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Saturday, January 19, 2019

VAISHYA - वैश्य ~ the Backbone of India's economy

VAISHYA - वैश्य ~ the Backbone of India's economy


अंग्रेजों के आने से पहले तक हमारा देश इतना धनी और समृद्ध था कि इसे सोने का चिङियां कहा जाता था।भारत को सोने के चिङियां बनाने में इन्हीं वैश्य समुदाय का योगदान जाता है। द्वारा तमाम लूट-खसोट के बाद भी वैश्य समाज के मेहनत के बदौलत 16 वीं शताब्दी तक भारत तब भी दुनिया का सबसे अधिक धनी देश था।अकेले भारत के GDP ग्रोथ इतना ज्यादा था जितना पुरे युरोप का था।तो यह उपलब्धि हमारे वैश्य समाज के बदौलत थी। यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत #मैगस्थनीज ने वैश्य समाज की विरासत की प्रशंसा में लिखा है कि- "देश में भरण- पोषण के प्रचुर साधन तथा उच्च जीवन-स्तर, विभिन्न कलाओं का अभूतपूर्व विकास और पूरे समाज में ईमानदारी, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा प्रचुर उत्पादन वैश्यों के कारण है।" 

#द्विज_वर्ण - ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य आर्यों के द्विज वर्ण हैं । वैश्यों के ब्राह्मणों और क्षत्रियों के साथ गुरुकुल शिक्षा, उपनयन संस्कार , शिखा, सूत्र धारण करने का अधिकार है । ब्राह्मण की उपाधि शर्मा है , क्षत्रिय की वर्मा और वैश्य की गुप्त । ब्राह्मणों की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के मस्तक से हुई , क्षत्रिय की भुजाओं से और वैश्यों की *उदर से । ब्राह्मण देश की मेधाशक्ति हैं क्षत्रिय देश की रक्षा शक्ति और वैश्य देश की अर्थ शक्ति । एक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा से ब्राह्मण , शिव-शक्ति से क्षत्रिय और विष्णु से वैश्य (अर्थात विष्णु की तरह अन्नदाता , लक्ष्मीवान और पालक ) ।

*कृषि, वाणिज्य और गौपालन से ही समाज की उदर पूर्ति होती है ।

#कर्तव्य - 

विष्णु संहिता में लिखा है - क्षमा , सत्य , दम , शौच , दान , इन्द्रिय संयम , अहिंसा , गुरुसेवा , तीर्थपर्यटन , सरलता , लोभत्याग , देवब्राह्मण पूजा , और निंदा का त्याग ये वैश्य जाती के साधारण धर्म हैं । 

#मनुस्मृति के अनुसार अध्ययन, कृषि, वाणिज्य, पशु रक्षा, दान देना और कुसीन्द वैश्यों के प्रमुख कार्य हैं । 

"पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च ।
वणिक पथम कुसीदं च वैश्यश्च कृषिमेव च ।।" 

श्री वामन पुराण में भी बताया गया है - 

"यज्ञाध्ययन-सम्पन्नता दातारः कृषिकारिणः ।
पशुपालयं प्रकुर्वन्तु वैश्य विपणीजीविनः ।।"

वैश्यगण यज्ञाध्ययन से सम्पन्न दाता , कृषिकर्ता व वाणिज्य जीवी हों । तथा पशुपालन का कर्म करें । 

#महाभारत में उल्लेख आया है कि सर्वादिक धनाढ्य होने के कारण राज्य को #सर्वादिक_कर देने वाला वैश्य वर्ग ही था । "उपातिष्ठनत कौन्तेयं वैश्य इव कर प्रदः ।"

#नाम_व_उपाधियां - वैश्य शब्द का संस्कृत पर्याय उरुव्य , उरूज , भुमीजीवी , वट , द्विज , वार्तिक , सार्थवाह , वणिक , पणिक है । 

आदि जगत के इतिहास में जिस फिणिक (फिनिशन्स) नामक जिस प्राचीन जाती का उल्लेख है वह ऋक सहिंता की पणि नाम की जाती का अपभ्रंश है । (तं गूर्तयोने मनिषः परिणसः समुद्रं न संचरने सनिस्पवः) । इस मंत्र में धनार्थी पणिगण समुद्र व सागरद्वारा यात्रा करके व्यापार करते थे ।

वैश्य वर्ण के लिए बौद्ध साहित्य में वेस्स , गृहपति , सेट्टी , कुटुम्भिक , आदि शब्द मिलते हैं । इसके अलावा बौद्ध काल मे वैश्य गृहपति भी कहे जाते थे । सेट्टी अथवा सेठ (बड़े व्यापारी) के साथ वह बैंकपति और सार्थवाह भी थे । सार्थवाह दूरस्थ प्रदेशों की यात्रा करके व्यापार करते थे । 

वैश्यों को महाजन, सेठ, नगरसेठ, धन्नासेठ, जगतसेठ आदि उपाधियों से भी सम्मानित किया जाता था । जो श्रेष्ठ से बनी है । और संस्कृत शब्दकोश में साधु शब्द जिससे साहू या शाह बना वो भी व्यापारियों के लिए प्रयोग होता था ।

#राजतंत्र_में_वैश्य -

महाभारत कालीन मंत्रिमंडल में सर्वादिक 21 मंत्री पद वैश्यों के लिए थे । महाभारत शान्तिपर्व में राजधर्मानुशासन पर्व के ८५वें अध्याय श्लोक ७-११ में पितामह भीष्म ने 'धर्मराज' युधिष्टिर को उपदेश देते हुए मंत्रिमंडल के आकार के विषय में कहा - "राजा के मंत्रिमंडलं में 4 वेदपाठी ब्राह्मण, 8 क्षत्रिय, 21 धन धान्य से सम्पन्न वैश्य, 3 शूद्र 1 सूत को मंत्रिमंडल में सम्मिलित करें ।" 

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार क्षत्रिय राजतंत्र और वैश्य ग्राम व्यवस्था संभालते थे ग्राम प्रधान बनकर । 

#आधुनिक_काल_और_मध्य_काल_में_वैश्य_जाती ~

इस समयखण्ड में भी वैश्य जाती का भारत के उत्थान और हिन्दू धर्म के लिए में अभुत्व पूर्ण योगदान रहा है । 

◆ कई इतिहासकारों के अनुसार #गुप्तकाल जो भारत का स्वर्णिम काल कहा जाता है जिसमें हिन्दू धर्म का चतुर्दिश उत्थान हुआ वो वैश्य थे । 
◆कई वैश्य जातियां जैसे अग्रवाल , रस्तोगी और बर्णवाल इत्यादि प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था से निकली हैं। सिद्धार्थ गौतम भी शाक्य गणतंत्र के थे । पाणिनि की अष्टाध्यायी , जैन व बौद्ध ग्रंथों में लिछवि, वैशाली , मालव आदि गणराज्यों का उल्लेख है । अग्रवाल जिस प्राचीन गणतंत्र के थे 'आग्रेय' वो महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार यौधेयों के गणतंत्र का एक अंग था जो भारत की द्वितीय रक्षा प्रणाली था गुप्त काल तक । यौधेयों ने अनेकों वर्षों तक हमें विदेशी शक, हूण आक्रमणकारियों से बचाया था । सिकंदर से भी युद्ध में आग्रेय गणराज्य ने भाग लिया था । आग्रेय गणराज्य का जिक्र महाभारत में मालव और रोहतगी गणराज्यों के साथ आया है । इसे महाराज अग्रसेन ने बसाया था ।
◆ मध्यकाल में वैश्य रजवाड़ों में ऊंचे और बड़े पदों पे थे जिनका युद्ध मे भाग लेना भी इतिहास में दर्ज है । उदाहरणतः मारवाड़ी वैश्य भामाशाह महाराणा प्रताप के प्रधान मंत्री, अच्छे मित्र व सलाहकार थे । 
◆हिन्दू धर्म की संजीवनी गीताप्रेस गोरखपुर दो मारवाड़ी अग्रवालों हनुमान प्रसाद पोद्दार और जयदयाल गोयनका जी की दें थी जिसने घर घर में हमारे धर्म शास्त्र पहुंचाए । ◆भारतीय ISRO जिसने कई महत्वपूर्ण मिशन में अपने झंडे गाड़ें हैं उसके संस्थापक एक गुजराती जैन बनिया 'विक्रम साराभाई' थे । 
◆आज वैश्य समाज भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ हैं ।


लेख साभार: प्रखर अग्रवाल की फेसबुक वाल से साभार 

Sunday, January 13, 2019

Chirag Jain : चिराग़ जैन


जन्म : 27 मई 1985; नई दिल्ली

शिक्षा : स्नातकोत्तर (जनसंचार एवं पत्रकारिता)

पुरस्कार एवं सम्मान

1) भाषादूत सम्मान (हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार) 2016

2) सारस्वत सम्मान (जानकी देवी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) 2016

3) शब्द साधक सम्मान (राॅटरी क्लब, अपटाउन, दिल्ली) 2016

4) लेखक सम्मान (लेखक व पत्रकार संघ, दिल्ली) 2014

5) हिन्दी सेवी सम्मान (भारत विकास परिषद्, नई दिल्ली) 2014

6) कविहृदय सम्मान (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) 2013

7) छुपा रुस्तम सम्मान (वाह-वाह क्या बात है, सब टीवी) 2013

प्रकाशन

कोई यूँ ही नहीं चुभता; काव्य-संग्रह; शिल्पायन प्रकाशन

ओस; काव्य-संकलन; पाँखी प्रकाशन

मन तो गोमुख है; काव्य-संग्रह; पाँखी प्रकाशन

जागो फिर एक बार; काव्य-शोध; राष्ट्रीय कवि संगम

पहली दस्तक; काव्य-संकलन; पाँखी प्रकाशन

दूसरी दस्तक;काव्य-संकलन; पाँखी प्रकाशन

निवास : नई दिल्ली

“27 मई 1985 को दिल्ली में जन्मे चिराग़ पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘हिन्दी ब्लॉगिंग’ पर शोध कर रहे हैं। ब्लॉगिंग जैसा तकनीकी विषय अपनी जगह है और पन्नों पर उतरने वाली संवेदनाओं की चुभन और कसक की नमी अपनी जगह। कवि-सम्मेलन के मंचों पर एक सशक्त रचनाकार और कुशल मंच संचालक के रूप में चिराग़ तेज़ी से अपनी जगह बना रहे हैं।

चिराग़ की रचनाओं में निहित पात्र का निर्माण एक भारतीय मानस् की मानसिक बनावट के कारण हुआ है, जिसे पगने, फूलने में सैकड़ों वर्ष लगे हैं। एक स्थिर व्यक्तित्व का चेहरा, जिसका दर्शन हमें पहली बार इनकी रचनाओं में होता है।

एक चेहरे का सच नहीं, एक सच का चेहरा! जिसे चिराग़ ने गाँव, क़स्बों और शहरों के चेहरों के बीच गढ़ा है। औपनिवेशिक स्थिति में रहने वाले एक हिन्दुस्तानी की आर्कीटाइप छवि शायद कहीं और यदा-कदा ही देखने को मिले। एक सच्चा सच चिराग़ की रचनाओं में जीवन्त और ज्वलंत रूप में विद्यमान है कि उसकी प्रतिध्वनि सदियों तक सुनाई देगी।

चिराग़ की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनमें हिमालय-सी अटलता भी है और गंगा-सा प्रवाह भी। चिराग़ की रचनाओं के कॅनवास पर दूर तक फैला हुआ एक चिन्तन प्रदेश मिलता है, सफ़र का उतार-चढ़ाव नहीं, मील के पत्थर नहीं कि जिन पर एक क्षण बैठकर हम रचनाकार के पद-चिन्हों को ऑंक सकें कि कहाँ वह ठिठका था, कौन-सी राह चुनी थी, किस पगडंडी पर कितनी दूर चलकर वापस मुड़ गया था। हमें यह भी नहीं पता चलता कि किस ठोकर की आह और दर्द उसके पन्नों पर अंकित है।

चिराग़ की रचनाओं को पढ़कर लगता है कि वह ग़रीबी की यातना के भीतर भी इतना रस, इतना संगीत, इतना आनन्द छक सकता है; सूखी परती ज़मीन के उदास मरुथल में सुरों, रंगों और गंध की रासलीला देख सकता है; सौंदर्य को बटोर सकता है और ऑंसुओं को परख सकता है। किन्तु उसके भीतर से झाँकती धूल-धूसरित मुस्कान को देखना नहीं भूलता।

नई पीढ़ी का सटीक प्रतिनिधित्व कर रहे चिराग़ को पढ़ना, वीणा के झंकृत स्वरों को अपने भीतर समेटने जैसा है। इस रचनाकार का पहला काव्य-संग्रह ‘कोई यूँ ही नहीं चुभता’ जनवरी 2008 में प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त चिराग़ के संपादन में ‘जागो फिर एक बार’; ‘भावांजलि श्रवण राही को’ और ‘पहली दस्तक’ जैसी कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में चिराग़ की रचनाएँ चार रचनाकारों के एक संयुक्त संकलन ‘ओस’ में प्रकाशित हुई हैं।” –परिचय लेखक- नील

साभार : kavyanchal.com/chirag-jain

ADITI GUPTA - अदिति गुप्ता


अदिति गुप्ता, जन्म २१ अप्रैल, १९८८, एक भारतीय टेलीविज़न अभिनेत्री हैं। अदिति ने अपना स्वप्निल प्रथम-अभिनय बालाजी टेलीविज़न के 'किस देश में है मेरा दिल' नामक कार्यक्रम में हर्षद चोपड़ा के विपर्यय स्वरूप किया था जब वे केवल १९ वर्ष की थीं। उनका गृहनगर पुणे है और वे एक व्यवहार अभिकल्पक (फैशन डिजाइनर) बनना चाहती थीं, लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बदलीं की उन्हें मुख्य भूमिका निभाने का अवसर मिल गया।

रोमन लिपि में अदिति का नाम Aditi ना लिखकर Additi लिखा जाता है। इसका हिन्दी में नाम इस प्रकार बनेगा 'अद्दिति'। यह इसलिए क्योंकि बालाजी टेलीविज़न की स्वामी एकता कपूर का अंकज्योतिष में बहुत विश्वास है और इसलिए उन्होंने नाम में एक अतिरिक्त d जोड़ दिया है। अदिति का कहना है कि वे अपने अभिनय-पात्र हीर से बिल्कुल विपरीत हैं और बहिर्मुखी हैं और लड़कों से इश्कबाज़ी करना पसंद करती हैं। व्यवसाय से अदिति पुणे से एक व्यवहार अभिकल्पक हैं।

अभी वह बालाजी टेलीफ़िल्म्स के धरावाहिक किस देश में है मेरा दिल में हीर नाम की लड़की की मुख्य भूमिका निभा रही हैं। वृतांतों पर उन्होनें विभिन्न प्रदर्शन किए हैं, जैसे स्टार परिवार अवार्डस, स्टार प्लस के रंग दे इंडिया वृतांत, बालाजी के दिवाली रिश्तों की इत्यादि। उन्होनें कैमिया (अतिथि भूमिका) भुमिकाएं भी निभाई हैं जैसे कयामथ में और बालाजी के कार्यक्रम कसौटी जिंदगी की के अंतिम धारावाहिक में।

वर्तमान परियोजनाएं 
किस देश में है मेरा दिल - हीर मान / जुनेजा 
कैमिया
पुरस्कार 
रिलायंस मोबाइल स्टार परिवार अवार्डस २००८ (पसंदीदा योग्य जोड़ी, हर्षद मेहता के साथ बतौर हीर मान) 
न्यू टैलेंट अवार्डस २००८ (परदे पर सर्वश्रेष्ठ दंपत्ति हर्षद दोपड़ा के साथ बतौर हीर मान) 
स्टार परिवार अवार्डस २००९ (पसंदीदा जोड़ी, हर्षद चोपड़ा के साथ बतौर हीर मान / जुनेजा) 
गौण बातें 
अदिति को संगीत सुनना पसंद है, उन्हें पश्विमी परिधान पसंद हैं, उनका पसंदीदा गाना है "भीगी-भीगी रातों में"। 
अदिति का सबसे अच्छा मित्र उनका लैपटॉप है। वह अपना खाली समय अपने लैपटॉप पर बिताना पसंद करती है। उनके लैपटॉप पर उनकी बहुत-सी गूढ़ बातें हैं जिन्हें वे किसी के साथ नहीं बाँटती हैं। 
अदिति सदैव एक व्यवहार अभिकल्पक बनना चाहती थीं और उन्होंने कभी नहीं सोचा था की वे कभी अभिनेत्री बनेंगी। 
अदिति का कहना है कि वे अपने अभिनय-पात्र हीर जैसी नहीं हैं और उन्हें लड़कों के साथ इश्कबाज़ी करना पसंद है। 

महालक्ष्मी का महाराज अग्रसेन को अग्रकुल की कुलदेवी होने का वर

महालक्ष्मी का महाराज अग्रसेन को अग्रकुल की कुलदेवी होने का वर 

पद्मासने स्थिते देवी परब्रह्म स्वरूपिणी ।

परमेशी जगन्मातः महालक्ष्मी नमोस्तुते ।।

आज मार्गशीष पूर्णिमा को श्री हरिप्रिया महालक्ष्मी जी ने महाराज अग्रसेन को तृतीय और अंतिम वर दिया था। इसे अग्रवाल समाज महालक्ष्मी वरदान पर्व के रूप में मनाता है। अग्रसेन अपने पुत्र विभु को आग्रेय का राज्य सौंपकर महारानी माधवी के साथ वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार कर तपस्चर्या करने चले गए । चलते चलते वो यमुना तट पर पहुंचे और वहां यमुना जी मे गोते लगाकर मन को एकाग्र करके , संक्षिप्त जप आदि का कर्म पूर्ण किया और वहां यमुना तट के महर्षियों द्वारा कहीं गईं कथाओं गाथाओं को सुनने लगे । तदोपरांत महाराज अग्रसेन और महारानी माधवी ने उत्तम तपस्या का अनुष्ठान प्रारम्भ किया और त्रिभुवन अधीश्वरी देवी महालक्ष्मी का स्तवन किया । अग्र-माधवी ने जगतपिता ब्रह्मा जी द्वारा रचित सैंकड़ों मंत्रों से श्रध्दापूर्वक महालक्ष्मी का पूजन किया । उन्होंने वर्षों तक एक पैर पे खड़े रहकर दुर्धर योग का अनुष्ठान किया ऐसे कठोर व्रत का पालन करते हुए उन दोनों का शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था और उनका शरीर, चमड़े से ढकी हड्डियों का ढांचा मत्र राह गया था । उनके इस कठोर तप से प्रसन्न होकर साक्षात महालक्ष्मी कमल दल पे विराजमान होकर प्रकट हुईं । और उन्हें अग्रकुल की कुलदेवी होने का वर दिया ।

श्री उवाच

भविष्यति प्रसादन्मे वंशास्ते तेजसंविताः।
परित्राणाय लोकानं सत्यमेदत् ब्रवीमि ते।।

श्री लक्ष्मी ने कहा- हे अग्र! मेरी कृपा से तुम्हारा वंश , स्वयं तुम्हारे तेज से परिपूर्ण होगा , जो तीनों लोकों के संकटों से संसार के लोगों को मुक्ति दिलाएगा , मैं तुमसे ये सत्यवचन कहती हूं।

तव तुष्टा प्रदास्यमि राज्यमायुर्वपूः सुतान्।
न तेसाम दुर्लभं किश्चिदस्मिनलोके भविष्यति।।

हे अग्र ! तुम्हारे वंश द्वारा संतुष्ट होने पर मैं उन्हें राज्य, दीर्घायु, निरोगी शरीर, व श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करूंगी और तब उनके लिए संसार मे कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ।

पूज्यस्व कुले नित्यं सोअग्रवंशो भविष्यति।
कुलेम् ते न वियोक्ष्यामि यावच्चंद्रादिवाकारं।।

हे अग्र ! जिस कुल में मेरी नित्य पूजा होती हो ऐसा तुम्हारा अग्रवंश होगा , मैं तुम्हे वचन देती हूं जब तक सूरज और चंद्र विद्यमान है मैं पूजित होने पे तुम्हारे कुल का परित्याग नहीं करूंगी ।

😊😊 जय कुलदेवी महालक्ष्मी जय श्रीमन नारायण 😊😊

महाराजा अग्रसेन पर मालदीव में डाक टिकट


साभार: वैश्य वैभव 

VAISHYA GURUMATH HALDIPUR - वैश्य गुरु मठ हल्दीपुर






साभार: वैश्य भारती पत्रिका 

भारतेंदु हरिश्चंद्र: आधुनिक हिंदी के पितामह जिनकी जिंदगी लंबी नहीं बड़ी थी

भारतेंदु हरिश्चंद्र: आधुनिक हिंदी के पितामह जिनकी जिंदगी लंबी नहीं बड़ी थी


भारतेंदु हरिश्चंद्र को केवल 35 वर्ष की आयु मिली, लेकिन इतने ही समय में उन्होंने गद्य से लेकर कविता, नाटक और पत्रकारिता तक हिंदी का पूरा स्वरूप बदलकर रख दिया। हिन्दी साहित्य के माध्यम से नवजागरण का शंखनाद करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में 9 सितम्बर, 1850 को हुआ था। इनके पिता श्री गोपालचन्द्र अग्रवाल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और‘गिरिधर दास’ उपनाम से भक्ति रचनाएँ लिखते थे। घर के काव्यमय वातावरण का प्रभाव भारतेंदु जी पर पड़ा और मात्र पाँच वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना पहला दोहा लिखा।

“लै ब्यौड़ा ठाड़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान
बाणासुर की सैन्य को, हनन लगे भगवान्।।”

यह दोहा सुनकर पिताजी बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया कि तुम निश्चित रूप से मेरा नाम बढ़ाओगे। बाबू हरिश्चन्द्र बाल्यकाल से ही परम उदार थे। यही कारण था कि इनकी उदारता लोगों को आकर्षित करती थी। इन्होंने विशाल वैभव एवं धनराशि को विविध संस्थाओं को दिया है। इनकी विद्वता से प्रभावित होकर ही विद्वतजनों ने इन्हें ‘भारतेन्दु’ की उपाधि प्रदान की। अपनी उच्चकोटी के लेखन कार्य के माध्यम से ये दूर-दूर तक जाने जाते थे। इनकी कृतियों का अध्ययन करने पर आभास होता है कि इनमें कवि, लेखक और नाटककार बनने की जो प्रतिभा थी, वह अदभुत थी। ये बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार थे।

भारतेन्दु जी के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। उन्होंने देश के विभिन्न भागों की यात्रा की और वहाँ समाज की स्थिति और रीति-नीतियों को गहराई से देखा। इस यात्रा का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे जनता के हृदय में उतरकर उनकी आत्मा तक पहुँचे। इसी कारण वह ऐसा साहित्य निर्माण करने में सफल हुए, जिससे उन्हें युग-निर्माता कहा जाता है। 16 वर्ष की अवस्था में उन्हें कुछ ऐसी अनुभति हुई, कि उन्हें अपना जीवन हिन्दी की सेवा में अर्पण करना है। आगे चलकर यही उनके जीवन का केन्द्रीय विचार बन गया। उन्होंने लिखा है –

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान कै, मिटे न हिय को सूल।।”

भारतेंदु ने हिन्दी में ‘कवि वचन सुधा’ पत्रिका का प्रकाशन किया। वे अंग्रेजों की खुशामद के विरोधी थे। पत्रिका में प्रकाशित उनके लेखों में सरकार को राजद्रोह की गन्ध आयी। इससे उस पत्र को मिलने वाली शासकीय सहायता बन्द हो गयी; पर वे अपने विचारों पर दृढ़ रहे। वे समझ गये कि सरकार की दया पर निर्भर रहकर हिन्दी और हिन्दू की सेवा नहीं हो सकती।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की राष्ट्रीय भावना का स्वर ‘नील देवी’ और ‘भारत दुर्दशा’ नाटकों में परिलक्षित होता है। अनेक साहित्यकार तो भारत दुर्दशा नाटक से ही राष्ट्र भावना के जागरण का प्रारम्भ मानते हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनेक विधाओं में साहित्य की रचना की। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर पण्डित रामेश्वर दत्त व्यास ने उन्हें ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से विभूषित किया।

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। जिस समय भारतेंदु हरिश्चंद्र का अविर्भाव हुआ, देश ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ी चरमोत्कर्ष पर थी। शासन तंत्र से सम्बन्धित सम्पूर्ण कार्य अंग्रेज़ी में ही होता था। अंग्रेज़ी हुकूमत में पद लोलुपता की भावना प्रबल थी। भारतीय लोगों में विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण था। ब्रिटिश आधिपत्य में लोग अंग्रेज़ी पढ़ना और समझना गौरव की बात समझते थे। हिन्दी के प्रति लोगों में आकर्षण कम था, क्योंकि अंग्रेज़ी की नीति से हमारे साहित्य पर बुरा असर पड़ रहा था। हम ग़ुलामी का जीवन जीने के लिए मजबूर किये गये थे। हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा था। ऐसे वातावरण में जब बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र अवतारित हुए तो उन्होंने सर्वप्रथम समाज और देश की दशा पर विचार किया और फिर अपनी लेखनी के माध्यम से विदेशी हुकूमत का पर्दाफ़ाश किया।



भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी में नाटक विधा तथा खड़ी बोली के जनक माने जाते हैं। साहित्य निर्माण में डूबे रहने के बाद भी वे सामाजिक सरोकारों से अछूते नहीं थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा का सदा पक्ष लिया। 17 वर्ष की अवस्था में उन्होंने एक पाठशाला खोली, जो अब हरिश्चन्द्र डिग्री कालिज बन गया है। यह हमारे देश, धर्म और भाषा का दुर्भाग्य रहा कि इतना प्रतिभाशाली साहित्यकार मात्र 35 वर्ष की अवस्था में ही काल के गाल में समा गया। इस अवधि में ही उन्होंने 75 से अधिक ग्रन्थों की रचना की, जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इनमें साहित्य के प्रत्येक अंग का समावेश है।

प्रख्यात साहित्यकार डा. श्यामसुन्दर व्यास ने लिखा है – जिस दिन से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने भारत दुर्दशा नाटक के प्रारम्भ में समस्त देशवासियों को सम्बोधित कर देश की गिरी हुई अवस्था पर आँसू बहाने को आमन्त्रित किया, इस देश और यहाँ के साहित्य के इतिहास में वह दिन किसी अन्य महापुरुष के जन्म-दिवस से किसी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं है। 

बाबू मोशाय!!! जिंदगी लंबी नहीं…बड़ी होनी चाहिए…!’ यह डायलॉग 1971 की चर्चित फिल्म ‘आनंद’ का है. फिल्म में कैंसर के मरीज बने राजेश खन्ना ने जिंदगी का यह फलसफा अपने दोस्त अमिताभ बच्चन को दिया था. लेकिन यह फलसफा हिंदी साहित्य की महान विभूति भारतेंदु हरिश्चंद्र पर भी सटीक बैठता है. उन्होंने सिर्फ 34 साल चार महीने की छोटी सी आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन दुनिया छोड़ने से पहले वे अपने क्षेत्र में इतना कुछ कर गए कि हैरत होती है कि कोई इंसान इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ कैसे कर सकता है. हमें मालूम हो या न हो लेकिन यह सच है कि आज का हिंदी साहित्य जहां खड़ा है उसकी नींव का ज्यादातर हिस्सा भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली ने खड़ा किया था. उनके साथ ‘पहली बार’ वाली उपलब्धि जितनी बार जुड़ी है, उतनी बहुत ही कम लोगों के साथ जुड़ पाती है. इसलिए कई आलोचक उन्हें हिंदी साहित्य का महान ‘अनुसंधानकर्ता’ भी मानते हैं.

साभार: theanalyst.co.in/bhartendu-harishchandra

SHRIDDHA SAHU - श्रद्धा साहू

MISHIKA CHOURASIA - मिशिका चौरसिया

फिल्म में मेरा सलेक्शन बिना ऑडिशन के हुआ- मिशिका चौरसिया


पहलाज निहलानी की फिल्म ‘ रंगीला राजा’ से तीन लड़कियों ने डेब्यु किया है। उनमें से एक का नाम है मिशिका चौरसिया। मिशिका का जन्म नागपूर में हुआ और उसकी पढ़ाई लिखाई हुई बैंगलुरू में। एक्टिंग के बारे में कभी न सोचने वाली मिशिका का फिर किस तरह आगमन हुआ बॉलीवुड में। बता रही है, इस मुलाकात में।

बकौल मिशिका मैं नागपुर से हूं लेकिन बाद में बैंगलुरू चली गई। एक्टिंग को लेकर मैने नहीं सोचा था। लेकिन बाद में कुछ ऐसा हुआ कि मुझे इस लाइन में आना पड़ा। इसके लिये मैने पहले न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी से एक्टिंग का कोर्स किया। उसके बाद मुंबई आ गई। यहां आने के बाद मैंने टी-सीरीज के साथ दो तीन म्यूजिक वीडियोज किये।

एक दिन मेरे अंकल के तहत मेरा पहलाज जी से उनके ऑफिस में मिलना हुआ। हमने उनकी फिल्मों के बारे में बातें की लेकिन मैने अपने काम की उनसे कोई बात नहीं की और जब हम निकलने लगे तो पहलाज जी ने कहा कि अपनी कुछ फोटोज मुझे भेजना। मैने अपने पिक्स भेज दिये। करीब पंद्रह दिन बाद पहलाज जी का फोन आया कि कल ऑफिस आ जाओ, आपका मेजरमेन्ट लेना है। मैं हैरान थी कि उन्होंने मेरे बारे में मुझसे कुछ भी नहीं पूछा फिर कैसा मेजरमेंट। खैर मैं अगले दिन उनके ऑेफिस गई तो वो पूरा भरा हुआ था। उस वक्त वहां डासरेक्टर समेत कू्र का हर मेंबर मौंजूद था। मेरा मेजरमेंट हुआ, उसके बाद सर ने मुझे पूरी कहानी न बताते हुये मुझे मेरे रोल की वन लाइन सुनाई। इसके बाद मुझे फिल्म के लिये साइन कर लिया। दरअसल सर ऑडिषन में बिलीव नहीं करते, उनका कहना हैं कि पांच मिनीट के ऑडिशन में कैसे एक्टर की पहचान हो सकती है। इसलिये मैं कह सकती हूं कि मुझे बिना ऑडिशन की ये फिल्म मिली। उसके पंदरह दिन बाद कर्जत में इस फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई थी। 


किरदार यही है कि ये एक वर्किगं वूमन है जो काफी स्ट्रांग है। वो काफी बबली है। सबसे अहम बात ये है कि जब मेरी एन्ट्री होती है इसके बाद ही सारे ड्रामे और तमाशे शुरू हो जाते हैं। गोविंदा डबल रोल में हैं और उनकी बीवी और गर्लफ्रेंड है। मैं किसी के साथ नहीं हूं फिर भी दोनों के साथ हूं।

गोविंदा जी की फिल्में देखकर मैं बड़ी हुई हूं। दूसरे सुपर स्टार सुपर स्टार ही होता है। वो फिल्में करे या न करें। उसके कॅलीबर और उसके टेलेंट पर कोई फर्क नहीं पड़ता। कहा जाता है आफ्टर दिलीप कुमार गोविंदा ही एक ऐसा एक्टर हैं जिसे कंपलीट एक्टर कहा जा सकता है। मैने देखा है उनका टेलेंट जो पिक्चर में दिखाई देता है उससे कहीं ज्यादा है। इसी फिल्म के दौरान मैने देखा कि एक ही षॉट वे दस अलग अलग तरीके से दिखा सकते है उन्होंने अपना वैरियेशन रिपीट नहीं किया। जबकि हम तो एक बार ही कर ले तो बहुत बड़ी बात है। मेरा पहला ही सीन उनके साथ करीब तीन मिनिट बीस सैकेंड का था, जो एक टेक में ओ के हो गया। हालांकि इससे पहले कुछ रिहर्स्रल जरूर हुई थी। मुझे कैमरे से डर वर नहीं लगता दूसरे मेरी मैमोरी बहुत शार्प है इसलिये डायलॉग्स याद करने के मेरे साथ कोई प्राब्लम नहीं थी । मुझे हां पहलाज जी का सपोर्ट, गोविंदा जी का सपोर्ट तो था ही लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि मैने मास्टर शॉट वन टेक में कंपलीट कर दिया। सभी शॉक्ड थे। कि एक नई लड़की ऐसा कैसे कर सकती है।


उनकी इमेज पता नहीं क्यों ऐसी बना दी गई वरना बहुत ही अच्छे इंसान हैं शक्ति सर। पूरी शूटिंग के दौरान अपनी इमेज के मुताबिक उन्होंने एक प्रतिशत भी ऐसी हरकत नहीं की। उनके पास किस्सों की खजाना है, मैं उनसे लगातार किस्से सुनती रहती थी। शूटिंग के बाद हम सब देर रात तक कैरम खेलते रहते थे या और मस्ती करते रहते थे । वाकई उके साथ काम करने में जो मजा आया उसे मैं ता जिन्दगी नहीं भूल सकती ।

मिशिका का कहना हैं कि मुझे पहलाज जी ने तीन फिल्मों के लिये अनुबंधित किया हुआ है बावजूद इसके मैं बाहर भी फिल्म कर सकती हूं।

साभार: mayapuri.com/mishika-chourasia-talks-about-her-debut-film-rangeela-raja







आरके अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, नेट प्लाट प्राइवेट लिमिटेड

मां के कहने से ब्याज पर लिए 50,000 रुपये और शुरू किया बिजनेस, आज 60 करोड़ का टर्नओवर

आरके अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, नेट प्लाट प्राइवेट लिमिटेड 

हर सफलता के पीछे एक अद्भुत कहानी होती है। कानपुर शहर के उद्योगपति आरके अग्रवाल की सफलता की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। साधारण से नौकरी पेशा परिवार में जन्मे आरके अग्रवाल की मां की इच्छा थी कि उनका बेटा उद्योगपति बने। अनगिनत संघर्षों को पछाड़ते हुए आखिरकार आरके अग्रवाल ने ऐसा कर दिखाया। आज उनकी शहर में पांच औद्योगिक इकाइयां हैं। कई देशों में इनके उत्पाद निर्यात होते हैं। 60 हजार रुपये से शुरू किया काम आज 60 करोड़ के सालाना टर्नओवर में तब्दील कर दिया है। तिलक नगर निवासी आरके अग्रवाल के पिता दिवंगत रूप किशोर अग्रवाल न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी में थे। चार बेटों का परिवार और एक कमाने वाला। शुरुआती जीवन अभावों में बीता। किसी तरह उन्होंने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और बंगलुरू की एक कंपनी में नौकरी करने लगे। बेटे का नौकरी करना उनकी मां कमला अग्रवाल को पसंद नहीं आया।

मां चाहती थीं कि उनकी तरह उनके बेटे के परिवार को हर महीने वेतन का इंतजार न करना पड़े। आखिरकार मां ने एक दिन कह दिया, बेटा नौकरी नहीं करनी। तुम्हें उद्योगपति बनना है। मां के सपने को पूरा करने के लिए आरके अग्रवाल ने नौकरी छोड़ दी। उन्होंने बताया कि वेतन से बचे 10,000 रुपये और पिता से ब्याज पर लिए 50,000 रुपये से अपनी स्किल वाला उद्योग स्थापित किया। वर्ष 1978 में पनकी में किराये पर बिल्डिंग ली। रिसर्च इकाइयों के लिए इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रूमेंट बनाने की फैक्ट्री स्थापित की।

यहीं से असली संघर्ष शुरू किया। विभिन्न तरह के लाइसेंस आदि लेना बड़ा मुश्किल था। आखिरकार इस व्यवसाय में बड़ी सफलता नहीं मिली। आठ साल बाद इसे बंद कर दिया। वर्ष 1986 में प्लास्टिक और पॉलीयूरेटीन के व्यवसाय में कदम रखा। ऑटो मोबाइल कंपोनेट बनाने लगे। यह काम चल निकला। देखते देखते टाटा मोटर, स्कॉर्ट्स, सोनालिक ट्रैक्टर जैसी कंपनियां इनके उत्पादों की ग्राहक बन गईं।

आरके अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, नेट प्लाट प्राइवेट लिमिटेड

वर्तमान में ये देश की कई बड़ी ऑटो मोबाइल कंपनियों के लिए उत्पाद तैयार करते हैं। काम इतना बढ़ा कि पनकी में ही एक के बाद एक पांच उत्पादक इकाइयां स्थापित कीं। एक फैक्ट्री रूद्रपुर में भी खोली। उनका सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपये से अधिक का हो गया है। 

कुल उत्पादन का 40 फीसदी निर्यात 

आरके अग्रवाल बताते हैं कि उनके कुल उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा निर्यात होता है। इंग्लैंड, स्लोवेनिया, आयरलैंड में उत्पाद जाते हैं। वर्ष 2010 में राष्ट्रपति अवार्ड और 2012 व 2014 में राज्य सरकार से एक्सपोर्ट अवार्ड से सम्मानित भी किया गया। दिल्ली में चल रहीं लो फ्लोर बसों में उन्हीं की बनाई हुई सीटें लगी हैं। अभी हाल ही में उन्होेंने प्लास्टिक पॉली प्रोपलिन के दाने की ट्रेडिंग भी शुरू की है। 

युवाओं को संदेश 

युवा नौकरी के पीछे न भागें। यदि दिमाग में कोई बिजनेस आइडिया है तो उस पर काम करें। लगन और मेहनत से किए गए काम में सफलता मिलती है। एक बात ध्यान रखें जो भी उत्पाद बेचें या बनाएं उससे एक दिन में कमाने की न सोचें। व्यवसाय दीर्घकालीन लाभ के लिए होता है। 

साभार:प्रदीप अवस्थी , अमर उजाला, कानपुर


Monday, December 17, 2018

वैश्य समाज के बारे में कुछ जानकारी

वैश्य समाज के बारे में कुछ जानकारी,,,,,

वैश्य समाज के बारे में मुझे जानकारी देने को आवश्यता नही है ,,,

दुनियां जानती है वैश्य समाज के बारे में ,,,,,

फिर भी वैश्य समाज से अंजान या जलने वाले या घृणा करने वाले लोगों को बता रहा हूँ ये समाज के बारे में कुछ भ्रांतियां है जिन्हें दूर करना चाहता हूँ ,,,

जो लोग समाज के बारे में भ्रांतियां फैलाते है वो या तो वैश्य समाज की शख्सियत , कामयाबी से जलते है या फिर अंजान बने रहना चाहते है ,,


उन्हें बता हूँ वैश्य समाज कभी भी किसी भी समाज का अहित नही चाहता है वो सबको सम्मान देता है सभी को अपनी तरफ सुखी देखने की कामना करता है ये वो ही समाज है जो सबसे कम धन होने के बाबजूद भी अपने खर्चो में फिजूल खर्ची को खत्म करके सभी वर्गों के हितों के लिए कुछ न कुछ करता है ये वही समाज है जिसने अपने साथ-2 सभी के लिए ऐसी परम्पराए विकसित की है जिससे सभी की रोजी रोटी सुचारू रूप से चल सके ,,, फिर भी सभी ये कहते है कि वैश्य समाज ने हमारे लिए क्या किया है अरे मूर्खो ,,,,,

जो पंडित ये समझते है कि हम पूज्यनीय है तो ये मत भूलो की आज भी तुम्हारा कोई आदर कर रहा है तो वो सिर्फ वैश्य समाज की बजह से , जो तुम अहंकार दिखाते हो जरा सा ज्ञान होने का उससे ज्यादा ज्ञान तो एक तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति भी लिए फिरता है तुम्हे लेकिन जो तबज्जो मिलती है वो सब वैश्य समाज की बजह से ,,,,, वो तुम्हे अपने से भी श्रेष्ठ रखता है ,,,अन्य जातियां भी तभी तुम्हारा सम्मान करती है न तो तुम्हे कौन पूछता था ,,, वैश्य समाज ने ही हर जाति के उत्तान के लिए कुछ न कुछ परम्पराए बनाई है जैसे विवाह के अवसर पर दूल्हे की हजामत के लिए नाई , मिट्टी के बर्तनों के लिए कुम्हार,,,,हवन पूजन के लिए पंडित, काजी, ,,,,बैंड बाजे के लिए मुसलमान, खाने के लिए हलवाई, हर वर्ग को उन्नति में लाने के लिए कुछ न कुछ अवश्य रखा है फिर भी चंद चोर नेताओ , कर्मचारियों , विशेषकर फिल्म जगत के लोगों ने इस समाज के बारे में उल्टा सीधा चित्रण किया है जिसके परिणामस्वरूप ही आज हर समाज वैश्य वर्ग को घृणा की दृष्टि से देखता है बिना कुछउसके बारे में इतिहास जाने ,,,,

वो वर्ग ऐसा वर्ग है जो अपनी मेहनत - की एक-एक पाई पाई को इकट्ठा करके करोड़ो का चंदा किसी को भी दान में देता है ,,,,,,वैश्य समाज को मुझे परिचय देने की आवश्यकता नही है वो किसी परिचय का मोहताज नही है तमाम कुप्रथाओ को खत्म करने में हमेशा अग्रणी ,,,,,,,,

देश आजादी से लेकर आज तक वैश्य समाज ने जो योगदान दिया है वो अविस्मरणीय है ,,, देश आजादी में क्रांति के लिए धन बल जुटाने सेठ जमुनालाल बजाज , बिरला परिवार , देश आजादी की लड़ाई में भी वैश्य समाज के प्रमुख क्रांतिकारियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है जिसे भुलाया नही जा सकता जैसे - लाला लाजपत राय , मनमंथ गुप्ता, महात्मा गांधी, श्यामलालगुप्ता पार्षद इतियादी अनेक ऐसे जांबाजों हुए है जिनका महत्वपूर्ण योगदान है ,,,,

वैश्य समाज के संस्कारों के बारे में बात करे तो इसके कहने ही क्या है ,,,,,

बड़े से बड़े उधोयपतियों को देख लो एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अमबानी से लेकर , सुनील भारती मित्तल , वेदान्ता ग्रुप के मालिक अनिल अग्रवाल , आदित्य बिड़ला ग्रुप के मालिक इतियादी में से किसी को भी देख लो अहंकार,अभिमान छू कर भी नही गुजरा है ,,,

हमेशा राष्ट हिट में कुछ न कुछ बड़ा करते रहते है 

जैसे अगर सुनील मित्तल एयरटेल के मालिक की बात करें तो बिज़नेस यूनिवरसिटी के लिए 7000 करोड़ का चंदा देना , अनिल अमबानी का 

Bsuiness स्कूल के लिए 10000 करोड़ देना , अनिल अग्रवाल का 20000 करोड़ का दान करना अनेकों ऐसे उदाहरण है दान पुण्य के कार्यों के किस्सों में तो ये समाज अग्रणी है ही ये समाज दिखावा के लिए दान नही करता है ना ही राजनीति करने के लिए राजनीति से इस वर्ग का कोई लेना देना नही है ,,,,

इसका जीता जागता उदाहरण है मिस्टर मुकेश अमबानी एशिया के डब्से धनाढ्य व्यक्ति अपनी बेटी के शादी समारोह में सपरिवार गरीबों को , दिव्यांगों को अपने हाथों से भोजन करा रहे है इनका राजनीति से कोई लेना देना नही है ये इनके माता पिता के संस्कार है जो इनमे झलक रहे है वार्ना अपने सुना ही होगा ,,,,की पैसा , पद ,या प्रतिष्ठा अगर बढ़ती है तो इंसान का अहंकार भी बढ़ता है पर वो इन पर फिट नही बैठता है मित्रो,,,,,,, ये है हमारा वैश्य समाज और उसके संस्कार सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक के,,,,

Monday, November 5, 2018

महान स्वतन्त्रता सेनानी - नीरा आर्य

इतनी #यातनाएं दी गईं और नेहरू कहता है चरखा से आजादी मिली? #नीरा_आर्य की कहानी। जेल में जब मेरे #स्तन काटे गए ! स्वाधीनता संग्राम की #मार्मिक_गाथा। एक बार अवश्य पढ़े, नीरा आर्य (१९०२ - १९९८) की संघर्ष पूर्ण जीवनी:


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नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में #सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी |

नीरा ने अपनी एक #आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक #ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है -

5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य #आजाद_हिन्द_फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था।

इन्हें नीरा ​नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनके भाई बसंत कुमार भी आजाद हिन्द फौज में थे। इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई।

नीरा नागिन और इनके भाई बसंत कुमार के जीवन पर कई लोक गायकों ने काव्य संग्रह एवं भजन भी लिखे | 1998 में इनका निधन हैदराबाद में हुआ।

नीरा आर्य का #विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था |

नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की #जान_बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर #पति श्रीकांत जयरंजन दास की #हत्या कर दी थी।

आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में #काले_पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।

आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।

नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है - 
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से #अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।

हमें रात के 10 बजे #कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?

जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो #कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।

अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।

‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की #सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार #हथौड़ी_से_पैरों_की_हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।

मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्या #अंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’

उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ...’’ फिर मैंने उनके ऊपर #थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’

#जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा, यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’

‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’

‘‘नेताजी जिंदा हैं....झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा। 
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’

‘‘तो कहाँ हैं...।’’

‘‘मेरे #दिल में जिंदा हैं वे।’’

जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे #आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी #आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया...#लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई #पत्तियाँ_काटने के काम आता है, उस #ब्रेस्ट_रिपर को उठा लिया और मेरे #दाएँ_स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था...लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और #उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे #छाती_से_अलग कर दिए जाएँगे...’’

उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी #नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ 

#सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या #पेंशन स्वीकार नहीं की।

जय हिन्द, जय माँ भारती, वन्देमातरम !!!

(साभार अमित त्रिपाठी जी )

दीपावली - श्री महालक्ष्मी वरदान पर्व



साभार: अग्रभाग्वत 






Sunday, October 14, 2018

SAHU TELI VAISHYA HISTORY - साहू तेली वैश्य समाज का इतिहास

SAHU TELI VAISHYA HISTORY - साहू तेली वैश्य समाज का इतिहास

तेली वैश्य वानिया समुदाय एक प्राचीन और प्रतिष्ठित व्यापारिक समुदाय है, जिसका मुख्य पारंपरिक कार्य तेल निकालना और उसका व्यापार करना रहा है。 'तेली' शब्द संस्कृत के 'तैलिक' से बना है। वर्ण व्यवस्था में इन्हें वैश्य (बनिया) माना जाता है, जो सदियों से अपनी उद्यमशीलता और सामाजिक योगदान के लिए जाने जाते हैं。

तेली वैश्य वानिया समुदाय का इतिहास और उत्पत्ति

पौराणिक उत्पत्ति: कई हिंदू ग्रंथों के अनुसार, इस समुदाय की उत्पत्ति भगवान शिव से जुड़ी मानी जाती है。 समाज को तेल की आपूर्ति और विभिन्न औषधीय तेलों के उपयोग के लिए इस कार्य का सृजन किया गया था।

पारंपरिक तकनीक: ऐतिहासिक रूप से समुदाय का मुख्य केंद्र 'कोल्हू' या 'घानी' (बैलों से चलने वाली लकड़ी की मशीन) हुआ करती थी。 तिलहन (सरसों, तिल, अलसी आदि) को पेरकर तेल निकालने की पारंपरिक कला इनकी मेहनत और हुनर का प्रमाण रही है

वैश्य वर्ण की मान्यता: हिंदू चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में इन्हें वैश्य (व्यापारी वर्ग) का प्रमुख अंग माना जाता है。 देश के विभिन्न हिस्सों में इन्हें अलग-अलग नामों, जैसे- तेली, साहू, गुप्ता, राठौर, मोदी, और वैश्य वाणी के रूप में जाना जाता है

समाज की ऐतिहासिक भूमिका और विस्तार
अर्थव्यवस्था और व्यापार: यह समुदाय केवल तेल निकालने तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ था। ये लोग साहूकारी (ऋण देना) और अनाज के थोक व्यापार में भी अग्रणी थे

सामाजिक निर्माण: आर्थिक रूप से संपन्न होने पर इस समुदाय ने समाज-कल्याण के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ऐतिहासिक रूप से इन्होंने कई मंदिरों, धर्मशालाओं और जन-सुविधाओं का निर्माण कराया。


प्रमुख विभूतियाँ और संत परंपरा
संत जगनाडे महाराज: तेली समुदाय की संत परंपरा में संत जगनाडे महाराज का नाम अत्यंत आदरणीय है, जो महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी संप्रदाय से जुड़े थे और तुकाराम महाराज के अनुयायी थे।

राजा धनुआ तेली: लोककथाओं और इतिहास में राजा धनुआ तेली का उल्लेख एक प्रतापी राजा के रूप में मिलता है。

वर्तमान परिदृश्य
वर्तमान समय में यह समुदाय शिक्षा, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक उद्योगों में सक्रियता से अपनी भागीदारी निभा रहा है。 तेली वैश्य समुदाय भारत के विभिन्न राज्यों—विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात—में एक मजबूत सामाजिक और राजनीतिक उपस्थिति रखता है。 सामाजिक उत्थान के लिए सक्रिय तेली जन जागृति संघ जैसे संगठन भी समुदाय के इतिहास और संस्कृति को संरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं

Tuesday, October 9, 2018

सूरत में महाराजा अग्रसेन जयंती पर फैशन शो


साभार: दैनिक भास्कर 

अग्रवाल गोत्र परंपरा



साभार: मरुधर के स्वर, पत्रिका, जमशेदपुर 

अग्रसेन जयंती का शुभारम्भ कबसे हुआ?






साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका, जमशेदपुर 

अग्रवाल झंडा गान






साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका

अग्र मंत्र


साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका 

AGROHA - पुण्य धाम अग्रोहा





साभार: मरुधर के स्वर पत्रिका