Tuesday, November 1, 2016

MAHURI CASTE - माहुरी कम्युनिटी

माहुरी कम्युनिटी

औरंगजेब के शासन काल में माहुरी गण मथुरा निवासी थे। औरंगजेब समूचे भारतवर्ष वासियों को अपने धर्म में परिवर्तन कराना चाहता था। इसलिए उसने निश्चय किया की वो शीरनी ( एक प्रकार का मीठा ) खायेगा और देश की सारी जनता उसके बाद घर्म की पुष्टि के लिए खा लेगी, इसतरह सबका घर्म परिवर्तन हो जायेगा और सारे भारतवासी एक उसके धर्म के हो जायेंगे।

कुछ चतुर दरवारीयों ने युक्ती लगाई और इसे नामुमकिन बताया और इसकी सफलता पर प्रश्नन उठाया, इतनी बड़ी दावत का खर्च और जगह की कमी की बात बता कर औरंगजेब को राजी किया की केवल सभी दरबारी ही उसका छोड़ा हुआ शीरनी (मिठाई) की जगह बादशाह का पिया हुआ हुक्का पी लेंगे जीससे उनके अधीन जितनी जनता आती है उनसबों का स्वाभाविक धर्म परिवर्तन माना जायेगा।यह कम खर्च वाली बात, स्वभाव से कंजूस, बादशाह को पसंद आ गई और हुक्का पिने की बात मान गया तथा उसके लिए उसकी एक तिथि घोषित कर दी गई।

चतुर दरवारियों की यह चाल कामयाब हुई क्योंकि हिन्दू हुक्का पीने का जूठा नहीं मानते थे और वख्त पड़ने पर हुक्का सभी से बांट कर पी लेते थे।

लेकिन माहुरी गण हुक्का कभी नहीं पीते थे, धूम्रपान माहुरी समाज में पूर्णतः वर्जित था, धूम्रपान करते पाये जाने से समाज से ही वाहिष्कृत कर देने की प्रथा थी और पूरा माहुरी समाज पूर्णतः शाकाहारी था। आज भी यदि किसीकी गलती से रसोई में मांसाहारी वास्तु बानी तो माहुरी स्त्रीयां उन बर्तनों को आज भी फेंक देती हैं।कुछ माहुरी स्त्रियाँ व मर्द प्याज लहसुन तक खाने की बात छोड़ उसे हाथ तक नही लगाते ।

बादशाह का छोड़ा हुका पिने का दिन यानि धर्म परिवर्तन वाले दिन आने के पहले ही माहुरीगण अपने धमॅ,संस्कृति एवं अपने अस्तित्व को बचाने हेतु करीब 700 परिवार मथुरा से गया शहर को प्रस्थान कर गए ।
माहुरी 700 परिवार मथुरा से मुगलों के अत्याचार का विद्रोह करते हुए करीब 400 वर्ष पूर्व पहले गया शहर आये परंतु, यहां भी मुगलों की पहुंच महुरीयों को मजबूर किया बिहार के घने स्थानों में बिभाजित होने के लिए , कुछ गया के पास वाले स्थानों बिहारशरीफ , नवादा, बरबीघा, कोडरमा इत्यादि, जो ज़्यादातर उस समय जंगलों जैसे थे , दूसरी ओर, कुछ लोग दूसरी ओर गिरिडीह के घने, अनेक स्थानों मे अवस्थित हुए उस समय गिरिडीह की यात्रा काफी कठीन मनी जाती थी |हालांकि, सुचारू तो आजतक भी नही हुई है| इस तरह माहुरी जाती दो भागों मे विभक्त अनायास ही हो गई और एक दूसरे से बिछड़ गए क्योंकि गया के इलाके से गिरिडीह के इलाकों से, एक जगह से दूसरे जगह जाना आना उस समय लगभग नामुमकिन सा था | इसतरह ये एक दूसरे से 200/ 300 वर्षों तक अलग रहे|

1912 वर्ष में स्वर्गीय कारु राम जी अठघरा के अथक प्रयास से "मगध माहुरी महामंडल " गया के पास पावन स्थल रजगीरीह में स्थापित करवाई|पुनः एक वर्ष के बाद 1913 में गिरिडीह के खरकडिहा में "हज़ारीबाग़ माहुरी वैश्य महामंडल " की भी स्थापना करवाई|स्वर्गीय बाबू कारु राम जी अठघरा की दूरदर्शिता महुरी समाज के लिए हमेशा प्रेरणात्मक रहेगी|

तदुपरांत, 1914 वर्ष मे स्व. प्रभु दयाल गुप्ता ,झरिया निवासी, ने एक बहुत ही रचनात्मक कार्य ,"माहुरी मयंक" पत्रिका का प्रकाशन इंग्लैंड से प्रेस मांगा कर ,झरिया से कमला प्रेस स्थापित कर,बहुत समय तक निःषुल्क पत्रिका वितरण करवाई|कमला प्रेस की स्थापना शुरू में केवल माहुरी मयंक मुद्रण के लिए ही उन्होंने की थी, अन्यथा वे मुख्यतः colliery owner व coal marchant थे।

इस तरह माहुरीमयंक के द्वारा दोनों माहामण्डलों में विचारों का आदान प्रदान होने लगा| कालान्तर में बाबू प्रभु दयाल की अध्यकछता में बरबीघा महाअधिवेसन में अपने दो भाई तथा हिसुआ के घनाडय जमींदार के पुत्र, तीन लड़कों की शादी भरकठा ,गिरिडीह की तीन कन्यायों से निर्धारित कर दखिन ~मगह यानी मगध एवाम् हज़ारीबाग़ महामंडल को एकजुट करवाया|इस महामंडलों की मिलन देखने महुरीगंन दूर दूर से पधारे थे| यह एक ऐतेहासिक प्रसंग था ,तब के बाद से आज भी दोनों महामण्डलों मे वैवाहिक संबंध धड्ड्ले से होते आ रहे हैं|

यह मीलन माहुरी समाज को बहुत उच्चाईयों तक ले गया, दोनों समाज के बड़े बड़े व्यापरीयों में वैवाहिक सम्बन्धों के साथ देश के सबसे बड़े व्यपारिक परीवारों के बराबरी में लाकर खड़ा कर दीया, यह पूरे माहुरी समाज का स्वर्णिम समय था|एक परीवार,जो CH के नाम से प्रचलित है जिसमें छट्ठू राम होरीलराम, छट्ठू राम दर्शन राम ई. ने अबरख (Mica) खनिज के उत्पादन और निर्यात में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की,साथ ही साथ गया के सफलतम व्यपारी, राय बहादुर राम चंद राम के पुत्र लाला गुरुशरण लाल भदानी से मिल कर गया , बिहार में पहला Textile मिल, गया कॉटन एंड जूट मिल, जो पुरे गया शहर को बिजली भी मुहहैया करवाया, लगाया बाद में गुरुशरण बाबू ने sugar मिल, glass मिल तथा कई तरह की industries की झड़ी लगा दी, देश की सबसे बड़ी ग्लास फैक्टरी भुरकुंडा में Bhurkunda Glass Factory लगाई साथ ही साथ सोघपुर, कलकत्ता में विश्व की सबसे बड़ी सोधपुर ग्लास फैक्टरी स्थापित करने की शुरुवात कर दी । अपने ही एक मैनेजर DNAgrawal को ग्लास स्पेशलाईजेसन के लिए विदेश भेजा जो बाद देश में Safex glass का निर्माण किया और विदेशों में कई ग्लास फैक्ट्री लगवा कर Indian Multinational बने।

जुगिलाल कमलपत सिंघानिया( J K )से इनकी घनिस्टता थी इनके घर " कमला टावर " कानपूर में ही इनका देहवास हो गया। गुरुशरण भादानी देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक पद President of Federal of Indian Chamber of Commerce and Industries ( FICCI ) चुने गये,उनके द्वारा दिए गए सुझाव आज भी सराहनीय हैं|FICCI द्वारा Platinum Jubilee के अवशर पर प्रकाशित volume पर लाला गुरुशरण लाल के कार्य को मुख्य स्थान दीए गए |वे बिहार चैम्बर ऑफ़ कामर्स के प्रेजिडेंट के साथ साथ बिहार सरकार के वित्तीय सलाहकार भी मनोनीत हुए।

अबरख के व्यपार तथा निर्यात में झुमरी तिलैया (कोडरमा) के CH,CD और Indian Mica & Micanite Industries के अलावे गिरिडीह के KPR यानी स्व. कमलापति राम तरवे , RPTarwe & Co. जैसे स्वजातियों ने Japan और अमेरिका जैसे देशों में अबरख व्यपार की धूम मचा कर रख दी। Japan की सबसे बड़ी ग्रुप ऑफ कंपनी से KPR के घने सम्बन्ध थे।

स्व. कमलापति तरवे हजारीबाग महामंडल के स्थाई अध्यक्छ व संग्रक्छक थे। उनके पुत्र स्व. बसुदेब तरवे Japan की" नीहों शोही" ग्रुप ऑफ़ कम्पनी में काफी शुमार हुवा करती थी। वे अधिकतर Japan में ही अवस्थित थे। RPTarwe & Co के संथापक स्व.राम प्रसाद तरवे और उनके पुत्र श्री अजित तरवे curt flower की विशेषता प्राप्त कर अबरख व विभिन्न प्रकार के निर्यात करके आज भी तरवे परिवार देश की विदेशी मुद्रा कोष को मजबूत कर रहें हैं।

CH के C ग्रुप अहमदाबाद में गुजरात कॉटन मिल नगद, ढाई लाख तोले सोना बेच कर खरीद डाला। इतना सोने की बिक्री कलकत्ते सराफा बाजार को हिला कर रख दिया, सोने के तत्काल भाव गिर कर रिकॉर्ड बनाया।इनको अमेरिकन मोटर कार कंपनी विंटेज बेबी कार, जो ओपन कार भी थी, उपहार स्वरुप, बड़े कार क्रेता होने के कारण, प्रदान किया।

इनके H ग्रुप ने बम्बई शहर में हीरजी कॉटन मिल ख़रीदा जिसे झरी राम भदानी बहुत सफल तारिके से चलाया, ये दानवीर बिहारी सेठ ऑफ़ बॉम्बे कहलाये, यहां गरीबों और जरुरतमंदों को छूट कर दान दिया, इन्होंने ही वहां अपनी जमींन पार्क बनाने हेतु दान कर दी जो पुरे भारत में "कमला नेहरू पार्क " के नाम प्रसिद्ध है। इस पार्क में जूते कि शकल वाली structure बनाई गयी है। ये बेशकीमती घोड़ों के मालिक रहे हैं, बेरी डांस,चेतक व पवन जैसे नामचीन घोड़े हवाई जहाज से डर्बी रेस पर जाते, इनके अस्तबल वातानुकूलित होते तथा जीतने पर इनके जौकी इन्हें vat69 पिलाते, इनके खुराक अच्छे आछो को नसीब नहीं होते।

भारतवर्ष में उस समय तेजी से industrialisation होने लगा और सम्पति कर से बचाव व बड़े व्यापार और बढाने लिए कंपनी का फैशन बढ़ा जो निहायत ही पेचीदा आज तक है Indian Companies Act जो वर्ष 1956 में आ पाई। उसके पहले कम्पनी कानून और जटिल थी, आज भी SawWallace, Duncans जैसी Multinational Companies नहीं बच पायी और भारतीय व्यपारियों विजय माल्या और मन्नू छाबड़िया (दुबई के भारतीय व्यपारी)के हाथों आ गई और बहुत जल्द ही इनके हांथों से भी फीसल कर ब्रिटेन चल गई। कंपनी का management पाया जा सकता है पर कम्पनी का मालिक बनना मुमकिन नहीं।कई भारतीय भी इस लपेटे में आ गए और करीब सभी माहुरी कम्पनियो की भी यही दशा हुई।माहुरी परिवार भी यदि पबलीक कम्पनी नहीं खोलता या खरीदता होता तो बहुत कुछ बाच गया होता और इतना बड़ा नुकसान नहीं होता। आज CH प्राइवेट कम्पनी इस लिए बच पाया क्योंकि ये प्राइवेट ली. कम्पनी है जिसका कंट्रोल परिवार व चंद पारिवारिक मित्रों ही सिमित होता है, आज भी एकमात्र CH P.Ltd. कम्पनी की हैसियत अरबों में है।

वर्तमान समय में industrialisation की उम्मीद माहुरी शिक्छितों से भी की जा सकती है, इनमें से कुछ माहुरी यंग छात्र वीलक्छ्न प्रतिभा रखते है और पढाई पूरी करते करते कई कम्पनियाँ खड़े कर चुके हैं ISRO से जुड़ चुके हैं, विदेशी ताकतें बड़ी पूँजी का दाँव इन पर लगाने को तैयार हैं । वैसे जैसे yahoo,google नयी टेक्नॉलॉजि से अंतररास्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है।

माहुरी हमेशा से ही उच्च स्थान प्राप्त जाति रही है, H.H.Pislay, ICS, अपनी किताब में जो 1891में प्रकाशित हुई थी, जिसमें माहुरी जाती की बिहार राज्य में स्थिति काफी सुदृढ थी,उस समय बिहार राज्य बंगाल में मिला हुआ था, और अग्रवाल बनियों के बराबर की स्थित जैसे थे, सिखों की तरह ही तम्बाकू का प्रयोग महुरी समाज में पूर्णतयः निषेध था, इसे व्यवहार करते पाये जाने पर समाज से निष्कसित कर दिया जाता था| एक और सबसे बड़ी विशेषता यह थी की इस जाती में शादियां हेमेशा दूल्हे के स्थान पर हुआ करती थी| व्यपार और सुद का ही मुख्य धंधा इनका काम था जिसमें ज्यादातर लोग जमींदार जैसा उच्च स्थान पर अवस्थित थे, जिंमेंसे कइयों को अलग अलग उपाधि प्राप्त थी,जिन्हें पंगत पर खाने के लिए उच्च स्थान यानी अलग से पीढ़ा बैठने के लिए दिया जाता था| चौधरी जैसा टाइटल महुरीयों के नाम के पीछे नहीं होता है परंतु ये चौधरी कहलाते थे और नाम के पीछे चौधरी की तरह उपनाम लिखते थे|ऐसा एक परिवार बस्ताकोला, धनबाद में अवस्थित हैं इन सबों का वर्णन आगे किया जायेगा| जमींदारी उन्मूलन और अबरख खनिज व्यवहार की प्रायः समाप्ति माहुरी समाज को काफी छती पहुंचाई|अबरख का व्पापार और उत्पादन माहुरी समाज का प्रमुख धंधा हो चला था|

माहुरी जाती की सरलता और साथ ही साथ वैभवता भी बेमिशाल मानी जाती हैं, सादगी की बात करें तो इनके विवाह पांच गज सूती वस्त्र (ननकीलाट) दूल्हे और दुल्हन को पहना कर व दहेज़ के नाम पर रु 11/- पर होती रही हैं साथ ही साथ माहुरी जमींदारों के यहाँ भी विवाह ऐसे ही होते रहे परंन्तु, बेटी के विवाह उप्रान्त खोईछे में ( बिदाई के वक्त दिया गया उपहार ) गावँ के गावँ दे देने की प्रथा रही है। वैभव तो ऐसा कि, मैं खुद 1969 वर्ष में बोम्बई के सबसे रहीश मुह्हले में ईनका जो दो तल्ले banglow में लिफ्ट लगा देखा साथ ही, पहली बार उनमें बैठने की व्यवस्था देखी और जो बड़ा सा चित्र सीड़ियों पर देखा उसकी कीमत 300 से 400 स्वर्ण मुद्राओं से बोली बोल कर ली गयी। माहुरी जमीनदारों के वंसज के यहाँ चोरी भी अंतराष्ट्रीय गिरोहों द्वारा पुरानी पेंटिंग व जवारहतों की चोरी हुई, जहाँ उन अंतर्राष्ट्रीय चोरों को इतनी मूल्यवान वस्तुएं मिली की वे चांदी के बर्तनों व सामान को रस्ते में फेंकते हुये पालयमान हुए।

आज भी कुछ लोगों के पास मथुरा से लायी गयी कुछ दुर्लभ वस्तुओं को देख कर अनुमान लगा सकते हैं की महुरीगण पहले व्यपारी होने के साथ साथ कुशल योद्धा भी होते थे क्योंकि गया के सूबेदार, माहुरी दरवारी के करीब 700 लोगों को गया में पनाह इसलिए दिए,की हमारे माहुरी दरवारी एक युद्ध में सूबेदार की जान बचाई थी।ऐसे बहुत से लोग हमारे समाज में हैं जिनके पास ऐसीही कुछ दुर्लभ वस्तुएं हैं जिसका मतलब नहीं समझ आता जैसे बहुतों के यहाँ तलवार जैसी बहुत पुरानी वास्तु पड़ी रहती है जिसमें अधिकतर लोग अनुउपयोगी समझ कर निकाल भी चुके हैं। ऐसे ही एक वयोबृध् से हमारी मुलाकात हुई जिंकेपास करीब 17 वीं शताबदी की एक तलवार मौजूद है।.

माहुरी गण जब करीब 700 परिवार के साथ गया के सूबेदार बइयो परिवार के शरण पाने के बाद औरंगजेब को उसके जासूसों से इस बात की जानकारी पाते ही, गया पर आक्रमण करने,मुगल सेन की टुकडी भेज दिया
माहुरी गण मुगल सेना से टक्कर लेंना उचित नहीँ समझा और उस समय की नजाकत देख कर जीतनी दूर जा सकते थे उतनी दूर घने स्थानों,जो उस समय जंगलों जैसे ही थे, वहाँ की जो भी जनसँख्या थीं उनमें सम्मिलित हो गये, जहाँ माहुरियों को अलग से खोज निकलना मुगल सैनिकों के लिये काफी कठिन कार्य लगा, इसलिये मुगल सेना और औरंगजेब का सारा का सारा गुस्सा बाइयो परिवार पर निकला जिन्होंने हमें शरण दिया था, वे सारे ही उनके शिकार हुए।

माहुरी परिवार भी उनके उपकार को नहीँ भुले, आज तक उसके उपरांत तक बइयो परिवार को श्रधा पूर्वक प्रत्येक श्राध पर उनके नाम से पिंड निकल कर अलग से पिंड दान करते आ रहे है और हमेशा से करते रहेंगे। हाँ ये बात बहुतों को पता नहीँ की एक अलग पिंड क्यों

इतना ही नहीँ हमारे कुछ माहुरी जमींदार परिवार में बइयो की श्रधा में ही कुछ उनके धर्म के लोग भी पलते दिखे।

हीसुआ estate उन में से एक जमींदार परिवार में पायेंगे बइयो परिवार के वंशज कई पीढी तक जो उनके यहाँ पले और बढे, इतना ही नहीँ, उनके शाकाहारी व्यंजन आज भी इस परिवारों में बड़े चाव से इनके रसोई के व्यंजनों में शामिल हैं।


mahuris.blogspot.in/2015/11/blog-post_27.html


No comments:

Post a Comment

हमारा वैश्य समाज के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।