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Saturday, June 8, 2013

वैश्य समाज कि बेटियों ने किया नाम रोशन



साभार : अग्रोहाधाम..

PREMLATA AGRAWAL - प्रेमलता अग्रवाल - दुनिया के हर शिखर पर विजय


 PREMLATA AGRAWAL - प्रेमलता अग्रवाल - दुनिया के हर शिखर पर विजय 


बेटियों के लिए वह गट्सी मॉम (साहसी मां) हैं, तो पति के लिए साधारण जीवन जीने वाली असाधारण महिला, लेकिन समर्थक उन्हें जमशेदपुर की माउंटिनियर मॉम (पर्वतारोही मां) कहना ज्यादा पसंद करते हैं। वाकई जिस समाज में 40 वर्ष पार कर चुकी महिला अमूमन ′बुजुर्ग′ मानी जाती है और उनकी निर्भरता घर के पुरुष सदस्यों पर बढ़ जाती है, वहां उम्र के पचास वसंत देख चुकी प्रेमलता अग्रवाल अगर सेवन समिट्स (दुनिया के सातों महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटियां) की फतह का इतिहास रचती हैं, तो उनकी उपलब्धि पर इतराना स्वाभाविक है। यह सफलता इसलिए भी खास है, क्योंकि इससे पहले कोई भारतीय महिला यह उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई थी। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली भारत की सबसे उम्रदराज महिला का रिकॉर्ड भी प्रेमलता के ही नाम है।

पद्मश्री से सम्मानित प्रेमलता को पर्वतों से प्यार बचपन में ही हो गया था। तब दार्जिलिंग की पहाड़ी वादियां उन्हें खूब लुभाती थीं और वह अपने छोटे कदमों से पहाड़ नापने निकल पड़ती थीं। पर जमशेदपुर का सपाट मैदान ससुराल क्या बना, पहाड़ की गोद में खेलने की आदतें पीछे छूट गईं। अलबत्ता करीब दस वर्ष पूर्व घर-बच्चों की जिम्मेदारी घटनी शुरू हुई, तो इच्छाएं फिर से जीवित हो उठीं। पर्वतारोही बनने के उनके फैसले को पत्रकार पति और ससुरालवालों ने जरूर हाथोंहाथ लिया, फिर भी बढ़ती उम्र उनकी राह में रुकावट-जैसी थी। एवरेस्ट फतह को याद करते हुए प्रेमलता ने एक इंटरव्यू में कहा है, ′जब मैं बेस कैंप पहुंची, तो मिशन का नेतृत्व कर रहे शेरपा का पहला वाक्य यही था कि तुम इस मिशन पर क्यों आई हो? तुम चोटी तक नहीं पहुंच पाओगी।′ लेकिन जैसा कि पिता रामवतार गर्ग कहते हैं, उनकी बेटी जो ठान लेती है, उसे जरूर पूरा करती है। यही जिद प्रेमलता को विश्व की सबसे ऊंची चोटी तक ले गई, जबकि राह में मौसम ने तो रुकावटें डाली ही, दस्तानों के गुम होने से भी दिक्कतें आईं।

बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में प्रेमलता ने आज दुनिया नाप ली है, पर उन्हें खुद से बड़ी उपलब्धि अरुणिमा की लग रही है, जिसने विकलांगता को पीछे छोड़ते हुए एवरेस्ट की सफल चढ़ाई की। अब उनका सपना अपनी दो अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करना है-पहला, महिलाओं, खासकर आदिवासी महिलाओं को पर्वतारोहण का प्रशिक्षण देना, और दूसरा, छोटी बेटी की शादी कर मां का कर्तव्य पूरा करना।

एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जब वह बेस कैंप पहुंची, तो उन्हें यही सुनना पड़ा कि बढ़ती उम्र के कारण वह चोटी तक नहीं पहुंच पाएंगी।

साभार : अमरउजाला

Wednesday, May 8, 2013

VAISH COMMUNITY OF JHARKHAND - झारखंड में वैश्य समुदाय


Vaish Community of Jharkand

  1. Saundik(sudi) Vaish 
  2. Tailik Vaish 
  3. Kalwar(vayahut) Vaish 
  4. Jaishwal Vaish 
  5. Rauniyar Vaish 
  6. Kanu Vaish 
  7. Madhesiya Vaish 
  8. Kesarwani Vaish 
  9. Swarnkar Vaish 
  10. Barnwal Vaish 
  11. Maheshwari Vaish 
  12. kamlapuri Vaish 
  13. Agarwal Vaish 
  14. Mahuri Vaish 
  15. Chaurashiya Vaish 
  16. Sinduriya Vaish 
  17. Poddar Vaish 
  18. Agarhari Vaish 
  19. Rastogi Vaish 
  20. Kasera Vaish 
  21. Samari Vaish 
  22. Khandelwal Vaish 
  23. Thathera Vaish 
  24. Modi Vaish 
  25. Jain Vaish 
  26. Khatri Vaish 
  27. Malakar Vaish 
  28. Mathur Vaish 
  29. Kankubj vaish 
  30. Mahawar Vaish 
  31. Oshwal Vaish 
  32. Ayodhyawasi Vaish 
  33. Patwa Vaish 
  34. Pansari Vaish 
  35. Mahajan Vaish 
  36. kasaudhan Vaish 
  37. Kumbhkar Vaish 
  38. Bishwakarma Vaish 
  39. Batham Vaish 
  40. Tanti Vaish 
  41. Tomar Vaish 
  42. Kamat Vaish 
  43. Kaithal vaish 
  44. Manihari Vaish 
  45. Lohar Vaish 
  46. Khatik Vaish 
  47. Tilli Vaish 
  48. Naagar Vaish 
  49. Laheri Vaish 
  50. Punjabi Vaish 
  51. Sindhi Vaish 
  52. kajariwal Vaish 
  53. Bangh vaish 
  54. Santanpuri Vaish


  • साभार : वैश्य मोर्चा 

Saturday, April 20, 2013

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य - HEMU VIKRAMADITYA



सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या केवल हेमू (१५०१-१५५६) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में १६वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। यह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण समय रहा जब मुगल एवं अफगान वंश, दोनों ही दिल्ली में राज्य के लिये तत्पर थे। कई इतिहसकारों ने हेमू को 'भारत का नैपोलियन' कहा है |

16वीं शताब्दी में एक नाम हेमू का आता है। महाराज हेमचन्द्र विक्रमादित्य वह विद्युत की भांति चमके और देदीप्यमान हुए। हेमू दोसर वैश्य भार्गव वंश के गोलिश गोत्र में उत्पन्न राय जयपाल के पौत्र और पूरनमाल के पुत्र थे। हेमू का एक दूसरा नाम हेमू बनिया बक्कल भी था. हेमू 16वीं शताब्दी का सबसे अधिक विलक्षण सेनानायक था । राजा विक्रमाजीत हेमू जन्म से मेवात स्थित रिवाड़ी के हिंदू थे जो अपने वैयक्तिक गुणों तथा कार्यकुशलता के कारण यह सूर सम्राट् आदिलशाह के दरबार का प्रधान मंत्री बन गया थे। यह राज्य कार्यो का संचालन बड़े योग्यता पूर्वक करते थे। आदिलशाह स्वयं अयोग्य थे और अपने कार्यों का भार वह हेमू पर डाले रहते थे।

जिस समय हुमायूँ की मृत्यु हुई उस समय आदिलशाह मिर्जापुर के पास चुनार में रह रहे थे। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार सुनकर हेमू अपने स्वामी की ओर से युद्ध करने के लिए दिल्ली की ओर चल पड़े। वह ग्वालियर होते हुए आगे बढे और उसने आगरा तथा दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। तरदीबेग खाँ दिल्ली की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। हेमू ने बेग को हरा दिया और वह दिल्ली छोड़कर भाग गया।

इस विजय से हेमू के पास काफी धन, लगभग 1500 हाथी तथा एक विशाल सेना एकत्र हो गई थी। उन्होंने अफगान सेना की कुछ टुकड़ियों को प्रचुर धन देकर अपनी ओर कर लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्राचीन काल के अनेक प्रसिद्ध हिंदू राजाओं की उपाधि धारण की और अपने को 'राजा विक्रमादित्य' अथवा विक्रमाजीत कहने लगे। इसके बाद वह अकबर तथा बैरम खाँ से लड़ने के लिए पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में जा डटे। 5 नवंबर, 1556 को युद्ध प्रारंभ हुआ। इतिहास में यह युद्ध पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। हेमू की सेना संख्या में अधिक थी तथा उसका तोपखाना भी अच्छा था किंतु एक तीर सम्राट हेमचन्द्र की आँख को छेदता हुआ सिर तक चला गया। हेमचन्द्र ने हिम्मत न हारते हुए तीर को बाहर निकाला परन्तु इस प्रयास में पूरी की पूरी आँख तीर के साथ बाहर आ गई। आपने अपने रूमाल को आँख पर लगाकर कुछ देर लड़ाई का संचालन किया, परन्तु शीघ्र ही बेहोश होकर अपने ``हवाई´´ नामक हाथी के हौदे में गिर पड़े।

शहर के कतोपुर स्थित साधारण परिवार से निकलकर अंतिम हिंदू सम्राट होने का गौरव प्राप्त करने वाले राजा हेमचंद विक्रमादित्य 7 अक्टूबर 1556 को मुगलों को हराकर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए थे।

आपका महावत आपको युद्ध के मैदान से बाहर निकाल रहा था कि मुगल सेनापति अली कुली खान ``हवाई´´ हाथी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा और बेहोश हेमू को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गया। इस प्रकार दुर्भाग्यवश सम्राट हेमचन्द्र एक जीता हुआ युद्ध हार गये और भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र दोसर वैश्य (भार्गव) वंश का शासन 29 दिन के बाद समाप्त हो गया।

बैराम खाँ के लिए यह घटना एकदम अप्रत्याशित थी। बैराम खाँ ने अकबर से प्रार्थना की कि हेमू का वध करके वह `गाज़ी´ की पदवी का हक़दार बने। आनन-फानन में अचेत हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया। जिससे हेमू के समर्थकों की हिम्मत या भविष्य के विद्रोह की संभावना को पूरी तरह कुचल दिया जाय।

दिल्ली पर अधिकार हो जाने के बाद बैराम खाँ ने हेमू के सभी वंशधरों का क़त्लेआम करने का निश्चय किया। हेमू के समर्थक अफ़ग़ान अमीर और सामन्त या तो मारे गए या फिर दूर-दराज़ के ठिकानों की तरफ भाग गए। बैराम खाँ के निर्देश पर उसके सिपहसालार मौलाना पीर मोहम्मद खाँ ने हेमू के पिता को बंदी बना लिया और तलवार के वार से उनके वृद्ध शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। और उसने हेमू के समस्त वशधरों यानी सम्पूर्ण ढूसर भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया। अलवर, रिवाड़ी नारनौल, आनौड़ आदि क्षेत्रों में बसे हुए दोसर वैश्य कहलाए जाने वाले भार्गव जनों को चुन-चुन कर बंदी बनाया। साथ ही हेमू के अत्यन्त विश्वास पात्र अफ़गान अधिकारियों और सेवकों को भी नहीं बक्शा।

अपनी फ़तह के जश्न में उसने सभी बंदी ढूसर भार्गवों और सैनिकों के कटे हुए सिरों से एक विशाल मीनार बनवाई।

यह बात इतिहास में कुछ इस तरह कही जाती है-

साह कहीं बनियन को लाओ, मारो सबन जहाँ लगि पावो |
आहिदी गये पकड़ सब लाये, लाय झरोखों तारे दिखाए |
तब उजीर ने विनती किन्ही , चुक सबे दुसर सिर किन्ही |
उन्हें छोर तब दुसर ही पकडे, पकड़ पकड़ बेरहीन में जकडे |

हेमू के बाद दुसर वैश्य समाज के लोग हरियाणा व् दिल्ली से पूर्व की ओर पलायन करने लगे और गंगा के किनारे वर्तमान कानपूर एवं उन्नाव तथा रायबरेली के बैसवारा के क्षेत्रों में बस गये |

साभार : http://dosarvaish.com/

दोसर वैश्य समाज का इतिहास - कौन ? - कैसे ? - कहाँ से ?


आज दोसर वैश्य समाज के हर व्यक्ति के मन में एक प्रश्न उठता है कि दोसर वैश्य समाज में जन्म लिया है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ और कैसे हुई। इसकी जानकारी ज्ञात हो सके इसके लिए मैंने समाज और राजनीती में कार्य करते हुए और विभिन्न प्राचीन पुस्तको से जो जानकारी प्राप्त हुई वह मैं आप सबकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ ।

गोत्र - 
महाभारत व जातक आदि प्राचीन ग्रंथो में व्यक्ति का परिचय पूछते समय उसका नाम तथा गोत्र दोनों विषय में पुछा जाता था । गोत्रो की परंपरा प्राचीन ऋषियों से चली आ रही है , मान्यता है कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र - भ्रगु , अंगिरा , मरीचि और अत्रि हुए । ये चार ऋषि गोत्रकर्ता थे । 
ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप थे , हमारा दोसर वैश्य समाज कश्यप ऋषि का गोत्र है ।
उत्पत्ति का स्थल -
दोसर वैश्य ,"दूसर वैश्य "का कालांतर में परिवर्तित रूप है । डा . मोतीलाल भार्गव द्वारा लिखी पुस्तक "हेमू और उसका युग "से पता चलता है कि दूसर वैश्य हरियाणा में दूसी गाँव क़े मूल निवासी थे ।जो कि गुरगाव जनपद के उपनगर रिवाड़ी के पास स्थित है ।यह स्थान बलराम जी (बलदाऊ)की ससुराल जो वधुसर कि दूसर और बाद में दूसी कहलाया ।

दोसर वैश्य समाज की विजय गाथा / दिल्ली विजय -  

हेमू की दिल्ली विजय - 
भारतीय इतिहास में प्रशिद्ध हेमचन्द्र विक्रमादित्य 'हेमू' दोसर वैश्य जाति के थे । हेमू के पिता का नाम पूरन दास और चाचा का नाम नवलदास था जो दोसर वैश्य समाज के प्रशिद्ध संत थे । हेमू ने 6 अक्टूबर सन 1556 को दिल्ली विजय प्राप्त की । 300 वर्षो बाद किसी हिन्दू शासक ने दिल्ली की सत्ता प्राप्त की थी ।

दॊसर वैश्य का वर्गीकरण -
पंडित कामता प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तक "जाति भास्कर " सम्वत 1960 विक्रमी के लगभग से पता चलता है कि इसमें लगभग 400 वैश्य उप-जातियों का विवरण है ।इस सूची में दोसर वैश्य के स्थान पर दूसर वैश्य का विविरण मिलता है जो कि दिल्ली और मिर्जापुर के बीच गंगा किनारे निवास करते है ।

दोसर वैश्य समाज की धार्मिक मान्यताएं - 
दोसर वैश्य समाज गाय को बहुत ही सुभ एवं पवित्र मानते थे । दोसर वैश्य समाज वैष्णव् मत को मानने वाले है । उत्तर भारत में केवल दोसर वैश्य समाज में विवाह में वधू को निगोड़ा पहनाया जाता था । आज भी दोसर वैश्य समाज के अतिरिक्त आज किसी समाज में निगोड़ा नहीं पहनाया जाता है |

मोती लाल जी का शॊध - 
ब्रिटिश शासनकाल में सन 1880 में मोतीलाल भार्गव द्वारा दिए गए शॊध पुत्र "हेमू और उसका युग" में वर्रण है - दूसी जो हेमू का जन्म स्थान था वहां वैश्य को दूसी वैश्य जो वर्तमान में दॊसर वैश्य कहा गया है ।

साभार : http://dosarvaish.com/

कहाँ से आता था राजाओं के पास इतना धन ?




बचपन से ही राजस्थान के किले, हवेलियाँ आदि देखने के बाद मन सोचता था कि उस राजस्थान में जहाँ का मुख्य कार्य कृषि ही था और राजस्थान में जब वर्षा ही बहुत कम होती थी तो कृषि उपज का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि कितनी उपज होती होगी? सिंचाई के साधनों की कमी से किसान की उस समय क्या आय होती होगी? जो किसी राजा को इतना कर दे सके कि उस राज्य का राजा बड़े बड़े किले व हवेलियाँ बनवा ले| जिस प्रजा के पास खुद रहने के लिए पक्के मकान नहीं थे| खाने के लिए बाजरे के अलावा कोई फसल नहीं होती थी| और बाजरे की बाजार वेल्यु तो आज भी नहीं है तो उस वक्त क्या होगी? राजस्थान में कर से कितनी आय हो सकती थी उसका अनुमान शेरशाह सूरी के एक बयान से लगाया का सकता है जो उसने सुमेरगिरी के युद्ध में जोधपुर के दस हजार सैनिको द्वारा उसके चालीस हजार सैनिको को काट देने के बाद दिल्ली वापस लौटते हुए दिया था – “कि एक मुट्ठी बाजरे की खातिर मैं दिल्ली की सल्तनत खो बैठता|”

मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जिस राज्य की प्रजा गरीब हो वो राजा को कितना कर दे देगी ? कि राजा अपने लिए बड़े बड़े महल बना ले| राजस्थान में देश की आजादी से पहले बहुत गरीबी थी| राजस्थान के राजाओं का ज्यादातर समय अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को रोकने के लिए आत्म-रक्षार्थ युद्ध करने में बीत जाता था| ऐसे में राजस्थान का विकास कार्य कहाँ हो पाता ? और बिना विकास कार्यों के आय भी नहीं बढ़ सकती| फिर भी राजस्थान के राजाओं ने बड़े बड़े किले व महल बनाये, सैनिक अभियानों में भी खूब खर्च किया| जन-कल्याण के लिए भी राजाओं व रानियों ने बहुत से निर्माण कार्य करवाये| उनके बनाये बड़े बड़े मंदिर, पक्के तालाब, बावड़ियाँ, धर्मशालाएं आदि जनहित में काम आने वाले भवन आज भी इस बात के गवाह है कि वे जनता के हितों के लिए कितना कुछ करना चाहते और किया भी|

अब सवाल ये उठता है कि फिर उनके पास इतना धन आता कहाँ से था ?


राजस्थान के शहरों में महाजनों की बड़ी बड़ी हवेलियाँ देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी कई सेठों के पास तो राजाओं से भी ज्यादा धन था और जरुरत पड़ने पर ये सेठ ही राजाओं को धन देते थे| राजस्थान के सेठ शुरू ही बड़े व्यापारी रहें है राजा को कर का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं व्यापरियों से मिलता था| बदले में राजा उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराते थे| राजा के दरबार में सेठों का बड़ा महत्व व इज्जत होती थी| उन्हें बड़ी बड़ी उपाधियाँ दी जाती थी| सेठ लोग भी अक्सर कई समारोहों व मौकों पर राजाओं को बड़े बड़े नजराने पेश करते थे| कालेज में पढते वक्त एक ऐसा ही उदाहरण सुरेन्द्र सिंह जी सरवडी से सीकर के राजा माधो सिंह के बारे में सुनने को मिला था- राजाओं के शासन में शादियों में दुल्हे के लिए घोड़ी, हाथी आदि राजा की घुड़साल से ही आते थे| राज्य के बड़े उमराओं व सेठों के यहाँ दुल्हे के लिए हाथी भेजे जाते थे|

सीकर में राजा माधोसिंह जी के कार्यकाल में एक बार शादियों के सीजन में इतनी शादियाँ थी कि शादियों में भेजने के लिए हाथी कम पड़ गए| जन श्रुति है कि राजा माधो सिंह जी ने राज्य के सबसे धनी सेठ के यहाँ हाथी नहीं भेजा बाकि जगह भेज दिए| और उस सेठ के बेटे की बारात में खुद शामिल हो गए जब दुल्हे को तोरण मारने की रस्म अदा करनी थी तब वह बिना हाथी की सवारी के पैदल था यह बात सेठजी को बहुत बुरी लग रही थी| सेठ ने राजा माधो सिंह जी को इसकी शिकायत करते हुए नाराजगी भी जाहिर की पर राजा साहब चुप रहे और जैसे ही सेठ के बेटे ने तोरण मारने की रस्म पूरी करने को तोरण द्वार की तरफ तोरण की और हाथ बढ़ाया वैसे ही तुरंत राजा ने लड़के को उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया और बोले बेटा तोरण की रस्म पूरी कर| यह दृश्य देख सेठ सहित उपस्थित सभी लोग आवक रह गए| राजा जी ने सेठ से कहा देखा – दूसरे सेठों के बेटों ने तो तोरण की रस्म जानवरों पर बैठकर अदा की पर आपके बेटे ने तो राजा के कंधे पर बैठकर तोरण रस्म अदा की है| इस अप्रत्याशित घटना व राजा जी द्वारा इस तरह दिया सम्मान पाकर सेठजी अभिभूत हो गए और उन्होंने राजा जी को विदाई देते समय नोटों का एक बहुत बड़ा चबूतरा बनाया और उस पर बिठाकर राजा जी को और धन नजर किया| इस तरह माधोसिंह जी ने सेठ को सम्मान देकर अपना खजाना भर लिया|

इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है कि राजस्थान के राजाओं के पास धन कहाँ से आता था| राजाओं की पूरी अर्थव्यवस्था व्यापार से होने वाली आय पर ही निर्भर थी न कि आम प्रजा से लिए कर पर|

व्यापारियों की राजाओं के शासन काल में कितनी महत्ता थी सीकर की ही एक और घटना से पता चलता है- सीकर के रावराजा रामसिंह एक बार अपनी ससुराल चुरू गए| चुरू राज्य में बड़े बड़े सेठ रहते थे उनके व्यापार से राज्य को बड़ी आय होती थी| चुरू में उस वक्त सीकर से ज्यादा सेठ रहते थे| जिस राज्य में ज्यादा सेठ उस राज्य को उतना ही वैभवशाली माना जाता था| इस हिसाब से सीकर चुरू के आगे हल्का पड़ता था| कहते है कि ससुराल में सालियों ने राजा रामसिंह से मजाक की कि आपके राज्य में तो सेठ बहुत कम है इसलिए लगता है आपकी रियासत कड़की ही होगी| यह मजाक राजा रामसिंह जी को चुभ गई और उन्होंने सीकर आते ही सीकर राज्य के डाकुओं को चुरू के सेठों को लूटने की छूट दे दी| डाकू चुरू में सेठों को लूटकर सीकर राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते और चुरू के सैनिक हाथ मलते रह जाते| सेठों को भी परिस्थिति समझते देर नहीं लगी और तुरंत ही सेठों का प्रतिनिधि मंडल सीकर राजाजी से मिला और डाकुओं से बचाने की गुहार की|

राजा जी ने भी प्रस्ताव रख दिया कि सीकर राज्य की सीमाओं में बस कर व्यापार करो पूरी सुरक्षा मिलेगी| और सीकर राजा जी ने सेठों के रहने के लिए जगह दे दी, सेठों ने उस जगह एक नगर बसाया , नाम रखा रामगढ़| और राजा जी ने उनकी सुरक्षा के लिए वहां एक किला बनवाकर अपनी सैनिक टुकड़ी तैनात कर दी| इस तरह सीकर राज्य में भी व्यवसायी बढे और व्यापार बढ़ा| फलस्वरूप सीकर राज्य की आय बढ़ी और सेठों ने जन-कल्याण के लिए कई निर्माण कार्य यथा विद्यालय, धर्मशालाएं, कुँए, तालाब, बावड़ियाँ आदि का निर्माण करवाया| जो आज भी तत्कालीन राज्य की सीमाओं में जगह जगह नजर आ जाते है और उन सेठों की याद ताजा करवा देते है|


इस तरह के बहुत से सेठों द्वारा राजाओं को आर्थिक सहायता देने या धन नजर करने के व जन-कल्याण के कार्य करवाने के किस्से कहानियां यत्र-तत्र बिखरे पड़े| बुजुर्गों के पास सुनाने के लिए इस तरह की किस्सों की कोई कमी ही नहीं है| अक्सर राजा लोग ही इन धनी महाजनों से जन-कल्याण के बहुत से कार्य करवा लेते थे| बीकानेर के राजा गंगासिंह जी के बारे में इस तरह के बहुत से किस्से प्रचलित है कि कैसे उन्होंने धनी सेठों को प्रेरित कर जन-कल्याण के कार्य करवाये| वे किसी भी संपन्न व्यक्ति से मिलते थे तो वे उसे एक ही बात समझाते थे कि इतना कमाया, नाम किया पर मरने के बाद क्या ? इसलिए जीते जी कुछ जन-कल्याण के लिए कर ताकि मरने के वर्षों बाद तक लोग तुझे याद रखे| और उनकी बात का इतना असर होता था कि कुछ धनी सेठों ने तो अपना पुरा का पुरा धन जन-कल्याण में लगा दिया|


राजा गंगासिंह जी के मन में जन-कल्याण के लिए कार्य करने का इतना जज्बा था कि उन्होंने आजादी से पहले ही भांकड़ा बांध से नहर ला कर रेगिस्तानी इलाके को हराभरा बना दिया था| रेवाड़ी से लेकर बीकानेर तक उन्होंने अपने खजाने व सेठों के सहयोग से रेल लाइन बिछवा दी थी| दिल्ली के स्टेशन पर बीकानेर की रेल रुकने के लिए प्लेटफार्म तक खरीद दिए थे| और यही कारण है कि आज भी बीकानेर वासियों के दिलों में महाराज गंगासिंह जी के प्रति असीम श्रद्धा भाव है| उपरोक्त कुछ किस्सों व राजस्थान में सेठों व राजाओं के संबंध में बिखरे पड़े किस्सों कहानियों से साफ़ जाहिर है कि राजाओं के पास जो धन था वह गरीब प्रजा का शोषण कर इकट्ठा नहीं किया जाता था बल्कि राज्य के व्यवसायियों द्वारा किये जाने वाले व्यापार से मिलने वाले कर से खजाने भरे जाते थे|

पर अफ़सोस आज के व्यवसायी जो सरकारों को अपनी जेब में रखने का दावा करते है वे जन-कल्याण के लिए खर्च करना तो दूर उल्टा सत्ताधारी नेताओं, मंत्रियों से मिलकर आम-गरीब जनता व देश के संसाधनों को लूटकर सरकारी खजाना खाली कर अपना खजाना भरने में लगे है|


साभार : श्री रतन सिंह जी शेखावत 

सत्ता पर सेठों (व्यापारियों) का प्रभाव तब और अब

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में रिलाइंस द्वारा सरकार से मिलीभगत कर देश के संसाधनों को जिस तरह से लूटा उसका खुलासा किया साथ ही मुकेश अम्बानी की यह कहते हुए ऑडियो टेप भी सुनाई कि सत्तधारी दल तो उसकी जेब की दुकान है| तब से आम आदमी हैरान परेशान कि कैसे एक औधोगिक घराना सरकार को अपनी मुट्ठी में रखता है| यदि एक रिलाइंस कम्पनी जिसे चाहे मंत्री बनवा सकती है जिसे चाहे मंत्रिमंडल से हटवा सकती है तो देश में और भी कई औधोगिक घराने है उनका भी तो सरकार पर इसी तरह का वर्चस्व होगा| आज आम आदमी यह समझ ही नहीं पा रहा कि सरकार वे लोग चला रहें है जिन्हें उसने वोट देकर संसद में पहुँचाया था या उनकी आड़ में कोई और सरकार चला रहें है|

पिछले दिनों हुए खुलासों के बाद अब देश के आम नागरिक को शंका होने लगी है कि पता नहीं इस तरह के गठबंधन ने देश के संसाधनों को कितना लूटा होगा ? और लूट रहें है| राज्य सत्ता पर व्यापारियों (महाजनों) का प्रभाव कोई नई बात नहीं है| देश की स्वतंत्रता से पहले भी महाजनों का देश के सभी छोटे-बड़े राजाओं, नबाबों और बादशाहों पर अपने अकूत धन दौलत की वजह से प्रभाव रहा है| किसी भी सरकार को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है यह धन जितना किसी भी राज्य को व्यवसायी कमा कर दे सकते है उतना कभी भी आम-जनता नहीं दे सकती| राजाओं के जमाने में भी राज्य के बड़े बड़े सेठ राजा को आर्थिक मदद देकर राज्य में अपने व्यवसाय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ और सुरक्षा प्राप्त करते थे| साथ ही राजा के दरबार में उपाधियाँ पाकर सम्मान भी पाते थे|



पर अपने अकूत धन के माध्यम से उस समय के महाजन सिर्फ राजा को ही प्रभावित नहीं रखते थे बल्कि अपना धन सामाजिक कार्यों व जन-कल्याण की योजनाओं में खर्च कर आमजन से भी आदर, सम्मान पाते थे| पुरानी चलती आ रही किसी भी जनश्रुति में कभी किसी पुराने समय के सेठ के बारे में कोई गलत बात अब तक नहीं सुनी| राजस्थान के छोटे बड़े कस्बों व शहरों में आज भी सेठों द्वारा बनाये गए बड़े बड़े विद्यालय भवन, कालेज,धर्मशालाएं,कुँए,पक्के तालाब व बावड़ियाँ जगह जगह देखी जा सकती है| सैकड़ों वर्ष पहले सेठों द्वारा जन-कल्याण के लिए भवन व निर्माण आज भी देखकर लोग उनके प्रति श्रद्धा भाव दर्शाते हुए नतमस्तक हो जाते है| राजस्थान के सेठों ने तो दूर दूर जाकर दूसरे राज्यों में व्यापार कर धन कमाया और अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा राजस्थान में लाकर जन-कल्याण में खर्च किया|

राजा व तत्कालीन शासक बड़े सेठों से मिलने वाले धन की वजह से भले ही उनके प्रभाव में होते थे पर वे अपने राज्य की संपदा व संसाधनों को ऐसे कभी ना लूटने देते थे जैसे आज के बड़े सेठ, महाजन हमारे द्वारा चुनी गई लोकतान्त्रिक सरकार और हमारी सेवा के लिए रखे गए सरकारी सेवकों से मिलकर देश के संसाधनों को लूट रहें है| एक उस वक्त के व्यवसायी थे जो जनहित में खुलकर खर्च करते थे और आज उन्हीं की पीढ़ी के लोग जनहित के बहाने कमाने के चक्कर में रहते है| पुराने सेठों द्वारा बनाई गई स्कूलों में जहाँ आम विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर पाता था वहीं आज के उधमियों ने शिक्षा व सामान्य उपचार को को भी व्यवसाय बना लिया और दोनों ही व्यवसायों में आज जितनी लूट-पाट मची है सबके सामने है|

व्यवसायी तब भी सता को प्रभावित करते थे और आज भी पर उस वक्त के व्यवसायियों व वर्तमान व्यवसायियों की नैतिकता में रात दिन का फर्क है| पुराने समय के व्यवसायियों द्वारा जहाँ जन-कल्याण के लिए खर्च करने के कारण उनके प्रति आम-जन के मन आदर, सम्मान व श्रद्धाभाव होता था वहीं आज के व्यवसायियों द्वारा राजनीतिज्ञों व अफसरों से गठजोड़ कर देश के संसाधनों को लूटने की वजह से आम जन इनसे घृणा व नफरत करता है|

साभार : श्री रतन सिंह शेखावत, ज्ञान दर्पण

व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये


स्वाभिमान के मामले में समझौता करने वाले लोगों पर अक्सर लोग व्यंग्य कसते सुने जा सकते है कि- “बनिये की मूंछ का क्या ? कब ऊँची हो जाये और कब नीची हो जाय ?”

राजस्थान में तो एक कहावत है –गाँव बसायो बाणियो, पार पड़े जद जाणियो” कहावत के जरिये बनिए द्वारा बसाये किसी गांव की स्थिरता पर ही शक किया जाता रहा है|

उपरोक्त कहावतों से साफ है कि अपने व्यापार की सफलता के लिए व्यापारिक धर्म निभाने की बनिए की प्रवृति को लोगों ने उसकी कायरता समझ लिया जबकि ऐसा नहीं है बनिए ने अपनी मूंछ कभी नीची की है यानी कहीं समझौता किया है तो वह उसकी एक व्यापारिक कार्यविधि का हिस्सा मात्र है| कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यापार में सौम्य व्यवहार, मृदु भाषा व संयम के बिना सफल नहीं हो सकता और बनियों ने अपने इन्हीं गुणों के आधार पर व्यापार के हर क्षेत्रों में सफलता चूमी है|

बनियों के इन्हीं गुणों की वजह से उनको कायर मानने वाले लोग यह क्यों नहीं समझते कि आज तो व्यापार करना आसान है, ट्रांसपोर्ट के साधनों से एक जगह से दूसरी जगह माल लाना ले जाना, बैंकों के जरिये धन का स्थानांतरण करना एकदम आसान है जबकि पूर्व काल में जब न बैंक थे न आवागमन के साधन थे तब भी बनिए अपने घर से हजारों मील दूर ऊंट, बैल गाड़ियों में माल भरकर यात्राएं करते हुए व्यापार करते थे रास्ते में डाकुओं द्वारा लुटे जाने का पूरा खतरा ही नहीं रहता था बल्कि कई छोटे शासक भी डाकुओं की भूमिका निभाते हुए व्यापारिक काफिलों को लुट लिया करते थे फिर भी अपने धन व जान की परवाह किये बगैर बनिए बेधड़क होकर दूर दूर तक अपने काफिले के साथ व्यापार करते घूमते रहते थे| उनका यह कार्य किसी भी वीरता व साहस से कम नहीं था|

व्यापार ही क्यों युद्धों में भी बनियों ने क्षत्रियों की तरह शौर्य भी दिखा इस क्षेत्र में भी पीछे नहीं रहे जोधपुर जैसलमेर का इतिहास पढ़ते हुए ऐसे कई उदाहरण पढने को मिल जाते है| इन पूर्व राज्यों में कई बनिए राज्य के सफल प्रधान सेनापति रहे है जिनकी वीरता व कूटनीति का इतिहासकारों ने लोहा माना है|

राजस्थान का प्रथम इतिहासकार मुंहता नैणसी (मोहनोत नैणसी) जो जैन था और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह का सफल प्रधान सेनापति था जिसने जोधपुर राज्य की और से कई युद्ध अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया| जोधपुर राज्य में महाराजा भीमसिंह व उनके बाद महाराजा मानसिंह के समय में इंद्रराज सिंघवी नामक बनिया जोधपुर का सेनापति रहा जिसकी वीरता, राजनैतिक समझ और कूटनीति इतिहास में भरी पड़ी है| इंद्रराज सिंघवी ने अपनी राजनैतिक कूटनीति व समझदारी से जोधपुर राज्य को ऐसे बुरे वक्त में युद्ध से बचाया था जब जोधपुर महाराजा के ज्यादातर सामंत विरोधियों से मिल जयपुर व बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर पर चढ़ा लाये थे और जोधपुर की सेना में सैनिक तो दूर तोपें इधर उधर करने के लिए मजदुरों तक की कमी पड़ गयी थी| ऐसी स्थिति में इंद्रराज सिंघवी ने अपने बलबूते जोधपुर किले से बाहर निकल ऐसी चाल चली कि जयपुर, बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर सेना के कमजोर प्रतिरोध के बावजूद मजबूर होकर वापस लौटना पड़ा|

आजादी के कुछ समय पहले भी जब जयपुर की सेना ने सीकर के राजा को गिरफ्तार करने हेतु सीकर पर चढ़ाई की तो शेखावाटी की समस्त शेखावत शक्तियाँ एकजुट होकर जयपुर सेना के खिलाफ आ खड़ी हुई यदि वह युद्ध होता तो भयंकर जनहानि होती पर शेखावाटी के सेठ जमनालाल बजाज की सुझबुझ व कूटनीति ने शेखावाटी व जयपुर के बीच होने वाले इस भयंकर युद्धपात से बचा लिया|

इन उदाहरणों के अलावा राजस्थान के पूर्व राज्यों के इतिहास में आपको कई ऐसे सफल सेनापतियों के बारे में पढने को मिलेगा जो बनिए थे और उन्होंने अपना परम्परागत व्यापार छोड़ सैन्य सेवा में अपनी वीरता व शौर्य का लोहा मनवाया| ज्ञान दर्पण पर जल्द ही आपको ऐसे शौर्य पुरुषों का परिचय भी पढने को मिलेगा|




साभार : SRI RATAN SINGH SHEKHAWAT



Monday, February 25, 2013

वैश्य महाकुम्भ, रुड़की

उत्तराँचल वैश्य महाकुम्भ, दिनांक ३/३/१३, दिन रविवार, आप सभी वैश्य बंधू सादर आमंत्रित


Wednesday, February 13, 2013

मधेशिया बनिया समाज - MADHESHIYA VAISHYA

Madhesiya Baniya Samaj

मद्धेशिया वैश्य वस्तुत: कानू, कान्दू (कन्दोइ) और हलवाइ एक ही जाति है। जिसका मुख्य व्यवसाय मिठाइ बनाना होता है साथ ही भुजा भुजने वाले भी कानू, कान्दू जाति के ही लोग हैं।

कानू, कान्दू, कन्दोइ हलवाइ एक ही श्रेणी में होने के नाते एक ही कुल देवता की पूजा करते है। वैवाहिक सम्बन्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान में समानता होने के साथ ही शादी में मूल-डीह को मान्यता देते है।

प्राचीन काल से मुगल कालीन व अंग्रेजों के शासन काल में लिखे गये अनेकों ग्रन्थों और अभिलेखों में इस जाति समूह को कानू-कान्दू (कन्दोइ) नाम से उल्लेख किया गया है।

सन 1891 में जनगणना आयुक्त एच.एस.रिस्ले ने अपनी पुस्तक जन जातियां एवं जातियां (ट्राइब्स एण्ड कास्टस) में इस जाति समूह की व्याख्या की है। तथा इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि हलवाइ तथा 34 जातियां कानू या कान्दू (कन्दोइ) का ही अंश है।

पराधीनता की लंबी अवधि में इस जाति समूह के स्तर में काफी गिरावट आर्इ फलस्वरूप समाज के प्रति समर्पण के भाव नष्ट होने लगे, व्यकित स्वेरूछाचारी हो गया स्वामि विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, बहन एनी बेसेण्ट आदि महापुरूषों के भारतीय संस्कृति के गुण-गान करने का अत्यधिक प्रभाव सभी जाति व्यवस्था पर स्पष्ट दिखाइ देने लगा। सभी जातियां अपने सुधार की नइ दिशाए ढुंढने लगी।

सौभाग्य से हनुमानगंज बलिया उ.प्र. के श्री विष्णु कुमार गुप्त मुजफरपुर बिहार में डिप्टी क्लेक्टर थे। उन पर तत्कालीन परिसिथतियों का विषेष प्रभाव पड़ा फलस्वरूप सन 1905 र्इ. में महात्मा गणीनाथ जयंति के अवसर पर मुजफफरपुर नगर (बिहार) में एक स्वजाति सभा का विशाल आयोजन हुआ। सभा में दूर-दूर से आये हुए समाज बंधूओं ने एक स्वर में माननीय विष्णु कुमार गुप्त के विचारों का समर्थन किया। उनकी समाज के प्रति निष्ठा, लगन, त्याग, उच्चभाव को देखकर उन्हे इस जाति समूह (कानू-कांदू-कन्दोर्इ-हलवार्इ-भूर्जी, कान्यकुब्ज, क्रोंच, चेचड़ सहित 34 जाति समूह) को अखिल भारतीय मध्यदेशीयवैष्य के नाम सें विभूषित कर अपना प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया।

History of Madhesiya Samaj
Baba Ganinath



Madhesiya has been formed with the combination of two Sanskrit words i.e. "Madhya" and "Desh" hence some times also referred as "Madhyadeshiye" meaning who belonged to central part of the country.

Currently, members of the community are spread throughout India and overseas as well. They have earned respect in the society due to their tenderness and ability to make gold out of wastes that means they are highly skilled businessmen.

These are the some surnames generally used by our Vaisya Madhesia Samaj are as follows Shah, Shaw,Sah,Gupta,Prasad,Kanu,Madhesiya,Seth,Kannaujiya,Rai BahadurAgarwal etc.

There are many deities which are worshipped among Madhesiya Kanu and other vaisya community. Prominent among them are:Sri Baba Ganninath Sri Ganninath is one of the 14 deities of the community and great saint of the communitySome of them are Sri Govind Ji,Braham Baba, Mata sati.etc.



साभार : http://baniyasamaj.blogspot.in,

रौनियार वैश्य - ROUNIYAR VAISHYA





साभार :

Rauyinar Vaishya Sabha Delhi

rouniyarvaishyasabhadelhi.com/


Friday, January 18, 2013

सम्राट अशोक महान - एक महान वैश्य सम्राट

अशोक (राजकाल ईसापूर्व 273-232 ) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का चक्रवर्ती राजा था । उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़गानिस्तानतक पहुँच गया था । यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था । सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है ।


जीवन के उत्तरार्ध में अशोक भगवान गौतम बुद्ध के भक्त हो गये और उन्ही की स्मृति मे उन्होने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल - लुम्बिनी - मे मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रुप मे देखा जा सकता है । उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया 

आरंभिक जीवन

अशोक मौर्य सम्राट बिन्दुसार तथा रानी धर्मा का पुत्र था । । एक दिन उसको स्वप्न आया उसका बेटा एक बहुत बड़ा सम्राट बनेगा । उसके बाद उसे राजा बिन्दुसार ने अपनी रानी बना लिया । चुँकि धर्मा कोई क्षत्रिय कुल से नहीं थी अतः उसको कोई विशेष स्थान राजकुल में प्राप्त नहीं था । अशोक के कई भाई (सौतेले)-बहने थी । बचपन में उनमें कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती थी । अशोक के बारे में कहा जाता है कि वो बचपन से सैन्य गतिविधियों में प्रवीण था । दो हज़ार वर्षों के पश्चात्, अशोक का प्रभाव एशिया मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में देखा जा सकता है। अशोक काल में उकेरा गया प्रतीतात्मक चिह्न, जिसे हम 'अशोक चिह्न' के नाम से भी जानते हैं, आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है। बौद्ध धर्म के इतिहास में गौतम बुद्ध के पश्चात् अशोक का ही स्थान आता है।

साम्राज्य विस्तार

अशोक का ज्येष्ठ भाई सुसीम उस समय तक्षशिला का प्रांतपाल था । तक्षशिला में भारतीय-यूनानी मूल के बहुत लोग रहते थे । इससे वह क्षेत्र विद्रोह के लिए उपयुक्त था । सुसीम के अकुशल प्रशासन के कारण भी उस क्षेत्र में विद्रोह पनप उठा । राजा बिन्दुसार ने सुसीम के कहने पर राजकुमार अशोक को विद्रोह के दमन के लिए वहाँ भेजा । अशोक के आने की खबर सुनकर ही विद्रोहियों ने उपद्रव खत्म कर दिया और विद्रोह बिना किसी युद्ध के खत्म हो गया । हालांकि यहां पर बग़ावत एक बार फिर अशोक के शासनकाल में हुई थी पर इस बार उसे बलपूर्वक कुचल दिया गया ।
अशोक का राज्य

अशोक की इस प्रसिद्ध से उसके भाई सुसीम को सिंहासन न मिलने का खतरा बढ़ गया । उसने सम्राट बिंदुसार को कह के अशोक को निर्वास मे डाल दिया । अशोक कलिंग चला गया । वहां उसे मत्स्य कुमारी कौर्वकी से प्यार हो गया । हाल में मिले साक्ष्यों के अनुसार बाद में अशोक ने उसे तीसरी या दूसरी रानी बनाया था ।

इसी बीच उज्जैन में विद्रोह हो गया । उसे सम्राट ने निर्वासन से बुला विद्रोह को दबाने के लिए भेज दिया । हालाकि उसके सेनापतियों ने विद्रोह को दबा दिया पर उसकी पहचान गुप्त ही रखी गई क्योंकि मौर्यों द्वारा फैलाए गए गुप्तचर जाल से उसके बारे में पता चलने के बाद उसके भाई सुसीम द्वारा उसे मरवाए जाने का भय था । वह बौद्ध सन्यासियों के साथ रहा था । इसी दौरान उसे बौद्ध विधि-विधानों तथा शिक्षाओं का पता चला था । यहाँ पर एक सुन्दरी जिसका नाम देवी था से उसे प्रेम हो गया जिसे उसने स्वस्थ्य होने के बाद विवाह कर लिया ।

कुछ वर्षों के बाद सुसीम से तंग आ चुके लोगों ने अशोक को राजसिंहासन हथिया लेने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि सम्राट बिन्दुसार वृद्ध तथा रुग्न हो चले थे । जब वह आशरम मे॒ थे तब उन्को यह खबर् मिली की उनकी मा को उनके सोतेले भाईयो ने मार दाला। तब वह राज महल मे जाकार अपने सारे सोतेले भाईयो को मार दाला और सम्रात बने।

सत्ता सम्हालते ही अशोक ने पूर्व तथा पश्चिम दोनो दिशा में अपना साम्राज्य फैलाना शुरु किया । उसने आधुनिक असम से ईरान की सीमा तक साम्राज्य केवल आठ वर्षों में विस्तृत कर लिया।

कलिंग की लड़ाई

कलिंग युद्ध उसके जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुई । इस युद्ध में हुए नरसंहार से उसका मन ग्लानि से भर गया और उसने बौद्ध धर्म को अंगीकार कर लिया ।

बौद्ध धर्म अंगीकरण

तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया मध्य प्रदेश मेंसाँची का स्तूप

कलिंग युद्ध में हुई क्षति तथा नरसंहार से उसका मन लड़ाई करने से उब गया और वो अपने कृत्य से व्यथित हो गया । इसी शोक में वो बुद्ध के उपदेशों के करीब आता गया और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिय ।

बौद्ध धर्म स्वीकीर करने के बाद उसने उसको अपने जीवन मे उतारने की कोशिश भी की । उसने शिकार तथा पशु-हत्या करना छोड़ दिया । उसने ब्राह्मणो अन्य सम्प्रदायों के सन्यासियों को खुलकर दान दिया । जनकल्याण के लिए उसने चिकित्यालय, पाठशाला तथा सड़को आदि का निर्माण करवाया ।

उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने धर्म प्रचारक ,नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान सीरिया, मिस्र तथा यूनान तक भेजे । उसने इस काम के लिए अप् ने पुत्र ओर पुत्रि को यात्राओ पर भेजा था| अशोक के धर्म प्रचारको मे सबसे ज्यदा सफलता उसके पुत्र महेन्द्र को मिली। उसके पुत्र महेन्द्र ने श्रीलन्का के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म मे दीक्षित किया,जिसने बौद्ध धर्म को अपना राज धर्म बना दिया। अशोक से प्रेरित होकर उसने अपनी उपाधि देवनामप्रिय रख लिया।

नेपाल के लुम्बिनीमें सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया स्तम्भ


मृत्यु

अशोक ने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया जिसके बाद लगभग 232 ईसापूर्व में उसकी मृत्यु हुई । उसके कई संतान तथा पत्नियां थीं पर उनके बारे में अधिक पता नहीं है। उसके पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म के प्रचार में योगदान दिया ।

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य राजवंश लगभग 600 वर्षों तक चला ।


मगध तथा भारतीय उपमहाद्वीप में कई जगहों पर उसके अवशेष मिले हैं । पटना (पाटलिपुत्र) के पास कुम्हरार में अशोककालीन अवशेष मिले हैं । लुम्बिनी में भी अशोक स्तंभ देखा जा सकता है । कर्नाटक के कई स्थानों पर उसके धर्मोपदेशों के शिलोत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं ।

साभार : विकिपीडिया 

बिन्दुसार - एक महान वैश्य सम्राट

बिन्दुसार (राज 298-272 ईपू) मौर्य राजवंश के राजा थे जो चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र थे। बिन्दुसार को अमित्रघात, सिहसेन्तथा मद्रसार भी कहा गया है। बिन्दुसार महान मौर्य सम्राट अशोक के पिता थे।


चन्द्रगुप्त मौर्य एवं दुर्धरा के पुत्र बिन्दुसार ने काफी बड़े राज्य का शासन संपदा में प्राप्त किया। उन्होंने दक्षिण भारत की तरफ़ भी राज्य का विस्तार किया । चाणक्य उनके समय में भी प्रधानमन्त्री बनकर रहे।

बिन्दुसार के शासन में तक्षशिला के लोगों ने दो बार विद्रोह किया । पहली बार विद्रोह बिन्दुसार के बड़े पुत्र सुशीमा के कुप्रशासन के कारण हुआ । दूसरे विद्रोह का कारण अज्ञात है पर उसे बिन्दुसार के पुत्र अशोक ने दबा दिया ।

बिन्दुसार की मृत्यु 272 ईसा पूर्व (कुछ तथ्य 268 ईसा पूर्व की तरफ़ इशारा करते हैं)। बिन्दुसार को 'पिता का पुत्र और पुत्र का पिता' नाम से जाना जाता है क्योंकि वह प्रसिद्ध शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र एवं महान राजा अशोक के पिता थे।



परिचय

बिंदुसार मौर्य सम्राट् चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी। स्ट्राबो के अनुसार सैंड्रकोट्टस (चंद्रगुप्त) के बाद अमित्रोकोटिज़ उत्तराधिकारी हुआ जिसे एथेनेइयस ने अमित्रोकातिस (सं. अमित्रघात) कहा है। जैन ग्रंथ राजवलिकथे में उसे सिंहसेन कहा गया है। बिंदुसार नाम हमें पुराणों में प्राप्त होता है। चंद्रगुप्त के उत्तराधिकारी के रूप में वही नाम स्वीकार कर लिया गया है। पुराणों के अतिरिक्त परंपरा में प्राप्त नामों से उसके विजयी होने की ध्वनि मिलती है। संभवत: चाणक्य चंद्रगुप्त के बाद भी महामंत्री बना रहा और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने बताया कि उसने पूरे भारत की एकता कायम की। ऐसा मानने पर प्रतीत होता है कि बिंदुसार ने कुछ देश विजय भी किए। इसी आधार पर कुछ विद्वानों के अनुसार बिंदुसार ने दक्षिण पर विजय प्राप्त की। किंतु यह समीचीन नहीं प्रतीत होता। 'दिव्यावदान के अनुसार तक्षशिला में राज्य के प्रति प्रतिक्रिया हुई। उसे शांत करने के लिए बिंदुसार ने वहाँ अपने लड़के अशोक को कुमारामात्य बनाकर भेजा। जब वह वहाँ पहुंचा, लोगों ने कहा कि हम न बिंदुसार से विरोध करते हैं न राजकुमार से ही, हम केवल दुष्ट मंत्रियों के प्रति विरोध प्रदर्शित करते हैं। बिंदुसार की विजयों को पुष्ट करने अथवा खंडित करने के लिए कुछ भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इतना अवश्य प्रतीत होता है कि उसने राज्य पर अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया। सीरिया के सम्राट् से इसके राजत्व काल में भी मित्रता कायम रही। मेगस्थनीज़ का उत्तराधिकारी डाईमेकस सीरिया के सम्राट् का दूत बनकर बिंदुसार के दरबार में रहता था। प्लिनी के अनुसार मिस्र के सम्राट् टॉलेमी फ़िलाडेल्फ़स (285-247 ई. पू.) ने भी अपना राजदूत भारतीय नरेश के दरबार में भेजा था यद्यपि स्पष्ट नहीं होता कि यह नरेश बिंदुसार ही था। एथेनियस ने सीरिया के सम्राट् अंतिओकस प्रथम सोटर तथा बिंदुसार के पत्रव्यवहार का उल्लेख किया है। राजा अमित्रघात ने अंतिओकस से अपने देश से शराब, तथा सोफिस्ट खरीदकर भेजने के लिए प्रार्थना की थी। उत्तर में कहा गया था कि हम आपके पास शराब भेज सकेंगे किंतु यूनानी विधान के अनुसार सोफिस्ट का विक्रय नहीं होता।

बिंदुसार के कई लड़के थे। अशोक के पाँचवें शिलालेख में मिलता है कि उसके अनेक भाई बहिन थे। सबका नाम नहीं मिलता। 'दिव्यावदान' में केवल सुसीम तथा विगतशोक इन दो का नाम मिलता है। सिंहली परंपरा में उन्हें सुमन तथा तिष्य कहा गया है। कुछ विद्वान्‌ इस प्रकार अशोक के चार भाइयों की कल्पना करते हैं। जैन परंपरा के अनुसार बिंदुसार की माता का नाम दुर्धरा था।

साभार : विकिपीडिया 

Monday, December 31, 2012

भंडारी वैश्य-BHANDARI VAISHYA

भंडारी जाति का संक्षिप्त इतिहास

भारतीय समाज में कर्म के आधार पर सुदीर्घ काल तक प्रचलित रही चतुवर्ण-व्यवस्था में भंडारी वैश्य वर्ण में स्थान पाते हैं और भंडारी महाजन जाति में आते हैं | ओसवाल वंश की एक प्रतिष्ठ जाति/गौत्र/शाखा भंडारी समाज ही है |

सन 1891 में भंडारी गौत्र की उत्पति अजमेर के चौहान राज्य वंश से हुई | अजमेर के चौहान राजाओं के वंशज राव लाखण सी/लक्ष्मण शाकमभरी(सांभर) से अलग होकर अपने बाहुबल से नाडोल को अपना राज्य बनाया | भंडारियों की ख्यात् के अनुसारनाडोल के राजा राव लाखण सी के 24 रानियाँ थी, परन्तु वे सभी नि:संतान थी| जैन आचार्य यशोभद्र सूरी जी विहार करते हुए नाडोल पधारे | राजा लाखण सी ने आचार्य श्री का भक्तिभाव से भव्य सत्कार किया | आचार्य श्री अत्यंत प्रसन्न हुए | राव लाखण सी ने आचार्य श्री के सम्मुख नि:संतान होने का दुःख प्रकट किया और दुःख निवारण के लिये आचार्य प्रवर से शुभाशीष देने का निवेदन किया | आचार्यवर ने प्रत्येक रानी को एक एक पुत्र होने का आशीर्वाद दिया और साथ ही राजा से कहा की वे अपने 24 पुत्रो में से एक पुत्र हमे सौप दोगे, जिसे हम जैन धर्म, अंगीकार करवायेंगे | राजा लाखण सी ने यह बात स्वीकार कर ली | आचार्य श्री का आशीर्वाद फलीभूत हुआ और राजा लाखण सी 24 पुत्रो के पिता बने, जिनके नाम इस प्रकार है -

(1) मकडजी
(2) सगरजी
(3) मदरेचाजी
(4) चंद्रसेनजी
(5) सोहनजी
(6) बीलोजी
(7) बालेचाजी
(8) सवरजी
(9) लाडूजी
(10) जजरायजी
(11) सिद्पालजी
(12) दूदारावजी
(13) चिताजी
(14) सोनगजी
(15) चांचाजी
(16) राजसिंहजी
(17) चीवरजी
(18) बोडाजी
(19) खपतजी
(20) जोधाजी
(21) किरपालजी
(22) मावचजी
(23) मालणजी
(24) महरजी

कुछ वर्षों बाद आचार्य जी पुन: पधारे और राजा लाखण सी ने अपने वचन अनुसार प्रसन्तापूर्वक अपने 12 वे पुत्र दूदारावजी को आचार्य श्री की सेवा में दे दिया | आचार्य श्री ने दूदारावजी को प्रतिबोधित किया | उनके प्रतिबोध एवं तात्विक भाष्य से दूदारावजी ने जैन धर्म को अंगीकार किया | राजा लाखण सी ने दूदारावजी को "भांडागारिक राजकीय पद पर आसीन किया" भांडागारिक पद को किसी क्षुद्र भंडार विशेष से जोड़ना उचित नहीं होगा | भांडागारिक पद राजकोषीय भंडार की व्यापकता से युक्त लगता है दूदाराव जी के वंशज भांडागारिक नाम से संबोंधित किये जाते रहे होगें जो कालान्तर में अपभ्रंश रूप में भंडारी शब्द में परिवर्तित हो गया होगा - ऐसा प्रतीत होता है |

अत: इस प्रकार दूदारावजी ही भंडारियों के आदिपुरुष हुए |

Wednesday, December 26, 2012

जो किस्मत के धनी वे बनिया!

जी-चैनल के सुभाष गोयल से लेकर एयरटेल के सुनील मित्तल तक सभी बनिए ही हैं। आचार्य रजनीश ने दुनिया को दीवाना बनाकर रखा था वह भी बनिए (जैन) ही थे। चंद्रा स्वामी ने तो चूना लगाने के क्षेत्र में नए रिकार्ड बनाए, वे भी बनिए हैं। कौनसा ऐसा क्षेत्र है जो उनसे बचा हुआ है?

पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस जाति का ही कारोबारी एकाधिकार रहा है। लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिक बनिए ही हैं। इनमें हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, प्रभात खबर से लेकर हाल ही में बिक जाने वाला नई दुनिया तक शामिल है। 

अखबारों में आ रहे तमाम परीक्षा परिणामों के नतीजों पर नजर डालें तो इस कालम में बनियों यानी वैश्य व्यापारी वर्ग पर लिखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। हाई स्कूल से लेकर आईआईटी, पीएमटी यहां तक की सिविल सेवा तक के नतीजों में सफलता पाने वालों की सूची चौंकाती है। जिधर नजर डालंे तो उसमें आधे से ज्यादा नामों के आगे गुप्ता, गोयल, जैन, अग्रवाल, सिंघल, बसंल, कंसल आदि सरनेम देखने को मिलेंगे। जो बनिए कभी केवल दुकान और व्यापार तक सीमित रहते थे, आज हर क्षेत्र में अव्वल आ रहे हैं। शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो, जहां उन्होंने सफलता हासिल नहीं की हो। कुशाग्रता तो उनके खून में पाई जाती है और मानो गणित पर उनका एकाधिकार सा है। शायद ही इस वर्ग का कोई छात्र ऐसा हो, जो गणित में कमजोर हो। चंद वर्ष पहले तक सीपीडब्ल्यूडी में ही बनिया इंजीनियरों की भरमार दिखती थी, पर अब यह अतीत की बात हो चुकी है। 

मनु स्मृति में भी वैश्यों को व्यापार का काम सौंपा गया था और अपना देश आजाद हुआ तो उससे पहले से ही वे सभी क्षेत्रों में सफलता हासिल करने लगे थे। बिड़लाजी महात्मा गांधी के फाइनेंसर माने जाते थे। यह अलग बात है कि इस देश को आजादी दिलावाने में अहम भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी खुद भी गुजरात के बनिया ही थे। जमना लाल बजाज, डालमिया सभी ने स्वतंत्रता संग्राम में जितना संभव हो सका, उतनी उनकी मदद की। उस दौरान मनमथनाथ गुप्त की गिनती बहुत बड़े क्रांतिकारियों में होती थी। साहित्य के क्षेत्र में भी मैथलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि कहलाए। काका तो जाने माने हास्य कवि थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस जाति का ही कारोबारी एकाधिकार रहा है। लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिक बनिए ही हैं। इनमें हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, प्रभात खबर से लेकर हाल ही में बिक जाने वाला नई दुनिया तक शामिल है। 

पत्रकार के रूप में बनियों ने विशेष ख्याति हासिल की। समकालीन पत्रकारिता में शेखर गुप्ता इसका जीता जागता उदाहरण है। एक समय तो ऐसा था जब कि मजाक में यह कहा जाने लगा था कि इंडियन एक्सप्रेस में ‘गुप्त काल’ रहा है। क्योंकि तब शेखर गुप्ता के अलावा वहां नीरजा (गुप्ता), हरीश गुप्ता, शरद गुप्ता, शिशिर गुप्ता भी पत्रकारिता कर रहे थे। 

जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो पत्रकार निर्मल पाठक ने उनसे चुटकी लेते हुए कहा था, चचा, भाजपा के लिए तो समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि अब बनियों को सोचना पड़ेगा कि वे आपको वोट दें या भाजपा को। केसरीजी ने पूछा वह कैसे तो उसने शरारती अंदाज में कहा कि आपने जगह-जगह दीवारों पर लिखा यह नारा तो पढ़ा ही होगा कि ‘भाजपा के सदस्य बनिए’।

बनियों का भाजपा से विशेष लगाव रहा हैं। एक समय था, जब हर शहर में पार्टी का स्थानीय दफ्तर किसी बाजार में होता था। नीचे दुकान होती थी व पहली मंजिल पर कार्यालय हुआ करता था। जब राजग सत्ता में थी तो दैनिक जागरण के मालिक नरेंद्र मोहन भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा में आ गए थे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वैश्य समाज का एक भी मंत्री नहीं था। विजय गोयल भी सरकार के अंतिम महिनों में कैबिनेट में लिए गए थे। नरेंद्र मोहन अपने अखबार में अक्सर यह खबर छपवाते रहते थे कि राजग में बनियों की उपेक्षा हो रही है। उनका एक भी मंत्री नहीं हैं। इस पर एक बार प्रमोद महाजन ने किसी कार्यक्रम में उनसे कटाक्ष करते हुए कहा कि हम पर तो बनियों की सरकार होने का आरोप लगाया जा रहा है और आप का अखबार लिख रहा है कि सरकार में बनियों की उपेक्षा हो रही है। 

रुपए पैसे के हिसाब-किताब रखने की उनकी योग्यता गजब की होती है। इसी योग्यता के कारण सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने तक पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे थे। उनके बारे में यह कहावत प्रचलित थी कि ‘‘न खाता न बही, जो कहें केसरी वही सही’’। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के कोषाध्यक्ष भी बनिया ही हैं। पहले पार्टी के कोष को वेदप्रकाश गोयल संभालते थे। अब अध्यक्ष बदलने के बाजवूद भाजपा का खजाना उत्तराधिकारी के रुप में उनके बेटे पीयूष गोयल को सौंप दिया गया है।

पड़ोसी राज्य हरियाणा में बनियों व जाटों का बहुत पुराना बैर माना जाता है। न्याय युद्ध के दौरान देवीलाल अक्सर भजनलाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए एक किस्सा सुनाते थे कि उन्होंने किसी जाट से पूछा कि अगर हर किलोमीटर एसवाईएल नहर बनाने में भजनलाल एक लाख रुपए कमा रहा हो तो पूरी हरियाणा में नहर बनवा कर वह कितनी कमाई कर डालेगा? इस पर उस लड़के ने जवाब दिया कि हम कोई ‘बणिए’ के छोरे हैं जो यह हिसाब किताब करते फिरे? यह अलग बात है कि तब बीडी गुप्ता उनके साथ हुआ करते थे जो कि वैश्य समाज के एक बहुत बड़े संगठन के अध्यक्ष थे। हरियाणा की राजनीति में ओम प्रकाश जिंदल की काफी अहम भूमिका रही। पहले उन्होंने भजनलाल का साथ निभाया व फिर बंसी लाल का।

आपातकाल के दौरान बंसीलाल अपने शहर भिवानी के एक संपन्न वैश्य व्यापारी से नाराज हो गए। उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए शहर के सबसे चर्चित स्थान घंटाघर में स्थित उसकी संपत्ति पर बुलडोजर फिरवा दिया। वह लाला इतना होशियार था कि जब उसे यह पता चला कि कार्रवाई होने वाली है तो उसने उस युग में जब कि लोगों के पास साधारण कैमरे भी नहीं होते थे, मुंबई से फिल्म बनाने वाले मूवी कैमरे व फोटोग्राफर का इंतजाम किया। उस इलाके में स्थित एक ऊंची इमारत में उसे छिपाकर पूरी फिल्म तैयार करवाई। जब आपातकाल समाप्त हुआ और जनता पार्टी ने उस दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया तो उसने उसके समक्ष वह फिल्म पेश कर दी। आयोग ने उसकी जमीन वापस लौटाने का आदेश दिया। इस घटना के कई साल बाद जब मैं उस बुजुर्ग व्यापारी से मिला तो उसने बताया कि बंसीलाल के इस कदम से उसके भाग्य खुल गए क्योंकि उसकी जिस बिल्डिंग को ध्वस्त किया गया था, वह काफी पुरानी थी। उसमें दरजनों किराएदार थे, जो डेढ़, दो रूपए महिला किराया देते थे। उसे खाली भी नहीं करते थे। बुलडोजर चलने के बाद उसे उनसे मुक्ति मिल गई। जब मैं वहां गया तो उस स्थान पर बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका था। जिसमें दर्जनों बैंक व बीमा कंपनियों के दफ्तर खुले हुए थे। जिनसे तब उसे लाखों रूपए महीना किराया मिल रहा था। हालांकि जब लाला ने अनुरोध कर मुझे पीछे स्थित अपने बाग में खाना खिलवाया तो मैंने पाया कि हमें स्टील की जिन कटोरियों में खाना परोसा गया था, वे टूटी हुई थीं। मैंने अपने जीवन में पहली व अंतिम बार स्टील के टूटे हुए बर्तन वहीं देखे। 

जी-चैनल के सुभाष गोयल से लेकर एयरटेल के सुनील मित्तल तक सभी बनिए ही हैं। आचार्य रजनीश ने दुनिया को दीवाना बनाकर रखा था, वह भी बनिए (जैन) ही थे। चंद्रा स्वामी ने तो चूना लगाने के क्षेत्र में नए रिकार्ड बनाए, वे भी बनिए है। कौन सा ऐसा क्षेत्र है, जो उनसे बचा हुआ है? हिंदू धर्म में सबसे चर्चित कथा सत्य नारायण की है, जो यह बताती है कि आदमी किस तरह से भगवान तक को मूर्ख बनाता है। पहले उसे प्रसाद का लालच देकर काम करवाता है, फिर अपना वादा पूरा करना भूल जाता है। उसका मुख्य पात्र भी बनिया ही है। 

बनिए पूजा पाठ में बहुत ज्यादा रूचि लेते हैं। दीवाली पर सबसे लंबी पूजा वही करवाते हैं। वे ही सबसे ज्यादा मथुरा और वृंदावन जाते हैं। लक्ष्मी को भी उनके यहां ही रहना पसंद आता है। इस बारे में हरियाणा में किसी जाट मित्र ने एक किस्सा सुनाया कि एक जाट ने अपने घर में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित कर ली। एक दिन शाम को खूंटा नजर नहीं आया तो उसने भैंस की जंजीर हनुमानजी की टेढ़ी वाली टांग में बांध दी। कुछ देर बाद भैंस का घूमने का मन हुआ, उसने कुछ झटके मारकर मूर्ति उखाड़ डाली व बाहर चल पड़ी। मूर्ति उसके साथ घिसटती चली जा रही थी। रास्ते में एक मंदिर था, जहां लक्ष्मी की मूर्ति लगी थी। वे हनुमानजी की हालत देखकर हंस पड़ी। इस पर हनुमानजी नाराज होकर कहा, ज्यादा न हंस। वह तो तेरी किस्मत अच्छी है कि बनिया के यहां रहती है। अगर किसी जाट के पल्ले पड़ी होती तो कब की यह हंसी निकल गई होती।


साभार : नया इंडिया, लेखक विनम्र 




Wednesday, December 19, 2012

कलाल-कलवार-कराल वैश्य

पिछड़ी  जातियों के संदर्भ में अक्सर कलाल शब्द सुनते आए हैं। कलार या कलाल मूलतः वैश्यों के उपवर्ग है जो जातिवादी समाज में विकास की दौड़ में लगातार पिछड़ते चले गए। अब इन्हें अन्य पिछड़ावर्ग में गिना जाता है। यह भी स्थापित सत्य है कि वैश्य समुदाय की पहचान किस जमाने में क्षत्रिय वर्ण में होती रही है। विभिन्न वैश्य समूदायों की उत्पत्ति के सूत्र क्षत्रियों से ही जुड़ते हैं।


कलाल शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत केकल्य या कल्प से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है इच्छापूर्ति करना। व्यवहार में लाने योग्य, समर्थ आदि। व्यावहारिक तौर पर इसमें राशन सामग्री का भाव भी आता है। आप्टे के संस्कृत शब्दकोश में कल्पपालः का अर्थ शराब विक्रेता बताया गया है। इसी तरह कल्य शब्द का अर्थ भी रुचिकर, मंगलमय आदि है। इसमें भी भोज्य सामग्री का भाव है। कल्य से ही बना हैकलेवा जो हिन्दी में खूब प्रचलित है और सुबह के नाश्ते या ब्रेकफास्ट के अर्थ में इस्तेमाल होता है। कल्या का मतलब मादक शराब होता है। मदिरा के कई उपासकों का कलेवा कलाली पर ही होता है। कल्यपाल या कल्पपालमूलतः एक महत्वपूर्ण ओहदा होता था जिस पर तैनात व्यक्ति के जिम्मे सेना की रसद से जुड़ी हुई तमाम जिम्मेदारियां थीं। कल्यपाल यानी जो खाद्य आपूर्ति का काम करे। व्यापक रूप में खाद्य आपूर्ति यानी प्रजा के भरण पोषण का दायित्व राजा का भी होता है अतः प्रजापालक के रूप में कल्यपाल का अर्थ राजा भी होता है। कलाल वैश्यों से भी पहले क्षत्रिय थे इसके संदर्भ भी मिलते हैं। कल्यपाल राजवंश भी हुआ है जिन्होने कश्मीर में शासन किया।


शासन के लिए, खासतौर पर सेना के लिए रसद आपूर्ति के काम में मदिरा भी एक रसद की तरह ही उपभोग की जाती थी। कल्प का एक अन्य अर्थ है रोगी की चिकित्सा। जाहिर है इसमें पदार्थ का सार, आसवन करना, आसव निकालना आदि भाव भी शामिल हैं। गौरतलब है कि प्राचीन भैषज विज्ञान के अनुसार ये सारी विधियां ओधषि निर्माण से जुड़ी रही हैं। कलाल के वैश्य समुदाय संदर्भित अर्थ पर गौर करें तो जाहिर है कि रोगोपचार वैद्य का कार्य रहा है मगर ओषधि निर्माण का काम एक पृथक व्यवसाय रहा है जिसे वैश्य समुदाय करता रहा है। कल्यपाल एक राज्याश्रित पद होता था। प्राचीनकाल में भी मदिरा के गुण-दोषों के बारे में राज्य व्यवस्था सतर्क थी। कल्यपालका मतलब हुआ आसवन की गई सामग्री का अधिपति। शासन व समाज के उच्च तबके द्वार विलासिता के तौर पर उपभोग की जाने वाली मदिरा के निर्माण का काम इसी कल्यपाल के जिम्मे होता था। कल्यपाल का ही अपभ्रंश रूप होता है कलार या कलाल। कलाल समुदाय में जायसवाल वर्ग काफी सम्पन्न और शिक्षित रहा है। इनकी उद्यमशीलता वैश्यों सरीखी ही है। मदिरा के कारोबार पर हमेशा से राजकीय नियंत्रण रहा है। आज के दौर में हर राज्य में शराब विक्रेताओं के 

कल्य शब्द से बने कलाल या कलार से ही जन्मे कलारी या कलाली का किसी समय समाज में ऊंचा और विशिष्ट स्थान था।सिंडिकेट बने हुए हैं जिन पर कलाल समुदाय के लोग ही काबिज हैं। देश के अलग अलग इलाकों में इनके कई नाम भी प्रचलित हैं मसलन कलार, कलवार, दहरिया, जायसवाल, कनौजिया, आहलूवालिया, शिवहरे, वालिया,   कर्णवाल, सिकन्द,  आदि। पंजाब के आहलूवालिया जबर्दस्त लड़ाका क्षत्रिय हैं। बहादुरी में इनका सानी नहीं अविभाजित पंजाब के आहलू गांव से इनकी शुरूआत मानी जाती है। अवध का एक बड़ा इलाका किसी जमाने में कन्नौज कहलाता था। यहां से जितने भी समुदाय व्यवसाय-व्यापार के लिए अन्यत्र जा बसे उनके साथा कन्नौजिया शब्द भी जुड़ गया। कन्नौजिया शब्द में किसी जाति विशेष का आग्रह नहीं बल्कि स्थान विशेष का आग्रह अंतर्निहित है। कन्नौजिया उपनामधारी लोग हर वर्ग-समाज में मिल जाएंगे। शिवहरे नाम शिव से संबंधित है।


कल्य शब्द से बने कलाली से जहां ताड़ीखाने का रूप उभरता है वहीं राजस्थान की रजवाड़ी संस्कृति में यह शब्द विलास और श्रंगार के भावों को व्यक्त करता है। लोक गायन की एक शैली हीकलाली अथवा कलाळी कहलाती है। इस पर कई भावपूर्ण गीतलिखे गए हैं। शुद्ध रूप में इन्हें कलाळियां कहा जाता है। रजवाड़ी दौर में कलाळ अर्थात कलालों का रुतबा था। उनकी मदिरा प्रसिद्ध थी। उनकी अपनी भट्टियां होती थीं।लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ने रजवाड़ी गीत की भूमिका में लिखा है कि समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति इनके घर जाकर मदिरापान करते थे। इन कलालों की महिलाएं मेहमानों की आवभगत करतीं और मनुहार से मदिरा पिलाते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान के बनाए रखती थीं। वे इस संबंध में सजन और पातुड़ी कलाळन का उल्लेख करती हैं। मध्यकालीन सूफी-संतों ने भी ईश्वर भक्ति के संदर्भ में कलाली, भट्टी जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। कबीरदास कहते हैं-कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई। सिर सौपे सोई पिवै, नहिं तो पिया न जाई।। यानी रामरस का स्वाद अगर लेना है तो सर्वस्व त्यागना होगा। अब यह कैसे संभव है कि जिस सिर अर्थात मुंह से मदिरा का स्वाद लेना है, वही सिर कलाल को मदिरा की एवज में सौप दिया जाए !!

कल्य शब्द से बने कलाल या कलार से ही जन्मे हैं कलारी या कलाली का किसी समय समाज में ऊंचा और विशिष्ट स्थान था। आज कलाली देशी दारू की दुकानों या ठेकों के रूप में आमतौर पर व्यवहृत हैं। मराठी, गुजराती, पंजाबी जैसी भाषाओं में भी यही रूप प्रयोग में आते हैं जिससे सिद्ध है कि कल्यपाल की राज्याश्रित व्यवस्था का विस्तार समूचे भारत में था। शराब की भट्टियां लगाने का काम खटीक करते थे और विक्रय की जिम्मेदारी कलाल समुदाय की थी। डॉ विगो खोबरेकर लिखित मराठा कालखंड-2 में शिवाजी के राज्य में नियंत्रित मदिरा व्यवसाय का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि ब्राह्मणों के लिए शराबनोशी प्रतिबंधित थी। सैनिकों के लिए भी शराब की मनाही थी।

साभार :

श्री अजित वडनेरकर, http://shabdavali.blogspot.in/2009/02/blog-post_27.html