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Friday, January 23, 2026

भागवत और उनके अवतार की जाति

भागवत और उनके अवतार की जाति

भागवत और उनके अवतार की जाति पर चर्चा चल रही है... लेकिन भागवत के देवता हैं कौन? क्या भागवत केवल कृष्ण का चरित्र है? लेकिन भागवत के कृष्ण कौन है?
निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दने । देवक्यां देवरूपिण्यां #विष्णुः सर्वगुहाशयः । आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः ॥

जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले जनार्दनके अवतारका समय था निशीथ । चारों ओर अन्धकारका साम्राज्य था। उसी समय सबके हृदयमें विराजमान भगवान् विष्णु देवरूपिणी देवकीके गर्भसे प्रकट हुए, जैसे पूर्व दिशामें सोलहों कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाका उदय हो गया हो ॥ ❤️

- श्रीमद्भागवत दशम स्कंद अध्याय तृतीया

वास्तव में भागवत तो संपूर्ण विष्णु चरित्र पर ही आधारित है यह बात स्वयं वेद व्यास इसी श्रीमद्भागवत में कहते हैं - एतद् वः कथितं विप्रा #विष्णोश्चरितमद्भुतम् । ❤️ - श्रीमद्भागवत, द्वादश स्कंध 12.2

कृष्ण अवतार केवल दशम स्कंध में वर्णित हैं अन्य ग्यारह स्कन्द में अर्ची, पृथु, लक्ष्मी नरसिंह सीताराम आदि सभी चौबीस अवतार वर्णित हैं जिन्हें भागवत ने लक्ष्मी नारायण का ही अवतार कहा है.. ❤️🙏🏻

भगवान विष्णु का वर्ण क्या होगा? वैसे तो भगवान से ही चारों वर्ण उत्पन्न हुए और भगवान का कोई वर्ण नहीं हैं फिर भी सोचें तो..

देखिए भगवान विष्णु का प्रिय रंग - पीताम्बर.. मनुस्मृति के अनुसार वैश्य का प्रियरंग पीताम्बर.. विष्णु को कौन प्रिय लक्ष्मी.. वैश्यों को कौन प्रिय - लक्ष्मी, विष्णु से ही वैश्य बना.. उनके नामानुसार.. और विष्णु क्या करते हैं अन्न धन आदि द्वारा विश्व का पालन.. विश्वम्भर हैं... विश का मुखिया अर्थात वैश्य होता है.. कृषि वाणिज्य और गोपालन द्वारा अन्न, धन का सृजन वैश्य करते हैं... और तो और जब भगवान ने अपना पूर्णावतार (कृष्ण अवतार) लिया तो दौड़ते हुए नंद बाबा के आंगन में पहुंच गए.. बच्चे को पारिवारिक माहौल ही अच्छा लगता है.. वैश्य वर्ण के कारण उन्हें वैश्य परिवार में ही बचपन अच्छा लगा.. गोपालक होते हैं वैश्य और भगवान का धाम - गोलोक धाम... उनकी प्रिया राधा रानी के पिता का उल्लेख शिव पुराण और ब्रह्मवैवर्त में वृषभानु "वैश्य" ऐसा स्पष्ट है..

52 बुद्धि बनिया और बनिये का दिमाग की अक्सर तारीफ की जाती है और नारायण छलिया हैं.. वैश्य ऐश्वर्यशाली होते हैं लक्ष्मीवान होते हैं और नारायण साक्षात लक्ष्मीपति हैं 😎

भागवत का प्राण गोपिका गीत है और गोपियां कौन हैं? साक्षात् वैश्य कुलोद्भव ❤️🙏🏻

इतनी similarity के बाद अब मैं दावा ठोक देता हूँ... 😜😜

जय गोविंद

लेख साभार प्रखर अग्रवाल जी की फेसबुकवाल से

Thursday, January 22, 2026

महाराजा अग्रसेन की शिक्षाये

महाराजा अग्रसेन की शिक्षाये 

महाराज अग्रसेन जी ने अमावस्या का बहुत गहरा महत्व बताया है, खासकर समाज, दान और आत्मशुद्धि से जोड़कर।


उनकी शिक्षाओं के अनुसार:

अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व (महाराज अग्रसेन की दृष्टि से)
महाराज अग्रसेन जी मानते थे कि अमावस्या केवल तिथि नहीं, आत्मचिंतन का दिन है।
उन्होंने कहा था:
“जिस प्रकार अमावस्या की रात के बाद चंद्रमा फिर से बढ़ता है,
उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन की अंधकारपूर्ण आदतों को त्यागकर
फिर से उज्ज्वल बनना चाहिए।”

आत्मशुद्धि का दिन

महाराज अग्रसेन जी के अनुसार अमावस्या पर:
मौन धारण करना
कम बोलना, अधिक सोचना
क्रोध, अहंकार और लोभ का त्याग
ये सब राजा के लिए भी उतना ही आवश्यक है जितना साधु के लिए।
इसी कारण वे अमावस्या को राजधर्म और आत्मधर्म दोनों की परीक्षा का दिन मानते थे।

दान और करुणा का विशेष दिन

महाराज अग्रसेन जी ने अपने राज्य में नियम बनाया था:
“अमावस्या के दिन कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए।”
इसलिए वे अमावस्या पर विशेष रूप से:
अन्न दान
वस्त्र दान
निर्धनों की सहायता
करते थे।
यही परंपरा आज भी अग्रवाल समाज में दिखती है।

पितृ सम्मान का महत्व

महाराज अग्रसेन जी मानते थे कि:
“जो अपने पूर्वजों को स्मरण करता है,
उसका भविष्य स्वतः उज्ज्वल होता है।”
इसीलिए अमावस्या को वे:
पितरों का तर्पण
माता-पिता का आशीर्वाद
बड़ों का सम्मान
का श्रेष्ठ दिन बताते थे।

समाज सुधार से जोड़कर देखा

उनके अनुसार:
अमावस्या = नया आरंभ
वे कहते थे:
“आज का दिन संकल्प का है —
मैं आज से अन्याय नहीं करूँगा,
किसी को दुःख नहीं दूँगा।”

सार

महाराज अग्रसेन जी के अनुसार अमावस्या:
कारण
अर्थ
आत्मचिंतन
अपने दोष सुधारने का दिन
दान
समाज को साथ लेकर चलने का दिन
पितृ स्मरण
संस्कारों को जीवित रखने का दिन
नया संकल्प
जीवन को फिर से उज्ज्वल बनाने का अवसर

Sunday, January 18, 2026

KUMAR GUPT - THE GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT

KUMAR GUPT - THE GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT


कुमारगुप्त प्रथम, गुप्त वंश के सम्राट एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय के पुत्र थे। पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद वह राजगद्दी पर बैठे। इनकी माता का नाम पट्टमहादेवी ध्रुवदेवी था। उनके शासन काल में विशाल गुप्त साम्राज्य अक्षुण रूप से क़ायम रहा। बल्ख से बंगाल की खाड़ी तक उनका अबाधित शासन था। सब राजा, सामन्त, गणराज्य और प्रत्यंतवर्ती जनपद कुमारगुप्त के साम्राज्य के अधीन थे। गुप्त वंश की शक्ति उसके शासन काल में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। कुमारगुप्त को विद्रोही राजाओं को वश में लाने के लिए कोई युद्ध नहीं करने पड़े।

उपाधि 

 महाराजाधिराज, परम भट्टारका, परमद्वैता, शंक्रादित्य, महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, श्री महिंद्रा, महेंद्रसिंह, महेंद्र सिम्हा, अश्वमेघमहेंद्र, अश्वमेध महिंद्रा, परमदैवत

मृत्यु 455 ई., प्राचीन भारत

कुमारगुप्त प्रथम का पारिवारिक जीवन

कुमारगुप्त प्रथम के 2 पुत्र – स्कंदगुप्त और पूरुगुप्त थे। स्कंदगुप्त के अभिलेख में उसकी माता का नाम नहीं बताया गया है। कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम की राजकुमारी अनंता देवी से हुआ था। जिनसे उन्हें एक पुत्र हुआ जिसका नाम पूरुगुप्त था।

भिटारी के अभिलेख बताते हैं कि कुमारगुप्त प्रथम ने अपने एक मंत्री की बहिन के साथ विवाह किया था। परंतु, उन्हें प्राप्त हुई संतान का कहीं जिक्र नहीं मिलता है।

कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेख

कुमारगुप्त प्रथम के समय के लगभग 16 अभिलेख और बड़ी मात्रा में स्वर्ण के सिक्के प्राप्त हुए हैं। उनसे उसके अनेक नामों की यथा- ‘परमदैवत’, ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’, ‘अश्वमेघमहेंद्र’, ‘महेंद्रादित्य’, ‘श्रीमहेंद्र’, ‘महेंद्रसिंह’ आदि की जानकारी मिलती है। इसमें से कुछ तो वंश के परंपरागत हैं, जो उनके सम्राट पद के बोधक हैं।


कुछ अभिलेख उनकी नई विजयों के द्योतक जान पड़ते हैं। सिक्कों से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त प्रथम ने दो अश्वमेध यज्ञ किए थे। उसके अभिलेखों और सिक्कों के प्राप्ति स्थानों से उसके विस्तृत साम्राज्य का ज्ञान होता है। वे पूर्व में उत्तर-पश्चिम बंगाल से लेकर पश्चिम में भावनगर, अहमदाबाद, उत्तर प्रदेश और बिहार में उनकी संख्या अधिक है। उसके अभिलेखों से साम्राज्य के प्रशासन और प्रांतीय उपरिकों का भी ज्ञान होता है।

कुमारगुप्त प्रथम के राज्य पर आक्रमण

कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में साम्राज्य को हिला देने वाले दो आक्रमण हुए थे। पहला आक्रमण कदाचित्‌ नर्मदा नदी और विध्यांचल पर्वतवर्ती आधुनिक मध्य प्रदेशीय क्षेत्रों में बसने वाली पुष्यमित्र नाम की किसी जाति का था। उनके आक्रमण ने गुप्त वंश की लक्ष्मी को विचलित कर दिया था, किंतु राजकुमार स्कंदगुप्त आक्रमणकारियों को मार गिराने में सफल हुआ। दूसरा आक्रमण हूणों का था, जो संभवत उसके जीवन के अंतिम वर्ष में हुआ था। हूणों ने गंधार पर क़ब्ज़ा कर गंगा की ओर बढ़ना प्रारंभ कर दिया था। स्कंदगुप्त ने उन्हें पीछे ढकेल दिया।

कुमारगुप्त प्रथम का शासन काल | सुख-समृद्धि का युग

कुमारगुप्त का शासन काल भारतवर्ष में सुख और समृद्धि का युग था। वह स्वयं धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु और उदार शासक के रूप में जाने जाते थे। उसके अभिलेखों में पौराणिक हिन्दू धर्म के अनेक संप्रदायों के देवी-देवताओं के नामोल्लेख और स्मरण होने के साथ ही साथ बुद्ध की भी स्मृति चर्चा है। उसके उदयगिरि के अभिलेख में पार्श्वनाथ के मूर्ति निर्मांण का भी वर्णन है। यदि ह्वेनत्सांग ने ‘शंक्रादित्य’ नाम से जिसे संबोधित किया है वह कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य ही हैं, तो इन्हें ‘नालन्दा विश्वविद्यालय’ का संस्थापक भी कह सकते हैं।

कुमारगुप्त प्रथम का शासन का प्रबंधन

अपने शासन के अंतिम समय में कुमारगुप्त को पुष्यमित्र या हूण जातियों के विद्रोह सामना करना पड़ा। ऐसा लगता था कि इस विद्रोह के बाद से ही गुप्त साम्राज्य विघटन की ओर चला जाएगा। परंतु कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने राजा बनने के बाद अपनी वीरता और शौर्य से हूणों को पराजित कर गुप्त वंश को भयंकर संकट से बचाया।

कुमारगुप्त के साम्राज्य में मजबूत शासन प्रणाली थी जिसकी बदौलत वह इतने बड़े साम्राज्य को संभाल पाने में सफल हुए। उनके राज्य में उपरिकस, भूक्तिस, विशयास और विश्यापति थे जो वर्तमान समय में क्रमशः गवर्नर, मुख्यमंत्री, कलेक्टर व मजिस्ट्रेट के समान पद थे।

उपरिकस (गवर्नर) को महाराजा कहा जाता था जो शासन के कार्यभार व राज्यों से प्राप्त कर का हिसाब रखते थे। भूक्तिस (मुख्यमंत्री) हर एक राज्य एक ही होता था जो राज्य का शासन संभालता था। विशयास (कलेक्टर) राज्य के ही अंगों पर गौर करते थे और विश्यापति (मजिस्ट्रेट) अन्य नीचे स्तर के कार्यों की देखरेख किया करते थे।

कुमारगुप्त प्रथम की सैनिक एवं राजनैतिक उपलब्धियाॅं

कुमारगुप्त ने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया। उनका राज्यकाल 415 ई. से 455 ई. तक था। 40 वर्षों में कुमारगुप्त प्रथम ने कोई सैनिक सफलता तो अर्जित नहीं की, परन्तु अपने पूर्वजों से जो विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था, उसे उन्होंने अक्षुण्ण बनाये रखा। उनके राज्यकाल में शान्ति और सुव्यवस्था कायम रही।

कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेखों से पता चलता है कि उसके शासन के वर्ष शान्तिपूर्ण रहे और वह व्यवस्थित तरीके से शासन करते थे। लेकिन उसके शासन का अन्तिम चरण शान्तिपूर्ण नहीं था। स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख से पता चलता है कि इस काल में पुष्यमित्रों ने गुप्त-साम्राज्य पर आक्रमण किया था। हालाँकि स्कन्दगुप्त ने इस आक्रमण को विफल कर दिया था।

इस अभिलेख के अनुसार इस आक्रमण के परिणाम स्वरूप इस कुल की राजलक्ष्मी विचलित हो उठी। इसे स्थिर करने में स्कन्दगुप्त को कठिन प्रयास करना पड़ा पुष्यमित्रों के तेज़ी को रोकने के लिए उसे पूरी रात युद्धभूमि में ही बितानी पड़ी। भीतरी लेख से पता चलता है कि पुष्यमित्रों की सैन्यशक्ति एवं साधन विकसित थे तथा उनसे मुकाबला करना अत्यन्त कठिन कार्य था।

इसलिए इस अभिलेख में तीन बार गुप्तों की लक्ष्मी विचलित होने का उल्लेख है। जिससे इस आक्रमण की तेजी का अनुमान लगाया जा सकता है। कुमारगुप्त इस समय तक बूढ़े हो चुके थे। इसलिए उनके पुत्र युवराज स्कन्दगुप्त को इस युद्ध के संचालन का नेतृत्व करना पड़ा।

स्कन्दगुप्त ने बड़ी कुशलता-पूर्वक पुष्यमित्रों के आक्रमण को विफल कर दिया तथा अपनी योग्यता और शक्ति को प्रदर्शित किया। स्कन्दगुप्त की यह विजय अत्यन्त महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इस विजय से पुष्यमित्रों ने उत्पात, भय और आतंक की जो स्थिति उत्पन्न कर दी थी वह समाप्त हो गयी और उनके विचलित कर देने वाले प्रहारों से गुप्तवंश विलुप्त होने से बच गया।

विभिन्न स्रोतों से पता चलता है कि प्राचीन भारत में पुष्यमित्र नामक जाति थी। वायुपुराण तथा जैनकल्पसूत्र में इस जाति का उल्लेख मिलता है। वे नर्मदा नदी के मुहाने के समीप मेकल में शासन करते थे। पुष्यमित्रों के पहचान का निर्धारण करना कठिन तो अवश्य है किन्तु इतना स्पष्ट है कि आक्रमणकारी बुरी तरह परास्त हुए और उन्हें सफलता नहीं प्राप्त हो सकी। इस विजय की सूचना मिलने से पहले ही वृद्ध सम्राट कुमारगुप्त दिवंगत हो चुके थे।

कुमारगुप्त प्रथम की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

कुमारगुप्त प्रथम एक एक योग्य शासक थे। जिन्होंने गुप्तवंश को आगे बढाया और एक उदारवादी शासक के रूप में अपनी पहचान स्थापित किया। इसके साथ ही साथ उन्होंने कई सांस्कृतिक उपलब्धियां भी अर्जित की और बहुत से निर्माण कार्य भी कराये ।

1. सहिष्णुता और निर्माण-कार्य

कुमारगुप्त प्रथम का शासन-काल सहिष्णुता और सार्वजनिक निर्माण कार्यों का काल था। वह अपने पूर्वजों की तरह वैष्णव था। उसके मुद्राओं एवं अभिलेखों पर उसकी ‘परमभागवत‘ की उपाधि मिलती है। मुद्राओं पर विष्णु के वाहन गरूड़ की चित्र भी खुदा हुआ है। लेकिन उसने अपने पूर्वजों की धार्मिक सहिष्णुता को कायम रखा।

ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतान्त में उल्लेख किया है कि शक्रादित्य (कुमारगुप्त प्रथम महेन्द्रादित्य) ने नालन्दा बौद्ध बिहार की स्थापना की थी। यहाँ पर कुमारगुप्त प्रथम ने 450 ई. में विश्व प्रसिद्ध नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी। इस विश्वविद्यालय को बाद के गुप्त वंशीय शासकों ने इस विश्वविद्यालय के निर्माण कार्य को जारी रखा और 470 ई. तक यह विश्वविद्यालय दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हो चुका था।

उस समय के करमदण्डा अभिलेख से पता चलता है कि कुमारगुप्त प्रथम का एक उच्च पदाधिकारी पृथ्वीषेण, जो उसका पहले मंत्री और कुमारामात्या था तथा बाद में कुमारगुप्त का महाबलाधिकृत (सेनापति) हो गया, शैव संप्रदाय से था। करमदण्डा अभिलेख में उसके द्वारा एक शैव-मूर्ति की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

मन्दसोर अभिलेख से ज्ञात होता है कि पश्चिमी मालवा के गवर्नर बन्धुवर्मा के शासनकाल में एक दशपुर में एक सूर्यमंदिर का निर्माण करवाया था। बिलसड़ के अभिलेख से पता चलता है कि ध्रुवशर्मा ने स्वामी महासेन (कार्तिकेय) का एक मंदिर बनवाया था। मनकुवर के अभिलेख में बुद्धमित्र द्वारा एक बुद्ध-प्रतिमा की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

उदयगिरी के एक गुहा लेख में शंकर द्वारा जैन तीर्थकर पाश्र्वनाथ की मूर्ति-स्थापना का प्राप्त होता है। उनमें किसी प्रकार की धार्मिक शत्रुता नहीं थी। लोह अपनी इच्छा के अनुसार कई धर्मों के मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण करते थे और अपनी इच्छा अनुसार दान भी देते थे। राजा की नजर में भी कोई पक्षपात नहीं था। वह एक मात्र योग्यता के आधार पर अपने पदाधिकारियों को नियुक्त करते थे, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के हों।

2. अश्वमेघ यज्ञ

कुमारगुप्त के सिक्कों से पता चलता है कि उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया था। अश्वमेघ के सिक्कों के मुख भाग पर यज्ञयूप में बधे हुए घोड़े की चित्र तथा मुख्य भाग पर ‘श्री अश्वमेघमहेन्द्रः‘ मुद्रालेख छपी है। लेकिन कुमारगुप्त ने किस उपलब्धि के लिए यह अनुष्ठान किया था, इसका पता नहीं चलता।
नालंदा विश्वविद्यालय (निर्माण 450 ईस्वी से 470 ईस्वी)

5वीं शताब्दी ईस्वी (450 ईस्वी) में नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण गुप्त वंश के कुमारगुप्त ने करवाया था। कुमारगुप्त प्रथम के बाद उनके उत्तराधिकारी अन्य गुप्त वंशीय राजाओं ने यहाँ अनेक विहारों और विश्वविद्यालय के भवनों का निर्माण करवाया। इनमें से गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने 470 ई. में यहाँ एक सुंदर मंदिर बनवाकर भगवान बुद्ध की 80 फीट की प्रतिमा स्थापित की थी। इसके बाद इसका निर्माण कार्य पूरा हो चुका था और इसे दुनिया के लिए अध्यन का एक केंद्र बना दिया गया था। नालन्दा विश्‍वविद्यालय में अध्ययन करने के लिए जावा, चीन, तिब्बत, श्रीलंका व कोरिया आदि देशों के छात्र आते थे।

जब ह्वेनसांग भारत आया था उस समय नालन्दा विश्‍वविद्यालय में 8500 छात्र एवं 1510 अध्यापक थे। उस समय शीलभद्र, धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, दिकनाग, ज्ञानचन्द्र, नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग, धर्मकीर्ति आदि नालंदा के प्रख्यात आचार्य (प्रोफ़ेसर) थे। तथा शीलभद्र यहाँ के प्राचार्य थे।

इसके निर्माण के बाद कन्नौज के राजा हर्षवर्धन, पाल शासक और अनेक विद्वानों ने समय समय पर इसका संरक्षण किया। नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा, प्रतिष्ठा और बौद्धिक आदान-प्रदान का केंद्र था। बौद्ध दर्शन के अलावा, इस विश्वविद्यालय में व्याकरण, चिकित्सा, तर्कशास्त्र और गणित भी पढ़ाया जाता था। यह 5वीं शताब्दी ई. से 1200 ई. तक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था। नालंदा विश्वविद्यालय को इतिहासकारों द्वारा दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है।

हालाँकि तक्षशिला विश्वविद्यालय और भी पुराना लगभग (700 ईसा पूर्व) है, परन्तु यह तक्षशिला विश्वविद्यालय आवासीय नहीं था। तक्षशिला विश्वविद्यालय इस समय पाकिस्तान के रावलपिंडी (पंजाब) में स्थित है। यह कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था।

नालंदा विश्वविद्यालय में छात्रों के रहने की उत्तम व्यवस्था थी। इस विश्वविद्यालय में 8 शालाएं और 300 कमरे थे। अनेक खंडों में विद्यालय तथा छात्रावास बने हुए थे। छात्रों के सोने के लिए पत्थर के शयनयान बने हुए थे, तथा उसने स्नान के लिए सुन्दर तारण ताल बने हुए थे इस तरण तालों में नीचे से ऊपर जल पहुचने की व्यवस्था की गयी था। इसके परिसर में जगह जगह पर तांबे एवं पीतल की बुद्ध की अनेकों छोटी बड़ी मूर्तियाँ थी। इस विश्‍वविद्यालय में शिक्षण कार्य पालि भाषा में होता था।
 
नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश के नियम

ह्वेनसांग ने दस वर्षों तक यहाँ अध्ययन किया। ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में लिखा था था कि नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना अत्यंत कठिन था। इस विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए छात्र को प्रवेश परीक्षा (Entrance Test) देनी होती थी। इस प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही प्रवेश मिल पाना संभव था। यह प्रवेश परीक्षा छ: भागों में विभाजित थी। इस परीक्षा के छः भागों को संपन्न करने के लिए विश्विद्यालय में छ: द्वार बनाये गए थे। इस छः द्वारों से होकर ही छात्र को विद्यालय में प्रवेश करना होता था।

प्रत्येक द्वार पर एक द्वार पण्डित होता था। प्रवेश का इच्छुक छात्र जब पहले द्वार पर पहुँचता था तो उस द्वारा पर मौजूद पंडित उसकी परीक्षा लेता था। अगर वह छात्र उस परीक्षा में अनुतीर्ण हो जाता था तो उसे प्रवेश नहीं मिलता था और उसको वापस कर दिया जाता था। यदि वह छात्र उत्तीर्ण हो जाता था तो उसे आगे दूसरे द्वार की तरफ भेजा जाता था जहाँ पर मौजूद पंडित पुनः उसकी परीक्षा लेता था। अगर वह छात्र यहाँ पर अनुतीर्ण हो गया तो उसे वही से योग्य करार देकर वापस कर दिया जाता।

दूसरे द्वारा पर उतीर्ण होने पर उसे आगे जाने दिया जाता था। आगे वह तीसरे द्वार पर पहुँचता था। इस प्रकार से उसे छ: द्वारों पर स्थित पंडितों द्वारा ली गयी परीक्षा को पास करने पर ही नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल पाता। जिस द्वारा पर छात्र अनुतीर्ण हो जाता वहा से वह असफल होकर प्रवेश प्रक्रिया से बहार हो जाता था। इस परीक्षा में 20 से 30 प्रतिशत छात्र ही उत्तीर्ण हो पाते थे। विश्वविद्यालय में प्रवेश के बाद भी छात्रों को कठोर परिश्रम करना पड़ता था तथा अनेक परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था। यहाँ से स्नातक करने वाले छात्र का हर जगह सम्मान होता था।

नालंदा विश्वविद्यालय की निःशुल्क व्यवस्था

नालन्दा विश्वविद्यालय में शिक्षा, आवास, भोजन आदि का कोई शुल्क छात्रों से नहीं लिया जाता था। सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं। राजाओं और अमीर लोगों द्वारा दिये गये दान से इस विश्वविद्यालय का व्यय चलता था। इस विश्वविद्यालय को 200 ग्रामों की आय प्राप्त होती थी।
नालंदा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम और शिक्षक

नालंदा में बौद्ध धर्म के अतिरिक्त हेतुविद्या, शब्दविद्या, चिकित्सा शास्त्र, अथर्ववेद तथा सांख्य से संबंधित विषय भी पढ़ाए जाते थे। शिक्षा की व्यवस्था महास्थविर के नियंत्रण में थी। अर्थात महास्थविर यहाँ के व्यवस्थापक थे। शीलभद्र यहाँ के प्रधानाचार्य थे, जो एक प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् थे। यहाँ के अन्य ख्याति प्राप्त आचार्यों में नागार्जुन, पदमसंभव (जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार किया), शांतिरक्षित और दीपंकर शामिल थे। ये सभी बौद्ध धर्म के इतिहास में प्रसिद्ध हैं।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि नालंदा के एक सहस्त्र विद्वान् आचार्यों में से सौ ऐसे थे जो सूत्र और शास्त्र जानते थे, पाँच सौ विद्वान ऐसे थे जो तीन विषयों में पारंगत थे और बीस विद्वान ऐसे थे जो पचास विषयों में पारंगत थे। केवल शीलभद्र ही ऐसे थे जिनकी सभी विषयों में जानकारी थी।

नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का महत्व

7वीं शती में और उसके पश्चात् कई सौ वर्षों तक, नालंदा एशिया का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय था। यहाँ अध्ययन के लिए चीन के अतिरिक्त चंपा, कंबोज, जावा, सुमात्रा, ब्रह्मदेश, तिब्बत, लंका और ईरान आदि देशों के विद्यार्थी आते थे और विद्यालय में प्रवेश पाकर अपने को धन्य मानते थे।

नालंदा के विद्यार्थियों द्वारा ही एशिया में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ था। यहाँ के विद्यार्थियों और विद्वानों की मांग एशिया के सभी देशों में थी और उनका सर्वत्र आदर होता था। तिब्बत के राजा के निमंत्रण पर भदंत शांतिरक्षित और पद्मसंभव तिब्बत गए थे। वहाँ उन्होंने संस्कृत, बौद्ध साहित्य और भारतीय संस्कृति का प्रचार किया।

बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करना

1193 ई. में एक तुर्क शासक मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था, जिसका उद्देश्य ज्ञान, बौद्ध धर्म और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करना था। उसने नालंदा के पुस्तकालय में आग लगा दी थी। कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी पुस्तकें थी की पूरे तीन महीने तक यहां के पुस्तकालय में आग धधकती रही। उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले। बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया था।

नालंदा विश्वविद्यालय का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होना

नालंदा विश्वविद्यालय को 9 जनवरी 2009 को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। नालंदा विश्वविद्यालय को 2010 में पुनर्जीवित किया गया और इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा दिया गया। यह बिहार के नालंदा जिले के राजगीर में स्थित है और विदेश मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

कुमारगुप्त प्रथम का धर्म

कुमारगुप्त के सिक्कों पर गरुड़ का चिन्ह बना हुआ है जिससे पता चलता है कि वह भगवान विष्णु के परम भक्त थे क्योंकि गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है। हालांकि, गुप्त साम्राज्य का राष्ट्रीय चिन्ह भी गरुड़ था जो उनके पूर्वजों ने अपनाया था।

इसके साथ ही वह कार्तिकेय के भी भक्त थे। उनके सिक्कों पर कार्तिकेय को मोर पर बैठा हुआ दिखाया गया है। कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है जिसके कारण उन्होंने अपने एक पुत्र का नाम स्कंदगुप्त रखा था और खुद का नाम “कुमार” रखा था।

उनके राज्य में बौद्ध, जैन, शैव और विष्णु में विश्वास माने जाते रहे थे। वह खुद एक हिंदू थे , उनके द्वारा किया गया अश्वमेध यज्ञ हिंदू धर्म का एक प्रमाण है।

कुमारगुप्त प्रथम के सिक्के

कुमारगुप्त प्रथम ने अपने शासन के दौरान बड़ी संख्या में सिक्के जारी किए। बयाना से 614 सिक्के मिले हैं उन सिक्कों के मुख्य प्रकार निम्न है-


धनुर्धारी
घुड़सवार
तलवारधारी
शेर कातिल
बाघ कातिल
हाथी सवार
हाथी सवार-बाघ कातिल
गैंडा कातिल
अश्वमेध
छत्र
अप्रतिघा
गीतिकाव्यकार
राजा और रानी

इन सिक्कों पर कुमारगुप्त प्रथम को भिन्न-भिन्न उपाधियां दी गई है जैसे श्री महिंद्रा, महेंद्र सिम्हा, अश्वमेध महिंद्रा इत्यादि।

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु

संभवतः कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु प्राचीन भारत में 455 ई. में हुई थी। स्कंदगुप्त के अभिलेखों में बताया गया है कि स्कंदगुप्त 455 ई. में गुप्त साम्राज्य की राजगद्दी पर बैठे। जिसका मतलब है कि कुमारगुप्त ने उसी वर्ष या उससे पहले वर्ष में राज सिंहासन छोड़ा होगा।

वी. ए. स्मिथ ने कुमारगुप्त के सिक्कों से पता लगाया है कि उसने 455 ई. तक शासन किया था। कुमारगुप्त प्रथम के राज्य के अंतिम वर्ष शांतिपूर्वक नहीं रहे। उस समय पुष्यमित्र या हूणों ने उनके खिलाफ रोष जताना शुरू कर दिया था और ऐसा माना जाता है कि जिसके कारण उन्होंने राज्य के कई भागों पर अपना अधिकार खो दिया था।

कुमारगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी स्कंदगुप्त

455 ई. में स्कंदगुप्त, गुप्त वंश की राजगद्दी पर बैठे। राजा बनने के तुरंत बाद ही उनको हूणों (मलेच्छ/पुष्यमित्र) के आक्रमण का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी वीरता, सहस और पराक्रम के दम पर इस युद्ध में हूणों को पराजित कर दिया और उनके क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया।

उनके दादा समुद्रगुप्त के समय में ये क्षेत्र गुप्त वंश के ही अंग थे। जिनको हूणों ने अपने कब्जे में ले लिया था। इस जीत के बाद वह अपनी मां से मिलने गए जिनकी आंखें खुशी के मारे आंसुओं से भर आई थी।

HARSHWARDHAN - THE GREAT VAISHYA SAMRAT

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हर्षवर्धन (590-647 ई.) प्राचीन भारत में एक राजा थे, जिन्होंने उत्तरी भारत में 606 ई. से 647 ई. तक शासन किया। वह वर्धन राजवंश के शासक प्रभाकरवर्धन के पुत्र थे। इनके पिता प्रभाकरवर्धन ने हूणों को पराजित किया था। हर्षवर्धन का छोटा भाई राज्यवर्धन और एक बहन थी, जिसका नाम राजश्री था। हर्षवर्धन वैश्य वनिक महाजन वंश के थे।

ईसा की छठी शताब्दी में उत्तर भारत में एक शक्तिशाली राज्य था, जिसका नाम था थानेश्वर। यह क्षेत्र आज के हरियाणा का क्षेत्र है। इस राज्य में राजा प्रभाकरवर्धन शासन करते थे। वे बड़े वीर, पराक्रमी और योग्य शासक थे। राजा प्रभाकरवर्धन ने महाराज के स्थान पर महाराजाधिराज और परम भट्टारक की उपाधियां धारण कर रखी थीं। राजा प्रभाकरवर्धन छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मालवों, गुर्जरों और हूणों को परास्त कर चुके थे, परन्तु इसके पश्चात भी राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा पर अक्सर हूणों के छुट-पुट उपद्रव होते रहते थे।

हर्षवर्धन का संक्षिप्त परिचय

हर्षवर्धन का जन्म 590 ई. को थानेश्वर (वर्तमान हरियाणा का एक क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता प्रभाकरवर्धन, पुष्यमित्र वंश के एक राजा थे, तथा माता का नाम यशोमती था। हर्ष का एक बड़ा भाई तथा एक बहन थी। भाई का नाम राज्यवर्धन तथा बहन का नाम राज्यश्री था।

हर्ष से पहले वर्धन साम्राज्य का ज्यादा विस्तार नहीं हुआ था। उनके भाई ने सम्राट बनने के बाद साम्राज्य को विस्तारित किया। परंतु यह विस्तार ज्यादा नहीं हो पाया था। जब हर्ष राजा बने तो उन्होंने लगभग पूरे उत्तरी भारत पर अपना शासन स्थापित कर लिया।

हर्षवर्धन का जन्म

राजा प्रभाकरवर्धन की रानी का नाम था यशोमती। रानी यशोमती के गर्भ से जून 590 ई. में एक परम तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर भारत के इतिहास में राजा हर्षवर्धन के नाम से विख्यात हुआ। हर्षवर्धन का एक बड़ा भाई था जिसका नाम था राज्यवर्धन। राज्यवर्धन हर्षवर्धन से चार वर्ष बड़ा था। साथ ही एक राजश्री नाम की बहन भी थी जो उससे लगभग डेढ़ वर्ष छोटी थी। इन तीनों बहन-भाइयों में अगाध प्रेम था।

हर्ष का जन्म थानेसर में हुआ था जो वर्तमान में हरियाणा में है। यहां 51 शक्तिपीठों में से 1 पीठ है। हर्ष के मूल और उत्पत्ति के संदर्भ में एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो कि गुजरात राज्य के गुन्डा जिले में पाया गया है। उनके काल में कन्नौज में मौखरि वंश के राजा अवंति वर्मा शासन करते थे।

सिहांसनारूढ़

हर्ष के पिता का नाम प्रभाकरवर्धन था। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के पश्चात राज्यवर्धन राजा हुआ, पर मालव नरेश देवगुप्त और गौड़ नरेश शशांक की दुरभि संधिवश मारा गया। अर्थात बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या के बाद हर्षवर्धन को 606 ई. में राजपाट सौंप दिया गया। खेलने-कूदने की उम्र में हर्षवर्धन को राजा शशांक के खिलाफ युद्ध के मैदान में उतरना पड़ा था। शशांक ने ही राज्यवर्धन की हत्या की थी। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में अराजकता की स्थिति बन चुकी थी। इस स्थिति में हर्ष के शासन ने राजनीतिक स्थिरता प्रदान की।

हर्षवर्धन बना सम्राट

एक समय में वर्धन साम्राज्य का शासक हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन थे। प्रभाकरवर्धन का किसी कारण वश देहांत हो गया जिसके बाद उनके बड़े बेटे राज्यवर्धन ने शासन की बागडोर को संभाला। वह हर्ष का बड़ा भाई था। दोनों भाइयों की इकलौती बहन राज्यश्री का विवाह मोखेरी राजा ग्रहवरमण से हुआ। कई वर्षों बाद ग्रहवरमण को मालवा के राजा देवगुप्त ने युद्ध में हरा दिया तथा उनकी हत्या कर दिया।


साथ ही साथ देवगुप्त ने विधवा राज्यश्री को भी बंदी बना लिया गया। अपने परिवार के साथ ऐसी अनहोनी होते हुए देखकर राज्यवर्धन ने मालवा पर आक्रमण कर दिया तथा देवगुप्त को पराजित कर दिया।

इसके बाद पश्चिम बंगाल के गौड़ वंश के शासक शशांक ने राज्यवर्धन के साथ नजदीकी संबंध बनाए। परंतु शशांक मालवा के राजा देवगुप्त से मिले हुए थे।

मौका पाकर शशांक ने विश्वासघात करके राज्यवर्धन की हत्या कर दी। हर्ष ने अपने भाई की हत्या की खबर सुनकर गौड़ों पर आक्रमण कर दिया। उस समय हर्ष की उम्र मात्र 16 वर्ष की थी। और इसी मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही 606 ई. को हर्षवर्धन पुष्यमित्र साम्राज्य का सम्राट बना।

हर्षवर्धन का शासन प्रबन्ध

हर्ष स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था में व्यक्तिगत रूप से रुचि रखते थे। सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् गठित की गई थी। बाणभट्ट के अनुसार ‘अवन्ति’ युद्ध और शान्ति का सर्वोच्च मंत्री था। ‘सिंहनाद’ हर्ष का महासेनापति था। बाणभट्ट ने हर्षचरित में इन पदों की व्याख्या इस प्रकार की है-

अवन्ति – युद्ध और शान्ति का मंत्री
सिंहनाद – हर्ष की सेना का महासेनापति
कुन्तल – अश्वसेना का मुख्य अधिकारी
स्कन्दगुप्त – हस्तिसेना का मुख्य अधिकारी
भंंडी- प्रधान सचिव
लोकपाल- प्रान्तीय शासक
हर्षवर्धन का सम्राज्य विस्तार

महान सम्राट हर्षवर्धन ने लगभग आधी शताब्दी तक अर्थात 590 ई. से लेकर 647 ई. तक अपने राज्य का विस्तार किया। हर्षवर्धन ने पंजाब छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया था। हर्ष ने लगभग 41 वर्षों तक शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार जालंधर, पंजाब, कश्मीर, नेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया था। साथ ही इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया। हर्ष के कुशल शासन में भारत तरक्की की ऊंचाईयों को छू रहा था। हर्ष के शासनकाल में भारत ने आर्थिक रूप से बहुत प्रगति की थी।

कहा जाता है कि हर्षवर्धन ने अरब पर भी चढ़ाई कर दी थी, लेकिन रेगिस्तान के एक क्षेत्र में उनको रोक दिया गया। इसका उल्लेख भविष्य पुराण में देखने को मिलता है।

हर्षवर्धन के अभियान


ऐसा माना जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन की सेना में 1 लाख से अधिक सैनिक थे। यही नहीं, सेना में 60 हजार से अधिक हाथियों को रखा गया था। लेकिन हर्ष को बादामी के चालुक्यवंशी शासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। जिसका उल्लेख ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में मिलता है। 6ठी और 8वीं ई. के दौरान दक्षिण भारत में चालुक्‍य बहुत शक्तिशाली थे। इस साम्राज्‍य का प्रथम शास‍क पुलकेसन, 540 ई. में शासनारूढ़ हुआ और कई शानदार विजय हासिल कर उसने एक बहुत ही शक्तिशाली साम्राज्‍य की स्‍थापना की। उसके पुत्रों कीर्तिवर्मन व मंगलेसा ने कोंकण के मौर्यन सहित अपने पड़ोसियों के साथ कई युद्ध करके सफलताएं अर्जित कीं व अपने राज्‍य का और विस्‍तार किया।

कीर्तिवर्मन का पुत्र पुलकेसन द्वितीय चालुक्‍य साम्राज्‍य के महान शासकों में से एक था। उसने लगभग 34 वर्षों तक राज्‍य किया। अपने लंबे शासनकाल में उसने महाराष्‍ट्र में अपनी स्थिति सुदृढ़ की तथा दक्षिण के बड़े भू-भाग को जीत लिया था। हर्षवर्धन के विरुद्ध रक्षात्‍मक युद्ध लड़ना उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

हर्ष ने अपने 41 वर्षों के शासन के दौरान अनेकों युद्धों का सामना किया। उसके द्वारा लड़े गए मुख्य युद्ध निम्न थे –

पुलकेशिन द्वितीय के साथ युद्ध

618-619 इ. की सर्द ऋतु में हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वितीय के साथ युद्ध किया। यह युद्ध नर्मदा नदी के तट पर लड़ा गया था। पुलीकेशिन द्वितीय तथा हर्षवर्धन दोनों कुशल राजा थे, और दोनों ही साम्राज्यवादी नीति पर काम करते थे। अपनी इसी निति के चलते अपने राज्य के विस्तार के लिए वह एक दूसरे से भिड़ गए। इस युद्ध में हर्ष को पराजय कला सामना करना पड़ा।

पुलकेशिन द्वितीय ने अपनी विजय के बाद नर्मदा नदी को सीमा मानकर वर्धन साम्राज्य के साथ संधि कर ली।
वल्लभ साम्राज्य के साथ युद्ध

हर्ष ने 630 ई. से 633 ई. के बीच वल्लभ साम्राज्य के शासक ध्रुवसेन द्वितीय बालादित्य के साथ युद्ध किया। इस युद्ध में हर्ष ने ध्रुवसेन को पराजित कर दिया। परंतु वल्लभी वंश को हराने के बाद हर्ष ने उनके साथ वैवाहिक संबंध बनाकर संधि स्थापित कर ली।

पूर्वी भारत के राजाओं के साथ युद्ध

हर्ष अपने पूर्वी भारत के आक्रमणों में जब असफल रहा, तो उसने कामरूप के शासक भास्कर वर्मा के साथ मिलकर पूर्वी भारत पर पुनः चढ़ाई कर दी। इस प्रकार उसने 640 ई. के आसपास ओडू, कांगोद तथा कलिंग पर विजय प्राप्त की। इसके बाद उसने वर्तमान उड़ीसा के क्षेत्र को भी जीत कर एक बौद्ध सभा बुलाई जो कन्नौज सभा को नाम से जानी गयी।

हर्ष ने कश्मीर, नेपाल, जालंधर, वल्लभी, मालवा, सिंध, सीमांत प्रदेश व असम को अपने राज्य में मिला लिया। सिंध उसका आश्रित राज्य बन गया था।

हर्षवर्धन द्वारा रचित साहित्य

हर्षवर्धन ने ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागरानंद’ नामक नाटिकाओं की भी रचना की। ‘कादंबरी’ के रचयिता कवि बाणभट्ट हर्षवर्धन के मित्रों में से एक थे। कवि बाणभट्ट ने अपनी एक रचना ‘हर्षच चरित’ में हर्षवर्धन की जीवनी विस्तार से लिखी है।

हर्षवर्धन का धर्म

हर्ष हिंदू धर्म में पैदा हुआ था। वह भगवान शिव का परम भक्त था इस कारण से कुछ इतिहासकार उसे शैव भी मानते हैं। परन्तु इसके बाद वह धीरे-धीरे बौद्ध धर्म की ओर प्रेरित हुआ। और आखिर में उसने बौद्ध धर्म अपना लिया।

उसने 443 ई. में कन्नौज में एक बहुत बड़े सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में बौद्ध, ब्राह्मण, जैन व नालंदा के विद्वान उपस्थित हुए। हर्ष अपने राजस्व का एक चौथाई हिस्सा धर्म के लिए बाँट देता था। उसके प्रश्रय से बौद्ध धर्म का काफी प्रचार-प्रसार हुआ तथा बौद्ध धर्म का महायान देश विदेश में भी फैला।
हर्ष की सभाएं

तमाम वर्षों से हर्ष अनेक छोटी छोटी सभाओं का आयोजन करवाता आया था जो बौद्ध धर्म तथा अन्य धर्मों का प्रचार-प्रसार करती थी। अपने शासन के अंतिम वर्षों में हर्ष ने दो मुख्य सभाओं का आयोजन करवाया जो इस प्रकार है

कन्नौज सभा
प्रयाग सभा

कन्नौज सभा


643 ई. में हर्ष ने कन्नौज सभा का आयोजन करवाया। यह सभा 23 दिनों तक चली। इसमें चीनी यात्री ह्वेनसांग, 3,000 महायान और हीनयान बौद्ध भिक्षु, 3,000 ब्राह्मण व नालंदा विश्वविद्यालय के हजार बौद्ध विद्वान को बुलाया गया था।

कन्नौज सभा का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के महायान का प्रचार-प्रसार करना था। ह्वेनसांग को इस सभा का सभापति बनाया गया था।

गंगा नदी के तट पर विशाल विहार को बनाया गया। यहाँ पर भगवान बुद्ध की मूर्ति को 1,000 फुट उँच्चे स्तंभ पर रखा गया। हर रोज बुद्ध की एक दूसरी मूर्ति को जुलूस में उठाया जाता। हर्ष खुद जुलूस में छत्र को उठाता।

इस जुलूस में 20 राजा 300 हाथी जाते थे। हर्ष भगवान बुद्ध की मूर्ति को नहला कर पश्चिमी स्तंभ तक लेकर गया। वह मूर्ति पर मोती, सुनहरे फूल व अन्य कीमती चीजों को अर्पित करता था।

प्रयाग सभा

हर्ष ने 646 ई. में ही प्रयाग में मोक्ष परिषद का आयोजन करवाया। वह पिछले 30 वर्षों से प्रत्येक वर्ष ऐसी सभाओं का आयोजन करवाता रहा। इस सभा में 500,000 से ज्यादा लोग एकत्रित हुए। यह सभा गंगा जमुना के प्रयाग की रेत पर आयोजित करवाई गई थी। इस सभा में चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा देश के राजा आए हुए थे। यह सभा 75 दिनों तक चलती रही। प्रत्येक दिन बहुत सारा दान दिया जाता था।

पहले दिन भगवान बुद्ध की मूर्ति की स्थापना की गई और वस्त्र व बहुमूल्य वस्तुए बांटी गई। दूसरे व तीसरे दिन क्रमशः सूर्य और शिव की पूजा-अर्चना की गई।

चौथे दिन बौद्ध भिक्षुओं को बहुत सारा दान दिया गया और पांचवें दिन ब्राह्मण लोगों को दान दिया गया। अगले दस दिनों तक अन्य धर्म के लोगों को दान दिया गया। इसके पश्चात अन्य विदेशी तपस्वियों को भी दान दिया गया। अगले एक महीने तक निर्धन, असहाय व अनाथ लोगों को सहायता प्रदान की गई।

ह्वेनसांग ने बताया कि 75 दिनों की सभा में हर्ष ने पिछले 5 वर्षों के राजस्व को लोगों में बांट दिया। यहाँ तक कि उसने अपने पहने हुए वस्त्र तथा सभी बेशकीमती आभूषणों को भी बिना किसी भेदभाव के लोगों में बांट दिया।

अपना सब कुछ दान कर देने के बाद उसने अपनी बहन से एक पुराना वस्त्र मांगा, जिसको पहनकर उसने बुद्ध की पूजा की। उसे इस बात की प्रसन्नता थी कि उसका समस्त धन दान कार्य में व्यय हो गया।

चीन से बेहतर संबंध

हर्ष ने 641 ई. में एक ब्राह्मण को अपना दूत बनाकर चीन भेजा था। 643 ई. में चीनी सम्राट ने ‘ल्यांग-होआई-किंग’ नाम के दूत को हर्ष के दरबार में भेजा था। लगभग 646 ई. में एक और चीनी दूतमण्डल ‘लीन्य प्याओं’ एवं ‘वांग-ह्नन-त्से’ के नेतृत्व में हर्ष के दरबार में आया। इतिहास के मुताबिक, चीन के मशहूर चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के राज-दरबार में आठ साल तक उनके मित्र की तरह रहे। तीसरे दूत मण्डल के भारत पहुंचने से पहले ही हर्ष की मृत्यु हो गई थी।

हर्षवर्धन के अपनी पत्नी दुर्गावती से 2 पुत्र थे, जिनके नाम थे – वाग्यवर्धन और कल्याणवर्धन। पर अरुणाश्वा नामक मंत्री ने उनके दोनों बेटों की हत्या कर दी। इस वजह से हर्ष का कोई वारिस नहीं बचा। हर्ष के मरने के बाद, उनका साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखरता चला गया और फिर समाप्त हो गया।

हर्षवर्धन की मृत्यु

हर्षवर्धन की मृत्यु 647 ई. को कन्नोज में 57 वर्ष की उम्र में हुई थी। उसने 41 वर्षों तक उत्तरी भारत पर शासन किया। अपने शासन के अंतिम समय में हर्ष ने राज्य के राजस्व को दान आदि में बांट दिया। वह भगवान बुद्ध का भक्त बन चुका था। उसने नागानंद, प्रियदर्शिका व रत्नावली आदि नामक साहित्यिक पुस्तकों की रचना भी की।

हर्ष ने विद्वानों, शिक्षा के प्रचार-प्रसार, एवं धर्म अनुयायियों पर राज्यों का चौथा हिस्सा व्यय किया। हर्ष एक महान सम्राट तो था ही, इसके साथ ही साथ, यह भी कहा जा सकता है कि वह एक अंतिम हिंदू सम्राट था।

Saturday, January 17, 2026

THE GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT CHANDRAGUPT VIKRAMADITYA

THE GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT CHANDRAGUPT VIKRAMADITYA


सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय महान  वैश्य वनिक वंशके पांचवे राजा थे। वह सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न थे।अपने पिता समुद्रगुप्त के बाद वह राजगद्दी पर बैठे। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त वंश की नींव को कमजोर नहीं होने दिया और एक शांति पूर्ण शासन का निर्माण किया।

उपाधि 

राजाओं का राजा, सम्राट, विष्णु का भक्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय, महाराजाधिराज, परमभागवत, श्रीविक्रम, नरेन्द्रचन्द्र, नरेंद्रसिंह, विक्रमांक एवं विक्रमादित्य आदि

मृत्यु 415 ईस्वी, भारत (अनुमानित)

चन्द्रगुप्त द्वितीय का जीवन परिचय

चन्द्रगुप्त द्वितीय का जन्म प्राचीन भारत के मगध राज्य में हुआ था। उनके पिता का नाम समुद्रगुप्त तथा माता का नाम दत्ता देवी था। अपने पिता समुद्रगुप्त के बाद वह गुप्त वंश के राज सिंहासन पर बैठे।

चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है। इन्होने अपने पिता समुद्रगुप्त के सारे गुण ग्रहण कर लिए थे। साथ ही साथ इन्होने अपने पिता के द्वारा जीते हुए दूसरे राज्यों व पूरे भारत में विस्तारित गुप्त साम्राज्य को अखंड बनाये रखा।

गुप्त वर्ण बताते हैं कि चन्द्रगुप्त द्वितीय की प्रथम रानी का नाम ध्रुवा देवी था जिनका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम था। और कुमारगुप्त प्रथम ही चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद गुप्त वंश का शासक बना था। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नागवंश की राजकुमारी कुबेरानाग के साथ भी विवाह किया था। कुबेरानाग और चन्द्रगुप्त द्वितीय को एक पुत्री की प्राप्ति हुई जिसका नाम प्रभावती गुप्त था।

नागवंश के राजा, गुप्त वंश के सम्राट समुद्रगुप्त से पहले मध्य भारत पर राज करते थे। परंतु बाद में, समुद्रगुप्त ने नागवंश को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। जब चंद्रगुप्त ने शकों पर आक्रमण किया था तब नाग राजाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था जिससे वह शकों को पराजित कर पाया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के दादा का नाम भी चन्द्रगुप्त था (ना कि चन्द्रगुप्त मौर्य)। इनके दादा को इतिहास में चन्द्रगुप्त प्रथम के नाम से जाना जाता है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से किया। वाकाटक राज्य गुप्त साम्राज्य के दक्षिण के दक्कन का क्षेत्र था। कुछ वर्षों बाद, 390 इस्वी में रूद्रसेन की मृत्यु हो गई। अब प्रभावती अपने नन्हें पुत्र के राज्य-निरीक्षक के रूप में शासन संभालने लगी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाटक को अपने राज्य में मिलाकर उज्जैन को दूसरी राजधानी घोषित किया जिससे उसे समुद्री व्यापार से अन्य संसाधनों की प्राप्ति होने लगी। इन पारिवारिक संबंधों से उसे मजबूत सरंक्षण प्राप्त हो गया जिसके कारण वह (चन्द्रगुप्त द्वितीय) शकों पर विजय प्राप्त कर सके।

एक संस्कृत नाटक देवीचंद्रगुप्तम में यह बताया गया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय का एक बड़ा भाई था जिसका नाम रामगुप्त था। रामगुप्त ने पिता समुद्रगुप्त के बाद शासन की बागडोर संभाली। परंतु, वह एक अच्चछा शासक नहीं था जिसके कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उसको सिंहासन से हटा दिया और खुद राजा बन गए।

हालांकि नाटक की ये बातें विवादास्पद हैं। रामगुप्त के इतिहास की सटीकता और वास्तविकता का इस नाटक से कोई पता नहीं चलता है। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक यह सत्य है परंतु, कुछ इसे एक नाटक मात्र ही समझते हैं।
 
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन

इलाहाबाद के अभिलेख में बताया गया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के पिता समुद्रगुप्त को शक राजा मरून दास ने प्रसन्न करने के लिए उपहार भेजे थे, जिससे समुद्रगुप्त ने शकों के राज्य पर आक्रमण नहीं किया।

परंतु चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विदेशियों को बाहर निकालना चाहा, जिनमें उसके मुख्य प्रतिद्वंदी पश्चिम के शक थे। मध्य, दक्षिण और पूर्व भारत में चन्द्रगुप्त द्वितीय का पहले से ही शासन था, परंतु पश्चिम में शकों का शासन था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया। उसने पश्चिमी भारत के शकों को पराजित किया और शक शासक रूद्रसेन तृतीय को हराया। शकों को हराने से गुजरात, मालवा और काठियावाड़ गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित हो गए।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने 397 ई. और 409 ई. के बीच में शकों के राज्य पर अधिकार कर लिया था। शकों के राज्य में चांदी के सिक्के चलते थे जो उनके उन्मूलन के साथ ही नष्ट हो गए। शकों पर विजय प्राप्त करने की याद में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के सिक्के जारी किए।

दिल्ली के लौह स्तंभ के अभिलेख में, चन्द्रगुप्त द्वितीय को चंद्रा के नाम से भी जाना गया है। उसने पंजाब क्षेत्र पर मार्च करते हुए वर्तमान अफगानिस्तान और पूर्व में पश्चिम बंगाल तक अपनी सीमा को बढ़ाया।

राजगद्दी पर आरूढ़ होने के बाद चंद्रगुप्त के सम्मुख दो प्रमुख कार्य थे –रामगुप्त के समय में उत्पन्न हुई अव्यवस्था को दूर करना।

उन म्लेच्छ शकों का उन्मूलन करना, जिन्होंने न केवल गुप्तश्री के अपहरण का प्रयत्न किया था, अपितु जिन्होंने कुलवधू की ओर भी दृष्टि उठाई थी।

इन दोनों ही प्रमुख कार्यों को चन्द्रगुप्त द्वितीय ने बड़ी ही कुशलता से अंजाम दिया। चन्द्रगुप्त द्वितीय के सम्राट बनने पर शीघ्र ही साम्राज्य में व्यवस्था क़ायम हो गई। वह अपने पिता का योग्य और अनुरूप पुत्र था। अपनी राजशक्ति को सुदृढ़ कर उसने शकों के विनाश के लिए युद्धों का प्रारम्भ किया।

भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’

चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन-काल भारत के इतिहास का बड़ा महत्त्वपूर्ण समय माना जाता है। चीनी यात्री फ़ाह्यान (Fa-Haien) उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा। वह बड़ा उदार और न्याय-परायण सम्राट था। उसके समय में भारतीय संस्कृति का चतुर्दिक विकास हुआ। महान कवि कालिदास उसके दरबार की शोभा थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय स्वयं वैष्णव थे, पर अन्य धर्मों के प्रति भी उदार-भावना रखते थे। गुप्त राजाओं के काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। इसका बहुत कुछ श्रेय चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की शासन-व्यवस्था को है।

क्या चन्द्रगुप्त द्वितीय और महाराज विक्रमादित्य एक ही थे?

एक अच्छे शासक एवं सुशासन के कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय की तुलना 57 ई. पू. के सुप्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य से की गयी और चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि दी गयी।

विष्णुपुराण से विदित होता है कि संभवत: गुप्तकाल से पूर्व अवन्ती पर आभीर इत्यादि शूद्रों या विजातियों का आधिपत्य था। ऐतिहासिक परंपरा से हमें यह भी विदित होता है कि प्रथम सदी ई. पू. में (57 ई. पू. के लगभग) विक्रम संवत के संस्थापक किसी अज्ञात राजा ने शकों को हराकर उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया था। गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अवंती पर पुन: विजय प्राप्त किया और वहाँ से विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंका।

इसलिए कुछ विद्वानों का मानना है कि 57 ई. पू. में विक्रमादित्य नाम का कोई राजा नहीं था। और चन्द्रगुप्त द्वितीय ही ने अवंती-विजय किया और इन्ही को राजा विक्रमादित्य कहा जाता है। इन्होने ही अवंती-विजय के पश्चात् मालव संवत् को जो 57 ई. पू. में प्रारम्भ हुआ था, विक्रम संवत का नाम दे दिया।विष्णु पुराण से स्पष्ट है कि गुप्त काल से पहले अवंती संभवतः शूद्रों और आभीरों जैसी जनजातियों के नियंत्रण में थी।

ऐतिहासिक परंपरा यह भी बताती है कि पहली शताब्दी ई.पू. (लगभग 57 ईसा पूर्व) विक्रम संवत के संस्थापक एक राजा ने शकों को पराजित कर उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया। गुप्त काल में चंद्रगुप्त द्वितीय ने अवंती पर पुनः कब्ज़ा कर लिया और वहाँ से विदेशी शासन का उन्मूलन कर दिया। अतः कुछ शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि 57 ई.पू. विक्रमादित्य नाम का कोई राजा नहीं था। और चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ही अवंती पर विजय प्राप्त की और वही राजा विक्रमादित्य है। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ही अवंती-विजय के पश्चात् 57 ई. पू. में प्रारम्भ होने वाले मालव संवत को विक्रम संवत का नाम दे दिया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य विस्तार

गुजरात-काठियावाड़ के शक-महाक्षत्रपों के अतिरिक्त गान्धार कम्बोज के शक-मुरुण्डों (कुषाणों) का भी चन्द्रगुप्त द्वितीय ने संहार किया था। दिल्ली के समीप महरौली में लोहे का एक ‘विष्णुध्वज (स्तम्भ)’ है, जिस पर चंद्र नाम के एक प्रतापी सम्राट का लेख उत्कीर्ण है। इतिहासकारों का मानना है, कि यह लेख गुप्तवंशी चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही है। इस लेख में चंद्र की विजयों का वर्णन करते हुए कहा गया है, कि उसने सिन्ध के सप्तमुखों (प्राचीन सप्तसैन्धव देश की सात नदियों) को पार कर वाल्हीक (बल्ख) देश तक युद्ध में विजय प्राप्त की थी।


पंजाब की सात नदियों यमुना, सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब, झेलम और सिन्धु का प्रदेश प्राचीन समय में ‘सप्तसैन्धव’ कहाता था। इसके परे के प्रदेश में उस समय शक-मुरुण्डों या कुषाणों का राज्य विद्यमान था। सम्भवतः इन्हीं शक-मुरुण्डों ने ध्रुवदेवी पर हाथ उठाने का दुस्साहस किया था। इस कारण से ध्रुवदेवी और उसके पति चन्द्रगुप्त द्वितीय के प्रताप ने बल्ख तक से इन शक-मुरुण्डों का खदेड़ दिया, और गुप्त साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा को सुदूर वंक्षु नदी तक पहुँचा दिया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शकों पर विजय

गुप्त वंश के समय हालाँकि बाहरी आक्रमणों से गुप्त वंश सुरक्षित था परन्तु इस समय कुछ बाहरी आक्रमणकारी अथवा विदेशी जाति के लोग थे। जिनसे समय-समय पर खतरा बना रहता था इनको चन्द्रगुप्त द्वितीय ने परास्त करके अपने राज्य का और अधिक विस्तार कर लिया।

विदेशी जातियों की शक्ति के इस समय दो बड़े केन्द्र थे

 काठियावाड़ और गुजरात के शक – महाक्षत्रप।
गान्धार-कम्बोज के कुषाण।

शक-महाक्षत्रप सम्भवतः ‘शाहानुशाहि कुषाण’ राजा के ही प्रान्तीय शासक थे, यद्यपि साहित्य में कुषाण राजाओं को भी शक-मुरुण्ड (शकस्वामी या शकों के स्वामी) संज्ञा कहा गया है। पहले चन्द्रगुप्त द्वितीय ने काठियावाड़ – गुजरात के शक-महाक्षत्रपों के साथ युद्ध किया। उस समय महाक्षत्रप ‘रुद्रसिंह तृतीय’ इस शक राज्य का स्वामी था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के द्वारा वह परास्त हुआ, और गुजरात-काठियावाड़ के प्रदेश भी गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित हो गए।

शकों की पराजय में वाकाटकों से भी बड़ी सहायता मिली। दक्षिणापथ में वाकाटकों का शक्तिशाली राज्य था। समुद्रगुप्त ने वहाँ के राजा ‘रुद्रदेव या रुद्रसेन’ को परास्त किया था, पर अधीनस्थ के रूप में वाकाटक वंश की सत्ता वहाँ पर अब भी विद्यमान थी। वाकाटक राजा बड़े ही प्रतापी थे, और उनकी अधीनता में अनेक सामन्त राजा राज्य करते थे। वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय के साथ चन्द्रगुप्त द्वितीय की कन्या ‘प्रभावती गुप्त’ का विवाह भी हुआ था। ‘रुद्रसेन द्वितीय’ के साथ गुप्त वंश की राजकुमारी का विवाह हो जाने से गुप्तों और वाकाटकों में मैत्री और घनिष्ठता स्थापित हो गई थी।

इस विवाह के कुछ समय बाद ही तीस वर्ष की आयु में रुद्रदेन द्वितीय की मृत्यु हो गई। उसके पुत्र अभी छोटी आयु के थे, अतः राज्यशासन प्रभावती गुप्त ने अपने हाथों में ले लिया, और वह वाकाटक राज्य की स्वामिनी बन गई। इस स्थिति में उसने 390 ई. से 410 ई. के लगभग तक राज्य किया। अपने प्रतापी पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय का पूरा सहयोग प्रभावती को प्राप्त था। जब चन्द्रगुप्त द्वितीय ने महाक्षत्रप शक-स्वामी रुद्रसिंह पर आक्रमण किया, तो वाकाटक राज्य की सम्पूर्ण शक्ति उसके साथ थी।

चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा बंगाल पर अधिकार

महरौली के इसी स्तम्भलेख में यह भी लिखा है, कि बंगाल में प्रतिरोध करने के लिए इकट्ठे हुए अनेक राजाओं को भी चन्द्रगुप्त द्वितीय ने परास्त किया था। ऐसा कहा जाता है, कि जब चन्द्रगुप्त द्वितीय काठियावाड़-गुजरात के शकों को परास्त करने में व्यस्त थे, उसी समय बंगाल के कुछ पुराने राजकुलों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया था, और इस कारण से चन्द्रगुप्त द्वितीय ने बंगाल जाकर उस विद्रोह को दवाया और उन राजाओं को अपने अधीन कर लिया।

दक्षिणी भारत के राजाओं पर अपना अधिकार बनाये रखना

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त साम्राज्य अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुँच गया था। दक्षिणी भारत के जिन राजाओं को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन किया था, वे अब भी पूरी तरह से चन्द्रगुप्त द्वितीय की अधीनता स्वीकार करते थे। शक-महाक्षत्रपों और गान्धार-कम्बोज के शक-मुरुण्डों के परास्त हो जाने से गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चित में अरब सागर तक और हिन्दूकुश के पार वंक्षु नदी तक हो गया था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियाँ और उपाधियाँ

गुजरात-काठियावाड़ के शकों खदेड़ कर उनके राज्य को गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत कर लेना चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इसी कारण वह भी ‘शकारि’ और ‘विक्रमादित्य’ कहलाये। कई सदी पहले शकों को इसी प्रकार से खदेड़ कर सातवाहन सम्राट ‘गौतमी पुत्र सातकर्णि’ ने भी ‘शकारि’ और ‘विक्रमादित्य’ की उपाधियाँ ग्रहण की थीं।

अब चन्द्रगुप्त द्वितीय ने भी एक बार फिर उसी गौरव को प्राप्त किया। गुजरात और काठियावाड़ की विजय के कारण अब गुप्त साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत हो गई थी। नये जीते हुए प्रदेशों पर भली-भाँति शासन करने के लिए पाटलिपुत्र बहुत दूर पड़ता था। इसलिए चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जयिनी को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधि केवल ‘विक्रमादित्य’ ही नहीं थी। शिलालेखों में उसे ‘सिंह-विक्रम’, ‘सिंहचन्द्र’, ‘साहसांक’, ‘विक्रमांक’, ‘देवराज’ आदि अनेक उपाधियों से विभूषित किया गया है। उसके भी अनेक प्रकार के सिक्के मिलते हैं। शक-महाक्षत्रपों को जीतने के बाद उसने उनके प्रदेश में जो सिक्के चलाए थे, वे पुराने शक-सिक्कों के नमूने के थे।

चंद्रगुप्त द्वितीय के विभिन्न लेखों में उनको देवगुप्त एवं देवराज जैसे अन्य नामों से सुशोभित किया गया है। अभिलेखों एवं मुद्रालेखों से उनकी विभिन्न उपाधियों- महाराजाधिराज, परमभागवत, श्रीविक्रम, नरेन्द्रचन्द्र,
 नरेंद्रसिंह, विक्रमांक एव विक्रमादित्य आदि का पता चलता है।


उत्तर-पश्चिमी भारत में उसके जो बहुत से सिक्के मिले हैं, वे कुषाण नमूने के हैं। चन्द्रगुप्त द्वितीय की वीरता उसके सिक्कों के द्वारा प्रकट होती है। सिक्कों पर चन्द्रगुप्त II को सिंह के साथ लड़ता हुआ प्रदर्शित किया गया है, और साथ में यह वाक्य दिया गया है – क्षितिमवजित्य सुचरितैः दिवं जयति विक्रमादित्यः अर्थात पृथ्वी का विजय प्राप्त कर विक्रमादित्य अपने सुकार्य से स्वर्ग को जीत रहा है।

अश्वमेध यज्ञ

समुद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने राज्य का और भी ज्यादा विस्तार किया। उनके शासन काल में गुप्त साम्राज्य अपने चरम पर था। इस समय शासन व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। गुप्त काल का यह समय अपने विकास के सर्वोच्च शिखर को छू रही थी। अपने पिता समुद्रगुप्त की ही भांति चन्द्रगुप्त द्वितीय ने भी अश्वमेध यज्ञ किया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का धर्म

चन्द्रगुप्त द्वितीय का धर्म हिंदू था। अभिलेख व सोने-चांदी के सिक्के पर उसे भगवान विष्णु का भक्त बताया गया है तथा उसे परम भागवत के नाम से भी पुकारते हैं।

बयाना मुद्राभांड से प्राप्त सिक्कों पर उसे चक्रविक्रम के नाम से संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है – “वह जो सुदर्शन चक्र के कारण शक्तिशाली है।”

चन्द्रगुप्त के विदेश-मंत्री वीरसेना के उदयगिरी अभिलेख में वर्णित है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने भगवान शिव का मंदिर भी बनवाया था। ऐसे ही एक अन्य अभिलेख के अनुसार, उसने बौद्ध भिक्षुक को भी दान दिया था जिससे पता चलता है कि वह सिर्फ विष्णु के भक्त नहीं थे , बल्कि उन्होंने अन्य देवों की भी मान्यता रखी थी।

चीनी यात्री फाह्यान (Fa-Haien) का आगमन

चीनी यात्री फाह्यान सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन में भारत आया था। वह यहां लगभग 6 वर्षों तक ठहरा। उसने चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन को शांति वादी व समृद्ध वादी बताया। उसने किसी भी तरह की चोरी या लूटपाट नहीं देखी जो संभवतया दूसरे चीनी यात्रियों ने महसूस की थी। फाह्यान के अनुसार, मध्य भारत का शहर मथुरा एक बहु-जनसंख्या वाला शहर था, जहां लोग प्रसन्न और अमीर थे। उनको अपने धन, वस्तुओं, भवनों के बारे में राजा को बताने की जरूरत नहीं थी।

अपराधियों के लिए कोई कठोर शारीरिक सजा नहीं था, बल्कि उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता था। यह शुल्क अपराधी के कृत्य के आधार पर कम या ज्यादा हो सकता था। राजा के हर एक अधिकारी जैसे अंगरक्षक, दास, सैनिक इत्यादि सभी को वेतन दिया जाता था। फाह्यान के मुताबिक, चांडालों के अलावा कोई भी मांस, अंडे, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन नहीं करता था। चंडालों को कोई भी नहीं छूता था। जब भी चांडाल किसी शहर या बाजार में आते थे तो वे एक ध्वनि से सभी को सचेत कर देते थे ताकि लोग उनके संपर्क में ना आए।

चांडाल ही मांस मच्छी का लेनदेन किया करते थे। सामान्य बाजार में कोई भी कसाई खाना या शराब की दुकान नहीं होती थी। आमतौर पर लोग किसी भी तरह के पक्षी और सूअर नहीं रखते थे। लोग कौड़ियो से चीजों का लेनदेन करते थे। फाह्यान ने पाटलिपुत्र को सबसे धनवान शहर बताया है। बौद्ध धर्म के उत्सव में शहरों की गलियों से बड़ी धूमधाम से रथ निकाले जाते थे। किसी भी अहाय इंसान की प्राथमिक सुविधाओं के लिए शुल्क नहीं लिया जाता था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल के सिक्के

चन्द्रगुप्त ने अपने पिता समुद्रगुप्त के जारी किए हुए सोने के सिक्कों को प्रचलन में रखा, जिनके मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं-

धनुर्धारी
बाघ कातिल
राजदंड

चन्द्रगुप्त ने राजदंड सिक्कों को बहुत कम जारी किया क्योंकि वह एक शांतिप्रिय शासक था जो जनता को कष्ट नहीं देना चाहता था। इसके साथ ही चन्द्रगुप्त ने भी सोने के सिक्के जारी किए जो इस प्रकार है 

घुड़सवार
शेर कातिल

इन सिक्कों को उसके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम ने अपने शासन में भी जारी रखा। इसके अलावा, चन्द्रगुप्त ने शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद विशेष रूप से चांदी के सिक्के जारी किए। शकों के राज्य में चांदी के सिक्के पहले से चलते थे जिन पर उनके राज्य का प्रतीक बना हुआ था। चन्द्रगुप्त ने उन सिक्कों से उनके राज्य के प्रतीक को हटा करके अपने राज्य के गरूड़ प्रतीक को बनवाया। ये सिक्के प्रायः शकों के सिक्कों जैसे ही हैं।

इन सिक्कों पर चन्द्रगुप्त द्वितीय को “राजाओं का राजा”, “चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य”, “विष्णु का भक्त” बताया गया है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु

लगभग 415 ईस्वी में सम्राट चन्द्रगुप्त की मृत्यु हो गई। इसके बाद, उनका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम गुप्त वंश की राजगद्दी पर बैठा। चन्द्रगुप्त ने 375 ईस्वी से लेकर 415 ईस्वी तक लगभग 40 वर्षों तक प्राचीन भारत पर शासन किया। चंद्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य की उपाधि दी गई क्योंकि उनके कार्य व वीरता राजा विक्रमादित्य के जैसी थी।

CHANDRAGUPTA PRATHAM - A GREAT VAISHYA SAMRAT

CHANDRAGUPTA PRATHAM - A GREAT VAISHYA VANIK SAMRAT 


चन्द्रगुप्त प्रथम वैश्य गुप्त साम्राज्य के तीसरे राजा थे। इनको महाराजाधिराज के नाम से भी जाना जाता है। इन्होने गुप्त साम्राज्य की शुरुआत 319 से 320 ई. के आसपास की थी। चन्द्रगुप्त प्रथम ने उत्तर भारत पर 320 ई. से 335 ई. तक शासन किया। चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है।

चन्द्रगुप्त प्रथम का संक्षिप्त परिचय

इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश के प्रथम स्वतंत्र शासक थे। गुप्त वंश को एक साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का श्रेय चन्द्रगुप्त प्रथम को ही जाता है।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों श्रीगुप्त और घटोत्कच की अपेक्षा चन्द्रगुप्त प्रथम की पदवी बड़ी है और उनके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। चन्द्रगुप्त प्रथम के समय के सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चन्द्रगुप्त प्रथम ने उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर शासन किया। उसके कारण गुप्त साम्राज्य का नाम पूरे भारत में प्रसिद्ध होने लगा। साथ ही साथ गुप्त साम्राज्य का दूसरे राज्यों के साथ पारिवारिक संबंध बनाकर चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य को मजबूत बनाया।

चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का तीसरा और प्रतापी राजा था जिसने ‘गुप्त सवंत’ (319-320 ईस्वी) की शुरुआत की थी। उसके पिता का नाम घटोत्कच था। सम्राट बनने के बाद उसने लिच्छवी राज्य के साथ पारिवारिक संबंध बनाया और खुद को ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि दी जो प्रायः एक उच्च शासक के लिए प्रयोग की जाती थी।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों की अपेक्षा उसकी पदवी बड़ी है और उसके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। उसके सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान उसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चन्द्रगुप्त प्रथम का वैवाहिक जीवन

चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी कुल की राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया। उस समय लिच्छवी वंश का शासन वैशाली (वर्तमान बिहार) में हुआ करता था, लिच्छवी वंश ने वैशाली जो की आज बिहार में है, पर लगभग 36 पीढ़ियों तक शासन किया। गुप्त वंश के लोगों ने इस विवाह को एक महत्वपूर्ण कड़ी समझी क्योंकि गुप्त वंश का हाल ही में उदय हुआ था जिसने एक मजबूत वंश के साथ संबंध बनाया था।

विवाह के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम कचा रखा गया था। कचा ने अपने राज्य की सीमाओं को समुद्र तट फैलाने के बाद अपना नाम बदलकर ‘समुद्रगुप्त’ रख लिया।

जिससे पता चलता है कि कचा ही समुद्रगुप्त था परंतु इस तथ्य के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। इस विवाह के उपरांत, गुप्त वंश का नाम प्रसिद्ध हो गया। उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने माता कुमार देवी व पिता चन्द्रगुप्त प्रथम की स्मृति में सोने के सिक्के जारी किये जिन पर उन दोनों की छवि बनी हुई है।

इन सिक्कों में एक तरफ चन्द्रगुप्त के साथ उसकी रानी कुमारदेवी का चित्र और नाम अंकित है और दूसरी ओर सिंह पर सवार देवी का चित्र तथा लिच्छिवी नाम लिखा है।

गुप्त वंशावलियों में समुद्रगुप्त को भी गर्व से ‘लिच्छिवियों की पुत्री का पुत्र’ कहा गया है, जबकि अन्य किसी शासक की माता के वंश का उल्लेख नहीं मिलता। इस आधार पर अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि चन्द्रगुप्त प्रथम और कुमारदेवी के विवाह का गुप्तों के उत्थान में विशेष महत्व था।

चन्द्रगुप्त प्रथम और कुमार देवी के वैवाहिक सम्बन्ध के बारे में अलग अलग इतिहासकारों का अपना अलग अलग मत है :के0 पी0 जायसवाल के मतानुसार गुप्तों ने लिच्छिवियों की सहायता से किसी क्षत्रिय राजा को पराजित कर मगध प्राप्त किया था। एलन के अनुसार लिच्छिवियों का वंश प्राचीन क्षत्रिय वंश था, जिसके सामाजिक और राजनैतिक रूप से सम्मानित होने के कारण गुप्तों को उनसे वैवाहिक सम्बन्ध होने पर गर्व हुआ होगा। इसी कारण वह बार-बार इस वैवाहिक सम्बन्ध का उल्लेख करते हैं।

विन्सेण्ट स्मिथ का कहना था कि चन्द्रगुप्त प्रथम की पत्नी के सम्बन्धियों का राज्य मगध और आस-पास के क्षेत्र पर था और इस विवाह के कारण चन्द्रगुप्त प्रथम राजसत्ता का उत्तराधिकारी बना।

परमेश्वरी लाल गुप्त का मानना था की लिच्छिवी नरेश पुत्रहीन मरे होंगे और पुत्र के अभाव में पुत्री तथा उसके पति को उनका राज्य प्राप्त हुआ होगा।

इतिहासकारों का मानना था की उस समय पुत्र न होने पर पुत्री के पुत्र को उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाता था। इस आधार पर लिच्छिवी के वैध उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त के वयस्क होने तक चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपनी रानी कुमारदेवी के साथ संयुक्त रूप से राज्य किया और समुद्रगुप्त के वयस्क होने पर उसे राज्य सौंप कर सन्यास ले लिया । इस प्रकार चन्द्र गुप्त प्रथम और कुमारदेवी के इस वैवाहिक सम्बन्ध से पूर्वी भारत के दो राज्यों का एकीकरण हुआ और चन्द्रगुप्त प्रथम को एक बड़ा साम्राज्य प्राप्त हुआ।

चन्द्रगुप्त प्रथम का शासन

चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. से 320 ई. के मध्य में राजतिलक होने के उपरांत गुप्त सवंत (319-320 ईस्वी) की शुरुआत की। परंतु अधिकतर इतिहासकारों का कहना है कि यह तथ्य कल्पना मात्र है जो यथार्थ सत्यता की पुष्टि नहीं करता। परन्तु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चन्द्रगुप्त प्रथम ने संभवतया एक लंबे समय तक उत्तर भारत पर राज किया।

उसने गुप्त साम्राज्य की सीमा को बढ़ाने के लिए बड़े कदम तो नहीं लिए, परंतु गुप्त वंश की प्रसिद्धि बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इलाहाबाद के अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त प्रथम जब अपनी बृद्धावस्था में चला गया था तब अपने पुत्र समुद्रगुप्त को राजगद्दी पर बैठा दिया। जिससे स्पष्ट रूप से यह साबित होता है कि चन्द्र गुप्त प्रथम ने काफी लंबे समय तक शासन किया था।

गुप्त संवत का प्रारम्भ

चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण और गुप्त अभिलेखों से प्राप्त साक्ष्यो के परस्पर मेल न खाने के कारण संवत के विषय में भी विद्वानों में काफी मतभेद हैं। फ्लीट का मानना है कि लिच्छिवियों के संवत को ही गुप्त वंश ने अपना लिया था और गुप्त संवत की शुरुआत हुई थी। परन्तु अधिकांश इतिहासकार इस संवत को गुप्त वंश का ही मानते हैं।

विन्सेन्ट स्मिथ का कहना है की चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण के समय से गुप्त संवत की शुरुआत हुई । अधिकांश इतिहासकार बाद की दो जनश्रुतियों जिनका उल्लेख जिनसेन के हरिवंशपुराण तथा अल्बरूनी के वर्णन में मिलता है, उसके आधार पर गुप्त संवत का आरम्भ मानते है । उनका कहना है की गुप्त वंश 319 ई0 से और गुप्त वर्ष 1 का आरम्भ 320 ई0 से हुआ था । अधिकांश इतिहासकारों का मत है की गुप्त संवत की शुरुआत चन्द्र गुप्त प्रथम ने अपने राज्यारोहण की स्मृति में किया था।

चन्द्रगुप्त प्रथम का साम्राज्य विस्तार

चन्द्रगुप्त प्रथम के शासन के विस्तार के बारे में बहुत कम ही तथ्य है। उसके पुत्र समुद्रगुप्त के द्वारा बनाए गए इलाहाबाद के शिलालेख में चन्द्रगुप्त प्रथम के बारे में थोड़ी ही जानकारी दी गई है। उसने बताया गया है कि समुद्रगुप्त ने बहुत सारे राजाओं को परास्त कर दिया था। उसके उत्तराधिकारियों और पुराणों के आधार पर उसका साम्राज्य विस्तार आधुनिक बिहार,बंगाल के कुछ इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश भागों में माना जाता है।

पुराणों में मगध, साकेत और प्रयाग को गुप्तों का क्षेत्र बताया गया है। परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार उसके पुत्र समुद्रगुप्त के द्वारा विजित क्षेत्रों पर चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्य उत्तर में वाराणसी के आगे गंगा के उत्तर में नहीं होगा, लेकिन उसके राज्य में मध्यप्रदेश के बिलासपुर, रायपुर ,सम्भलपुर और गंजाम जिले के कुछ हिस्से सम्मिलित होंगे। पश्चिम में विदिशा की सीमा तक तथा पूर्व की ओर पूरा बिहार और बंगाल का कुछ क्षेत्र चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्य में शामिल थे।

समुद्रगुप्त ने जिन राज्यों को जीता था, उसका मतलब यह था कि वो राज्य पहले गुप्त वंश के अंग नहीं थे। यानी कि उन पर चंद्रगुप्त प्रथम का अधिकार नहीं था। तो विद्वानों ने एक कच्चा अनुमान लगाया गया है कि चंद्रगुप्त प्रथम का शासन, पश्चिम में प्रयागराज, दक्षिण में मध्य भारत, उत्तर में नेपाल, पूर्व में बंगाल इन्हीं क्षेत्रों के बीच में था। अतः कहा जा सकता है कि चंद्रगुप्त प्रथम का शासन बंगाल व इसके आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित था।
चन्द्रगुप्त प्रथम के सोने के सिक्के

मथुरा, लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर, गाजीपुर, वाराणसी, बयाना, हाजीपुर इत्यादि क्षेत्रों से सोने के सिक्के मिले हैं। जिन पर चंद्रगुप्त व उसकी पत्नी कुमार देवी की छवि बनी हुई है। इन सिक्कों पर गुप्त लिपि में चन्द्र नाम लिखा गया है। तथा सिक्के के दूसरी तरफ शेर पर बैठी हुई रानी की छवि बनी हुई है और गुप्त लिपि में लिच्छवी नाम लिखा हुआ है।


कुछ इतिहास शास्त्रियों के मुताबिक ये सिक्के चन्द्र गुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त ने जारी किए थे। तो वहीं कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सिक्के खुद चन्द्रगुप्त ने जारी किए थे। इन सिक्कों में चन्द्रगुप्त और कुमार देवी अलग-अलग खड़े हुए हैं तो कुछ इतिहासकारों ने प्रस्तावित किया है कि चन्द्र गुप्त और कुमार देवी दोनों एक साथ मिलकर राज्य तो चलाते थे परंतु शासन के भिन्न-भिन्न क्षेत्र संभालते थे। वहीं सिक्के के दूसरी तरफ रानी की छवि न होकर माँ दुर्गा की छवि है ।

चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु

इतिहास की किताबों के अनुसार, चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ईस्वी को पाटलिपुत्र में ही हुई थी। परंतु, उसकी मृत्यु के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है। चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई0 से लेकर लगभग 335 ई0 तक राज्य किया। एलन, फ्लीट एवं स्मिथ मानते हैं कि चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ई0 में हुयी होगी।

परन्तु वही रमेश चन्द्र मजूमदार और परमेश्वरी लाल गुप्त का कहना है कि 338 ई0 से 345 ई0 के बीच चन्द्र गुप्त प्रथम ने अपने पुत्र को राज्य देकर सन्यास ले लिया। उसके पश्चात वह कितने समय जीवित रहे, इसका कोई प्रमाण नहीं है। अपनी मृत्यु के समय चन्द्रगुप्त प्रथम काफी वृद्ध हो चुके थे। उन्होंने गुप्त साम्राज्य के दोनों पूर्ववर्ती राजाओं की तुलना में अपने शासन को अधिक अच्छे से संभाला और सफलतापूर्वक चलाया।

चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद गुप्त साम्राज्य को उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने संभाला जो की अपने पिता की तुलना में काफी अच्छे तरीके से साम्राज्य का विस्तार किया और गुप्त साम्राज्य की सीमाओं को काफी बड़ा कर दिया।

कुछ जगहों से प्राप्त सोने के सिक्के से पता चला है कि चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद कचा नाम का इंसान गुप्त साम्राज्य का सम्राट बना था। संभवतया कचा, चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र और समुद्रगुप्त का बड़ा भाई था। परन्तु कुछ इतिहासकार कचा को ही समुद्रगुप्त मानते हैं। उनका कहना है कि कचा ने अपने राज्य की सीमाओं को समुद्र तट फैलाने के बाद अपना नाम बदलकर ‘समुद्रगुप्त’ रख लिया। जिससे पता चलता है कि कचा ही समुद्रगुप्त था परंतु इस तथ्य के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं।

इस तरह चन्द्र गुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य की राजगद्दी संभाली और उसने भारत के लगभग सभी राज्यों पर विजय प्राप्त करके देश को एकता के सूत्र में बाँधा। यहाँ तक कि वी ए स्मिथ ने तो समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन भी कह दिया।