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Sunday, March 30, 2025

ASATI VAISHYA SAMAJ

ASATI VAISHYA SAMAJ

असाटी समाज की आदिता के सम्बन्ध में इतिहास बताता है कि असाटी वैश्य उन्हीं वैष्णव में से हैं जब से ब्राम्हण, क्षत्रिय, शूद्र ये चार वर्ण बने हैं। हीरापुर निवासी स्वर्गीय चैधरी श्री दमरूलाल ने असाटी समाज की उत्पत्ति की जानकारी के लिये जाति भास्कर ग्रन्थ का अवलोकन किया है और उसमें 84 प्रकार के वैश्यों के नामों का उल्लेख बताया है जिसमें अयोध्यावासी वैश्य भी लिखे हैं।

अयोध्या राजधानी के निवासी होने के कारण प्रारंभ काल से लेकर आज भी अपने असाटी समाज की चिट्ठी पत्रियों में राम-राम, जय सियाराम, जय श्री सीताराम अथवा जय राम जी को ही लिखा जाता है। जैसे कि आग्रा के निवासी होने से अग्रवाल कहलाते हैं और उनकी चिट्ठी पत्रियों में अधिकतर जय गोपाल जय राधेश्याम लिखा जाता है।

झांसी जिले के कुमेड़ी ग्राम में स्वर्गीय दुर्जन सरकनया असाटी समाज में बड़े विद्वान और भक्त पुरूष हो गये हैं। इनका स्वाभाव भी ऐसा ही था कि देश में घूमना, विद्वानों की संगत करना और समाज सुधार के कार्य करना। एक समय इन्होंने तिरोड़ा ग्राम में 17 दिन तक एक पंचायत करके समाज की एकता की थी। श्री दुर्जन सरकनया ने अपनी एक रचियता पुस्तक में अपने को असाटी न लिखकर पूर्व अयोध्यावासी लिखा है। अब अपना समाज अयोध्यावासी से असाटी कैसे कहलाया उसका कारण यह है कि अयोध्या के निकट असाटी नाम एक ग्राम है। अपने पूर्वज, मुगलों के या किसी और के आतंक से या अकाल के कारण लगभग तीन चार सौ वर्ष पूर्व असाटी ग्राम से टीकमगढ़, छतरपुर आदि रियासतों के ग्रामों में आकर रहने लगे थे, अयोध्या की राजधानी का होने से अयोध्यावासी और असाटी ग्राम का होने से असाटी कहा जाना सन्देहरहित और स्वाभाविक है। इसलिए अयोध्यावासी-असाटी वैश्य ये तीनों नाम डंके की चोट पर निर्बिवाद हैं निवास-स्थान, देश और कर्तव्य पर ही तो सब जातियाँ बनी हुई हैं।

अपने पूर्वज असाटी ग्राम से रियासतों में जब आये थे तब लगभग सौ डेढ़ सौ से अधिक न रहे होंगे। कारण कि सन् 1944 से सन् 1973 के दरम्यान इस तीस वर्ष के अर्से में 5228 की 9445 असाटी संख्या के अर्थात दूनी के लगभग हो गई है। यदि 300 वर्ष के पूर्व का अनुभव लगाया जाये तो सौ-डेढ़ सौ से अधिक नहीं आंकी जा सकती है। हर पीढ़ी में एक-एक के तीन-तीन व्यक्ति भी हों तो चक्रवृद्धि के अनुसार 1 के 3, 3 के 9, 9$9 के 27, $27 के 81, $81 के 243, $243 के 729 अर्थात् सात पीढ़ी में एक के 729 हो जाते हैं। इससे पूर्णरूप से सिद्ध होता है कि अपने पूर्वज असाटी ग्राम से उपर्युक्त रियासतों में अल्प संख्या में ही आये थे।

तीन-चार सौ वर्ष पूर्व असाटी ग्राम से रियासतों में आने के प्रमाण इस प्रकार से सिद्ध होते हैं कि अपने असाटी समाज के जो मंदिर बने हैं वह संवत् 1700 से ही बने हैं इसके उपरान्त असाटी समाज के लोगों को समाज और नरेशों द्वारा साव, नायक, चैधरी, सवाई आदि की जो उपाधियाँ मिलीं हैं उनका कार्य-काल भी सौ दो सौ वर्ष से अधिक का नहीं है जो डायरेक्ट्री के पृष्ठों में आप पढ़ेंगे।

गोत्रों की आदिता के संबंध में इतिहास बताता है कि ‘‘भारतखण्डे आर्यावर्ते …………………., अर्थात भारतवर्ष के निवासी आर्य कहलाते थे। जिनके गुण, कर्म, स्वभाव में चार प्रकार की भिन्नता थी इसलिए ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के चार भाग बने, जैसा कि भगवान ने कहा है ‘‘चार्तुवर्ण मया सृष्टि, कर्म, विभागशः’’। इस चारों वर्णों का एक ही सनातन धर्म था जिसका धर्म संस्कार, संस्कृति द्वारा सप्त ऋषियों के नाम से कश्यप, कौशल, वाशिष्ठ, गोयल, वासल्य, बांदल्य, चारल्य यह सात गोत्र हैं जो असाटी समाज में भी हैं। शेष चार जन गोत्र, माडल्य, फांदल्य, खोड़ल उपर्युक्त गोत्रों के उपनाम ही समझ में आते हैं, कारण कि इन चार गोत्रों के सिर्फ दस-दस ही घर हैं।

वंशों के नाम स्थान और व्यवसाय पर ही रखे गये हैं आजीविका के लिए जैसे कि कठरयाई के धन्धे से कटारिया, गुलाब से गुललहा, लोहे के धन्धे से लोहिया, अरस्या, पटवारी आदि हैं। इसी प्रकार निवास स्थान के कारण ग्रामों के नाम से भी वंशों के नाम हैं तिगोड़ा के तिगड़ैया, मातौल के मातोल्या, हीरापुर के हीरापुरिया, देवदा के देवदइया व देवरा, समर्रा के समरया, दलीपुर के दलीपुरिया और कुछ वंशों के नाम पदवी पर भी चलने लगे हैं जैसा कि नायक, चैधरी आदि हैं। स्थानों के नाम से अन्य वर्णों में भी वंशों के नाम हैं अयोध्या के अयोध्यावासी, गंगातट के गंगापारी, सरयूतट के सरयूपारी, कन्नौज के कन्नौजिया, मालवा के मालवीय बुन्देलखंड के बुन्देला, महोबा के महोबिया, राजपूताने के राजपूत इससे पूर्ण सिद्ध होता है कि वर्तमान युग में निवास स्थान और आजीविका के धन्धों से और कुछ पदवी के नाम पर भी वंश बने हैं। जबकि पिछले युगों में जिनके वंश में जो पुरूषार्थी पुरूष होते थे उनके नाम से वंश चलते थे जैसा कि राजा रघु से रघुवंशी आदि हैं। निमि से निमिवंशी, कुरू से कौरव, पाण्डु से पाण्डव, यदु से यदुवंशी आदि और कुछ वंशों के नाम सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी जैसे प्राकृतियों पर भी हैं।

असाटी समाज में वंशों की संख्या 84 भी बताई है जो सन् 1944 की जनगणना में 62 थे और अब सन् 73 की गणना में 59। रियासतों में असाटी समाज जब 84 ग्रामों में थी तब समाज की व्यवस्था के लिए बारह-बारह गांव के सात चैंतरे बनाये गये थे समाज का अधिक विस्तार हो जाने के कारण डायरेक्ट्री में अब प्रमुख ग्रामों के अन्तर्गत संपर्क के ग्रामों का नाम दर्शाया गया है।

वंश, गोत्र और समाज की (उत्पत्ति) अर्थात आदिता का परिचय बड़ी खोजबीन और प्रमाणों के साथ लिखा गया है।

MAHURI VAISHYA SAMAJ HISTORY

MAHURI VAISHYA SAMAJ HISTORY 

माहुरी वैश्य समाज का इतिहास

माहुरी वैश्य समाज के लोग अपने परिवार के ज्ञान,परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित अपनी जड़ों का पता प्राचीन और दूर के अतीत से लागते है।पुराणों की अवधि के साथ-साथ भारत के स्वर्ण युग में भी, (मौर्य और गुप्त काल) माहुरी जाति के साक्ष्य पाये जाते हैं।हमारे प्राचीन पूर्वज मथुरा,वृंदावन और गोकुल के आसपास के जंगलों की बस्तियों में रहते थे।वे इन वनों में अपने मूल के प्रति सम्मान,गहरी नैतिक मूल्यों और धार्मिक दृष्टिकोण के साथ एक निष्ठावान समुदाय के रूप में अपने सर्वोच्य देवी के रूप में माता मथुरासिनी (देवी शक्ती के एक रूप) का आदर एवं पूजनीय मानते थे।निकट अवधि में, हमारे वंशजो का उत्तर भारत में मुगल शासन (16 वीं सदी) केे समय से कम से कम 500 वर्षों तक का पता चलता हैं,जब कारवां मार्ग सुरक्षित हो गए थे और हमारे पूर्वजों ने मथुरा-वृंदावन-गोकुल क्षेत्रो से निकल कर सुबा-ए-बंगाल कि ओर आने लगे थे।सुबा-ए-बंगाल उस अवधि के सबसे समृद्ध प्रांतों में से एक था। 18 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में,जब मुगल साम्राज्य का विघटन हुआ और व्यापार मार्ग असुरक्षित हो गए और जब ये लोग पिंडारी लूटरो के लक्ष्य बनने लग गए,तो हमारे कई पूर्वजों ने बिहार शरीफ के आसपास के क्षेत्रों में स्थायी रूप से प्रवास करने लगे।बिहार शरीफ उस समय का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक और राजनीतिक केंद्र था और वर्तमान में भारत के बिहार राज्य में स्थित है। प्रवास के इस तरह की लहर कई दशकों तक चलती रही जिससे मथुरा से लेकर बिहार शरीफ और आसपास के इलाकों मेे बड़ी संख्या में परिवार आते रहे।उसी समय लगभग,कई परिवार पहले से ही मगध के उपजाऊ मैदानी भाग में जो गंगा के दक्षिण तथा मध्य बिहार में स्थित है,स्थायी रूप से बसने लगे और व्यापार,वाणिज्य और अन्य आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने लग गए थे। प्रवास के इस तरह की लहर कई दशकों तक जारी रही थी,और कई दशकों के उपरातं गया जो कि हिंदुओं के सात सबसे पवित्र शहरों में से एक है,महुरी वैश्य की सामाजिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरी।

भारत की आजादी की पहली लड़ाई(1857-1858) से पहले,बड़ी संख्या में माहुरी वैश्य छोटानागपुर पठार के उत्तरी भाग खास करके वर्तमान के गिरीडीह जिला के आसपास के इलाको में जो भारत के झारखंड राज्य का हिस्सा हैं बसने लग गए थे। 20 वीं सदी की शुरूआत में यह देखा जाने लगा था कि बड़ी संख्या में महुरी वैश्य परिवार के लोग पूर्व में पश्चिम बंगाल और दक्षिण में उड़ीसा तक जा के बसने लगे । इस बीच,महुरी वैश्य समुदाय के कई सामाजिक नेताओं की पहल के कारण,एक सामाजिक पुनर्जागरण धीरे-धीरे आकार ले रहा था। इन पहल की वजह से उच्च जागरूकता और शिक्षा के उच्च स्तर में वृद्धि हुई। इससे व्यापार और वाणिज्य के पारंपरिक गुणों के अलावा खुद को अभिव्यक्त करने के नए तरीके तलाशने के लिए माहुरी जाती के लोगों में अग्रणी भावना और गतिशीलता बढ़ गई। उस समय,ज्ञान आधारित पेशेवरों का एक वर्ग उभर कर आया है जो कि विभीन्न प्रकार के उद्योग,सरकारी और अर्ध-सरकारी रोजगार तथा अन्य कई ज्ञान आधारित व्यवसायों में जाने लगे। यह सामाजिक पुनर्जागरण भारत के बड़े महानगरो मेंं जैसे कोलकाता, मुंबई और नई दिल्ली और कई अन्य बड़े और छोटे शहरों में बसने के लिए महुरी वैश्य के सैकड़ों परिवारों में हुई।20 वीं शताब्दी तक,समुदाय के शिक्षित कुलीन वर्ग की अग्रणी भावना उन्हें दुनिया के कई हिस्सों तक ले गई,और तीसरी सदियों की शुरुआत से,माहुरी वैश्य परिवार भले ही छोटी संख्या में,परंतु कई महाद्वीपों और दुनिया भर के लगभग सभी समय क्षेत्रों में जाने लग गये।

यद्यपि महुरी वैश्य का इतिहास करीब तीन शताब्दी या उससे भी ज्यादा समय तक का पता लगता है।माहुरी वैश्य के लोकगीतों के साथ-साथ कुछ पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों का सुझाव है कि महुरी वैश्य की जड़ें (जरूरी नहीं कि एक ही नाम “माहुरी ” हो) पहले दो सदियों से भी पहल का है,यहां तक ​​कि मौर्य और गुप्त काल से भी पहले।

Saturday, March 29, 2025

KESARWANI VAISHYA SAMAJ

KESARWANI VAISHYA SAMAJ

पथ्वी के रचनाकार ब्रह्मा और प्रजापति के रूप में महर्षि अंगिरा, उनके सुपुत्र कश्यप एवं अन्य अनेक 'ऋषि प्रवरों' के सुकृत्य का परिणाम आज के स्तर तक पहुंची भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विकास है। इन्हीं गोत्र परम्पराओं और प्रवर प्रथाओं से अभिभूत है वैश्य समुदाय का केसरवानी वैश्य समाज।

केसरवानी वैश्य समाज के अनेक सपूतों ने भारत की सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, आर्थिक पुननिर्माण एवं विकास के क्षेत्रों में अपना भरपूर योगदान इतिहास के विभिन्न कालखण्डों में दिया है। चाहे वह हड़प्पा-मोहन जोदड़ों के पणियों' के रूप में हो, वैदिक काल में वेदों की महत्वपूर्ण ऋचाओं के रचनाकार ऋषि अग्रणियों, जैसे व षय, तुग्र, शुष्ण, विप्लु, वेतसु, दशोनि, तुतुजी, इम, शरत, नववास्तु, चुमुरी, कुयव, प्रमगन्द और ब वु इत्यादि के रूप में हो।

ईसा के सैकड़ों वर्ष पूर्व से ही भारत का सम्बन्ध रोम, इटली, यूनान, बेबिलोन तथा दक्षिण एशिया के देशों से रहा है। व्यापार से ही ऐसे सम्बन्धों की जड़ें मजबूत हुई है। सांस्कृतिक परंपराओं, भारतीय उत्पादों एवं लोक कल्याणार्थ चिन्तन के आदान-प्रदान के सूत्र से भारत की पहचान सारे संसार में आज भी अति विशिष्ट है। विश, विट, पणि, बनिक, बनिया, वानी जैसे नामों से जाने गये लोग हजारों वर्षों से वैश्य परम्परा, सामाजिक धर्म और राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन करते आ रहे हैं। वैश्य धर्म का पालन करते हुए कृषि, उत्पादन, वितरण, विपणन, वाणिज्य, व्यापार और एतत्सम्बन्धी प्रबन्धन क्षेत्रों से जुड़ी सभी विशेषताएं आज तक निर्वाह करते आ रहे हैं। मौर्य, गुप्त, मौखरी (माहुरी), पुष्यमूति राजवंशों ने मध्यकाल में राजनीतिक एवं प्रशासनिक मापदण्ड स्थापित कर सामाजिक समरसता, कूटनीति और आर्थिक विकास के क्षेत्रों में ऐसे उदाहरणों की छाप छोड़े जो स्वर्णयुग एवं आदर्श बनकर आज भी इतिहास के पष्ठों में अद्वितीय हैं। श्रेष्ठी, महाश्रेष्ठी, सार्थवाह, शे‌ट्टी आदि नामों से अपना परिचय स्थापित कर इतिहास को सुशोभित किया है।

अति प्राचीन काल से ही भारत को अनके वाह्य आक्रमण झेलने पड़े हैं, किन्तु सांस्कृतिक सहिष्णुता का उत्कृष्ठ उदाहरण इस मिट्टी में जो उपलब्ध है, उससे बढ़कर संभवतः अन्यत्र नहीं है। सांस्कृतिक विकृति और वाह्य नश्लों के सामाजिक मिश्रण के चलते भारत का रूप, जो पहले सप्त सैन्धव, सनातन, आर्यन, महाकाव्य काल जनित संरकारों, जैन, बौद्ध, शैय, स्मार्त, वैष्णव, सूफी स्वरूप था वह आज भारतीय हो गया है, इनके सभी ऐतिहासिक चरणों में वैश्यों का योगदान अन्य सभी वर्षों से बढ़चढ़ कर रहा है।

केसरवानी समाज का इतिहास लिखने का प्रयास विगत् 1891 ई. से आरम्भ हुआ है। अनेक शोधकर्ताओं ने समाज के वयोव द्ध मनीषियों द्वारा वर्णित ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन अपने निबंधों में किया है। इन निबंधनों का सम्पादन सर्वप्रथम श्री मोहनलाल गुप्त दिल्ली ने 'केसरवानी वैश्य का इतिहास नामक पुस्तक में किया है। वस्तुतः ये सभी निबंध इस पुस्तक की प ष्ठभूमि, विषय वस्तु और आगे किये जाने वाले शोष ों के आधार हैं।

केसरवानी वैश्य का उ‌द्भव कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ। उस समय वैश्य समुदाय यह वर्ग 'केसरवानी' नहीं बल्कि 'बणिक' 'वाणी' या 'बनिया कहलाता था। कश्मीर की भूमि में केसर की खेती, जंगली जड़ी बूटियाँ, फल, मेवे इत्यादि का व्यापार और खेती इस समाज का प्रमुख पेशा था। धर्म परायण निष्ठावान और राजभक्त होने के कारण कश्मीर के राजवंशों से लगभग सभी कालों में इनकी निकटता रही।

मोहम्मद गजनी और बाद में उसके सरदारों के चलते इस समाज को बारहवीं सदी के मध्यावधि में कश्मीर छोड़ना पड़ा। कुछ परिवार धर्मान्तरण स्वीकार कर वहीं रह गये। लगभग सवा सौ परिवार जिन्होंने पठानों और अफगानों का युद्ध में प्रतिरोध किया, वे अपनी रक्षार्थ और परिवार की सुरक्षा के लिये मात भूमि को प्रणाम कर, विभिन्न दिशाओं में पलायान कर गये। कांगड़ा, पंजाब, दिल्ली होते हुए अधिकतर लोग नेपाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कौशाम्बी, प्रयाग और इलाहाबाद तक पहुंच गये। कुछ गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र होते हुए अपने कुटुम्बों से मिलने के लिये आतुर कड़ेमानिकपुर (जिला प्रयाग) में जमा हुए। यहीं से आरम्भ होता है 'केसरवानी समाज' के इतिहास का आधुनिक चरण।

अन्र्तवैश्य सम्बन्ध, बाजार, पूंजी, ऋण, ब्याज और व्यापार-वाणिज्य की द ष्टि से इस समाज के सम्मुख एक बड़ी शून्यता के अलावा देशान्तरण के बाद कुछ भी नहीं था। इतिहास की मार, आर्थिक विपन्नता, असुरक्षा के मनोवैज्ञानिक दबाब से पस्त सन् 1134 ई. में इन्हें अपने कुटुम्बों से बिछड़कर पूरब, पश्चिम, नेपाल और भारत के विभिन्न क्षेत्र में आजीविका के लिये फैलना पड़ा।

अनुवांशिक परम्परा, सुसंस्कृति, स्वच्छ आचार विचार की प ष्ठभूमि, भौगोलिक एवं पर्यावरणजनित कारणों से कुछ हद तक विकृत हुई। कई सामाजिक, वैवाहिक और धार्मिक कमजोरियाँ, कुरीतियाँ और अंधविश्वास फैले। इन कुरीतियों के निवारण और कुटुम्बों के पुनर्मिलन की प्रक्रिया, 1890, 1918 तथा 1921 ई. से आरम्भ हुई। ऐसे प्रयासों का फल अखिल भारतीय केसरवानी वैश्य महासभा के प्रयास से सन् 1935 तथा 1938 में दिखने लगा। जब पच्छ्या और पूर्वी धड़ों का मिलन हुआ और रोटी-बेटी का सम्बन्ध पुनः शुरू हुआ।

यद्यपि इस समाज में विलक्षण प्रतिभाओं के धनी अनेक श्रेष्ठजन हुए परन्तु एक बड़ा तबका आज भी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं न्याय की द ष्टि से उपेक्षित, प्रताड़ित और पीड़ित है। समान अवसर, संविधान सम्मत सहायता संरक्षण तथा आरक्षण से वंचित है।

वर्तमान दौर में केसरवानी समाज के प्रमुख उल्लेखनीय नाम हैं सर्वश्री सीताराम केसरी, (1919-2000) राजनीतिज्ञ, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष, भारत सरकार के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष, पद्म भूषण डा. दुखन राम (1899-1991 ई.), प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक, समाजसेवी, शिक्षाविद्ः डा. संकठा प्रसाद (1911-1986), फार्मेसी विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, यू.पी.एस.सी. के अध्यक्ष, (1971-1978); टी. आर. केसरवानी, एवियेशन विशेषज्ञ, यू.एन.ओ.; न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त, पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय; हिन्दी के प्रखर उपासक जिन्होंने चार हजार से ज्यादा न्याय निर्णय हिन्दी में लिखा।

एस. लाल. आई.सी.एस. यू.एन.ओ. के स्थापना वर्ष 1944 में भारत के राजदूत: के.लाल. बार-एट-लों; भागलपुर, एल.सी. गुप्ता, आई.ए.एस. परीक्षा में सर्वप्रथम, ईश्वर चन्द प्रसाद केसरी (सासाराम) म.प्र. काडर, आई.ए.एस., अजीत केसरी (क्वाथ, बिहार), म.प्र. काडर, आई.ए.एस., राम किंकर गुप्ता, म.प्र. काडर, आई.ए.एस., प्रेमचन्द केसरवानी (इलाहाबाद) बिहार काडर, आई.ए.एस., अभिषेक केसरवानी, आई.ए. स., प्रतापगढ़ 2009-10, कन्हैया लाल शिवरतन (सागर-1923), प्रसिद्ध एडवोकेट, प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी, प्रेमजीत लाल, मुकुन्दीलाल गुप्त, संयुक्त निदेशक-सी.बी. आई।

निरंजन लाल केसरवानी, पूर्व सांसद बिलासपुरः श्री नंदगोपाल गुप्ता, 'नन्दी जी (इलाहाबाद) होमिओपैथी मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार, रामहित गुप्ता, पूर्व वित्तमंत्री, म.प्र. रामचन्द्र केशरी, पूर्व मंत्री. झारखण्ड, जयकुमार पालित, पूर्व विधायक (बिहार), स्व. राजकिशोर केसरी, विधायक, श्रीमती किरण केसरी, विधायक (बिहार प्रदेश)

व्यापार एवं उद्योग के क्षेत्र में रामदास रईस (लखनऊ-1918) साइकिल उद्योग में अग्रगण्य, रामकृष्ण गुप्ता (मुम्बई), अन्तर्राष्ट्रीय सेवई निर्माता एवं निर्यातक इत्यादि।

आज के दौर में आई. पी. एस., महिला आई. ए. एस., स्टेट प्रशासिनक एवं पुलिस सेवा में हमारे नौनिहाल आ रहे है। डॉक्टर, इन्जीनियर, चार्टड एकाउन्टेन्ट, एम.बी.ए. संचार एवं कम्प्यूटर विशेषज्ञ (हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर), कलाकार, साहित्यकार, फिल्म कलाकार, मिडिया जरनलिस्ट एवं प्रकाशक, विभिन्न उद्योगों में उच्चस्थान प्राप्त कई महानुभावों ने केसरवानी समाज का नाम बढ़ाया है।

विभिन्न उपशाखाओं में बंटे, अपनी-अपनी विशेषज्ञता से देश सेवा में केसरवानी वैश्य कार्यरत हैं। भारत की हिन्दूजन संख्या का चौबीस प्रतिशत वैश्य, सम्पूर्ण वैश्य समाज, विभिन्न संगठनों, मंचों, सभाओं द्वारा भारत की सेवा में संलग्न है।

केसरवानी समाज का उद्भव, विकास और वर्तमान से संबंधित इस पुस्तक में प्रस्तुत विवरण बहुआयामी शोध, अध्ययन, अवलोकन और विश्लेषण का एक अकिंचन प्रयास है, जो पाठकों के समक्ष सादर समर्पित है।

Tuesday, March 25, 2025

PRIYA JAYASWAL - BIHAR INTER BOARD TOPPER 2025

PRIYA JAYASWAL - BIHAR INTER BOARD TOPPER 2025

Bihar Board 12th Topper 2025 बिहार बोर्ड ने 12वीं का रिजल्ट जारी कर दिया है। इसमें पश्चिम चंपारण की प्रिया जायसवाल ने बिहार बोर्ड की इंटरमीडिएट परीक्षा में विज्ञान संकाय से राज्य में पहला स्थान प्राप्त किया है। प्रिया ने अपनी सफलता का श्रेय कठिन परिश्रम और सही मार्गदर्शन को दिया। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन आठ घंटे पढ़ाई करती थी।


क्या बनना चाहती हैं Science टॉपर प्रिया

प्रिया जायसवाल ने विज्ञान संकाय से राज्य में प्राप्त किया पहला स्थान

उच्च प्लस टू विद्यालय हरनाटांड़ की छात्रा है प्रिया जायसवाल

पश्चिम चंपारण जिले के बगहा दो प्रखंड स्थित हरनाटांड़ निवासी किसान संतोष जायसवाल की सुपुत्री प्रिया जायसवाल ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित इंटरमीडिएट की परीक्षा में विज्ञान संकाय से राज्य में पहला स्थान प्राप्त किया है।

प्रिया दो साल पहले बोर्ड परीक्षा में भी टॉप 10 में अपना स्थान बनाने में सफल रही थी। राजकीयकृत राज्य संपोषित उच्च माध्यमिक विद्यालय हरनाटांड़ में अध्ययनरत प्रिया ने अपनी सफलता का श्रेय कठिन परिश्रम और सही मार्गदर्शन को दिया। प्रिया प्रतिदिन आठ घंटे पढ़ाई करती थी। दैनिक जागरण को बताया कि बोर्ड परीक्षा में आठवां स्थान प्राप्त करने के बाद तय कर लिया कि इससे अधिक मेहनत कर इंटर एग्जाम में और बेहतर करना है।

हालांकि, यह उम्मीद नहीं थी कि राज्य में पहला स्थान हासिल करने में सफल रहूंगी। प्रिया ने बताया कि 'मैं बाजार में थी तभी मेरे पास पटना से एक कॉल आया, कहा- तुमने पूरे बिहार में टॉप किया है।मैंने कहा बिहार में एक ही प्रिया नहीं होंगी, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ की मैंने टॉप किया होगा। फोन करने वाले ने जब पूरा नाम प्रिया जायसवाल बताया तो मैं मानी।' आज ऐसा लग रहा जैसे मैं अपने सपने को जी रही हूं।

हालांकि यह सफर का एक सुखद पड़ाव है। संघर्ष तबतक जारी रहेगा जबतक नीट परीक्षा कंप्लीट कर एमबीबीएस में दाखिला ना ले लूं।प्रिया का सपना है कि वह पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बने और समाज के वंचित वर्ग के लोगों का इलाज कर उन्हें सेहतमंद बनाए रखे।

बेहतर पढ़ाई के लिए गांव से आकर हरनाटांड़ में रहने लगी जायसवाल पश्चिमी चंपारण जिले के अंतर्गत बगहा दो प्रखंड के हरनाटांड़ निवासी संतोष जायसवाल की बेटी हैं। प्रिया के पिता एक साधारण व्यवसायी व किसान हैं और माता रीमा जायसवाल एक गृहिणी हैं। इससे पहले प्रिया अपने पिता के पैतृक निवास वाल्मीकिनगर थाना क्षेत्र के धुमवाटांड़ में रहती थीं। बेहतर तरीके से पठन पाठन के उद्देश्य से करीब दो साल से अब हरनाटांड़ में ही बस गए हैं।हरनाटांड़ में ही इनके किसान पिता संतोष जायसवाल एक मिल भी चलाते हैं, जिससे इनके परिवार का जीविकोपार्जन चलता है।


बड़ी बहन कर रही डीएलएड

प्रिया तीन बहन व दो भाइयों में तीसरे नंबर की है। सबसे बड़ी बहन सोनी जायसवाल साइंस से ग्रेजुएशन कर वाल्मीकिनगर से डीएलएड कर रही हैं।
दूसरी बहन प्रीति जायसवाल जो विज्ञान संकाय में पूरे बिहार में चौथा रैंक ला चुकी हैं और फिलहाल हरनाटांड़ में ही रहकर नीट की तैयारी कर रही हैं।
इनके दो छोटे भाइयों में आदित्य जायसवाल कोटा में रहकर नीट की तैयारी कर रहे हैं जबकि सबसे छोटे यशराज जायसवाल हरनाटांड़ में ही रहकर पढ़ाई कर रहे हैं

Wednesday, March 19, 2025

MARWADI BANIYA MARRIAGE - मारवाड़ी विवाह अनुष्ठान

MARWADI BANIYA MARRIAGE - मारवाड़ी विवाह अनुष्ठान


मारवाड़ी विवाह की भव्य और शानदार रस्में दिखावटी खर्चों से भरी होती हैं, लेकिन असली महिमा प्रेम और परंपराओं का जश्न मनाने का उनका अनुष्ठानिक तरीका है। मारवाड़ी रीति-रिवाज की हर शादी की रस्म में एक शाही माहौल की भागीदारी को दर्शाया गया है।

शुरुआत से लेकर अंत तक, यह अनोखी मारवाड़ी शादी जीवंत भावनाओं से सजी परंपराओं की एक श्रृंखला की तरह लगती है। ठेठ मारवाड़ी शादी के रीति-रिवाजों में राजस्थान की डेस्टिनेशन वेडिंग की समृद्ध विरासत और संस्कृति की झलक दिखाई देती है । सांस्कृतिक समारोहों की एक श्रृंखला को तीन अलग-अलग भागों में वर्गीकृत किया जाता है जिन्हें इस प्रकार पहचाना जाता है - एक भव्य मारवाड़ी शादी की शादी से पहले की रस्में, शादी का दिन और शादी के बाद की रस्में।

रोका समारोह –


मारवाड़ी विवाह में विवाह-पूर्व रस्में रोका समारोह से शुरू होती हैं। उत्तर भारतीय विवाह संस्कृति की तरह, भावी दूल्हा-दुल्हन के माता-पिता लड़के और लड़की के साथ एक-दूसरे से मिलते हैं। माता-पिता लड़के और लड़की के माथे पर तिलक लगाते हैं और उपहारों और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। माता-पिता और अन्य बड़े-बुजुर्ग एक-दूसरे को बधाई देते हैं और नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देते हैं।

सगई या मुधा - टीका समारोह -


हालाँकि यह सगाई या अंगूठी बदलने की रस्म जैसा लगता है, मारवाड़ी शादी की संस्कृति में सगाई पूरी तरह से अलग है। यह पारंपरिक प्री-वेडिंग कार्यक्रम दूल्हे के घर पर होता है जहाँ दुल्हन पक्ष के सभी पुरुष सदस्य आते हैं और दुल्हन का भाई दूल्हे के माथे पर चावल और कुमकुम का टीका लगाता है । महिलाएँ इस रस्म में भाग नहीं लेती हैं। लेकिन इन दिनों जोड़े अंगूठियाँ भी बदलते हैं और महिलाएँ इस रस्म में भाग लेती हैं।

ब्याह हठ –


MARRIAGE -डे के 5, 7, 11 या 21 दिन पहले , विवाहित महिलाएं और दूल्हा-दुल्हन की पड़ोसी उनके घर जाती हैं। वे मंगल गीत गाती हैं और दाल और गुड़ से मीठे व्यंजन बनाती हैं । इन्हें मंगोड़ी के नाम से जाना जाता है और शादी के दिनों में इनका इस्तेमाल किया जाता है। सभी महिलाएं लड़के और लड़की को आशीर्वाद देती हैं और शादी के उत्सव और खरीदारी की शुरुआत का संकेत देती हैं। ब्याह हाथ दूल्हा और दुल्हन के घर पर अलग-अलग होता है।

भात न्योतना और भात भरना -


भात न्योतना वर-वधू की माँ द्वारा मातृ पक्ष के परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को दिया जाने वाला एक आधिकारिक निमंत्रण है । आमतौर पर, वर-वधू की माँ इस विवाह-पूर्व अनुष्ठान की मेजबानी करती हैं। इसके बाद, भात भरना की रस्म होती है जिसमें सभी आमंत्रित रिश्तेदार महंगे उपहारों और कपड़ों के माध्यम से माँ पर प्यार बरसाते हैं ।

नंदी गणेश पूजा –


जिन मारवाड़ी परिवारों में शादी होने वाली है, वे नंदी गणेश पूजा का आयोजन करते हैं और परिवार के देवताओं की भी पूजा करते हैं। यह अनुष्ठान भगवान गणेश को बाधा मुक्त विवाह अनुष्ठानों के लिए एक हार्दिक प्रार्थना का प्रतीक है । इस अनुष्ठान में केवल दूल्हा और दुल्हन के करीबी परिवार के सदस्य ही शामिल होते हैं। कई परिवारों में, इसे गणपति स्थापना के रूप में दर्शाया जाता है ।

रात्रि जगा –


किसी भी बुरी मंशा को दूर रखने के लिए दूल्हा-दुल्हन का पूरा परिवार पूरी रात जागता रहता है । वे पवित्र विवाह घरों की दीवारों पर स्वास्तिक और ओम के पवित्र चिह्न बनाते हैं । परिवार के सदस्य इस रात परेशानी मुक्त शादी के अनुभव के लिए प्रार्थना करते हैं। दूल्हा-दुल्हन के पूर्वजों को भी शादी के लिए आशीर्वाद देने के लिए बुलाया जाता है। यह रस्म शादी के दिन से एक रात पहले की जाती है।

पिट्ठी दस्तूर –


मारवाड़ी विवाह रीति-रिवाजों में हल्दी समारोह को पिट्ठी दस्तूर के नाम से भी जाना जाता है। यह विवाह अनुष्ठान दोनों घरों में महिला-केंद्रित उत्सव है, जहाँ दूल्हा/दुल्हन एक सुसज्जित मंच पर बैठते हैं और सभी महिलाएँ अपनी बारी आने पर बेसन, हल्दी, चंदन और पानी से बना लेप लगाती हैं। सभी महिलाएँ पारंपरिक मारवाड़ी गीत गाकर और ढोल बजाकर एक उल्लासपूर्ण वातावरण बनाती हैं । जब सभी सदस्य अपनी बारी का काम पूरा कर लेते हैं, तो दूल्हा/दुल्हन उस पानी से स्नान करते हैं जो महिलाएँ पास के जलाशय से लाती हैं। इस अनुष्ठान के बाद, दूल्हा और दुल्हन शादी के दिन तक अपने घरों से बाहर नहीं जा सकते हैं।

तेलबान –


पिट्ठी दस्तूर या हल्दी की रस्म के ठीक बाद, दूल्हा और दुल्हन को सरसों के तेल और दही से स्नान कराया जाता है। फिर उन्हें परिवार के सदस्यों द्वारा गुड़ की मिठाई और घुंघरा खिलाया जाता है और मामा शगुन (नकद) देकर दूल्हा और दुल्हन पर अपना अपार प्यार बरसाते हैं। यह उनकी शादी के लिए सौभाग्य का प्रतीक है।

महफ़िल –


उत्तर भारतीय विवाह संस्कृति के महिला संगीत की तरह ही, महफ़िल भाग्यशाली जोड़े के बड़े दिन से एक या दो दिन पहले शाम को मनाई जाती है। सभी महिलाएँ अलग-अलग इकट्ठा होती हैं और गायन, नृत्य और अन्य मज़ेदार गतिविधियों का आनंद लेती हैं। दूसरी ओर, सभी पुरुष परिवार के सदस्य और रिश्तेदार एक साथ आते हैं और अपने तरीके से भव्य विवाह उत्सव मनाते हैं। यह उत्सव देर रात तक चलता रहता है। कोई भी पुरुष या महिला एक-दूसरे के उत्सव में हस्तक्षेप नहीं करता है, लेकिन केवल दूल्हे को महिलाओं के उत्सव या महफ़िल की रस्म में भाग लेने की अनुमति होती है। आप कह सकते हैं कि यह मारवाड़ी विवाह की पारंपरिक बैचलर पार्टी है।

मेहँदी समारोह –


मारवाड़ी विवाह में दुल्हन के लिए एक शुभ संकेत, मेहंदी समारोह दुल्हन की पूरी लड़की टोली द्वारा बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। पेशेवर मेहंदी कलाकारों को परिवार द्वारा काम पर रखा जाता है जो परिवार की अन्य महिलाओं के साथ दुल्हन की हथेलियों, हाथों और पैरों पर जटिल डिजाइन बनाते हैं । दूल्हे के घर पर भी इसी तरह की रस्म निभाई जाती है। इस मज़ेदार और रोमांचक शादी की रस्म के दौरान, सभी सदस्य बॉलीवुड और लोकगीतों के जोशीले गीतों पर नाचते और गाते हुए आनंद में सराबोर हो जाते हैं ।

माहिरा दस्तूर –


मारवाड़ी विवाह समारोह में दूल्हा-दुल्हन की मौसी और मौसी का बहुत महत्व होता है। वे दूल्हा-दुल्हन के प्रति अपना प्यार और सम्मान दिखाने के लिए उन्हें उपहार, कपड़े, नकद और मिठाइयाँ देते हैं । बदले में, दूल्हा-दुल्हन की माताएँ पारंपरिक घर का बना खाना परोसती हैं और रस्म में शामिल होने और बहुमूल्य उपहार देने के लिए " धन्यवाद " व्यक्त करती हैं। यह रस्म शादी के बाद भी भाई के अपनी बहन के प्रति प्यार और सम्मान को व्यक्त करती है

.पल्ला दस्तूर –


मारवाड़ी परंपराओं की इस आवश्यक शादी से पहले की रस्म के लिए दूल्हे के परिवार को दुल्हन के घर जाना पड़ता है । वे अपनी होने वाली बहू को शादी की पोशाक, उससे मेल खाने वाले सामान या गहने, मिठाई और अन्य उपहार देते हैं । यह अनुमान लगाया जाता है कि दुल्हन अपने बड़े दिन पर इन शादी के सामान से खुद को सजाएगी। इस रस्म के दौरान दुल्हन परिवार के सभी सदस्यों के सामने बैठती है।

जनेऊ –


मारवाड़ी विवाह की पूर्व संध्या पर , दूल्हा एक धार्मिक आयोजन में भाग लेता है जिसमें हवन और पूजा शामिल है । पुजारी दूल्हे को एक पवित्र धागा प्रदान करता है और उसे अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को पार करते हुए एक कंधे पर पहनने के लिए कहता है। इस अनुष्ठानिक आयोजन के दौरान, वह एक भगवा कपड़ा पहनता है। यह अनुष्ठान दूल्हे के ब्रह्मचर्य आश्रम चरण के गृहस्थ आश्रम चरण में परिवर्तन का प्रतीक है । इस अनुष्ठान के साथ, वह विवाहित जीवन और परिवार के महत्व और जिम्मेदारियों को समझना शुरू कर देता है।

एक भव्य एवं भव्य मारवाड़ी विवाह समारोह की आंतरिक विवाह दिवस रस्मों की श्रृंखला

थम्ब पूजा –


वर और वधू के परिवारों के बीच एक मजबूत नींव बनाने के लिए, दूल्हे पक्ष के पुजारी दुल्हन के घर पर यह अनूठी रस्म निभाते हैं । दूल्हे पक्ष के पारिवारिक पुजारी दुल्हन के घर पहुँचते हैं और मज़बूती से बनाए गए खंभों की पूजा करते हैं। खंभों की पूजा करना दोनों परिवारों की नींव को मज़बूत करने का प्रतीक है । अब वह बनाए गए गड्ढे में हवन करते हैं और हवन पूजा पूरी होने के बाद, वह 11 ब्राह्मणों को पारंपरिक भोजन खिलाने और उन्हें दक्षिणा देने का निर्देश देते हैं ।

मारवाड़ी विवाह की एक और अनोखी रस्म है घरवा , जिसमें देवी पार्वती की पूजा की जाती है । देवी पार्वती की मूर्ति को पवित्र और नए कपड़े और आभूषण पहनाए जाते हैं। ये कपड़े और आभूषण दूल्हे के परिवार द्वारा चढ़ाए जाते हैं।

कोरथ और गणपति पूजा –


मारवाड़ी विवाह में दुल्हन के परिवार के सभी पुरुष सदस्यों द्वारा दूल्हे पक्ष के पुजारी और उसके परिवार को आमंत्रित करने का पारंपरिक तरीका कोरथ कहलाता है। दुल्हन पक्ष के सभी करीबी पुरुष सदस्य और परिवार के पुजारी दूल्हे के घर जाते हैं। वे अपने पुजारी को पवित्र विवाह मंडप में आमंत्रित करते हैं और दूल्हे का परिवार दुल्हन के परिवार के पुजारी को उपहार, भोजन और दक्षिणा प्रदान करता है।

कोराथ के बाद दूल्हे के घर पर गणपति पूजा की जाती है । इस अंतरंग समारोह में दूल्हे की शादी स्थल के लिए प्रस्थान करने से ठीक पहले प्रार्थना शामिल होती है। मंडप समारोह के रूप में भी जाना जाने वाला यह अनुष्ठान परेशानी मुक्त शादी के लिए प्रार्थना करने के लिए बनाया गया है।

निकासि –


यह मारवाड़ी विवाह की रस्म दूल्हे की बहन और बहनोई (बहन के पति) से जुड़ी है, जो विवाह स्थल तक पहुँचने की यात्रा पर निकलने के लिए पूरी तरह तैयार है। वह दूल्हे के सिर पर मोतियों की लड़ियों, ज़री के झुमकों या फूलों की लड़ियों से बना एक सुंदर सेहरा बाँधती है और उस घोड़ी पर एक सुनहरा धागा बाँधती है जिस पर दूल्हा चढ़ने वाला होता है। अब दूल्हे की भाभी बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए उसकी आँखों में काजल लगाती है । घोड़ी को भी सुंदर पोशाक पहनाई जाती है और उसे दाल , चावल, चीनी, घी और गुड़ का एक शुभ मिश्रण खिलाया जाता है ।

बारात –


दूल्हे और उसके सभी पुरुष साथियों की आकर्षक बारात को बारात कहते हैं। अच्छी तरह से सजे-धजे दूल्हा शाही अंदाज में घोड़ी पर बैठता है और तलवार रखता है जो मारवाड़ की समृद्ध संस्कृति, विरासत और राजसीपन को दर्शाती है। बारात (बारात) विवाह स्थल या उस स्थान पर पहुँचती है जहाँ दुल्हन का परिवार इंतज़ार कर रहा होता है। बारात के दौरान, सभी सदस्य नाचते-गाते हैं और दूल्हे की शादी के दिन का आनंद लेते हैं।

तोरण –


एक और छोटी लेकिन अनोखी मारवाड़ी शादी की रस्म जो दूल्हा शादी स्थल पर पहुंचने से ठीक पहले करता है, वह है - नीम के पेड़ या उसकी शाखा को छड़ी से छूना। ऐसा माना जाता है कि यह क्रिया शुभ अवसर को किसी भी बुरी नज़र से बचाती है। अब वह प्रवेश करने से पहले तोरण (एक सुंदर प्रवेश द्वार) को भी छूता है।

बारात ढुकाव और आरती –


जैसे ही बारात विवाह स्थल पर पहुँचती है, दुल्हन का परिवार उसका स्वागत करता है। खास तौर पर दुल्हन की माँ अपने होने वाले दामाद के लिए कुछ पारंपरिक स्वागत गतिविधियाँ करती है। वह उसके सिर पर तिलक लगाती है, आरती करती है और दूल्हे को मिठाई और पानी पिलाती है। अब बारात पवित्र विवाह स्थल में प्रवेश करती है।

जयमाला –


दूल्हा पवित्र विवाह मंडप की ओर जाता है और उसके कुछ ही समय बाद, दुल्हन अपनी शुभ उपस्थिति से विवाह मंडप को गौरवान्वित करती है। वह दूल्हे के सिर पर सात सुहाली (एक अनोखा नाश्ता आइटम) रखती है और फिर दोनों भाग्यशाली व्यक्ति एक दूसरे को उत्तम पुष्प माला पहनाते हैं।

ग्रन्थि बंधन या गंथ बंधन –


दुल्हन के घूंघट या ओढ़नी के कोने को दूल्हे के कमरबंद से बांधना मारवाड़ी विवाह में ग्रंथीबंधन या गंठबंधन कहलाता है। यह गाँठ दूल्हे के कंधे पर रखी जाती है और यह पूरे विवाह समारोह के दौरान दो आत्माओं के पवित्र मिलन का प्रतीक है।

कन्यादान एवं पाणिग्रहण-


अन्य हिंदू विवाह संस्कृतियों की तरह, कन्यादान मारवाड़ी विवाह समारोह का एक अभिन्न अंग है। सबसे पहले, दुल्हन का पिता अपने परिवार के बारे में बताता है और दूल्हे से सौहार्दपूर्वक पूछता है कि क्या वह उसकी बेटी को स्वीकार करेगा और उसकी देखभाल करेगा। दूल्हा इसे स्वीकार करता है और पिता दुल्हन का हाथ दूल्हे के हाथ पर रखता है। दुल्हन से भी ऐसा ही सवाल पूछा जाता है कि क्या वह इसे स्वीकार करती है और दूल्हे के परिवार का उपनाम क्या है । दोनों पक्षों द्वारा सकारात्मक रूप से सिर हिलाने के बाद, दूल्हा और दुल्हन दोनों के हाथों में एक पवित्र धागा बांधा जाता है। मारवाड़ी विवाह में कन्यादान काफी संवेदनशील और भावनात्मक क्षण होता है क्योंकि माता-पिता अपनी बेटी को दूसरे परिवार को देते हैं। दोनों पक्षों द्वारा स्वीकृति और पवित्र धागे को बांधने को मारवाड़ी विवाह संस्कृति में पाणिग्रहण कहा जाता है।

फ़ेरे –


पवित्र अग्नि के चारों ओर सात पवित्र फेरे लेकर विवाह बंधन में बंधना मारवाड़ी विवाह में फेरे की रस्म है। पहले तीन फेरों में दुल्हन दूल्हे का नेतृत्व करती है और बाकी चार फेरों में वह अपने दूल्हे का अनुसरण करती है। वे पुजारी के सामने सात पवित्र वचन भी पढ़ते हैं और बिना किसी अलगाव के हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाने का वादा करते हैं। अंत में, पुजारी उन्हें सुखी वैवाहिक जीवन के लिए अग्नि (अग्नि देवता) से आशीर्वाद लेने के लिए कहते हैं ।

अश्वरोहम्-


दुल्हन अपना पैर एक चक्की के पत्थर पर रखती है और उसे हल्के बल से आगे धकेलती है। यह रस्म सात बार निभाई जाती है और यह दुल्हन द्वारा साहस और दृढ़ संकल्प के साथ प्रत्येक कठिनाई का सामना करने का प्रतीक है। यहाँ दूल्हा दुल्हन का हाथ पकड़ता है जो दर्शाता है कि वह सभी कठिन परिस्थितियों में अपनी पत्नी का साथ देगा। दुल्हन भी हर बार चक्की को धकेलने के बाद मेहँदी के पेस्ट को छूती है।

सप्तपदी –


अब दूल्हा-दुल्हन को पति-पत्नी कहा जाता है। वे साथ में सात कदम चलते हैं और यह पति-पत्नी या जीवन साथी के रूप में उनके विवाहित जीवन की शुरुआत को दर्शाता है।

वामांग स्थापना –


यह रिवाज़ दूल्हा, दुल्हन और दुल्हन के भाई द्वारा निभाया जाता है। दुल्हन का भाई जोड़े को मुरमुरे देता है और फिर वे इसे पवित्र अग्नि या अग्नि में चढ़ाते हैं। इसके बाद, दुल्हन दूल्हे के बाईं ओर बैठती है जो दूल्हे के परिवार द्वारा उसकी पत्नी के रूप में उसकी स्वीकृति को दर्शाता है। जोड़े द्वारा अग्नि में मुरमुरे की आहुति तीन बार दी जाती है।

सिन्दूर दान/सीरगुठी/सुमंगलिका -


सिंदूर दान की रस्म शुरू करने के लिए दुल्हन को चावल, मिठाई, गुड़, मूंग दाल और नकदी से भरी थाली दी जाती है । अब दूल्हे की बहन आगे आती है और दुल्हन के बालों का विभाजन करती है। दूल्हा उसमें सिंदूर भरता है। इस शुभ अनुष्ठान के दौरान युगल उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़े होते हैं । दुल्हन की माँ दुल्हन की गोद में नथ (नाक का सामान) रखती है और उम्मीद करती है कि वह हवन और पूजा पूरी करने के बाद इसे पहनेगी।

अंजला भराई –


छवि स्रोत: ShaadiDukan

मारवाड़ी संस्कृति की एक असाधारण शादी की रस्म दुल्हन को उसके ससुर द्वारा नकदी से भरा बैग भेंट करना है । मारवाड़ी या बनिया विवाह में वह अपनी सभी भाभियों और अपने पति के बीच समान रूप से धन वितरित करके धन से निपटने के अपने कौशल को प्रस्तुत करती है । यह घर में वित्त की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपकर नई दुल्हन का मारवाड़ी परिवार में स्वागत करने का एक तरीका भी है।

पहरावानी –


यह रस्म दुल्हन के परिवार के नए दामाद के प्रति सम्मान और प्यार दिखाती है। उसे एक नए कपड़े पर बैठने के लिए कहा जाता है और फिर सभी रिश्तेदार और परिवार के सदस्य मूल्यवान उपहार, कपड़े और गहने आदि के माध्यम से प्यार बरसाते हैं। दुल्हन अपने पिता के घर की दहलीज पर एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण पूजा भी करती है । यह शादी के बाद उसके बाहर निकलने का प्रतीक है। पहरावनी रस्म के अंत में वह दहलीज पर रखे मिट्टी के दीये को तोड़ती है।

जूता छुपई / जूता चुराई –


किसी भी अन्य उत्तर भारतीय विवाह समारोह की तरह, जूता छुपाई की रस्म के बिना मारवाड़ी विवाह समारोह फीका लगता है। जब दूल्हा अन्य रस्मों को निभाने में व्यस्त होता है, तो उसकी सभी भाभियाँ उसकी शादी की चप्पलें चुरा लेती हैं । जब वह उन्हें वापस करने के लिए कहता है, तो लड़कियों का गिरोह इसके बदले में मोटी रकम मांगता है । दूल्हे की तरफ से, लोग उनसे अपनी मांग कम करने का अनुरोध करते हैं और लंबी मजेदार बातचीत के बाद, वे एक निश्चित राशि पर पहुँचते हैं। यह रस्म सभी के चेहरों पर मुस्कान की एक विस्तृत श्रृंखला जोड़ती है।

सर गुत्थी और सज्जन गोठ –


पारंपरिक तरीके से शादी की रस्मों और प्यार के जश्न में काफी समय बिताने के बाद, दुल्हन पक्ष की बड़ी महिला उसके बालों में कंघी करती है और उसका चेहरा धोकर उसे तरोताजा करती है ।


अब दुल्हन का पूरा परिवार दूल्हे के परिवार के लिए पारंपरिक और लजीज भोजन का प्रबंध करता है। इस भोजन में दाल, बाटी, चूरमा, केर सांगरी, गट्टे की सब्जी और कई अन्य स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ जैसे मारवाड़ी संस्कृति के समृद्ध व्यंजन शामिल होते हैं । दुल्हन पक्ष के परिवार के सदस्य दूल्हे के परिवार के अपने समकक्ष रिश्तेदार को शंक जलेबी भेंट करते हैं । यह दोनों परिवारों के बीच एक मधुर शुरुआत को दर्शाता है।

जुआ खेलई –


यह मजेदार रस्म नवविवाहित जोड़े को कई खेलों में शामिल करके उनकी अनुकूलता का आकलन करती है। यह रस्म विदाई से ठीक पहले दुल्हन के घर पर होती है । एक-दूसरे को चिढ़ाना, विपरीत पक्षों को चुनौतियाँ देना और फिर छोटे-छोटे मज़ेदार खेलों में जीत का जश्न मनाना, यह सब मारवाड़ी विवाह उत्सव में जुआ खेलई की रस्म के बारे में है।

विदाई –


मारवाड़ी शादी की मजेदार रस्मों के दौरान खूब हंसी-मजाक करने के बाद, विदाई का समय भावनात्मक हो जाता है। लेकिन जाने से पहले दुल्हन के घर की रसोई में थाली पूजा की जाती है । उसे सिक्कों और चीनी से भरा सूखा नारियल भेंट किया जाता है और बाद में वह इसे अपनी सास को देती है । दूल्हा और दुल्हन दोनों ही शादी स्थल से निकलने और दूल्हे के घर की ओर जाने के लिए आशीर्वाद और अनुमति मांगते हैं। दुल्हन के परिवार के आंसू बहते हैं क्योंकि वह अब उन्हें छोड़ रही है। कार के पहिए के पास एक नारियल भी तोड़ा जाता है जो नए जोड़े को नए घर में ले जा रहा है।

शादी के बाद की मारवाड़ी शादी की रस्में

गृह प्रवेश –


जब दुल्हन अपने पति के साथ पहली बार ससुराल पहुँचती है, तो सभी उसे प्यार से गले लगाते हैं और उसका स्वागत करते हैं। उसकी सास आरती उतारती है और फिर वह घर में प्रवेश करती है। घर की दहलीज पर दूध और सिंदूर के मिश्रण से भरी थाली रखी जाती है। नई दुल्हन पहले अपने पैर थाली में रखती है और अपने रंगीन पैरों से घर में पाँच कदम चलती है। अब वह चावल और सिक्के से भरे बर्तन को धीरे से लात मारती है जो फर्श पर गिर जाता है। यह जोड़े के लिए समृद्धि और प्रजनन क्षमता के आगमन का संकेत है ।

दुल्हन के स्वागत को यादगार बनाने के लिए दुल्हन की भाभियाँ प्रवेश द्वार पर पहरा देती हैं और जोड़े को प्रवेश देने के लिए कुछ पैसे या उपहार मांगती हैं। दुल्हन सबसे पहले सौभाग्य के रूप में घी और गुड़ को छूती है। जोड़ा घर के मंदिर में एक साथ दीया भी जलाता है ।

पेज लागानी –


नई दुल्हन का उसके पति के घर में स्वागत करने के बाद, उसे हर रिश्तेदार और परिवार के सदस्य से मिलवाया जाता है। वह बड़ों के पैर छूती है और छोटों का अभिवादन करके उनका आशीर्वाद लेती है।

मुँह दिखाई –


मारवाड़ी विवाह समारोह में दुल्हन और महिलाओं पर केंद्रित एक और अनुष्ठान दुल्हन का घूंघट उठाना और उसकी सुंदरता की प्रशंसा करना है। महिलाएँ उसे टोकन मनी ( शगुन ) देती हैं या करीबी सदस्य उसे गहने भी देते हैं। यह अनुष्ठान सभी महिलाओं द्वारा एक-एक करके किया जाता है।

चूड़ा –


चूड़ियाँ दुल्हन और उसके विवाहित जीवन का एक अशुभ संकेत हैं। दुल्हन की सास उसे लाख और हाथी दांत से बने चूड़े का एक सेट उपहार में देती है। मारवाड़ी संस्कृति में पारंपरिक दुल्हनें इन्हें पूरे एक साल तक बिना टूटे पहनती हैं। इस पवित्र चूड़े का टूटना दुल्हन के लिए एक अपशकुन का संकेत है।

पग फेरा –


शादी के दो या तीन दिन बाद दुल्हन अपने पति के साथ अपने मायके जाती है । दुल्हन के सभी परिवार के सदस्यों द्वारा उनका भव्य स्वागत किया जाता है। दुल्हन के चचेरे भाई-बहन अपने देवर के साथ हल्के-फुल्के मज़ाक करते हैं और उसे प्यार से चिढ़ाते हैं। सभी एक साथ खाना खाते हुए अच्छा समय बिताते हैं और कुछ समय बाद दुल्हन अपने नए घर के लिए निकल जाती है। घर से निकलते समय उसे और उसके पति को कई उपहार भी मिलते हैं । यह इस बात का प्रतीक है कि दुल्हन को उसके मायके में हमेशा प्यार और देखभाल मिलेगी।

कुमाऊँ में जैन धर्म की प्राचीनता

कुमाऊँ में जैन धर्म की प्राचीनता

भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) के पुत्र भरत का प्राचीन काल में कैलास—मानसरोवर जाने का रास्ता ‘कुमाऊँ’ से था, जो कि चीन के तिब्बत, पश्चिम नेपाल और भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित है। कुमाऊँ (एवं संपूर्ण उत्तराखंड) के प्राचीन शासकों ‘कत्यूरी—राजाओं’ के समय में भी जैन धर्म का प्रचार इस क्षेत्र में था। कुमाऊँ के प्रवेश द्वार से सटे तराई भाँवर के क्षेत्र में ही ‘अहिच्छत्रा जैन तीर्थ’ स्थित है। जो कभी प्राचीन उत्तर—पाँचाल राज्य की राजधानी थी। साथ ही साथ कुमाऊँ में स्थित प्राचीन जैन चरण पादुकाओं की जानकारी देना भी इस लेख का उद्देश्य है।
 
उत्तराखण्ड में नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों को कुमायूँ (कुमाऊँ) जनपद या क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। जब से उत्तराखंड राज्य, उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक अलग राज्य बना है तब से प्रशासनिक दृष्टिकोण से इसको अन्य कई छोटे—छोटे जिलों में बांट दिया गया है। परन्तु प्रस्तुत लेख में हम पुराने जिलों यानि नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों को मानकर ही विचार करेंगे।
 
प्राचीन काल से ही कुमायूँ में जैन संस्कृति का प्रचार रहा है, जो भारत के उत्तर में, हिमालय पर्वत श्रेणी के ठीक बीचों बीच यानि मध्य में स्थित है। कुमायूँ के उत्तर में तिब्बत (कैलाश पर्वत/अष्टापद), पश्चिम में गढ़वाल, दक्षिण में उत्तर प्रदेश का बरेली/रुहेलखण्ड, तथा पूर्व में नेपाल की पश्चिमी सीमा लगी हुई है। इसके पूर्व में काली नदी (घाघरा और शारदा) तथा पश्चिम में रामगंगा नदियाँ बहती हैं। इसकी तलहटी में एक लंबी पट्टी में मैदानी भाग है, जिसे तराई या भाँवर नाम से जाना जाता है। भगवान ऋषभदेव इसी हिमालय में स्थित पर्वतराज ‘‘कैलाश’’ उपनाम अष्टापद से मोक्ष सिधारे थे। भगवान आदिनाथ के निर्वाण का समाचार ज्ञात होने पर उनके ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती राजा ‘‘भरत’’ कुमाऊँ के भूभाग के रास्ते से होते हुए ही सपरिवार कैलाश पर्वत पर गये थे और समारोहपूर्वक भगवान का निर्वाण पूजोत्सव मनाया था। आज भी कैलाश और मानसरोवर यात्रा पर भारत से जाने के लिये अनेकों रास्ते हैं परन्तु इनमें से सबसे सुगम एवं सुरक्षित मार्ग कुमाऊँ में स्थित ‘‘लिपुलेख’’ दर्रे को माना जाता है। इसके बाबत सुप्रसिद्ध, लेखक, तथा साधक एवं यात्री स्वामी प्रणवानंद लिखते हैं।
 
There are several routes to the Holy Kailas (Kailasa) and Mansarover from different places, i.e., (i) From Almora.... Lipulekh pass to Kailas (ii) -------(XIV) from kullu via Thuling...... Manasarovar..Fme Øekeâej mJeeceer peer ves Yeejle mes kewâueeMe/ceevemejesJej lekeâ Deeves peeves kesâ efJeefYeVe Ûeewon jemleeW keâe JeCe&ve keâj Devle ceW efueKeles nQ—``The first route i.e. from Almora via Lipu-Lekh pass is the easiest and safest for people going from plains.2 According to some historians the great Emperor (Asoka (269 B.C.) deputed the Katyuri Raja Nandi Dev of Kumaon who invaded westeren Tibet through Unta-dhura pass and annexed it to the Indian Empire. On his return journey he visited Kailas and Mansarovar. NandiDev visited this Region once again in the following year, according to the copper plate inscription in the temple of Pandukeshvar (Village in midway between Joshimath and Badrinath). The copper plate dates the 25th year of Vikrama era, (i.e. about 33 B.C).3 Thus the earliest ruling dynasty known to authentic history is the Katyuris. The Katyuri Raja of Kumaon and Garhwal was styled ``Sri Besdeo Giriraj Chakra Churamani and the earuiest traditions record that of the Joshmath Katyuri's possessions extended from the Satlaj as far as the Gandaki and from the snow to the plains including the whole of Rohilkhand. ``Tradition gives the origin of their Raj at Joshimath in the north near Badrinath and a subsequent migration to Katyur velley in Almora district where a city called Kartti-Keyapura was founded.4 In 335 AD the kingdom of kartipura was a semi-tributory State of the Gupta empire. In the Allahabad inscription of Samudra Gupta this state is mentioned to the west of Nepal. Kartripura is identifies with katyuriraj in Kumon.5
 
नौनीताल के प्रसिद्ध नैनादेवी मंदिर में काशीपुर निवासी श्री उग्रसेन जी तथा अन्य कई सज्जनों ने कुछ वर्ष हुए एक मनोज्ञ जैन तीर्थंकर प्रतिमा देखी थी। बाद में वह वहाँ नहीं रही और बताया गया कि कतिपय अन्य र्मूितयों के साथ वह भी चोरी हो गई है।७ अगस्त २०१२ एवं १५-०९-२०१२ में मैंने अपने एक पुराने मित्र डा. डी. एन. तिवारी से दूरभाष पर वार्ता की तो उन्होंने भी लगभग चौथी—पाँचवी ईस्वी शताब्दी के एक जैन शिलालेख, जो कि जैन तीर्थंकर र्मूित पर था, के बाबत् बताया। उनके द्वारा यह भी बताया गया कि यह लेख नैनीताल जिल में पाया गया है। उस समय (५वीं शताब्दी ई.) कुमायूँ में कुणिन्दों अथवा कत्यूरी राजाओं का शासन था, जो कि गुप्त साम्राज्य के सामंत थे। कत्यूरी राजाओं के शासन काल को कुमायूँ का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। ऐसा यहाँ के सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक श्री यमुनादत्त वैष्णव ‘‘अशोक’’ का कथन है। कुमायूँ में एक इलाका कत्यूर घाटी (थाने) लगभग १०० वर्गमील के क्षेत्र में स्थित है। खश, हूण, शक आदि जातियों की भाँति कत्यूरी लोग भी भारत के बाहर से आये। सिकन्दर के आक्रमण के बाद कत्यूरी राजाओं ने काबुल में कई शताब्दियों तक राज्य किया। उस प्रान्त में वे कतूरा, कटोर वंशीय कहलाते थे। ये लोग ‘‘इंडोसीथियन’’ थे। इन्हीं लोगों की एक शाखा ने बदरीनाथ के निकट जोशीमठ को अपनी राजधानी बनाया था। बाद में उन्होंने किसी उथल—पुथल के कारण अपनी राजधानी कुमायूँ में ‘र्काितकेयपुर’ (पार्वती एवं शिवजी के ज्येष्ठ पुत्र) में बसाई। यह वही इन्डोसीथिन या शक जाति है जिसके वंशजो / क्षत्रपों का शासन एक समय पूरे उत्तर भारत में था। नहपान इस वंश का सर्वप्रसिद्ध, प्रतापी एवं महत्वपूर्ण नरेश था। जैन अनुश्रुति में उसके नहवाण, नरवाहन, नमोवाहन, नभसेन या नरसेन आदि नाम मिलते हैं। यूनानी भूगोलवेत्ता टालेमी ने भी इस नरेश का उल्लेख किया है। नहपान ने राज्यभार अपने जामाता उशवदात, मंत्री अयम और सेनापति यशोमतिक को सौपकर स्वयं जिनदीक्षा ले ली प्रतीत होती है। यानि जो भी शक राजा थे उनका पूर्णतया भारतीयकरण हो गया था।
 
अलमोड़ा जिले के द्वाराहाट कस्बे में संवत् १०४४ (सन् १०४४ ईस्वी) का संस्कृत नागरी में एक लेख चरण—पादुका के पास खुदा हुआ है। इस शिलालेख में उक्त वर्ष तथा र्आियका देवश्री और ललितश्री का नाम अंकित है। द्वाराहाट के इस लेख से यह सिद्ध होता है कि जैन साध्वियों का बिहार हिमाल की दुर्गम उपत्यकाओं तक होता रहता था। द्वाराहाट की ऊँचाई समुद्रतल से लगभग ५०३१ फीट और इसकी अंतिम रेल हेड काठगोदाम से दूरी (मोटर मार्ग द्वारा) लगभग १२० कि.मी. है। यहाँ कत्यूरी राजाओं का शासन १५वीं शताब्दी तक रहा था। एक पूरा जैन मंदिर इस कस्बे में निर्मित था, जिसमें स्थापित भगवान पाश्र्वनाथ की खंडित र्मूित अब अल्मोड़ा म्यूजियम में प्रदर्शनार्थ रखी हुई है।
 
इसे कत्यूरी राजाओं के समय लगभग ९वीं शती में गूजर साहू अथवा चौधरी परिवार ने बनवाया था। यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख करना जरूरी है कि इस हिमालयीन भूभाग में ‘लगभग सातवीं शती ई. से काष्ठ—देवालयों के स्थान पर प्रस्तर खंडों से देवालयों का निर्माण होने लगा जो निरन्तर जारी रहा। यानि इस भू—भाग में सातवीं शताब्दी से पूर्व पत्थरों के देवालय/चैत्य र्नििमत नहीं होते थे, क्योंकि लकड़ी की इमारतें इस भूकम्प—प्रवण क्षेत्र में ज्यादा मजबूत और सुरक्षित मानी जाती हैं और इस भूभाग में विश्व की सर्वश्रेष्ठ लकड़ी के जंगल अनादिकाल से पाये जाते हैं। उत्तराखंड में अभी तक पत्थरों से र्नििमत जितने भी देवालय/मंदिर (प्राचीन) ज्ञात हैं वह प्राय: आठवीं शताब्दी के आसपास अथवा बाद में र्नििमत है। अत: पर्वतीय क्षेत्र में जैन धर्म की उपस्थिति उतनी ही प्राचीन मानी जा सकती है, जितनी कि अन्य सनातन धर्मों की। संभवत: इन्हीं सब तथ्यों के कारण ही प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार और गजेटियर लेख एटकिन्सन महोदय ने लिखा है कि ‘‘यह प्रदेश पूर्व ब्राह्माणिक एवं बौद्ध क्रिया—कलापों का मिला जुला स्वरूप है’’।
 
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या जैन धर्म में पूजा / उपासना के चिन्ह मात्र काष्ठ/पत्थर र्नििमत देवालय/चैत्य/मंदिर ही थे ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जैन मान्यता में तीर्थकरों और महापुरुषों की चरण—पादुकाऐं स्थापित करने की प्रथा बहुत प्राचीन काल से रही है। अन्य धर्मों में ऐसी प्रथा दृष्टिगोचर नहीं होती। सम्मेदशिखर, श्रीनगर (गढ़वाल) आदि पर्वतों पर चरणपादुकाओं के माध्यम से ही भक्त अपने भावों को निर्मल करते हैं। प्राय: सभी प्राचीन जैन मंदिरों में चरणपादुकाऐं स्थापित करने के स्पष्ट निर्देश दिये गये है और विधि भी बतलाई गई है।१६ करने के स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं और विधि भी बतलाई गई है। इसी तारतम्य में महाकवि कालिदास ने अपने मेघदूत नामक काव्यग्रंथ के श्लोक ५५ में हिमालय के भूगोल के वर्णन में ‘‘चरणपादुका’’ का उल्लेख करते हुए लिखा हैं कि हे मेघ ‘‘उसी पहाड़ (हिमालय) में महादेव की चरण—शिला नामक स्थान है, जिसे योगी नित्य पूजते हैं। तुम भी भक्तिभाव से नम्रतापूर्वक उनकी (चरण—चिह्नों) प्रदक्षिणा करना। यह चरणपादुकाऐं आज भी बद्रीनाथ तीर्थ के पास स्थित हैं।
 
इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण नैनीताल जिले में काठगोदाम और नैनीताल के बीच में स्थित रानीबाग के पास चित्रशिला नाम से प्रसिद्ध स्थान में स्थित हैं।१८ लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से कुमाऊँ क्षेत्र में यक्षों की पूजा की जाती थी।

जैन अनुयायिओं में भी ‘‘तीर्थकरों’’ के साथ साथ यक्ष—यक्षणियों की पूजा का प्राचीनकाल से ही प्रचार था और उनकी र्मूितयाँ भी स्थापित की जाती थी।’’२० अल्मोड़ा जिले के एक ग्राम बमनसुआल, जहाँ महादेव शिव के प्राचीन मंदिरों का समूह स्थित है, में एक र्मूित तीर्थंकर नेमिनाथ की पाई गई है। अब खंडित अवस्था में यह राजकीय संग्रहालय, अलमोड़ा में प्रदर्शनार्थ रखी हुई है।

एक और जैन र्मूित पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर की गुफा में पाई गई है। इसके बाबत् यह जानकारी नहीं मिल पाई हैं कि यह किस तीर्थंकर की प्रतिमा है और किस संवत् की है। परन्तु यह निश्चित है कि यह प्रतिमा पूर्व मध्यकालीन समय की है। उपरोक्त के अलावा कुमाऊँ के गजेटियर में भी जैन मतावलंबियों और सम्प्रदाय के बारे में काफी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है, जिसका विवरण निम्न प्रकार है—
श्री एटकिन्सन महोदय को स्थानीय विद्वान कुमाऊँ (पहाड़ों का) का वेदव्यास मानते हैं। इन्हों ने उस समय, जब इस क्षेत्र में आवागमन के साधन अल्प थे, बहुत मेहनत एवं लगन से हिमालय के इन दुर्गम क्षेत्रों में बसी विभिन्न जातियों, नगरों एवं धर्मों इत्यादि की जानकारी इकट्ठी कर गजेटियर में प्रकाशित कराई। कुमाऊँ में जैन धर्म / जातियों का विवरण निम्न प्रकार से दिया गया है—
 
(a) AGARWALS —Among the Baniya class, the Agrawals from the plain have some importance in KUMAON and although some account has been given else where (i.e. Gaz II 395), it will be interesting to record that is told by an intelligent member of the community at Naini-tal. The Agrawals claim to have been Rajputs, but failing to oppose Shihabud-din Gori when he destroyed Agroha, they took to trade. They neither eat fist nor flesh, nor they drink spirits and have strict ceremonial observations. Marriage in the same gotra is prohibited. A few are Saivas but the majority is Vaishnavas or Jainas and many worship the unseen god, `Permeshwar Nirankar.'
 
(b) SARAUGIS—The Saraugis or Jainas, who are frequently spoken of a caste, are named after the religion professes by them (Gaz III, 497). Their temples are separate and contained naked images of their (Tirthankaras. Their great teacher was Parasanth, and they hold within their pale people (keâcepeesj, #eerCekeâeÙe, ogyeues heleues ceveg<Ùe, Oece& Yeer¤) of very different origin. They are very scruspulous in their ceremonial Oservances with a view to avoid doing injury to the slightest living organism; some called Bhauras go so far as to wear a bandage over their mouths lest any thing should enter by accident. The bride passes the night before marriage in the temple of Parasnath. As a rule, few of the ceremonies enjoyed by orthodox HINDU custom are observed.
 
(c) SAHUS—The sahus of DORA (A Patti of Pargana in Pali Pachhaon of Kumoan) belong to bharadvaj, vasishtha and kasyapa gotras and Madhyandiniya sakha. One of the Sahus was in former times appointed Chaudhri of the Almora bazar with duties of a chakrayat or superintendent and managed to keep the office hereditary in his family for some generation, so that his descendants still call themselves Chaudhris. The Sahus profess ro be Rajput but they are neither rajpur nor vaisyas and it is difficult to place them in correct castes. They first came into notice when employed by Rudra Chand (Raja of Kumoan) in the latter half of the sixteenth century. They now occupy themselves with trade and service. The Chaudhris of Dwarahat ascribe their origin to ``Kangra' and they still workship the kot-kangra Devi of Jwalamukhi. They belong to very miscellaneous gotra called Vatsa-Bhargava. The name `Chaudari is given by courtesy as in plains to the Heads of Particular occupations among the Baniyas
 
उपरोक्त गजेटियर का हिन्दी में संक्षिप्त निम्न प्रकार है|
 
(अ) अग्रवाल
यह वणिक वर्ग का एक महत्वपूर्ण समुदाय है। जिसका वर्णन नैनीताल में रहने वाले एक चतुर सुजान से पूछ कर लिखा गया है। वर्तमान में यह लोग राजपूत कौम से संबंधित हैं और अपने को अतीत में हुये कुरुक्षेत्र के राजा अग्रसेन का वंशज बताते हैं। शहाबुद्दीन गौरी ने जब अग्रोहा को विजित किया तो हारकर उन्होंने व्यापार को अपना पेशा बना लिया। इस समुदाय के व्यक्ति ना तो मछली खाते हैं ना ही माँस का भक्षण करते हैं और ना ही शराब पीते हैं। यह समुदाय अपने रीति रिवाजों में कट्टर है। अपने गोत्र में शादी—विवाह पूर्णत: र्विजत है। बहुत अल्प संख्या में शैव हैं परन्तु अधिकांश आबादी या तो वैष्णव हैं अथवा जैन मत के हैं।
 
(ब) सरावगी
 
यहाँ जैनों को प्राय: इसी (नाम) से जाना जाता है और यह इनका धर्म भी है। इस समुदाय के अलग मंदिर हैं, जिनमें यह दिगम्बर मूर्तिर्यों की पूजा करते हैं, जिन्हें ये तीर्थंकर कहते हैं। अपने आप को यह पाश्र्वनाथ भगवान का अनुयायी बताते हैं जिनका अभ्युदय काफी पहले हुआ था। यह अत्यन्त धर्मभीरु समुदाय है और अपने रीति रिवाजों का पालन सही प्रकार से करने पर विशेष ध्यान देते हैं। जगत के छोटे से छोटे जीवों की हिंसा नहीं हो इसलिये अपने मुँह पर सफेद पट्टी बाँधते हैं, जिससे मुँह में किसी भी प्रकार के कींड़े मकोंड़े (भौरा) प्रवेश नहीं कर सके। शादी के पूर्व नवबधु पाश्र्वनाथ भगवान के मंदिर में एक रात्रि व्यतीत करती है। इस समुदाय के कुछ रीति रिवाज कट्टर पंथी हिन्दुओं से मिलते जुलते हैं।
 
(स) साहु (या साह / शाह) प्राय: वैश्य समुदाय में गिने जाते हैं। ये भारद्वाज, वशिष्ठ और कश्यप गोत्र से संबंध रखते हैं। पुराने किसी समय में एक साहू व्यक्ति को अल्मोड़ा बाजार का अफसर या चौधरी (निरीक्षक) नियुक्त किया गया था (इसे चकुड़ायत भी कहते थे) चकुड़ायत बाजार की देखभाल के अलावा, वहाँ की खबरें राजदरबार तक पहुँचाते थे। सब से पहले १६ वीं शताब्दी में राजा रुद्र—चंद (चंद वंश के राजा) के समय इन्हें सेवा में लिया गया था। यह न तो राजपूत हैं, ना ही वैश्य। इनका संबंध कुमाऊँ के पाली पछाऊँ क्षेत्र से ज्यादा है। द्वाराहाट के चौधरी लोग अपना संबंध परिचमी ज्वालामुखी से बताते हैं और कोट—काँगड़ देवी की पूजा करते हैं।
 
अहिच्छत्रा हिमालय के पर्वतीय भूभाग की तलहटी (फुटहिल) को तराई अथवा भांवर कहते हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ के बीचों बीच यानि मध्य तराई में रामनगर कस्बा है। जनश्रुति है कि पूरा रामनगर कस्बा किसी प्राचीन नगर की ईट / पत्थरों से र्नििमत है। लगभग २००० वर्षों पूर्व हिमालय की तराई में पूर्वी पंचाल राज्य की राजधानी अहिच्छत्रा ही वह नगरी थी जिसके मलवे से रामनगर कस्बे का निर्माण हुआ होगा क्योंकि आधुनिक रामनगर के पास ही प्राचीन अहिच्छत्रा स्थित है।
 
बरेली जिले की आँवला तहसील के कस्बे रामनगर के बाह्य भाग में सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ अहिच्छत्रा स्थित है। इसी स्थान पर २३वें जैन तीर्थंकर पाश्र्वनाथ पर पुराण प्रसिद्ध उपसर्ग हुआ था और यहीं उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यहीं पर भगवान पाश्र्वनाथ के प्रथम समवसरण की रचना हुई थी। किसी समय यहाँ एक विशाल एवं रमणीक नगर था किन्तु अब जंगल में यत्र — तत्र फले प्राचीन टीले और ध्वस्त खंडहर ही शेष हैं। एक वेदी तिखाल वाले बाबा की कहलाती है, जिसमें भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा तथा चरण चिन्ह स्थापित हैं। अन्य मंदिरों की वेदियों में भी मनोज्ञ जैन प्रतिमायें विराजमान हैं।
 
यह स्थान २३ वें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ की ज्ञानकल्याणक भूमि है जो ई. पूर्व ८७७ में जन्में और ७७७ में निर्वाण प्राप्त किया। अहिच्छत्रा ‘‘उत्तर—पाँचाल’’ राज्य की राजधानी थी। ‘इसे विभिन्न धर्मों के पुराणों में पांचलपुरी अपरनाम परिचक्रा एवं शंखावती नाम से भी निर्देशित किया गया है। जब भगवान पाश्र्वनाथ इस नगरी के पास स्थित गहन वन ‘भीमावटी’ के जंगल में कायोत्सर्ग ध्यान मुद्रा में लीन थे, ‘शम्बर’ नामक दुष्ट असुर ने उन पर भीषण उपसर्ग किये। नागराज धरणेन्द्र और यक्षेश्वरी पद्मावती ने उन उपसर्गों के निवारण का यथाशक्ति प्रयत्न किया। नागराज (अहि) ने तो भगवान के सिर के ऊपर छत्राकार सहस्रफण मंडप बनाया था। इसीलिए यह पांचालनगरी लोक में अहिच्छत्रा नाम से प्रसिद्ध हुई।........२०वीं शताब्दी में हुए पुरातात्विक उत्खनन एवं खोज/शोध से जो सामग्री प्रकाश में आई, उसने सिद्ध कर दिया है कि कम से कम दो हजार वर्षों से यह स्थान अहिच्छत्रा नाम से जाना जाता है। अनेक जैन पुराणों एवं कथा ग्रंथों में अहिच्छत्रा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। ई. पूर्व दूसरी शती के लगभग हुये अहिच्छत्रा के राजा ‘‘आषाणसेन’’ ने अपने भानजे कौशाम्बी के राजा वहसतिमित्र के राज्य में स्थित प्रभासगिरि (इलाहाबाद के स्थित—पभोसा) पर जैन मुनियों के लिये गुफायें बनावई थी। अहिच्छत्रा के कोत्तरी (कटारी) खेड़ा में दूसरी शती ई. के प्राचीन जैन मंदिर और र्मूितयों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें दूसरी शती ई. के एक लेख में ‘अहिच्छत्रा’ नाम भी स्पष्ट रूप में अंकित हैं। कुमाऊँ के एक स्थानीय इतिहासकार रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार सूर्यवंशी ‘‘कत्यूरी राजाओं’’ से पहले दाणू कुमेर सेन का राज्य कुमाऊँ में था लेकिन इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यदि ऐसा रहा भी तो केवल अल्पकाल (विक्रम शासन और शालिवाहन शासन के मध्य में कुछ वर्ष) तक रहा होगा।
 
इसी प्रकार का कथन ‘‘कुमाऊँ का इतिहास’’ के प्रसिद्ध लेखक श्री बद्रीदत्त पांडे का है जिनके अनुसार जागेश्वर मंदिर के एक पत्थर में ‘माधवसेन’ नाम खुदा हुआ है। संभव है, मगध के सेन राजा माधवसेन कुमाऊँ में आये हों यद्यपि यह अनुमान एवं अनुसंधान का विषय है। वैसे अहिच्छत्रा में १९४०-४४ ईस्वी के बीच जो वैज्ञानिक उत्खनन हुआ है उससे यह प्रमाणित होता है कि यह नगर ईसा पूर्व ३०० से दसवीं शताब्दी तक एक सम्पन्न राज्य की राजधानी या नगरी अवश्य थी।२५ चूँकि यह नगर हिमालय की तराई में बसा हुआ है तो गढ़वाल—कुमाऊँ के दुर्गम भीतरी पर्वतीय भागों में आने जाने तथा देश व पहाड़ के बीच व्यापार के घाटे (दरे) का कार्य करता रहा है। पहले इसे ढिकुली अथवा चिलकिया नाम से जाना जाता था। अस्तु उपरोक्त तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में हम यह कह सकते हैं कि कुमाऊँ में जैनधर्म के लिखित प्रमाण ईसा पूर्व ३०० वर्ष से मिलने आरंभ हो जाते हैं। आगे जरूरत इस बात के तथ्य पर शोध करने की है कि नये—्नाये स्थानों पर चरण—पादुकाओं की खोज की जाए तो जैन धर्म का इतिहास इससे भी पूर्व का सिद्ध किया जा सकता है।

कैलाशचन्द्र जैन सारांश

EMAMI JAGANNATH MANDIR BALGOPALPUR

EMAMI JAGANNATH MANDIR BALGOPALPUR

 

इमामी पेपर मिल्स द्वारा भारत के ओडिशा के बालासोर जिले के बालगोपालपुर में नया जगन्नाथ मंदिर। भगवान जगन्नाथ जाति, पंथ और धर्म से ऊपर हैं। यह मंदिर अट्ठहत्तर फीट ऊंचा जगमगाता मंदिर है और इसे बालासोर शहर के बालगोपालपुर स्थित इमामी पेपर मिल के परिसर में तीन एकड़ भूमि पर बनाया गया है। मंदिर को पुरी जगन्नाथ मंदिर की प्रतिकृति होने का दावा किया जाता है, इसमें विश्व प्रसिद्ध ब्लैक पैगोडा कोणार्क सूर्य मंदिर की झलक भी है, जिस पर चार घोड़ों के अलावा सोलह कोणार्क चक्र उत्कीर्ण हैं। अद्भुत वास्तुकला और अद्भुत परिदृश्य वाला एक सुंदर स्थान।


Travel Info:

Best time to visit: Oct-Feb

District: Balasore (Baleswar)

Elevation: 45.0m

Open Time: 5Am-7.30Pm

Popular Cuisine: Local Food

Attractions: Kalingan style of temple architecture

Nearest Bus Stop: Balasore

Nearest Railway Station: Balasore

Travel Options: Taxi, Bus, Train

Nearest town: Balasore

Distance from Bhubaneswar: 203 km

SHREE PARSHVANATH TEERTH - NAKODA JI

SHREE PARSHVANATH TEERTH - NAKODA JI 

राजस्थान के अरावली पहाड़ियों की आडावल पर्वत श्रृंखला की गोद में रेगिस्तानी रेतीले टीबो की ओट में प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों वाला श्री जैन श्वेताम्बर नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ बसा हुआ हैं। यह जगत विख्यात जैन तीर्थ पश्चिमी राजस्थान के सीमावर्ती रेगिस्तानी बाड़मेर जिले बालोतरा उपखण्ड में वस्त्रों पर रंगाई-छपाई के लिए विख्यात बालोतरा से दस किलोमीटर एवं ऐतिहासिक औद्योगिक बस्ती जसोल से पांच किलोमीटर दूर पश्चिम की ओर पहाड़ियों की श्रृंखला की गोद में विद्यमान हैं। श्री नाकोड़ा जैन तीर्थ में पहुंचने के लिये जोधपुर-बाड़मेर के बीच चलने वाली बड़ी रेल लाईन पर आये बालोतरा जंक्शन रेलवे स्टेशन पर उतरना पड़ता है। यहां से बस एवं सड़क यातायात के विभिन्न साधनों से बालोतरा से जसोल होते हुए पक्के सड़क मार्ग से भारत विख्यात जैन तीर्थ नाकोड़ा आसानी से पहुुंचा जा सकता हैं। बालोतरा-जसोल एवं आसपास के स्थानों से श्री नाकोड़ा के लिए आसानी से हर समय सड़क यातायात के साधन उपलब्ध रहते हैं। आवागमन की सुविधा के अतिरिक्त देश व प्रदेश के कई स्थानों से नाकोड़ा के लिए बस यातायात की सुविधा भी है और वैसे निजी वाहनों से नाकोड़ा जैन तीर्थ की यात्रा पर आना अधिक सुगम हो जाने से इस तीर्थ स्थल पर यात्रियों का जमघट लगा रहता हैं।


श्री नाकोड़ा जैन धर्मावलम्बियों का अति प्राचीन तीर्थ स्थल है। जनश्रुतियों, दंत कथाओं एवं लोक आख्यानों के आधार पर बताया जाता है कि मालव जैन शासक ने वीरमपुर एवं नाकोर नगर बसाया था। ये दोनों स्थान वर्तमान में बाड़मेर जिले के प्राचीन महेवा राज्य के स्थान रहे है। वीरमपुर बालोतरा के समीप वर्तमान श्री नाकोड़ा के नाम से इतिहास प्रसिद्ध स्थल रहा है। वहां नाकोर नगर सिणधरी के समीप नाकोड़ा गांव से परिचायक है।

वीरमपुर (नाकोड़ा) के तत्कालिन शासक वीरमदत्त ने ईसा की तीसरी शताब्दी के पूर्व आठवें जैन तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभजी का मंदिर बनाया था, जिसकी प्रतिष्ठा श्री स्थुलिभद्रजी द्वारा सम्पन्न करवाई गई थी। उसका जीर्णोद्धार विक्रम पूर्व 189 में सम्राट सम्प्रति ने आषाढ़ सुदि 9 को इसकी प्रतिष्ठा आर्य श्री सुहास्तिसूरिजी द्वारा सम्पन्न करवाई। इसके पश्चात इस मंदिर का वि.सं. 35 में उज्जैन शासक वीर विक्रमादित्य ने जिर्णोद्धार करवाकर आचार्य श्री सिद्धसेनजी दिवाकर के हाथों मिगसर सुदि 11, वि.सं. 62 चैत्र सुदि 15 को भक्तामर रचियता आचार्य श्री मानतुंगसूरिजी ने जिर्णोद्धार के बाद वि.सं. 415 ज्येष्ठ सुदि 10 बुधवार को आचार्य श्री देवसूरिजी ने भी जिर्णोद्धार के बाद एवं वि.सं. 813 मिगसर सुदि 13 को ग्वालियर महाराजा जयसेन ने जिर्णोद्धार करवाकर आचार्य श्री यशोदेवसूरिजी से इस मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई।

ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व वाले वीरमपुर के श्री चन्द्रप्रभजी के मंदिर के बाद वि.सं. 909 में इस मंदिर के जीर्णौद्धार होने के पश्चात् यहां मूलनायक के रूप में जैन धर्मावलिम्बयों के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा रही जो वि.सं. 1223 में जीर्णोद्धार होने के बाद तक रही। महेवा पर वि.सं. 1280 में बादशाह आलमशाह ने आक्रमण कर दिया तब महेवा राज्य का उपनगर वीरमपुर बुरी तरह से प्रभाावित होकर उजड़ गया। उस समय यहां के जैन मंदिर की सभी प्रतिमाओं को नाकोर नगर (सिणधरी) के पास नाकोड़़ा गांव के कालीद्रह-नागद्रह (तालाब) में छिपा दिया।

वि.सं. 1313 में राव वीरम ने वीरमपुर को पुनः बसाया। इसके बाद नाकोर नगर (नाकोड़ा गांव) से श्यामवर्णी श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा नागद्रह तालाब से मिली, जिसे वि.सं. 1429 में वीरमपुर के प्राचीन पूर्व वाले श्री चन्द्रप्रभजी, श्री महावीर स्वामी वाले मंदिर में मूलनायक के रूप में द्वितीय वैषाख वदी 10 को आचार्य श्री जिनोदयसूरिजी ने प्रतिष्ठा की। तब से वीरमपुर का यह मंदिर नाकोड़ा पार्श्वनाथ के नाम से परिचायक बन गया। वि.सं. 1443 वैषाख षुक्ल 13 को मुगल बादशाह वाबीसी ने आक्रमण किया और महेवा का वीरमपुर (नाकोड़ा) पुनः उजड़ गया। तब भी यहां केे जैन मंदिर की मूर्तियों को सिणधरी क्षेत्र के नाकोर नगर (नाकोड़ा गांव) के कालीद्रह-नागद्रह तालाब में सुरक्षा के लिए छिपाया गया। वि.सं. 1511 में रावल वीदा ने वीरमपुर को पुनः आबाद किया। तब वि.सं. 1512 में आचार्यश्री कीर्तिरत्नसूरिजी ने स्वप्न के आधाार पर नाकोड़ा गांव के तालाब से मूर्ति प्राप्त कर यहां प्रतिष्ठित की। इसके बाद श्राविका लाछी बाई ने श्री आदिनाथ भगवान का एवं मालाशाह संखलेचा ने अपनी माता की इच्छा से श्री शांतिनाथ भगवान का मंदिर बनाकर क्रमशः आचार्य श्री हेेमविमलसूरिजी एवं आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरिजी से प्रतिष्ठा सम्पन्न करवाई।

वीरमपुर का श्री पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ के नाम से अपनी धार्मिक पहचान तब से बनाए हुए आज भी जनप्रिय बना हुआ है। लेकिन सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्थ एवं अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में यहां के शासक पुत्र नगर सेठ संखलेचा नानक की लम्बे बालों वाली चोेटी काटकर अपने घोड़े पर भिनभिनाती मक्ख्यिों को उड़ाने के लिये झवरी बनाने के निर्णय से भयभीत होकर नाकोड़ा से जैसलमेर तीर्थ यात्रा का बहाना बनाकर नाकोड़ा छोड़कर हमेशा के लिये चले गये। इसके बाद उजड़ा नाकोड़ा बाद में जनबस्ती के रूप में आज दिन तक वापिस नहीं बसा।

सत्रहवीं शताब्दी में उजड़ने के बाद वि.सं. 1960 में जैन साध्वी श्री सुन्दरश्रीजी ने बड़ी लगन, निष्ठा, परिश्रम एवं प्रयास के बाद इसका जिर्णोद्धार करवाकर इसकी वि.सं. 1991 माघ शुक्ला 13 को श्री हिम्मतविजयजी (आचार्य श्री मद् विजयहिमाचलसूरीश्वरजी) द्वारा प्रतिष्ठा सम्पन्न करवाई गई। इस प्रतिष्ठा के बाद नाकोड़ा तीर्थ उत्तरोत्तर प्रगति एवं विकास के पथ पर निरन्तर अग्रसर हो रहा हैं। इस प्रतिष्ठा के बाद वि.सं. 2000 में बाड़मेर के यति श्री नेमिचन्द्रजी ने दादा श्री जिनदत्तसूरि दादाबाड़ी, प्रन्यास श्री कल्याणविजयजी ने वि.सं. 2005 में श्री आदिनाथ भगवान मंदिर में बने चौमुखी मंदिर की आचार्य श्री जिनरत्नसूरिजी ने वि.सं. 2008 में दादा श्री कीर्तिरत्नसूरि दादाबाड़ी की आचार्य श्रीमद्विजय हिमाचलसूरीश्वरजी ने वि.सं. 2016 में विभिन्न जैन प्रतिमाओं की, आचार्यश्रीमद्विजय हिमाचलसूरीश्वरजी ने वि.सं. 2029 में पुनः नाकोड़ा के विभिन्न जैन प्रतिमाओं की,आचार्य श्री गुणरत्नसूरीश्वरजी ने वि.सं. 2046 में सिद्धचक्र मंदिर की आचार्य श्री अरिहंत सिद्ध सूरीश्वरजी ने वि.सं. 2055 में श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ, ज्ञानशाला चतुर्मुख मंदिर की श्री रत्नाकर विजयजी ने वि.सं. 2055 में श्री लक्ष्मीसूरि गुरू मंदिर की एवं वि.सं. 2062 में श्री कलाप्रभसागरसूरीश्वरजी ने ज्ञानशाला के जैन आराधना मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई। तीर्थ क्षेत्र में वि.सं. 1500 से लेकर 2062 तक होने वाली विभिन्न प्रतिष्ठाओं में प्रतिष्ठित की कई प्रतिमाएं विद्यमान हैं। जिन पर इन अवधि के कई शिलालेख उत्कीर्ण किये हुए हैं।

इन प्रतिष्ठाओं के आयोजन के साथ जैन तीर्थ धार्मिक दृष्टि से दिनों दिन प्रगति की ऊचाईयों को छूने लगा है। वहां तीर्थ में बने अन्य धार्मिक स्थलों में भगवान महावीर स्मृति भवन, मंगल कलश, निर्माणाधीन समवसरण मंदिर, भक्तामर पट्टशाला आदि ने इस जैन तीर्थ की धार्मिक ख्याति को जनप्रिय बना दिया है। नाकोड़ा के अधिष्ठायक श्री भैरवदेवजी के चमत्कारों ने तो इस तीर्थ की महिमा में चार चाँद जड़ दिये है। तीर्थ अन्य कई धार्मिक स्थलों को अपनी गोद में लिये जन-जन में धार्मिक आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा बनाए हुए है। तीर्थ जैन मंदिरों के जीर्णोद्धार, मानव सेवा, जीवदया, चिकित्सा, शिक्षा, सधर्मी सेवा, जैन साधु-साध्वी वै्यावच्य, साहित्य प्रकाशन, ज्ञानशाला संचालन, गौशाला संचालन आदि कई प्रकार की मानवोपयोगी एवं धार्मिक गतिविधियों का संचालन कर अपनी अनोखी कीर्ति बनाए हुए है। भगवान श्री पार्श्वनाथजी के जन्मोत्सव पर प्रतिवर्ष पोष वदी दशमी को आयोजित होने वाले त्रिदिवसीय मेले में हजारों श्रद्धालु लोग सम्मिलित होते हैं। यात्रियों, दर्शनार्थियों की सुविधा हेतु भोजनशाला, आधुनिक सुविधायुक्त आवासीय व्यवस्था, बिजली, पानी, टेलिफोन, सुरक्षा, यातायात सुविधा आदि का उचित प्रबंध किया हुआ है। सम्पूर्ण तीर्थ की व्यवस्था हेतु श्री जैन श्वेतांबर नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ ट्रस्टमण्डल गठित है।