, जहां उनके पिता को परमाणु परियोजना में नौकरी मिली। वहां उन्होंने स्थानीय विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया।

16 साल की उम्र में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा पास की। यह परीक्षा फ्रांस में ही ली गई थी। इसमें उन्हें भौतिकी, रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र, गणित, अंग्रेजी और हिंदी की परीक्षा पास करनी पड़ी। प्रवेश परीक्षा में उन्हें 45 में से 41 अंक प्राप्त हुए थे जिसके बाद शेफील्ड यूनिवर्सिटी ने 13 हजार पाउंड की स्कॉलरशिप प्रदान की। भारत लौट चुके अपने माता-पिता के बारे में वे कहते हैं कि उनको मुझ पर गर्व है। उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया है।

साभार:  jagran.com/news/world-indian-made-youngest-doctor-in-britain-16401274.htmlI

9 Things You Will Relate To If You Are Getting Married To A Marwari



Big pockets and humble hearts, the Marwari culture is one of its own kind. These people love to live colourful lives. Traditional and deeply rooted, Marwaris are amongst the most vibrant people on this planet. If you are getting married to a Marwari, you will be able to relate to these situations very well.

Alcohol is not their cup of tea. Well, we know that your empty glass must be weeping, but this is the hard truth. Do not worry though, they have so many amazing non-alcoholic drinks to offer that you won’t even miss your booze.

#2. Food festival

GIF via Giphy

Marwaris are die-hard foodies and all their get togethers, especially the weddings, are a living proof of that. Dal baati churma, gatte and kadhi, their buffets are the most lavish ones; so you better work on your appetite! Despite non-vegetarian food being a strict no, their feasts are great.

#3. Sangeet or dance competition

GIF via Bollypop

Marwaris are very particular about their sangeet. They will hire the best choreographers, set up the best stage and call the best DJ for the sangeet. We are sure that you must have been mesmerised by their breathtaking performances.

#4. Culture 

Marwari culture is full of colours. Whether it is the food, the decorations, the clothes or the drinks, everything is inspired by colourful confetti. Your life will never be dull as your dresses will always include lots of sparkle.

#5. You will be pampered like crazy

Image: Instagram

Marwaris love to pamper their bahus and damads. You will be put on a pedestal and pampered like a VIP. Only the best of the best is served to you because you are special for them.

#6. You will put on weight

GIF via Tumblr

We do not want to scare you, but all the amazing food and pampering will make you put on weight. Sweets will be shoved in your mouth along with other delicious things. All this will be done with a big smile that you would not be able to deny. So, get your sweatpants ready.

#7. Wedding planning is serious

Image: Love Breakups Zindagi

Marwaris are known for their big fat Indian weddings. The weddings that they organise are nothing short than carnivals. We are sure that you must have been a part of numerous discussions related to the decor and catering.

#8. Money is honey

Image: Tribhovandas Bhimji Zaveri TVC

If you are getting married to a Marwari, you will be showered with money. A major part of the gifts given to you will be hard cash. And if not money, it will be jewellery because the motive of giving gifts is investment.

#9. Keep up with your knowledge

Image: Swaragini

Marwaris are not just about food, clothes and weddings, they are actually very smart people. Their knowledge on politics, economics and general affairs is commendable. You will have to do some homework because you are in for a lot of intelligent debates.

If you are getting married to a Marwari, you are in for a roller coaster ride. You are going to enjoy each and every moment of your life from now onwards. Just embrace all the bling and you are good to go!

SABHAR: bollywoodshaadis.com/articles/things-you-will-relate-to-if-you-are-getting-married-to-a-marwari-6507,  By Ojasvee