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Sunday, June 16, 2019

प्रेमलता अग्रवाल: जिनके हौसलों के आगे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी छोटी पड़ गई

प्रेमलता अग्रवाल: जिनके हौसलों के आगे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी छोटी पड़ गई

premlata-agarwal-the-first-indian-woman-to-conquer-the-top-peaks-of-seven-summits Premlata Agarwal: The First Indian Woman To Conquer The Top Peaks of Seven Summits


किसी भी मंजिल को पाने के लिए आपका जूनून ही आपकी तरक्की की ऊंचाई तय करता है. अगर आपके दिल में अपने सपनों तक पहुंचने का हौसला नहीं है, तो सपने देखने का कोई मतलब नहीं बनता.

आज हम इस लेख में ऐसी महिला की बात करेंगे, जिन्होंने सपने देखे और उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान एक कर दिया.

उनके हौसले के आगे विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी छोटी पड़ गई. आज इनकी उम्र 55 साल हो चुकी है.

ये भारत की पहली महिला हैं, जिनके नाम 50 साल की उम्र में विश्व के सात सर्वोच्च शिखरों को फतह कर उन पर तिरंगा फहराने का रिकॉर्ड है. साथ ही ये भारत की सबसे उम्रदराज महिला पर्वतारोही भी रही हैं.

इन्होंने 2011 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह किया. जी हां! हम बात कर रहे हैं प्रेमलता अग्रवाल की.

आइए जानते हैं इस पर्वतारोही की रोमांचित कर देते वाली कहानी –
एक क्षण में बदल गया जीवन का नजरिया

1963 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के एक छोटे से गांव सुखिया पोखरी में पैदा हुईं प्रेमलता के पिता रामअवतार एक बिजनेसमैन थे. पढ़ाई सामान्य बच्चों की तरह हुई और शुरुआती जीवन भी काफी साधारण रहा. 

स्कूल के दिनों में भी उन्होंने कुछ खास खेलों में हिस्सा नहीं लिया था, सिवाय रनिंग के. महज हायर सेकेंडरी शिक्षा हासिल करने के बाद बहुत कम उम्र में उनकी शादी विमल अग्रवाल से कर दी गई, जो कि पेशे से एक पत्रकार थे.

फिर 18 साल की उम्र में ही वह दो बेटियों की मां बन गईं. शुरुआत से लेकर अब तक हर चीज साधारण तरीके से ही चल रही थी. प्रेमलता के पति और बेटियों ने उस समय सोचा भी नहीं होगा कि आगे आने वाले समय में उनकी पति व मां वो कारनामा कर दिखाएंगी कि उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा.

प्रेमलता के जीवन में बदलाव उनकी उम्र के 35वें साल में आया. इसकी शुरुआत एक वाकिये से हुई, जब प्रेमलता अपनी बेटी को जे.आर.डी. टाटा स्पोर्ट्स काॅम्पलेक्स जमशेदपुर में टेनिस की ट्रेनिंग के लिए लेकर गई थीं.

यहां उन्होंने नोटिस बोर्ड पर डालमा हिल ट्रेक का एक नोटिस लगा देखा, जिसे टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया गया था. इसे देखकर वह काफी प्रभावित हुईं और उनके मन में इस आयोजन का हिस्सा बनने का खयाल आया.

Premlata Agarwal Saluting heros of Our Independence. (Pic: )

बछेंद्री पाल ने दिखाया नया रास्ता

जिसके बाद प्रेमलता ने इस ट्रेक में हिस्सा और 500 प्रतिभागियों में से तीसरा नंबर हासिल किया. उनकी इस जीत के लिए उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित किया जाना था. जिसके लिए वह टीएसएएफ कार्यालय पहुंचीं.

यहां उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया.

इस दौरान प्रेमलता ने कार्यालय में लगी लेजेंडरी पर्वतारोही बछेंद्री पाल की ढेरों तस्वीरों को देखा, जो उन्होंने पर्वतारोहन के दौरान ली थीं. इन तस्वीरों को देख प्रेमलता इस कदर प्रभावित हुईं कि उन्होंने फैसला कर लिया कि वह अपनी बेटी को एडवेंचर स्पोर्टस में शामिल कराएंगी.

इसके बाद वह सीधे बछेंद्री पाल के ऑफिस मिलने चली गईं और उनसे इस बारे में बात की. प्रेमलता की बातों को सुनने के बाद बछेंद्री पाल ने उन्हें कहा कि अपनी बेटी की बजाए आप खुद क्यों नहीं इसे ज्वाइन करतीं.


Premlata is The First Indian Woman To Conquer The Top Peaks of Seven Summits. (Pic: )

खुद से पहले परिवार को दी तवज्जो 

बछेंद्री पाल की यह बात सुनकर प्रेमलता ने झट से इसके लिए हां कर दी और उनके प्रशिक्षण के अधीन साल 2000 तक उन्होंने अपना बुनियादी पर्वतारोहण पाठ्यक्रम पूरा कर लिया.

प्रशिक्षण खत्म करने के बाद प्रेमलता अपने पहले अभियान के तहत साल 2004 में बछेंद्री पाल के साथ नेपाल की आइसलैंड पीक पर गईं. इसके बाद 2008 में उन्होंने साउथ अफ्रिका के माउंट किलिमेनजारो की ट्रेकिंग की.

धीरे-धीरे पर्वतारोहण उनका जुनून सा बन गया और वह इसमें काफी अच्छी भी हो गईं.

उनकी इस काबिलियत को देखकर बछेंद्री पाल ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करनी चाहिए. असल में एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए जो कुछ भी गुण एक पर्वतारोही में होने चाहिए, वह सब उनमें मौजूद हैं.

यहां तक कि अगर प्रेमलता माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए हां कहतीं, तो टाटा स्टील की और से उन्हें स्पोंसरशिप भी दी जाती. लेकिन प्रेमलता ने इस चुनौती को कुछ समय के लिए टालने का फैसला किया.

क्योंकि वह इस बारे में अपने परिवार से विचार-विमर्श करना चाहती थीं.

Premlata Agarwal at Mount McKinley USA. (Pic: )

जिम्मेदारियां निभाने के बाद शुरू किया सफर

फैसला लेने में उन्हें पूरे पूरे 2 साल का समय लगा. इस बीच उन्होंने अपनी बड़ी बेटी की शादी कर दी और छोटी बेटी को पढ़ाई के लिए आगे भेजा.

परिवार की सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद प्रेमलता ने इस बारे में अपने पति विमल से बात की, जिस पर उन्होंने हां में सर हिलाते हुए कहा कि अगर बछेंद्री पाल को लगता है कि तुम ये कर सकती हो, तो तुम्हें जरूर जाना चाहिए.

यहां तक कि इस फैसले में प्रेमलता के सास-ससुर ने भी उनका समर्थन किया था.

आखिरकार, अपनी उम्र के 48वें साल में बछेंद्री पाल के विश्वास के सहारे प्रेमलता ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जाने का अपना प्रशिक्षण शुरू कर दिया.

इस प्रशिक्षण को पूरा करने के बाद प्रेमलता ने अपनी टीम के साथ 25 मार्च को नेपाल के काठमांडू से इस अभियान की शुरूआत कर दी.

शुरुआत में तो सब ठीक रहा, मगर जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई, वैसे-वैसे वातावरण का बदलाव अपना असर दिखाने लगा. उम्रदराज होने के कारण प्रेमलता को सबसे अधिक दिक्कत पेश आ रही थी. इस दौरान उनके पांव में तेज दर्द होने लगा.

ये तो सिर्फ शुरूआत थी, आगे और भी कठिन हालात इनका इंतजार कर रहे थे. 

Premlata Agarwal at Mount Everest NEPAL. (Pic: )

दिक्कतों के बावजूद नहीं मानी हार

प्रेमलता इतनी कमजोर नहीं थीं कि शुरूआत में ही हार मान बैठें. उनका हौसला अडिग था, और दर्द के बावजूद वह लगातार आगे बढ़ती रहीं. इस बीच उनके साथ चल रही पर्वतारोही ने उन्हें बार-बार कहा कि उनकी उम्र ऐसी नहीं है कि वह इस तरह का वातावरण झेल सकें.

इसलिए उन्हें वापस चले जाना चाहिए. इस बीच उनका एक दस्ताना भी कहीं गिर गया. ऐसे में वह ठंड का शिकार हो सकती थीं. सभी ने उन्हें वापस चले जाने का सुझाव दिया. लेकिन उन्होंने किसी की एक न मानी.

यहां-वहां ढूंढने पर उन्हें अपना दस्ताना भी मिल गया और उन्होंने अपना अभियान जारी रखा.

इस दौरान जब प्रेमलता व उनकी टीम 26 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचे, मौसम बिगड़ गया और उन्होंने वापस जाने का फैसला कर लिया. लेकिन थोड़ी देर बाद ही मौसम ठीक हो गया और सभी ने अपनी चढ़ाई फिर से शुरू कर दी.

पूरे रास्ते उन्होंने बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया, पर अंत में वह दुनिया के सात सबसे ऊंचे शिखरों में से एक की चोटी तक पहुंचने में सफल रहीं. जहां उन्होंने तिरंगा लहरा कर न सिर्फ अपना बल्कि पूरे भारत का नाम रौशन कर दिया.

Premlata Agarwal Receiving an Award By President of India. (Pic: tsafindia)

प्रेमलता ने अपने अद्भुत साहस की बदौलत भारत की सबसे उम्रदराज पर्वतारोही का खिताब हासिल किया. मई, 2018 तक ये खिताब प्रेमलता के नाम ही था, मगर अब संगीता बहल इस खिताब की हकदार बन गईं. इन्होंने 53 साल की उम्र में यह कारनामा कर दिखाया.

प्रेमलता को उनकी इस उपलब्धि के लिए 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. बहरहाल, प्रेमलता अब टाटा स्टील में काम करते हुए वहां अपने जैसे ही जोशीले पर्वतारोहियों को प्रशिक्षित देती हैं, और उनमें ऊंचे पहाड़ों को फतह करने का हौसला भी.

साभार: ROAR MEDIA 

JEE Advanced Result 2019: टॉपर कार्तिकेय गुप्ता ने बताया अपनी सफलता का राज





JEE Advanced Result 2019 Topper: आईआईटी रुड़की ने शुक्रवार को जेईई एडवांस 2019 का रिजल्ट जारी कर दिया। देश की 23 आईआईटी में एंट्री दिलाने वाली इस परीक्षा में महाराष्ट्र के चंद्रपुर के रहने वाले कार्तिकेय गुप्ता चंद्रेश ने टॉप किया है। कार्तिकेय ने JEE Main 2019 में 100 NTA स्कोर प्राप्त किया था। JEE Mains exam में उनकी रैंक 18 थी। परीक्षा में भाग लेने वाले परीक्षार्थी जेईई की वेबसाइट jeeadv.ac.in पर जाकर रिजल्ट चेक कर सकते हैं।

कार्तिकेय ने बताया कि वह हमेशा अपने डाउट क्लियर करने पर जोर देते रहे। जब तक सारे डाउट क्लियर नहीं होते थे, उन्हें नींद नहीं आती थी। वह हमेशा रिलेक्स माइंड से पढ़े।

कार्तिकेय ने कहा, 'भरोसा था की मुझे आईआईटी मुंबई में सीएस ब्रांच मिल जाएगी लेकिन टॉप करने की नहीं सोची थी। मैं रेगुलर क्लासेस के अलावा रोजाना 6-7 घंटे सेल्फ स्टडी करता था। मैंने लगातार वीकली टेस्ट दिए। इससे मुझे मेरी तैयारी का स्टेट पता लगता रहा।'

उन्होंने कहा, 'स्टूडेंट्स को बिना किसी तनाव और दबाव के पढ़ाई करनी चाहिए। सेल्फ कंपीटीशन लक्ष्य तक पहुंचने में अहम भूमिका अदा करता है। तैयारी के दौरान मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से रिलेक्स रहना जरूरी है। लंबे समय तक लगातार नहीं पढ़ना चाहिए। दो-दो घंटे की पढ़ाई के बाद ब्रेक लेने चाहिए।
JEE Advanced Result 2019 घोषित, अब खुलने लगा रिजल्ट का लिंक

कार्तिकेय अपना आदर्श महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मानते हैं। 2017 और 2018 में KVPY क्वालिफाई किया था।

कार्तिकेय ने INPHO, INCHO, INAO और INJSO क्वालिफाई किया हुआ है।
JEE Advanced 2019 Toppers: यहां देखें जेईई एडवांस टॉपरों की पूरी लिस्ट

17 साल के कार्तिकेय ने 360 में से 337 अंक प्राप्त किए हैं। वह महाराष्ट्र के चंद्रपुर क्षेत्र के हैं और उनके पिता चंद्रेश गुप्ता पेपर इंडस्ट्री में मैनेजर हैं, जबकि मां पूनम गुप्ता हाउस वाइफ हैं। परीक्षा में दूसरा स्थान इलाहाबाद के हिमांशु सिंह और तीसरा स्थान नई दिल्ली के अर्चित बुबना ने हासिल किया है।


कार्तिकेय ने मुंबई की एलेन इंस्टीट्यूट ब्रांच से कोचिंग की थी।

कार्तिकेय के बड़े भाई भारतीय विद्या भवन सरदार पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मुम्बई से सीएस ब्रांच से इंजीनियरिंग कर रहे हैं।

जेईई एडवांस्ड में कुल 161319 स्टूडेंट्स बैठे थे। 38705 स्टूडेंट्स ने परीक्षा पास की है। इनमें से 5356 लड़कियां हैं।

कार्तिकेय ने 372 में से 346 मार्क्स हासिल किए हैं। वहीं हैदराबाद के माधापुर की शबनम सहाय ने लड़कियों में टॉप किया है। शबनम ने 372 में से 308 अंक हासिल कर ऑल इंडिया में 10वां स्थान प्राप्त किया है।

साभार: दैनिक हिन्दुस्तान 

मोदी के डिजिटल इंडिया में ये हैं देश के सबसे बड़े डिजिटल बनिया

मोदी के डिजिटल इंडिया में ये हैं देश के सबसे बड़े डिजिटल बनिया

दीपेंदर गोयल - zomato
व्यापार के डीएनए के साथ पैदा हुए बनियों ने सफलता की कई कहानियां हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के उभार के साथ इस समुदाय ने चाहे वह बंसल हों, गोयल हों, गुप्ता हो या अग्रवाल- इन्होंने नए व्यापारिक मॉडल, विशेष रूप से तेजी से बढ़ते डिजिटल उद्योग को आसानी से अपना लिया है।

ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म 'जोमेटो' के संस्थापक दीपिंदर गोयल हैं, ऑनलाइन टैक्सी सर्विस 'ओला' के संस्थापक भाविश अग्रवाल हैं, वहीं 'फ्लिपकार्ट' के संस्थापक सचिन बंसल, किफायती होटल श्रंखला 'ओयो रूम्स' के संस्थापक 24 वर्षीय रीतेश अग्रवाल और 'लेंसकार्ट' के संस्थापक पीयूष बंसल हैं।

जोमेटो' को 2.3 अरब डॉलर की कुल पूंजी के साथ शुरू किया गया था, जिसके कोष में हाल ही में 60 करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ। भारत में 'उबर' का स्थानीय प्रतिद्वंद्वी ओला की पूंजी लगभग 60 अरब डॉलर हो गई है। 'ओला' अब लगभग 125 शहरों में है।

फ्लिपकार्ट' से निकलने के बाद उसे अपनी लगभग एक अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेचने के बाद बंसल ने भावीश की 'ओला' में 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया और उनके इसमें और ज्यादा निवेश करने की संभावना है।

इन सभी में एक विशेषता समान है : हिसाब किताब पर मजबूत पकड़ और उनके आधुनिक उपभोक्ताओं के बारे में स्पष्ट समझ, जिनमें ज्यादातर युवा हैं और पिज्जा मंगाने से लेकर, कैब बुलाने, उड़ानें बुक करने और कहीं भी खरीदारी करने तक के लिए अपना ज्यादातर समय स्मार्टफोन और इंटरनेट पर बिताते हैं।

मोर्गन स्टेनली' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारियों, बैंकरों, साहूकारों, अनाजों और मसालों के विक्रेताओं के पेशेवर समुदाय बनिया ने लगभग 40 करोड़ युवाओं की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर खुद को बहुत तेजी से तैयार किया है |

साइबरमीडिया रिसर्च एंड सर्विसिस लिमिटेड' (सीएमआर) के प्रमुख और वरिष्ठ उपाध्यक्ष थॉमस जॉर्ज ने कहा, "पारंपरिक व्यावसायिक घरानों के युवाओं ने फायदेमंद ई-कॉमर्स में कदम रख दिया है, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं, नए व्यापारिक मॉडलों और बेहतर शिक्षा के प्रति जागरूकता के कारण वे सफल भी हुए हैं।"

देश में 40 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता और लगभग 50 करोड़ ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ता (लगभग 97 फीसदी वायरलैस कनेक्शन) हैं, जिसे 'बनिया ब्रिगेड' ने ई-कॉमर्स और ऑनलाइन उद्योग में अपना अबतक का सबसे बड़ा अवसर माना है।

'जोमेटो' वर्तमान में प्रति महीने 2.2 करोड़ ऑर्डर लेती है। कंपनी ने ड्रोन आधारित फूड डिलीवरी के लिए देशी स्टार्टअप 'टैकईगल इन्नोवेशंस' का अधिग्रहण कर लिया।

दीपिंदर गोयल के अनुसार, 'जोमेटो' अभी हवाई नवाचार के शुरुआती दौर में है और नए कल के निर्माण के लिए छोटे-छोटे कदम बढ़ा रहा है, जहां उपभोक्ता उनके ऑर्डर किए गए खाने की डिलीवरी के लिए एक ड्रोन का इंतजार करें।

साभार : udaybulletin.com

Tuesday, May 21, 2019

तेली वैश्य समाज के महापुरुष

ADITI AGRAWAL - अनपढ़ सास ने बहु को IAS बनाया

अनपढ सास ने बेटी की तरह अपनी बहू को पढ़वाया…बहू ने IAS बनकर नाम किया रौशन


अनपढ़ सास और दसवीं पास ससुर ने बहू के हौसले बुलंद कर दिए। तो उसने समाज का नाम रोशन कर दिया। कमला नगर के शांति नगर निवासी मंजू अग्रवाल ने बच्चों को पढ़ाया और बहू को आइएएस बना दिया। सिविल सर्विसेज में अदिति ने पहले प्रयास में ही IAS की परीक्षा पास की है।

उनका कहना है कि मेरी कामयाबी के साथी सास मंजू अग्रवाल, ससुर राजीव अग्रवाल और पति निशांत अग्रवाल हैं। गाजियाबाद के मोदी नगर के दयावती मोदी पब्लिक स्कूल 12वीं का पढ़ाई करने वाले अदिति बताती हैं कि कालेज के वक्त उनके दोस्तों से प्रेरणा मिली थी और कालेज के पास बने गंदे नाले के पास रहने वालों को देखकर यह फैसला लिया है। एपीजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्ट एंड प्लानिंग ग्रेटर नोएडा से बीआर्क किया है। वर्ष 2015 में उनकी शादी आगरा में निशांत से हो गई। इसके बाद आईएएस की तैयारी शुरू की थी। पहले ही प्रयास में ही सफलता हासिल की है।

मजबूत बेसिक से लक्ष्य आसान : आइएएस की परीक्षा में 282वीं रैंक हासिल करने वाली अदिति ने बताया कि सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठने के लिए अभ्यार्थियों को बेसिक मजबूत करना चाहिए। गंदगी में रहने वालों की बनेंगी हमदर्द : अदिति कालेज जाते वक्त मोदी नगर में नाले के पास रहने वालों लोगों को देखकर परेशान होती थी। वह उनके लिए काम काम करना चाहती हैं।

साभार: livebavaal.com/mother-in-low-promote-daughter

Ravi RajMay 12, 2019

VARUN BARNWAAL - कभी दो वक्त की रोटी के लिए साइकिल पंचर बनाते थे, आज IAS अधिकालरी हैं वरुण बरनवाल

कभी दो वक्त की रोटी के लिए साइकिल पंचर बनाते थे, आज IAS अधिकालरी हैं वरुण बरनवा


कहते हैं जहां चाह, वहां राह। अगर हौसले बुलंद हों और आत्मविश्वास मजबूत हो तो हर इंसान अपने सपनों को पूरा कर लेता है। दुनिया की सारी तकलीफों को पीछे छोड़ते हुए सफलताओं के डगर में आगे बढ़ता रहता है। इसी बात को सच कर दिखाया है महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर बोइसार के रहने वाले वरुण बरनवाल ने।

वरुण ने एक समय अपनी स्कूल की पढ़ाई छोड़ साइकिल के पंक्चर लगाने का काम शुरू किया था। पिता की मौत के बाद पूरा परिवार भूख से परेशान था। ऐसे में बचपन से पढ़ाई में अव्वल रहे वरुण ने 10 वी कक्षा की परीक्षा देने के बाद से अपने परिवार का दायित्व संभाला और अपने पिता के साइकिल मरम्मत की दुकान को चलाने लगा। वह दिन रात अपनी किताबों से दूर साइकिल के पंक्चर लगाता था। लेकिन उसका मन हमेशा पढ़ाई में ही रहा।

10 वी के परिणाम आने के बाद पता चला कि उसने पूरे शहर में दूसरा स्थान हासिल किया है। लेकिन पैसे की कमी के चलते वह आगे की पढ़ाई नहीं कर सकता था। ऐसे में उनके एक परिचित डॉक्टर ने पढ़ाई में वरुण के लगन को देखकर उसका कॉलेज में एडमिशन करवा दिया। एक बार फिर वरुण ने अपनी पढ़ाई शुरू की।

12 वी के बाद वरुण ने इंजीनियरिग कॉलेज में दाखिला लिया। हालांकि वरुण को अपने कॉलेज की फीस भरने में भी काफी दिक्कत होती थी। वह दिन में कॉलेज जाता था। शाम को साइकिल की दुकान पर बैठता था और फिर ट्यूशन पढ़ाता था। वरुण की कड़ी मेहनत रंग लाई और उसने अपने इंजीनियरिंग के पहले सेमिस्टर में ही टॉप किया। इसके बाद उसे कॉलेज की तरफ से स्कॉलरशिप दिया गया।

वरुण पढ़ाई के साथ-साथ समाज सुधारक कार्य में भी तत्पर रहता था। उसने अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल के आंदोलन में भी हिस्सा लिया था। इंजीनियरिंग पास करते ही वरुण ने यूपीएससी की परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी। पढ़ाई के लिए अपने 8 साल की कड़ी मेहनत के बाद वरुण ने आखिरकार यूपीएससी की परीक्षा में देश में 32 वा रैंक हासिल किया। कभी साइकिल का पंक्चर ठीक करने वाला वरुण आज अपने हौसले के बल पर आईएएस अधिकारी बन गया है। वह गुजरात के हिम्मतनगर का एसिसटेंट कलेक्टर है।

साभार: livebavaal.com/ias-varun-baranwal-story-india

Wednesday, May 15, 2019

वो चार 'सेठ', जिनकी ना के बराबर हुई थी पढ़ाई लेकिन कमाया अथाह पैसा

भारत के वो चार 'सेठ', जिनकी ना के बराबर हुई थी पढ़ाई लेकिन कमाया अथाह पैसा

जीवन में सफल होने का एकमात्र मानक उच्च शिक्षा नहीं है. यह हम नहीं कह रहे, भारत की ये दिग्गज हस्तियां साबित कर चुकी हैं.

जीवन में सफल होने का एकमात्र मानक उच्च शिक्षा नहीं है. यह हम नहीं कह रहे, भारत की ये दिग्गज हस्तियां साबित कर चुकी हैं.

जीवन में सफलता के कदम चूमने के लिए साक्षर होना, उच्च शिक्षा हासिल करना, बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में भारी-भरकम लेक्चर सुनना अनिवार्य नहीं है. इन बातों को हम नहीं कह रहे इन बातों को साबित किया है भारत के शीर्ष के उद्योगपतियों ने. उन शख्सियतों ने जिनकी पढ़ाई-लिखाई न के बराबर हुई है, लेकिन उनका उद्योग हजारों करोड़ का है.

घनश्याम दास बिड़ला, आजादी के आंदोलन के लिए भी दिए पैसे

इस सूची में सबसे ऊपर नाम घनश्याम दास बिड़ला (जीडी बिड़ला) का है. इन्होंने केएम बिड़ला ग्रुप की स्‍थापना की थी. एक आंकड़े के मुताबिक इस ग्रुप की परिसंपत्तियां करीब 200 अरब रुपये है. जीडी बिड़ला ने आरंभिक पढ़ाई के बाद ही पढ़ाई-लिखाई से तौबा कर लिया था.

जीडी बिड़ला का राजस्‍थान के पिलानी में 1894 में हुआ था. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई के बाद कोलकाता जाकर व्यसाय शुरू कर दिया. यही नहीं उस दौर में जब देशभर में आजादी की लड़ाई छिड़ी हुई थी, उस दौर में आजादी के जननायकों के लिए भी उन्होंने पैसे जुटाने का काम किया. आजादी के आंदोलन में कूदे बेहद पढ़े-लिखे लोगों को जब पैसे की जरूरत पड़ी तो वे जीडी बिड़ला के पास पहुंचे.


बाद में आजाद भारत में इसी केवल प्राथमिक शिक्षा हासिल करने वाले शख्स ने कपड़े, सीमेंट, बिजली, उर्वरक, दूरसंचार, एल्यूमीनियम के क्षेत्र में उल्लेखनीय व्यवसाय बिठाया.

रामकृष्ण डालमिया, नेहरू और जिन्ना दोनों के रहे प्र‌िय

रामकृष्ण डालमिया ने 18 साल की उम्र में जब कारोबार की दुनिया में कदम रखा, तो पिता विरासत में उनके लिए कुछ भी छोड़कर नहीं गए थे. इसके बाद अगले कुछ सालों में उन्होंने बड़ा उद्योग खड़ा कर लिया. जबकि उनकी शक्षणिक योग्यता के बारे में पता करें तो प्राइमरी के बाद उनके स्कूल या कॉलेज जाने का कोई सबूत नहीं मिलते. लेकिन इन्होंने डालमिया ग्रुप की स्‍थापना की.

डालमिया राजस्‍थान के चिरावा नाम के गांव में पैदा हुए थे. यहीं से उन्होंने ऊचाई का रास्ता तय किया. इन्होंने चीनी फैक्ट्री, सीमेंट, पेपर, बैंक, इंस्योरेंस कंपनी, बिस्कुट, एविएशन कंपनी और पब्लिकेशन के क्षेत्र में काम किया. जबकि उनकी अपनी पढ़ाई-ल‌िखाई बहुत ही कम हुई थी.






कहा जाता था कि वो जिस कारोबार में हाथ डालते थे, वहां उन्हें सफलता उनके हाथ चूमते थी. डालमिया के पास अकूत संपत्ति थी और ताकत भी था. वह गांधी से लेकर जिन्ना तक के सीधे संपर्क में रहते थे. वह रसिक और महिलाओं को पसंद करने वाले शख्स भी थे.

वैश्य समाज के बारे में सम्पूर्ण जानकारी के लिए पढ़िए " हमारा वैश्य समाज"

एमडीएच वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी, तांगा चलाने से यहां तक का सफर


'महाशय जी' के नाम से प्रसिद्ध धर्मपाल गुलाटी का जन्म साल 1919 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ. शुरुआती दिनों में ही बेहतर पढ़ाई के संस्‍थान और मन ना लगने के चलते इनकी शिक्षा छूट गई थी. यहीं से उनके व्यवसाय की नीव पड़ी. उन्होंने कंपनी की शुरुआत शहर में एक छोटे से दुकान से की. लेकिन 1947 में उनका परिवार दिल्ली आ गया.

ऐसा कहा जाता है कि एमडीएच के मालिक ने दिल्ली पहुंचने के बाद एक तांगा खरीदा जिसमें वह कनॉट प्लेस और करोल बाग के बीच यात्रियों ढोने का काम करते थे. गरीबी की वजह से मजबूर धर्मपाल को इस वक्त अधिक यात्री नहीं मिलते थे, इनमें से कुछ उनके साथ गाली-गलौज भी करते थे.


गरीबी से तंग आकर उन्होंने अपना तांगा बेच दिया और 1953 में चांदनी चौक में एक दुकान किराए पर ले ली जिसका नाम रखा गया महाशिया दी हट्टी (MDH) और वह करना शुरू किया जिसके लिए वह जाने जाते थे- मसालों का व्यापार. अब उनको लेकर कितनी ही तरह की बातें होती हैं.

वालचंद हीराचंद

सेठ वालचन्द हीराचन्द को देश में जहाज बनाने, एयरक्राफ्ट बनाने की शुरआत की थी. इसके रास्ते वे देश के दूसरे व्यापारों में भी आए और एक सफलतम कारोबारी बने. उनका जन्म 23 नवम्बर 1882 गुजरात के जैन परिवर में हुआ था. ऊपर के लोगों की तुलना में इन्‍होंने स्नातक तक पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ी थी. लेकिन इनका पाला भी उच्चस्तीय शिक्षा नहीं पड़ा था.


पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के बाद उन्होंने पहले फैमिली बिजनेस करना शुरू दिया. लेकिन बाद में उन्होंने घरेलू व्यापार को छोड़ दिया और खुद से जहाजरानी, वायुयान निर्माण, कार निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और सफलता के कदम चूमे.

साभार: news 18 hindi


Tuesday, May 7, 2019

ICSE BOARD EXAM INDIA TOPPER , वैश्य समुदाय के बच्चो का जलवा







साभार: अमर उजाला 

INDIA TOPPER तरु जैन ने सोशल मीडिया से दूरी बनाए बगैर की पढ़ाई; 500 में से 499 अंक आए

तरु जैन ने सोशल मीडिया से दूरी बनाए बगैर की पढ़ाई; 500 में से 499 अंक आए


अपनी टॉपर बेटी का मुंह मीठा कराते माता-पिता।

जयपुर की तरु जैन ने 500 में से 499 अंक लाकर सीबीएसई 10वीं में टॉप किया है। तरु ने इस सफलता का क्रेडिट अपने टीचर्स, फ्रेंड्स व फैमिली को दिया है। तरु ने कहा कि वह दिल्ली यूनिवर्सिटी से सीए करना चाहती है या इकॉनोमिक ऑनर्स करना चाहती हूं। उन्होंने कहा कि साेशल मीडिया से दूरी बनाए बगैर पढ़ाई की और यह मुकाम हासिल किया। तरु के पिता आईसीआईसीआई बैंक में चीफ मैनेजर (आई टी) हैं और मां नेहा जैन हाउस वाइफ हैं।

मैंने इतना एक्सपैक्ट नहीं किया था

तरु ने कहा, मैं इस बड़ी सफलता का क्रेडिट अपनी फैमिली, फ्रेंड्स व टीचर्स को देती हूं। मैंने इतना अच्छा परिणाम एक्सपैक्ट नहीं किया था। भविष्य में क्या करना है के बारे में पूछे जाने पर तरु ने कहा, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से सीए करना चाहती हूं।

सोशल मीडिया से नहीं बनाई दूरी

तरु ने कहा कि वह आधे घंटे सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती हैं। मैं कभी नहीं कहूंगी की सोशल मीडिया से पूरी तरह कटे रहें। यह रुटीन पढ़ाई के दौरान भी जारी रहा। मैं तीन-चार घंटे रोज पढ़ाई करती हूं। मेरी मैथ्स और स्टेटिक्स में हमेशा रुचि रही है। कई बार मुझे लगता है कि जो मैंने पढ़ा है उसे भूल जाती हूंं ऐसे स्थति में मेरे पेरेंंट्स मेरी मदद करते थे।

बेटी पर गर्व

तरु के पिता धर्मेंद्र जैन ने कहा उनकी बेटी ने न केवल माता-पिता का बल्कि राजस्थान का भी नाम रोशन किया है। उन्होंने कहा कि हमें 97 प्रतिशत तक की उम्मीद थी, लेकिन इतनी उम्मीद नहीं थी। धर्मेंद्र ने कहा कि आज गर्व महसूस हो रहा है, हम गौरवान्वित है। वहीं तरु की मां नेहा जैन ने कहा कि आज मुझे मेरी बेटी के नाम से जाना जा रहा है। इस खुशी को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। यह गर्व करने लायक है। उन्होंने बताया कि हमारा संयुक्त परिवार है और तरु सबके साथ घुलमिल रहती है।

वह पढ़ाई के साथ और कामों में भी रुचि लेती है। नेहा ने कहा कि तरु को सपोर्ट करने की ज्यादा जरूरत नहींं पड़ी। यह खुद परफेक्ट है। इस पर ज्यादा प्रेशर डालने की जरूरत नही है। उन्होंने कहा कि हम तरु के सपने करने के लिए उसके साथ हैं। उसे अपने फैसले लेने की पूरी आजादी है। वह आगे जो भी पढ़ाई या करियर के बारे में तय करेगी हम उसका पूरा साथ देंगे। आगे सब कुछ इसके ऊपर छोड़ रखा है।


साभार: दैनिक भास्कर 

वैश्य समाज का नाम रोशन करते दसवी के टोपर

वैश्य समाज के बच्चो ने फिर से समाज का नाम रोशन किया हैं. 10th CBSE के परिणाम में सम्पूर्ण भारत से टॉप थ्री पोजीशन पर 64 बच्चो में 25 वैश्य समाज से हैं. बहुत बधाई आप सभी को.  कुछ तो बात हैं की हस्ती मिटती नहीं हमारी. हमें आरक्षण की भीख नहीं चाहिए. बहुत हिम्मत हैं  हम में. अपना रास्ता खुद बनाते हैं.  

1st. position.

1. TARU JAIN                        JAIPUR
2. YOGESH GUPTA              JAUNPUR
3. VATSAL VARSHNEYA     MEERUT
4. APOORVA JAIN                GHAZIABAD
5. SHIVANI LATH-                NOIDA
6. DHATRI MEHTA               THANE
7. ANKIT SAHA                    HYDERABAD
8. SHIVIKA DUDANI           DELHI

2nd POSITION

1. KASHVI JAIN                   AMBALA
2. DRISHTI GUPTA              PANCHKULA
3 AYUSHI SHAH                  AJMER
4. MALLIKA MANDAL       NOIDA
5. RADHIKA GUPTA            NOIDA
6. MANAN GUPTA               GHAZIABAD
7. NEHA JAIN 

3rd POSITION

1. SHUBH AGRAWAL          MEERUT
2. RAGHAV SINGHAL         GHAZIABAD
3. ANMOL GUPTA                NOIDA
4. MEHUL GARG                  GHAZIABAD
5. ISHITA AGRAWAL           GHAZIABAD
6. RIDHIMA GUPTA             GHAZIABAD
7. PIYA GUPTA                      GURUGRAM
8. NEHA JAIN                        DELHI

Monday, May 6, 2019

योगेश गुप्ता ने पूरे भारत में टॉप किया

जौनपुर के सेंट पैट्रिक स्कूल के CBSC बोर्ड की 10th के परीक्षा परिणाम में योगेश गुप्ता ने पूरे भारत में टॉप किया,500 में 499 अंक।
बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएं।।
इनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं।

वत्सल वार्ष्णेय 10th इंडिया टोपर

Tuesday, April 2, 2019

RUPA GROUP - कभी दुकानों से भगा दिया जाता था, आज है 1500 करोड़ के बिज़नेस

कभी दुकानों से भगा दिया जाता था, आज है 1500 करोड़ के बिज़नेस के मालिक


Rupa Group Success Story : इस कंपनी को इस मुकाम तक पहुचाने में दो भाइयों की जोड़ी ने अपने पूरे जीवन को समर्पित कर दिया है उनके नाम है प्रहलाद राय अग्रवाल (74) और कुंज बिहारी अग्रवाल (64) जो व्यापार क्षेत्र में KB और PRके नाम से विख्यात हैं। दोनों मारवाड़ी व्यापारिक विरासत से आये है जिन्होंने अपना पूरा जीवन व्यापार में लगा दिया है।

जब KB से व्यापार के बारे में पूछा गया तो उनके अनुसार – ” व्यापार एक तरह से एडजस्टमेंट है जिसमें हमेशा मार्कट की गति के अनुसार अपने आप को अच्छा बनाते हुए कैसे आप वस्तुओं को क्वालिटी के साथ बेच सकते हो और अपनी मार्केट वैल्यू बनाते हो।“

इसी फिलॉसफी पर काम करते हुए आज रूपा अपने व्यापार क्षेत्र (इनरवेयर बिज़नेस) में लीडर बनकर उभरा है जो सतत विकास एवं प्रयासों का साझा फल है। यह एक कहानी है जो लगातार बन रहे मार्केट में मौकों को भुनाने के साथ ही नवीनतम तकनीक और कठिन मेहनत से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना है।

जैसे जैसे लोगों की आमदनी बढ़ती गई है वैसे ही इस क्षेत्र में भी कॉम्पिटिशन बढ़ता गया है , इनरवियर बिज़नेस में आज LUX, VIP, Dollar और Jockey जैसे ब्रांड मौजदू है लेकिन RUPA एक मार्केट लीडर के रूप में उभरा है जो इस कंपनी के लीडरशिप को दर्शाता है ।

रूपा ग्रुप के इनरवियर ब्रांड्स 

सबसे खास चीज़ जो RUPA ने अन्य प्रतिस्पर्धीयों से अलग की है वो है अपने ही क्षेत्र में ब्रांड को विकसित करना। जब Rupa ब्रांड पूरे भारत मे अच्छा बिज़नेस कर रहा था तब इन्होंने MacroMan नाम से एक प्रीमियम ब्रांड मार्किट में उतारा.

जो आज उनका फ्लैगशिप ब्रांड बन गया है जिसकी पहुंच अब निम्न और मध्यम वर्गीय ग्राहकों के साथ ही उच्च वर्ग ग्राहकों में भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा है। इस ब्रांड के द्वारा इन्होंने ग्राहकों को एक प्रीमियम अनुभव कराने का एक सफल उदाहरण पेश किया है।

इस तरह के सफल प्रयोगों के साथ इंडस्ट्री लीडर बनना RUPA के लिये आसान होता गया , इन ब्रांड्स ने रेवेन्यू को पांच गुना करते हुए 800 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया है तथा सालाना लगभग 20% की दर से इनका रेवेन्यू और प्रॉफिट बढ़ रहा है .

इनके पास अब पूरी ब्रांड चैन बन चुकी है जो किड्स से लेकर एडल्ट्स तथा निम्न से उच्च वर्गों में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाब रहे हैं।

Rupa Group Success Story

तो कहानी शुरू होती है 1968 में जब 19 वर्षीय PR अग्रवाल ने वो शुरुआत की है जो आज RUPA Group के नाम से हमारे सामने है। इनकी कहानी भी राजस्थान के मारवाड़ी परिवारों से मिलती है जिन्होंने ने रोज़गार के नए अवसरों के लिए राजस्थान को छोड़कर देश के अन्य क्षेत्रों की तरफ रुख किया था।

रूपा के विज्ञापन 

PR के पिताजी शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले के रहने वाले थे, लगातार अकाल और खेती के चौपट होने के कारण कोलकाता शिफ्ट होने का निर्णय लिया। कोलकाता में बहुत ही कम पूंजी में अपना व्यापार शुरू किया और पूरा परिवार यही विस्थापित हो गया ।

PR शुरुआत में कोलकाता में एक कॉलेज खोलना चाहते थे लेकिन साथ ही अपने परिवार के बिज़नेस में भी लगातार काम करते रहे। हमेशा मेहनती और नए आइडियाज पर काम करने वाले PR अपने पिताजी से विरासत में मिले व्यापार से ज्यादा खुश नही थे।

इसी तड़प और नए करने की चाहत ने 1962 में बिनोद होजरी नाम से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की नींव डाली लेकिन अगले 6 सालों में यह व्यापार नही चल पाया और वो घाटे में आ गए।

अपने कारोबार या यूं कहें कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए 1968 में इन्होंने RUPA नाम से इनरवेयर उत्पादन का काम शुरू किया जो उनके पिछले से कारोबार से कई गुना कारगर साबित हुआ।

1960 के दशक में Dora नाम से एक इनरवेयर ब्रांड बहुत ही पॉपुलर होने के साथ ही मार्किट लीडर था। PR का सीधा सामना अब Dora से ही होने वाला था , जब भी रिटेलर्स के पास अपने ब्रांड Rupa को बेचने जाते तो उन्हें दुकानों से भगा दिया जाता था।

जब रिटेलर्स उनका प्रोडक्ट नही ले रहे है तो उन्होंने व्हॉल सेलर्स को 2 महीने तक माल क्रेडिट पर देना शुरू कर दिया तथा धीरे धीरे Rupa ब्रांड मार्किट में अपनी पहुंच बनाने में कामयाब रहा लेकिन अभी भी DORA से प्रतिस्पर्धा बहुत दूर की बात थी।

एक  समारोह के दौरान ग्रुप  संस्थापक अग्रवाल बंधू 

कहते है जब इंसान कठिन मेहनत कर रहा होता है तो ईश्वर भी उसका साथ देता है , ऐसा ही कुछ PR के साथ भी हुआ । अगले तीन साल में Dora ने अपने रिटेल क्षेत्र में ध्यान बढ़ाने के चलते कम लाभ वाले इनरवेयर बिज़नेस को बंद कर दिया ।

ये मौका PR के लिए एक मार्केटिंग अवसर बन कर आया और इसको PR ने हाथों हाथ लिया और जुट गए Rupa को ब्रांड बनाने में , इनके इस काम मे छोटे भाई KB का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

कोलकाता के आसपास अपनी पैठ बनाने के बाद RUPA ने पूरे देश मे अपनी पहुंच बनाने का फैसला लिया और अच्छी क्वालिटी के साथ ही आक्रामक मार्केटिंग के साथ ही अपने क्षेत्र में उतर गए ।

Rupa ने अपने आप को मार्कट में बनाये रखने के लिए आउटसोर्सिंग के बजाय ब्रांड क्रिएशन और मार्केटिंग पर ज्यादा ध्यान दिया । इसी के फलस्वरूप 1980 में बॉलीवुड फिल्मों के कैसेट्स पर एडवरटाइजिंग देने का फैसला किया जिससे पूरे देश मे इनकी पहुंच बनी और सेल्स में जोरदार बढ़त देखने को मिली।

लेकिन असली सफलता 1990 में आज तक के साथ एडवरटाइजिंग के बाद मिली और उनकी टैग लाइन ‘ ये आराम का मामला हैं‘ सभी की जुबान पर चढ़ गई और आज का RUPA ब्रांड अब मार्केट लीडर बन गया है । अब बाकी की कहानी मार्केट की सफलता की कहानियां बन गई है ।

PR और KB दोनों भाइयों ने मिलकर अपनी व्यापारिक कुशलता एवम मेहनत से भारतीयों का सबसे पसंदीदा ब्रांड खड़ा कर लिया है ।

RUPA के बारे में रोचक तथ्य: 

रूपा के ब्रांड – 
Softline, 
Euro, 
Bumchums, 
Torrido, 
Thermocot, 
Macroman, 
Footline and 
Jon 

इनरवेयर मार्केट लीडर 

सेलिब्रिटी जो रूपा ब्रांड से जुड़ चुके हे – Govinda, Sanjay Dutt, Aishwarya Rai, Ronit Roy, Ranveer Singh, Sidharth Malhotra, Bipasha Basu 
Revenue – 1500 Carore 

सीखने योग्य बातें

इस RUPA ग्रुप के सफर से कई वास्तविक अनुभव निकल कर आये है जिन्हें अपने जीवन मे आत्मसात कर सकते है। सबसे महत्वपूर्ण बात सीखने को जो मिलती है वो अंत तक लड़ते रहना और कितनी भी विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना ।

हम भी शरुआती विफलताओं से घबरा कर अपना कार्य बीच मे ही छोड़ देते है जिससे हमारा सारा किया गया कार्य व्यर्थ हो जाता है। हमें अंत तक लड़ना चाहिए और हमेशा विफलता के बाद भी एक और प्रयास के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार रखना चाहिए।

DEEPAK GUPTA - मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ डेयरी से सालाना करोड़ों की कमाई कर रहे दीपक गुप्ता

मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ डेयरी से सालाना करोड़ों की कमाई कर रहे दीपक गुप्ता

सिंगापुर में कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में तीस वर्षों की लगी-लगाई नौकरी छोड़कर दीपक गुप्ता इन दिनों नाभा (पंजाब) में हिमालय क्रीमी डेयरी से सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रहे हैं। उनका धंधा कुछ ही साल में इतना मुनाफेदार होने की सबसे बड़ी वजह है उनके डेयरी की दूध की शुद्धता। वह अपने यहां किसी को दूध छूने भी नहीं देते हैं। थन से सीधे दूध कोल्ड टैंकों में स्टोर होता है।

दीपक गुप्ता

पहले दूध में केवल पानी मिलाया जाता रहा है किन्तु आज हालात ये हैं कि लोग दूध में सिंथेटिक पदार्थ मिलाने लगे हैं। दूध में मिलाये जाने वाले कुछ केमिकल तो इतने दुष्प्रभावी होते ही हैं कि उनका असर आने वाली संतानों पर भी पड़ने का खतरा होता है। 

सिंगापुर में अपना लंबा करियर छोड़ कर चंडीगढ़ से लगभग दो घंटे की ड्राइव दूरी पर नाभा (पंजाब) में हिमालय क्रीमी डेयरी चला रहे दीपक गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने 20 एकड़ जमीन में डेयरी स्थापित की है जिसमें होल्सटीन फ्रीजिएन तथा जर्सी नस्ल की सैकड़ों गायें हैं। उनका सपना था कि वह लोगों को ऐसा दूध उपलब्ध कराएं, जिसे हाथ से छुआ भी न गया हो। यह नया नहीं है बल्कि दुनिया भर में ‘फार्म टू टेबल’ डेयरी कारोबार के नाम से काफी प्रचलित है, जिसे लोग पसंद भी करते हैं। उनकी डेयरी में दूध को हाथ से छुआ भी नहीं जाता। सीधे स्टोर किया जाता है। इसके बाद दूध को रेफ्रिजरेटेड ट्रकों के जरिये सप्लाई किया जाता है। गायों के चारे के लिए वह फार्म में जैविक पद्धति से उगे गेहूं और सब्जियों का इस्तेमाल करते हैं।

गायों के वेस्ट का इस्तेमाल कर बायोगैस और उर्वरक भी तैयार किया जाता है। आज हिमालय क्रीमी डेयरी फार्म से उन्हें सालाना कई करोड़ की आय हो रही है। दो साल पहले उन्होंने डेयरी फॉर्म का यह काम शुरू किया था। चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज में पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद उन्हें नौकरी की जरूरत महसूस हुई तो विदेश निकल गए। वह सिंगापुर में एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने लगे लेकिन अपना मुल्क छोड़कर तीन दशक तक लगातार विदेश में रहने से उनका मन उचटने लगा था। विदेश में वह जिस मल्‍टीनेशनल कंपनी में नौकरी करते थे, उसका भी एग्रीकल्‍चर का ही काम था। उससे भी उन्हें अपने इस नए धंधे का अनुभव मिला था।

एक दिन जब वह सिंगापुर से भारत लौट रहे थे, तभी रास्ते में अखबार पढ़ते समय एक खबर ने उनको इतना उत्साहित कर दिया कि जीवन की दिशा ही बदल गई। उन्होंने उसी वक्त सिंगापुर की नौकरी छोड़ने की ठान ली। तय कर लिया कि अब जो कुछ करेंगे, अपने देश की धरती पर। अब नौकरी के लिए सिंगापुर नहीं जाएंगे। घर लौटकर उन्‍होंने अपनी लगभग बीस एकड़ की जमीन पर डेयरी का काम शुरू कर दिया। अच्छी नस्ल की जर्सी गाएं खरीद लाए। उनके साथ कुछ अन्य नस्ल की भी गाएं थीं। धीरे-धीरे उनकी संख्या तीन सौ से अधिक हो गई। इस वक्त साढ़े तीन सौ गाएं उनके फॉर्म में हैं। उनको रोजाना मशीनों से दुहा जाता है।

शुद्धता को ध्यान में रखते हुए मशीनों के जरिए दूध सीधे टैंकों में जमा किया जाता है और वहीं से ग्राहकों को सप्लाई कर दिया जाता है। दीपक गुप्ता बताते हैं कि आजकल आम तौर से ग्राहकों को शुद्ध दूध का अभाव रहता है। उनको जल्दी पूरी तरह गैरमिलावटी दूध मिलना मुश्किल रहता है। ऐसे में वह किसी भी कीमत पर अपनी गायों के दूध की शुद्धता पर कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। यहां तक कि पैकिंग के वक्त भी उनके दूध पर कोई कर्मचारी हाथ नहीं लगा सकता है। यही कारण है कि ग्राहक उनके दूध की शुद्धता पर पूरा भरोसा करते हैं और इससे उनके दूध की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

किसी ज़माने में भारत में शुद्ध दूध की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दूध-दही की नदियां बहने वाला देश कहा जाता था। पहले दूध में केवल पानी मिलाया जाता रहा है किन्तु आज हालात ये हैं कि लोग दूध में सिंथेटिक पदार्थ मिलाने लगे हैं। दूध में मिलाये जाने वाले कुछ केमिकल तो इतने दुष्प्रभावी होते ही हैं कि उनका असर आने वाली संतानों पर भी पड़ने का खतरा होता है। वैसे अब दूध की शुद्ध आजमाने के तरीके भी लोगों ने सीख लिए हैं। शुद्धता जांचने के लिए सर्वप्रथम आप उसकी खुशबू लें। यदि उस दूध में साबुन जैसी गंध आती है तो वह दूध सिंथेटिक है।

शुद्ध दूध स्वाद में हल्का मीठा होता है, जबकि नकली और सिंथेटिक दूध का स्वाद डिटर्जेंट और सोडा मिला होने के कारण कड़वा हो जाता है। शुद्ध दूध को कुछ समय या एक से अधिक दिन भी स्टोर करने पर उसका रंग नहीं बदलता, जबकि नकली दूध कुछ ही समय के बाद पीला पड़ने लगता है। पानी के मिलावट की पहचान करने के लिए दूध को एक काली सतह पर थोड़ा सा गिरा दे। यदि दूध असली होगा तो उसके पीछे एक सफेद लकीर छूटेगी अन्यथा नही। उबालते समय शुद्ध दूध का रंग नही बदलता है जबकि नकली दूध उबालने पर पीले रंग का हो जाता है। किसी चिकनी जगह जैसे लकड़ी या पत्थर की सतह पर एक-दो बूंद दूध टपकाइए, आप देखेंगे की यदि वह शुद्ध है तो नीचे की और बहने पर उसके पीछे सफ़ेद धारी जैसा निशान हो जाएगा वरना दूध अशुद्ध है। शुद्ध दूध को हथेली पर रगड़ने से चिकनाहट महसूस नहीं होती है जबकि अशुद्ध दूध डिटर्जेंट जैसी चिकनाहट पैदा कर देता है। दीपक गुप्ता के डेयरी का दूध इन सारे तरीकों से आजमाया जा चुका है। आज तक उन्हें कहीं से कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली है।

दीपक गुप्ता की डेयरी

दीपक गुप्ता को अब शुद्धता की बदौलत ही अपने व्यवसाय से अब सालाना करोड़ों रुपए की कमाई हो रही है। वह अपने इस कारोबार से इतना संतुष्ट और खुश हैं कि उन्हें न तो पुराना जॉब छोड़ने का कोई पश्चाताप है, न और किसी काम की जरूरत रह गई है। उनका ये कारोबार दिनोदिन उन्नत होता जा रहा है। दीपक गुप्ता बताते हैं कि अखबार की खबर भी एक निमित्त मात्र बनी, पढ़ते ही तुरंत मूड बना लिया वरना हाईटेक डेयरी खोलना तो उनका पढ़ाई के समय से ही बड़ा पुराना सपना रहा है। हां, बिना हाथ लगाए दूध की पैकिंग का आइडिया जरूर उन्‍हें सिंगापुर से भारत के सफर के दौरान मिला था। वह अक्‍सर भारत में अखबारों में मिलावटी दूध के बारे में पढ़ते थे। तभी से उनके मन में कुछ नया करने की बात तेजी से जोर मारने लगी थी। वैसे भी हमारे देश में खाटी दूध मिलना सपने जैसा ही होता है। खास कर त्योहारों के मौके पर शुद्ध खोवा तक मिलना दुश्वार रहता है। पता नहीं क्यों लोग दूध जैसे पेय का इतनी धोखेबाजी से धंधा करते हैं। ईमानदारी से करें तो इसमें वैसे ही भारी बरक्कत के चांस रहते हैं।

विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अभी पिछले महीने ही कहा है कि उपज बढ़ाने के लिए कीट नाशकों तथा अन्य रासायनों के इस्तेमाल से कृषि उत्पादों आदि में प्रदूषण होने से भारत में मां का दूध भी पूरी तरह शुद्ध नहीं रह गया है, फिर गाय-भैस के दूध की शुद्धता की बात कौन करे लेकिन दीपक गुप्ता कहते हैं कि उनका दावा है, कोई उनकी डेयरी के दूध को अशुद्ध सिद्ध करके दिखाए। वैसे साधारणतया दूध में 85 प्रतिशत जल होता है और शेष भाग में ठोस तत्व यानी खनिज और वसा होता है। गाय-भैंस के अलावा बाजार में विभिन्न कंपनियों का पैक्ड दूध भी उपलब्ध होता है। दूध प्रोटीन, कैल्शियम और राइबोफ्लेविन (विटामिन बी -2) युक्त होता है। इनके अलावा इसमें विटामिन ए, डी, के और ई सहित फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयोडीन व कई खनिज और वसा तथा ऊर्जा भी होती है।

इसमें कई एंजाइम और कुछ जीवित रक्त कोशिकाएं भी हो सकती हैं। गाय के दूध में प्रति ग्राम 3.14 मिली ग्राम और भैस के दूध में प्रति ग्राम 0.65 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। जहां तक मिलावट की बात है, आजकल ज्यादातर कंपनियां इसमें विटामिन ए, लौह और कैल्शियम ऊपर से मिलाती हैं। इसमें भी कई तरह के जैसे फुल क्रीम, टोंड, डबल टोंड और फ्लेवर्ड मिल्क बेचे जा रहे हैं। फुल क्रीम में पूर्ण मलाई होती है, अतः वसा सबसे अधिक होता है। इन सभी की अपनी उपयोगिता है, पर चिकित्सकों की राय के अनुसार बच्चों के लिए फुल क्रीम दूध बेहतर है तो बड़ों के लिए कम फैट वाला दूध। दीपक गुप्ता कहते हैं कि दूध में यदि मिलावट कर दीजिए तो खीर, खोआ, रबड़ी, कुल्फी, आईस्क्रीम यानी दुग्ध जनित हर प्रोडक्ट मिलावटी हो जाता है। इसलिए वह कत्तई अपने यहां दूध को किसी हाथ लगाने भर की भी छूट नहीं देते हैं।

साभार: yourstory.com/hindi/3857b45677-deepan-gupta-earning-m


Monday, April 1, 2019

अग्रोहा और लक्खी तालाब

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सालभर में बीकानेर के तीन अग्रवाल परिवारों ने 7000 करोड़ के नमकीन बेचे.


साभार: नवभारत टाइम्स 

MARWARI IN DELHI - दिल्ली में मारवाड़ी

ACHIN AGRWAAL - अचिन अग्रवाल, वैश्य गौरव




 


साभार: दैनिक भास्कर 

श्रेया अग्रवाल ने देश किये जीते ३ गोल्ड, बनाया विश्व रिकोर्ड

मप्र / शूटिंग के लिए 12वीं की परीक्षा छोड़ी थी, अब श्रेया ने देश के लिए जीते तीन गोल्ड मेडल


3 साल पहले पहली बार श्रेया ने उठाई थी एयरगन, अब वर्ल्ड चैम्पियन; भाई भी राष्ट्रीय स्तर का निशानेबाज

जबलपुर. यहां की रहने वाली श्रेया ने सोमवार को ताइपे (ताइवान) में चल रही 12वीं एशियन एयरगन शूटिंग चैम्पियनशिप में 10 मीटर एयर राइफल जूनियर वर्ग में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के साथ गोल्ड मेडल जीता। वे इससे पहले टीम और मिक्स्ड टीम इवेंट में भी देश के लिए गोल्ड जीत चुकी हैं। इस प्रदर्शन से उनके घर में जश्न का माहौल है। पिता संजय अग्रवाल ने दैनिक भास्कर एप प्लस से बातचीत की। उन्होंने श्रेया की जिंदगी के उस वाकये का जिक्र किया, जिसने बेटी को आज शिखर पर पहुंचा दिया।

पिता ने बताया कि तीन साल पहले, जब श्रेया 9वीं में थीं, तब वह स्कूल टीम के साथ एक शूटिंग इवेंट में गई थी। वहां उसने गोल्ड मेडल जीत लिया। इसके बाद वह निशानेबाजी का नियमित ट्रेनिंग लेने लगी। दूसरी वजह, उसका भाई यश है। जो राष्ट्रीय स्तर का शूटर है।

रात को ही कह दिया था कि गोल्ड जीतूंगी

पिता बताते हैं कि श्रेया ने अपने पहले प्रदर्शन के बाद से पीछे मुड़कर नहीं देखा। रविवार रात 8.30 बजे श्रेया का फोन आया था। कहा- कल मैच है। मैं गोल्ड ही जीतूंगी। इसके बाद हमें आज 11 बजे उसके कोच निशांत नथवानी ने बताया कि बेटी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ गोल्ड जीता है।

परीक्षा और खेल में, खेल को चुना 

संजय ने बताया कि एशियन चैम्पियनशिप के लिए दिल्ली में ट्रॉयल हो रहे थे और श्रेया को इसके लिए चुना। उसने मां (मीना अग्रवाल) और मुझसे कहा- शूटिंग चैम्पियनशिप का ट्रॉयल है और 12वीं की परीक्षा भी चालू हो रही है। इस पर हमने उसे कहा- परीक्षा होती रहेगी। तुम ट्रॉयल देने जाओ। वह गई और एशियन शूटिंग चैम्पियनशिप के लिए चुन ली गई।

तीन साल पहले उठाई गन, अब विश्व चैम्पियन 

18 साल की छोटी सी उम्र में विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में स्वर्णिम प्रदर्शन करने वाली श्रेया ने महज 3 साल पहले राइफल पकड़ी थी। नियमित अभ्यास, लगन और मेहनत के कारण उनकी देश के शीर्ष जूनियर निशानेबाजों के बीच अलग पहचान है।

गगन नारंग फाउंडेशन का फायदा मिला 

पिता ने बताया कि गगन नारंग फाउंडेशन से जुड़ने का श्रेया को फायदा मिला। उसने शूटिंग की बारीकियां तेजी से सीखीं। जबलपुर में उसके कोच निशांत नथवानी हैं। वे भी नारंग फाउंडेशन से जुड़े हैं।

बेटी पर गर्व है: पिता

ईपीएफ विभाग में कार्यरत पिता संजय कहते हैं, हमें अपनी बेटी पर गर्व है। उसने मप्र के साथ ही दुनिया में देश का मान बढ़ाया। इन तीन मेडल के साथ ही अब तक वह 13 इंटरनेशनल मेडल जीत चुकी है। सरकार ने उसे ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट (ओजीक्यू) के लिए भी चुना है। मां मीना अग्रवाल शासकीय शिक्षक हैं। बेटी की सफलता से बेहद खुश मीना कहती हैं- हमें उसके पदक जीतने की उम्मीद थी और उसने एक-दो नहीं पूरे तीन गोल्ड मेडल जीत लिए।


12वीं एशियन एयरगन शूटिंग चैंपियनशिप में श्रेया का प्रदर्शन- 

1 - 10 मीटर व्यक्तिगत स्पर्धा - गोल्ड 

2 - टीम इवेंट में गोल्ड 

3 - मिक्स्ड डबल में गोल्ड

श्रेया अग्रवाल का वर्ल्ड रिकॉर्ड.

श्रेया अग्रवाल ने चीन की रुओझू का 10 मीटर एयर राइफल का रिकॉर्ड तोड़ जूनियर महिला वर्ग में बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

ताइपे। पूरा भारत इस समय IPL के रंग में रंगा हुआ है। इस IPL में अब तक कई दिलचस्प मुकाबले देखने को मिले हैं। ऐसे में हर कोई IPL पर नजरे गड़ाए बैठा है। लेकिन, भारत के जूनियर चैंपियनों ने दुनिया में देश का नाम रोशन कर दिया है। शूटर श्रेया अग्रवाल ने सोमवार को एशियाई एयरगन चैंपियनशिप में जूनियर वर्ग का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है।

ताइपे में चल रही एशियाई एयरगन चैंपियनशिप के जूनियर महिला वर्ग मुकाबले में श्रेया अग्रवाल ने 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया। 18 साल की श्रेया ने फाइनल में 252.5 अंक हासिल किए, जो वर्ल्ड रिकॉर्ड है। इस वर्ग में भारत की मेहुली घोष ने कांस्य पदक जीता। उन्होंने 228.3 का स्कोर किया।

रिकॉर्ड

10 मीटर एयर राइफल के जूनियर महिला वर्ग मुकाबले में यह रिकॉर्ड अब तक चीन की रुओझू झाओ के नाम था। रुओझू ने पिछले साल 22 अप्रैल को कोरिया में वर्ल्ड चैम्पियनशिप के दौरान 252.4 का स्कोर किया था।
इस प्रतियोगिता में यशवर्धन के साथ मिलकर श्रेया अग्रवाल 10 मीटर एयर राइफल जूनियर मिक्स्ड टीम का स्वर्ण पदक पहले ही जीत चुकी हैं। उस इवेंट में मेहुली घोष और केवल प्रजापति की भारतीय जोड़ी रजत पदक जीतने में सफल रही थी।

साभार: दैनिक भास्कर