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Sunday, February 4, 2024

MALAV GUPTA VAISHYA DYNESTY - वैश्य गुप्तवंश (मागध अथवा मालव वंश)

#MALAV GUPTA VAISHYA  DYNESTY - वैश्य  गुप्तवंश (मागध अथवा मालव वंश)

सम्राट आदित्यसेन के अपसड़ (जिला गया) एवं सम्राट जीवित गुप्त के देववरणार्क (जिला शाहाबाद) के लेखों से एक अन्य गुप्त राजवंश का पता लगता है जो गुप्तवंश के पतन के पश्चात्‌ मालवा और मगध में शासक बना। इस वंश के संस्थापक श्री गुप्त थे। इनके क्रम में श्रीहर्षगुप्त, जीवितगुप्त, कुमारगुप्त, दामोदरगुप्त, महासेनगुप्त, माधवगुप्त, आदित्यसेन, विष्णुगुप्त एवं जीवितगुप्त (द्वितीय) इस वंश के शासक हुए।
परिचय

इस वंश का पूर्वकालिक गुप्तों से क्या संबंध था यह निश्चित नहीं है। पूर्वकालिक गुप्तों से पृथक्‌ करने की दृष्टि से इन्हें माधवगुप्त या उत्तरकालीन गुप्त कहते हैं। इस नए गुप्तवंश का उत्पत्तिस्थल भी विवादग्रस्त है। हर्षचरित्‌ में कुमारगुप्त और माधवगुप्त को ‘मालव राजपुत्र’ कहा है। महासेन गुप्त अनुमानत: मालवा के शासक थे भी। आदित्यसेन के पूर्ववर्ती किसी राजा का कोई लेख मगध प्रदेश से नहीं मिला। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कुछ विद्वानों ने कृष्णगुप्त के वंश का उत्पत्तिस्थल मालवा निश्चित किया। इसी आधार पर इन्हें मालवगुप्त कहते थे। किंतु अधिकांश विद्वान इन्हें मगध का ही मूल निवासी मानते हैं।

इस वंश के आरंभिक नरेश संभवत: गुप्त सम्राटों के अधीनस्थ सामंत थे। अपसड़ अभिलेख में कृष्णगुप्त को नृप कहा है एवं समानार्थक संज्ञाएँ इस वंश के परवर्ती शासकों के लिये भी प्रयुक्त हुई हैं। अपने वंश की स्वतंत्र सत्ता सर्वप्रथम इस वंश के किस शासक ने स्थापित की, यह अज्ञात है। कृष्णगुप्त के लिये अपसड़ लेख में केवल इतना ही कहा गया है कि वे कुलीन थे। उनकी भुजाओं ने शत्रुओं के हाथियों का शिरोच्छेद सिंह की तरह किया तथा अपने असंख्य शत्रुओं पर विजयी हुए। कृष्णगुप्त के समय में ही संभवत: कन्नौज में हरिवर्मन्‌ ने मौखरिवंश की स्थापना की। कृषणगुप्त ने संभवत: अपनी पुत्री हर्षगुप्ता का विवाह हरिवर्म के पुत्र आदित्यवर्मन्‌ से किया। कृष्णगुप्त के पुत्र एवं उत्तराधिकारी श्रीहर्षगुप्त (लगभग 505-525 ई.) ने अनेक भयानक युद्धों में अपना शौर्य दिखाया और विजय प्राप्त की। इनके उत्तराधिकारी जीवितगुप्त (प्रथम) (ल. 525-545 ई.) को अपसड़ लेख में ‘क्षितीश-चूड़ामणि’ कहा गया है। उनके अतिमानवीय कार्यों को लोग विस्मय की दृष्टि से देखते थे। मागधगुप्तों के उत्तरकालीन सम्राटों के विषय में इस प्रकार की कोई बात ज्ञात नहीं होती। संभवत: राजनीतिक दृष्टि से आरंभिक माधवगुप्त अधिक महत्वपूर्ण भी नहीं थे, इसी से लेखों में उनकी पारंपरिक प्रशंसा ही की गई है।

कुमारगुप्त (लगभग 540-560 ई.) के विषय में पर्याप्त एवं निश्चित जानकारी प्राप्त होती है। कदाचित उनके समय में मागधगुप्तों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषण की होगी। कुमारगुप्त ने मौखरि नरेश ईशानवर्मन को पराजित किया। उनकी सफलता स्थायी थी। प्रयाग तक का प्रदेश उनके अधिकार में था। उन्होंने प्रयाग में प्राणोत्सर्ग किया। उनके पुत्र दामोदरगुप्त ने पुन: मौखरियों को युद्ध में पराजित किया, किंतु वे स्वयं युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुए। इसी काल में मागध पुत्री ने मालवा पर भी अपना अधिकार स्थापित किया। दामोदरगुप्त के उपरांत उनके पुत्र महासेनगुप्त (लं. 563 ई.) शासक हुए। मौखरियों के विरूद्ध, अपनी शक्ति दृढ़ करने के उद्देश्य से उन्होंने थानेश्वर के नरेश राज्यवर्धन के पुत्र आदित्यवर्धन से अपनी बहन महासेनगुप्ता का विवाह किया। हर्षचरित में उल्लिखित कुमारगुप्त एवं माधवगुप्त के पिता मालवराज संभवत: महासेनगुप्त ही थे। अपसड़ लेख के अनुसार इन्होंने लौहित्य (ब्रह्मपुत्र नदी) तक के प्रदेश पर आक्रमण किया और असंभव नहीं कि उन्होंने मालवा से लेकर बंगाल तक के संपूर्ण प्रदेश पर कम से कम कुछ काल तक शासन किया हो। महासेनगुप्त ने मागध गुप्तों की स्थिति को दृढ़ किया, किंतु शीघ्र ही कलचुरिनरेश शंकरगण ने उज्जयिनी पर 595 ई. या इसके कुछ पहले अधिकार कर लिया। उधर वलभी के मैत्रक नरेश शीलादित्य (प्रथम) ने भी पश्चिमी मालव प्रदेश पर अधिकार स्थापित कर दिया। इसी बीच किसी समय संभवत: महासेनगुप्त के सामंत शासक शशांक ने अपने को उत्तर एवं पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: मगध भी महासेन गुप्त के अधिकार में इसी समय निकल गया। महासेनगुप्त का अपना अंत ऐसी स्थिति में क्योंकर हुआ, ज्ञात नहीं होता। पर उनके दोनों पुत्रों कुमारगुप्त और माधवगुप्त ने थानेश्वर में सम्राट प्रभाकरवर्धन के दरबार में शरण ली।

इस अराजक स्थिति में किन्हीं देवगुप्त ने स्वयं को मालवा या उसके किसी प्रदेश का शासक घोषित कर दिया। इस देवगुप्त का कोई संबंध मागध गुप्तों के साथ था या नहीं, नहीं कहा जा सकता। हर्षवर्धन के अभिलेखों के अनुसार राज्यवर्धन ने देवगुप्त की बढ़ती हुई शक्ति को निरूद्ध किया था। हर्षचरित के अनुसार देवगुप्त ने गौड़ाधिप शशांक की सहायता से मौखरि राजा को पराजित कर उन्हें मार डाला तथा राज्यश्री को बंदी बना लिया। राज्यवर्धन ने देवगुप्त को पराजित किया। किंतु देवगुप्त आदि ने षड्यंत्र द्वारा उन्हें मार डाला। किंतु इसके बाद देवगुप्त भी पराजित हो गए और क्रमश: हर्षवर्धन ने प्राय: संपूर्ण उत्तर भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

अपसड़ लेख से प्रतीत होता है कि माधवगुप्त ने मगध पर शासन किया और प्राय: अपना सारा जीवन हर्ष के सामीप्य एवं मैत्री में व्यतीत किया। हर्ष ने भी संभवत: माधवगुप्त को पूर्वसंबंधी एवं मित्र होने के नाते मगध का प्रांतपति नियुक्त किया होगा। माधवगुप्त ने हर्ष की मृत्यु के बाद ही अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की होगी। अपसड़ लेख में माधवगुप्त को वीर, यशस्वी और अनेक शत्रुओं को पराजित करनेवाला कहा गया है। इनके राज्य का आरंभ हर्ष की मृत्यु के शीघ्र बाद एवं उसका अंत भी संभवत: शीघ्र ही हो गया होगा। माधवगुप्त के पश्चात्‌ उनके पुत्र आदित्यसेन मगध के शासक हुए। इनके समय के अनेक लेख प्राप्त हुए हैं। उनकी सार्वभौम स्थिति की परिचायिका उनकी ‘महाराजाधिराज’ उपाधि है। देवघर से प्राप्त एक लेख में आदित्यसेन की चोल प्रदेश की विजय एवं उनके द्वारा किए गए विभिन्न यज्ञों आदि का उल्लेख है। उन्होंने तीन अश्वमेध भी किए। उनके काल के कुछ अन्य जनकल्याण संबंधी निर्माण कार्यों का ज्ञान लेखों से होता है। आदित्यसेन ने अपनी पुत्री का विवाह मौखरि नरेश भोगवर्मन से किया और उनकी पौत्री, भोगवर्मन की पुत्री, वत्सदेवी का विवाह नेपाल के राजा शिवदेव के साथ हुआ। नेपाल के कुछ लेखों में आदित्यसेन का उल्लेख ‘मगधाधिपस्य महत: श्री आदित्यसेनरय’ करके हुआ है। इससे लगता है कि पूर्वी भारत में मागधगुप्तों का बड़ा संमान एवं दबदबा था। आदित्यसेन के राज्य का अंत 672 ई. के बाद शीघ्र ही कभी हुआ।

आदित्यसेन के उपरांत उनके पुत्र देवगुप्त (द्वितीय) मगध की गद्दी पर बैठे। 680 ई. के लगभग वातापी के चालुक्य राजा विनयादित्य ने संभत: देवगुप्त को पराजित किया। इन्होंने ‘महाराजाधिराज’ उपाधि धारण की। देववरणार्क लेख से स्पष्ट है कि देवगुप्त के पश्चात उनके पुत्र विष्णुगुप्त मगध के शासक हुए। महाराजाधिराज उपाधि इनके लिये भी प्रयुक्त है। इन्होंने कम से कम 17 वर्ष तक अवश्य राज्य किया क्योंकि इनके राज्य के 17वें वर्ष का उल्लेख इनके एक लेख में हुआ है। इस वंश के अंतिम नरेश जीवितगुप्त (द्वितीय) थे। गोमती नदी के किनारे इनके विजयस्कंधावार की स्थिति का उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान होता है कि इन्होंने गोमती के तीरस्थ किसी प्रदेश पर मौखरियों के विरुद्ध आक्रमण किया था।

जीवितगुप्त के पश्चात्‌ इस वंश के किसी शासक का पता नहीं चलता। मागध गुप्तों का अंत भी अज्ञात है। गउडवहो से ज्ञात होता है कि 8वीं सदी के मध्य कन्नौज के शासक यशोवर्मन ने गौड़ के शासक को पराजित कर मार डाला। पराजित गौड़ाधिप को मगध का शासक भी कहा है इसलिये अनुमान है कि यशोवर्मन द्वारा पराजित राजा संभवत: जीवितगुप्त (द्वितीय) ही थे। असंभव नहीं कि गौड़ नरेश ने जीवितगुप्त को पराजितकर मगध उनसे छीन लिया हो और स्वयं गौड़ और मगध की स्थिति में यशोवर्मन के विरुद्ध युद्ध में मारा गया हो।

शासक

पश्चातवर्ती गुप्त शासन के प्रमुख शासक निम्नलिखित हैं: 

नृप श्री कृष्णगुप्त, (शासनकाल 490-505 ई )
देव श्री हर्षगुप्त, (शासनकाल 505-525 ई )
श्री जीवित गुप्त प्रथम, (शासनकाल. 525-550 ई )
श्री कुमारगुप्त, (शासनकाल 550-560 ई )
श्री दामोदरगुप्त, (शासनकाल 560-562 ई )
श्री महासेनगुप्त, (शासनकाल 562-601 ई )
श्री माधवगुप्त, (शासनकाल 601-655 ई ) (रानी : श्रीमती)
महाराजाधिराज आदित्यसेन, (शासनकाल 655-680 ई ) (रानी: कोनदेवी)
महाराजाधिराज देवगुप्त, (शासनकाल 680-700 ई ) (रानी: कमलादेवी)
महाराजाधिराज विष्णुगुप्त (रानी: इज्जदेवी)
महाराजाधिराज जीवित गुप्त द्वितीय

TANMAY AGRAWAL - WORLD FASTEST TRIPLE CENTURY

 

#TANMAY AGRAWAL - WORLD FASTEST TRIPLE CENTURY


AKSHITA GUPTA - IAS

 AKSHITA GUPTA - IAS



Friday, February 2, 2024

Dr M K Sridhar -Padm shree

 Dr M K Sridhar -Padm shree



Dr M K Sridhar, renowned acamedician, chancellor of Chanakya University is awarded with Padmashree by the Govt of India on the occasion of 75 the republic day.

      

He belongs to Arya Vysya Samaj of Karnatak.

       

It is a matter of pride for all Vaishya bandhus.

       

In the above photo you can see Dr M K Sridhar being felicitated by the Karnataka Arya Vysya Mahasabha, President Sri R P Ravishankar n other office bearers.


SABHAR : PRADEP SHETTI JI 

SUPAM MAHESHWARI - INDIAS FIRST 3 UNICORN OWNER

SUPAM MAHESHWARI - INDIAS FIRST 3 UNICORN OWNER

भारत के एलन मस्क... FirstCry के सुपम माहेश्वरी ने कैसे बनाई तीन यूनिकॉर्न कंपनियां 

सुपम माहेश्वरी फर्स्टक्राई के फाउंडर हैं। उन्होंने साल 2010 में इसे लॉन्च किया था और आज यह देश में बेबी केयर और किड्स प्रॉडक्ट्स बेचने वाली बड़ी कंपनियों में शामिल है। माहेश्वरी ने साथ ही दो और यूनिकॉर्न कंपनियों की भी स्थापना की है।

माहेश्वरी ने तीन यूनिकॉर्न कंपनियां बनाई हैं
साल 2010 में किया था फर्स्टक्राई को लॉन्च
GlobalBees और XpressBees भी यूनिकॉर्न



सुपम माहेश्वरी को भारत का एलन मस्क कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि उन्होंने एक दो नहीं बल्कि तीन-तीन यूनिकॉर्न कंपनियां बनाई हैं। माहेश्वरी ऑनलाइन बेबी केयर प्रॉडक्ट्स कंपनी फर्स्टक्राई (FirstCry) के अलावा GlobalBees Brands Ltd और XpressBees के भी फाउंडर हैं। माहेश्वरी ने बेबी केयरिंग पर फोकस किया और 13 साल में 22,000 करोड़ रुपये की कंपनी खड़ी कर दी। आज इस कंपनी के 100 से भी ज्यादा शहरों में 400 से ज्यादा आउटलेट हैं। इस पर 6000 से भी ज्यादा ब्रांड्स के 200,000 से भी ज्यादा प्रॉडक्ट्स उपलब्ध हैं।

सुपम माहेश्वरी ने दिल्ली कॉलेज से इंजीनियरिंग करने के बाद आईआईएम अहमदाबाद से पीजीडीएम किया। इसके बाद उन्होंने नौकरी करने के बजाय खुद बिजनस करने की सोची। साल 2000 में Brainvisa Technologies नाम से ई-लर्निंग वेंचर शुरू किया था और 2007 में इसे एक अमेरिकी कंपनी को बेच दिया। साल 2010 में उन्होंने अमिताभ साहा के साथ मिलकर BrainBees Solutions और इसके फ्लैगशिप ब्रांड फर्स्टक्राई को लॉन्च किया। दोनों ने अपनी पर्सनल सेविंग्स में से 2.5 करोड़ रुपये से इसकी फंडिंग की। इसका मकसद भारत में माता-पिता को बेबी और किड्स प्रॉडक्ट्स मुहैया कराना था।

कैसे आया आइडिया

दरअसल जब सुपम पिता बने तो बच्चों के प्रॉडक्ट्स को लेकर उन्हें काफी समस्या का सामना करना पड़ा। सुपम के मुताबिक उन्होंने विदेशों में ऑनलाइन बेबी केयर और किड प्रॉडक्ट्स के बिजनस का चलन देखा था। भारत में भी अमीर लोग विदेशों से बच्चों का सामान मंगाते थे। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए उन्होंने फर्स्टक्राई की स्थापना की। इसकी शुरुआत ऑनलाइन बेबी केयर रिटेलर के रूप में हुई लेकिन जल्दी ही कंपनी ने ऑफलाइन रिटेल स्टोर भी शुरू कर दिए। कंपनी ने बेबीहग और क्यूटवॉक नाम से दो प्राइवेट लेबल भी शुरू किए।

जल्दी ही यह कंपनी लोकप्रिय होने लगी। शुरुआत में उन्होंने सिर्फ खिलौने बेचने पर ध्यान दिया और पुणे पर ही फोकस किया। धीरे-धीरे उन्होंने इसे पूरे देश में फैलाया और बाकी रिटेलर्स को भी अपने प्लेटफॉर्म पर सामान बेचने का मौका दिया। आज इस कंपनी का नेटवर्क पूरे देश भर में फैला है। कई बड़े शेयरों में वेयरहाउस हैं। आज बेबी प्रॉडक्ट्स बेचने वाला एक सफल ऑनलाइन और ऑफलाइन ब्रांड है। कंपनी के प्रॉडक्ट्स में डायपर्स, फीडिंग, नर्सिंग, स्कीन केयर, खिलौने, कपड़े, जूते, फैशन के सामान और बच्चों से जुड़े सारे प्रॉडक्ट्स शामिल हैं। फाइनेंशियल ईयर 2023 में कंपनी का टर्नओवर 2400 करोड़ रुपये रहा।

तीन यूनिकॉर्न

इस दौरान माहेश्वरी ने लॉजिस्टिक कंपनी XpressBees भी बनाई। शुरुआत में यह केवल फर्स्टक्राई के प्रॉडक्ट डिलीवर करती थी लेकिन बाद में इसने दूसरी कंपनियों के लिए भी लॉजिस्टिक का काम शुरू कर दिया। पिछले साल इस कंपनी को भी यूनिकॉर्न कंपनी का दर्जा मिल गया। इसी तरह GlobalBees को भी साल 2021 में यूनिकॉर्न का दर्जा मिल गया। इस तरह माहेश्वरी ने तीन यूनिकॉर्न कंपनियों की स्थापना की है। यही वजह है कि उन्हें भारत का एलन मस्क कहा जा सकता है।

BHAVISH AGRAWAL - OWNER OF 3 UNICORN

BHAVISH AGRAWAL - OWNER OF 3 UNICORN

भाविश अग्रवाल 3 यूनिकॉर्न के मालिक बनने वाले दूसरे भारतीय, जानिए कौन है पहले नंबर पर

ओला के को-फाउंडर भाविश अग्रवाल (Bhavish Aggarwal) की एआई स्टार्टअप कंपनी Krutrim AI हाल ही में यूनिकॉर्न बनी है. इसके यूनिकॉर्न (Unicorn) बनते ही भाविश अग्रवाल ऐसे दूसरे भारतीय शख्स बन गए, जो 3 यूनिकॉर्न स्टार्टअप के को-फाउंडर हैं.


ओला के को-फाउंडर भाविश अग्रवाल (Bhavish Aggarwal) की एआई स्टार्टअप कंपनी Krutrim AI हाल ही में यूनिकॉर्न बनी है. इसके यूनिकॉर्न (Unicorn) बनते ही भाविश अग्रवाल ऐसे दूसरे भारतीय शख्स बन गए, जो 3 यूनिकॉर्न स्टार्टअप के को-फाउंडर हैं. इससे पहले सुपम माहेश्वरी ये मुकाम हासिल कर चुके हैं और अब भाविश भी इस लिस्ट में शामिल हो गए हैं


ओला के फाउंडर भाविश अग्रवाल के लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) स्टार्टअप Krutrim SI Designs (कृत्रिम) ने Matrix Partners और अन्य से इक्विटी राउंड में 1 बिलियन डॉलर की वैल्यूएशन पर 50 मिलियन डॉलर की फंडिंग हासिल की है.

कंपनी ने एक बयान में कहा, "यह ऐतिहासिक उपलब्धि न केवल कंपनी के लिए बल्कि भारत के टेक इकोसिस्टम के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, क्योंकि Krutrim भारत का सबसे तेज यूनिकॉर्न बन गया है."

Krutrim एक AI कंप्यूटिंग स्टैक और LLMs का निर्माण कर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत के टेक इकोसिस्टम की अनूठी आवश्यकताओं को पूरा करना है. दिसंबर में, कंपनी ने एक LLM का अनावरण किया, जिसमें कहा गया कि उसके प्रशिक्षण में भारतीय डेटा का सबसे व्यापक प्रतिनिधित्व था.

विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए जेनरेटिव एआई ऐप्लीकेशंस को बढ़ावा देते हुए, यह मॉडल Krutrim के संवादात्मक एआई सहायक को कई भारतीय भाषाओं में कुशल होने में भी सक्षम बनाएगा.

Krutrim के फाउंडर भाविश अग्रवाल ने कहा, "भारत को अपना खुद का एआई बनाना है और Krutrim में हम देश का पहला फुल एआई कंप्यूटिंग स्टैक बनाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं."

कंपनी ने Krutrim Pro की भी घोषणा की, जो एक मल्टीमॉडल LLM होगा जिसमें भाषाओं और विविध विषयों को धाराप्रवाह नेविगेट करने की उन्नत क्षमताएं होंगी. 2 ट्रिलियन टोकन पर प्रशिक्षित मॉडल को लक्ष्य फरवरी 2024 तक बीटा वर्जन रिलीज़ करना है. इसका उद्देश्य शिक्षा और व्यावसायिक संचार सहित विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करना है, क्योंकि कंपनी स्वदेशी डेटा केंद्रों और उन्नत कंप्यूटिंग समाधानों के साथ एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की भी योजना बना रही है.

पिछले साल, अक्टूबर में, Krutrim ने लगभग 197 करोड़ रुपये या 24 मिलियन डॉलर जुटाने के लिए 10 रुपये के अंकित मूल्य पर 38,901 सीरीज ए और 19,67,61,099 सीरीज बी डिबेंचर जारी करने के लिए एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था.

Thursday, February 1, 2024

VRITTI AGRAWAL - A GOLD MEDALIST

 VRITTI AGRAWAL - A GOLD MEDALIST


तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हैदराबाद,तेलंगाना की वृत्ति अग्रवाल ने तैराकी में 5 स्वर्ण पदक प्राप्त किए।वृत्ति ने 1500मीटर,800 मीटर,400 मीटर,200 मीटर फ्री स्टाइल तथा 200 मीटर बटर फ्लाई स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीते।


JAICKIE SHROFF - अपने जग्गू दादा

JAICKIE SHROFF - अपने जग्गू दादा 

टॉकीज के बाहर मूंगफली बेचते थे जैकी श्रॉफ: मां ने साड़ियां बेचकर 10वीं की पढ़ाई करवाई, बस स्टॉप पर खड़े-खड़े मिला पहला मॉडलिंग प्रोजेक्ट


जग्गू दादा उर्फ जैकी श्रॉफ आज 67 साल के हो चुके हैं। मुंबई की तीन बत्ती चॉल में जन्मे जैकी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। गरीबी का वो आलम था कि एक 10 बाय 10 के कमरे में 4 लोग गुजारा करते थे और कमाई का जरिया था मूंगफली बेचना और सड़कों पर पोस्टर चिपकाना।

जैकी कभी थिएटर के बाहर मूंगफली बेचते थे, कभी फिल्मों के पोस्टर चिपकाते थे। एक दिन बस स्टैंड पर एक आदमी ने इन्हें देखा और कहा मॉडलिंग करोगे क्या? जैकी ने सवाल के बदले सवाल पूछा- पैसे दोगे क्या? इन दो सवालों में हुई बातचीत ने चॉल के मामूली लड़के को बॉलीवुड का स्टार बना दिया।

फिल्मों में आने के बाद भी जैकी ने अपना ठिकाना नहीं बदला। सेट पर जाने के लिए भी वो चॉल के बाथरूम में घंटों लाइन में खड़े रहते थे, जहां 30 लोगों के बीच सिर्फ 3 ही बाथरूम थे। बड़े-बड़े प्रोड्यूसर चॉल, तो कभी बाथरूम के बाहर खड़े उनका इंतजार करते थे।

आज उनका ठिकाना तो बदल चुका है, लेकिन जैकी कहते हैं कि उन्हें सुकून की नींद चॉल में ही आती है। जैकी को इंडस्ट्री का सबसे डाउन टु अर्थ एक्टर कहना गलत नहीं होगा। जहां जाते हैं हाथ में पौधा होता है, चाहे कोई नामी अवॉर्ड फंक्शन हो, या राम मंदिर का उद्घाटन। कभी पुराने दिनों को याद करने के लिए घंटों चॉल के 10 बाय 10 के कमरे में रहने जाते हैं, तो कभी पुराने लोगों से मुलाकात करते हैं। चॉल के जग्गू दादा, लोगों की मदद के लिए हमेशा आगे रहते हैं। कोई मदद का मोहताज न रहे, इसलिए उन्होंने भिखारियों को अपना पर्सनल नंबर दे रखा है।

आज जैकी दादा के जन्मदिन के खास मौके पर, जानिए उनकी जिंदगी से जुड़े 10 बेहद दिलचस्प किस्से-


चॉल में हुआ जन्म, पटाखों से डरते थे, तो मां करती थी दूसरे बच्चों की पिटाई

कहानी शुरू होती है, बॉम्बे से। 1 फरवरी 1957 को जैकी श्रॉफ का जन्म तीन बत्ती चॉल में हुआ। इसी चॉल में उनके मां-बाप रीटा और काकूभाई की प्रेम कहानी भी शुरू हुई थी। दरअसल, 1936 के आसपास कजाकिस्तान में हुए तख्तापलट के बीच 10 साल की रीटा 7 भाई-बहनों और मां के साथ, जान बचाकर पहले लाहौर फिर दिल्ली आ पहुंची थीं। कुछ समय बाद उनका परिवार दिल्ली से बॉम्बे आ पहुंचा। पैसे नहीं थे, तो पूरा परिवार तंगहाली में तीन बत्ती चॉल में ही आकर बस गया। वहीं दूसरी तरफ रईस वैश्य बनिया गुजराती  परिवार में जन्मे काकूभाई, शेयर मार्केट में पैसे डूबने से गरीबी की मार झेलकर चॉल में रहने आ गए।

तीन बत्ती चॉल में रीटा और काकूभाई की मुलाकात हुई और दोनों ने शादी कर ली। इस शादी से कपल को दो बेटे हुए। चार लोगों का परिवार चॉल की एक छोटी सी खोली में रहता था। 7 खोलियों में 30 लोगों के बीच सिर्फ 3 ही बाथरूम हुआ करते थे, जिनमें रोजाना लंबी कतारों में लोग खड़े रहते थे।

चॉल में हर साल बड़ी धूमधाम से दिवाली मनाई जाती थी। दीये जलाए जाते थे और पटाखों से पूरा चॉल जगमगा उठता था, लेकिन जैकी को पटाखों से खूब डर लगता था। वो छिपने के लिए बिस्तर के नीचे घुस जाया करते थे। ऐसे में जब मां जैकी को परेशान होते देखती थीं, तो पड़ोस के बच्चों की पिटाई कर दिया करती थीं।


10 साल की उम्र में भाई को समुद्र में डूबते देखा

जैकी श्रॉफ के बड़े भाई उनसे 7 साल बड़े थे। तीन बत्ती इलाके में उनके नाम का सिक्का चलता था। जब भी किसी को कोई दिक्कत होती थी, तो वो सीधे जैकी के बड़े भाई के पास आकर शिकायत करता था और वो उनकी परेशानियां सॉल्व करते थे। आसपास के इलाके के लोग उन्हें दादा कहकर बुलाते थे।

1967 में उनके भाई को एक नौकरी मिल गई। परिवार को लगा ही था कि अब उनकी गरीबी दूर हो जाएगी, लेकिन एक हादसे से सब बर्बाद हो गया। दरअसल, जैकी के भाई अपने एक दोस्त को बचाने के लिए समुद्र में कूद गए थे, जबकि उन्हें खुद तैरना नहीं आता था। ये मंजर 10 साल के जैकी ने देखा था, जिससे वो बुरी तरह टूट गए थे। भाई की मौत के बाद वो खुद चॉल के जग्गू दादा बनकर लोगों की मदद करने लगे।

मां ने साड़ियां बेचकर पढ़ाया, 11वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर मूंगफली बेचते थे

जैकी के पिता ज्योतिषी थे। उनकी कमाई से परिवार का गुजारा करना बेहद मुश्किल था। जब गरीबी में जैकी की 10वीं की पढ़ाई पूरी करवाने के पैसे नहीं बचे, तो उनकी मां ने अपनी साड़ियां बेच दीं। घर में तंगी का ये आलम था कि जैकी 11वीं के बाद पढ़ाई नहीं कर सके। पढ़ाई छोड़ने के बाद जैकी 2 सालों तक कुछ नहीं कर सके। कुछ समय बाद वो अपने दोस्तों के साथ मिलकर चॉल के पास सिनेमाघरों में पोस्टर लगाने का काम करने लगे। खाली समय में वो थिएटर के बाहर मूंगफली भी बेचते थे।


मां रीटा के साथ जैकी श्रॉफ

कुछ समय बाद जैकी ने ताज होटल में शेफ बनने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली। फ्लाइट अटेंडेंट बनने के लिए भी अप्लाई किया, लेकिन वो नौकरी भी नहीं मिली। कुछ समय बाद हाथ-पैर मारते हुए जैकी को रामपट रोड की ट्रेड विंग्स नाम की एक ट्रैवल एजेंसी में नौकरी मिल गई।

बस स्टैंड पर मिला पहला मॉडलिंग प्रोजेक्ट, फीस मिली 7 हजार रुपए

एक दिन जैकी श्रॉफ बस स्टैंड पर खड़े थे कि अचानक एक शख्स उनके पास आकर खड़ा हो गया। उस आदमी ने पूछा कि आप क्या करते हैं। जैकी ने बातचीत में अपने बारे में सब बता दिया। वो शख्स एडवर्टाइजमेंट एजेंसी के लिए काम करता था। जैकी बेहद हैंडसम थे, तो उसने झट से उन्हें भी मॉडलिंग का ऑफर दे दिया। जब उसने बताया कि सिर्फ तस्वीरें क्लिक करवाने के पैसे दिए जाते हैं, तो जैकी ने तुरंत उससे काम मांग लिया। उस आदमी ने जैकी को अगले दिन दफ्तर बुला लिया।

अगले दिन दफ्तर में ही उनका नाप लिया गया और जवाब मिला, हम आपको मॉडल बना रहे हैं। पहली ही मुलाकात में एजेंसी से जैकी को 7 हजार रुपए का साइनिंग अमाउंट मिला। ट्रैवल एजेंसी में दिन भर मेहनत करने के बाद भी जैकी को हजार रुपए नहीं मिलते थे, ऐसे में इकट्ठे 7 हजार रुपए मिलना उनके लिए बड़ी बात थी। जैकी तुरंत घर गए और मां के हाथों में सारे पैसे थमा दिए। जैकी ने मां ने कहा था कि वो नौकरी छोड़कर अब मॉडलिंग ही करना चाहते हैं। मां मान गईं और जैकी नौकरी छोड़कर मॉडल बन गए। एजेंसी से जुड़ने के बाद जैकी को लगातार काम मिलने लगा।


देव आनंद ने दिया पहला काम, एक्टिंग नहीं कर पाए तो जमकर डांट पड़ी

मॉडलिंग के ही दिनों में आशा के. चंद्रा ने जैकी का टैलेंट परखते हुए उन्हें अपना एक्टिंग स्कूल जॉइन करने को कहा। पहले तो जैकी ने इनकार कर दिया, लेकिन जब आशा ने बताया कि उनके स्कूल में देव आनंद के बेटे सुनील आनंद भी आते हैं, तो जैकी झट से मान गए। दरअसल, जैकी श्रॉफ देव आनंद के फैन हुआ करते थे। साथ एक्टिंग क्लासेस लेते हुए जैकी और सुनील की दोस्ती गहरी होती चली गई।

एक दिन जैकी श्रॉफ की जिद पर सुनील उन्हें देव आनंद से मिलवाने ले गए। देव आनंद ने उन्हें देखते ही कहा, आज सुबह-सुबह तुम्हारी तस्वीर देख रहा था और शाम को तुम मेरे सामने खड़े हो, मैं तुम्हें फिल्म में रोल दूंगा। एक मुलाकात में ही देव आनंद ने जैकी को अपनी फिल्म स्वामी दादा में सेकेंड लीड रोल दे दिया। रोल मिलने से जैकी बेहद खुश थे, लेकिन फिर 15 दिनों बाद देव आनंद ने वो रोल मिथुन को दे दिया। ऐसे में जैकी को शक्ति कपूर के चेले का रोल मिल सका। जब शुरुआत में जैकी ठीक तरह से एक्टिंग नहीं कर सके, तो उन्हें सेट पर खूब डांट पड़ती थी, लेकिन समय के साथ जैकी भी माहिर होते चले गए।

जैकी श्रॉफ अपने अंदाज से हर किसी का ध्यान खींच लिया करते थे, ऐसे में जब सुभाष घई अपनी फिल्म हीरो के लिए नए चेहरे की तलाश में थे, तो अशोक खन्ना ने उन्हें जैकी के नाम का सुझाव दिया। 1983 की फिल्म हीरो से जैकी रातोंरात स्टार बन गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कई फिल्मों में नजर आने के बाद भी जैकी चॉल में ही मां के साथ रहते थे। उन्हें यहां बाथरूम जाने के लिए घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता था, क्योंकि पूरे चॉल में सिर्फ 3 ही बाथरूम थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि डायरेक्टर उनके इंतजार में कई घंटों तक चॉल तो कभी बाथरूम के बाहर इंतजार करते थे। जैकी भी बड़ी चालाकी से चॉल वालों को शूटिंग का बहाना कर कई बार लाइन तोड़कर बाथरूम चले जाते थे।

स्टार बनने के बाद जैकी ने गरीबों के हित में कई बड़े काम किए। कई बच्चों का स्कूल में एडमिशन करवाया। कई जरूरतमंद लोगों का इलाज करवाया। आज जैकी की बदौलत करीब 100 परिवारों का गुजारा होता है। जैकी ने पुराने घर की जगह तीन बत्ती से पाली हिल स्थित घर के बीच वाले रास्ते में रहने वाले कई भिखारियों को अपना पर्सनल मोबाइल नंबर दे रखा है। कई भिखारी उन्हें आज भी मदद के लिए कॉल करते हैं और जैकी उन्हें तुरंत मदद पहुंचाते हैं।

जब जैकी की गर्लफ्रेंड ने उनकी दूसरी गर्लफ्रेंड को लिखा था लेटर, दोनों करना चाहती थीं शादी

जैकी श्रॉफ ने फिल्मों में आने के बाद 1987 में आएशा से शादी की थी, हालांकि उन्होंने आएशा दत्त से शादी करने का फैसला 1973 में ही कर लिया था। आएशा एक रईस खानदान की लड़की थीं और जैकी उस समय तीन बत्ती की चॉल में रहने वाले मामूली लड़के। दोनों की पहली मुलाकात तब हुई जब आएशा 13 साल की थीं। एक दिन स्कूल बस के गेट पर खड़ी हुईं आएशा पर जैकी की नजर गई। जैकी दौड़कर पास गए और अपना परिचय दे दिया। दूसरी मुलाकात दोनों की कैसेट रिकॉर्डिंग शॉप में हुई जहां आएशा कुछ रिकॉर्डिंग लेने पहुंची थीं। जैकी ने उनकी मदद की तो आएशा भी इंप्रेस हो गईं। उन्होंने सोच लिया वो इसी लड़के से शादी करेंगी।

सिमी गरेवाल के चैट शो में जैकी श्रॉफ ने बताया था कि आएशा से पहले वो किसी और लड़की से प्यार करते थे। वो लड़की पढ़ाई के लिए यूएस चली गई थी, लेकिन जैकी चाहते थे कि जब वो लड़की वापस आएगी तो दोनों शादी करेंगे। ये बात जैकी ने आएशा को भी बताई थी। जैसे ही आएशा को ये पता चला तो उन्होंने जैकी से उस लड़की को लेटर लिखने की इजाजत मांगी।

आएशा ने लेटर में लिखा था, जब तुम वापस आ जाओगी, हम दोनों जैकी से शादी करेंगे और बहनों की तरह रहेंगे। ये देखकर जैकी समझ गए कि आएशा उनसे बेहद मोहब्बत करती हैं। हीरो बनने के बाद दोनों ने 1987 में शादी की। इस शादी से कपल के दो बच्चे टाइगर श्रॉफ और कृष्णा श्रॉफ हैं।


जैकी श्रॉफ के पैंट को लकी समझते हैं अनिल, आज भी संभालकर रखी है

कर्मा, त्रिमूर्ति, लज्जा, राम-लखन, परिंदा, रूप की रानी चोरों का राजा जैसी कई हिट फिल्मों में साथ नजर आ चुके जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर असल जिंदगी में अच्छे दोस्त हैं। एक समय में दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि जैकी का दिया गया पैंट लकी समझकर आज भी अनिल कपूर ने संभालकर रखा है। दरअसल, जैकी श्रॉफ अपने जमाने के फैशन आइकन समझे जाते थे। जब फिल्म विरासत के लिए अनिल को एक पैंट की जरूरत पड़ी तो उन्होंने जैकी की एक पैंट मांग ली, क्योंकि वो उन्हें बहुत पसंद आई थी। जैकी ने भी बिना सवाल किए पैंट दे दिया। जब फिल्म विरासत जबरदस्त हिट हुई तो अनिल ने इसका क्रेडिट जैकी की पैंट को दिया। अनिल को लगता था कि वो पैंट उनके लिए लकी है, ऐसे में उन्होंने हमेशा के लिए उस पैंट को सहेज कर रख लिया।

जब अनिल कपूर को मारने पड़े थे 17 थप्पड़

साल 1989 में रिलीज हुई फिल्म परिंदा में जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित और नाना पाटेकर अहम किरदारों में थे। फिल्म ने 5 नेशनल अवॉर्ड जीते और इसे ऑस्कर भेजा गया था। फिल्म में जैकी श्रॉफ ने अनिल कपूर के बड़े भाई का रोल प्ले किया था। फिल्म के एक सीन के लिए जैकी को अनिल को थप्पड़ मारना था। डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा परफेक्शन के लिए जाने जाते थे, ऐसे में उन्होंने जैकी से कहा कि वो अनिल को असली थप्पड़ मारें। एक परफेक्ट शॉट के लिए जैकी ने अनिल को 17 थप्पड़ मारे थे।


जैकी को फिल्म में मरता दिखाने के लिए विधु विनोद चोपड़ा को ऑफर हुए थे 10 लाख रुपए

फिल्म परिंदा के क्लाइमैक्स में अनिल कपूर और माधुरी को मरता हुआ दिखाया गया था। इस फिल्म को बनाते हुए विधु विनोद चोपड़ा के पास पैसे कम पड़ गए थे। जब विधु विनोद चोपड़ा ने वो फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स को दिखाई तो एक डिस्ट्रीब्यूटर ने उन्हें कहा, मैं तुम्हें 10 लाख रुपए नकद दूंगा, बस क्लाइमैक्स में माधुरी, अनिल की जगह जैकी को मार दो। विधु विनोद चोपड़ा ने 10 लाख रुपए का ऑफर ठुकरा दिया, लेकिन जैकी को मरता हुआ नहीं दिखाया।


एक फिल्म में लगा दी जिंदगी भर की कमाई, नुकसान हुआ तो बेचना पड़ा था घर का फर्नीचर

2003 की फिल्म बूम को जैकी श्रॉफ और उनकी वाइफ आएशा श्रॉफ ने प्रोड्यूस किया था। इस फिल्म में दोनों ने अपनी जिंदगी की सारी जमापूंजी लगा थी। ये कटरीना कैफ की पहली फिल्म थी वहीं इसमें अमिताभ बच्चन, गुलशन ग्रोवर, जीनत अमान जैसी बड़ी स्टारकास्ट थी। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने आखिरी समय में बैकआउट कर दिया और सारा नुकसान जैकी को हुआ।

फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हुई और जैकी के सारे पैसे डूब गए। गरीबी ऐसी आई कि घर का फर्नीचर, आर्टवर्क और पूरा घर तक बिक गया। टाइगर श्रॉफ ने उस समय अपनी मां से वादा किया था कि वो घर वापस खरीदेंगे। आज टाइगर ने मां के लिए घर खरीद लिया है।

Tuesday, January 23, 2024

Saturday, December 2, 2023

ABHINAV GUPTA - DGP UTTRAKHAND

ABHINAV GUPTA - DGP UTTRAKHAND 

अभिनव_कुमार_गुप्ता बने देवभूमि #उत्तराखंड के पुलिस प्रमुख (DGP)...उत्तर प्रदेश में #बरेली जिले के मूल #निवासी अभिनव कुमार गुप्ता 1996 बैच के #आईपीएस ऑफिसर है उनको उत्तराखंड के #पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है....



श्री  अभिनव गुप्ता जी को  सर्व वैश्य समाज की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं एवं बहुत बहुत बधाई और उज्जवल भविष्य की कामना।

Monday, November 6, 2023

THE SECRET OF SUCCESS OF #BANIYA MARWADI COMMUNITY IN BUSINESS

THE SECRET OF SUCCESS OF #BANIYA MARWADI COMMUNITY IN BUSINESS 

#बनिया (वैश्य) समुदाय, मारवाड़ियों का व्यापार में कुशल और सफल होने का क्या कारण है ? - THE SECRET OF SUCCESS OF BANIYA COMMUNITY, IN BUSINESS :

बनिया समाज में अग्रवाल, माहेश्वरी और जैन (ओसवाल, पोरवाल आदि) लोगों को लिया जाता है - मैं यहाँ पर राजस्थान के इन लोगों के बारे में बताऊंगा, जिनको मारवाड़ी भी कहा जाता है. ये एक अफ़सोस है, कि साम्यवादी लेखकों के निहित लक्ष्यों के कारण मारवाड़ी को हर साहित्य और हर फिल्म में एक लोभी लालची के रूप में दर्शाया जाता रहा है. कोई भी फिल्म देखिये या कोई भी काल्पनिक उपन्यास पढ़िए - कुछ पात्र इस प्रकार लिखे जाएंगे - एक मारवाड़ी होगा जो बहुत लोभी और निर्दयी होगा और एक पठान होगा जो बहुत सहयोगी होगा - ये जानबूझ कर इस समाज को हीनभावना से भरने का षड्यंत्र था.

(हमारी ओर से : पहले तो यह स्पष्ट कर दें, कि 'मारवाड़' राजस्थान का एक क्षेत्र हैं, जिसमें बाड़मेर, जोधपुर, पाली, जालोर और नागौर जिले आते हैं. सही मायने में इस क्षेत्र में रहने वाले सभी लोग, चाहे वोह किसी भी जाति, या धर्म के हों, 'मारवाड़ी' कहलाते हैं, पर व्यवहार में केवल वैश्य/अग्रवालों को ही मारवाड़ी समझा जाता है. हमने इस लेख की मूल भावना को बिना बदले, इसमें कुछ सम्पादन, कुछ अपनी ओर से जोड़ा है).

मारवाड़ी समाज के बारे में कुछ शोध-आधारित सामग्री प्रस्तुत है :
अगर आप फिल्मों में दिए हुए इम्प्रैशन को एक बार के लिए हटाएंगे, तो इसको पढ़ पाएंगे. नहीं तो आप ये ही मान कर चलेंगे - मारवाड़ी यानी .... .परिवर्तन संसार का नियम है और इसका कोई अपवाद नहीं है. हर अगली पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी पुरानी, दकियानूसी, पुरातनपंथी और अविकसित नजर आती है. इसी कारण हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की व्यवस्थाओं को बदल देती है और नयी व्यवस्थाएं स्थापित करने का प्रयास करती है. इसी प्रक्रिया में कई परम्पराएं लुप्त हो जाती है और फिर हम चाह कर भी उनको नहीं सहेज सकते हैं. ऐसी ही एक व्यवस्था है मारवाड़ी प्रबंधन शैली.

नयी पीढ़ी ने पाश्चात्य शिक्षा को अपना लिया है और वे अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी संकोच करते हैं. जो मारवाड़ी प्रबंध शैली अनेक वर्षों की गुलामी के बाद भी सलामत रह गयी, वो आजादी के बाद उपेक्षा का शिकार हुई और कुछ ही दशकों में लुप्त हो गयी. सरकार या किसी भी प्रबंध संस्थान की तरफ से इस अद्भुत प्रबंध शैली को लिपिबद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए. भारतीय प्रबंध संस्थानों ने विदेशों की प्रबंध (management) शैलियों को सीखने और समझने में अपना सारा समय लगा दिया और उन्ही प्रबंध शैलियों को आगे बढ़ावा दिया, लेकिन इस अद्भुत प्रबंध शैली को हीन दृष्टि से देखा और उस उपहास के कारण ये व्यवस्था आज लुप्त हो चुकी है. आज का ये फैशन बन गया है, कि प्रबंध सीखना है, तो अमेरिका की कुछ प्रबंध संस्थाओं में जाओ (वो संस्थाएं वाकई महान है), लेकिन अफ़सोस तो ये है की अद्भुत प्रबंध दक्षता रखने वाले मारवाड़ी अपनी नयी पीढ़ी को अपनी प्रबंध दक्षता सिखाने की बजाय इसी फैशन में बह कर विदेश से प्रशिक्षित करवा रहे हैं. आधुनिक शिक्षित लोगों ने ऐसा चश्मा पहना है की उनको भारतीय व्यवस्थाओं में अच्छाइयां ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं - शायद उनको मेरे इस लेख में भी कुछ भी कम का न मिले. लेकिन 100 साल बाद पश्चिम से किसी ने भारत पर अध्ययन किया और फिर किसी ने पूछा, कि अद्भुत भारतीय व्यवस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए कौन जिम्मेदार है तो क्या जवाब देंगे ?

एक समय मारवाड़ी व्यावसायिक दक्षता पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत पहचान स्थापित कर चुकी थी, लेकिन आज ये कला लुप्त होने के कगार पर है. मारवाड़ी प्रबंध शैली दुनिया में कहीं पर भी पूरी तरह से लिखी हुई नहीं है और ये उन लोगों के साथ ही विदा हो गयी है जो लोग इस कला में मर्मज्ञ थे. लेकिन जैसे ही ये पूरी तरह लुप्त हो जायेगी - वैसे ही हमें अहसास होगा की एक बहुत ही शानदार प्रबंध व्यवस्था हमने खो दी है.

लुप्त हुई मारवाड़ी व्यवस्था का आज कोई जिक्र बेमानी है, लेकिन फिर भी उनकी कुछ व्यवस्थाओं के बारे में मैं अवश्य जिक्र करना चाहूँगा :

1. मौद्रिक प्रबंधन और ब्याज गणना की अद्भुत व्यवस्था :

मारवाड़ी प्रबंध व्यवस्था का आधार मौद्रिक गणना है और इसी कारण ब्याज को नियमित रूप से गिना जाता है, जो कि पैसे के समुचित सदुपयोग के लिए जरुरी है. फिल्मों में मारवाड़ी ब्याज पर बहुत ही उपहास और व्यंग्य नजर आते हैं, लेकिन आज ये ही व्यवस्थाएं आधुनिक बैंकिंग संस्थाएं अपना रही है. बाल्यकाल से ही गणना (गणित) का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और इसी कारण बिना केलकुलेटर के भी कोई भी व्यक्ति दशमलव अंकों की गुना-भाग भी आसानी से कर लिया करते थे और गणना में छोटी से छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी. ब्याज जितना होता है, उतना ही लेना सिखाया जाता है - एक पैसा भी हराम का लेना पाप है और इसी प्रशिक्षण के कारण मारवाड़ी ब्याज की गणना भी करता है, लेकिन अपने धर्म का भी पालन करता है. लेकिन अफ़सोस ये है, कि आपने तो फिल्मों में उसको हमेशा लोभी और लालची के रूप में ही देखा है. आप जब तक मारवाड़ी परिवारों में रह कर ये सब नहीं देखोगे, विश्वास नहीं करोगे. मैंने तो बचपन से ये सब देखा भी है और बार बार आजमाया भी है. कई बार जान बुझ कर ज्यादा भुगतान कर के भी देखा और एक एक पाई वापिस लेनी पड़ेगी, क्योंकि हराम का नहीं लेना बचपन से सिखाया जाता है - बचपन से ये ही प्रशिक्षण मिलता है, कि सही नियत रखिये और सही गणना करिये.

2. जीवन पर्यन्त की प्रबंध कारिणी - यानी मुनीम व्यवस्था :

मारवाड़ी व्यवस्था में मुनीम को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता था. मुनीम को आधुनिक व्यवस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के सामान इज्जत और सम्मान दिया जाता था और उसके ऊपर पूरा विश्वास किया जाता था. उसको पारिवारिक सदस्य की तरह सम्मान मिलता था. उसको जीवन पर्यन्त के लिए व्यवसाय का प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता था. उसके परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाई जाती थी, ताकि उसके परिवार को कोई परेशानी न हो.

3. पड़ता व्यवस्था :

मारवाड़ी निर्णय का आधार पड़ता यानी शुद्ध लाभ. शुद्ध लाभ की गणना का ये तरीका अद्भुत था. इसमें सिर्फ अस्थायी आय और अस्थायी खर्चों के आधार पर हर निर्णय से मिलने वाले शुद्ध लाभ या हानि पर चिंतन कर के ये निर्णय लिया जाता था, कि मूल्य क्या रखा जाए.

4. संसाधन बचत :

मारवाड़ी अपने हर निर्णय में संसाधनों का कमसे कम इस्तेमाल कर के अधिक से अधिक बचत करने का प्रयास करते थे और इस प्रकार पर्यावरण की बचत में योगदान देते थे. मारवाड़ी एक दूसरे को चिठ्ठी भी लिखते थे, तो उसमे कम से कम कागजों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक जानकारियां प्रेषित करते थे.

5. बदला व्यवस्था :

मारवाड़ी अपने सौदों को भविष्य में स्थानांतरित करने के लिए बदला व्यवस्था काम में लेते थे, जिसके तहत सौदों को आगे की तारीख पर करने के लिए निश्चित दर से ब्याज की गणना होती थी. (ऐसी ही कुछ व्यवस्था विकसित करने के लिए दो अर्थशास्त्रियों को हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन मारवाड़ियों की इस व्यवस्था को रोक दिया गया था). शेयर बाजार में भी यह व्यवस्था लम्बे समय तक चलती रही.

6. हुंडी व्यवस्था :

आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के शुरू होने से अनेक वर्ष पहले से मारवाड़ी व्यापारी हुंडी व्यवस्था को चलाते आ रहे हैं, जिसको अंग्रेजों ने पूरी तरह से रोक दिया और फिर आजादी के बाद आधुनिक सरकार ने पूरी तरह से ख़तम कर दिया था. ये हुंडी व्यवस्था आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से कम लागत पर मुद्रा के स्थानांतरण का माध्यम था, जिसमे बिना तकनीक या बिना इंटरनेट के भी आज की तरह ही एक जगह से दूसरी जगह पर मुद्रा का आदान प्रदान होता था.

7. पर्यावरण अनुकूल निर्णय :

मारवाड़ी हमेशा पर्यावरण अनुकूल निर्णय लिया करते थे - जिसमे वे स्थानीय पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बिना ही व्यापार और व्यवसाय को बढ़ावा देने का प्रयास करते थे.

8. धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना :

व्यापार शुरू करने से पहले वे मंदिर बनाते थे और 'शुभ-लाभ' लिखते थे. शुभ, यानी हर व्यक्ति का कल्याण लाभ से पहले लिखते थे, ताकि हर निर्णय को सबके कल्याण के लिए ले सकें. हर निर्णय को धर्म और अध्यात्म के आधार पर जांचा जाता था. तकनीक के देवता विश्वकर्मा की पूजा की जाती थी, तो धन के देवता गणेश और लक्ष्मी को आराध्य माना जाता था. सभी निर्णय सिद्धांतों पर आधारित होते थे और सबसे बड़ा सिद्धांत ये था, कि जो भी निर्णय हो, वो जीवन को जन-कल्याण और आत्मकल्याण की तरफ ले जाए. जीवन का मकसद था - केवल ज्ञान की तरफ जाना और इसी लिए हर निर्णय को पुण्य का अवसर के रूप में देखा जाता था, पाप से बचने के प्रयास किये जाते थे. ऐसी तकनीक नहीं अपनायी जाती थी, जिससे जीवों का नाश हो. शुरुआत करते समय से ही सकल भ्रमांड के कल्याण को आदर्श के रूप में रखा जाता था.

9. देवों को अर्पण :

हर व्यापारिक निर्णय श्री गणेश और रिद्धि सिद्धी की आराधना के बाद किया जाता है. श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. आय का कुछ हिस्सा देवों को अर्पित कर दिया जाता था, जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण के काम में आता था. व्यापार की आम्दानी का कुछ भाग गोशाला या ऐसी ही अन्य किसी संस्था को देने से ये माना जाता था, कि देवताओं का हिस्सा उनको अर्पित कर दिया गया है. प्राचीन भारत में इसी कारण मंदिरों में प्रचुर संपति दान में आती थी, जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण हेतु अर्पित की जाती थी.

10. गद्दियों की व्यवस्था :

आधुनिक तड़क भड़क की जगह मारवाड़ी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गद्दियों की व्यस्था रखते थे, जो बहुत ही आरामदायक, आत्मीयता पूर्ण और स्वच्छता पर आधारित माहौल बनाती थी. ये मेहमानों के ढहरने के लिए भी काम आती थी. किसी मेहमान को जरुरत के समय इन्हीं गद्दियों में रुकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती थी, ताकि अनावश्यक होटल का खर्च भी नहीं होता था. आधुनिक एयर कंडीशन ऑफिसों से तुलना करके पर्यावरण के ज्यादा अनुकूल क्या है, ये आप स्वयं तय कर सकते हैं.

11. बचत और उत्पादकता पर जोर :

मारवाड़ी व्यवस्था में बचत और उत्पादकता पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था और इसी कारण विषम परिस्थितियों में भी मारवाड़ियों ने व्यापार कर के अपने आप को सफल बनाया. आधुनिक कंपनियों की जगह पर मारवाड़ियों ने बचत और उत्पादकता के क्षेत्र में शानदार कार्य किया और वैश्विक व्यापार स्थापित किया. रविवार की जगह पर अमावस्या की छुट्टी होती थी (यानि महीने में सिर्फ एक दिन की छुट्टी). सामान्य दिनों में भी कार्य के घंटे बहुत ज्यादा होते थे, लेकिन हर कर्मचारी को साल में एक महीने अपने गांव जाने की छुट्टी दी जाती थी.

12. जरुरत पड़ने पर राज्य की मदद :

मारवाड़ी व्यवसायी उस समय के राजा की जरुरत के समय आर्थिक मदद किया करते थे और इसी कारन अनेक शहरों में मारवाड़ी व्यापारियों को नगर-शेठ की उपाधि दी जाती थी. कई बार देश हित में व्यापार और उद्यम की बलि भी चढ़ा दी जाती थी. भामा शाह द्वारा महाराणा प्रताप के लिए अपने खजाने खोल देने की ऐतिहासिक घटना को हम सब जानते ही है !

13. स्थानीय लोगों की भागीदारी :

मारवाड़ी जहाँ पर भी व्यापार करने के लिए जाते थे, वहां के स्थानीय लोगों को अपने व्यापार और उद्योगों से लाभान्वित करने का प्रयास करते थे और इसी कारण उनको स्थानीय लोगों से पर्याप्त सहयोग और सम्मान मिलता था.

14. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध को सहना :

मारवाड़ियों को अन्य भारतियों की तरह सत्ता पक्ष से विरोध का समना करना पड़ा. डाकुओं, लुटेरों और अनेक अधिकारियों को मारवाड़ी सरल लक्ष्य नजर आते थे, जिन पर वे अपने अत्याचार आसानी से कर लेते थे. सत्ताधारी उनसे मनमाना टैक्स वसूलते थे. ब्याज की सूक्ष्म गणना किसी को भी अच्छी नहीं लगती थी. लोग मारवाड़ियों से पैसे तो उधार लेना चाहते थे, लेकिन ब्याज नहीं देना चाहते थे, लेकिन मारवाड़ियों की सफलता का आधार ही उनकी सूक्ष्म गणना थी, जिस के कारण वे पैसे के सही इस्तेमाल पर जोर देते थे. अंग्रेजों और उनके इतिहासकारों ने मारवाड़ियों को सूदखोर के रूप में प्रचारित किया, क्योंकि अंग्रेजों को मारवाड़ियों की व्यवस्था बैंकिंग व्यवस्था से बेहतर नजर आयी और वे आधुनिक बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ियों को हटाना चाहते थे. हालाँकि, मारवाड़ी खुद बैंकिंग व्यवस्था के समर्थक थे और बैंकें भी मारवाड़ियों की तरह चक्रवर्ती ब्याज लेती थी. मारवाड़ी किसानों को जरुरत के समय पर ऋण प्रदान करदेते थे और इसी कारण अनेक वर्षों से मारवाड़ियों ने किसानों के साथ मिल कर हर जगह पर कृषि को सफल बनाने में योगदान दिया था, लेकिन ये आधुनिक व्यवस्था में नकारात्मकता के माहौल में तब्दील हो गया. अंग्रेजों के बाद में आधुनिक भारत में मारवाड़ियों के योगदान और उद्यमिता को पूरी तरह से विरोध का सामना करना पड़ा और उसी के कारण मारवाड़ियों ने परम्परागत व्यवस्थाओं को बदल दिया और नयी प्रोफेशनल प्रबंधन पर आधारित व्यवस्थाओं को अपना लिया, ताकि उनका विरोध न हो. आधुनिक मीडिया द्वारा मारवाड़ियों का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण हुआ और इस प्रकार उनकी उद्यमिता को लगाम लग गयी. मारवाड़ियों की नयी पीढ़ी अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी हिचकिचाने लगी.

15. सामाजिक उद्यमिता :

मारवाड़ी उद्यमी अपनी आय में से कुछ राशि बचा कर के समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने प्याऊ, गोशालाएं, मंदिर, शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल और धर्मशालाओं का निर्माण किया. उनके प्रयासों से राजस्थान में विकट परिस्थितियों में भी लोगों को रहने में दिक्कत नहीं आयी. आजादी से पहले अनेक शिक्षण संस्थाएं मारवाड़ियों ने इस प्रकार स्थापित की, ताकि भारतीय संस्कृति भी सलामत रहे और युवा पीढ़ी भी शिक्षित हो सके.

16. विपणन की व्यक्तिगत शैली : आधुनिक विज्ञापन आधारित व्यवस्था की जगह पर मारवाड़ी व्यवसायी व्यक्तिगत संपर्क और व्यक्तिगत सेवा पर आधारित विपणन व्यवस्था अपनाते थे, जिसमे एक व्यक्ति को ग्राहक बनाने के बाद पूरी जिंदगी उसकी जरूरतों के अनुसार उत्पाद उसको प्रदान करते थे. व्यापारिक रिश्तों को पूरी जिंदगी निभाया जाता था और व्यापारिक सम्बन्ध मधुर व्यवहार, वैयक्तिक संबंधों और आपसी विश्वास पर आधारित होते थे. "अच्छी नियत" के आधार पर ही सारे निर्णय लिए जाते थे, ताकि पूरी जिंदगी व्यापारिक सम्बन्ध बना रहे और इसी लिए आपसे मेलजोल, जमाखर्च, लेनदेन और आपसी खातों के मिलान पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था.

17. दीर्धजीवी उत्पाद :

मारवाड़ी ऐसे उत्पाद विकसित करते थे, जो दीर्ध समय तक सलामत रह सके और इस प्रकार निवेश करते थे, ताकि दीर्ध काल तक कोई दिक्कत न आये. आधुनिक कम्पनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती है, जो अलप काल में ही नष्ट हो जाएं. वे पैकेजिंग और विज्ञापन पर अत्यधिक अपव्यय करती है लेकिन मारवाड़ी लोग इस प्रकार के अपव्यय को बचाते थे.

18. साख पर बल:

मारवाड़ी अपने व्यापर में साख बनाने पर सबसे अधिक जोर देते थे और साख पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने देते थे. इसी कारण "गुडविल" शब्द के आने से बहुत पहले से साख और "नाम" जैसे शब्द मारवाड़ी व्यापारिक जगत में काम आते थे.

19. कार्य विभाजन व् युवाओं को मार्गदर्शन :

मारवाड़ी व्यापर में बुजुर्ग लोग नीतिगत निर्णय लेते हैं, लेकिन युवा रोज का काम देखते हैं. इस प्रकार सभी लोगों में काम बंटे रहते थे और आपसी तालमेल भी बना रहता था. सबसे बड़ा पुरुष व्यक्ति 'करता' कहलता था और वो सभी नीतिगत निर्णय लेता था. परिवार के युवा उससे मार्गदर्शन ले कर रोजमर्रा के निर्णय लेते थे, उसको एक एक पैसे का हिसाब देते थे. पूरे घर में एक ही रसोई होती थी और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ में नहीं बहाया जाता था. अन्न का सबसे पहला टुकड़ा गाय, फिर अन्य प्रमुख जानवरों जैसे कुत्तों आदि के लिए निकला जाता था, फिर घर के लोग खाना कहते थे. भोजन सामान्य लेकिन होता था, लेकिन बड़े प्यार से मिल कर खाने में अलग ही आनंद होता था. थाली में एक भी दाना व्यर्थ नहीं छोड़ा जाता था. थाली में सबसे पहले कर्ता भोजन की शुरुआत कर्ता था और आखिर में भी वो ये ही देखता था, कि कोई भी भूखा नहीं रह गया है और सबसे आखिरी दाना (अगर कुछ बच जाए) गृह स्वामिनी उठाती थी. आज की बड़ी कंपनियों की पांच सितारा संस्कृति की तुलना में बहुत कम भोजन व्यर्थ जाता था. भोजन के समय ही अच्छे उद्यमियों और अच्छे सामाजिक आदर्शों का वृत्तांत सुनाया जाता था, जो युवाओं को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित करता था. ऐसा माना जाता था, कि साथ में भोजन करने से आपसी प्रेम बढ़ता है. साल में कम से कम एक बार पूरा परिवार तीर्थयात्रा के लिए या सत्संग के लिए जाता था, जो परिवार के लोगों को जीवन मूल्यों से जोड़ देता था. व्यवसाय का केंद्र परिवार था. परिवार का आपसी प्रेम व्यापारिक संबंधों में भी परिलक्षित होता था.

20. प्रेम भरा संवाद :

मारवाड़ी लोगों ने अनेक व्यवस्थाएं की थी, जिनमे आपसी मधुर संवाद हो सके. सब पुरुष लोग एक साथ भोजन करते थे और सब महिलायें एक साथ भोजन करती थी. इस प्रकार भोजन के दौरान आपस में मधुर संवाद स्थापित हो जाता था. रात्रि में युवा वर्ग बुजुर्गों के पैर दबाता था और उसी दौरान बुजुर्ग लोग युवाओं को व्यापारिक सीख भी दिया करते थे, दिन भर के समाचार भी पूछ लेते थे. उसी समय वे उनको व्यावसायिक नीतियों और परम्पराओं की शिक्षा भी प्रदान करते थे. इसी प्रकार, मारवाड़ी उद्यमी अपने कर्मचारियों से भी प्रेम से बात करते थे और एक सौहार्द-पूर्ण माहौल बनाया करते थे.

21. सुव्यवस्थित खाते और सुव्यवस्थित वार्षिक विवरण : मारवाड़ी उद्यमी दिवाली से दिवाली अपने व्यापार के बही-खाते रखते थे. बहीखाते बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे जाते थे, जिनमे कभी भी कोई त्रुटि नहीं होती थी. हर विवरण बहुत ही सहेज कर रखा जाता था. हर दिवाली को नयी पुस्तकों में खाते-बही की पूजा कर के शुरुआत की जाती थी. हर खाता पूरी तरह से व्यवस्थित होता था. उस जमाने में कम्प्यूटर नहीं था, अतः सारे खाते वर्षों तक सुरक्षित रखे जाते थे.

पूरी दुनिया जानती है, किस प्रकार बजाज, बिरला, सिंघानिया, पीरामल, लोहिया, दुगड़, गोलछा, संघवी, मित्तल, पोद्दार, रुइया, और बियानी आदि घराने अपने व्यापारिक कौशल से आगे बढे हैं. बिरला समूह तो इस बात के लिए जाना जाता है, कि वो फैक्ट्री बाद में लगाता है - पहले वहां लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनाता है, लोगों को रहने के लिए मकान देता है. है न अद्भुत बात ! भामा शाह ने राणा प्रताप को दिल खोल कर मदद की, तो जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को दिल खोल कर मदद की. इन्हीं नीतियों के कारण अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लाखों गुरुकुल, उपासरे, पोशालाएँ, धर्मशालाएं, भोजनशलायें कार्यरत थी और उस समय की शिक्षा मूल्य-परक थी. उस समय में हर घर में श्रवण कुमार जैसे पुत्र होते थे, जो अपने व्यापार से ज्यादा अपने माँ-बाप और देश की सेवा को तबज्जु देते थे. मारवाड़ी व्यवस्था में कमियां निकालना बहुत आसान है, लेकिन उसकी जो अच्छाइयां हैं, उनको अगर आज का उद्यमी अपनाता है, तो वो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल प्रबंध व्यवस्था स्थापित कर पायेगा और इससे उसका और इस दुनिया का दोनों का भला ही होगा. लेकिन लुप्त हो रही इस व्यवस्था से सीखना और इसको आगे बचाना अब तो मुश्किल ही है. अमेरिका की आधुनिक प्रबंध शिक्षा हो सकता है, अधिक आर्थिक सफलता प्रदान कर दे, लेकिन जो सुकून और पर्यावरण से जो जुड़ाव भारतीय व्यवस्थाओं ने स्थापित किया था, वो तो अब लुप्त ही हो गया है और इसके लिए वर्तमान पीढ़ी ही जिम्मेदार है.

साभार : श्री त्रिलोक कुमार जैन, मणिपाल विश्वविद्यालय जयपुर

LALA LAJPAT RAY - हिंदुस्तान के महान स्वतंत्रता सेनानी की वह विरासत जो आज पड़ोसी मुल्क में है"

#LALA LAJPAT RAY - हिंदुस्तान के महान स्वतंत्रता सेनानी की वह विरासत जो आज पड़ोसी मुल्क में है"हिंदुस्तान के महान स्वतंत्रता सेनानी की वह विरासत जो आज पड़ोसी मुल्क में है"


सन् १९३८ में अग्रवाल नवरत्न गरमदल के महान स्वतंत्रता सेनानी #लाला_लाजपत_राय जी ने यह भव्य परिसर करांची में महालक्ष्मी के नाम से बनाया था। वह #महालक्ष्मी के अनन्य #भक्त थे। पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय वह जब बोलते थे तो उनका स्वर सिंह के समान गूंजता था जिससे ब्रिटिश अफसरों के दिल की धड़कने तेज हो जाति थीं.. भारत के विभाजन के पूर्व अखंड भारत की सबसे ऊंची इमारत होने का गौरव प्राप्त था। इसके ऊपर 18 फीट ऊंची समृद्धि और सौभाग्य की देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित थी। इसके आर्किटेक्ट Maysers D H Daruwala & Co. ने इसे Art Deco style में बनाया था। यह जयपुर के लाल पत्थरों से बनी थी और इसके मालिक लाहौर के लाला लाजपत राय थे। इसका उत्घाटन #सरोजनी_नायडू ने किया था। अपने उत्कृष्ट आर्किटेक्चर, क्लॉक टावर और आयरन एलिवेटर के लिए यह भवन पूरे शहर में प्रसिद्ध था।

लेकिन भारत की आजादी के बाद मल्लेच्छों ने इस भवन का नाम बदल दिया और हमारी प्यारी माता की मूर्ति भी तोड़ दी... और अपने हाथों से ही अपने देश की गरीबी और बदहाली लिख ली... चलिए #मल्लेच्छो ने #करांची की तो लक्ष्मी बिल्डिंग का नाश कर दिया... लेकिन लाला लाजपत राय जी ने १९३८ में ही भारत #मुंबई में भी लक्ष्मी बिल्डिंग का निर्माण करवाया था जिसके ऊपर आजतक भगवती लक्ष्मी विराजमान हैं.. और इस बिल्डिंग का उद्घाटन स्वयं नेताजी #सुभाष_चंद्र_बोस ने किया था. 

लाला लाजपत राय जी ने #लाहौर में #लक्ष्मी_मैंशन का भी निर्माण करवाया था जिसके चौक का नाम भी माता लक्ष्मी के नाम पर लक्ष्मी चौक हो गया... लाला लाजपत राय ने ही #जिन्ना की मुस्लिम लीग के विरोध में पंजाबी हिंदू महासभा बनाई थी जो आगे जाकर #मालवीय जी की #हिंदू_महासभा की नींव पड़ी.. लाला जी हिंदू महासभा के अध्यक्ष पद पर भी लंबे समय तक रहे.. उन्होंने महामारी के वक्त जब #क्रिश्चियन मिशनरी अछूतों का धर्मांतरण करवा रहीं थी तब अछूतोद्धार आंदोलन चलाकर हरिजनों को हिंदू धर्म से जोड़ने और उनके लिए आवास और रोजगार का प्रबंध भी किया था। 

हमारे महान स्वतंत्रता सेनानी और सभी क्रांतिकारियों के प्रिय नेता लाला लाजपत राय जी की अनमोल विरासत है .. लाला लाजपत राय जी ने अपने प्राण देश के नाम न्योछावर किए थे थे और उनके अपमान का ही बदला लेने के लिए भगत सिंह सुखदेव राजगुरु आदि हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। 

महालक्ष्मी हम अग्रवालों की कुलदेवी हैं... #महालक्ष्मी ने #महाराजा अग्रसेन को आज से ५१०० वर्ष पूर्व ही वरदान दिया था की हे अग्र ! जिस कुल में युगों युगों तक मेरी नित्य पूजा होगी ऐसा तुम्हारा अग्रवंश होगा... लाला लाजपत राय भी इसी #अग्रवंश के अनमोल रत्न हैं

SABHAR : PRAKHAR AGRAWAL

Monday, October 2, 2023

ASHA PAREKH - जिओ तो आशा पारेख जैसे

#ASHA PAREKH - जिओ तो आशा पारेख जैसे 

डिप्रेशन में सुसाइड के बारे में सोचने लगी थीं आशा पारेख, सिंगल रहकर खुद के दम पर बदली


हिंदी सिनेमा पर कई दशकों तक राज करने वालीं एवरग्रीन एक्ट्रेस आशा पारेख को भला कौन नहीं जानता। चार दशक से भी लंबे करियर तक फिल्मी दुनिया पर राज करने वालीं आशा पारेख पर हर कोई फिदा था। हीरो भी आशा पारेख पर जान छिड़कते थे। लेकिन आशा पारेख निजी जिंदगी में अकेली ही रह गईं। उन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी, और उन महिलाओं के लिए मिसाल कायम की, जो अकेलेपन में निराश हो जाती हैं और हिम्मत हार जाती हैं। आशा पारेख की जिंदगी में भी एक ऐसा मोड़ आया था, जब वह डिप्रेशन में डूब गई थीं, और उन्हें आत्महत्या करने के ख्यालों ने घेर लिया था। पर एक्ट्रेस ने उन विचारों के भंवर जाल को तोड़ खुद को बाहर निकाला। एक मजबूत महिला बनकर हर किसी के लिए प्रेरणा बनीं। आशा पारेख का 2 अक्टूबर को 81वां बर्थडे है। इस मौके पर 'मंडे मोटिवेशन' सीरीज में उनकी यही इंस्पायरिंग कहानी बता रहे हैं।

दो अक्टूबर 1942 को गुजराती  बनिया जैन परिवार में एक ऐसी लड़की का जन्म हुआ, जो आने वाले वक्त में हिंदी सिनेमा की तस्वीर बदलने वाली थी। कहावत है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। आशा पारेख के साथ भी ऐसा ही था। मां सुधा यानी सलमा पारेख ने जब देखा कि नन्हीं सी आशा पारेख को डांस का शौक है, तो उन्हें क्लासिकल डांस की ट्रेनिंग दिलवानी शुरू कर दी। इस तरह छोटी सी उम्र से ही आशा पारेख ने डांस की बारीकियां सीख लीं, और आज अपनी डांस अकेडमी चलाती हैं।


Monday Motivation Asha Parekh:81 साल की उम्र के पड़ाव पर आशा पारेख भले ही निजी जिंदगी में अकेली हैं। भले ही उन्होंने शादी नहीं की और बच्चा भी गोद नहीं लिया, पर अकेलेपन को उन्होंने कमजोरी बनाने के बजाय ताकत बनाया। दुनिया को दिखा दिया कि एक अकेली औरत चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकती। आशा पारेख एक महान एक्ट्रेस और डांसर ही नहीं बल्कि आज उनके नाम से मुंबई में एक हॉस्पिटल चलता है और वह डांस भी सिखाती हैं।

हीरोइन बनने चलीं तो हुईं रिजेक्ट, कहा गया- स्टार मटीरियल नहीं

आशा पारेख ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में की थी। उनकी पहली फिल्म 1952 में आई थी, जिसका नाम 'मां' था। कुछ और फिल्मों में आशा पारेख ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया, और फिर स्कूल के कारण एक्टिंग छोड़ दी। लेकिन जब आशा पारेख 16 साल की हुईं, तो उन्होंने बतौर लीड एक्ट्रेस करियर शुरू करने के बारे में सोचा। पर पहले ही पड़ाव पर उन्हें रिजेक्शन का सामना करना पड़ा।


रिजेक्शन के 8 दिन बाद ही रातोंरात बनीं स्टार

डायरेक्टर ने यह कहकर आशा पारेख को 'गूंज उठी शहनाई' में साइन करन से मना कर दिया कि वह स्टार मटीरियल नहीं हैं। हीरोइन बनने के लायक नहीं हैं। पर आशा पारेख ने खुद को टूटने नहीं दिया। हिम्मत रखी और 8 दिन बाद ही उन्हें डायरेक्टर नासिर हुसैन ने 'दिल देके देखो' ऑफर की। इस फिल्म ने आशा पारेख को रातोंरात स्टार बना दिया और 60 के दौर की टॉप हीरोइनों में ला खड़ा किया।


जब डिप्रेशन में गईं आशा पारेख, सुसाइड के बारे में लगीं सोचने

आशा पारेख फिल्मी करियर में दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की कर रही थीं। लेकिन निजी जिंदगी में बहुत उथल-पुथल से गुजरीं। आशा पारेख की जिंदगी में सबसे बुरा दौर तब आया, जब उन्होंने मां-बाप को खो दिया। उस दौर के बारे में एक्ट्रेस ने 'इंडियन एक्सप्रेस' को दिए इंटरव्यू में किया था। आशा पारेख ने कहा था कि वह उनकी जिंदगी का सबसे काला और बुरा दौर था। वह बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं और डिप्रेशन में चली गई थीं। आशा पारेख के मुताबिक, उनके मन में सुसाइड के ही ख्याल आते। वह मौत को गले लगाने के बारे में सोचतीं। पर आशा पारेख हिम्मत रखे हुए थीं। उन्होंने उससे उबरने में डॉक्टरों की भी मदद ली। और देखो, आज वही आशा पारेख हैं, जो 81 साल की उम्र में भी हमारे सामने डटकर खड़ी हैं, और काम कर रही हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह डांस अकेडमी और एक हॉस्पिटल चला रही हैं। वाकई उनकी कहानी किसी मिसाल से कम नहीं है।

HIMANSHU GUPTA - A MOUNTAINEER

 

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Sunday, October 1, 2023

SHARK TAINK JUDGES - सारे के सारे पुरुष जज वैश्य समाज से

#SHARK TAINK JUDGES - सारे के सारे पुरुष जज वैश्य समाज से