महाराजा अग्रसेन की शिक्षाये
महाराज अग्रसेन जी ने अमावस्या का बहुत गहरा महत्व बताया है, खासकर समाज, दान और आत्मशुद्धि से जोड़कर।
अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व (महाराज अग्रसेन की दृष्टि से)महाराज अग्रसेन जी मानते थे कि अमावस्या केवल तिथि नहीं, आत्मचिंतन का दिन है।
उन्होंने कहा था:
“जिस प्रकार अमावस्या की रात के बाद चंद्रमा फिर से बढ़ता है,
उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन की अंधकारपूर्ण आदतों को त्यागकर
फिर से उज्ज्वल बनना चाहिए।”
आत्मशुद्धि का दिनमहाराज अग्रसेन जी के अनुसार अमावस्या पर:
मौन धारण करना
कम बोलना, अधिक सोचना
क्रोध, अहंकार और लोभ का त्याग
ये सब राजा के लिए भी उतना ही आवश्यक है जितना साधु के लिए।
इसी कारण वे अमावस्या को राजधर्म और आत्मधर्म दोनों की परीक्षा का दिन मानते थे।
दान और करुणा का विशेष दिनमहाराज अग्रसेन जी ने अपने राज्य में नियम बनाया था:
“अमावस्या के दिन कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए।”
इसलिए वे अमावस्या पर विशेष रूप से:
अन्न दान
वस्त्र दान
निर्धनों की सहायता
करते थे।
यही परंपरा आज भी अग्रवाल समाज में दिखती है।
पितृ सम्मान का महत्वमहाराज अग्रसेन जी मानते थे कि:
“जो अपने पूर्वजों को स्मरण करता है,
उसका भविष्य स्वतः उज्ज्वल होता है।”
इसीलिए अमावस्या को वे:
पितरों का तर्पण
माता-पिता का आशीर्वाद
बड़ों का सम्मान
का श्रेष्ठ दिन बताते थे।
समाज सुधार से जोड़कर देखाउनके अनुसार:
अमावस्या = नया आरंभ
वे कहते थे:
“आज का दिन संकल्प का है —
मैं आज से अन्याय नहीं करूँगा,
किसी को दुःख नहीं दूँगा।”
सारमहाराज अग्रसेन जी के अनुसार अमावस्या:
कारण
अर्थ
आत्मचिंतन
अपने दोष सुधारने का दिन
दान
समाज को साथ लेकर चलने का दिन
पितृ स्मरण
संस्कारों को जीवित रखने का दिन
नया संकल्प
जीवन को फिर से उज्ज्वल बनाने का अवसर
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