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Saturday, January 17, 2026

CHANDRAGUPTA PRATHAM - A GREAT VAISHYA SAMRAT

CHANDRAGUPTA PRATHAM - A GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT 


चन्द्रगुप्त प्रथम वैश्य गुप्त साम्राज्य के तीसरे राजा थे। इनको महाराजाधिराज के नाम से भी जाना जाता है। इन्होने गुप्त साम्राज्य की शुरुआत 319 से 320 ई. के आसपास की थी। चन्द्रगुप्त प्रथम ने उत्तर भारत पर 320 ई. से 335 ई. तक शासन किया। चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है।

चन्द्रगुप्त प्रथम का संक्षिप्त परिचय

इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश के प्रथम स्वतंत्र शासक थे। गुप्त वंश को एक साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का श्रेय चन्द्रगुप्त प्रथम को ही जाता है।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों श्रीगुप्त और घटोत्कच की अपेक्षा चन्द्रगुप्त प्रथम की पदवी बड़ी है और उनके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। चन्द्रगुप्त प्रथम के समय के सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चन्द्रगुप्त प्रथम ने उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर शासन किया। उसके कारण गुप्त साम्राज्य का नाम पूरे भारत में प्रसिद्ध होने लगा। साथ ही साथ गुप्त साम्राज्य का दूसरे राज्यों के साथ पारिवारिक संबंध बनाकर चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य को मजबूत बनाया।

चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का तीसरा और प्रतापी राजा था जिसने ‘गुप्त सवंत’ (319-320 ईस्वी) की शुरुआत की थी। उसके पिता का नाम घटोत्कच था। सम्राट बनने के बाद उसने लिच्छवी राज्य के साथ पारिवारिक संबंध बनाया और खुद को ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि दी जो प्रायः एक उच्च शासक के लिए प्रयोग की जाती थी।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों की अपेक्षा उसकी पदवी बड़ी है और उसके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। उसके सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान उसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चन्द्रगुप्त प्रथम का वैवाहिक जीवन

चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी कुल की राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया। उस समय लिच्छवी वंश का शासन वैशाली (वर्तमान बिहार) में हुआ करता था, लिच्छवी वंश ने वैशाली जो की आज बिहार में है, पर लगभग 36 पीढ़ियों तक शासन किया। गुप्त वंश के लोगों ने इस विवाह को एक महत्वपूर्ण कड़ी समझी क्योंकि गुप्त वंश का हाल ही में उदय हुआ था जिसने एक मजबूत वंश के साथ संबंध बनाया था।

विवाह के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम कचा रखा गया था। कचा ने अपने राज्य की सीमाओं को समुद्र तट फैलाने के बाद अपना नाम बदलकर ‘समुद्रगुप्त’ रख लिया।

जिससे पता चलता है कि कचा ही समुद्रगुप्त था परंतु इस तथ्य के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। इस विवाह के उपरांत, गुप्त वंश का नाम प्रसिद्ध हो गया। उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने माता कुमार देवी व पिता चन्द्रगुप्त प्रथम की स्मृति में सोने के सिक्के जारी किये जिन पर उन दोनों की छवि बनी हुई है।

इन सिक्कों में एक तरफ चन्द्रगुप्त के साथ उसकी रानी कुमारदेवी का चित्र और नाम अंकित है और दूसरी ओर सिंह पर सवार देवी का चित्र तथा लिच्छिवी नाम लिखा है।

गुप्त वंशावलियों में समुद्रगुप्त को भी गर्व से ‘लिच्छिवियों की पुत्री का पुत्र’ कहा गया है, जबकि अन्य किसी शासक की माता के वंश का उल्लेख नहीं मिलता। इस आधार पर अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि चन्द्रगुप्त प्रथम और कुमारदेवी के विवाह का गुप्तों के उत्थान में विशेष महत्व था।

चन्द्रगुप्त प्रथम और कुमार देवी के वैवाहिक सम्बन्ध के बारे में अलग अलग इतिहासकारों का अपना अलग अलग मत है :के0 पी0 जायसवाल के मतानुसार गुप्तों ने लिच्छिवियों की सहायता से किसी क्षत्रिय राजा को पराजित कर मगध प्राप्त किया था। एलन के अनुसार लिच्छिवियों का वंश प्राचीन क्षत्रिय वंश था, जिसके सामाजिक और राजनैतिक रूप से सम्मानित होने के कारण गुप्तों को उनसे वैवाहिक सम्बन्ध होने पर गर्व हुआ होगा। इसी कारण वह बार-बार इस वैवाहिक सम्बन्ध का उल्लेख करते हैं।

विन्सेण्ट स्मिथ का कहना था कि चन्द्रगुप्त प्रथम की पत्नी के सम्बन्धियों का राज्य मगध और आस-पास के क्षेत्र पर था और इस विवाह के कारण चन्द्रगुप्त प्रथम राजसत्ता का उत्तराधिकारी बना।

परमेश्वरी लाल गुप्त का मानना था की लिच्छिवी नरेश पुत्रहीन मरे होंगे और पुत्र के अभाव में पुत्री तथा उसके पति को उनका राज्य प्राप्त हुआ होगा।

इतिहासकारों का मानना था की उस समय पुत्र न होने पर पुत्री के पुत्र को उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाता था। इस आधार पर लिच्छिवी के वैध उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त के वयस्क होने तक चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपनी रानी कुमारदेवी के साथ संयुक्त रूप से राज्य किया और समुद्रगुप्त के वयस्क होने पर उसे राज्य सौंप कर सन्यास ले लिया । इस प्रकार चन्द्र गुप्त प्रथम और कुमारदेवी के इस वैवाहिक सम्बन्ध से पूर्वी भारत के दो राज्यों का एकीकरण हुआ और चन्द्रगुप्त प्रथम को एक बड़ा साम्राज्य प्राप्त हुआ।

चन्द्रगुप्त प्रथम का शासन

चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. से 320 ई. के मध्य में राजतिलक होने के उपरांत गुप्त सवंत (319-320 ईस्वी) की शुरुआत की। परंतु अधिकतर इतिहासकारों का कहना है कि यह तथ्य कल्पना मात्र है जो यथार्थ सत्यता की पुष्टि नहीं करता। परन्तु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चन्द्रगुप्त प्रथम ने संभवतया एक लंबे समय तक उत्तर भारत पर राज किया।

उसने गुप्त साम्राज्य की सीमा को बढ़ाने के लिए बड़े कदम तो नहीं लिए, परंतु गुप्त वंश की प्रसिद्धि बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इलाहाबाद के अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त प्रथम जब अपनी बृद्धावस्था में चला गया था तब अपने पुत्र समुद्रगुप्त को राजगद्दी पर बैठा दिया। जिससे स्पष्ट रूप से यह साबित होता है कि चन्द्र गुप्त प्रथम ने काफी लंबे समय तक शासन किया था।

गुप्त संवत का प्रारम्भ

चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण और गुप्त अभिलेखों से प्राप्त साक्ष्यो के परस्पर मेल न खाने के कारण संवत के विषय में भी विद्वानों में काफी मतभेद हैं। फ्लीट का मानना है कि लिच्छिवियों के संवत को ही गुप्त वंश ने अपना लिया था और गुप्त संवत की शुरुआत हुई थी। परन्तु अधिकांश इतिहासकार इस संवत को गुप्त वंश का ही मानते हैं।

विन्सेन्ट स्मिथ का कहना है की चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण के समय से गुप्त संवत की शुरुआत हुई । अधिकांश इतिहासकार बाद की दो जनश्रुतियों जिनका उल्लेख जिनसेन के हरिवंशपुराण तथा अल्बरूनी के वर्णन में मिलता है, उसके आधार पर गुप्त संवत का आरम्भ मानते है । उनका कहना है की गुप्त वंश 319 ई0 से और गुप्त वर्ष 1 का आरम्भ 320 ई0 से हुआ था । अधिकांश इतिहासकारों का मत है की गुप्त संवत की शुरुआत चन्द्र गुप्त प्रथम ने अपने राज्यारोहण की स्मृति में किया था।

चन्द्रगुप्त प्रथम का साम्राज्य विस्तार

चन्द्रगुप्त प्रथम के शासन के विस्तार के बारे में बहुत कम ही तथ्य है। उसके पुत्र समुद्रगुप्त के द्वारा बनाए गए इलाहाबाद के शिलालेख में चन्द्रगुप्त प्रथम के बारे में थोड़ी ही जानकारी दी गई है। उसने बताया गया है कि समुद्रगुप्त ने बहुत सारे राजाओं को परास्त कर दिया था। उसके उत्तराधिकारियों और पुराणों के आधार पर उसका साम्राज्य विस्तार आधुनिक बिहार,बंगाल के कुछ इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश भागों में माना जाता है।

पुराणों में मगध, साकेत और प्रयाग को गुप्तों का क्षेत्र बताया गया है। परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार उसके पुत्र समुद्रगुप्त के द्वारा विजित क्षेत्रों पर चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्य उत्तर में वाराणसी के आगे गंगा के उत्तर में नहीं होगा, लेकिन उसके राज्य में मध्यप्रदेश के बिलासपुर, रायपुर ,सम्भलपुर और गंजाम जिले के कुछ हिस्से सम्मिलित होंगे। पश्चिम में विदिशा की सीमा तक तथा पूर्व की ओर पूरा बिहार और बंगाल का कुछ क्षेत्र चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्य में शामिल थे।

समुद्रगुप्त ने जिन राज्यों को जीता था, उसका मतलब यह था कि वो राज्य पहले गुप्त वंश के अंग नहीं थे। यानी कि उन पर चंद्रगुप्त प्रथम का अधिकार नहीं था। तो विद्वानों ने एक कच्चा अनुमान लगाया गया है कि चंद्रगुप्त प्रथम का शासन, पश्चिम में प्रयागराज, दक्षिण में मध्य भारत, उत्तर में नेपाल, पूर्व में बंगाल इन्हीं क्षेत्रों के बीच में था। अतः कहा जा सकता है कि चंद्रगुप्त प्रथम का शासन बंगाल व इसके आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित था।
चन्द्रगुप्त प्रथम के सोने के सिक्के

मथुरा, लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर, गाजीपुर, वाराणसी, बयाना, हाजीपुर इत्यादि क्षेत्रों से सोने के सिक्के मिले हैं। जिन पर चंद्रगुप्त व उसकी पत्नी कुमार देवी की छवि बनी हुई है। इन सिक्कों पर गुप्त लिपि में चन्द्र नाम लिखा गया है। तथा सिक्के के दूसरी तरफ शेर पर बैठी हुई रानी की छवि बनी हुई है और गुप्त लिपि में लिच्छवी नाम लिखा हुआ है।


कुछ इतिहास शास्त्रियों के मुताबिक ये सिक्के चन्द्र गुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त ने जारी किए थे। तो वहीं कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सिक्के खुद चन्द्रगुप्त ने जारी किए थे। इन सिक्कों में चन्द्रगुप्त और कुमार देवी अलग-अलग खड़े हुए हैं तो कुछ इतिहासकारों ने प्रस्तावित किया है कि चन्द्र गुप्त और कुमार देवी दोनों एक साथ मिलकर राज्य तो चलाते थे परंतु शासन के भिन्न-भिन्न क्षेत्र संभालते थे। वहीं सिक्के के दूसरी तरफ रानी की छवि न होकर माँ दुर्गा की छवि है ।

चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु

इतिहास की किताबों के अनुसार, चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ईस्वी को पाटलिपुत्र में ही हुई थी। परंतु, उसकी मृत्यु के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है। चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई0 से लेकर लगभग 335 ई0 तक राज्य किया। एलन, फ्लीट एवं स्मिथ मानते हैं कि चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ई0 में हुयी होगी।

परन्तु वही रमेश चन्द्र मजूमदार और परमेश्वरी लाल गुप्त का कहना है कि 338 ई0 से 345 ई0 के बीच चन्द्र गुप्त प्रथम ने अपने पुत्र को राज्य देकर सन्यास ले लिया। उसके पश्चात वह कितने समय जीवित रहे, इसका कोई प्रमाण नहीं है। अपनी मृत्यु के समय चन्द्रगुप्त प्रथम काफी वृद्ध हो चुके थे। उन्होंने गुप्त साम्राज्य के दोनों पूर्ववर्ती राजाओं की तुलना में अपने शासन को अधिक अच्छे से संभाला और सफलतापूर्वक चलाया।

चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद गुप्त साम्राज्य को उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने संभाला जो की अपने पिता की तुलना में काफी अच्छे तरीके से साम्राज्य का विस्तार किया और गुप्त साम्राज्य की सीमाओं को काफी बड़ा कर दिया।

कुछ जगहों से प्राप्त सोने के सिक्के से पता चला है कि चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद कचा नाम का इंसान गुप्त साम्राज्य का सम्राट बना था। संभवतया कचा, चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र और समुद्रगुप्त का बड़ा भाई था। परन्तु कुछ इतिहासकार कचा को ही समुद्रगुप्त मानते हैं। उनका कहना है कि कचा ने अपने राज्य की सीमाओं को समुद्र तट फैलाने के बाद अपना नाम बदलकर ‘समुद्रगुप्त’ रख लिया। जिससे पता चलता है कि कचा ही समुद्रगुप्त था परंतु इस तथ्य के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं।

इस तरह चन्द्र गुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य की राजगद्दी संभाली और उसने भारत के लगभग सभी राज्यों पर विजय प्राप्त करके देश को एकता के सूत्र में बाँधा। यहाँ तक कि वी ए स्मिथ ने तो समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन भी कह दिया।

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