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Saturday, June 9, 2018

JEE Advanced 2018 ; Pranav Goyal secured rank 1, फिर से वैश्य प्रतिभाओं का जलवा

फिर से वैश्य प्रतिभाओं ने अपना जलवा दिखाया हैं, राष्ट्रीय स्तर पर टॉप ४, दिल्ली और रूडकी IIT में सभी टोपर वैश्य समुदाय से है, बधाई हो. इसे कहते हैं प्रदर्शन, बिना किसी आरक्षण के और भीख के, तभी तो कहा जाता हैं, की अक्ल बड़ी या भैंस, कोई नहीं कर सकता हैं मुकाबला हमारा. तुम लगे रहो आरक्षण मांगने में, हम आगे निकलते जायेंगे. दिमाग तो कोई नहीं छीन सकता हमारा. देख ले ये सरकारे भी. सभी दल देख ले. और वे भी देख ले जिन्हें आरक्षण की भीख चाहिए. अब भी संभल जाओ. गर्व हैं हमें इन बच्चो पर. ये तो नाम उनके हैं जिनके सर नेम लिखे हैं, बहुत से लोग वे भी होंगे जिनके सर नेम नहीं लिखे हैं.

NEW DELHI: The Joint Entrance Examination (JEE) Advanced 2018 results have been declared today on the official website jeeadv.ac.in.


Pranav Goyal is the top ranker in Common Rank List (CRL) in JEE (Advanced) 2018 by obtaining 337 marks out of 360 marks. Meenal Parakh is the top ranked female with CRL 6. She scored 318 marks.

K V R Hemant Kumar Chodipilli is the topper from IIT-Kharagpur region. His rank is 7.

Vineetha Vennela from IIT- Kharagpur region is first among girls. Her rank is 261.

In 2018, a total of 11,279 seats are being offered in the IITs. This year, 800 supernumerary seats have been created specifically for female candidates in the IITs in order to improve the gender balance in IITs.

A Total number of 1,55,158 candidates appeared in both papers 1 and 2 in JEE (Advanced) 2018. A total of 18,138 candidates have qualified JEE (Advanced) 2018. This is more than 1.6 times the number of seats that are being offered.

Of the total qualified candidates, 2076 are females.

Highlights of the JEE Advanced 2018 Results 

1) Total number of qualified boys: 16062 
2) Total number of qualified girls : 2076 
3) Total number of qualified general (GE) candidates : 8794 
4) Total number of qualified OBC candidates : 3140 
5) Total number of qualified SC candidates : 4709 
6) Total number of qualified ST candidates : 1495

Zone wise male-female topper

Institute Male (CRL) Female (CRL)

IIT Bombay 

Rishi Agarwal (8) 
Missula Meghana (8)

IIT Delhi 

Sahil Jain (2) 
Meenal Parakh (6)

IIT Guwahati 

Prashant Kumar (150)
Pranjal Singh (3189)

IIT Kanpur 

Aayush Kadam 
Harshita Boonlia

IIT kharagpur 

K V R Hemant 
Kumar Chodipilli Vineetha Vennela (261)
IIT Madras Mavuri Siva 
Krishna Manohar (5) Narukulla Chaya 
Sai Nikhita (153)

IIT Roorkee 

Pranav Goyal (1) 
Vrinda Jindal (137)

Following are the top category rankers 

Category Name Place Rank


OPEN (CRL) Pranav Goyal Panchkula 1
OPEN (CRL) Sahil Jain Kota 2
OPEN (CRL) Kalash Gupta
New Delhi 3
OPEN (CRL) Meenal Parakh Kota 1 (Girls)
OBC‐NCL Mavuri Siva 
Krishna Manohar
Vijayawada 1
SC Aayush Kadam Kota 1
ST Jatoth Shiva Tarun Hyderabad 1
CRL‐PwD Manan Goyal
Patiala 1
OBC‐NCL‐PwD Vijendra Kumar Jehanabad 1
SC‐PwD Raushan Kumar
Vaishali 1

Following are the top five candidates in every zone

Zone Name CRL



Bombay 

RISHI AGARWAL 8
Abhinav Kumar 12
Saumya Goyal 13
Anuj Srivastava 25
Parth Laturia 29


Delhi 

SAHIL JAIN 2
Kalash Gupta 3
Pawan Goyal 4
Meenal Parakh 6
Lay Jain 9


Guwahati 

PRASHANT KUMAR 150

Rishi Ranjan 280
Punit Shyamsukha 294
Dibyojeet Bagchi 325
Chaitnya Shrivastava 413


Kanpur

 AAYUSH KADAM 78

Samyak Jain 147
Himansh Rathore 165
Pranshu S Negi 190
Vaidic Jain 197


Kharagpur
 K V R HEMANT 

KUMAR CHODIPILLI
Nimay Gupta 48
Aayush Agarwal 60
Sarthak Behera 82
Debajyoti Kar 92


Madras 

MAVURI SIVA KRISHNA

MANOHAR
Gosula Vinayaka
Srivardhan
Ayyapu Venkata Phani
Vamsinath
Basavaraju Jishnu 15
Mekala Anmol Reddy 26


Roorkee 

PRANAV GOYAL 1
Neel Aryan Gupta 10

Tarush Goyal 16
Shivam Goel 18
Raaghav Raaj Kuchiyaa 27





Wednesday, June 6, 2018

PALLAV NADHANI - पल्लव नधानी - वैश्य गौरव

16 वर्ष की उम्र में जिज्ञासावश शुरू किया बिज़नेस, आज बराक ओबामा जैसी हस्तियाँ हैं इनके क्लाइंट्स

युगांतरकारी घटनाएं कौन सी होती है? क्या यह दिशा बदलने वाले किसी आइडिया से पैदा होती है या कि किसी ऐसी विचार-क्रांति से जो अलग लगते क्षेत्रों को नूतन ढंग से संयोजित करने में? इसका उत्तर शायद हाँ ही है। किन्तु बक़ौल पल्लव नधानी, युगांतरकारी घटनाएं वह होती हैं जो मानवता को बदलने की ताकत रखती हैं। वह इस ढंग से सिर्फ तथ्यों को परिभाषित नहीं करते बल्कि उस पर अमल करना जानते हैं। इन सब के चलते फ्यूज़न चार्ट्स के संस्थापक पल्लव 30 वर्ष से कम उम्र के फ़ोर्ब्स की अचीवर्स की सूची में शामिल हुए। 


भागलपुर के एक मारवाड़ी परिवार में पल्लव का जन्म हुआ था। उनके घर में लग्ज़री के नाम पर एक मात्र चीज़ कम्प्यूटर था, जिसे उनके पिता अपने प्रोजेक्ट के अकाउंट के लिए उपयोग में लाते थे। कम्प्यूटर होने की वजह से उन्हें दोस्तों में खास जगह मिली हुई थी क्योंकि उस समय घर में कम्प्यूटर होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।

1997 में पल्लव के पिता ने एक कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर की शुरुआत की थी। जिसमे ट्रेनिंग के लिए उनके रिश्तेदारों के बहुत से बच्चे आये थे। रात में जब सब सो जाया करते थे तब पल्लव उनकी कम्प्यूटर की किताबें लेकर पढ़ा करते और सीखने की कोशिश करते। दो साल के अंदर ही वह सेंटर बंद हो गया। फिर वे बेहतर संभावनाओं को तलाशने कोलकाता आ गए। कोलकाता में पल्लव को ला-मार्टिनेयर स्कूल में दाखिला मिल गया। यहाँ शहर के बेहतरीन बच्चे पढ़ने आया करते थे।

उनके जैसा दिखने के लिए, पहनने के लिए उन्हें मिलने वाली जेब-खर्च पड़ने लगी। अपनी जेब-खर्च बढ़ाने के मकसद से पल्लव ने एक वेबसाइट पर इनोवेटिव आइडियाज के लेख लिखे जो काफी पसंद किये गए। पहले दो आर्टिकल के लिए उन्हें 2000 डॉलर मिले जो उनके लिए काफी था।

पल्लव का तीसरा आर्टिकल उनके लिए गेम चेंजर साबित हुआ। उन्हें डेवलपर से काफी सराहना मिली। यह आइडिया उन्हें तब मिली जब उन्हें स्कूल असाइनमेंट के लिए बार-बार एक्सेल में चार्ट बनाना पड़ता था जो उन्हें पसंद नहीं था। तब उन्होंने इंटरेक्टिव चार्टिंग सॉल्युशन बनाने के बारे में सोचा। उस पर लिखे आर्टिकल से उन्हें 1500 डॉलर मिले और साथ ही साथ काफी सराहना भी मिली।

17 वर्ष की उम्र में पल्लव ने 2001 में फ्यूज़न चार्ट्स की स्थापना की। शुरुआती समय कठिनाई से भरा था। बहुत सारे ग्राहक भारत के बाहर से होते थे और उन्हें राज़ी करने के लिए तरह-तरह के प्रेजेंटेशन, कॉल भी किये जाते थे। तीन साल तक पल्लव अकेले ही प्रोडक्ट डेवलपमेन्ट, वेबसाइट निर्माण, सेल्स और मार्केटिंग, कस्टमर सपोर्ट के मोर्चे संभाले हुए थे। साल 2005 में उन्होंने अपना पहला ऑफिस खोला। दो साल के अंतराल में 20 लोगों की टीम तैयार हो गई। अब पल्लव को अनुभवी सलाह की जरुरत महसूस हुई क्योंकि उन्हें सरकारी नियमों और बैंकिंग व फाइनेंस की ज्यादा जानकारी नहीं थी और उन्हें विदेशी ग्राहकों से भी डील करना था। इस परेशानी को हल करने के लिए उन्होंने अपने पिता की मदद ली। आज उनके पिता उनकी कंपनी में सीएफओ के पद पर आसीन हैं।



पिता और बेटे के साझे निरीक्षण में उनकी कंपनी के कर्मचारी की संख्या 20 से बढ़कर 50 हो गई और उनका बिज़नेस लगातार बढ़ने लगा। 2011 में फ्यूज़न चार्ट्स का ऑफिस बेंगलुरु में खोला गया। वर्तमान में फ्यूज़न चार्ट्स में 80 कर्मचारी और 25,000 ग्राहक हैं जिनमें लिंक्ड-इन, गूगल, फेसबुक, फोर्ड जैसी कंपनियां भी शामिल है। कंपनी ने धीरे-धीरे अपने पांव-पसारे और दुनिया के करीब 120 फार्मास्युटिकल से लेकर एफएमसीजी तक और शिक्षण संस्थानों से लेकर नासा तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

इस कंपनी ने विश्व स्तर के प्लेटफॉर्म पर भी अपना सिक्का जमाया। 2010 में इनके द्वारा डिज़ाइन किये हुए डिजिटल डैशबोर्ड को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुना। फ्यूज़न चार्ट्स ऐसी पहली भारतीय स्टार्ट-अप कंपनी है जिन्होंने ओबामा प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।

महज 30 साल के पल्लव नधानी के बिज़नेस ने आज 47 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। उनकी कंपनी पैसे जुटाने में विश्वास नहीं करती। पहले ही दिन से बिज़नेस ने लाभ ही कमाया है और खुद पल्लव का अपना ही पैसा बिज़नेस में लगा है। 

हम देख सकते हैं कि अगर जिज्ञासु दिमाग पूरी लगन से आगे बढ़े तो सफलता हमेशा क़दम चूम लेती है। बहुत बार कठिन परिस्थितियां भी आई पर उन सब बाधाओं को पार कर वे आगे बढ़ते गए। उनका मूलमंत्र है “आगे बढ़ते रहो’। हथियार डाल देने से बेहतर यह होता है कि आप धीरे-धीरे ही सही बढ़ते रहें, अपने लक्ष्य की ओर।

साभार:
hindi.kenfolios.com/started-business-16-satisfy-curiosity-now-clients-like-barack-obama

by Anubha TiwariJuly 3, 2017

Sunday, June 3, 2018

लिंगायत वैश्य - LINGAYAT VANI

लिंगायत वैश्य - LINGAYAT VANI 

वर्धा, नागपुर और सभी बरार जिलों में लिंगायत बनियों की संख्या मध्य प्रांत में लगभग 8000000 है। लिंगायत संप्रदाय का संक्षिप्त विवरण एक अलग लेख में दिया गया है। लिंगायत बनिया एक अलग अंतर्विवाही समूह बनाते हैं, और वे अन्य बनियों के साथ या लिंगायत संप्रदाय से संबंधित अन्य जातियों के सदस्यों के साथ न तो खाते हैं और न ही विवाह करते हैं। लेकिन वे बनियों के नाम और व्यवसाय को बरकरार रखते हैं। इनके पाँच उपखण्ड हैं, पंचम, दीक्षावंत, मिर्च-वांट, ताकालकर और कनाडे। पंचम या पंचम-सली मूल ब्राह्मण के वंशज हैं जो लिंगायत संप्रदाय में परिवर्तित हो गए हैं। वे समुदाय के मुख्य निकाय हैं और आठ गुना संस्कार या एसजित-वर्ण के रूप में जाने जाते हैं।

दीक्षा या दीक्षा से दीक्षावंत, पंचमसालियों का एक उपखंड है, जो जाहिर तौर पर दीक्षित ब्राह्मणों की तरह शिष्यों को दीक्षा देते हैं। कहा जाता है कि ताकालकरों का नाम तकाली नामक जंगल से लिया गया है, जहां उनके पहले पूर्वज ने भगवान शिव को एक बच्चे को जन्म दिया था। कनाडे केनरा से हैं। मिर्चवांट शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है; ऐसा कहा जाता है कि इस उपजाति का एक सदस्य अपने भोजन या पानी को फेंक देगा यदि यह किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा देखा जाता है जो लिंगायत नहीं है, और वे पूरे सिर को मुंडवाते हैं। उपरोक्त रूप अंतर्विवाही उप-जातियां हैं। लिंगायत बनियों में बहिर्विवाही समूह भी होते हैं, जिनके नाम मुख्य रूप से नाममात्र के होते हैं, निम्न-जाति प्रकार के होते हैं। उनमें से उदाहरण हैं कौएडे, कावा एक कौआ, तेली एक तेल-विक्रेता, थुबरी एक बौना, उबडकर एक आग लगाने वाला, गुड़करी एक चीनी-विक्रेता और धामनगाँव से धमनकर। वे कहते हैं कि गणित या बहिर्विवाही समूहों को अब नहीं माना जाता है, और यह कि अब एक ही उपनाम वाले व्यक्तियों के बीच विवाह निषिद्ध है। यह कहा जाता है कि यदि किसी लड़की की शादी किशोरावस्था से पहले नहीं की जाती है तो उसे अंततः जाति से निकाल दिया जाता है, लेकिन यह नियम शायद पुराना हो गया है। शादी का प्रस्ताव या तो लड़के या लड़की के पक्ष से आता है, और कभी-कभी दूल्हे को अपने यात्रा खर्च के लिए एक छोटी राशि मिलती है, जबकि अन्य समय में दुल्हन- 1 संप्रदाय के कुछ नोटिस के लिए लेख बैरागी देखें। कीमत अदा की जाती है। शादी में दूल्हे के हाथों में चावल के रंग का लाल और दुल्हन के हाथ में पीले रंग की जुआरी पहनाई जाती है। दूल्हा दुल्हन के सिर पर चावल रखता है और वह जुआरी को उसके चरणों में रख देती है। उनके बीच पानी से भरा एक बर्तन रखा जाता है जिसमें एक सुनहरी अंगूठी होती है, और वे अपने हाथों को पानी के नीचे अंगूठी पर एक साथ रखते हैं और असली के अंदर एक सजावटी छोटे विवाह-शेड के पांच बार चक्कर लगाते हैं। एक दावत दी जाती है, और दुल्हन का जोड़ा एक छोटे से मंच पर बैठता है और उसी पकवान में से खाता है। विधवाओं के पुनर्विवाह की अनुमति है, लेकिन विधवा अपने पहले पति या अपने पिता के वर्ग से संबंधित पुरुष से विवाह नहीं कर सकती है। तलाक की मान्यता है। लिंगायत मृत व्यक्ति को शिव के लिंगम या प्रतीक के साथ बैठने की मुद्रा में दफनाते हैं, जिसने अपने जीवनकाल में मृत व्यक्ति को कभी नहीं छोड़ा है, उसके दाहिने हाथ में जकड़ा हुआ है। कभी-कभी कब्र के ऊपर शिव की छवि के साथ एक चबूतरा बनाया जाता है। वे शोक के प्रतीक के रूप में अपना सिर मुंडवाते नहीं हैं।

उनका प्रमुख त्योहार शिवरात्रि या शिव की रात है, जब वे भगवान को बेल के पेड़ और राख की पत्तियां चढ़ाते हैं। एक लिंगायत को कभी भी शिव के लिंगम या लिंग चिह्न के बिना नहीं होना चाहिए, जिसे चांदी, तांबे या पीतल के एक छोटे मामले में गले में लटकाया जाता है। यदि वह उसे खो देता है, तो उसे तब तक खाना, पीना या धूम्रपान नहीं करना चाहिए जब तक कि वह उसे न पा ले या दूसरा प्राप्त न कर ले। लिंगायत किसी भी उद्देश्य के लिए ब्राह्मणों को नियुक्त नहीं करते हैं, लेकिन उनके अपने पुजारी, जंगम द्वारा सेवा की जाती है, जिन्हें वंश और पंचम समूह के सदस्यों से दीक्षा द्वारा भर्ती किया जाता है। लिंगायत बनिया व्यावहारिक रूप से सभी तेलुगु देश के अप्रवासी हैं; उनके तेलुगु नाम हैं और वे अपने घरों में यह भाषा बोलते हैं। वे अनाज, कपड़ा, किराने का सामान और मसालों का कारोबार करते हैं।

Wednesday, May 30, 2018

अग्रहरियों का एक समुदाय ऐसा भी जो हैं सिख

हिंदुत्व के रक्षक - सिख के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर सिंह जी 

जय अग्रसेन। हम सभी में शायद हैं ही सभी इस बात से अभिज्ञ हो कि अग्रहरियों का एक ऐसा भी समुदाय हैं जो सिख धर्म को मानते हैं। जी हाँ चौकिये नहीं, बिलकुल सही सुना आपने। इन्हें अग्रहरि सिख कहते हैं। स्वयं को हमारी ही भांति महाराजा अग्रसेन का संतान बताने वाले अग्रहरि सिखों की क्या दास्तान हैं, इनका क्या इतिहास रहा हैं। कैसे अग्रहरियो का एक कुनबा सिख धर्म अपना लिया, इसकी पूरी कहानी हम समझने की कोशिश करते हैं।

मूल रूप से अग्रहरि सिख बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल से आते हैं, क्योंकि सदियों से अग्रहरि सिख बिहार में रहते थे। इस कारण इन्हें बिहारी सिख भी कहते हैं। हालाकि वर्तमान में ये महज बिहार, झारखण्ड या पश्चिम बंगाल तक ही सिमित नही रहे, देश के अन्य कई स्थानों की और रोजगार या अन्य कारणों से फ़ैल चुके हैं।

क्या हैं इनका इतिहास 

इनके इतिहास के बारे में बताया जाता हैं कि मुग़ल शासन में जब हिन्दुओ को जबरन मुसलमान बनाया जा रहा था तब उन्हने अपने धर्म और बहु-बेटियों की रक्षा के लिए खालसा अपनाकर तलवार उठाया था। इसी काल में कई अग्रवालों ने हार मानकर इस्लाम कबुल किया, लेकिन स्वाभिमानियो के इस कुनबे को मुसलमान होना मंजूर नहीं था। वे सभी नौवे गुरु तेग बहादुर सिंह जी की उपस्तिथि में खालसा धारण कर सिख धर्म में परिवर्तित हुए और अपने धर्म की रक्षा के लिए सतत संघर्षरत रहे। 

इतिहासकारों के मत 

इनके सम्बन्ध में जानकारी जुटाने के दौरान ऑनलाइन ही हमें एक श्रोत मिला जिसमे यह उल्लेख किया गया हैं कि सिख अग्रहरि, गुरु तेग बहादर की असम यात्रा के समय से अहोम (अहोम एक असामी समुदाय जो ताई जाति के वंशज हैं) का एक समुदाय सिख धर्म में परिवर्तित हो गया है। हालांकि हम इस बात की पुष्टि नहीं करते। क्योंकि अहोमो से इनका सम्बन्ध तर्कसंगत नही प्रतीत होता। 

यह सिख समुदाय करीब 200 साल पहले बिहार में सासाराम, गया आदि से आए थे। वे हिंदी और बंगाली बोलते हैं, अलग-अलग गुरुद्वार होते हैं, और उनके पास कोलकाता के पंजाबी-भाषी सिखों के साथ कोई सामाजिक संबंध नहीं है।

द आइडेंटिटी ऑफ़ नॉर्थ ईस्ट सिख के लेखक श्री हिमाद्री बनर्जी इनके सम्बन्ध में लिखते हैं कि करीब 200 साल पहले बिहार में सासाराम और गया आदि से (कोलकाता के बारा बाजार) आए थे। वे हिंदी और बंगाली बोलते हैं। इनका अलग सा गुरुद्वारा भी होता हैं। कोलकाता के पंजाबी-भाषी सिखों के साथ इनका कोई सामाजिक संबंध नहीं है।

इनकी परम्पराएं और वर्तमान स्थिति 

वें सिख परंपरा का बखूबी पालन करते हैं। गुरबानी, सिख इतिहास, कीर्तन और गुरुमुखी को अग्रहरि सिखों के बच्चों के लिए नियमित रूप से पढ़ाया जाता है। वे वास्तव में सिख धर्म का अनुसरण करते हैं, अग्रहरि सिख अन्य सिखों की भांति किरपान को अपने साथ रखने और अपने केश नहीं कटाते। आजकल अग्रहरि सिख के बहुत से युवा अमृतधारी (being baptized as a Khalsa by taking Amrit or nectar water) हैं। अमृत ​​संचार नियमित रूप से सासाराम, केदली, और कोलकाता के गुरुद्वाराओ में होता हैं। वर्तमान में इन्होने में पंजाबी भाषी सिखों के साथ भी सामाजिक संबंध स्थापित कर लिए हैं। इसके अलावा वे पवित श्री गुरुगन्था साहिब जी के अनुसार ही सभी अनुष्ठानों को पूरा करते हैं। 

वे हिंदू अग्रहरि और सिख अग्रहरि दोनों में विवाह करते हैं। सिख परिवार में अरोड़ा, अहुवालिया में भी शादी-ब्याह के सम्बन्ध हैं। आज इस समुदाय के लोग अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यू. के. यूरोप और गल्फ देशों में भी जा बसे हैं। 

साभार: allaboutagrahari.com/2017/07/Who-is-Agrahari-Sikh.html

Tuesday, May 29, 2018

CBSE 10TH RESULT - वैश्य समाज के छात्रो का जलवा




साभार: दैनिक भास्कर , नवभारत टाइम्स 

CBSE 10TH RESULT - OUT OF TOP 4, 3 STUDENT ARE VAISHYA AGARWAL

सीबीएसई 10वीं का रिजल्ट घोषित, प्रखर मित्तल समेत 4 ने किया टॉप; सभी को 500 में से 499 नंबर


एजुकेशन डेस्क. सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) मंगलवार को 10वीं क्लास का रिजल्ट घोषित कर दिया है। इस बात की जानकारी मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव अनिल स्वरुप ने ट्वीट कर दी। स्टूडेंट्स अपना रिजल्ट बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट cbseresults.nic.in पर जाकर चेक कर सकते हैं। इस साल गुड़गांव के प्रखर मित्तल समेत चार छात्रों ने टॉप किया है। सभी को 500 में से 499 नंबर मिले हैं।

इन चारों ने किया टॉप

प्रखर मित्तल, डीपीएस गुड़गांव 499/500

रिमझिम अग्रवाल, आरआर पब्लिक स्कूल, बिजनौर 499/500

नंदिनी गर्ग, स्कॉटिश इंटरनेशन स्कूल, शामली 499/500

श्रीलक्ष्मी,  भवन विद्यालय, कोचीन 499/500

साभार: दैनिक भास्कर 

Sunday, May 20, 2018

उत्तर गुप्त राजवंश

उत्तर गुप्त राजवंश

सुप्रसिद्ध गुप्त राजवंश का अवसान 550-51 ईस्वी में हुआ और इसके साथ ही उत्तर भारतीय राजनीति में रिक्तता के साथ-साथ अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण भी उत्पन्न हुआ। गुप्त सम्राटों के अधीन उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले अनेक स्थानीय राजवंश इस रिक्तता को भरने के लिए अपनी शक्ति के संवर्धन में लग गये। परिणामतः उनमें प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुयी, जिसने पारस्परिक संघर्षों को जन्म दिया। कतिपय सामन्त राजवंश मगध और उसके पार्श्ववर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्यवादी शक्ति बनने का स्वप्न देखने लगे इनमें उत्तर गुप्त, मौखरि एवं थानेश्वर के पुष्यभूति राजवंश का नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सभी राजवंशों के सन्दर्भ में प्रचुर सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं तथापि आभिलेखिक एवं साहित्यिक स्रोतों से उत्तर गुप्त, मौखरी एवं पुष्यभूति राजवंश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएं उपलब्ध हैं। अतएव इतिहासकारों ने इन राजवंशों का इतिहास उपलब्ध साक्ष्यों के समवेत विवेचन के आधार पर प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। गुप्तोत्तरकालीन इतिहास का विवरण प्रस्तुत करते हुए इस आलेख में भी क्रमशः उत्तरगुप्त राजवंश का इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं।

उत्तर गुप्त राजवंश के इतिहास को प्रकाशित करने वाले अभिलेखों में आदित्यसेन का अफसढ़ अभिलेख तथा जीवित गुप्त द्वितीय का देववर्णाक अभिलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त आदित्यसेन के समय के दो अभिलेख शाहपुर और मन्दार नामक स्थानों तथा विष्णुगुप्त के काल का एक अभिलेख मंगराव नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से ये विशेष सूचना प्रदायी नहीं हैं। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ये सभी लेख बिहार प्रान्त से प्राप्त हुए हैं। उदाहणार्थ अफसढ़ अभिलेख गया जिले में स्थित अफसढ़ नामक स्थान में मिला है, जो इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त से लेकर आदिसेन तक के काल के ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करता है। इससे हमें आदित्यसेन तक उत्तरगुप्त राजवंशावली का ज्ञान तो होता ही है साथ ही इससे उत्तरगुप्त मौखरी सम्बन्धों पर भी रोचक प्रकाश पड़ता है। देववर्णाक अभिलेख बिहार प्रान्त के शाहाबाद (आरा) जिले के देववर्णाक नामक स्थान से मिला है।

इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय कनिंघम महोदय को है। उन्होंने 1880 ईस्वी में इसे प्राप्त किया था। इस अभिलेख से उत्तरगुप्त राजवंश के अंतिम तीन शासकों देव गुप्त, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के काल के इतिहास के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं। इस प्रकार अफसढ़ एवं देववर्णाक से प्राप्त अभिलेख एक साथ दृष्टि में रखने पर हमें इस वंश के ग्यारह शासकों का अविच्छिन्न इतिहास ज्ञात हो जाता है। चूँकि कृष्ण गुप्त इस वंश का प्रथम शासक तथा जीवित गुप्त द्वितीय इस वंश का अन्तिम शासक था। अतः सम्प्रति इस राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास न्यूनाधिक रूप से ज्ञात है, तथापि इस वंश के इतिहास के सम्बन्ध में अभी भी अनेक ऐसी सूचनाएँ हैं जो विवादस्पद बनी हुई हैं। जिनके सम्बन्ध में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णायक मत व्यक्त करना दुष्कर है।

उत्पत्ति एवं आदि राज्य

उत्तर गुप्त राजवंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त को अफसढ़ अभिलेख में ‘सदवंश’ में उत्पन्न बताया गया है। इससे केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह किसी उच्चकुल से सम्बद्ध था। इससे अधिक उत्तर गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में हमें कोई सूचना नहीं मिलती। इस वंश के अधिकांश शासकों के नाम के साथ ‘गुप्त’ शब्द जुड़ा हुआ है। अतः कतिपय विद्वानों के द्वारा यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि ये चक्रवर्ती गुप्त राजवंश से सम्बन्धित रहे होंगे। किंतु यह सम्भावना निर्मूल प्रतीत होती है। क्योंकि यदि ये चक्रवर्ती गुप्तों से सम्बद्ध होते तो इनके लेखों में निश्चय ही गर्व पूर्वक इस बात का उल्लेख किया गया होता। तो भी उल्लेखनीय है कि इस वंश के सभी राजाओं के नाम के अन्त में गुप्त शब्द नहीं मिलता।

ध्यातव्य है कि इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक का नाम आदित्यसेन मिलता है। सम्भवतः उत्तर गुप्त राजवंश, सम्राट गुप्तों के आधीन शासन करने वाला एक सामन्त राजवंश था। क्योंकि इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त को केवल नृप उपाधि प्रदान की गई है तथा इसके उत्तराधिकारी हर्ष गुप्त के नाम के साथ केवल आदर सूचक ‘श्री’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि चक्रवर्ती गुप्तों से पृथक करने के लिए ही इतिहासकारों ने इस वंश को परवर्ती गुप्त वंश अथवा उत्तर गुप्त वंश कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इस नामकरण पर आपत्ति भी की है। सुधाकर चट्टोपाध्याय का सुझाव था कि इस वंश का नामकरण उनके संस्थापक कृष्ण गुप्त के नाम पर करना चाहिए तथा इसे ‘कृष्ण गुप्तवंश’कहा जाना चाहिए।

गुप्त राजवंश अथवा उत्तर गुप्त राजवंश अब इतिहासकारों के बीच अधिकांशतः स्वीकृत और बहुमान्य हो चुका है। उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र कौन सा था ? यह विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है। इस राजवंश के पश्चात्वर्ती शासकों आदित्यसेन, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के अभिलेख मगध क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह इंगित है कि इन तीन शासकों का शासन मगध क्षेत्र पर व्याप्त था। अतः फ्लीट आदि विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस राज्यवंश का मूल क्षेत्र भी मगध ही रहा होगा।1 इसके विपरीत डी. सी. गांगुली, आर. के. मुकर्जी, सी. बी. वैद्य, हार्नले एवं रायचौधरी आदि अनेक विद्वानों का यह विचार है कि इस वंश के लोग मूलतः मलवा के निवासी थे जो हर्षोत्तर काल में मगध के शासक बने।2 मालवा को उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानने वाले विद्वान का मुख्य तर्क यह है कि हर्षचरित में माधव गुप्त का उल्लेख मालवराज पुत्र के रूप में हुआ है। जबकि अफसढ़ अभिलेख में माधव गुप्त को महासेन गुप्त का पुत्र कहा गया है। दोनों को ही स्रोतों में माधव गुप्त को हर्ष का मित्र कहा गया है।

हर्षचरित के अनुसार वह हर्ष का बाल सखा था जबकि अफसढ़ अभिलेख के अनुसार वह हर्ष देव के निरन्तर साहचर्य का आकांक्षी था। इन दोनों स्रोतों को साथ-साथ देखने से हर्षचरित के मालवराज और आदित्यसेन के पितामह महासेन गुप्त की एकरूपता प्रमाणित होती है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि जीवित गुप्त द्वितीय के देववर्णाक अभिलेख के अनुसार मगध पर पहले मौखरी सर्ववर्मा और अवन्तिवर्मा का अधिकार था, जो उत्तर गुप्त वंश के शासक दामोदर गुप्त और महासेन गुप्त के समकालीन थे। इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि मगध का क्षेत्र सर्ववर्मा के पिता ईशानवर्मा के भी आधीन रहा हो, जो उत्तर गुप्त वंशी शासक कुमार गुप्त का समकालीन था। क्योंकि ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख में ईशानवर्मा को आन्ध्रों, शूलिकों तथा गौड़ों का विजेता कहा गया है और गौड़ की विजय मगध क्षेत्र पर अधिकार के बिना सम्भव नहीं प्रतीत होती। इन सभी तथ्यों को दृष्टि में रखने पर पूर्वी मालवा के क्षेत्र को ही उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानना युक्ति संगत लगता है।

कृष्ण गुप्त 

असफढ़ अभिलेख के अनुसार उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक कृष्ण गुप्त था। अभिलेख के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासनकाल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता तथापि इस दिशा में हमें ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है। ईशानवर्मा उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासनकाल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमार गुप्त के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासनकाल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

अफसढ़ अभिलेख में कृष्ण गुप्त को ‘नृप’ उपाधि से विभूषित किया गया है।1 इस समय गुप्त साम्राट बुध गुप्त शासन कर रहा था जिसका राजनैतिक प्रभाव मालवा क्षेत्र तक निश्चित रूप से व्याप्त था। बुध गुप्त के शासनकाल में ही हूण नरेश तोरमाण का पश्चिमी भारत पर आक्रमण हुआ। तोरमाण के शासन का प्रथम वर्ष का अभिलेख एरण से प्राप्त हुआ है। इससे यह विदित होता है कि 490 ईस्वी और 510 ईस्वी के बीच किसी समय तोरमाण का अधिकार मालवा क्षेत्र पर स्थापित हुआ। उसने बुध गुप्त के एरण क्षेत्र पर शासन करने वाले सामन्त मातृविष्णु के अनुज धान्यविष्णु को अपनी ओर से इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया। किंतु मालवा क्षेत्र में हूणों की यह सत्ता निर्विध्न नहीं रही। क्योंकि एरण से ही प्राप्त 510 ईस्वी के भानु गुप्त के अभिलेख से ज्ञात होता है कि भानु गुप्त ने, जो एक महान योद्धा था एरण में एक भीषण युद्ध किया, जिसमें उसका मित्र गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ था और उसकी पत्नी अपने पति के शव के साथ सती हो गई थी।

समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भानु गुप्त और गोपराज ने यह युद्ध हूण नरेश तोरमाण के विरूद्ध ही किया होगा। स्पष्टतः मालवा क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में तेजी के साथ परिवर्तन हो रहा था जिससे मध्य भारत के परिव्राजक, उच्चकुल तथा एरण क्षेत्र के धान्यविष्णु जैसे सामन्त कुलों की गुप्त सम्राटों के प्रति स्वामिभक्ति शिथिल और संदिग्ध होती जा रही थी। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए कृष्ण गुप्त ने पूर्वी मालवा में अपना छोटा सा राज्य स्थापित किया। यद्यपि अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि उसकी सेना में सहस्रों की संख्या में हाथी थे तथा वह असंख्य युद्धों का विजेता था एवं विद्वानों से सदैव वह घिरा रहता था, किन्तु इसे औपचारिक प्रशंसा मात्र ही समझना चाहिए।

हर्ष गुप्त

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था। इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था। अफसढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त किया था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरूद्ध संघर्षरत था।

अफसढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थित एक सामान्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोधर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसकी बहन हर्ष गुप्ता का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

जीवित गुप्त प्रथम 

हर्ष गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जीवित गुप्त प्रथम था। इसने लगभग 520 ईस्वी से 540 ईस्वी तक शासन किया। अफसढ़ अभिलेख से उपलब्ध सूचनओं से यह संकेत मिलता है कि यह अपने पिता एवं पितामाह की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। इसे अभिलेख में ‘क्षितीशचूड़ामणि’1 उपाधि से विभूषित किया गया है। अफसढ़ अभिलेख में इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि ‘वह समुद्रतटवर्ती हरित प्रदेश तथा हिमालय के पार्शववर्ती शीत प्रदेश के शत्रुओं के लिए दाहक ज्वर के सदृश था।’1 ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त-साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण एवं मालवा शासक यशोवर्धन के दिग्विजय के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक अव्यवस्था की भयावह स्थिति उतपन्न हो चुकी थी।

गुप्त सम्राटों का प्रताप-सूर्य अस्त हो रहा था और हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित उत्तरी बंगाल के क्षेत्रों से गुप्त सत्ता का प्रभाव समाप्त हो चला था। असम्भव नहीं है कि जीवित गुप्त प्रथम ने समकालीन गुप्त सम्राट, जो सम्भवतः कुमार गुप्त तृतीय था, के सामन्त के रूप में पूर्वी भारत में विद्रोहों का दमन करने के लिए यह अभियान किया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभियान में समकालीन मौखरी नरेश ईश्वर वर्मा ने भी उसका सहयोग किया। क्योंकि जौनपुर शिलालेख में यह कहा गया है कि ईश्वर वर्मा ने उत्तर की दिशा में हिमालय तक के क्षेत्रों (प्रालेयाद्रि) पर विजय प्राप्त की थी। इन विजयों के परिणाम स्वरूप जीवित गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्तों के राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि हुई। इसलिए अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि ‘उसका पराक्रम पवन पुत्र हनुमान द्वारा समुद्र लंघन के समान अमानुषिक था।

कुमार गुप्तः

जीवित गुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुमार गुप्त हुआ। इसका शासनकाल लगभग 540 ईस्वी से से 560 ईस्वी तक माना गया है। इसके शासन के प्रायः मध्यकाल में (550-51ईस्वी) गुप्त सम्राट विष्णु गुप्त की मृत्यु हुई एवं गुप्त राजवंश का पूर्णतः अंत हो गया। गुप्त राजवंश के पतन का लाभ उठाने की दिशा में उत्तर गुप्त और मौखरी दोनों ही राजवंश सक्रिय हो उठे। परिणामतः इन दोनों राजकुलों का पारस्परिक मैत्री सम्बन्ध समाप्त हो गया। अफसढ़ अभिलेख से दोनों कुलों के बीच शत्रुता एवं संघर्ष की स्पष्ट सूचना मिलती है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त एवं उसके समकालीन मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कदाचित इस संघर्ष का उद्देश्य मगध के क्षेत्र पर, जो साम्राज्य सत्ता का प्रतीक था, अधिकार स्थापित करना था।

उत्तर गुप्त नरेश कुमार गुप्त एवं मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच संघर्ष की सूचना देने वाला एकमात्र स्रोत अफसढ़ अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त ने ‘राजाओं में चन्द्रमा के समान शक्तिशाली ईशानवर्मा के सेना रूपी क्षीरसागर का, जो लक्ष्मी की सम्प्राप्ति का साधन था, मन्दराचल पर्वत की भाँति मंथन किया। इस श्लोक में निहित अर्थ को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। रायचौधरी का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त की विजय हुई तथा ईशानवर्मा पराजित हुआ। क्योंकि मौखरियों द्वारा इस युद्ध में विजय का कोई दावा नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि ईशानवर्मा के 554 ईस्वी के हड़हा अभिलेख में इस युद्ध का कोई वर्णन नहीं है। अतः इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह युद्ध 554 ईस्वी के बाद किसी समय हुआ होगा। अफसढ़ अभिलेख के आगे के श्लोक में यह कहा गया है कि इस युद्ध के बाद कुमार गुप्त ने प्रयाग में अग्निप्रवेश कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।1 निहाररंजन राय और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त पराजित हुआ था और उसने पराजय जनित ग्लानि के कारण प्रयाग में आत्महत्या की थी।

साभार: vimitihas.wordpress.com/tag/उत्तर-गुप्त-राजवंशसंपादक- मिथिलेश वामनकर


झारखण्ड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक

रजरप्पा: झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की बैठक, 27% आरछण की मांग को लेकर आंदोलन तेज करने का निर्णय

आज 20 मई को रजरप्पा मंदिर मिलन चौक स्थित संस्कार होटल सभागार में झारखंड वैश्य संघर्ष मोर्चा, केंद्रीय समिति की एक विस्तारित बैठक हुई। इस बैठक में पूरे प्रदेश से वैश्य मोर्चा के पदाधिकारी और सदस्य शामिल होने आए। इस बैठक की अध्यछता केंद्रीय अध्यछ श्री महेश्वर साहु एवं संचालन उप-प्रधान महासचिव श्री राजीव राज एवं केंद्रीय महासचिव श्री बिरेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से किया। इस बैठक में मुख्यातिथि के बतौर मोर्चा के मुख्य संरछक शान-ए-वैश्य श्री गोपाल प्रसाद साहु उपस्थित थे। यह बैठक मोर्चा के मुख्य मुद्दों, यथा- पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन करने, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को भी तत्काल राष्ट्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने, शून्य जिलों में भी एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने, सांगठनिक सुदृढ़ीकरण व विस्तार, सिल्ली एवं गोमिया उपचुनाव, आगे की रणनीति व कार्यक्रम आदि मुद्दों रखी गई थी।

सर्वप्रथम रामगढ़ जिलाध्यछ रामदेव प्रसाद द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। तत्पश्चात केंद्रीय अध्यछ महेश्वर साहु द्वारा विषय प्रवेश कराया गया। तब केंद्रीय समिति की बैठक में उपरोक्त मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई और कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गए। तत्पश्चात बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि -

◆पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, बिजली विभाग की मनमानी और व्यवसायियों की परेशानी आदि मुद्दों को लेकर पूरे प्रदेश में जोरदार आंदोलन चलाया जायेगा। जिसके तहत आगामी 12 जून को हजारीबाग में तथा 18 जून को मेदिनीनगर में प्रमंडलीय स्तर पर प्रदर्शन व महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा और मुख्यमंत्री के नाम आयुक्त को स्मार-पत्र सौंपा जायेगा। जबकि 1 जुलाई से 3 जुलाई तक राजभवन (रांची) के समछ तीन दिवसीय महाधरना कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। इसके बाद भी सरकार मोर्चा की मांगों पर पहल नहीं करती है तो क्रांति दिवस के अवसर पर 9 अगस्त को राज्य के सभी जिलों में वैश्य क्रांति सम्मेलन का आयोजन कर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई की घोषणा की जायेगी।

◆ बैठक में प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि वैश्य समाज अब राजनीति में भागीदारी और दावेदारी के लिए पूरे प्रदेश में जागरूकता अभियान चलायेगी और बुद्धिजीवियों तथा पढ़े-लिखे नवजावनों से भी राजनीति के छेत्र में उतरने का आह्वान करेगी, ताकि आने वाली पीढ़ी को उनका वाजिब हक-अधिकार दिलाया जा सके।

◆ बैठक में तय किया गया कि गोमिया एवं सिल्ली में उसी दल/उम्मीदवार को समर्थन किया जायेगा जो वैश्य मोर्चा के मुद्दों,यथा-पिछड़ों को 27% आरछण देने, वैश्य आयोग का गठन, शेष बचे 13 वैश्य उपजातियों को पुनः राष्ट्रीय ओ बी सी सूची में शामिल करवाने, शून्य जिलों में एक समान आरछण की व्यवस्था लागू करने आदि को स्वीकार करेगा। बिना बातचीत किये जबरन एवं बेवजह हम किसी दल को समर्थन नहीं करेंगें।

◆ संगठन विस्तार के तहत कई लोगों को केंद्रीय समिति में बतौर सदस्य शामिल किया गया, जैसे- सुरेश प्रसाद (गिरिडीह), डॉ आर. एन. प्रसाद (भुरकुंडा), सुमंत साह (केरेडारी)। इनकी कार्यछमता और संगठन के प्रति समर्पण को देख कर पदाधिकारी बनाया जायेगा।

इस अवसर पर बैठक को संबोधित करते हुए मोर्चा के मुख्य संरछक व मुख्य अतिथि गोपाल प्रसाद साहु ने कहा कि संगठन में बड़ी ताकत होती है। जब से वैश्य मोर्चा का गठन किया गया है, मोर्चा ने कई उपलब्धियां हाशिल की है और वैश्य समाज को लाभ दिलाया है। अगर वैश्य समाज के लोग इसी तरह संगठित होकर रहें और अपने मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहें तो आगे भी इसका लाभ मिलेगा। मुख्य अतिथि श्री साहु ने कहा कि झारखंड में पिछड़ों का आरछण कम कर देना, उनके अधिकारों को छीनना है। इससे लाखों छात्रों एवं बेरोजगारों को नुकशान हो रहा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल पिछड़ों को 27% आरछण की व्यवस्था कर दे, अन्यथा सड़क पर उतर कर आंदोलन का ही एकमात्र रास्ता बचता है। हमें आंदोलन के लिए सरकार मजबूर न करे। श्री साहु ने कहा कि मैं हमेशा समाज के साथ हूँ और आगे भी रहूँगा।

इस बैठक को मोर्चा के कार्यकारी अध्यछ पंचानन साहु (बुंडू), केंद्रीय उपाध्यछ श्रीमती रेखा मंडल (धनबाद), सुरेश प्रसाद आदि नेताओं ने भी संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन गुलाब प्रसाद साहु ने किया।



Friday, May 18, 2018

जब सब कहते हैं अच्छे बनिये, फिर इनकी भागीदारी के अनुसार हर क्षेत्र में हिस्सेदारी क्यों नही

आदिकाल से लेकर मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के हर क्षेत्र में वैश्य समाज यानी बनिये का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं महाराणा प्रताप के समय में यह बात उस समय सिद्ध हो गई जब राणा जी पर परेशानी पड़ी और सेना एकत्रित करने के लिये पैसा चाहिये था तो भामाशाह ने अशरफियों का ढेर उनके सामने लगा दिया। इसी प्रकार अन्य शासकों के शासनकाल में भी वैश्य समाज के योगदान को बादशाओं व राजाओं ने खूब सराहा और फिर उन्हे बड़ी बड़ी पदवियां भी दी।

समाज सुधार और समाजवाद की व्यवस्था बनाने के क्षेत्र में महाराजा अग्रसेन जी का बड़ा योगदान रहा। साफ सफाई के लिये उनके समय में कई व्यवस्थाएं की गई बताई जाती हैं। तो समाज में सबको बराबर का दर्जा भी प्राप्त हो और हर व्यक्ति के पास घर और रोटी तथा व्यापार उपलब्ध हो इसके लिये उन्होंने अपने समय में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को एक रूपया एक ईंट देने का प्रचलन शुरू किया जिससे ईंटो से घर बनाया जा सकें और रूपयों से व्यवसाय हो सके और इसके लिये समाज का हर संपन्न व्यक्ति जिसके पास जितना होता था वो सबको एक एक ईंट देता था लेकिन अगर कम भी है तो एक रूपया एक ईंट सब दे देते थे।
राष्टपिता महात्मा गांधी के समाज में योगदान और आजादी में उनके कार्याें एक कुर्बानियों को कोई भी भुला नहीं सकता। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि वैश्य समाज बनियों का मानव जाति के उत्थान में बहुत बडा योगदान रहा है।

वर्तमान समय में तो अब जो भी कोई व्यवसाय कर रहा है चाहे वो किसी जाति से संबंध क्यों न हों वो व्यवसाय होने की वजह से हर व्यक्ति के लिये व्यापारी वैश्य की श्रेणी मे आता है। और जो नहीं जानता उसे बनिया कहकर ही पुकारता है।

आप गाडी या बस में यात्रा करते है तो वहां श्लोगन लिखा मिलता है अच्छे यात्री बनिए की बात पढाई की चली तो अभिभावक व हर बुजुर्ग कहता है अच्छे छात्र बनिए। राजनेता की बात चलती है तो भी एक जुमला हर जगह सुनने को मिलता है अच्छा नेता बनिये और अच्छा जनसेवक बनिये अच्छा व्यापारी बनिये और अब तो कितने ही स्थानों पर सुनने को मिलता है अच्छे ज्योतिषी बनिये और अच्छे पूजारी बनिये पुलिस वाले हर सम्मेलन और विचार गोष्ठी में कहते सुनाई देंगे अच्छे वाहन चालक बनिये अच्छे इंसान बनिये।

जब सवाल यह उठता है कि सर्वमान्य शब्द बनिये को प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों से कहा जाता है कि अच्छे बनिये तो फिर आलोचना क्यों? कितनी ही जगह जब कोई किस्सा या बात होती है तो घूमा फिराकर व्यापारियों या बनियों की आलोचना करने का मौका कोई नहीं चूकता। कुछ लोग तो राजनीति हो या कोई ओर क्षेत्र। सीधे सीधे या घूमा फिराकर व्यापारी और बनिया कहकर इनकी आलोचना करने में कोई कसर नहंी छोड़ते। कितने ही अफसर तो जब अकेले बैठकर बात करते हैं तो अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिये यह कहने से नहंीं चूकते कि वो बनिये वो ऐसा ऐसा वो तो वैसा हैं ।

मेरा मानना है कि हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनिया आखिर खराब कैसे हो सकते हैं। अगर कुछ लोगों को कमी दिखाई देती है तो वो पहले अपने अंदर झांककर देखे और जब वो एक उंगली दूसरे पर उठाता है तो तीन उंगूलियां उस पर उठ रही हैं। तो भैया मेरे कहने का मतलब यह है कि बनियों की आलोचना छोड़ उनके द्वारा जो हर मंच और हर क्षेत्र में उन्हे प्रमुख स्थान देने की बात उठ रही है उसमे अब कोताही न कर जितनी जिसकी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धांत को मानकर और वैश्य समाज बनियों के योगदान को देखते हुए उन्हे हर क्षे में अब समाज को प्रगति विकास को गति तथा जरूरतमंदों की मदद करने वाले इस समाज के लोगों को उनकी योगता और काबलीयत के आधार पर बढ़ावा देने में अब कोई कोताही किसी को नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह जब अच्छा बनिया है और हर कोई उसके जैसा बनना चाहता है तो उसकी अवहेलना ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है और जो उनको अधिकार नहीं देगा वो देर सवेर पिछड़ता ही रहेगा।

क्योंकि कुछ भी कह लों जिस प्रकार अन्नदाता किसान के योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता उसी प्रकार वैश्य व्यापारी और बनिया के योगदान को किसी भी क्षेत्र में कोई भी नकारने की स्थिति में सही मायनों में नहीं हैं। और गलत तरीके से किसी को परेशान करना अपनी ही हानि के मार्ग को खोलना ही कहा जा सकता है।

साभार: – रवि कुमार विश्नोई

राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना

सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com



Monday, May 14, 2018

लिपिका अग्रवाल - यूपी की बेटी ने किया कमाल, 12वीं क्लास में किया अॉल इंडिया टॉप




लखीमपुर खीरी- 'पसीने की स्याही से जो लिखते हैं अपने सपनों को, उनके किस्मत के पन्ने कभी कोरे नहीं हुआ करते।' किसी ने ठीक कहा है कि मेहनत ही सफलता की पूंजी होती है और आप अपनी मेहनत से असंभव को भी संभव बना सकते हैं। कुछ ऐसा ही कारनामा लखीमपुर खीरी की लिपिका अग्रवाल ने कर दिखाया है। 

शहर के गढ़ी रोड पर टिम्बर व्यवसाय दीपक अग्रवाल की बेटी लिपिका अग्रवाल ने ISC क्लास 12 की परीक्षा में 99.50 परसेंट से अॉल इंडिया टॉप किया है। अब वह बेहद खुश हैं और आगे डॉक्टर बनना चाहती हैं।

लखनऊ पब्लिक स्कूल की छात्रा लिपिका की उपलब्धि पर स्कूल और परिवार में खुशी का माहौल है। सभी एक दूसरे को मुंह मीठा करा खुशी का इजहार कर रहे हैं। 

टॉपर लिपिका ने बताया कि मुझे इतने प्रतिशत की उम्मीद नहीं थी। हमने 97 प्रतिशत तक अनुमान लगाया था। वहीं मेहनत के सवाल पर उन्हाेंने कहा कि हमने इस हिसाब से तैयारी की थी कि कुछ छूट न जाए। लिपिका ने इस उपलब्धि के लिए परिजनाें आैर स्कूल का विशेष याेगदान हैं। 



Wednesday, April 4, 2018

उत्तरप्रदेश में वैश्य समाज अत्याचार का शिकार

‘महाराज जी ने कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी’: योगी के पास फरियाद लेकर गया बिजनेसमैन रोते हुए बोला

‘महाराज जी ने कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी’: योगी के पास फरियाद लेकर गया बिजनेसमैन रोते हुए बोलामीडिया को अपना रोते-रोते अपना बयान देते हुए आयुष सिंघल ने कहा कि जब से यह सरकार बनी है वह दौड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पहले भी सीएम से दो बार मिल चुके हैं। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।


बिजनेसमैन आयुष सिंघल का आरोप है कि उन्हें धक्का मारकर बाहर कर दिया गया।

लखनऊ के एक बिजनेसमैन ने कहा है कि जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास एक फरियाद लेकर गोरखपुर गया तो सीएम ने डांटकर उसे भगा दिया और उसका आवेदन पत्र फेंक दिया। लखनऊ के अलीगंज के रहने वाले आयुष सिंघल युवा बिजनेसमैन हैं। आयुष सिंघल का आरोप है कि उसकी जमीन पर यूपी के पूर्व बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी और उनके बेटे और नौतनवां के निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी ने कब्जा कर लिया है। आयुष ने कहा कि जब वह इस बात की शिकायत लेकर सीएम के पास पहुंचे तो सीएम ने उन्हें धक्का मारकर भगा दिया। आयुष सिंघल ने रोते हुए कहा कि मेरी क्या गलती है, हम तो व्यापारी आदमी हैं।

आयुष ने कहा, “सीएम साहब को मिला मैने, कागज दिया, ब्रीफ करना शुरू किया कि अमनमणि त्रिपाठी ने हमारी जमीन कब्जा कर रखी है…कागज नचा के फेंक दिया, कहा-अवारा कहीं का, जिंदगी में तुम्हारी कार्रवाई नहीं होगी।” जब पत्रकारों ने पूछा कि ऐसा किसने कहा तो, आयुष सिंघल ने कहा कि महाराज जी ने। मीडिया को अपना रोते-रोते अपना बयान देते हुए आयुष सिंघल ने कहा कि जब से यह सरकार बनी है वह दौड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पहले भी सीएम से दो बार मिल चुके हैं। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।

आयुष सिंघल ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि इस बार कुछ एक्शन लिया जाएगा लेकिन उन्हें धक्का मारकर भगा दिया गया, कागज नचा कर फेंक दिया। आयुष सिंघल के मुताबिक अमरमणि त्रिपाठी के लोग उन्हें जान से मारने की धमकी देते हैं। वहीं इस मामले में लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने कहा कि करीब 6-7 महीने पहले आयुष सिंघल उनसे मिलने आए थे। उन्होंने कहा कि जमीन का मामला होने की वजह से उन्होंने इस मुद्दे पर कलेक्टर साहब से बात की थी, इसके बाद राजस्व विभाग की टीम मौके पर गई और जमीन का सीमांकन किया।

एसएसपी के मुताबिक विवादित जमीन का कुछ हिस्सा सिंचाई विभाग का है। एसएसपी ने कहा कि आयुष सिंघल चाहते हैं कि पुलिस विवादित जमीन पर पहुंचे और जिस जमीन को वह अपना कहते हैं उस पर घेराबंदी करवा दे, लेकिन नैसर्गिक न्याय कहता है कि इस जमीन के जो भी 12 खातेदार हैं उनकी चौहद्दी एसडीएम कोर्ट में ही तय होगी। बता दें कि नौतनवां से निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है।
आयुष सिंघल का आवेदन

साभार: 

Monday, March 19, 2018

SANJANA SANGHI - 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' के रीमेक में नजर आएंगी संजना सांघी



मुंबई। संजना सांघी को 2014 की हॉलीवुड फिल्म 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' के हिंदी रीमेक के लिए चुना गया है। फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा बनाई जा रही इस फिल्म की शूटिंग 2018 के मध्य में शुरू होगी। इस फिल्म से कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा बतौर निर्देशक आगाज कर रहे हैं। इस रोमांटिक फिल्म में ऑस्कर विजेता ए.आर. रहमान संगीत देंगे।

छाबड़ा ने एक बयान में कहा, "मैं 'रॉकस्टार' की कास्टिंग के दौरान संजना से पहली बार मिला था। वह ऊर्जा से भरपूर युवती थीं। कुछ सालों बाद वह कुछ विज्ञापनों के लिए कास्टिंग के काम से फिर जुड़ी। वह एक परिपक्व युवती के रूप में नजर आईं और मैं देखकर हैरान रह गया कि वह एक बैहतरीन कलाकार हैं। उन्होंने कहा, "मैं फौरन इस बात को लेकर सुनिश्चित हो गया कि मैं एक दिन उसके साथ फिल्म बनाना पसंद करूंगा।

जैसे ही 'फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' की पटकथा तैयार हुई, मुझे वह इसके लिए बिल्कुल उपयुक्त लगीं। मैं इस प्रतिभाशाली लड़की के साथ मिलकर करिश्मा दिखाने का और इंतजार नहीं कर सकता। फॉक्स स्टार स्टूडियोज की चीफ क्रिएटिव ऑफिसर रुचा पाठक ने कहा कि वह मुकेश निर्देशित पहली फिल्म में इस प्रतिभाशाली युवती को लॉन्च करने के लिए उत्सुक हैं। 'द फॉल्ट इन ऑवर स्टार्स' जॉन ग्रीन्स के उपन्यास पर आधारित है। इस हॉलीवुड फिल्म में शैलेन वूडली और एंसेल एलगोर्ट ने काम किया है।



GATE Result 2018: लखनऊ के प्रशांत गुप्ता ने केमिस्ट्री में किया ऑल इंडिया टॉप




संक्षेप: 
किसान के बेटे ने केमिस्ट्री में किया टॉप 
986 स्कोर पाकर यह सफलता प्राप्त की 
ये किताब लिखना है नेक्स्ट टारगेट 

लखनऊः इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) गुवाहाटी ने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग गेट-2018 का रिजल्ट घोषित कर दिया. इसमें किसान के बेटे प्रशांत गुप्ता ने केमेस्ट्री सब्जेक्ट में देश में पहला स्थान हासिल किया है. प्रशांत गुप्ता यूपी की राजधानी लखनऊ के इटौंजा के रहने वाले हैं. प्रशांत ने गेट में 986 स्कोर पाकर यह सफलता प्राप्त की है. उनके पिता अविनाश गुप्ता किसान हैं और मां मधु गुप्ता गृहणी हैं.

प्रशांत ने NYOOOZ को बताया कि वो हमेशा से टॉप 10 में रैंक हासिल करना चाहते थे, पर उन्हें नहीं पता था कि वो पहला स्थान भी हासिल कर सकते हैं. प्रशांत ने बताया कि उन्हें किताबें पढ़ना और क्रिकेट खेलना पसंद है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह GATE का एग्जाम कैसे पास किया जाए इस पर किताब लिखना चाहते हैं.

प्रशांत का कहना है, ``मैं नहीं चाहता कि GATE का एग्जाम देने वाले किसी भी स्टूडेंट को इसके बारे में जानने में परेशानी हो. GATE के लिए तमाम परेशानियां झेलने के बाद मैंने `हाउ टू क्रेक द एग्जामिनेशन किताब लिखने का फैसला किया है.``

प्रशांत ने आगे कहा, ``मुझे इस बात की खुशी है कि यूपी बोर्ड से पढ़ने के बावजूद में इस एग्जाम में टॉप कर पाया.`` बता दें कि प्रशांत ने 2015 में BHU से ग्रेजुएशन किया है जबकि 2017 में IIT दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएशन पास किया.

अपने पिता के बारे में बात करते हुए प्रशांत ने कहा, ``उन्होंने किसान होने के बावजूद मेरे सपनों को पूरा करने में साथ दिया. अब मेरे लिए मौका है कि मैं अपनी खुशी उनके साथ बांट पाऊं.``



Sunday, March 11, 2018

PARAG AGRAWAL - पराग अग्रवाल

आईआईटी के पराग अग्रवाल बने ट्विटर के नए चीफ टेक्नीकल ऑफिसर


माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने पराग अग्रवाल को अपना नया चीफ टेक्नीकल ऑफिसर (सीटीओ) नियुक्त किया है। उन्हें 2016 में कंपनी छोड़ने वाले एडम मेसिंगर के बदले यह जिम्मेदारी दी गई है। आईआईटी बॉम्बे के छात्र पराग ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की है। ट्विटर की वेबसाइट के मुताबिक, सीटीओ के रूप में पराग कंपनी की तकनीकी रणनीति का नेतृत्व करेंगे। उनके जिम्मे मशीन लर्निंग, ट्विटर के ग्राहक एवं राजस्व उत्पाद और इंफ्रास्ट्रक्चर टीम की देखरेख होगी। पराग 2011 में बतौर एड इंजीनियर ट्विटर से जुड़े थे। उन्हें हाल ही प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर इंजीनियर का खिताब दिया गया था। इसके बाद उन्होंने एड सिस्टम बढ़ाने के प्रयासों की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने ऑनलाइन मशीन लर्निंग के लिए भी एक प्लेटफार्म तैयार किया। पराग ने बड़े पैमाने पर डाटा रिसर्च के क्षेत्र में काम किया है। वह माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च, याहू रिसर्च और एटीएंडटी लैब्स जैसी दिग्गज कंपनियों से जुड़े रहे। ट्विटर ज्वाइन करने से पहले उन्होंने एटी एंड टी, माइक्रोसॉफ्ट और याहू में रिसर्च इंटर्नशिप की हैं। 


ट्विटर में पराग के योगदानों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से ट्विटर यूजर्स की टाइमलाइंस में ट्वीट्स के औचित्य बढ़ाने के प्रयास भी शामिल हैं। ट्विटर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से खुद के गलत इस्तेमाल को भी रोकता है। ट्विटर के प्रवक्ता ने बताया- सीटीओ के तौर पर उनका काम मशीन लर्निंग और एआई सीखाने पर केंद्रित होगा। इसके अलावा राजस्व उत्पाद और बुनियादी ढांचा टीमों की स्केलिंग करना भी होगा। ट्विटर ने इस हफ्ते घोषणा की थी कि वह अपने प्लैटफॉर्म पर 'सामूहिक स्वास्थ्य, खुलापन और सार्वजनिक बातचीत में शिष्टाचार बढ़ाने' के मकसद से समाज विज्ञान का एक निदेशक नियुक्त करना चाहता है।

साभार: 
amarujala.com/technology/twitter-appoints-iit-bombay-amlumnus-parag-agarwal-as-its-new-cto

KAJAL AGRAWAL - काजल अग्रवाल

काजल अग्रवाल


काजल अग्रवाल (जन्म: 19 जून, 1985) एक भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री है, जों अधिकतर तेलगू फ़िल्मों में कार्य कर चुकी है। वे तमिल और हिन्दी सिनेमा में भी पदार्पण कर चुकी हैं। इन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत एक हिन्दी फिल्म क्यों! हो गया ना... से शुरू की। जिसमें इन्होंने अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय के साथ अभिनय किया था। यह फिल्म 11 अगस्त 2004 को प्रदर्शित हुई थी। इसके बाद ही यह तेलुगू फिल्मों में भी काम करने लगीं।

सफर

अभिनय की शुरुआत (2004 - 08)

काजल ने पहली बार अभिनय वर्ष 2004 में क्यों! हो गया ना... नामक एक हिन्दी फिल्म में दीया की बहन के रूप में एक छोटा सा किरदार निभाकर किया था। इस फिल्म में इनके साथ अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय भी थे। उसके बाद तमिल फिल्म निर्देशक भारतीराजा के बोम्मलत्तममें अर्जुन सरजा के साथ अभिनय किया था। यह फिल्म तय समय से काफी देर में 2008 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी।


काजल ने पहली बार तेलुगू फिल्म में अभिनय 2007 में तेजा की फिल्म लक्ष्मी कल्याणम में कल्याण राम के साथ मुख्य किरदार के रूप में कार्य किया था,लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस में असफल रही। इसके अगले वर्ष में कृष्णा वाम्सि के द्वारा निर्देशित फिल्म 'चन्दामामा' में यह दिखाई दी। यह फिल्म सकारात्मक समीक्षा के साथ ही इनकी पहली सफल फिल्म बनी।

वर्ष 2008 में इनकी पहली तमिल फिल्म 'पजनी' भी प्रदर्शित हुई,जो पेरारसु द्वारा निर्देशित थी| जिसमें यह सह-कलाकार भरत के साथ दिखाई दी। इसी वर्ष इनकी दो और तमिल फिल्म भी प्रदर्शित हुईं। वेंकट प्रभु की कॉमेडी-थ्रिलर सरोज़ा में काजल ने अथिति भूमिका निभाई और भारतीराजा की फ़िल्म 'बोम्मलत्तम' में भी कार्य किया। यह दोनों ही फिल्म सफल रहीं लेकिन काजल के अभिनय के सफर को और आगे पहुँचाने में असफल रहीं क्योंकि दोनों ही फिल्मों में उनका किरदार कमजोर था। 2008 में रिलीज इनकी दो तेलुगु फिल्में 'पौरुडू' एवं 'अट्टादिसता' बॉक्स ऑफिस में सफल रहीं|

सार्वजनिक मान्यता एवं आलोचनात्मक प्रशंसा (2009 - 11)

काजल अग्रवाल की चार फिल्में 2009 में प्रदर्शित हुईं। सर्वप्रथम इन्होंने तमिल फिल्म 'मोधि विलायुडु' में अभिनय किया जो कि बॉक्स ऑफिस पर असफल रही| इसके बाद काजल ने एस. एस. राजामौली द्वारा निर्देशित उच्च बजट तेलुगु फ़िल्म मगधीरा में राम चरण तेजा के साथ दोहरी भूमिका निभाई। काजल के राजकुमारी के रूप में अभिनय को विशेष प्रशंसा मिली।

तेलुगू फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए इन्हें नामित किया गया था।मगधीरा अधिक कमाई करने में पूरी तरह से सफल हुआ। इसने कई फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। यह तेलुगू भाषा का अब तक का सबसे अधिक कमाई करने वाले फिल्मों में सबसे ऊपर आ गया। इस फिल्म की सफलता ने काजल को तेलुगू सिनेमा के मुख्य कलाकारों के स्थान पर पहुँचा दिया। यह फिल्म तमिल भाषा में मावीरन नाम से 2011 में प्रदर्शित हुआ और यह भी कमाई करने में सफल रहा।

Raj Kumar Gupta - Film Director

Raj Kumar Gupta

Director Raj Kumar Gupta during the shoot of Raid in Lucknow.

Raj Kumar Gupta made his debut as a writer & director with the critically acclaimed and commercially successful 'Aamir' (2008). Shot with a shoestring budget, guerilla style on the streets of Mumbai, this edgy thriller established Raj Kumar as a filmmaker to look out for and garnered several award nominations in the Best Debut Director category that year. After penning the screenplay of 'Barah Aana' (2009), Raj Kumar Gupta wrote and directed 'No One Killed Jessica' (2011), based on the true story of the murder of Jessica Lal and the controversial trial of the case. This powerful drama featuring Rani Mukerjee and Vidya Balan drew rave reviews and set the box-office ringing. Nominated for several awards including the prestigious Filmfare & Screen Awards in the Best Film, Best Director and Best Screenplay categories, 'No One Killed Jessica' catapulted the filmmaker into the big league. In 2013, Raj Kumar Gupta shifted gears by surprising his audience with the suspense comic caper 'Ghanchakkar'. Starring Emraan Hashmi and Vidya Balan, the film drew an extremely divided response from both critics and viewers, but confirmed that the filmmaker wasn't going to play by the conventional rules set by the industry. Raj Kumar Gupta made his debut as a producer in 2016 with a short film titled "Aaba" under his production house Raapchik Films Pvt. Ltd. which premiered at Berlin Film Festival 2017 in the Generation K Plus Category and went on to win the prestigious International Jury Prize for Best Short film in its category.