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Monday, February 25, 2013

वैश्य महाकुम्भ, रुड़की

उत्तराँचल वैश्य महाकुम्भ, दिनांक ३/३/१३, दिन रविवार, आप सभी वैश्य बंधू सादर आमंत्रित


Wednesday, February 13, 2013

मधेशिया बनिया समाज - MADHESHIYA VAISHYA

Madhesiya Baniya Samaj

मद्धेशिया वैश्य वस्तुत: कानू, कान्दू (कन्दोइ) और हलवाइ एक ही जाति है। जिसका मुख्य व्यवसाय मिठाइ बनाना होता है साथ ही भुजा भुजने वाले भी कानू, कान्दू जाति के ही लोग हैं।

कानू, कान्दू, कन्दोइ हलवाइ एक ही श्रेणी में होने के नाते एक ही कुल देवता की पूजा करते है। वैवाहिक सम्बन्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान में समानता होने के साथ ही शादी में मूल-डीह को मान्यता देते है।

प्राचीन काल से मुगल कालीन व अंग्रेजों के शासन काल में लिखे गये अनेकों ग्रन्थों और अभिलेखों में इस जाति समूह को कानू-कान्दू (कन्दोइ) नाम से उल्लेख किया गया है।

सन 1891 में जनगणना आयुक्त एच.एस.रिस्ले ने अपनी पुस्तक जन जातियां एवं जातियां (ट्राइब्स एण्ड कास्टस) में इस जाति समूह की व्याख्या की है। तथा इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि हलवाइ तथा 34 जातियां कानू या कान्दू (कन्दोइ) का ही अंश है।

पराधीनता की लंबी अवधि में इस जाति समूह के स्तर में काफी गिरावट आर्इ फलस्वरूप समाज के प्रति समर्पण के भाव नष्ट होने लगे, व्यकित स्वेरूछाचारी हो गया स्वामि विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, बहन एनी बेसेण्ट आदि महापुरूषों के भारतीय संस्कृति के गुण-गान करने का अत्यधिक प्रभाव सभी जाति व्यवस्था पर स्पष्ट दिखाइ देने लगा। सभी जातियां अपने सुधार की नइ दिशाए ढुंढने लगी।

सौभाग्य से हनुमानगंज बलिया उ.प्र. के श्री विष्णु कुमार गुप्त मुजफरपुर बिहार में डिप्टी क्लेक्टर थे। उन पर तत्कालीन परिसिथतियों का विषेष प्रभाव पड़ा फलस्वरूप सन 1905 र्इ. में महात्मा गणीनाथ जयंति के अवसर पर मुजफफरपुर नगर (बिहार) में एक स्वजाति सभा का विशाल आयोजन हुआ। सभा में दूर-दूर से आये हुए समाज बंधूओं ने एक स्वर में माननीय विष्णु कुमार गुप्त के विचारों का समर्थन किया। उनकी समाज के प्रति निष्ठा, लगन, त्याग, उच्चभाव को देखकर उन्हे इस जाति समूह (कानू-कांदू-कन्दोर्इ-हलवार्इ-भूर्जी, कान्यकुब्ज, क्रोंच, चेचड़ सहित 34 जाति समूह) को अखिल भारतीय मध्यदेशीयवैष्य के नाम सें विभूषित कर अपना प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया।

History of Madhesiya Samaj
Baba Ganinath



Madhesiya has been formed with the combination of two Sanskrit words i.e. "Madhya" and "Desh" hence some times also referred as "Madhyadeshiye" meaning who belonged to central part of the country.

Currently, members of the community are spread throughout India and overseas as well. They have earned respect in the society due to their tenderness and ability to make gold out of wastes that means they are highly skilled businessmen.

These are the some surnames generally used by our Vaisya Madhesia Samaj are as follows Shah, Shaw,Sah,Gupta,Prasad,Kanu,Madhesiya,Seth,Kannaujiya,Rai BahadurAgarwal etc.

There are many deities which are worshipped among Madhesiya Kanu and other vaisya community. Prominent among them are:Sri Baba Ganninath Sri Ganninath is one of the 14 deities of the community and great saint of the communitySome of them are Sri Govind Ji,Braham Baba, Mata sati.etc.



साभार : http://baniyasamaj.blogspot.in,

रौनियार वैश्य - ROUNIYAR VAISHYA





साभार :

Rauyinar Vaishya Sabha Delhi

rouniyarvaishyasabhadelhi.com/


Friday, January 18, 2013

सम्राट अशोक महान - एक महान वैश्य सम्राट

अशोक (राजकाल ईसापूर्व 273-232 ) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का चक्रवर्ती राजा था । उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़गानिस्तानतक पहुँच गया था । यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था । सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है ।


जीवन के उत्तरार्ध में अशोक भगवान गौतम बुद्ध के भक्त हो गये और उन्ही की स्मृति मे उन्होने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल - लुम्बिनी - मे मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रुप मे देखा जा सकता है । उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया 

आरंभिक जीवन

अशोक मौर्य सम्राट बिन्दुसार तथा रानी धर्मा का पुत्र था । । एक दिन उसको स्वप्न आया उसका बेटा एक बहुत बड़ा सम्राट बनेगा । उसके बाद उसे राजा बिन्दुसार ने अपनी रानी बना लिया । चुँकि धर्मा कोई क्षत्रिय कुल से नहीं थी अतः उसको कोई विशेष स्थान राजकुल में प्राप्त नहीं था । अशोक के कई भाई (सौतेले)-बहने थी । बचपन में उनमें कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती थी । अशोक के बारे में कहा जाता है कि वो बचपन से सैन्य गतिविधियों में प्रवीण था । दो हज़ार वर्षों के पश्चात्, अशोक का प्रभाव एशिया मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में देखा जा सकता है। अशोक काल में उकेरा गया प्रतीतात्मक चिह्न, जिसे हम 'अशोक चिह्न' के नाम से भी जानते हैं, आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है। बौद्ध धर्म के इतिहास में गौतम बुद्ध के पश्चात् अशोक का ही स्थान आता है।

साम्राज्य विस्तार

अशोक का ज्येष्ठ भाई सुसीम उस समय तक्षशिला का प्रांतपाल था । तक्षशिला में भारतीय-यूनानी मूल के बहुत लोग रहते थे । इससे वह क्षेत्र विद्रोह के लिए उपयुक्त था । सुसीम के अकुशल प्रशासन के कारण भी उस क्षेत्र में विद्रोह पनप उठा । राजा बिन्दुसार ने सुसीम के कहने पर राजकुमार अशोक को विद्रोह के दमन के लिए वहाँ भेजा । अशोक के आने की खबर सुनकर ही विद्रोहियों ने उपद्रव खत्म कर दिया और विद्रोह बिना किसी युद्ध के खत्म हो गया । हालांकि यहां पर बग़ावत एक बार फिर अशोक के शासनकाल में हुई थी पर इस बार उसे बलपूर्वक कुचल दिया गया ।
अशोक का राज्य

अशोक की इस प्रसिद्ध से उसके भाई सुसीम को सिंहासन न मिलने का खतरा बढ़ गया । उसने सम्राट बिंदुसार को कह के अशोक को निर्वास मे डाल दिया । अशोक कलिंग चला गया । वहां उसे मत्स्य कुमारी कौर्वकी से प्यार हो गया । हाल में मिले साक्ष्यों के अनुसार बाद में अशोक ने उसे तीसरी या दूसरी रानी बनाया था ।

इसी बीच उज्जैन में विद्रोह हो गया । उसे सम्राट ने निर्वासन से बुला विद्रोह को दबाने के लिए भेज दिया । हालाकि उसके सेनापतियों ने विद्रोह को दबा दिया पर उसकी पहचान गुप्त ही रखी गई क्योंकि मौर्यों द्वारा फैलाए गए गुप्तचर जाल से उसके बारे में पता चलने के बाद उसके भाई सुसीम द्वारा उसे मरवाए जाने का भय था । वह बौद्ध सन्यासियों के साथ रहा था । इसी दौरान उसे बौद्ध विधि-विधानों तथा शिक्षाओं का पता चला था । यहाँ पर एक सुन्दरी जिसका नाम देवी था से उसे प्रेम हो गया जिसे उसने स्वस्थ्य होने के बाद विवाह कर लिया ।

कुछ वर्षों के बाद सुसीम से तंग आ चुके लोगों ने अशोक को राजसिंहासन हथिया लेने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि सम्राट बिन्दुसार वृद्ध तथा रुग्न हो चले थे । जब वह आशरम मे॒ थे तब उन्को यह खबर् मिली की उनकी मा को उनके सोतेले भाईयो ने मार दाला। तब वह राज महल मे जाकार अपने सारे सोतेले भाईयो को मार दाला और सम्रात बने।

सत्ता सम्हालते ही अशोक ने पूर्व तथा पश्चिम दोनो दिशा में अपना साम्राज्य फैलाना शुरु किया । उसने आधुनिक असम से ईरान की सीमा तक साम्राज्य केवल आठ वर्षों में विस्तृत कर लिया।

कलिंग की लड़ाई

कलिंग युद्ध उसके जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुई । इस युद्ध में हुए नरसंहार से उसका मन ग्लानि से भर गया और उसने बौद्ध धर्म को अंगीकार कर लिया ।

बौद्ध धर्म अंगीकरण

तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया मध्य प्रदेश मेंसाँची का स्तूप

कलिंग युद्ध में हुई क्षति तथा नरसंहार से उसका मन लड़ाई करने से उब गया और वो अपने कृत्य से व्यथित हो गया । इसी शोक में वो बुद्ध के उपदेशों के करीब आता गया और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिय ।

बौद्ध धर्म स्वीकीर करने के बाद उसने उसको अपने जीवन मे उतारने की कोशिश भी की । उसने शिकार तथा पशु-हत्या करना छोड़ दिया । उसने ब्राह्मणो अन्य सम्प्रदायों के सन्यासियों को खुलकर दान दिया । जनकल्याण के लिए उसने चिकित्यालय, पाठशाला तथा सड़को आदि का निर्माण करवाया ।

उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने धर्म प्रचारक ,नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान सीरिया, मिस्र तथा यूनान तक भेजे । उसने इस काम के लिए अप् ने पुत्र ओर पुत्रि को यात्राओ पर भेजा था| अशोक के धर्म प्रचारको मे सबसे ज्यदा सफलता उसके पुत्र महेन्द्र को मिली। उसके पुत्र महेन्द्र ने श्रीलन्का के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म मे दीक्षित किया,जिसने बौद्ध धर्म को अपना राज धर्म बना दिया। अशोक से प्रेरित होकर उसने अपनी उपाधि देवनामप्रिय रख लिया।

नेपाल के लुम्बिनीमें सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया स्तम्भ


मृत्यु

अशोक ने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया जिसके बाद लगभग 232 ईसापूर्व में उसकी मृत्यु हुई । उसके कई संतान तथा पत्नियां थीं पर उनके बारे में अधिक पता नहीं है। उसके पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म के प्रचार में योगदान दिया ।

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य राजवंश लगभग 600 वर्षों तक चला ।


मगध तथा भारतीय उपमहाद्वीप में कई जगहों पर उसके अवशेष मिले हैं । पटना (पाटलिपुत्र) के पास कुम्हरार में अशोककालीन अवशेष मिले हैं । लुम्बिनी में भी अशोक स्तंभ देखा जा सकता है । कर्नाटक के कई स्थानों पर उसके धर्मोपदेशों के शिलोत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं ।

साभार : विकिपीडिया 

बिन्दुसार - एक महान वैश्य सम्राट

बिन्दुसार (राज 298-272 ईपू) मौर्य राजवंश के राजा थे जो चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र थे। बिन्दुसार को अमित्रघात, सिहसेन्तथा मद्रसार भी कहा गया है। बिन्दुसार महान मौर्य सम्राट अशोक के पिता थे।


चन्द्रगुप्त मौर्य एवं दुर्धरा के पुत्र बिन्दुसार ने काफी बड़े राज्य का शासन संपदा में प्राप्त किया। उन्होंने दक्षिण भारत की तरफ़ भी राज्य का विस्तार किया । चाणक्य उनके समय में भी प्रधानमन्त्री बनकर रहे।

बिन्दुसार के शासन में तक्षशिला के लोगों ने दो बार विद्रोह किया । पहली बार विद्रोह बिन्दुसार के बड़े पुत्र सुशीमा के कुप्रशासन के कारण हुआ । दूसरे विद्रोह का कारण अज्ञात है पर उसे बिन्दुसार के पुत्र अशोक ने दबा दिया ।

बिन्दुसार की मृत्यु 272 ईसा पूर्व (कुछ तथ्य 268 ईसा पूर्व की तरफ़ इशारा करते हैं)। बिन्दुसार को 'पिता का पुत्र और पुत्र का पिता' नाम से जाना जाता है क्योंकि वह प्रसिद्ध शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र एवं महान राजा अशोक के पिता थे।



परिचय

बिंदुसार मौर्य सम्राट् चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी। स्ट्राबो के अनुसार सैंड्रकोट्टस (चंद्रगुप्त) के बाद अमित्रोकोटिज़ उत्तराधिकारी हुआ जिसे एथेनेइयस ने अमित्रोकातिस (सं. अमित्रघात) कहा है। जैन ग्रंथ राजवलिकथे में उसे सिंहसेन कहा गया है। बिंदुसार नाम हमें पुराणों में प्राप्त होता है। चंद्रगुप्त के उत्तराधिकारी के रूप में वही नाम स्वीकार कर लिया गया है। पुराणों के अतिरिक्त परंपरा में प्राप्त नामों से उसके विजयी होने की ध्वनि मिलती है। संभवत: चाणक्य चंद्रगुप्त के बाद भी महामंत्री बना रहा और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने बताया कि उसने पूरे भारत की एकता कायम की। ऐसा मानने पर प्रतीत होता है कि बिंदुसार ने कुछ देश विजय भी किए। इसी आधार पर कुछ विद्वानों के अनुसार बिंदुसार ने दक्षिण पर विजय प्राप्त की। किंतु यह समीचीन नहीं प्रतीत होता। 'दिव्यावदान के अनुसार तक्षशिला में राज्य के प्रति प्रतिक्रिया हुई। उसे शांत करने के लिए बिंदुसार ने वहाँ अपने लड़के अशोक को कुमारामात्य बनाकर भेजा। जब वह वहाँ पहुंचा, लोगों ने कहा कि हम न बिंदुसार से विरोध करते हैं न राजकुमार से ही, हम केवल दुष्ट मंत्रियों के प्रति विरोध प्रदर्शित करते हैं। बिंदुसार की विजयों को पुष्ट करने अथवा खंडित करने के लिए कुछ भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इतना अवश्य प्रतीत होता है कि उसने राज्य पर अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया। सीरिया के सम्राट् से इसके राजत्व काल में भी मित्रता कायम रही। मेगस्थनीज़ का उत्तराधिकारी डाईमेकस सीरिया के सम्राट् का दूत बनकर बिंदुसार के दरबार में रहता था। प्लिनी के अनुसार मिस्र के सम्राट् टॉलेमी फ़िलाडेल्फ़स (285-247 ई. पू.) ने भी अपना राजदूत भारतीय नरेश के दरबार में भेजा था यद्यपि स्पष्ट नहीं होता कि यह नरेश बिंदुसार ही था। एथेनियस ने सीरिया के सम्राट् अंतिओकस प्रथम सोटर तथा बिंदुसार के पत्रव्यवहार का उल्लेख किया है। राजा अमित्रघात ने अंतिओकस से अपने देश से शराब, तथा सोफिस्ट खरीदकर भेजने के लिए प्रार्थना की थी। उत्तर में कहा गया था कि हम आपके पास शराब भेज सकेंगे किंतु यूनानी विधान के अनुसार सोफिस्ट का विक्रय नहीं होता।

बिंदुसार के कई लड़के थे। अशोक के पाँचवें शिलालेख में मिलता है कि उसके अनेक भाई बहिन थे। सबका नाम नहीं मिलता। 'दिव्यावदान' में केवल सुसीम तथा विगतशोक इन दो का नाम मिलता है। सिंहली परंपरा में उन्हें सुमन तथा तिष्य कहा गया है। कुछ विद्वान्‌ इस प्रकार अशोक के चार भाइयों की कल्पना करते हैं। जैन परंपरा के अनुसार बिंदुसार की माता का नाम दुर्धरा था।

साभार : विकिपीडिया 

Monday, December 31, 2012

भंडारी वैश्य-BHANDARI VAISHYA

भंडारी जाति का संक्षिप्त इतिहास

भारतीय समाज में कर्म के आधार पर सुदीर्घ काल तक प्रचलित रही चतुवर्ण-व्यवस्था में भंडारी वैश्य वर्ण में स्थान पाते हैं और भंडारी महाजन जाति में आते हैं | ओसवाल वंश की एक प्रतिष्ठ जाति/गौत्र/शाखा भंडारी समाज ही है |

सन 1891 में भंडारी गौत्र की उत्पति अजमेर के चौहान राज्य वंश से हुई | अजमेर के चौहान राजाओं के वंशज राव लाखण सी/लक्ष्मण शाकमभरी(सांभर) से अलग होकर अपने बाहुबल से नाडोल को अपना राज्य बनाया | भंडारियों की ख्यात् के अनुसारनाडोल के राजा राव लाखण सी के 24 रानियाँ थी, परन्तु वे सभी नि:संतान थी| जैन आचार्य यशोभद्र सूरी जी विहार करते हुए नाडोल पधारे | राजा लाखण सी ने आचार्य श्री का भक्तिभाव से भव्य सत्कार किया | आचार्य श्री अत्यंत प्रसन्न हुए | राव लाखण सी ने आचार्य श्री के सम्मुख नि:संतान होने का दुःख प्रकट किया और दुःख निवारण के लिये आचार्य प्रवर से शुभाशीष देने का निवेदन किया | आचार्यवर ने प्रत्येक रानी को एक एक पुत्र होने का आशीर्वाद दिया और साथ ही राजा से कहा की वे अपने 24 पुत्रो में से एक पुत्र हमे सौप दोगे, जिसे हम जैन धर्म, अंगीकार करवायेंगे | राजा लाखण सी ने यह बात स्वीकार कर ली | आचार्य श्री का आशीर्वाद फलीभूत हुआ और राजा लाखण सी 24 पुत्रो के पिता बने, जिनके नाम इस प्रकार है -

(1) मकडजी
(2) सगरजी
(3) मदरेचाजी
(4) चंद्रसेनजी
(5) सोहनजी
(6) बीलोजी
(7) बालेचाजी
(8) सवरजी
(9) लाडूजी
(10) जजरायजी
(11) सिद्पालजी
(12) दूदारावजी
(13) चिताजी
(14) सोनगजी
(15) चांचाजी
(16) राजसिंहजी
(17) चीवरजी
(18) बोडाजी
(19) खपतजी
(20) जोधाजी
(21) किरपालजी
(22) मावचजी
(23) मालणजी
(24) महरजी

कुछ वर्षों बाद आचार्य जी पुन: पधारे और राजा लाखण सी ने अपने वचन अनुसार प्रसन्तापूर्वक अपने 12 वे पुत्र दूदारावजी को आचार्य श्री की सेवा में दे दिया | आचार्य श्री ने दूदारावजी को प्रतिबोधित किया | उनके प्रतिबोध एवं तात्विक भाष्य से दूदारावजी ने जैन धर्म को अंगीकार किया | राजा लाखण सी ने दूदारावजी को "भांडागारिक राजकीय पद पर आसीन किया" भांडागारिक पद को किसी क्षुद्र भंडार विशेष से जोड़ना उचित नहीं होगा | भांडागारिक पद राजकोषीय भंडार की व्यापकता से युक्त लगता है दूदाराव जी के वंशज भांडागारिक नाम से संबोंधित किये जाते रहे होगें जो कालान्तर में अपभ्रंश रूप में भंडारी शब्द में परिवर्तित हो गया होगा - ऐसा प्रतीत होता है |

अत: इस प्रकार दूदारावजी ही भंडारियों के आदिपुरुष हुए |

Wednesday, December 26, 2012

जो किस्मत के धनी वे बनिया!

जी-चैनल के सुभाष गोयल से लेकर एयरटेल के सुनील मित्तल तक सभी बनिए ही हैं। आचार्य रजनीश ने दुनिया को दीवाना बनाकर रखा था वह भी बनिए (जैन) ही थे। चंद्रा स्वामी ने तो चूना लगाने के क्षेत्र में नए रिकार्ड बनाए, वे भी बनिए हैं। कौनसा ऐसा क्षेत्र है जो उनसे बचा हुआ है?

पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस जाति का ही कारोबारी एकाधिकार रहा है। लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिक बनिए ही हैं। इनमें हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, प्रभात खबर से लेकर हाल ही में बिक जाने वाला नई दुनिया तक शामिल है। 

अखबारों में आ रहे तमाम परीक्षा परिणामों के नतीजों पर नजर डालें तो इस कालम में बनियों यानी वैश्य व्यापारी वर्ग पर लिखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। हाई स्कूल से लेकर आईआईटी, पीएमटी यहां तक की सिविल सेवा तक के नतीजों में सफलता पाने वालों की सूची चौंकाती है। जिधर नजर डालंे तो उसमें आधे से ज्यादा नामों के आगे गुप्ता, गोयल, जैन, अग्रवाल, सिंघल, बसंल, कंसल आदि सरनेम देखने को मिलेंगे। जो बनिए कभी केवल दुकान और व्यापार तक सीमित रहते थे, आज हर क्षेत्र में अव्वल आ रहे हैं। शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो, जहां उन्होंने सफलता हासिल नहीं की हो। कुशाग्रता तो उनके खून में पाई जाती है और मानो गणित पर उनका एकाधिकार सा है। शायद ही इस वर्ग का कोई छात्र ऐसा हो, जो गणित में कमजोर हो। चंद वर्ष पहले तक सीपीडब्ल्यूडी में ही बनिया इंजीनियरों की भरमार दिखती थी, पर अब यह अतीत की बात हो चुकी है। 

मनु स्मृति में भी वैश्यों को व्यापार का काम सौंपा गया था और अपना देश आजाद हुआ तो उससे पहले से ही वे सभी क्षेत्रों में सफलता हासिल करने लगे थे। बिड़लाजी महात्मा गांधी के फाइनेंसर माने जाते थे। यह अलग बात है कि इस देश को आजादी दिलावाने में अहम भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी खुद भी गुजरात के बनिया ही थे। जमना लाल बजाज, डालमिया सभी ने स्वतंत्रता संग्राम में जितना संभव हो सका, उतनी उनकी मदद की। उस दौरान मनमथनाथ गुप्त की गिनती बहुत बड़े क्रांतिकारियों में होती थी। साहित्य के क्षेत्र में भी मैथलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि कहलाए। काका तो जाने माने हास्य कवि थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस जाति का ही कारोबारी एकाधिकार रहा है। लगभग सभी बड़े अखबारों के मालिक बनिए ही हैं। इनमें हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इंडिया, दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, प्रभात खबर से लेकर हाल ही में बिक जाने वाला नई दुनिया तक शामिल है। 

पत्रकार के रूप में बनियों ने विशेष ख्याति हासिल की। समकालीन पत्रकारिता में शेखर गुप्ता इसका जीता जागता उदाहरण है। एक समय तो ऐसा था जब कि मजाक में यह कहा जाने लगा था कि इंडियन एक्सप्रेस में ‘गुप्त काल’ रहा है। क्योंकि तब शेखर गुप्ता के अलावा वहां नीरजा (गुप्ता), हरीश गुप्ता, शरद गुप्ता, शिशिर गुप्ता भी पत्रकारिता कर रहे थे। 

जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो पत्रकार निर्मल पाठक ने उनसे चुटकी लेते हुए कहा था, चचा, भाजपा के लिए तो समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि अब बनियों को सोचना पड़ेगा कि वे आपको वोट दें या भाजपा को। केसरीजी ने पूछा वह कैसे तो उसने शरारती अंदाज में कहा कि आपने जगह-जगह दीवारों पर लिखा यह नारा तो पढ़ा ही होगा कि ‘भाजपा के सदस्य बनिए’।

बनियों का भाजपा से विशेष लगाव रहा हैं। एक समय था, जब हर शहर में पार्टी का स्थानीय दफ्तर किसी बाजार में होता था। नीचे दुकान होती थी व पहली मंजिल पर कार्यालय हुआ करता था। जब राजग सत्ता में थी तो दैनिक जागरण के मालिक नरेंद्र मोहन भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा में आ गए थे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वैश्य समाज का एक भी मंत्री नहीं था। विजय गोयल भी सरकार के अंतिम महिनों में कैबिनेट में लिए गए थे। नरेंद्र मोहन अपने अखबार में अक्सर यह खबर छपवाते रहते थे कि राजग में बनियों की उपेक्षा हो रही है। उनका एक भी मंत्री नहीं हैं। इस पर एक बार प्रमोद महाजन ने किसी कार्यक्रम में उनसे कटाक्ष करते हुए कहा कि हम पर तो बनियों की सरकार होने का आरोप लगाया जा रहा है और आप का अखबार लिख रहा है कि सरकार में बनियों की उपेक्षा हो रही है। 

रुपए पैसे के हिसाब-किताब रखने की उनकी योग्यता गजब की होती है। इसी योग्यता के कारण सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने तक पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे थे। उनके बारे में यह कहावत प्रचलित थी कि ‘‘न खाता न बही, जो कहें केसरी वही सही’’। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के कोषाध्यक्ष भी बनिया ही हैं। पहले पार्टी के कोष को वेदप्रकाश गोयल संभालते थे। अब अध्यक्ष बदलने के बाजवूद भाजपा का खजाना उत्तराधिकारी के रुप में उनके बेटे पीयूष गोयल को सौंप दिया गया है।

पड़ोसी राज्य हरियाणा में बनियों व जाटों का बहुत पुराना बैर माना जाता है। न्याय युद्ध के दौरान देवीलाल अक्सर भजनलाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए एक किस्सा सुनाते थे कि उन्होंने किसी जाट से पूछा कि अगर हर किलोमीटर एसवाईएल नहर बनाने में भजनलाल एक लाख रुपए कमा रहा हो तो पूरी हरियाणा में नहर बनवा कर वह कितनी कमाई कर डालेगा? इस पर उस लड़के ने जवाब दिया कि हम कोई ‘बणिए’ के छोरे हैं जो यह हिसाब किताब करते फिरे? यह अलग बात है कि तब बीडी गुप्ता उनके साथ हुआ करते थे जो कि वैश्य समाज के एक बहुत बड़े संगठन के अध्यक्ष थे। हरियाणा की राजनीति में ओम प्रकाश जिंदल की काफी अहम भूमिका रही। पहले उन्होंने भजनलाल का साथ निभाया व फिर बंसी लाल का।

आपातकाल के दौरान बंसीलाल अपने शहर भिवानी के एक संपन्न वैश्य व्यापारी से नाराज हो गए। उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए शहर के सबसे चर्चित स्थान घंटाघर में स्थित उसकी संपत्ति पर बुलडोजर फिरवा दिया। वह लाला इतना होशियार था कि जब उसे यह पता चला कि कार्रवाई होने वाली है तो उसने उस युग में जब कि लोगों के पास साधारण कैमरे भी नहीं होते थे, मुंबई से फिल्म बनाने वाले मूवी कैमरे व फोटोग्राफर का इंतजाम किया। उस इलाके में स्थित एक ऊंची इमारत में उसे छिपाकर पूरी फिल्म तैयार करवाई। जब आपातकाल समाप्त हुआ और जनता पार्टी ने उस दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया तो उसने उसके समक्ष वह फिल्म पेश कर दी। आयोग ने उसकी जमीन वापस लौटाने का आदेश दिया। इस घटना के कई साल बाद जब मैं उस बुजुर्ग व्यापारी से मिला तो उसने बताया कि बंसीलाल के इस कदम से उसके भाग्य खुल गए क्योंकि उसकी जिस बिल्डिंग को ध्वस्त किया गया था, वह काफी पुरानी थी। उसमें दरजनों किराएदार थे, जो डेढ़, दो रूपए महिला किराया देते थे। उसे खाली भी नहीं करते थे। बुलडोजर चलने के बाद उसे उनसे मुक्ति मिल गई। जब मैं वहां गया तो उस स्थान पर बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका था। जिसमें दर्जनों बैंक व बीमा कंपनियों के दफ्तर खुले हुए थे। जिनसे तब उसे लाखों रूपए महीना किराया मिल रहा था। हालांकि जब लाला ने अनुरोध कर मुझे पीछे स्थित अपने बाग में खाना खिलवाया तो मैंने पाया कि हमें स्टील की जिन कटोरियों में खाना परोसा गया था, वे टूटी हुई थीं। मैंने अपने जीवन में पहली व अंतिम बार स्टील के टूटे हुए बर्तन वहीं देखे। 

जी-चैनल के सुभाष गोयल से लेकर एयरटेल के सुनील मित्तल तक सभी बनिए ही हैं। आचार्य रजनीश ने दुनिया को दीवाना बनाकर रखा था, वह भी बनिए (जैन) ही थे। चंद्रा स्वामी ने तो चूना लगाने के क्षेत्र में नए रिकार्ड बनाए, वे भी बनिए है। कौन सा ऐसा क्षेत्र है, जो उनसे बचा हुआ है? हिंदू धर्म में सबसे चर्चित कथा सत्य नारायण की है, जो यह बताती है कि आदमी किस तरह से भगवान तक को मूर्ख बनाता है। पहले उसे प्रसाद का लालच देकर काम करवाता है, फिर अपना वादा पूरा करना भूल जाता है। उसका मुख्य पात्र भी बनिया ही है। 

बनिए पूजा पाठ में बहुत ज्यादा रूचि लेते हैं। दीवाली पर सबसे लंबी पूजा वही करवाते हैं। वे ही सबसे ज्यादा मथुरा और वृंदावन जाते हैं। लक्ष्मी को भी उनके यहां ही रहना पसंद आता है। इस बारे में हरियाणा में किसी जाट मित्र ने एक किस्सा सुनाया कि एक जाट ने अपने घर में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित कर ली। एक दिन शाम को खूंटा नजर नहीं आया तो उसने भैंस की जंजीर हनुमानजी की टेढ़ी वाली टांग में बांध दी। कुछ देर बाद भैंस का घूमने का मन हुआ, उसने कुछ झटके मारकर मूर्ति उखाड़ डाली व बाहर चल पड़ी। मूर्ति उसके साथ घिसटती चली जा रही थी। रास्ते में एक मंदिर था, जहां लक्ष्मी की मूर्ति लगी थी। वे हनुमानजी की हालत देखकर हंस पड़ी। इस पर हनुमानजी नाराज होकर कहा, ज्यादा न हंस। वह तो तेरी किस्मत अच्छी है कि बनिया के यहां रहती है। अगर किसी जाट के पल्ले पड़ी होती तो कब की यह हंसी निकल गई होती।


साभार : नया इंडिया, लेखक विनम्र 




Wednesday, December 19, 2012

कलाल-कलवार-कराल वैश्य

पिछड़ी  जातियों के संदर्भ में अक्सर कलाल शब्द सुनते आए हैं। कलार या कलाल मूलतः वैश्यों के उपवर्ग है जो जातिवादी समाज में विकास की दौड़ में लगातार पिछड़ते चले गए। अब इन्हें अन्य पिछड़ावर्ग में गिना जाता है। यह भी स्थापित सत्य है कि वैश्य समुदाय की पहचान किस जमाने में क्षत्रिय वर्ण में होती रही है। विभिन्न वैश्य समूदायों की उत्पत्ति के सूत्र क्षत्रियों से ही जुड़ते हैं।


कलाल शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत केकल्य या कल्प से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है इच्छापूर्ति करना। व्यवहार में लाने योग्य, समर्थ आदि। व्यावहारिक तौर पर इसमें राशन सामग्री का भाव भी आता है। आप्टे के संस्कृत शब्दकोश में कल्पपालः का अर्थ शराब विक्रेता बताया गया है। इसी तरह कल्य शब्द का अर्थ भी रुचिकर, मंगलमय आदि है। इसमें भी भोज्य सामग्री का भाव है। कल्य से ही बना हैकलेवा जो हिन्दी में खूब प्रचलित है और सुबह के नाश्ते या ब्रेकफास्ट के अर्थ में इस्तेमाल होता है। कल्या का मतलब मादक शराब होता है। मदिरा के कई उपासकों का कलेवा कलाली पर ही होता है। कल्यपाल या कल्पपालमूलतः एक महत्वपूर्ण ओहदा होता था जिस पर तैनात व्यक्ति के जिम्मे सेना की रसद से जुड़ी हुई तमाम जिम्मेदारियां थीं। कल्यपाल यानी जो खाद्य आपूर्ति का काम करे। व्यापक रूप में खाद्य आपूर्ति यानी प्रजा के भरण पोषण का दायित्व राजा का भी होता है अतः प्रजापालक के रूप में कल्यपाल का अर्थ राजा भी होता है। कलाल वैश्यों से भी पहले क्षत्रिय थे इसके संदर्भ भी मिलते हैं। कल्यपाल राजवंश भी हुआ है जिन्होने कश्मीर में शासन किया।


शासन के लिए, खासतौर पर सेना के लिए रसद आपूर्ति के काम में मदिरा भी एक रसद की तरह ही उपभोग की जाती थी। कल्प का एक अन्य अर्थ है रोगी की चिकित्सा। जाहिर है इसमें पदार्थ का सार, आसवन करना, आसव निकालना आदि भाव भी शामिल हैं। गौरतलब है कि प्राचीन भैषज विज्ञान के अनुसार ये सारी विधियां ओधषि निर्माण से जुड़ी रही हैं। कलाल के वैश्य समुदाय संदर्भित अर्थ पर गौर करें तो जाहिर है कि रोगोपचार वैद्य का कार्य रहा है मगर ओषधि निर्माण का काम एक पृथक व्यवसाय रहा है जिसे वैश्य समुदाय करता रहा है। कल्यपाल एक राज्याश्रित पद होता था। प्राचीनकाल में भी मदिरा के गुण-दोषों के बारे में राज्य व्यवस्था सतर्क थी। कल्यपालका मतलब हुआ आसवन की गई सामग्री का अधिपति। शासन व समाज के उच्च तबके द्वार विलासिता के तौर पर उपभोग की जाने वाली मदिरा के निर्माण का काम इसी कल्यपाल के जिम्मे होता था। कल्यपाल का ही अपभ्रंश रूप होता है कलार या कलाल। कलाल समुदाय में जायसवाल वर्ग काफी सम्पन्न और शिक्षित रहा है। इनकी उद्यमशीलता वैश्यों सरीखी ही है। मदिरा के कारोबार पर हमेशा से राजकीय नियंत्रण रहा है। आज के दौर में हर राज्य में शराब विक्रेताओं के 

कल्य शब्द से बने कलाल या कलार से ही जन्मे कलारी या कलाली का किसी समय समाज में ऊंचा और विशिष्ट स्थान था।सिंडिकेट बने हुए हैं जिन पर कलाल समुदाय के लोग ही काबिज हैं। देश के अलग अलग इलाकों में इनके कई नाम भी प्रचलित हैं मसलन कलार, कलवार, दहरिया, जायसवाल, कनौजिया, आहलूवालिया, शिवहरे, वालिया,   कर्णवाल, सिकन्द,  आदि। पंजाब के आहलूवालिया जबर्दस्त लड़ाका क्षत्रिय हैं। बहादुरी में इनका सानी नहीं अविभाजित पंजाब के आहलू गांव से इनकी शुरूआत मानी जाती है। अवध का एक बड़ा इलाका किसी जमाने में कन्नौज कहलाता था। यहां से जितने भी समुदाय व्यवसाय-व्यापार के लिए अन्यत्र जा बसे उनके साथा कन्नौजिया शब्द भी जुड़ गया। कन्नौजिया शब्द में किसी जाति विशेष का आग्रह नहीं बल्कि स्थान विशेष का आग्रह अंतर्निहित है। कन्नौजिया उपनामधारी लोग हर वर्ग-समाज में मिल जाएंगे। शिवहरे नाम शिव से संबंधित है।


कल्य शब्द से बने कलाली से जहां ताड़ीखाने का रूप उभरता है वहीं राजस्थान की रजवाड़ी संस्कृति में यह शब्द विलास और श्रंगार के भावों को व्यक्त करता है। लोक गायन की एक शैली हीकलाली अथवा कलाळी कहलाती है। इस पर कई भावपूर्ण गीतलिखे गए हैं। शुद्ध रूप में इन्हें कलाळियां कहा जाता है। रजवाड़ी दौर में कलाळ अर्थात कलालों का रुतबा था। उनकी मदिरा प्रसिद्ध थी। उनकी अपनी भट्टियां होती थीं।लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ने रजवाड़ी गीत की भूमिका में लिखा है कि समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति इनके घर जाकर मदिरापान करते थे। इन कलालों की महिलाएं मेहमानों की आवभगत करतीं और मनुहार से मदिरा पिलाते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान के बनाए रखती थीं। वे इस संबंध में सजन और पातुड़ी कलाळन का उल्लेख करती हैं। मध्यकालीन सूफी-संतों ने भी ईश्वर भक्ति के संदर्भ में कलाली, भट्टी जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। कबीरदास कहते हैं-कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई। सिर सौपे सोई पिवै, नहिं तो पिया न जाई।। यानी रामरस का स्वाद अगर लेना है तो सर्वस्व त्यागना होगा। अब यह कैसे संभव है कि जिस सिर अर्थात मुंह से मदिरा का स्वाद लेना है, वही सिर कलाल को मदिरा की एवज में सौप दिया जाए !!

कल्य शब्द से बने कलाल या कलार से ही जन्मे हैं कलारी या कलाली का किसी समय समाज में ऊंचा और विशिष्ट स्थान था। आज कलाली देशी दारू की दुकानों या ठेकों के रूप में आमतौर पर व्यवहृत हैं। मराठी, गुजराती, पंजाबी जैसी भाषाओं में भी यही रूप प्रयोग में आते हैं जिससे सिद्ध है कि कल्यपाल की राज्याश्रित व्यवस्था का विस्तार समूचे भारत में था। शराब की भट्टियां लगाने का काम खटीक करते थे और विक्रय की जिम्मेदारी कलाल समुदाय की थी। डॉ विगो खोबरेकर लिखित मराठा कालखंड-2 में शिवाजी के राज्य में नियंत्रित मदिरा व्यवसाय का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि ब्राह्मणों के लिए शराबनोशी प्रतिबंधित थी। सैनिकों के लिए भी शराब की मनाही थी।

साभार :

श्री अजित वडनेरकर, http://shabdavali.blogspot.in/2009/02/blog-post_27.html

THE GREAT BANIYA COMMUNITY

A very very interesting story on India ‘s caste issues

Forbes magazine has put out a list of the world’s 1,210 billionaires.

Fifty-five of them are Indians. A billion dollars is Rs. 4,480 crore.

A Baniya is a member of the Vaish caste, 

They are approx. 15% of India ‘s population. Yet, 26 of the 55 are baniyas! & some of them from sub vaishya caste.

India ‘s richest man is a Baniya (Lakshmi Mittal, world’s sixth richest with $31.1 billion),


India ‘s second richest man is a Baniya (Mukesh Ambani, $27 billion),


India ‘s third richest man is a Khoja (Azim Premji, $16.8 billion) a converted baniya.


India ‘s fourth richest men are Baniyas (Shashi and Ravi Ruia, $15.8 billion),


India ‘s fifth richest person is a Baniya (Savitri Jindal, $13.2 billion),


India ‘s sixth richest man is a Baniya (Gautam Adani, $10 billion),


India ‘s seventh richest man is a Baniya (Kumar Mangalam Birla, $9.2 billion),


India ‘s eighth richest man is a Baniya (Anil Ambani, $8.8 billion),


India ‘s ninth richest man is a Baniya (Sunil Mittal, $8.3 billion).


India ‘s 10th richest man is a Parsi (Adi Godrej, world’s 130th richest with $7.3 billion).

Score: Baniyas 9, Rest of India 1. If we consider the Gujaratis Godrej and Premji (from the Lohana bania caste) as coming from mercantile communities then actually Rest of India wasn’t playing this match so far.

India ‘s 11th richest man is K.P. Singh of DLF ($7.3 billion). He is thefirst departure from our trend of mercantile castes. Singh is a peasant, the most populous caste grouping of India,
about 50% of our population.

From numbers 11 to 20, there are seven Baniyas. They are Anil Agarwal of Vedanta ($6.4 billion),

Dilip Shanghvi of Sun Pharma ($6.1 billion), Uday Kotak ($3.2 billion), and Subhash Chandra Goel of Zee, ($2.9 billion). The non-Baniyas are Shiv Nadar of nadar caste a sub vaishya caste, HCL ($5.6 billion),

Malvinder and Shivinder Singh of Ranbaxy ($4.1 billion), Kalanithi Maran of Sun TV ($3.5 billion), Mukesh Jagtiani of Landmark ($3 billion) and Pankaj Patel of Cadila ($2.6 billion) both of them from vaishya baniya caste

Between 21 and 30, there are 8  Baniyas. They are Indu Jain of The Times of India ($2.6 billion),

Desh Bandhu Gupta of Lupin ($2.1 billion), Sudhirand Samir Mehta of Torrent ($2 billion),

Aloke Lohia of Indorama ($2 billion) and Venugopal Dhoot of Videocon ($1.9 billion).

G.M. Rao of GMR ($2.6 billion).

Mumbai builder Rajan Raheja ($2.2 billion).(a khatri sub vaishya caste)

Gautam Thapar of Avantha ($2 billion)( a khatri saub vaishya caste). 

Between 31 and 40 are two Baniyas: Rahul Bajaj ($1.6 billion) and Ajay Piramal ($1.4 billion).

The non-Baniyas include three Brahmins: Nandan Nilekani ($1.8 billion) and

S. Gopalakrishnan ($1.6 billion) of Infosys, and Vijay Mallya ($1.4 billion).

Three of the others are from mercantile our sub vaishya castes: Chandru Raheja ($1.9 billion),

Brijmohan Lall Munjal of Hero Motors ($1.5 billion) and Vikas Oberoi ($1.4 billion).

The last two are K. Anji Reddy ($1.5 billion) (from Andhra’s dominant peasant community) and Ajay Kalsi of Indus Gas ($1.7 billion).

Between 41 and 50 are five Baniyas. They are R.P. Goenka ($1.3 billion), Rakesh Jhunjhunwala ($1.2 billion), Brij Bhushan Singhal ($1.2 billion), B.K. Modi ($1.1 billion) and Mumbai builder Mangal Prabhat Lodha ($1.1 billion). Baba Kalyani of Bharat Forge ($1.3 billion), Keshub Mahindra ($1.2 billion) are fro sub vaishya caste. Non baniya are  K. Dinesh ($1.2 billion) and S.D. Shibulal ($1.1 billion) of Infosys, and Yusuf Hamied of Cipla ($1.1 billion).

The last five, from 51 to 55, include two Baniyas: Mumbai builder Mofatraj Munot of Kalpataru ($1 billion) and Ashwin Dani of Asian Paints ($1 billion). Two of the others are

from mercantile sub vaishya castes: Parsi Anu Aga of Thermax ($1 billion) and Khatri Harindarpal Banga of Noble ($1 billion). Delhi builder Ramesh Chandra of Unitech ($1 billion) ends our list of Indians with a billion dollars or more.

The list has three Parsis, two Muslims and Sikhs in one spot (shared by the Ranbaxy Singhs).

Banga is also a Sikh name but Harindarpal is clean-shaven. All of them, except Poonawalla, have inherited their wealth, though in the case of one (Premji), he took a small firm and

made it global. There is nobody from the scheduled tribes or castes.

India ‘s large peasant castes have some representation (Singh, Patel, Reddy), but not much.

There are 46 Baniyas on our list. Many of them inherited their wealth, but just as many (Mittal, Ruias, Adani, Dhoot among others) are self-made.

The list has 16 Rajasthanis, and 13 Gujaratis. Every single Rajasthani is from one caste, Vaish, though they are from two faiths: Hindu and Jain.

Only Gujarat is capable of producing billionaires drawn from four different faiths-Hindu, Parsi, Jain and Muslim-and three different castes: Baniya, Khatri and peasant.

This is unique in India and there is something about this secular mercantile culture that produces great men across communities. What is it? Three out of the four biggest leaders of the subcontinent under British rule were Gujarati, and they were drawn from these three castes: Gandhi, Jinnah and Patel. Only 5% of India ‘s population, Gujaratis don’t have the numbers to dominate its democratic politics. But businesses are not run in

democratic fashion. And to rise, you need quality, not quantity.

The heartland of India , where our quantity resides, is missing from this list. Bihar, Bengal, Madhya Pradesh, Odisha, Uttar Pradesh have little or no representation and this does not surprise us.

On the list are 10 south Indians, in proportion to their 20% share of India ‘s population.

The famous five from Infosys are obviously self-made. Of the others, four are first-generation wealthy. This is a good indicator for the future, and it restores some balance in favor of Rest of India.

Two final observations. India ‘s greatest businessman is not on this list.Why is that?

It is because Ratan Tata owns less than 1% of Tata Sons. He is exceptional in every way.


SAABHAAR : SRI DINESH VORA

Thursday, December 13, 2012

प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी - वैश्य गौरव - Our Proud PM Shri Narendra Modi

हिंदू ह्रदय सम्राट, वैश्य गौरव भाई नरेन्द्र मोदी जी.


नरेन्द्र दामोदरदास मोदी  

जन्म: १७ सितम्बर, १९५० भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री हैं। भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें २६ मई २०१४ को विधिवत भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलायी। वे स्वतन्त्र भारत के १५वें प्रधानमन्त्री हैं तथा इस पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्र भारत में जन्में प्रथम व्यक्ति हैं।

उनके नेतृत्व में भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने २०१४ का लोकसभा चुनावलड़ा और २८२ सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। एक सांसद के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी एवं अपने गृहराज्य गुजरात के वडोदरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों जगह से जीत दर्ज़ की।
इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के १४वें मुख्यमन्त्री रहे। उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार ४ बार (२००१ से २०१४ तक) मुख्यमन्त्री चुना। गुजरात विश्वविद्यालय सेराजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त नरेन्द्र मोदी विकास पुरुष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।। माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर भी वे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय नेता हैं। टाइम पत्रिका ने मोदी को पर्सन ऑफ़ द इयर २०१३ के ४२ उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया है।

अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नरेन्द्र मोदी एक राजनेता और कवि हैं। वे गुजराती भाषा के अलावा हिन्दी में भी देशप्रेम से ओतप्रोत कविताएँ लिखते हैं।

नरेन्द्र मोदी का जन्म तत्कालीन बॉम्बे राज्य केमहेसाना जिला स्थित वडनगर ग्राम में हीराबेन मोदी और दामोदरदास मूलचन्द मोदी के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में १७ सितम्बर १९५० को हुआ था। नरेन्द्र मोदी जी का परिवार मोध-घांची-वनिक-तेली समुदाय से सम्बंधित हैं. जो की गुजरात की एक वैश्य जाति हैं.  वह पूर्णत: शाकाहारी हैं।  भारत पाकिस्तान के बीच द्वितीय युद्ध के दौरान अपने तरुणकाल में उन्होंने स्वेच्छा से रेलवे स्टेशनों पर सफ़र कर रहे सैनिकों की सेवा की।[ युवावस्था में वह छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए और साथ ही साथ भ्रष्टाचार विरोधी नव निर्माण आन्दोलन में हिस्सा लिया। एक पूर्णकालिक आयोजक के रूप में कार्य करने के पश्चात् उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन का प्रतिनिधि मनोनीत किया गया।  किशोरावस्था में अपने भाई के साथ एक चाय की दुकान चला चुके मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा वड़नगर में पूरी की। उन्होंने आरएसएस के प्रचारक रहते हुए 1980 में गुजरात विश्वविद्यालयसे राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर परीक्षा दी और एम॰एससी॰ की डिग्री प्राप्त की।
अपने माता-पिता की कुल छ: सन्तानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का भी हाथ बँटाया। बड़नगर के ही एक स्कूल मास्टर के अनुसार नरेन्द्र हालाँकि एक औसत दर्ज़े का छात्र था लेकिन वाद-विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में उसकी बेहद रुचि थी।  इसके अलावा उसकी रुचि राजनीतिक विषयों पर नयी-नयी परियोजनाएँ प्रारम्भ करने की भी थी। 
13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जसोदाबेन चमनलाल के साथ कर दी गयी और जब उनका विवाह हुआ वे मात्र 17 वर्ष के थे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार पति-पत्नी ने कुछ वर्ष साथ रहकर बिताये। परन्तु कुछ समय बाद वे दोनों एक दूसरे के लिये अजनबी हो गये क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने उनसे कुछ ऐसी ही इच्छा व्यक्त की थी। जबकि नरेन्द्र मोदी के जीवनी-लेखक ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है:

"उन दोनों की शादी जरूर हुई परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ बरसों बाद नरेन्द्र मोदी ने घर त्याग दिया और एक प्रकार से उनका वैवाहिक जीवन लगभग समाप्त-सा ही हो गया।"

पिछले चार विधान सभा चुनावों में अपनी वैवाहिक स्थिति पर खामोश रहने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अविवाहित रहने की जानकारी देकर उन्होंने कोई पाप नहीं किया। नरेन्द्र मोदी के मुताबिक एक शादीशुदा के मुकाबले अविवाहित व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार तरीके से लड़ सकता है क्योंकि उसे अपनी पत्नी, परिवार व बालबच्चों की कोई चिन्ता नहीं रहती। हालांकि नरेन्द्र मोदी ने शपथ पत्र प्रस्तुत कर जसोदाबेन को अपनी पत्नी स्वीकार किया है।

राजनीति में प्रारम्भ से ही सक्रियता

नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ. उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का आधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी। गुजरात में शंकरसिंह वघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की रणनीति ही तो थी।

अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ, मोदी की मेहनत रंग लायी जब गुजरात में 1995 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसी दौरान दो राष्ट्रीय घटनायें और इस देश में घटीं। पहली घटना थी सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथ यात्रा जिसमें आडवाणी जी के प्रमुख सारथी की मूमिका में नरेन्द्र का मुख्य सहयोग रहा। इसी प्रकार की दूसरी रथ यात्रा कन्याकुमारी से लेकर सुदूर उत्तर में स्थित काश्मीर तक की नरेन्द्र मोदी की ही देखरेख में आयोजित हुई। इन दोनों यात्राओं ने मोदी का राजनीतिक कद ऊँचा कर दिया जिससे चिढ़कर शंकरसिंह वघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बना दिया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुलाकर भाजपा में संगठन की दृष्टि से केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया।

1995 में राष्ट्रीय मन्त्री के नाते उन्हें पाँच प्रमुख राज्यों में पार्टी संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन) का उत्तरदायित्व दिया गया। इस पद पर वे अक्तूबर 2001 तक काम करते रहे। भारतीय जनता पार्टी ने अक्तूबर 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की कमान नरेन्द्र भाई मोदी को सौंप दी।

गुजरात के मुख्यमन्त्री के रूप में

नरेन्द्र मोदी अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिये समूचे राजनीतिक हलकों में जाने जाते हैं। उनके व्यक्तिगत स्टाफ में केवल तीन ही लोग रहते हैं कोई भारी भरकम अमला नहीं होता। लेकिन कर्मयोगी की तरह जीवन जीने वाले मोदी के स्वभाव से सभी परिचित हैं इस नाते उन्हें अपने कामकाज को अमली जामा पहनाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती।  उन्होंने गुजरात में कई ऐसे हिन्दू मन्दिरों को भी ध्वस्त करवाने में कभी कोई कोताही नहीं बरती जो सरकारी कानून कायदों के मुताबिक नहीं बने थे। हालाँकि इसके लिये उन्हें विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों का कोपभाजन भी बनना पड़ा परन्तु उन्होंने इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं की; जो उन्हें उचित लगा करते रहे। वे एक लोकप्रिय वक्ता हैं जिन्हें सुनने के लिये बहुत भारी संख्या में श्रोता आज भी पहुँचते हैं। वे स्वयं को पण्डित जवाहरलाल नेहरू के मुकाबले सरदार वल्लभभाई पटेल का असली वारिस सिद्ध करने में रात दिन एक कर रहे हैं। धोती कुर्ता सदरी के अतिरिक्त वे कभी कभार सूट भी पहन लेते हैं। गुजराती, जो उनकी मातृभाषा है के अतिरिक्त वे राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही बोलते हैं। अब तो उन्होंने अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह बोलने की कला सीख ली है। 

गुजरात के विकास की योजनाएँ

मुख्यमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के विकास के लिये जो महत्वपूर्ण योजनाएँ प्रारम्भ कीं व उन्हें क्रियान्वित कराया उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

पंचामृत योजना -  राज्य के एकीकृत विकास की पंचायामी योजना,

सुजलाम् सुफलाम्- राज्य में जल स्रोतों का उचित व समेकित उपयोग जिससे जल की बरवादी को रोका जा सके,

कृषि महोत्सव – उपजाऊ भूमि के लिये शोध प्रयोगशालाएँ,

चिरंजीवी योजना – नवजात शिशु की मृत्युदर में कमी लाने हेतु,

मातृ-वन्दना – जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु,

बेटी बचाओ – भ्रूण हत्या व लिंगानुपात पर अंकुश हेतु,

ज्योतिग्राम योजना – प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचाने हेतु,

कर्मयोगी अभियान – सरकारी कर्मचारियों में अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा जगाने हेतु,

कन्या कलावाणी योजना – महिला साक्षरता व शिक्षा के प्रति जागरुकता,

बालभोग योजना – निर्धन छात्रों को विद्यालय में दोपहर का भोजन,

मुख्यमन्त्री का दस सूत्री कार्यक्रम

आदिवासी व वनवासी क्षेत्र के विकास हेतु मोदी ने गुजरात राज्य में दस सूत्री वनबन्धु विकास कार्यक्रम चला रक्खा है। इस कार्यक्रम के सभी दस सूत्र निम्नवत हैं:

1-पाँच लाख परिवारों को रोजगार
2-उच्चतर शिक्षा की गुणवत्ता
3-आर्थिक विकास
4-स्वास्थ्य
5-आवास
6-साफ स्वच्छ पेय जल
7-सिंचाई
8-समग्र विद्युतीकरण
9-प्रत्येक मौसम में सड़क मार्ग की उपलब्धता
10-शहरी विकास ।

आतंकवाद पर मोदी के विचार

१८ जुलाई २००६ को मोदी ने एक भाषण में आतंकवाद निरोधक अधिनियम जैसे आतंकवाद-विरोधी विधान लाने के विरूद्ध उनकी अनिच्छा को लेकर भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आलोचना की। मुंबई की उपनगरीय रेलों में हुए बम विस्फोटों के मद्देनज़र उन्होंने केंद्र से राज्यों को सख्त कानून लागू करने के लिए सशक्त करने की माँग की। उनके शब्दों में -

"आतंकवाद युद्ध से भी बदतर है। एक आतंकवादी के कोई नियम नहीं होते। एक आतंकवादी तय करता है कि कब, कैसे, कहाँ और किसको मारना है। भारत ने युद्धों की तुलना में आतंकी हमलों में अधिक लोगों को खोया है।"

नरेंद्र मोदी ने कई अवसर पर कहा था कि यदि भाजपा केंद्र में सत्ता में आई, तो वह सन् २००४ में उच्चतम न्यायालय द्वारा अफज़ल गुरु को फाँसी दिए जाने के निर्णय का सम्मान करेगी। भारत के उच्चतम न्यायालय ने अफज़ल को २००१ में भारतीय संसद पर हुए हमले के लिए दोषी ठहराया था एवं ९ फ़रवरी २०१३ को तिहाड़ जेल में उसे लटकाया गया।

गुजरात के दंगों में मोदी पर आरोप प्रत्यारोप

२७ फरवरी २००२ को अयोध्या से गुजरात वापस लौट कर आ रहे कारसेवकों को गोधरा स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में एक हिंसक भीड़ द्वारा आग लगाकर जिन्दा जला दिया गया। इस हादसे में 59 कारसेवक मारे गये थे। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप समूचे गुजरात में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। मरने वाले ११८० लोगों में अधिकांश संख्या अल्पसंख्यकों की थी। इसके लिये न्यू यॉर्क टाइम्सने मोदी प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया। कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे की माँग की। मोदी ने गुजरात की दसवीं विधान सभा भंग करने की संस्तुति करते हुए राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। परिणामस्वरूप पूरे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राज्य में दोबारा चुनाव हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी ने मोदी के नेतृत्व में विधान सभा की कुल १८२ सीटों में से १२७ सीटों पर जीत हासिल की।

अप्रैल २००९ में भारत के उच्चतम न्यायालय ने विशेष जाँच दल भेजकर यह जानना चाहा कि कहीं गुजरात के दंगों में नरेन्द्र मोदी की साजिश तो नहीं। यह विशेष जाँच दल दंगों में मारे गये काँग्रेसी सांसद ऐहसान ज़ाफ़री की विधवा ज़ाकिया ज़ाफ़री की शिकायत पर भेजा गया था।दिसम्बर 2010 में उच्चतम न्यायालय ने एस०आई०टी० की रिपोर्ट पर यह फैसला सुनाया कि इन दंगों में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

उसके बाद फरवरी २०११ में टाइम्स ऑफ इंडिया ने यह आरोप लगाया कि रिपोर्ट में कुछ तथ्य जानबूझ कर छिपाये गये हैं और सबूतों के अभाव में नरेन्द्र मोदी को अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता।इंडियन एक्सप्रेस ने भी यह लिखा कि रिपोर्ट में मोदी के विरुद्ध साक्ष्य न मिलने की बात भले ही की हो किन्तु अपराध से मुक्त तो नहीं किया। द हिन्दू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ़ इतनी भयंकर त्रासदी पर पानी फेरा अपितु प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न गुजरात के दंगों में मुस्लिम उग्रवादियों के मारे जाने को भी उचित ठहराया। भारतीय जनता पार्टी ने माँग की कि एस०आई०टी० की रिपोर्ट को लीक करके उसे प्रकाशित करवाने के पीछे सत्तारूढ काँग्रेस पार्टी का राजनीतिक स्वार्थ है इसकी भी उच्चतम न्यायालय द्वारा जाँच होनी चाहिये।

सुप्रीम कोर्ट ने बिना कोई फैसला दिये अहमदाबाद के ही एक मजिस्ट्रेट को इसकी निष्पक्ष जाँच करके अबिलम्ब अपना निर्णय देने को कहा अप्रैल 2012 में एक अन्य विशेष जाँच दल ने फिर ये बात दोहरायी कि यह बात तो सच है कि ये दंगे भीषण थे परन्तु नरेन्द्र मोदी का इन दंगों में कोई भी प्रत्यक्ष हाथ नहीं। 7 मई 2012 को उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेष जज राजू रामचन्द्रन ने यह रिपोर्ट पेश की कि गुजरात के दंगों के लिये नरेन्द्र मोदी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा १५३ ए (1) (क) व (ख), १५३ बी (1), १६६ तथा ५०५ (2) के अन्तर्गत विभिन्न समुदायों के बीच बैमनस्य की भावना फैलाने के अपराध में दण्डित किया जा सकता है।  हालँकि रामचन्द्रन की इस रिपोर्ट पर विशेष जाँच दल (एस०आई०टी०) ने आलोचना करते हुए इसे दुर्भावना व पूर्वाग्रह से परिपूर्ण एक दस्तावेज़ बताया। 

२६ जुलाई २०१२ को नई दुनिया के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी को दिये गये एक इण्टरव्यू में नरेन्द्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा - "२००४ में मैं पहले भी कह चुका हूँ, २००२ के साम्प्रदायिक दंगों के लिये मैं क्यों माफ़ी माँगूँ? यदि मेरी सरकार ने ऐसा किया है तो उसके लिये मुझे सरे आम फाँसी दे देनी चाहिये।" मुख्यमन्त्री ने गुरुवार को नई दुनिया से फिर कहा- “अगर मोदी ने अपराध किया है तो उसे फाँसी पर लटका दो। लेकिन यदि मुझे राजनीतिक मजबूरी के चलते अपराधी कहा जाता है तो इसका मेरे पास कोई जबाव नहीं है।"

यह कोई पहली बार नहीं है जब मोदी ने अपने बचाव में ऐसा कहा हो। वे इसके पहले भी ये तर्क देते रहे हैं कि गुजरात में और कब तक गुजरे ज़माने को लिये बैठे रहोगे? यह क्यों नहीं देखते कि पिछले एक दशक में गुजरात ने कितनी तरक्की की? इससे मुस्लिम समुदाय को भी तो फायदा पहुँचा है।

लेकिन जब केन्द्रीय क़ानून मन्त्री सलमान खुर्शीद से इस बावत पूछा गया तो उन्होंने दो टूक जबाव दिया - "पिछले बारह वर्षों में यदि एक बार भी गुजरात के मुख्यमन्त्री के खिलाफ़ एफ०आई०आर० दर्ज़ नहीं हुई तो आप उन्हें कैसे अपराधी ठहरा सकते हैं? उन्हें कौन फाँसी देने जा रहा है?"

बाबरी मस्ज़िद के लिये पिछले ५४ सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे ९२ वर्षीय मोहम्मद हाशिम अंसारी के मुताबिक भाजपा में प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के प्रान्त गुजरात में सभी मुसलमान खुशहाल और समृद्ध हैं। जबकि इसके उलट कांग्रेस हमेशा मुस्लिमों में मोदी का भय पैदा करती रहती है।


२०१४ लोकसभा चुनाव


प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार में भाजपा कार्यसमिति द्वारा नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोक सभा चुनाव अभियान की कमान सौंपी गयी थी।१३ सितम्बर २०१३ को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों के लिये प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। इस अवसर पर पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी मौजूद नहीं रहे और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसकी घोषणा की। मोदी ने प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद चुनाव अभियान की कमान राजनाथ सिंह को सौंप दी। प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद मोदी की पहली रैली हरियाणा प्रान्त के रिवाड़ी शहर में हुई।

एक सांसद प्रत्याशी के रूप में उन्होंने देश की दो लोकसभा सीटों वाराणसी तथा वडोदरा से चुनाव लड़ा और दोनों निर्वाचन क्षेत्रों से विजयी हुए।


लोक सभा चुनाव २०१४ में मोदी की स्थिति


न्यूज़ एजेंसीज व पत्रिकाओं द्वारा किये गये तीन प्रमुख सर्वेक्षणों ने नरेन्द्र मोदी को प्रधान मन्त्री पद के लिये जनता की पहली पसन्द बताया था। एसी वोटर पोल सर्वे के अनुसार नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी घोषित करने से एनडीए के वोट प्रतिशत में पाँच प्रतिशत के इजाफ़े के साथ १७९ से २२० सीटें मिलने की सम्भावना व्यक्त की गयी।  सितम्बर २०१३ में नीलसन होल्डिंग और इकोनॉमिक टाइम्स ने जो परिणाम प्रकाशित किये थे उनमें शामिल शीर्षस्थ १०० भारतीय कार्पोरेट्स में से ७४ कारपोरेट्स ने नरेन्द्र मोदी तथा ७ ने राहुल गान्धी को बेहतर प्रधानमन्त्री बतलाया था। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन मोदी को बेहतर प्रधान मन्त्री नहीं मानते ऐसा उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था। उनके विचार से मुस्लिमों में उनकी स्वीकार्यता संदिग्ध हो सकती है जबकि जगदीश भगवती और अरविन्द पानगढ़िया को मोदी का अर्थशास्त्र बेहतर लगता है। योग गुरु स्वामी रामदेव व मुरारी बापू जैसे कथावाचक ने नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया।

पार्टी की ओर से पीएम प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद नरेन्द्र मोदी ने पूरे भारत का भ्रमण किया। इस दौरान तीन लाख किलोमीटर की यात्रा कर पूरे देश में ४३७ बड़ी चुनावी रैलियाँ, ३-डी सभाएँ व चाय पर चर्चा आदि को मिलाकर कुल ५८२७ कार्यक्रम किये। चुनाव अभियान की शुरुआत उन्होंने २६ मार्च २०१४ को मां वैष्णो देवी के आशीर्वाद के साथ जम्मू से की और समापन मंगल पाण्डे की जन्मभूमि बलिया में किया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भारत की जनता ने एक अद्भुत चुनाव प्रचार देखा। यही नहीं, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने २०१४ के चुनावों में अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की।


परिणाम

चुनाव में जहाँ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ३३६ सीटें जीतकर सबसे बड़े संसदीय दल के रूप में उभरा वहीं अकेले भारतीय जनता पार्टी ने २८२ सीटों पर विजय प्राप्त की। काँग्रेस केवल ४४ सीटों पर सिमट कर रह गयी और उसके गठबंधन को केवल ५९ सीटों से ही सन्तोष करना पड़ा। नरेन्द्र मोदी स्वतन्त्र भारत में जन्म लेने वाले ऐसे व्यक्ति हैं जो सन २००१ से २०१४ तक लगभग १३ साल गुजरात के १४वें मुख्यमन्त्री रहे और हिन्दुस्तान के १५वें प्रधानमन्त्री बने।

एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि नेता-प्रतिपक्ष के चुनाव हेतु विपक्ष को एकजुट होना पड़ेगा क्योंकि किसी भी एक दल ने कुल लोकसभा सीटों के १० प्रतिशत का आँकड़ा ही नहीं छुआ।


भाजपा संसदीय दल के नेता निर्वाचित

२० मई २०१४ को संसद भवन में भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित भाजपा संसदीय दल एवं सहयोगी दलों की एक संयुक्त बैठक में जब लोग प्रवेश कर रहे थे तो नरेन्द्र मोदी ने प्रवेश करने से पूर्वसंसद भवन को ठीक वैसे ही जमीन पर झुककर प्रणाम किया जैसे किसी पवित्र मन्दिर में श्रद्धालु प्रणाम करते हैं। संसद भवन के इतिहास में उन्होंने ऐसा करके समस्त सांसदों के लिये उदाहरण पेश किया। बैठक में नरेन्द्र मोदी को सर्वसम्मति से न केवल भाजपा संसदीय दल अपितु एनडीए का भी नेता चुना गया। राष्ट्रपति ने नरेन्द्र मोदी को भारत का १५वाँ प्रधानमन्त्री नियुक्त करते हुए इस आशय का विधिवत पत्र सौंपा। नरेन्द्र मोदी ने सोमवार २६ मई २०१४ को प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली।


वडोदरा सीट से इस्तीफ़ा दिया

नरेन्द्र मोदी ने २०१४ के लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक अन्तर से जीती गुजरात की वडोदरा सीट से इस्तीफ़ा देकर संसद में उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट का प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया और यह घोषणा की कि वह गंगा की सेवा के साथ इस प्राचीन नगरी का विकास करेंगे।


भारत के प्रधानमन्त्री

ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह

मुख्य लेख : नरेन्द्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह

नरेन्द्र मोदी का २६ मई २०१४ से भारत के १५वें प्रधानमन्त्री का कार्यकाल राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में आयोजित शपथ ग्रहण के पश्चात प्रारम्भ हुआ। मोदी के साथ ४५ अन्य मन्त्रियों ने भी समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ ली। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सहित कुल ४६ में से ३६ मन्त्रियों ने हिन्दी में जबकि १० ने अंग्रेज़ी में शपथ ग्रहण की।समारोह में विभिन्न राज्यों और राजनीतिक पार्टियों के प्रमुखों सहित सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया। इस घटना को भारतीय राजनीति की राजनयिक कूटनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

सार्क देशों के जिन प्रमुखों ने समारोह में भाग लिया उनके नाम इस प्रकार हैं।

अफ़्गानिस्तान – राष्ट्रपति हामिद करज़ई
बांग्लादेश – संसद की अध्यक्ष शिरीन शर्मिन चौधरी
भूटान – प्रधानमन्त्री शेरिंग तोबगे
मालदीव – राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम
मॉरिशस – प्रधानमन्त्री नवीनचन्द्र रामगुलाम
नेपाल – प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला
पाकिस्तान – प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ़
श्रीलंका – प्रधानमन्त्री महिन्दा राजपक्षे

ऑल इण्डिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्ना द्रमुक) और राजग का घटक दल मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कझगम (एमडीएमके) नेताओं ने नरेन्द्र मोदी सरकार के श्रीलंकाई प्रधानमंत्री को आमंत्रित करने के फैसले की आलोचना की। एमडीएमके प्रमुख वाइको ने मोदी से मुलाकात की और निमंत्रण का फैसला बदलवाने की कोशिश की जबकि कांग्रेस नेता भी एमडीएमके और अन्ना द्रमुक आमंत्रण का विरोध कर रहे थे। श्रीलंका और पाकिस्तान ने भारतीय मछुवारों को रिहा किया। मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित देशों के इस कदम का स्वागत किया।

इस समारोह में भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित किया गया था। इनमें से कर्नाटक के मुख्यमंत्री, सिद्धारमैया (कांग्रेस) और केरल के मुख्यमंत्री, उम्मन चांडी (कांग्रेस) ने भाग लेने से मना कर दिया। भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे अधिक सीटों पर विजय प्राप्त करने वालीतमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने समारोह में भाग न लेने का निर्णय लिया जबकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी ने अपनी जगहमुकुल रॉय और अमित मिश्रा को भेजने का निर्णय लिया।

वड़ोदरा के एक चाय विक्रेता किरण महिदा, जिन्होंने मोदी की उम्मीदवारी प्रस्तावित की थी, को भी समारोह में आमन्त्रित किया गया। अलवत्ता मोदी की माँ हीराबेन और अन्य तीन भाई समारोह में उपस्थित नहीं हुए, उन्होंने घर में ही टीवी पर लाइव कार्यक्रम देखा. 


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