VAISHYA NAG VANSH
हज़ारो साल पहले छपे ऐतिहासिक ग्रन्थ आर्य मंजुश्री मूल कल्प ने नाग वंश को भी वैश्य लिखा है। भारतीय इतिहास में नाग वंश का बड़ा महत्व है। जायसवाल जी ने इनकी प्रसिद्ध भारशिव वंश से एकता स्थापित की है। इस ग्रन्थ में नागों का वर्णन इस प्रकार किया गया है
"तब फिर वैश्य वंश का राजा शिशु राज्य करेगा। फिर नागराज नाम का राजा गौड देश का शासन करेगा। उसके समीप ब्राह्मण और वैश्य रहेंगे । नागराजा स्वयं भी वैश्य होंगे और वैश्यों से ही घिरे रहेंग”
" महासन्य समायुक्तः शूरः क्रान्तविक्रमः ।।
निर्धास्ये हकाराख्यो नृपतिं सामं विश्रुतम्
वैश्यवृत्तिस्ततो राजा महासन्यो महाबलः ।।
पराजयामास सोमाख्यम् .. .. . . . . .
मंजुश्रीमूलकल्प पृष्ठ ५३-५४
वैश्यवर्णशिशुस्तदा १७४६
नागराजसमायो गौडराजा”
इन वैश्य नागों का इतिहास हमें लिखने की आव्यस्यक्ता नहीं। श्री काशीप्रसाद जी ने इस बात पर आश्चर्य प्रगट किया है, कि इन नाग राजाओं को वैश्य क्यों लिखा गया है । पर हमें इसमें कोई आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। नाग राजाओं का वैश्य अग्रवंश से प्राचीन सम्बन्ध है। उनको भी यदि वैश्य जातियों में सम्मिलित किया गया हो, तो यह सर्वथा सम्भव है।
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