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Tuesday, March 21, 2017

11 Things You Encounter In Any Baniya Wedding!

Hai Shaava!

“Marriages are made in heaven”, but they are finally approved by our parents only; and then starts a week-long wedding celebration. That’s how Baniyas roll! Although we are apparently the penny-pinching individuals, but we love to flaunt all our assets on the day of the wedding.

We just love weddings and love the way people take part in it whole-heartedly. So, if you are a part of the Baniya wedding, you definitely can’t avoid all of these things:

1. Longer the Weddings, the Better it is: It is true that Baniyas can’t limit themselves in a short wedding because that’s just not the way it goes with them. Even if we don’t want, their relatives won’t spare us. And for a week’s program, the wedding preparation starts few months back itself.

2. Glitters and more Glitters: You know, the parents start gathering and saving jewelry and money for the wedding right from the day their child is born; especially in the Baniya Biradiri. And those savings and collectibles are finally showcased on the day of the wedding. A Baniya bride is flooded with gold and those who belong to the business class, the girls literally become a “gold factory”. All the cousins, the chachis and mamis and buas and mausis are dripping in glitters.



3. Shor-Sharabba throughout: No Baniya wedding is complete without loads of laughter, singing and screaming for the whole time. And it’s bound to happen that you will suffer from a sore throat or throat blockage after the functions. In every corner of the wedding venue, you will hear somebody bursting out of laughter without any reason or fufas and mausas finding complaints in the food or any ritual. 

4. The Lovely Folk Songs: Every ritual and rasam are accompanied by a folk song and the women of the house assemble in a single place and sing it. Many folk songs are meant to tease the bride and the groom and we dance all night long in the beats of dholak. Especially, during the haldi ceremony, mehendi and sangeet, Bollywood wedding songs are a big hit. 


5. Savoring the Homemade Mithaai: A caterer is booked for the whole 4-day event and they cook those yummy-mouth-watering-traditional foods like kachoris, aloo sabzi, paneer, mathris, jalebis, etc. and served in donas and thermocol plates. A guest in the wedding can never go empty stomach in a wedding house. 


6. All the relatives are Moms and Papas: In a typical Baniya wedding, all the relatives take their responsibilities so seriously that you can’t figure out who is the bride- groom’s actual parents because it’s a biiiiiiiggg family. Everyone is busy preparing for the wedding and everyone joins hand to help the parents.


7. Sarees are Necessary: Sarees are like a default wedding dress. A Baniya beti or bahu must know how to tie a saree because no matter how modern the groom’s family is, they still want their bahus to be in a saree for initial married days. And not only the bride, but all the other ladies are allowed to flaunt their figures in sarees. 


8. The Ultimate Lifafa Decision: The guests in the wedding decide on how much cash to pay to the wedded couple according to the closeness they have with a family. We often hear the dialogue, “Ye lo beta, lifafa”. You won’t see any guest coming empty-handed although in the invitation card it is written that, “No gifts, only Blessings”. 


9. A Perfect Matrimony Destination: A wedding venue is definitely a terminus for other families to choose their prospective brides and grooms. Many bachelor girls are strictly instructed by her parents to behave at her best so that someone notices them and offer a marriage proposal; and so happens with the boys too. 


10. Mehndi on Groom’s hands: The Mehndi is supposed to be a shagun for a bride. But in our Baniya wedding, even the groom has to apply the mehendi. It’s weird though but the guys are also not spared from applying that green henna on his hands and it’s simply too cute to see that both bride and grooms are donning in the same colour. 


11. The Saat phere and Sindoor: After all those non-stop wedding functions, the final time comes when the couple goes around the sacred fire and after that the groom puts the red sindoor on the bride’s temple. It’s so adorable and marks the start of a happy married life. All the sleepy and tired relatives and friends suddenly jump up and shouts again wishing the newlywed couple and we love it! 


Love us or hate us, we are proud to be Baniyas!!

SAABHAAR: khoobsurati.com/11-things-you-encounter-in-any-baniya-wedding.html


Tuesday, March 14, 2017

ULKA GUPTA - उल्का गुप्ता


इस 'झांसी की रानी' के रोल मॉडल हैं पापा, टीवी के बाद फिल्मों में बना रही मुकाम


इस 'झांसी की रानी' के रोल मॉडल हैं पापा, टीवी के बाद फिल्मों में बना रही मुकाम

टीवी सीरियल्स के बाद अब फिल्मों में अपना मुकाम शुरू करने वाली उल्का गुप्ता बिहार की निवासी हैं और वो कहती हैं कि फिल्मों में उनके दोस्त व गाइड पापा हैं। पापा उनके रोल मॉडल हैं।

 टॉलीवुड फिल्मों व टीवी सीरियल्स में स्थापित उल्का गुप्ता आज नित शोहरत के नए मुकाम हासिल कर रही हैं। टीवी सीरियल 'झांसी की रानी' में मनु का किरदार निभाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उनके पास कई फिल्मों के ऑफर हैं। राह आसान हो गई है, लेकिन मंजिल अभी दूर है।

बिहार की मूल निवासी उल्का कहती हैं कि फिल्मों में उनके दोस्त व गाइड पापा हैं। पापा उनके रोल मॉडल हैं। 

उल्का कहती हैं, 'मेरे पापा ग्रेट हैं। उन्होंने अपने और मेरे सपने को सच करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। मेरी सफलता सही में पापा की सफलता है।'

सहरसा शहर के चांदनी चौक के रहने वाले गगन गुप्ता ने 30 साल पहले जो सपने अपने लिए देखे थे, उसे पूरा करने के लिए अपनी बेटी को तैयार किया। तमाम संघर्ष के बाद एक मामूली कलाकार से आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन बेटी उल्का गुप्ता का गुरु बनकर उसे बड़ा कलाकार बना दिया। 


बाप का अनुभव और बेटी की प्रतिभा काम आई 



30 साल पहले गगन मुंबई गए थे। संघर्ष किया। फिल्मों में छोटे-मोटे रोल और सीरियल में काम भी मिले। संघर्ष के दिनों में ही शादी रचा ली और मुम्बई के पृथ्वी थियेटर से जुड़ गए। वर्ष 1997 में उल्का का जन्म हुआ। पिता बचपन से ही उल्का को अभिनेत्री बनाने का सपना देखते थे।

आर्थिक तंगी के कारण बेटी को किसी बेहतर प्रशिक्षण संस्थान में अभिनय का प्रशिक्षण दिलाने की क्षमता नहीं थी। वे खुद अपनी बेटी के गुरु बने और अभिनय की बारीकियों को सिखाने लगे। 

कुछ ही वर्षों में उल्का को सीरियल व विज्ञापन में काम मिलने लगा। झांसी की रानी का किरदार मिलने के बाद उल्का ने ऊंचाई को छू लिया। आज उल्का के पास शोहरत है। कई फिल्मों के ऑफर मिल चुके हैं। हालांकि, गगन इसे अपनी बेटी की सफलता मानते हैं। 

2007 से सीरियल में कर रही हैं काम

वर्ष 2007 में उसे पहला ब्रेक सीरियल 'रेशम दान' में मिला। इसके बाद 'सात फेरे', 'सवारी', 'सलोनी की बेटी' सीरियल में काम करने के बाद 2009 में 'झांसी की रानी' में लीड रोल से बड़ी कामयाबी मिली। वह सीरियल पांच वर्ष तक लगातार चला। 2013 में 'खेलती है जिंदगी' में उसका अभिनय निखरा। उल्का तेलगू फिल्म 'अंधरा पोरी', मराठी फिल्म 'ओढ-एट्रेक्शन', सीमा कपूर निर्देशित हिन्दी फिल्म 'मिस्टर काबेडी' में लीड रोल कर चुकी हैं। 

उल्का कहती हैं कि फिल्म या सीरियल करने से पहले स्टोरी को पढ़ती हूं। तब कोई निर्णय लेती हूं। पापा मेरी प्रेरणा हैं। उन्होंने संघर्ष करके मुंबई में मुझे राह दिखाई।

साभार: दैनिक जागरण 


Sayani Gupta







Sayani Gupta is an Indian film actress who appears in Hindi films. She has worked in films like Fan and Jolly LLB 2.She is graduated from the Film and Television Institute of India. Gupta is known for her role of a blind Pakistani Bangladeshi lesbian in the 2015 drama Margarita, with a Straw, that marked her acting debut and a secretary of the character played by Shah Rukh Khan in the 2016 action thriller. 

NAINA JAYSWAL - 16 Year Old Girl Is The Youngest Post Graduate In Asia


कुछ टैलेंट्स तो इंसान जन्म के दौरान ही लेकर आता है और कुछ यहां धरती पर आने के बाद आ जाती हैं। वैसे कुछ लोगों में इतनी प्रतिभाएं होती हैं कि उनके बारे में कुछ कहना भी कम ही लगता है। शायद उन्हें ही 'गॉड गिफ्टेड' का नाम दिया जाता है। एक ऐसा ही नाम है 'नैना जायसवाल', जिन्हें गॉड गिफ्टेड की संज्ञा दी जा सकती है। उनकी प्रतिभाएं इतनी हैं कि बखान करना भी मुश्किल सा लगता है। मात्र 16 साल की उम्र में नैना ने इतनी उपलब्धियां हासिल की हैं कि गिनते-गिनते उम्र कम पड़ जाए। चलिए बताते हैं नैना के बारे में..

नैना 8 साल की थीं जब उन्होंने अपनी 10वीं की परिक्षा पास कर ली। 13 साल की उम्र में जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन पूरा कर लिया। अब सोचने वाली बात है कि नैना में इतनी प्रतिभाएं कहां से आयी होंगी। उस मां-बाप के लिए कितनी गर्व की बात होगी जिसने ऐसी प्रतिभावान लड़की को जन्म दिया। अभी बात यहीं खत्म नहीं हुई, पन्ने कम पड़ जाएंगे नैना के बारे में लिखते-लिखते।

नैना अभी पीएचडी की पढ़ाई कर रही हैं। यही नहीं वो नेशनल लेवल की टेबल टेनिस चैंपियन भी हैं। अब बोलिए लड़किया किस मामले में पीछे हैं? हम तो कहें कि लड़कियां हर मामले में लड़कों से दो कदम आगे ही हैं। नैना के पिता ने नैना को हर काम के लिए सपोर्ट किया, हर काम के लिए सराहना की। 5 साल तक नैना की शिक्षा घर पर ही हुई, नैना के पिता खुद पढ़ाते थे।
कहानी अभी यहीं खत्म नहीं हुई। अभी कलाएं और भी हैं नैना की। नैना बेहद शानदार पियानो भी बजा लेती हैं और गाना भी गा लेती हैं। अपने दोनो हाथों से लिख लेती हैं। उन्हें रामायण के 108 श्लोक रटे हुए हैं। खाना बनाने में भी निपुण हैं, हैदराबादी बिरयानी 25 मिनट में बना लेती हैं।

अब कौन कहता है कि लड़कियां कमजोर होती हैं, लड़कियां घर का काम करने के लिए होती हैं और न जाने क्या-क्या। इन सब वाक्यों पर बस एक लगाम लगाने के लिए नैना जायसवाल का नाम काफी है। 16 साल की उम्र में इतनी उपलब्धियां कमाना आसान नहीं है और हर किसी के बस की बात भी नहीं है।


अब नैना की निगाह 2020 के ओलंपिक्स पर है। नैना के इरादे मजबूत हैं तो बेशक हर जंग में उन्हें सफलता मिलेगी। मेहनती और लगनशील के पर्याय में एक नाम 'नैना' का नाम लेना जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। बाकि नैना के लिए ढेर सारी दुआएं और शुभकामनाएं। इनके जज्बे को 100 सलामी।

वैश्य समाज के उत्तर प्रदेश से नव निर्वाचित विधायक


वैश्य समाज के उत्तर प्रदेश से नव निर्वाचित विधायकों का सादर अभीनन्दन, बहुत बहुत शुभकामनाऐं !!

1..श्री राधामोहन दास अग्रवाल (गोरखपुर शहर)
2..श्री जगनप्रसाद गर्ग (आगरा उत्तरी)
3..श्री सत्यप्रकाश अग्रवाल (मेरठ कैट)
4..श्री राजेश अग्रवाल (बरेली कैट)
5..श्री नितिन अग्रवाल (हरदोई)
6..श्री संजय गर्ग (सहारनपुर नगर)
7..श्री अतुल गर्ग (गाजियाबाद)
8 ..श्री राजकुमार अग्रवाल (संड़ीला)
9..श्री कपिल देव अग्रवाल (मुजफ्फरनगर)
10.श्री महेश कुमार गोयल (खेरागढ)
11.श्री वेद प्रकाश गुप्ता (अयोध्या)
12.श्री रितेश गुप्ता (मुरादाबाद)
13.श्री महेश गुप्ता (बदांयू )
14.श्री पंकज गुप्ता (उन्नाव)
15.श्री विकास गुप्ता (अयाहशाह)
16.श्री नन्द लाल गुप्ता (इलाहाबाद दक्षिण)
17.श्री संगम लाल गुप्ता (प्रतापगढ)
18.श्री संजय प्रताप जायसवाल (रुधोली)
19.श्री अनुपमा जायसवाल (बहराइच)
20.ड़ा नीरज बोरा (लखनऊ)
21.श्री रविन्द्र जायसवाल (वाराणसी उत्तरी)
22.श्रीमति संजू देवी (टांडा)
23.श्री अजय कुमार लल्लू (Tamkuraj)

24. श्री राकेश राठोर (सीतापुर )

सभी नई जिम्मेदारी के साथ उत्तरप्रदेश के विकास को नई ऊंचाईयों की ओर अग्रसर कर वैश्य समाज का नाम रोशन करें !



Tuesday, March 7, 2017

वानिया चेट्टीयार (तेली वैश्य) कुलभूषण "माता कन्नगी देवी"

वानिया चेट्टीयार (तेली वैश्य) कुलभूषण   "माता कन्नगी देवी"


आज से लगभग हज़ारो वर्ष पूर्व तमिलनाडु में मदुरई के पास एक गांव में कोवलन नामक वानिया चेट्टीयार (तैलिक वैश्य ) रहता था। कोवलन की पत्नी का नाम कन्नगी था। कन्नगी कोवलन से असीमित प्रेम करती थी। कन्नगी वेदों शास्त्रो की ज्ञाता थी और उच्च कोटि की पतिव्रता थी। कोवलन एक व्यापारी था और व्यापार के कारण अक्सर उसे बाहर जाना पड़ता था। एक बार कन्नगी ने अपने हाथ के सोने के कंगन कोवलन को बेचने हेतु दिए। कोवलन व्यापार के लिये बाहर गया। एक नर्तकी जिसका नाम माधवी था, कोवलन उसी के यहाँ रुक गया और उस स्त्री से उसके सम्बन्ध बन गए। लेकिन कुछ दिन बाद कोवलन को ऐसा एहसास हुआ की मेरी पत्नी कन्नगी मेरी राह देख रही होगी। जो मैं कर रहा हूँ, वह गलत है। ऐसा विचार कर कोवलन वापिस घर लौटने की सोचने लगा। मदुरई पहुंचकर कोवलन ने कन्नगी के सोने के कंगन मदुरई के व्यापारियो को बेच दिया। मदुरई में उस समय महाराजा पांड्य का शासन था। राजा पांड्य की पत्नी के कंगन चोरी हुए थे। राजा ने रानी के चोर को पकड़ने हेतु सिपाही फैला रखे थे। सिपाहियो ने अपने राज्य में कोवलन को देखा और उसके कंगनों को देखा जो हु बहु महारानी के कंगन जैसे थे। कोवलन को गिरफ्तार कर लिया गया। राजा पाण्ड्य ने कोवलन को मृत्युदंड दिया। उस ज़माने में चोरी, रेप इत्यादि पर सीधा गर्दन कलम होती थी। कोवलन की गर्दन धड़ से अलग कर दी गयी। उसे अपनी बात कहने का मौका ही नहीं दिया गया।

कोवलन की मृत्यु की खबर सुनकर कन्नगी को बहुत बड़ा झटका लगा। उसने राजा पांड्य के दरबार में प्रवेश किया और रानी के कंगन के समान 4 कंगन और दिखाए। और कहा की "ये कंगन मेरे है , मेरे पति चोर नहीं थे उनके पास आपकी रानी के कंगनों जैसे कंगन थे,आपने एकपक्षीय फैसला देकर मुझसे मेरा सुहाग छीन लिया"

राजा ने जाँच करायी तो मालूम पड़ा की रानी के कंगन तो महल में ही है। राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ मगर अब चिड़िया खेत चुग गयी थी।

रोती बिलखती कन्नगी ने कहा--- अगर मैंने मन वचन कर्म से अपने पति की सेवा की है तो हे अग्निदेव मेरे निर्दोष पति की ह्त्या करने वाले इस राज्य का विनाश कर दीजिये। बच्चों और बूढो को छोड़कर इस राज्य में सब कुछ जलकर राख हो जाये। धिक्कार है ऐसे न्यायतंत्र को जहाँ मेरे पति को झूठे आरोप में मृत्युदंड दे दिया गया।

कन्नगी ने ऐसा बोला ही था की पूरा मदुरई राज्य धू-धू कर जल उठा। राजा पांड्य गिड़गिड़ाने लगे मगर कुछ न हुआ। और चारो तरफ हाहाकार मच गया।

उधर कन्नगी पागलो की तरह खुले केश किये हुए रोती हुयी भटकने लगी। इतिहासकारो के अनुसार कन्नगी सशरीर एक विमान पर बैठकर स्वर्ग गयी थी और उसको लेने उसका पति स्वयं आया था।

आज भी जब मदुरई जाते है तो रास्ते में कई किलोमीटर का क्षेत्रफल अग्नि से जला हुआ साफ साफ दिखता है। कांचीपुरम का शिव मंदिर भी इसी आग की चपेट में आ गया था।

ये घटना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर बल देती है।
ये घटना वर्तमान समय में व्याप्त "Contempt of court" नामक व्यवस्था पर एक प्रहार है।

अगर लोगो को न्याय नहीं मिलेगा तो वो न्यायपालिका का अनादर करेंगे ही..

फिर क्यों न हम डायना की जगह कन्नगी को न्याय की देवी माने? और उसे ही न्यायालय में लगाएँ ।डायना के आँखों में पट्टी होती है जबकि कन्नगी देवी की आँखों में नहीं ।

वर्तमान में देवी कन्नगी की पूजा तमिलनाडु में होती है।

Monday, March 6, 2017

BHAVYA GANDHI भव्य गांधी



भव्य गांधी भारतीय अभिनेता हैं। भव्य एक जैन वैश्य परिवार से हैं यह मुख्यतः तारक मेहता का उल्टा चश्मा में टपू या टीपेन्द्र जेठालाल गड़ा नामक किरदार के लिए जाने जाते हैं। यह 2010 में स्ट्राइकर नामक एक फिल्म में बाल्य कलाकार के रूप में सूर्यकांत नामक एक किरदार निभाया था।

इनके अभिनय की शुरुआत तारक मेहता का उल्टा चश्मा नामक धारावाहिक से हुई थी। जिसका प्रसारण सब टीवी पर 28 जुलाई 2008 से शुरू हुआ था। इसमें यह टीपेन्द्र जेठालाल गड़ा जिसे प्यार से टप्पू कहते हैं, का किरदार निभा रहे थे। 2010 में स्ट्राइकर नमक फिल्म में बाल अभिनेता के रूप में सूर्यकांत का किरदार निभाया था। इस फिल्म में इनके साथ सिद्धार्थ, विद्या मलवाड़े, पद्म प्रिया, अनुपम खेर, सीमा बिस्वास और आदित्य पंचोली ने भी काम किया था।

2017 में तारक मेहता का उल्टा चश्मा के धारावाहिक को इन्होंने छोड़ दिया। भव्य ने टेलीचक्कर को इस धारावाहिक को छोड़ने के कारण पूछने से बताया कि "हाँ मैंने इसे जनवरी में छोड़ दिया, इसके आठ साल और आठ महीने का सफर काफी अच्छा रहा, मैंने तारक... की टीम और असित मोदी के साथ इसका काफी आनन्द लिया और जिस तरह से मेरे प्रशंसकों ने मुझे प्यार दिया, मैं चाहता हूँ कि उसी तरह भविष्य में भी मुझे इसी तरह प्यार करें।" इनसे जुड़े एक व्यक्ति ने टेलीचक्कर को इनके इस धारावाहिक को छोड़ने का कारण बताया कि भव्य अब अभिनेता के रूप में और आगे बढ़ना चाहते हैं और नए परियोजनाओं में काम करना चाहते हैं। भव्य को हाल ही में एक गुजराती फिल्म में काम करने का मौका मिला है। यह उनकी पहली गुजरती फिल्म है।

Thursday, February 16, 2017

Vikas Agarwal is member of making Space rocket team



पिछले साल तक किराने की दुकान चलाते थे विकास। अब स्पेस रॉकेट मेकिंग टीम के हैं मेंबर।

रायपुर.छत्तीसगढ़ के छोटे से शहर कोरबा के गांव में किराने की दुकान चलाने वाले एक युवक ने मेहनत के दम पर ऊंची उड़ान भरने का सपना देखा। इसके लिए उसने इसरो का एग्जाम दिया और पांचवीं रैंक हासिल कर साइंटिस्ट बने। बुधवार को इसरो ने जिस रॉकेट से 104 सैटेलाइट भेजकर रिकार्ड बनाया, उसे बनाने में इस युवक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

-काेरबा शहर के बालगी इलाके में पुश्तैनी किराना दुकान चलाने वाले विकास अग्रवाल ने मेहनत के दम पर ऊंची उड़ान भरी है।

-6वीं कक्षा से किराना दुकान में लोगों को सामान बेचते हुए खाली समय में सेल्फ स्टडी करने वाले विकास ने साइंटिस्ट बनने का सपना देखा था।

-लगातार कड़ी मेहनत के दम पर पिछले साल वो सपने को हकीकत में बदलने में कामयाब रहे। अब वे इसरो में साइंटिस्ट हैं।

-इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) ने बुधवार को एक साथ 104 उपग्रह लॉन्च कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। पीएसएलवी 37 के तहत यह उपग्रह लॉन्च किए गए।

-देश की साख बढ़ाने वाले इस मिशन में प्रदेश के 26 साल के यंग साइंटिस्ट विकास अग्रवाल का भी कॉन्ट्रीब्यूशन रहा है।

-विकास इन दिनों इसरो के त्रिवेंद्रम सेंटर में हैं। यहां सैटेलाइट को लेकर जाने वाले रॉकेट तैयार किए जाते हैं।

-सिक्योरिटी रीजंस के चलते विकास ने अपना एक्जेक्ट वर्क शेयर करने से असमर्थता जताई।

-इस मिशन में विकास का रोल ऐसे समझ सकते हैं कि रॉकेट का वो ऊपरी हिस्सा जहां सैटेलाइट कैरी किया जाता है उसे तैयार करने के प्रोजेक्ट में वे शामिल थे।

इसरो ने अपनी धमक और मजबूत कर ली

-विकास ने बताया कि सभी उपग्रहों को लेकर पीएसएलवी 37 ने श्री हरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरी।

-इसके करीब 17 मिनट बाद रिमोट-सेंसिंग कार्टोसेट-2 को कक्षा में स्थापित कर दिया गया।

-इसरो ने करीब 28 मिनट के अंदर सभी 104 सैटेलाइट को अपनी-अपनी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया।

-इसी के साथ वर्ल्ड स्पेस साइंस में इसरो ने अपनी धमक और मजबूत कर ली।

ऐसे पहुंचे इसरो तक

-दुकान में मिलने वाले खाली समय के अलावा विकास रोज देर रात तक पढ़ाई करते। नतीजतन, 12वीं में 89 परसेंट लाने में कामयाब रहे।

-इसी दौरान उन्होंने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग यानी गेट दिया। देशभर में 1600 रैंक आई, लेकिन घरवालों ने दूर रहकर पढ़ने की अनुमति नहीं दी।

-घरवालों से कुछ भी शेयर किए बिना विकास साइंटिस्ट बनने की तैयारियों में जुटे रहे। इसरो के एग्जाम के बारे में पता चला और भर दिया फॉर्म।

-साल 2014 में इसरो का टेस्ट दिया, मगर कामयाबी नहीं मिली। निराश होने के बजाय खामियां सुधारकर दोगुने जोश से तैयारी की और साल 2015 में फिर एग्जाम दिया।

-अक्टूबर 2015 में हुए रिटन एग्जाम में देशभर से शामिल दो लाख युवाओं में विकास ने ऑल इंडिया टॉप -5 रैंक हासिल की।

-साइंटिस्ट की इस पोस्ट के लिए विकास सहित 300 लोगों को फरवरी 2016 में इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, जिसमें विकास चुन लिए गए।

साभार दैनिक भास्कर 




Monday, February 13, 2017

History Of Nema Samaj “नेमा समाज” का इतिहास

“मनु-स्मृति”में वर्णित है कि सृष्टि के निर्माण के पूर्व ही ब्रम्हाजी ने मनुष्य जाति के लिए कुछ जीवन मूल्यों को निर्धारित करके उपदेश के रूप में महाराज मनु को प्रदान किया, जिसे महर्षि भृगु ने उन्हीं के शब्दों में धर्मशास्त्र के रूप में अन्य ऋषियों को प्रदान किया। सात्विक जीवन यापन एवं स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था हेतु एक नियमावली तय की गई थी जिसमे कहा गया था…..

धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह
धी विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्

धृतिः – धैर्य; प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य न खोना।

क्षमा – बिना बदले की भावना से किसी को भी क्षमा करना।

दमो – मन को नियंत्रित कर मन का स्वामी बनना।

अस्तेय – किसी अन्य के स्वामित्व की वस्तुओं एवं सेवा का

उपयोग न करना या चोरी न करना।

शौचं – विचार, शब्द और कार्य में पवित्रता।

इन्द्रिय निग्रह- इन्द्रियों को नियंत्रित करके स्वतंत्र होना।

धी। – विवेक, जो कि मनुष्य को सही एवं गलत में

अंतर बताये।

विद्या – भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान।

सत्य – जीवन के हर क्षेत्र में सत्य का पालन करना।

अक्रोधो- क्रोध न करना क्योंकि क्रोध से हिंसा पैदा होती है।

यही वे दस नियम थे जिनका अक्षरशः नियम से पालन करने के कारण हम ‘नेमा’कहलाये।

(2)हमारी गौत्र व्यवस्था………..

“नेमा” और “नीमा” वैश्य समुदाय की उपजातियाँ हैं जो मुख्यतः भारत के मध्यप्रदेश में पायी जाती हैं।कहते हैं यह नाम हमें हमारे पूर्वज राजा “निमी” से प्राप्त हुआ है।पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महिर्षि परशुराम क्षत्रियों का नाश कर रहे थे, तब महिर्षि भृगु ने लगभग 30 क्षत्रियों को अपने आश्रम में पनाह दी और अपने गुरुकुल में उन्हें स्वयं की रक्षा करने के लिए वणिक जाति के गुणधर्मों की शिक्षा-दीक्षा दी।भृगु ऋषि ने अपने इन शिष्यों को 14 ऋषियों में नियोजित किया और इन्हीं ऋषियों के नाम के अनुसार नेमाओं को 14 गोत्रों में वर्गीकृत किया गया है………

1. सेठ मोरध्वज

2. पटवारी कैलऋषि

3. मलक रघुनंदन

4. भौंरिया वासन्तन

5. खिरा बालानंदन

6. ड्योढ़िया शांडिल्य

7. चंदरेहा संतानी तुलसीनंदन

8. ट्योंठार गर्ग

9. रावत नंदन

10. भंडारी विजयनंदन

11. खंडेरेहा सनकनंदन

12. चौसहा शिवनंदन

13. किरमनिया कौशलनंदन

14. औगान वशिष्ठ

नीमा और नेमाओं की अन्य उपाधियों में लगभग एक समान गोत्रों का ही प्रचलन है जिसका उपयोग वैवाहिक परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। मध्यभारत में ज्यादातर लोग नाम के साथ ‘नेमा’ कुलनाम प्रयोग करते हैं जबकि यही मालवा एवं गुजरात में ‘नीमा’ शब्द से उच्चारित किये जाते हैं।

(3) ऐतिहासिक पृष्ठभूमी………

इतिहासकारों ने जितनी सजगता एवं तत्परता राजवंशों के लेखन में दिखायी है उतनी जातीय इतिहास लेखन में नहीं। यही कारण है कि जातीय एवं उपजातीय इतिहास विशुद्ध रूप से सामने नहीं आ पाया।नेमा मुख्यतः व्यापार एवं वाणिज्य के लिए जाने जाते रहे हैं। राजवंशों के शासनकाल में जब विभिन्न प्रकार की मुद्राओं का चलन था तब ये ‘सेठ’ और ‘महाजन’ कहे जाते थे।अलग-अलग व्यवसाय के अनुसार आड़त का धंधा करने वाले आड़तिया, सोने-चाँदी का धंधा करने वाले सराफ, मंडी में क्रय विक्रय की मध्यस्थता करने वाले ठडवाल, औषधि विक्रेता महाजन पंसारी कहलाते थे। राज्य तथा जागीरों की प्रशासनिक व्यवस्था से सम्बद्ध महाजनों को वेतन के बदले भूमि दी जाती थी तो कुछ कृषि कार्य भी करने लगे थे। वैश्यो की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। जागीरों की प्रशासन व्यवस्था चलाने, सामंतों को ऋण प्रदान करने में, ब्रिटिश सरकार को खिरज चुकाने तथा राजपूतों को अपनी सामाजिक रूढ़ियों और गौरव का निर्वाह करने के लिए समय समय पर सेठ साहूकारों की शरण लेना पड़ता था। इससे वैश्य महाजनों का सामाजिक और राजनितिक रुतबा भी था।

(4)मूल निवास और पलायन……………

नेमाओं की उत्पत्ति जयपुर,राजस्थान रियासत मानी जाती है।18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध से ब्रिटिश संरक्षण की स्थापना तक अंतरराज्यीय युद्धों, उत्तराधिकार संघर्ष, महाराणा और उसके सामंतो के पारस्परिक संघर्ष के चलते राज्य की आर्थिक स्थिति अस्तव्यस्त हो गयी थी और पारंपरिक व्यवसाय करना पहले जैसी मर्यादा न रह गया था। प्रमाण मिलता है कि राजपूतों के पतन के बाद खिन्न,एक विशाल वैश्य समुदाय पलायन करके मध्यभारत आ गया। ये लोग शांतिपूर्ण एवं खुशहाल जीवन जीना चाहते थे तो इन्होंने गोंडवाना के उपजाऊ क्षेत्र, जो कि नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के आसपास थे को चुना और आकर बस गए।उपनिवेशवाद के दौर में विश्व युद्ध के दौरान अंतर्देशीय विद्रोह के बाद कई लोग आफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, मॉरिसस आदि देशों में चले गए।नतीजतन आज नेमा पूरी दुनिया में मौजूद हैं। उन्होंने अपने रहने और भाषा के हिसाब से अपनी संस्कृति को बदला है किन्तु आज भी उनकी विरासत के मद्देनजर कहा जाता है कि नेमा पूरी दुनिया में कहीं भी रहें उनका एक न एक रिश्तेदार नरसिहपुर का अवश्य ही रहता है।

(5) सामाजिक भेद……बीसा, दसा और पचा समाज………

नेमा उपजाति की संख्या 10 से 15 हजार होने का अनुमान है जिसमे अधिकांशतः सागर, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी जिलों में रहते है। कुछ नेमा उपजातियां मध्यभारत के निमार से बुंदेलखंड में आ बसी हैं जो बगैर पानी में पकाया हुआ भोजन करती हैं उन्हें गोलापूर्व बनिया कहा जाता है। ये मुख्यतः हिन्दू हैं,जैनों की मिश्रित जातियां।

अन्य वैश्य समाजों की तरह नेमा भी बीसा, दसा, और पचा शाखाओं में बंटे हुए हैं। राजपूत काल में समाज उपेक्षित जातियों के लोगों ने जैन धर्म अंगीकार कर लिया था। धीरे-धीरे जाति मिश्रण प्रक्रिया के फलस्वरूप इनमें शाखा,प्रशाखा, गौत्र आदि के भेद उत्पन्न हो गए थे। जातिवादी अलगाव की भावना प्रबल होती गयी। ऊँच-नीच का सामाजिक भेद-विभेद विवाह संबंधों में मापा जाने लगा था, जो कि मान्यता स्वरुप आज भी जारी है। बीसा शुद्ध रूप,जबकि दसा अनियमित समुदाय माना जाता है।महाजनों द्वारा अन्य जाति की स्त्रियों से उत्पन्न सदस्य अर्धजातिक होते थे, जिन्हें पंचाल या पांचड़ा(पचा) कहा जाने लगा था। कुछ पीढ़ियों के बाद पूर्वजों का विवरण भुला दिया गया फलतः कुछ पचा भी दसा समाज में मिश्रित हैं।दसा और बीसा एक साथ भोजन तो कर सकते हैं किन्तु आपस में विवाह नहीं कर सकते ऐसी मान्यता बना दी गई थी। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि आज की अपेक्षा हमारे पूर्वज अधिक धार्मिक थे किन्तु वे सामाजिक मामलों में पूर्णतया बुद्धि, विवेक और सिद्धांतवादी थे। आज जैसी संकीर्णता उनमें न थी। उच्च गुण,कर्म, स्वभाव वाली कन्या के लिए वैसा ही वर ढूंढा जाता था। वर्ण में गुणों का मेल होना आवश्यक था, जाति-उपजाति और जो ये शाख़ाएँ हैं, बीसा, दसा, पचा उनमें नहीं।कन्याओं के लिए ही नहीं,लड़कों के लिए भी उच्च गुणों वाली लड़की ढूंढी जाती थी फिर वह भले ही निम्न कुल की क्यों न हो।प्रसन्नता पूर्वक इन विवाहों को सामाजिक मान्यता प्राप्त होती थी और इससे व्यक्ति की सामाजिक वरीयता और प्रतिष्ठा में कोई अंतर नहीं आता था। कहने का तात्पर्य वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आत्म विश्लेषण और सामाजिक विश्लेषण दोनों आवश्यक हैं।

(6) वर्तमान परिदृश्य………..

वर्तमान में नेमा अपनी ईमानदारी, कर्मठता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं।आज वे विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अग्रणी हैं। वकालत के क्षेत्र में, बैंकिंग में, चिकित्सा के क्षेत्र में, इंजिनियर और साफ्टवेअर प्रोफेशनल के रूप में हर जगह नेमा छाये हुए हैं।कुछ प्रतिष्ठित परिवार है जिन्होंने समाज को प्रभवित किया है जिनमें भोपाल का लहरी परिवार, सागर का चौधरी परिवार, नरसिंहपुर का बड़ा घर, मंझला घर, संझला घर, नन्हा घर,पुरावाले परिवार, नाजर, खिरा एवं खुरपे परिवार,वेदू का चौधरी परिवार जबलपुर का गुप्ता परिवार, सतना का नायक परिवार, करेली के भौंरिया,सेठ एवं मंदिर वाला परिवार, मेख का बाखर परिवार, पनारी का मोदी परिवार इत्यादि। आज नेमा भारत भर में हैं। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर, जबलपुर, सतना, सिवनी, घंसौर, छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा, सागर, भोपाल में ये बहुतायत में निवासरत हैं।

हमारी आज की पीढ़ी को भूतकाल से अवगत कराने के लिए उक्त सभी जानकारियाँ इकट्ठी की गयी हैं। कई जानकारियाँ दोषपूर्ण भी हो सकती हैं किन्तु मुख्य उद्देश्य ये है कि हम हमारी विरासत से कौन सी अच्छी बातों को अपने वर्तमान परिवेश में स्थान दें और भावी पीढ़ी के चरित्र निर्माण और सामाजिक निर्माण में कौन सी बातों का अहम स्थान होना चाहिए इसका विश्लेषण कर सकें, आत्ममंथन कर सकें।समीक्षा अवश्य कीजियेगा, कोई त्रुटि हो तो वो भी अवश्य कहियेगा………

साभार:सिद्धार्थनेमा,  http://nemasamajindia.com


Thursday, February 2, 2017

वैश्य समाज की वैश्विक विरासत

वैश्य समाज की वैश्विक विरासत (विरासत ट्रस्ट द्वारा शोध-परियोजना) 

भारतीय समाज-व्यवस्था में वैश्य समाज का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वैश्य समाज के अन्तर्गत अग्रवाल, माहेश्वरी, खण्डेलवाल, विजयवर्गीय, ओसवाल, जायसवाल, बरनवाल, जैन, केसरवानी, माथुरवैश्य, गहोईवैश्य, राजवंशी, रस्तोगी, रौनियार, वाष्र्णेय आदि अनेक घटक हैं। 

वैश्य समाज का प्राचीनकाल से वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण अवदान रहा है। यह अवदान परम्परागत विरासत के रूप में वर्तमान वैश्विक पीढ़ी को प्राप्त हुआ है तथा भावी पीढि़यों को प्राप्त होता रहेगा।

यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत मैगस्थनीज ने वैश्य समाज की विरासत की प्रशंसा में लिखा है-‘कि देश में भरण- पोषण के प्रचुर साधन तथा उच्च जीवन-स्तर, विभिन्न कलाओं का अभूतपूर्व विकास और पूरे समाज में ईमानदारी, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा प्रचुर उत्पादन वैश्यों के कारण है।' 

डाॅ. दाऊजी गुप्त वैश्य समाज की विरासत को रेखांकित करते हुए लिखते हैं- ‘वणिकों की आश्चर्यजनक प्रतिभा का प्रथम दिग्दर्शन हमें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त होता है। उस समय जैसे वैज्ञानिक ढंग से बसाए गए व्यवस्थित नगर आज संसार में कहीं नहीं हैं।आज के सर्वश्रेष्ठ नगर न्यूयार्क, पेरिस, लंदन आदि से हड़प्पा सभ्यता के नगर कहीं अधिक व्यवस्थित थे। ललितकला शिल्पकला और निर्यात-व्यापार पराकाष्ठा पर थे। इनकी नाप-तौल तथा दशमलव-प्रणाली अत्यन्त विकसित थी। भारतीय वणिकों ने चीन, मिश्र, यूनान, युरोप तथा दक्षिणी अमेरिका आदि देशों में जाकर न केवल अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाया अपितु उन देशों की अर्थव्यवस्था को भी सुधारा। ईसा से 200 वर्ष पूर्व कम्बोडिया, वियतनाम, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड आदि देशों में जाकर बस गए। वहाँ उनके द्वारा बनवाए गए उस काल के सैंकड़ों मन्दिर आज भी विद्यमान हैं। उसी काल में वे व्यापारी भारत से बौद्ध संस्कृति को अपने साथ वहाँ ले गए। वणिकों ने भारतीय धर्म, दर्शन और विज्ञान से सम्बन्धित लाखों ग्रन्थों का अनुवाद कराया जो आज भी वहाँ उपलब्ध हैं।'

वैश्य समाज की समाजसेवा प्रवृत्ति की प्रशंसा में राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने दिल्ली में 22 फरवरी 2009 को भाषण के दौरान कहा था कि ‘इस समाज का प्रेम और सद्भाव देश को मंदी के दौर से उबारने में सक्षम है। समाज लोगों की मदद में जुटा हुआ है। सामान्य हैसियत वाला वैश्य बन्धु भी जनसेवा में पीछे नहीं है। ऐसा समाज ही देश को सुदृढ बनाने की क्षमता रखता है।'

राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने 2 जनवरी 2009 को हैदराबाद में विचार प्रकट करते हुए कहा था कि ‘वैश्य समाज ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया । स्वतन्त्रता के बाद भी राष्ट्र निर्माण में वैश्य समाज की भूमिका सराहनीय रही। वैश्य समाज ने अपने वाणिज्यिक ज्ञान और व्यापारिक निपुणता का लोहा देश में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में मनवाया है। वैश्य समाज ने देश को बहुत से चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक समाजसेवी आदि दिए हैं तथा आर्थिक प्रगति और विकास कार्य में हमेशा भरपूर योगदान किया है।

22 जुलाई 1998 को भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकान्त ने वैश्य समुदाय को समाज का महत्त्वपूर्ण घटक बताते हुए कहा था - ‘भारत का सांस्कृतिक इतिहास बताता है कि व्यापार संस्कृति के प्रसार में भी बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। भारत के गणित खगोलशास्त्र आदि का ज्ञान धर्म-प्रचारकों के अलावा व्यापारियों द्वारा ही अरब और मध्य- एशिया के देशों में पहुँचा था और वहाँ से फिर यूरोप में। वैश्य प्राचीन समय से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ रहे हैं।' 

किन्तु वैश्य समाज की महनीय विरासत को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला। इतिहासकारों की संकुचित प्रकृति ही इसका कारण है। किसी देश व समाज का समग्र इतिवृत्त ही इतिहास का विषय होता है, पर प्रायः राजवंशों के उत्थान-पतन के साथ ही इतिहास के आरोह-अवरोह का संगीत चलता रहा है। राजवंशों का इतिहास दरबारी इतिहासकारों पर निर्भर रहा। ऐसे इतिहासकार पूर्ण सत्य का दर्शन न करा सके, फलस्वरूप अपूर्ण इतिहास केवल राजाओं के जन्म, राज्यारोहण, मृत्यु, युद्ध और सुधार के कार्यों में ही चक्कर काटता रहा।

भारतीय समाज की संरचना अनेक जातीय समाजों के योग से हुई है। प्रत्येक जातीय समाज की विशिष्ट मौलिक सांस्कृतिक-विरासत एवं राष्ट्रीय अवदान है। सभी जातीय समाजों के समग्र-विकास में ही भारतीय समाज का समग्र विकास निहित है। प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक दादाभाई नौरोजी ने कहा है कि सब जातीय समाज संगठित होकर कुरीति-निवारण, शिक्षा प्रसार आदि सामाजिक कार्यों में संलग्न रहें तो भारत एक सशक्त और अखण्ड राष्ट्र बना रहेगा- 

“If every caste and community formed its individual association and sincerely worked to eradicate social evils,to remove illiteracy and to spread education, aal the communities will ere long become national minded. Unity in various communities will automatically lead to converting All india communities without distinction of caste, creed and colour into one strong united Nation.” 

भारत की संविधान परिषद् के सदस्य डाॅ. सच्चिदानन्द सिन्हा ने जातीय समाजों की राष्ट्रीय विकास में भूमिका की सराहना करते हुए कहा था कि कोई समाज अपने अंगों की प्रगति से ही उत्कर्ष के शिखर पर पहुँचता है-

Societies advance as their component parts advance. As long Hindu Society was divided into castes, whose rules of behaviour of the progress were accepted by their members,social advance had to be a function of the progress made by each caste component. Before there can be a true spirit of nationality in our country each component part of the people must realise that its individualisation has realised a point in self-expression when it is desirable in the interest of further advanceor progress to merge its of with other groups or communities.

अतः वैश्य समाज की वैश्विक विरासत को उजागर करने के लिए अनुसन्धान की महती आवश्यकता है। इतिहास के शोधाश्रित पुनर्लेखन से ही पूर्ण सत्य प्रकाशित हो सकेगा तथा भावी पीढियाँ वास्तविक इतिहास को जान सकेंगी। पूर्व राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा का यह कथन सर्वथा यथार्थ है- ‘हमारे राष्ट्र में जितने भी समाज हैं उनका गहराई और विस्तार से अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि उनकी सांस्कृतिक विरासत के तत्त्वों को आने वाली पीढी के सामने रखा जा सके।

साभार : 
virasattrustsikar.blogspot.in/2014/07/blog-post.html

Sunday, January 22, 2017

भाविश अग्रवाल : ओला कैब : कभी घरवालों ने उड़ाया था मजाक, आज इस कंपनी के मालिक बन कमा रहे हैं 400 करोड़

कभी घरवालों ने उड़ाया था मजाक, आज इस कंपनी के मालिक बन कमा रहे हैं 400 करोड़

कहते हैंं सफलता उसी को मिलती है जो जिंदगी में कुछ अलग करता है. जब सफलता उसके कदमों में होती है, तो दुनिया उसे महान और काबिल बताती है. ऐसी ही एक कहानी है ओला कैब के संस्थापक भाविश अग्रवाल की, जिन्होंंने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर सड़कोंं पर अपनी कैब का सपना देखा और आज वो सपना हर महानगरों की जान बन गया है.
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माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च में करते थे नौकरी

जरा सोचिए! कोई क्यों लाखोंं की पैकज वाली नौकरी छोड़कर उस काम में हाथ आजमाएगा जहां सफलता मिलने का कोई ठिकाना नही हैं, लेकिन भाविश ने ऐसा नहीं सोचा और अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर ओला कैब के संस्थापक बनने की ठान ली.

कैसे सोचा ओला के बारे में

ये सोच एक सफर के साथ शुरू हुआ, जब भाविश एक बार बेंगलुरु से बांदीपुर एक किराए की कार में गए. उस दौरान उन्हें कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इस दौरान ड्राइवर ने उनसे ज्यादा पैसे मांगे, साथ ही पैसे ना देने पर सफर रोकने को कहा. उसके खराब बर्ताव की वजह से भाविश को कार छोड़कर बस से यात्रा करनी पड़ी. इस घटना के बाद भावेश ने कैब कंपनी बनाने का फैसला किया. उन्होंने महसूस किया कि जो दिक्कत उन्हें आई है, वही दिक्कत कई लोगों को आती होगी और यहीं से उन्होंने कैब बिजनेस में उतरने का मन बना लिया.


घरवालों और दोस्तों ने उड़ाया मजाक

माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च में काम कर रहे भाविश ने जब नौकरी छोड़कर इस काम में हाथ आजमाया तो घरवालों के साथ उनके दोस्तों ने भी उनका मजाक उड़ाया और कहा नौकरी छोड़कर बिजनेस चालू करना बेकार आईडिया है, पर भाविश नौकरी करने की जगह सेल्फ मेड एंटरप्रेन्योर बनना चाहते थे.


घरवाले सोचते थे ट्रैवल एजेंट का काम कर रहा हूं

भाविश कहते हैं ‘जब मैंने शुरुआत की तो मेरे माता-पिता सोच रहे थे कि मैं ट्रैवल एजेंट बनने जा रहा हूं. उन्हें समझा पाना काफी मुश्किल था, लेकिन जब ओला कैब्स को पहली फंडिंग हासिल हुई, तो उन्हें मेरे स्टार्टअप पर भरोसा हुआ.’


इन शहरों से शुरु किया सफर

माइक्रोसॉफट की नौकरी को अलविदा कहकर वो पहले मुंबई आए और फिर लुधियाना जाकर ओला कैब पर काम शुरू किया. भाविश अग्रवाल ने 2010-11 में ओला कैब्स की स्थापना की थी. इस दौरान उन्हें ना ही परिवार का साथ मिला ना ही दोस्तो का. लेकिन भाविश ने भी कुछ अलग करने की ठान रखी थी जिसकी जिद्द ने उन्हे आज कामयाब बना दिया.


ऐसे खड़ा किया खुद का कारोबार

भाविश ने अपने पैसों से कार ना खरीदकर बड़ी संख्या में टैक्सी ड्राइवर्स के साथ पार्टनरशिप की और पूरे सेटअप में आधुनिक टेक्नोलॉजी को शामिल किया. साथ ही इंटरनेट के माध्यम से इसे जोड़ा गया ताकि लोगों को बुक करने में आसानी हो. इतना ही नहीं शुरुआती दिनों में कई बार वो खुद कॉल लेते थे और ड्राइवर बनकर ग्राहकों को उनकी जगहों तक पहुंचाया करते थे.

आज है 400 करोड़ का टर्नओवर

भाविश ने आज कारोबार में एक नया मुकाम हासिल किया है. कई शहरोंं में ओला ने अपनी जगह बनाई है. इस कंपनी ने 2013-14 में करीब 418.25 करोड़ का कारोबार किया था. लेकिन अपनी सफलता के बाद भी भाविश हर दिन 15 घंटे काम करते हैं और खुद की सफलता का श्रेय वो अपने टेक्निकल बैकग्राउंड को देते हैं, जिसकी जरिए ओला ने इतना अच्छा काम किया हैं 

साभार : दैनिक जागरण 

Saturday, December 10, 2016

बनि‍यों की ये आदतें उन्‍हें बनाती हैं सबसे अमीर, आप भी जानें क्‍या है इनमें खास

बनि‍यों की ये आदतें उन्‍हें बनाती हैं सबसे अमीर, आप भी जानें क्‍या है इनमें खास


नई दि‍ल्‍ली। बनि‍या-वैश्य-वनिक समाज के लोगों को हमेशा से ही एक सफल कारोबारी माना जाता रहा है। इसमें कोई शक भी नहीं है क्‍योंकि‍ अगर आप देश के सबसे ज्‍यादा अमीरों की लि‍स्‍ट देखेंगे तो आपको बनिया कम्‍युनि‍टी के लोग ही नजर आएंगे। इसमें मुकेश अंबानी से लेकर लक्ष्‍मी नि‍वास मि‍त्‍तल और गौतम अड़ाणी तक शामि‍ल हैं। इस समाज के लोगों के खास कारोबारी सीक्रेट्स हैं जि‍नकी वजह से आज यह पूरी दुनि‍या में अपना कारोबार फैला रहे हैं।

बनि‍या कम्‍युनि‍टी से आए लोग आमतौर पर बि‍जनेस वर्ल्‍ड में राज करते हैं। वह जि‍स कारोबार को शुरू करते हैं वह उसे सफल बना लेते हैं। आइए जानतें हैं कि‍ वह पैसे का इस्‍तेमाल इतने अच्‍छे ढंग से कैसे करते हैं।

जोखि‍म उठाने वाले

कम उम्र में बनि‍या कम्‍युनि‍टी के लोग जोखि‍म उठाने की क्षमता रखना शुरू कर देते हैं। इलाहाबाद में पैदा हुए मनमोहन अग्रवाल ने अपना खुद का बि‍जनेस मात्र 15 साल की उम्र में शुरू कि‍या। उन्‍होंने एक जगह कहा है कि‍ मेरे पि‍ता ने मेरे भीतर कड़े फैसले करने की क्षमता, जोखि‍म उठाने का साहस और कि‍सी भी चीज को करने में अपना 100 फीसदी योगदान देने की आदत को डाला। 8 साल तक छोटा बि‍जनेस करने के बाद उन्‍होंने एक ऑनलाइन कंपनी खड़ी की जि‍से आज येभी.कॉम के नाम से जाना जाता है।

अकाउंट को साफ सुधरा रखना

बनि‍या शब्‍द संस्‍कृत के वाणिज्य शब्‍द से नि‍कला है जि‍सका मतलब कॉमर्स होता है। बनि‍या कम्‍युनि‍टी के लोग अपने बही-खातों (अकाउंटिंग बुक्‍स) को रोजाना अपडेट करते हैं। इन कि‍ताबों को वह चोपडी कहते हैं और बनि‍या कम्‍युनि‍टी के लोग पारंपरि‍क रूप से नई अकाउंट बुक को खोलने के साथ अपने नए साल की शुरुआत दि‍वाली से करते हैं।

पैसा बनाने को मौका नहीं छोड़ना

कारोबार करने वाले लोग कभी भी पैसा कमाने के मौके को नहीं छोड़ते। वह खुद को 24 घंटे और सातों दि‍न बि‍जनेस के साथ जोड़ कर रखते हैं। उनहें मुनाफा बनाने वाले कारोबार की समझ है और वह अपना फोकस बि‍जनेस कभी नहीं हटाते।

लीडरशि‍प स्‍कील

बनि‍या कम्‍युनि‍टी के लोगों में लीडरशि‍प स्‍कील भी काफी अच्‍छी है। वह बि‍जनेस के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी अपनी इस क्‍वालि‍टी को दि‍खाते हैं। इसके दो उदाहरण हमारे सामने हैं एक नरेंद्र मोदी, अमित शाह और दूसरे अरविंद केजरीवाल। दोनों ही पश्‍चि‍म और उत्‍तर भारत की वैश्य व्यापारिक कम्‍युनि‍टी से आते हैं।

भारत के अरबपति‍यों में बनि‍या कम्‍युनि‍टी का कब्‍जा

देश का सबसे ज्‍यादा अमीर व्‍यक्‍ति‍ बनि‍या – मुकेश अंबानी है। मुकेश अंबानी की नेटवर्थ 21.5 अरब डॉलर है। इसके बाद लक्ष्‍मी मि‍त्‍तल के नाम आता है जि‍नकी नेटवर्थ 21.1 अरब डॉलर है। इसके अलावा, शशि‍ रुइया और रवि‍ रुइया, गौतम अड़ाणी, कुमार मंगलम बि‍ड़ला, अनि‍ल अंबानी और सुनि‍ल मि‍त्‍तल, दिलीप सिंघवी  का नाम आता है।

साभार : MoneyBhaskar | December 09, 2016, 02:59PM IST

Monday, November 21, 2016

तेली समाज अपने नाम के आगे लिखें ‘मोदी’: प्रहलाद मोदी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छोटे भाई प्रहलाद मोदी ने देश के तेली समुदाय के लोगों से अनुरोध किया है कि वो अपने नाम के आगे ‘मोदी’ लिखें।

भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छोटे भाई प्रहलाद मोदी ने देश के तेली समुदाय के लोगों से अनुरोध किया है कि वो अपने नाम के आगे ‘मोदी’ लिखें। तैलिक साहू समाज की अखिल भारतीय युवक-युवती परिचय सम्मेलन को रविवार को संबोधित करते हुए प्रहलाद ने कहा कि मैं जब से यहां आया हूं तब से एक ही बात सुन रहा हूं कि देश का गौरव, समाज का गौरव नरेंद्र मोदी हैं। लेकिन हम सब तेली समाज के सदस्य अपने नाम के आगे ‘मोदी’ लिखने के लिए तैयार क्यों नहीं होते।

उन्होंने कहा कि हमारे तेली समाज के नेताओं ने अपनी-अपनी रोटियां सेंकने के लिए हमारी पहचान साहू, चौहान, परमार, राठौड़ और जैसवाल जैसी विभिन्न जातियों के रूप में कर रखी है। प्रहलाद ने कहा कि कर्मादेवी तेली थीं, कर्मादेवी के हम बच्चे हैं और हम तेली है, हम मोदी हैं। आज से ही तय करें कि हम हमारे नाम की शुरुआत मोदी से करें। उन्होंने बताया कि अगर हम मोदी के नाम से अपना परिचय शुरू करें तो मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान में हमारे तेली समाज की आबादी 14 करोड़ हो जाएगी। फिर भी हम बंटे हुए हैं, गुटबाजी में हैं और ये राजनीतिक पार्टियां हमें बेवकूफ बनाती हैं। इसीलिए हमें एक होना है।

प्रहलाद ने कहा कि जब तक हम लोग हमारा परिचय एक नहीं करेंगे, तब तक राजनीतिक पार्टियां हमारा दुरुपयोग करती रहेंगी। अगर हमें इस दुरुपयोग से बचना है, हमें अपने समाज को राष्ट्रीय अखाड़ा नहीं बनाना है, तो हमें अपनी पहचान एक करनी होगी। उन्होंने कहा कि पाटीदार और राजपूतों में भी तेली समाज की तरह विभिन्न उप जातियां हैं, लेकिन उनके परिचय की राष्ट्रीय पहचान क्रमश: पाटीदार और राजपूत हैं।

साभार : IBNKHABAR


Thursday, November 3, 2016

VARSHNEYA VAISHYA - वार्ष्णेय वैश्य समाज

बारहसैनी समाज का उद्गम महाभारत के समय या भगवान श्री कृष्ण की सदी से है। हमारे इष्ट देव श्री अक्रूर जी महाराज हैं जो वृष्णि वंश में उत्पन्न हुये। यह वृष्णि वंश यदुकुल की एक शाखा थी जिसमें भगवान श्री कृष्ण जी का भी अवतार हुआ।

श्री अक्रूर जी महाराज का जन्म श्री कृष्ण जी के पितृकुल में हुआ था अत: वे श्री कृष्ण जी के रिश्ते में चाचा लगते थे। इन सभी तथ्यों में कोई विरोधाभास नहीं मिलता है और पौराणिक सभी ग्रन्थ इन तथ्यों की पुष्टि करते है।

वृष्णि वंश के विषय में सभी पौराणिक ग्रन्थों में इस प्रकार व्याख्या दी गयी है–

वृषस्य पुत्रो मथुरासीम।तस्यापि वृष्णि प्रमुखं पुत्रं शातगसति।
यतो वृष्णि सलामेत दगोत्र भवाय। (4–11–26–27–28) & विष्णु पुराण।

अर्थात् वृश का पुत्र मधु हुआ। मधु के सौ पुत्र हुये जिनमें पहला वृष्णि था। इसी के नाम से ही यह कुल वृष्णिकुल हुआ।

वृष्णिकुल का सीधा सम्बन्ध क्षत्रीय समाज से है लेकिन इतिहास यह दर्शाता है कि जिन क्षत्रियों या ब्राह्मणो ने अपने कर्मों को आधार ‘‘व्यापार’’ बनाया वे ‘‘ वैश्यो’’

वंश के जिस क्षत्रिय समुदाय ने व्यापार को अपनाया उनका कुल ‘‘ बारहसैनी’’ और बाद में ‘‘वार्ष्णेय’’ शब्द से सम्बोन्धित किया गया।

जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने अपना समस्त काल मथुरा–वृन्दावन और आसपास के स्थानों पर क्रीड़ाये एवं लीलायें दिखाकर व्यतीत किया, उसी प्रकार हमारे समाज की जन्मदात्री मथुरा–वृन्दावन की पावन भूमि है।

यह बात प्रसिद्ध है कि वृष्णि और उनकी सन्तान मथुरा और उसके आसपास की जगहों पर ही निवास करती थी। वृष्णि के पिता का नाम मधु था और इसी कारण शायद नगर का नाम भी मथुरा पड़ा। आसपास की जगह मधुपुरी एवं मधुवन कहलायी।

‘‘मधुवन में राधिका नाची रे...............................................।’’ यह जगत विख्यात है।



मि0 कुर्क साहिब (अंग्रेज) की किताब ‘‘Enthographical Handbook’’ में 14/16 वें

पृष्ठ पर बारहसैनी शब्द का अर्थ इस प्रकार लिखा है:–

‘‘ प्राचीन होने के विचार से भी बारहसैनी विरादरी सर्वोपरि है उसकी उत्पत्ति की खोज महाभारत के पहले से मिलती है और अन्य विरादरियों की वावत यह भलीभाँति निश्चय हो चुका है कि वह महाभारत से कही पीछे उत्पन्न हुई।’’

उन्होंने जो वृतान्त बारहसैनियों का दिया है वह इस प्रकार है :–

‘‘बाहरसैनी मथुरा, बुलन्दशहर, अलीगढ़, बदायूँ, मुरादाबाद एवं एटा जिलों में रहते है। मथुरा के चारो ओर 84 कोस का क्षेत्र जो ‘‘बृज’’ की सीमा कही जाती है, बारहसैनी समाज की बसावट का क्षेत्र है।’’



बारहसैनी / वार्ष्णेय शब्दो की उत्पत्ति के विषय में कोई ठोस लेख प्राप्त नही है लेकिन पौराणिक गृन्थों एवं इतिहास के पन्नो का अवलोकन करने से कुछ अनुमान लगाये जा सकते है।

श्री अक्रूर जी महाराज के बारह भाई थे और एक बहिन थी, शायद इसी कारण उनके वँशजो ने "बारह" शब्द को अपनाया।

श्रेणियों की विश्वव्यापी परम्परा

"बारहसैनी" पत्रिका के जनवरी 1969 के अंक में आचार्य मुरारीलाल जी द्वारा लिखित एक लेख पढने को मिलता है।
 
इस लेख में उन्होनें प्राचीन समय में श्रेणियों के महत्व को दिखाया है। लेखक अनुसार ज्यों ज्यों कृषि पर आधारित, खानपान से सम्बन्धित पदार्थो के अतिरिक्त अन्य घरेलु सामानों का उदय हुआ, एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ जो मन्डियों में वस्तुओ को बेचने लगा। यह वर्ग कृषि जीवी नहीं था अतः इनकी बस्तियां गावों से पृथक बसने लगी। यही कस्बो / नगरो का आरम्भ था जिनकी जनसँख्या धिरे धिरे गावों की जनसँख्या से बढी होने लगी ऐसे कस्बो / नगरों में व्यापार करने वाले वार्णक सँगठित होने लगे। यह स्वाभाविक था कि बे वार्णक जो एक साथ रहते थे, पारस्परिक लाभ और सुरक्षा के लिये एक सँगठन सुत्र में बँध जाते थे। ऐसे ही सँगठन को वार्णक श्रेणी कहा जाता था। मोनाहन(Monahan) ने "Early History of Bengal" में लिखा है कि श्रेणियाँ विशेष प्रकार की सेनायें थी जो अनुबन्ध के अनुसार सेना की सेवा करती थी।

"बारहसैनी" या "द्वादश श्रेणि" शब्द इस बात का सँकेत करता है कि वेदिक काल मे ही, जब श्रेणियों की पृथा विद्धमान थी और भारतवर्ष में श्रेणियाँ "जाति" का रूप लेती जा रही थी, मथुरा, अलीगढ़(हाथरस) और चन्दोजी के आसपास जो व्यापारी वर्ग सक्रिय रहा और जिस वर्ग का कृषि एवं पशुपालनसे सम्बन्धित पदार्थो के व्यापार पर अधिप्त्य रहा और जिनके इष्ट देवता श्री अक्रूर जी महाराज थे, उन्होनें अपने आपको "बारहसैनी" कहलवाया।

वार्ष्णेय शब्द का महत्व

वार्ष्णेय शब्द का प्रयोग भगवान श्री कृष्ण के लिये कई लेखे में कीया गया है। उनका वँश भि वृष्णि था, गीता में उल्लेख है -
 
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रधुथन्ति कुलस्टियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण संकर॥
गीता, अध्याय 1, श्लोक 41

अथकेनप्रयुक्तोंडयं पापं चरति पुरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिन नियाज्वेत॥
गीता, अध्याय 3, श्लोक 36

वृष्णि वँश में जन्म लेने वाले, वैश्य समाज को अपनाने के उपरान्त कलान्तर में समाज के अग्रणी व्यक्तियों का अपने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर इतना अधिकार रहा होगा की उनके समाज को भी "वार्ष्णेय" शब्द से सम्बोधित कीया जाने लगा। यह बड़े गर्व की बात रही कि समाज को देशवासियों में प्रभु का नाम देना स्वीकार किया। इसीकारण सोलहवीं या बाद की शताब्दी में समाज के कुछ व्यक्तियों ने "वृष्णि", "वार्शनेई" या "वार्ष्णेय" लिखना प्रारम्भ कर दिया।

एक बार प्रेम से बोलो- "भगवान श्री कृष्ण की जय" !

साभार:
Akhil Bharatvarshiya Shri Vaishy Barahsaini Mahasabha