Tuesday, July 16, 2019

वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा


◆ वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा

★ महाराज अग्रसेन ने अपने नगर अग्रोहा में बसने वाले नए शख्श के लिए एक निष्क और एक ईंट हर परिवार से देने का नियम बनाया था। ताकि अग्रोहा में आने वाले हर शख्श के पास व्यापार के लिए पर्याप्त पूंजी हो और वो अपना घर बना सके।

★ जगतसेठ भामाशाह कांवड़िया महाराणा प्रताप के सलाहकार, मित्र व प्रधानमंत्री थे। इन्होंने हिन्दवी स्वराज के महाराणा प्रताप के सपने के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था । जिसके बाद महाराणा ने एक के बाद एक किले फतेह किये ।

★ एक घटना है जब गुरुगोविंद सिंहः के बच्चो की मुसलमानो ने निर्मम हत्या कर दी, मुसलमान यह दवाब डाल चुके थे, के उनका दाह संस्कार भी नही होने देंगे !! सभी सिख सरदार भी बस दूर खड़े तमाशा देख रहे थे !!

तब एक हिन्दू बनिया टोडरमल जी आगे आये, उन्होंने जमीन पर सोने के सिक्के बिछाकर मुसलमानो से जमीन खरीदी , जिन पर गुरु गोविंद सिंह के बच्चो का दाह संस्कार हो सके !!

आज उनकी कीमत लगभग 150 से 180 करोड़ रुपये तक बेठती है !!

★ बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के निर्माण के समय महामना मदन मोहन मालवीय सेठ दामोदर दास राठी (माहेश्वरी) जी से मिले थे। उस समय सेठ जी ने BHU के निर्माण के लिए महामना को 11000 कलदार चांदी के सिक्कों की थैली भेंट की जिसकी कीमत आज 1 हज़ार करोड़ रुपये बैठती है।

★ आजादी के दीवानों में अग्रवाल समाज के सेठ जमनालाल बजाज का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए 

यह रहते महात्मागांधी के साथ थे, लेकिन मदद गरमदल वालो की करते थे ! जिससे हथियार आदि खरीदने में कोई परेशानी नही हो !!

इनसे किसी ने एक बार पूछा था, की आप इतना दान कैसे कर पाते है ?

तो सेठजी का जवाब था ---मैं अपना धन अपने बच्चो को देकर जाऊं, इससे अच्छा है इसे में समाज और राष्ट्र के लिए खर्च कर देवऋण चुकाऊं ।

★ रामदास जी गुड़वाला अग्रवाल समाज के गौरव हैं । जगतसेठ रामदास जी गुरवाला एक बड़े बैंकर थे जिन्होंने 1857 की गदर में सम्राट बहादुर शाह जफर (जिनके नेतृत्व में 1857 का आंदोलन लड़ा गया था ) को 3 करोड़ रुपये दान दिए थे। वे चाहते थे देश आजाद हो ।

सम्राट दीवाली समारोह पे उनके निवास पे जाते थे और सेठ उन्हें 2 लाख अशरफी भेंट करते थे ।

उनका प्रभाव देखते हुए अंग्रेजों ने उनसे मदद मांगी लेकिन उन्होंने मना कर दिया था ।

बाद में अंग्रेजों ने उन्हें धोके से शिकारी कुत्तों के सामने फिकवा दिया और उसी घायल अवस्था मे चांदनी चौक के चौराहे पे फांसी पे चढ़ा दिया था ।

लेख साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल सभा 













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