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Tuesday, July 9, 2013

SWAMI SHRADDHANAND - A VAISHYA GOURAV - स्वामी श्रद्धानन्द - वैश्य गौरव


स्वामी श्रद्धानन्द



स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

स्वामी श्रद्धानन्द भारत के उन महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।


जीवन परिचय

स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म २२ फरवरी सन् १८५६ (फाल्गुन कृष्ण त्र्योदशी, विक्रम संवत् १९१३) को पंजाब प्रान्त के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट ईण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनके बचपन का नाम वृहस्पति और मुंशीराम था, किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ।

पिता का ट्रान्सफर अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी। लहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र मुंशीराम को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुंचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

वे एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। आर्य समाज में वे बहुत ही सक्रिय रहते थे।

उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था। जब आप ३५ वर्ष के थे तभी शिवा देवी स्वर्ग सिधारीं। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। सन् १९१७ में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।

गुरुकुल की स्थापना

सन् 1901 में मुंशीराम ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल विद्यालय खोला गया। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है जिसका नाम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय है। गांधी जी उन दिनों अफ्रीका में संघर्षरत थे। महात्मा मुंशीराम जी ने गुरुकुल के छात्रों से 1500 रुपए एकत्रित कर गांधी जी को भेजे। गांधी जी जब अफ्रीका से भारत लौटे तो वे गुरुकुल पहुंचे तथा महात्मा मुंशीराम तथा राष्ट्रभक्त छात्रों के समक्ष नतमस्तक हो उठे। स्वामी श्रद्धानन्द ने ही सबसे पहले उन्हे महात्मा की उपाधि से विभूषित किया और बहुत पहले यह भविष्यवाणी कर दी थी कि वे आगे चलकर बहुत महान बनेगे।

पत्रकारिता एवं हिन्दी-सेवा

उन्होने पत्रकारिता में भी कदम रखा। वे उर्दू और हिन्दी भाषाओं में धार्मिक व सामाजिक विषयों पर लिखते थे। बाद में स्वामी दयानन्द सरस्वतीका अनुसरण करते हुए उनने देवनागरी लिपि में लिखे हिन्दी को प्राथमिकता दी। उनका पत्र सद्धर्म पहले उर्दू में प्रकाशित होता था और बहुत लोकप्रिय हो गया था। किन्तु बाद में उनने इसको उर्दू के बजाय देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में निकालना आरम्भ किया। इससे इनको आर्थिक नुकसान भी हुआ। उन्होने दो पत्र भी प्रकाशित किये, हिन्दी में अर्जुन तथा उर्दू में तेज। जलियांवाला काण्ड के बाद अमृतसर में कांग्रेस का 43वां अधिवेशन हुआ। स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना भाषण हिन्दी में दिया और हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किए जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन

उन्होने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ-चढकर भाग लिया। गरीबों और दीन-दुखियों के उद्धार के लिये काम किया। स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया। सन् 1919 में स्वामी जी ने दिल्ली में जामा मस्जिद क्षेत्र में आयोजित एक विशाल सभा में भारत की स्वाधीनता के लिए प्रत्येक नागरिक को पांथिक मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया था।

शुद्धि

स्वामी श्रद्धानन्द ने जब कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को "मुस्लिम तुष्टीकरण की घातक नीति" अपनाते देखा तो उन्हें लगा कि यह नीति आगे चलकर राष्ट्र के लिए विघटनकारी सिद्ध होगी। इसके बाद कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया। दूसरी ओर कट्टरपंथी मुस्लिम तथा ईसाई हिन्दुओं का मतान्तरण कराने में लगे हुए थे। स्वामी जी ने असंख्य व्यक्तियों को आर्य समाज के माध्यम से पुन: वैदिक धर्म में दीक्षित कराया। उनने गैर-हिन्दुओं को पुनः अपने मूल धर्म में लाने के लिये शुद्धि नामक आन्दोलन चलाया और बहुत से लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया। स्वामी श्रद्धानन्द पक्के आर्यसमाज के सदस्य थे, किन्तु सनातन धर्म के प्रति दृढ़ आस्थावान पंडित मदनमोहन मालवीय तथा पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ को गुरुकुल में आमंत्रित कर छात्रों के बीच उनका प्रवचन कराया था।

हत्या

23 दिसम्बर, 1926 को नया बाजार स्थित उनके निवास स्थान पर अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी धर्म-चर्चा के बहाने उनके कक्ष में प्रवेश करके गोली मारकर इस महान विभूति की हत्या कर दी। उसे बाद में फांसी की सजा हुई।

साभार : विकिपीडिया 

Wednesday, July 3, 2013

दानवीर भामाशाह - वैश्य गौरव


दान की चर्चा होते ही भामाशाह का नाम स्वयं ही मुँह पर आ जाता है। देश रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के चरणों में अपनी सब जमा पूँजी अर्पित करने वाले दानवीर भामाशाह का जन्म अलवर, राजस्थान में 28 जून, 1547 को हुआ था। उनके पिता श्री भारमल्ल तथा माता श्रीमती कर्पूरदेवी थीं। श्री भारमल्ल राणा साँगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे। अपने पिता की तरह भामाशाह भी राणा परिवार के लिए समर्पित थे। एक समय ऐसा आया जब अकबर से लड़ते हुए राणा प्रताप को अपनी प्राणप्रिय मातृभूमि का त्याग करना पड़ा। वे अपने परिवार सहित जंगलों में रह रहे थे। महलों में रहने और सोने चाँदी के बरतनों में स्वादिष्ट भोजन करने वाले महाराणा के परिवार को अपार कष्ट उठाने पड़ रहे थे।
राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएँ, जिससे अपने देश को मुगल आक्रमणकारियों से चंगुल से मुक्त करा सकंे। इस समय राणा के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या धन की थी। उनके साथ जो विश्वस्त सैनिक थे, उन्हें भी काफी समय से वेतन नहीं मिला था। कुछ लोगों ने राणा को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी; पर राणा जैसे देशभक्त एवं स्वाभिमानी को यह स्वीकार नहीं था। भामाशाह को जब राणा प्रताप के इन कष्टों का पता लगा, तो उनका मन भर आया। उनके पास स्वयं का तथा पुरखों का कमाया हुआ अपार धन था। उन्होंने यह सब राणा के चरणों में अर्पित कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने25 लाख रु0 तथा 20,000 अशर्फी राणा को दीं। राणा ने आँखों में आँसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया।
राणा की पत्नी महारानी अजवान्दे ने भामाशाह को पत्र लिखकर इस सहयोग के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। इस पर भामाशाह रानी जी के सम्मुख उपस्थित हो गये और नम्रता से कहा कि मैंने तो अपना कर्त्तव्य निभाया है। यह सब धन मैंने देश से ही कमाया है। यदि यह देश की रक्षा में लग जाये, तो यह मेरा और मेरे परिवार का अहोभाग्य ही होगा। महारानी यह सुनकर क्या कहतीं, उन्होंने भामाशाह के त्याग के सम्मुख सिर झुका दिया। उधर जब अकबर को यह घटना पता लगी, तो वह भड़क गया। वह सोच रहा था कि सेना के अभाव में राणा प्रताप उसके सामने झुक जायेंगे; पर इस धन से राणा को नयी शक्ति मिल गयी। अकबर ने क्रोधित होकर भामाशाह को पकड़ लाने को कहा। अकबर को उसके कई साथियों ने समझाया कि एक व्यापारी पर हमला करना उसे शोभा नहीं देता। इस पर उसने भामाशाह को कहलवाया कि वह उसके दरबार में मनचाहा पद ले ले और राणा प्रताप को छोड़ दे; पर दानवीर भामाशाह ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
इतना ही नहीं उन्होंने अकबर से युद्ध की तैयारी भी कर ली। यह समाचार मिलने पर अकबर ने अपना विचार बदल दिया। भामाशाह से प्राप्त धन के सहयोग से राणा प्रताप ने नयी सेना बनाकर अपने क्षेत्र को मुक्त करा लिया। भामाशाह जीवन भर राणा की सेवा में लगे
रहे। महाराणा के देहान्त के बाद उन्होंने उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, जब उनका अन्त समय निकट आया, तो उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह अमरसिंह के साथ सदा वैसा ही व्यवहार करे, जैसा उन्होंने राणा प्रताप के साथ किया है। भामाशाह के लिए निम्नलिखित पंक्तियाँ कही गई हैं- वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला ।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला ।।


Monday, July 1, 2013

BANIYAS AND THEIR SECRET OF SUCCESS


THE SECRET OF BANIYA SUCCESS


News Item: IIM-B creams the best paid jobs

$193,000. That’s how much 29-year-old Gaurav Agarwal of the Indian Institute of Management, Bangalore, will make once he joins Barclays Capital, a British Bank, to work on Global financial risk management.
‘‘I attribute the increasing salaries to the economy. I also feel that many Indian salaries being offered now are much more when compared relatively,’’ said Agarwal, an electrical engineer from IIT Kanpur. ‘‘I joined IIM Bangalore as I wanted to change what I was doing,’’ says Agarwal, who plans to return to India after a few years.
IIM-B also saw the highest offer for a domestic position by an international firm — at Rs. 30 lakh per annum. ‘‘This has been a historic event for us. Of the 182 students that opted for placements, 65 have already been recruited,’’ said placement committee member Saurav Bansal.
While it may be stale news that Indians are making unprecedented success in many fields and that too in global arena, maybe you’ve not noticed something between the lines: the success of typical middle class in general-- and Baniya class in particular-- in professional fields; the success of Baniya clan in business is already well-established. Baniyas have shown their mettle in business and be it Gujarati, UP or Marwari, the Baniya has the will and the capabilities to make money in any adverse situation.
Let me explain why.
You go to any IIT, IIM, Engineering, Medical, Management, Architecture or any other knowledge- based institution, you’ll come across many Bansals, Aggarwals, Jains, Guptas, Mittals at every level of these institutions and organizations. Have you wondered why?
1.       Family Values: Baniyas are conservative, conventional, and enterprising. But, most of all, they are family people who respect family values. Which means, they respect their women and elders and inculcate good values in their children. I think the divorce rate in Baniyas might be the lowest, but I’ve no figures to substantiate this. Yes, the curse of dowry is there in Baniyas but then, it is there in the whole of Indian class.
2.       Pragmatic and Progressive: Baniyas value progress and are extremely practical and adaptable. They realize that the only way to climb up the stair in the society is by education. No wonder, Baniyas are willing to sell their house to finance the education of their children and pay through their noses for making the best possible education available to their wards. They are also God fearing and religious, but liberal towards other religions.
3.       Law abiding and conservative: Baniyas are the most conservative and believe in being law abiding. In US, the crime rate of Indians is the lowest and being highly educated expatriate and immigrants; they respect education, merit and are useful to their society they live in. Yes, they’re somewhatdabboo and cowardly, but being in interface with the general and sometimes envious public, they have learnt to be low profile and simple/ austere in their conduct.
4.       Money-wise: The credit card companies in US are extremely angry with Indians for taking their credit card and paying the bills on them in time, unlike Americans; this means these companies make no money from them and this they don’t like. Baniyas like me take the cards, use it to the minimum and pay on time, much to the consternation of the card companies. Baniyas are the least defaulters of banks, loan companies and live within their means. They save money and use it for education, marriages and building properties. No wonder, most Baniyas die rich. They believe in living within their means.
5.       Genetic Disposition: Baniyas are good at maths and they’re genetically inclined towards engineering, business and hisaab-kitaab. It is in their ghutti that they get maths and science from their mothers and fathers.

So, no wonder if you come across a Baniya at every level of management in any organization.
Incidentally, the richest Indian is also a Baniya.
His name is Lakshmi Mittal.

SABHAR : INDIATIMES.COM

Saturday, June 15, 2013

पुश्यगुप्त - PUSHYAGUPTA

पुश्यगुप्त - PUSHYAGUPTA

बोद्ध साहित्य एवं अशोक के अभिलेखों से स्पष्ट होता हैं कि मौर्य साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभक्त था, और राजकुल के राजकुमार ही प्रायः उनके राज्यपाल हुआ करते थे. रुद्रादमन (१५० ई) के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता हैं कि चंद्र गुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र (गुजरात) को अपने साम्राज्य का एक प्रांत बनाया था. और वंहा एक प्रान्तपति नियुक्त किया था जो कि वैश्य वंश का था, जिसका नाम पुष्य गुप्त था. जो कि चंद्रगुप्त का बहनोई था. उसने वंहा जनता के हित के लिए  विशाल सुदर्शन झील का निर्माण कराया था. (मौर्यस्य राज्ञः चन्द्रगुप्तस्य राश्त्रियेन् वैश्येन् पुश्य्गुप्तेन् कारितः) 

अतः स्पष्ट है कि पुश्यगुप्त मौर्य साम्राज्य के सौराष्ट्र प्रांत का राज्यपाल था. 

साभार: प्राचीन भारत में वैश्य समुदाय कि स्थिति और उसकी भूमिका 

Friday, June 14, 2013

गुजराती वैश्य - Gujrati Vaishya

Gujrat Vanis

Gujarat Vanis include the two divisions of Vadnagari and Visnagari Vanis, and claim descent from the Vaishyas, the third of the four traditional Hindu tribes. The names in common use among men arc Damodardas, Dwarkadas, Haridas, Krishnadas, Madhavdas, Prabhudas, Vallabhdas, Vishnudas, Vithaldas and Uttamdas; and among women Bhagirthibai, Jamnabai, Krishnabai, Kaveribai, Motibai, Rakhamabai, Sundarabai and Vithabai. They have no surnames. Their family-god is Vyankatesh or Balaji of Tirupati. Some are Vadnagars and others Visnagars from the towns of those names in north Gujarat. All in the district are said to belong to the Vishe division of these two classes. The two classes eat together but do not inter-marry. As a rule they are wheat-coloured, regular and delicate-featured and weak, the women being fairer than the men. Their home-tongue is Gujarati, but out-of-doors they speak Marathi. They are religious, worshipping all Brahmanic gods and keeping all Hindu fasts and feasts. Their family-gods are Balaji or Vyankoba of Tirupati in North Arkot and Vithoba of Pandharpur, and they make pilgrimages to the leading Hindu sacred places. Their priest is a Gujarati Brahman, and in his absence a Deshasth Brahman is asked to officiate at their marriage and death ceremonies. They belong to the Vallabhacharya sect. Every male and female should receive religious instruction from the teacher and repeat the verse or mantra which the teacher whispers into the ear of the initiated. They bow before him and offer him flowers and sandal paste. They believe in sooth-saying and astrology, but profess not to believe in witch-craft, omens or evil spirits. Of the sixteen Brahman ceremonies or sanskars they perform the naming, hair- clipping, marriage, puberty and death ceremonies. The details on each of these occasions differ little from those in use among local Brahmans. When a boy begins to learn to write, he is taken to school on a lucky day with music and a band of friends. In the name of Sarasvati, the goddess of learning, he lays before the slate, flowers, sandal paste, vermilion and turmeric powder, sweetmeats, with betel leaves and nuts and a coconut, and bows to the slate. Packets of sweetmeats are handed among the schoolboys. The teacher makes the boy write Om namas siddham, corrupted into O na ma si dham, that is, Bow to the perfect, and is presented with a roll of betel leaves, nuts and money, and the learning ceremony or Sarasvati pujan is over. Unlike local Brahmans, girls worship the goddess of fortune or mangalagauri before, and never after, they are married. Early marriage is allowed and practised, widow marriage and polygamy are forbidden on pain of loss of caste; polyandry is unknown. They have a caste council and settle social disputes at its meetings. Breaches of caste discipline are punished with fine and the decisions of the council are obeyed on pain of loss of caste. 

Gujarat Jains, also called Shravaks. According to their own account they formerly dwelt in Oudh and accepted Jainism along with Bharat, a Solar Kshatriya, the great disciple of Vardhamansvami. They are called Gujars because after leaving Oudh they settled in Gujarat. The names in common use among men and women are the same as those used by Vaishnav Gujars and the men add shetji or master and bhoyiji or brother to their names. Their surnames are Bhandari, Ganchi, Mulavera, Nanavati, Patu, Saraph, Shaha and Vakhariya. Persons bearing the same surnames may not inter-marry. Their home-tongue is Gujarati, and their family-god is Parasnath. They marry among themselves. In appearance and habits they do not differ from Gujar Vanis. They rank with Vaishnav Gujars though neither class eats from the other. They are religious, and they belong to the Digambar sect.

लाड वैश्य - LAD VAISHYA

#लाड वैश्य - LAD VAISHYA 

लाड बनियों के नाम से प्रतीत होता है कि वे दक्षिण गुजरात से अहमदनगर आये थे जिनका पुराना नाम (150 ई.) लाड या लाट देश था। पुरुषों और महिलाओं के बीच आम तौर पर उपयोग किए जाने वाले नाम स्थानीय हिंदुओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले नामों से भिन्न नहीं हैं। उनके उपनाम बालाटे, चव्हाण, सिखले, चौधरी, गोसावी, झारे, कराडे, खेले, मोदी, पैठंकर और शेटे हैं।

उनके परिवार-देवता तुलजापुर की देवी, सतारा में शिंगनापुर की महादेई और शोलापुर में पंढरपुर के विठोबा हैं। इनका जाति देवता पेटलाड के निकट आशापुरी या अशनाई है।

पारिवारिक संपत्ति में समानता लेकिन उपनाम में समानता न होना विवाह में बाधक है। वे धार्मिक लोग हैं, अपने परिवार और अन्य ब्राह्मण देवताओं की पूजा करते हैं और पवित्र स्थानों पर जाते हैं। उनका पुजारी एक देशस्थ/खेडावल ब्राह्मण है, जिसे वे अपने प्रमुख समारोहों में संचालन करने के लिए कहते हैं। उनके रीति-रिवाज आंशिक रूप से कुनबियों के समान हैं और आंशिक रूप से ब्राह्मणों के समान हैं, सिवाय इसके कि ग्रंथ सामान्य हैं और वैदिक संस्कृत में नहीं हैं। सामाजिक विवादों का निपटारा बैठकों में किया जाता है और सामाजिक अनुशासन का उल्लंघन करने वालों को जुर्माने से दंडित किया जाता है, जो आम तौर पर जाति-भोज पर खर्च किया जाता है। अन्य बनियों की तरह वे बीसा और दासा समूहों या 20 और 10 में विभाजित हैं, दासा अनियमित वंश के हैं।

Lad Banis as their name seems to show that they came to Ahmadnagar from south Gujarat whose old name (A.D. 150) was Lad or Lat Desh. The names in common use among men and women do not differ from those used by local Hindus. Their surnames are Balate, Chavan, Cikhale, Chaudhari, Gosavi, Jhare, Karade, Khele, Modi, Paithankar and Shete.

Their family-gods are Devi of Tuljapur, Mahadey of Shingnapur in Satara, and Vithoba of Pandharpur in Sholapur. Their caste deity is Ashapuri or Ashnai near Petlad.

Sameness of family-stock but not sameness of surname is a bar to marriage. They are religious people, worshipping their family and other Brahmanic gods, and visiting holy places. Their priest is a Deshasth/Khedawal Brahman whom, they ask to officiate at their leading ceremonies. Their customs are partly like those of Kunbis and partly like those of Brahmans, except that the texts are in ordinary and not in Vedic Sanskrit. Social disputes are settled at meetings and breaches of social discipline are punished with fines which are generally spent on caste-feasts. Like other Banias they are divided into the Bisa and Dasa groups or 20s and 10s, the Dasa being of irregular descent.

कोमती वैश्य - Koumti Vaishya

Komti Bania: 



The Marwari is essentially following similar mercantile pursuits to the Vaisya Komati of Peninsular India, and those of the Wani or Bani(a), to which the Komati add that of retail shopkeeping. All the Marwari of Rajputana adhere to the principle of reckoning their descent to a founder, and in their marriage ceremonies they abstain from blodd relationship, never marrying into their own gotra. Their widows never re-marry. The Baniya or Komati merchants and bankers are generally of the Vaishnava sect, but some of them worship Siva. They are most numerous in Telingana (Andhra) and in Madras (Tamil Nadu). They are essentially shopkeepers, sellers of dry grains, cultivation, and mercatile business. The Wani of the Western coast will only marry with the Komati Banya. They are in considerable numbers in the northern Andhra, adjoining Berar. They seem to have come from Telaugana. The names in common use among men are Govinda, Rama, Vishnu and Vithoba; and among women Chima, Ganga, Lakshmi Rama and Yamuna. Their surnames are Bhingarkar, Chhet, Chitte Gandhekar, Konakam, Nimbalkar, Niradkar, Pankar, Sudal, Tanitar and Vadkar. Persons bearing the same surnames cannot inter-marry. Their home-tongue is Telugu, and the family-god is Balaji o Vyankatraman of Tirupati in North Arkot. They are divided into Jana, and Vani Komtis, the Janays weaving and selling sacred thread which the Vani Komtis neither weave nor sell. These two classes eat together but do not inter-marry. There is a third class of Kadu Komtis who eat but do not marry with the other Komtis. They are dark, strong, and flabby, with a round face and small lively eyes. Everyday they lay flowers, sandal pasta and food before the image of Vyankatraman of Tirupati, of Vithoba of Pandharpur, of Devi of Tuljapur, of Ganpati, of Khandoba of Jejur in Pune, and of Maruti, and keep all Hindu fasts and feasts. Their priest is a Telangi Brahman who lives in Pune, and visits their villages once a year, but does not take food at their hands. He officiates at their marriages and receives a yearly tribute in money from each of his followers. In his absence, local Brahmans are asked to take his place at their ceremonies and are much respected. They make pilgrimages to Jejuri in Pune, Pandharpur in Sholapur and Tirupati in North Arkot. They are bound together by a strong caste feeling and settle social disputes, at meeting of caste-men. Smaller breaches of social rules are punished with fine and graver offences are referred to their religious teacher Krishnacharya whose decision is final and is obeyed on pain of loss of caste. 

कोंकणी वैश्य - Konkani Vaishya

Konkani Bania: 

Also Kunams or Kunbi Vanis or Maratha traders. The names in common use among men are Bapu, Balvant, Dhondu, Govind and Rania; and among women, Bhagirathi, Chimani, Ganga, Manu, Sakhi, Salu and Thaki. They add the word shet or merchant to the names of men and bai to the names of women. Their surnames are Avari, Ahir, Bodake, Borule, Dandnaik, Dhavare, Golade, Gujar, Hagvane, Holkar, Jagdale, Kadekar, Kalaskar, Kale, Kasid. Mitkari, Motale, Nandure, Nikam, Pabbore, Pansambal, Sajgure, Sabele, Sadavarte, Todekari, Vaskar,Yevari etc. Persons bearing the same surname cannot inter-marry. Their family-gods are Bahiroba of Sonari in Amadnagar, Devi of Tuljapur and of Rasin in Ahmadnagar, Dayal Malik in the town of Ahmadnagar, Khandoba of Jejuri near Pune, and Vyankatesh of Tirupati in North Arkot. They have two divisions, one which wears and one which does not wear the ling, and who differ in no points except that the ling-wearers rub their brows with cowdung ashes. They eat together and intermarry. They do not differ from local Maratha, Kunbis in appearance or dress. They are a religious people, worshipping all Brahmanic gods and keeping all Hindu fasts and feasts. They almost have equal reverence to Shiv and Vishnu and go on pilgrimage to Alandi, Banaras, Jejuri, Tuljapur and Tirupati. The priest of those who wear the ling is a Jangam, but they also call a Brahman to their chief ceremonies. They are Sampradais or followers of Tukaram who lived in the seventeenth century, wear rosaries of basil beads, and repeat his couplets or abhangs in honour of Vithoba of Pandharpur. Their religious teacher is a devotee of Vithoba and a follower of Tukaram, whom they bow and offer un-cooked food, flower and sandal paste. They worship local gods, and believe in witch-craft, sooth-saying, and spirits, whom they scare by repeating prayers and with the help of Deyrushis or Hindu exorcists. The followers of Tukararn burn their dead and mourn ten days; lingwearers bury with Lingayat rites but hold after-death ceremonies in Brahman fashion. They have a caste council or panch, and settle social disputes at meetings of caste-men under the control of the council. A head-man, called shetya, attends marriages, and the fathers of the bride and bridegroom, groom present him with betel and mark his brow with sandal paste, His office, is hereditary, and traders consult him on trade questions. He fixes the market rates and all members of the community are forbidden to under-sell on pain of fine or loss of caste. 

Divisions: 



Angane, Ahir, Angre, Avari, Bagrao, Bagwe, Bande, Bhagore, Bhalekar, Bhogale, Bhoite, Bhorate, Bhoware, Bodake, Borule, Dabhade, Dadhe, Dalvi, Dandnaik, Darbare, Devkate, Dhamale, Dhamdhere, Dhavare, Dhawle, Dhekale, Dhone, Dhumak or Dhumal, Dhybar, Dige, Gaikwad, Gavane (or Gavase), Ghatge, Golade, Gujar, Hagvane, Harane, Harphale, Holkar, Jagdale, Jagdhane, Kakde,Kadekar, Kalaskar, Kale, Kank, Kasid, Khadtare, Khaire, Kokate, Kshirsagar, Lokhande, Madhure, Mahadik, Mahakule, Malap, Malusare, Mane, Mhambar, Misal, Mitkari, Mohite, Motale, Nalwade, Nandure, Nikam, Pabbore, Palande, Pansambal, Parte (or Pathare or Phadtare), Phakde, Phalke, Pingale, Pudhare, Rasal, Renuse, Sabele, Sadavarte, Sajgure, Sambhare, Shankpal, Shirke, Shitole, Surve, Tawde, Teje, Thorat, Thote, Todekari,Ubale, Varade, Vaskar, Vichare, Wagh and Yevari. 

Marwari Vaishya - मारवाड़ी वैश्य

Marwari Bania:

Marwar is a place in Rajputana, from where we have Marwari Rajputs, Marwari Brahmins, Marwari Banias, etc. Out of the 128 merchant Marwari sub-castes in Rajasthan (that Todd counted), only five became big and prominent in Indian national commerce. These were the Maheshwaris, Oswals, Aggarwals, Porwals and Khandelwals. 

Marwaris vanias include the Mahajans, Maheshwaris, Oswals, Aggarwals, Sarawagis, Por(w)als or Porwar, Shrimals, Shrishrimals, Vijayvargias, Sunlas, Bohres, Pheriwalas, Baldias and Lohias, Khandelwal, Padmavati Purval, Lamechu, Chaturth, Pancham, Bagherwal, Shetwal, etc. 

In addition there are the Orwals, Mohnots, Singhis, Lodhas and Mohatas, Saukar, Sarraff or Shroff, Banya Komati, Modi grianseller etc. whose members are in the field of business, industry and administration. 



The Marwari arrange themselves into 12 tribes: the Mestri, the Urwar, Agarwal, Bijabargi, Sarogi and Oswa(l), Kandalwal, Neddatwar, and Porwal, etc. These all are divided into numerous kap or clans; in the Mahessar tribe alone are 72, amongst whom are the Rathi and Dhaga. These whealthy bankers and merchants, scattered throughout India, are all known under the denomination of Marwari, which means belonging to Maru or Marusthan, the desert. It is singular, Colonel Tod adds (Rajasthan, ii. P. 234), that the wealth of India should centre in this region of comparative sterility. 

श्री अग्रसेन जी महाराज



साभार :

श्री अग्रसेन जी के गौरवशाली अग्रवाल



साभार :

Saturday, June 8, 2013

वैश्य समाज कि बेटियों ने किया नाम रोशन



साभार : अग्रोहाधाम..

PREMLATA AGRAWAL - प्रेमलता अग्रवाल - दुनिया के हर शिखर पर विजय


 PREMLATA AGRAWAL - प्रेमलता अग्रवाल - दुनिया के हर शिखर पर विजय 


बेटियों के लिए वह गट्सी मॉम (साहसी मां) हैं, तो पति के लिए साधारण जीवन जीने वाली असाधारण महिला, लेकिन समर्थक उन्हें जमशेदपुर की माउंटिनियर मॉम (पर्वतारोही मां) कहना ज्यादा पसंद करते हैं। वाकई जिस समाज में 40 वर्ष पार कर चुकी महिला अमूमन ′बुजुर्ग′ मानी जाती है और उनकी निर्भरता घर के पुरुष सदस्यों पर बढ़ जाती है, वहां उम्र के पचास वसंत देख चुकी प्रेमलता अग्रवाल अगर सेवन समिट्स (दुनिया के सातों महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटियां) की फतह का इतिहास रचती हैं, तो उनकी उपलब्धि पर इतराना स्वाभाविक है। यह सफलता इसलिए भी खास है, क्योंकि इससे पहले कोई भारतीय महिला यह उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई थी। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली भारत की सबसे उम्रदराज महिला का रिकॉर्ड भी प्रेमलता के ही नाम है।

पद्मश्री से सम्मानित प्रेमलता को पर्वतों से प्यार बचपन में ही हो गया था। तब दार्जिलिंग की पहाड़ी वादियां उन्हें खूब लुभाती थीं और वह अपने छोटे कदमों से पहाड़ नापने निकल पड़ती थीं। पर जमशेदपुर का सपाट मैदान ससुराल क्या बना, पहाड़ की गोद में खेलने की आदतें पीछे छूट गईं। अलबत्ता करीब दस वर्ष पूर्व घर-बच्चों की जिम्मेदारी घटनी शुरू हुई, तो इच्छाएं फिर से जीवित हो उठीं। पर्वतारोही बनने के उनके फैसले को पत्रकार पति और ससुरालवालों ने जरूर हाथोंहाथ लिया, फिर भी बढ़ती उम्र उनकी राह में रुकावट-जैसी थी। एवरेस्ट फतह को याद करते हुए प्रेमलता ने एक इंटरव्यू में कहा है, ′जब मैं बेस कैंप पहुंची, तो मिशन का नेतृत्व कर रहे शेरपा का पहला वाक्य यही था कि तुम इस मिशन पर क्यों आई हो? तुम चोटी तक नहीं पहुंच पाओगी।′ लेकिन जैसा कि पिता रामवतार गर्ग कहते हैं, उनकी बेटी जो ठान लेती है, उसे जरूर पूरा करती है। यही जिद प्रेमलता को विश्व की सबसे ऊंची चोटी तक ले गई, जबकि राह में मौसम ने तो रुकावटें डाली ही, दस्तानों के गुम होने से भी दिक्कतें आईं।

बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में प्रेमलता ने आज दुनिया नाप ली है, पर उन्हें खुद से बड़ी उपलब्धि अरुणिमा की लग रही है, जिसने विकलांगता को पीछे छोड़ते हुए एवरेस्ट की सफल चढ़ाई की। अब उनका सपना अपनी दो अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करना है-पहला, महिलाओं, खासकर आदिवासी महिलाओं को पर्वतारोहण का प्रशिक्षण देना, और दूसरा, छोटी बेटी की शादी कर मां का कर्तव्य पूरा करना।

एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जब वह बेस कैंप पहुंची, तो उन्हें यही सुनना पड़ा कि बढ़ती उम्र के कारण वह चोटी तक नहीं पहुंच पाएंगी।

साभार : अमरउजाला

Wednesday, May 8, 2013

VAISH COMMUNITY OF JHARKHAND - झारखंड में वैश्य समुदाय


Vaish Community of Jharkand

  1. Saundik(sudi) Vaish 
  2. Tailik Vaish 
  3. Kalwar(vayahut) Vaish 
  4. Jaishwal Vaish 
  5. Rauniyar Vaish 
  6. Kanu Vaish 
  7. Madhesiya Vaish 
  8. Kesarwani Vaish 
  9. Swarnkar Vaish 
  10. Barnwal Vaish 
  11. Maheshwari Vaish 
  12. kamlapuri Vaish 
  13. Agarwal Vaish 
  14. Mahuri Vaish 
  15. Chaurashiya Vaish 
  16. Sinduriya Vaish 
  17. Poddar Vaish 
  18. Agarhari Vaish 
  19. Rastogi Vaish 
  20. Kasera Vaish 
  21. Samari Vaish 
  22. Khandelwal Vaish 
  23. Thathera Vaish 
  24. Modi Vaish 
  25. Jain Vaish 
  26. Khatri Vaish 
  27. Malakar Vaish 
  28. Mathur Vaish 
  29. Kankubj vaish 
  30. Mahawar Vaish 
  31. Oshwal Vaish 
  32. Ayodhyawasi Vaish 
  33. Patwa Vaish 
  34. Pansari Vaish 
  35. Mahajan Vaish 
  36. kasaudhan Vaish 
  37. Kumbhkar Vaish 
  38. Bishwakarma Vaish 
  39. Batham Vaish 
  40. Tanti Vaish 
  41. Tomar Vaish 
  42. Kamat Vaish 
  43. Kaithal vaish 
  44. Manihari Vaish 
  45. Lohar Vaish 
  46. Khatik Vaish 
  47. Tilli Vaish 
  48. Naagar Vaish 
  49. Laheri Vaish 
  50. Punjabi Vaish 
  51. Sindhi Vaish 
  52. kajariwal Vaish 
  53. Bangh vaish 
  54. Santanpuri Vaish


  • साभार : वैश्य मोर्चा 

Saturday, April 20, 2013

सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य - HEMU VIKRAMADITYA



सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या केवल हेमू (१५०१-१५५६) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में १६वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। यह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण समय रहा जब मुगल एवं अफगान वंश, दोनों ही दिल्ली में राज्य के लिये तत्पर थे। कई इतिहसकारों ने हेमू को 'भारत का नैपोलियन' कहा है |

16वीं शताब्दी में एक नाम हेमू का आता है। महाराज हेमचन्द्र विक्रमादित्य वह विद्युत की भांति चमके और देदीप्यमान हुए। हेमू दोसर वैश्य भार्गव वंश के गोलिश गोत्र में उत्पन्न राय जयपाल के पौत्र और पूरनमाल के पुत्र थे। हेमू का एक दूसरा नाम हेमू बनिया बक्कल भी था. हेमू 16वीं शताब्दी का सबसे अधिक विलक्षण सेनानायक था । राजा विक्रमाजीत हेमू जन्म से मेवात स्थित रिवाड़ी के हिंदू थे जो अपने वैयक्तिक गुणों तथा कार्यकुशलता के कारण यह सूर सम्राट् आदिलशाह के दरबार का प्रधान मंत्री बन गया थे। यह राज्य कार्यो का संचालन बड़े योग्यता पूर्वक करते थे। आदिलशाह स्वयं अयोग्य थे और अपने कार्यों का भार वह हेमू पर डाले रहते थे।

जिस समय हुमायूँ की मृत्यु हुई उस समय आदिलशाह मिर्जापुर के पास चुनार में रह रहे थे। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार सुनकर हेमू अपने स्वामी की ओर से युद्ध करने के लिए दिल्ली की ओर चल पड़े। वह ग्वालियर होते हुए आगे बढे और उसने आगरा तथा दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। तरदीबेग खाँ दिल्ली की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। हेमू ने बेग को हरा दिया और वह दिल्ली छोड़कर भाग गया।

इस विजय से हेमू के पास काफी धन, लगभग 1500 हाथी तथा एक विशाल सेना एकत्र हो गई थी। उन्होंने अफगान सेना की कुछ टुकड़ियों को प्रचुर धन देकर अपनी ओर कर लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्राचीन काल के अनेक प्रसिद्ध हिंदू राजाओं की उपाधि धारण की और अपने को 'राजा विक्रमादित्य' अथवा विक्रमाजीत कहने लगे। इसके बाद वह अकबर तथा बैरम खाँ से लड़ने के लिए पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में जा डटे। 5 नवंबर, 1556 को युद्ध प्रारंभ हुआ। इतिहास में यह युद्ध पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। हेमू की सेना संख्या में अधिक थी तथा उसका तोपखाना भी अच्छा था किंतु एक तीर सम्राट हेमचन्द्र की आँख को छेदता हुआ सिर तक चला गया। हेमचन्द्र ने हिम्मत न हारते हुए तीर को बाहर निकाला परन्तु इस प्रयास में पूरी की पूरी आँख तीर के साथ बाहर आ गई। आपने अपने रूमाल को आँख पर लगाकर कुछ देर लड़ाई का संचालन किया, परन्तु शीघ्र ही बेहोश होकर अपने ``हवाई´´ नामक हाथी के हौदे में गिर पड़े।

शहर के कतोपुर स्थित साधारण परिवार से निकलकर अंतिम हिंदू सम्राट होने का गौरव प्राप्त करने वाले राजा हेमचंद विक्रमादित्य 7 अक्टूबर 1556 को मुगलों को हराकर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए थे।

आपका महावत आपको युद्ध के मैदान से बाहर निकाल रहा था कि मुगल सेनापति अली कुली खान ``हवाई´´ हाथी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा और बेहोश हेमू को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गया। इस प्रकार दुर्भाग्यवश सम्राट हेमचन्द्र एक जीता हुआ युद्ध हार गये और भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र दोसर वैश्य (भार्गव) वंश का शासन 29 दिन के बाद समाप्त हो गया।

बैराम खाँ के लिए यह घटना एकदम अप्रत्याशित थी। बैराम खाँ ने अकबर से प्रार्थना की कि हेमू का वध करके वह `गाज़ी´ की पदवी का हक़दार बने। आनन-फानन में अचेत हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया। जिससे हेमू के समर्थकों की हिम्मत या भविष्य के विद्रोह की संभावना को पूरी तरह कुचल दिया जाय।

दिल्ली पर अधिकार हो जाने के बाद बैराम खाँ ने हेमू के सभी वंशधरों का क़त्लेआम करने का निश्चय किया। हेमू के समर्थक अफ़ग़ान अमीर और सामन्त या तो मारे गए या फिर दूर-दराज़ के ठिकानों की तरफ भाग गए। बैराम खाँ के निर्देश पर उसके सिपहसालार मौलाना पीर मोहम्मद खाँ ने हेमू के पिता को बंदी बना लिया और तलवार के वार से उनके वृद्ध शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। और उसने हेमू के समस्त वशधरों यानी सम्पूर्ण ढूसर भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया। अलवर, रिवाड़ी नारनौल, आनौड़ आदि क्षेत्रों में बसे हुए दोसर वैश्य कहलाए जाने वाले भार्गव जनों को चुन-चुन कर बंदी बनाया। साथ ही हेमू के अत्यन्त विश्वास पात्र अफ़गान अधिकारियों और सेवकों को भी नहीं बक्शा।

अपनी फ़तह के जश्न में उसने सभी बंदी ढूसर भार्गवों और सैनिकों के कटे हुए सिरों से एक विशाल मीनार बनवाई।

यह बात इतिहास में कुछ इस तरह कही जाती है-

साह कहीं बनियन को लाओ, मारो सबन जहाँ लगि पावो |
आहिदी गये पकड़ सब लाये, लाय झरोखों तारे दिखाए |
तब उजीर ने विनती किन्ही , चुक सबे दुसर सिर किन्ही |
उन्हें छोर तब दुसर ही पकडे, पकड़ पकड़ बेरहीन में जकडे |

हेमू के बाद दुसर वैश्य समाज के लोग हरियाणा व् दिल्ली से पूर्व की ओर पलायन करने लगे और गंगा के किनारे वर्तमान कानपूर एवं उन्नाव तथा रायबरेली के बैसवारा के क्षेत्रों में बस गये |

साभार : http://dosarvaish.com/

दोसर वैश्य समाज का इतिहास - कौन ? - कैसे ? - कहाँ से ?


आज दोसर वैश्य समाज के हर व्यक्ति के मन में एक प्रश्न उठता है कि दोसर वैश्य समाज में जन्म लिया है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ और कैसे हुई। इसकी जानकारी ज्ञात हो सके इसके लिए मैंने समाज और राजनीती में कार्य करते हुए और विभिन्न प्राचीन पुस्तको से जो जानकारी प्राप्त हुई वह मैं आप सबकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ ।

गोत्र - 
महाभारत व जातक आदि प्राचीन ग्रंथो में व्यक्ति का परिचय पूछते समय उसका नाम तथा गोत्र दोनों विषय में पुछा जाता था । गोत्रो की परंपरा प्राचीन ऋषियों से चली आ रही है , मान्यता है कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र - भ्रगु , अंगिरा , मरीचि और अत्रि हुए । ये चार ऋषि गोत्रकर्ता थे । 
ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप थे , हमारा दोसर वैश्य समाज कश्यप ऋषि का गोत्र है ।
उत्पत्ति का स्थल -
दोसर वैश्य ,"दूसर वैश्य "का कालांतर में परिवर्तित रूप है । डा . मोतीलाल भार्गव द्वारा लिखी पुस्तक "हेमू और उसका युग "से पता चलता है कि दूसर वैश्य हरियाणा में दूसी गाँव क़े मूल निवासी थे ।जो कि गुरगाव जनपद के उपनगर रिवाड़ी के पास स्थित है ।यह स्थान बलराम जी (बलदाऊ)की ससुराल जो वधुसर कि दूसर और बाद में दूसी कहलाया ।

दोसर वैश्य समाज की विजय गाथा / दिल्ली विजय -  

हेमू की दिल्ली विजय - 
भारतीय इतिहास में प्रशिद्ध हेमचन्द्र विक्रमादित्य 'हेमू' दोसर वैश्य जाति के थे । हेमू के पिता का नाम पूरन दास और चाचा का नाम नवलदास था जो दोसर वैश्य समाज के प्रशिद्ध संत थे । हेमू ने 6 अक्टूबर सन 1556 को दिल्ली विजय प्राप्त की । 300 वर्षो बाद किसी हिन्दू शासक ने दिल्ली की सत्ता प्राप्त की थी ।

दॊसर वैश्य का वर्गीकरण -
पंडित कामता प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तक "जाति भास्कर " सम्वत 1960 विक्रमी के लगभग से पता चलता है कि इसमें लगभग 400 वैश्य उप-जातियों का विवरण है ।इस सूची में दोसर वैश्य के स्थान पर दूसर वैश्य का विविरण मिलता है जो कि दिल्ली और मिर्जापुर के बीच गंगा किनारे निवास करते है ।

दोसर वैश्य समाज की धार्मिक मान्यताएं - 
दोसर वैश्य समाज गाय को बहुत ही सुभ एवं पवित्र मानते थे । दोसर वैश्य समाज वैष्णव् मत को मानने वाले है । उत्तर भारत में केवल दोसर वैश्य समाज में विवाह में वधू को निगोड़ा पहनाया जाता था । आज भी दोसर वैश्य समाज के अतिरिक्त आज किसी समाज में निगोड़ा नहीं पहनाया जाता है |

मोती लाल जी का शॊध - 
ब्रिटिश शासनकाल में सन 1880 में मोतीलाल भार्गव द्वारा दिए गए शॊध पुत्र "हेमू और उसका युग" में वर्रण है - दूसी जो हेमू का जन्म स्थान था वहां वैश्य को दूसी वैश्य जो वर्तमान में दॊसर वैश्य कहा गया है ।

साभार : http://dosarvaish.com/

कहाँ से आता था राजाओं के पास इतना धन ?




बचपन से ही राजस्थान के किले, हवेलियाँ आदि देखने के बाद मन सोचता था कि उस राजस्थान में जहाँ का मुख्य कार्य कृषि ही था और राजस्थान में जब वर्षा ही बहुत कम होती थी तो कृषि उपज का अनुमान भी लगाया जा सकता है कि कितनी उपज होती होगी? सिंचाई के साधनों की कमी से किसान की उस समय क्या आय होती होगी? जो किसी राजा को इतना कर दे सके कि उस राज्य का राजा बड़े बड़े किले व हवेलियाँ बनवा ले| जिस प्रजा के पास खुद रहने के लिए पक्के मकान नहीं थे| खाने के लिए बाजरे के अलावा कोई फसल नहीं होती थी| और बाजरे की बाजार वेल्यु तो आज भी नहीं है तो उस वक्त क्या होगी? राजस्थान में कर से कितनी आय हो सकती थी उसका अनुमान शेरशाह सूरी के एक बयान से लगाया का सकता है जो उसने सुमेरगिरी के युद्ध में जोधपुर के दस हजार सैनिको द्वारा उसके चालीस हजार सैनिको को काट देने के बाद दिल्ली वापस लौटते हुए दिया था – “कि एक मुट्ठी बाजरे की खातिर मैं दिल्ली की सल्तनत खो बैठता|”

मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जिस राज्य की प्रजा गरीब हो वो राजा को कितना कर दे देगी ? कि राजा अपने लिए बड़े बड़े महल बना ले| राजस्थान में देश की आजादी से पहले बहुत गरीबी थी| राजस्थान के राजाओं का ज्यादातर समय अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को रोकने के लिए आत्म-रक्षार्थ युद्ध करने में बीत जाता था| ऐसे में राजस्थान का विकास कार्य कहाँ हो पाता ? और बिना विकास कार्यों के आय भी नहीं बढ़ सकती| फिर भी राजस्थान के राजाओं ने बड़े बड़े किले व महल बनाये, सैनिक अभियानों में भी खूब खर्च किया| जन-कल्याण के लिए भी राजाओं व रानियों ने बहुत से निर्माण कार्य करवाये| उनके बनाये बड़े बड़े मंदिर, पक्के तालाब, बावड़ियाँ, धर्मशालाएं आदि जनहित में काम आने वाले भवन आज भी इस बात के गवाह है कि वे जनता के हितों के लिए कितना कुछ करना चाहते और किया भी|

अब सवाल ये उठता है कि फिर उनके पास इतना धन आता कहाँ से था ?


राजस्थान के शहरों में महाजनों की बड़ी बड़ी हवेलियाँ देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी कई सेठों के पास तो राजाओं से भी ज्यादा धन था और जरुरत पड़ने पर ये सेठ ही राजाओं को धन देते थे| राजस्थान के सेठ शुरू ही बड़े व्यापारी रहें है राजा को कर का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं व्यापरियों से मिलता था| बदले में राजा उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराते थे| राजा के दरबार में सेठों का बड़ा महत्व व इज्जत होती थी| उन्हें बड़ी बड़ी उपाधियाँ दी जाती थी| सेठ लोग भी अक्सर कई समारोहों व मौकों पर राजाओं को बड़े बड़े नजराने पेश करते थे| कालेज में पढते वक्त एक ऐसा ही उदाहरण सुरेन्द्र सिंह जी सरवडी से सीकर के राजा माधो सिंह के बारे में सुनने को मिला था- राजाओं के शासन में शादियों में दुल्हे के लिए घोड़ी, हाथी आदि राजा की घुड़साल से ही आते थे| राज्य के बड़े उमराओं व सेठों के यहाँ दुल्हे के लिए हाथी भेजे जाते थे|

सीकर में राजा माधोसिंह जी के कार्यकाल में एक बार शादियों के सीजन में इतनी शादियाँ थी कि शादियों में भेजने के लिए हाथी कम पड़ गए| जन श्रुति है कि राजा माधो सिंह जी ने राज्य के सबसे धनी सेठ के यहाँ हाथी नहीं भेजा बाकि जगह भेज दिए| और उस सेठ के बेटे की बारात में खुद शामिल हो गए जब दुल्हे को तोरण मारने की रस्म अदा करनी थी तब वह बिना हाथी की सवारी के पैदल था यह बात सेठजी को बहुत बुरी लग रही थी| सेठ ने राजा माधो सिंह जी को इसकी शिकायत करते हुए नाराजगी भी जाहिर की पर राजा साहब चुप रहे और जैसे ही सेठ के बेटे ने तोरण मारने की रस्म पूरी करने को तोरण द्वार की तरफ तोरण की और हाथ बढ़ाया वैसे ही तुरंत राजा ने लड़के को उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया और बोले बेटा तोरण की रस्म पूरी कर| यह दृश्य देख सेठ सहित उपस्थित सभी लोग आवक रह गए| राजा जी ने सेठ से कहा देखा – दूसरे सेठों के बेटों ने तो तोरण की रस्म जानवरों पर बैठकर अदा की पर आपके बेटे ने तो राजा के कंधे पर बैठकर तोरण रस्म अदा की है| इस अप्रत्याशित घटना व राजा जी द्वारा इस तरह दिया सम्मान पाकर सेठजी अभिभूत हो गए और उन्होंने राजा जी को विदाई देते समय नोटों का एक बहुत बड़ा चबूतरा बनाया और उस पर बिठाकर राजा जी को और धन नजर किया| इस तरह माधोसिंह जी ने सेठ को सम्मान देकर अपना खजाना भर लिया|

इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है कि राजस्थान के राजाओं के पास धन कहाँ से आता था| राजाओं की पूरी अर्थव्यवस्था व्यापार से होने वाली आय पर ही निर्भर थी न कि आम प्रजा से लिए कर पर|

व्यापारियों की राजाओं के शासन काल में कितनी महत्ता थी सीकर की ही एक और घटना से पता चलता है- सीकर के रावराजा रामसिंह एक बार अपनी ससुराल चुरू गए| चुरू राज्य में बड़े बड़े सेठ रहते थे उनके व्यापार से राज्य को बड़ी आय होती थी| चुरू में उस वक्त सीकर से ज्यादा सेठ रहते थे| जिस राज्य में ज्यादा सेठ उस राज्य को उतना ही वैभवशाली माना जाता था| इस हिसाब से सीकर चुरू के आगे हल्का पड़ता था| कहते है कि ससुराल में सालियों ने राजा रामसिंह से मजाक की कि आपके राज्य में तो सेठ बहुत कम है इसलिए लगता है आपकी रियासत कड़की ही होगी| यह मजाक राजा रामसिंह जी को चुभ गई और उन्होंने सीकर आते ही सीकर राज्य के डाकुओं को चुरू के सेठों को लूटने की छूट दे दी| डाकू चुरू में सेठों को लूटकर सीकर राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते और चुरू के सैनिक हाथ मलते रह जाते| सेठों को भी परिस्थिति समझते देर नहीं लगी और तुरंत ही सेठों का प्रतिनिधि मंडल सीकर राजाजी से मिला और डाकुओं से बचाने की गुहार की|

राजा जी ने भी प्रस्ताव रख दिया कि सीकर राज्य की सीमाओं में बस कर व्यापार करो पूरी सुरक्षा मिलेगी| और सीकर राजा जी ने सेठों के रहने के लिए जगह दे दी, सेठों ने उस जगह एक नगर बसाया , नाम रखा रामगढ़| और राजा जी ने उनकी सुरक्षा के लिए वहां एक किला बनवाकर अपनी सैनिक टुकड़ी तैनात कर दी| इस तरह सीकर राज्य में भी व्यवसायी बढे और व्यापार बढ़ा| फलस्वरूप सीकर राज्य की आय बढ़ी और सेठों ने जन-कल्याण के लिए कई निर्माण कार्य यथा विद्यालय, धर्मशालाएं, कुँए, तालाब, बावड़ियाँ आदि का निर्माण करवाया| जो आज भी तत्कालीन राज्य की सीमाओं में जगह जगह नजर आ जाते है और उन सेठों की याद ताजा करवा देते है|


इस तरह के बहुत से सेठों द्वारा राजाओं को आर्थिक सहायता देने या धन नजर करने के व जन-कल्याण के कार्य करवाने के किस्से कहानियां यत्र-तत्र बिखरे पड़े| बुजुर्गों के पास सुनाने के लिए इस तरह की किस्सों की कोई कमी ही नहीं है| अक्सर राजा लोग ही इन धनी महाजनों से जन-कल्याण के बहुत से कार्य करवा लेते थे| बीकानेर के राजा गंगासिंह जी के बारे में इस तरह के बहुत से किस्से प्रचलित है कि कैसे उन्होंने धनी सेठों को प्रेरित कर जन-कल्याण के कार्य करवाये| वे किसी भी संपन्न व्यक्ति से मिलते थे तो वे उसे एक ही बात समझाते थे कि इतना कमाया, नाम किया पर मरने के बाद क्या ? इसलिए जीते जी कुछ जन-कल्याण के लिए कर ताकि मरने के वर्षों बाद तक लोग तुझे याद रखे| और उनकी बात का इतना असर होता था कि कुछ धनी सेठों ने तो अपना पुरा का पुरा धन जन-कल्याण में लगा दिया|


राजा गंगासिंह जी के मन में जन-कल्याण के लिए कार्य करने का इतना जज्बा था कि उन्होंने आजादी से पहले ही भांकड़ा बांध से नहर ला कर रेगिस्तानी इलाके को हराभरा बना दिया था| रेवाड़ी से लेकर बीकानेर तक उन्होंने अपने खजाने व सेठों के सहयोग से रेल लाइन बिछवा दी थी| दिल्ली के स्टेशन पर बीकानेर की रेल रुकने के लिए प्लेटफार्म तक खरीद दिए थे| और यही कारण है कि आज भी बीकानेर वासियों के दिलों में महाराज गंगासिंह जी के प्रति असीम श्रद्धा भाव है| उपरोक्त कुछ किस्सों व राजस्थान में सेठों व राजाओं के संबंध में बिखरे पड़े किस्सों कहानियों से साफ़ जाहिर है कि राजाओं के पास जो धन था वह गरीब प्रजा का शोषण कर इकट्ठा नहीं किया जाता था बल्कि राज्य के व्यवसायियों द्वारा किये जाने वाले व्यापार से मिलने वाले कर से खजाने भरे जाते थे|

पर अफ़सोस आज के व्यवसायी जो सरकारों को अपनी जेब में रखने का दावा करते है वे जन-कल्याण के लिए खर्च करना तो दूर उल्टा सत्ताधारी नेताओं, मंत्रियों से मिलकर आम-गरीब जनता व देश के संसाधनों को लूटकर सरकारी खजाना खाली कर अपना खजाना भरने में लगे है|


साभार : श्री रतन सिंह जी शेखावत 

सत्ता पर सेठों (व्यापारियों) का प्रभाव तब और अब

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में रिलाइंस द्वारा सरकार से मिलीभगत कर देश के संसाधनों को जिस तरह से लूटा उसका खुलासा किया साथ ही मुकेश अम्बानी की यह कहते हुए ऑडियो टेप भी सुनाई कि सत्तधारी दल तो उसकी जेब की दुकान है| तब से आम आदमी हैरान परेशान कि कैसे एक औधोगिक घराना सरकार को अपनी मुट्ठी में रखता है| यदि एक रिलाइंस कम्पनी जिसे चाहे मंत्री बनवा सकती है जिसे चाहे मंत्रिमंडल से हटवा सकती है तो देश में और भी कई औधोगिक घराने है उनका भी तो सरकार पर इसी तरह का वर्चस्व होगा| आज आम आदमी यह समझ ही नहीं पा रहा कि सरकार वे लोग चला रहें है जिन्हें उसने वोट देकर संसद में पहुँचाया था या उनकी आड़ में कोई और सरकार चला रहें है|

पिछले दिनों हुए खुलासों के बाद अब देश के आम नागरिक को शंका होने लगी है कि पता नहीं इस तरह के गठबंधन ने देश के संसाधनों को कितना लूटा होगा ? और लूट रहें है| राज्य सत्ता पर व्यापारियों (महाजनों) का प्रभाव कोई नई बात नहीं है| देश की स्वतंत्रता से पहले भी महाजनों का देश के सभी छोटे-बड़े राजाओं, नबाबों और बादशाहों पर अपने अकूत धन दौलत की वजह से प्रभाव रहा है| किसी भी सरकार को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है यह धन जितना किसी भी राज्य को व्यवसायी कमा कर दे सकते है उतना कभी भी आम-जनता नहीं दे सकती| राजाओं के जमाने में भी राज्य के बड़े बड़े सेठ राजा को आर्थिक मदद देकर राज्य में अपने व्यवसाय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ और सुरक्षा प्राप्त करते थे| साथ ही राजा के दरबार में उपाधियाँ पाकर सम्मान भी पाते थे|



पर अपने अकूत धन के माध्यम से उस समय के महाजन सिर्फ राजा को ही प्रभावित नहीं रखते थे बल्कि अपना धन सामाजिक कार्यों व जन-कल्याण की योजनाओं में खर्च कर आमजन से भी आदर, सम्मान पाते थे| पुरानी चलती आ रही किसी भी जनश्रुति में कभी किसी पुराने समय के सेठ के बारे में कोई गलत बात अब तक नहीं सुनी| राजस्थान के छोटे बड़े कस्बों व शहरों में आज भी सेठों द्वारा बनाये गए बड़े बड़े विद्यालय भवन, कालेज,धर्मशालाएं,कुँए,पक्के तालाब व बावड़ियाँ जगह जगह देखी जा सकती है| सैकड़ों वर्ष पहले सेठों द्वारा जन-कल्याण के लिए भवन व निर्माण आज भी देखकर लोग उनके प्रति श्रद्धा भाव दर्शाते हुए नतमस्तक हो जाते है| राजस्थान के सेठों ने तो दूर दूर जाकर दूसरे राज्यों में व्यापार कर धन कमाया और अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा राजस्थान में लाकर जन-कल्याण में खर्च किया|

राजा व तत्कालीन शासक बड़े सेठों से मिलने वाले धन की वजह से भले ही उनके प्रभाव में होते थे पर वे अपने राज्य की संपदा व संसाधनों को ऐसे कभी ना लूटने देते थे जैसे आज के बड़े सेठ, महाजन हमारे द्वारा चुनी गई लोकतान्त्रिक सरकार और हमारी सेवा के लिए रखे गए सरकारी सेवकों से मिलकर देश के संसाधनों को लूट रहें है| एक उस वक्त के व्यवसायी थे जो जनहित में खुलकर खर्च करते थे और आज उन्हीं की पीढ़ी के लोग जनहित के बहाने कमाने के चक्कर में रहते है| पुराने सेठों द्वारा बनाई गई स्कूलों में जहाँ आम विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर पाता था वहीं आज के उधमियों ने शिक्षा व सामान्य उपचार को को भी व्यवसाय बना लिया और दोनों ही व्यवसायों में आज जितनी लूट-पाट मची है सबके सामने है|

व्यवसायी तब भी सता को प्रभावित करते थे और आज भी पर उस वक्त के व्यवसायियों व वर्तमान व्यवसायियों की नैतिकता में रात दिन का फर्क है| पुराने समय के व्यवसायियों द्वारा जहाँ जन-कल्याण के लिए खर्च करने के कारण उनके प्रति आम-जन के मन आदर, सम्मान व श्रद्धाभाव होता था वहीं आज के व्यवसायियों द्वारा राजनीतिज्ञों व अफसरों से गठजोड़ कर देश के संसाधनों को लूटने की वजह से आम जन इनसे घृणा व नफरत करता है|

साभार : श्री रतन सिंह शेखावत, ज्ञान दर्पण

व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये


स्वाभिमान के मामले में समझौता करने वाले लोगों पर अक्सर लोग व्यंग्य कसते सुने जा सकते है कि- “बनिये की मूंछ का क्या ? कब ऊँची हो जाये और कब नीची हो जाय ?”

राजस्थान में तो एक कहावत है –गाँव बसायो बाणियो, पार पड़े जद जाणियो” कहावत के जरिये बनिए द्वारा बसाये किसी गांव की स्थिरता पर ही शक किया जाता रहा है|

उपरोक्त कहावतों से साफ है कि अपने व्यापार की सफलता के लिए व्यापारिक धर्म निभाने की बनिए की प्रवृति को लोगों ने उसकी कायरता समझ लिया जबकि ऐसा नहीं है बनिए ने अपनी मूंछ कभी नीची की है यानी कहीं समझौता किया है तो वह उसकी एक व्यापारिक कार्यविधि का हिस्सा मात्र है| कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यापार में सौम्य व्यवहार, मृदु भाषा व संयम के बिना सफल नहीं हो सकता और बनियों ने अपने इन्हीं गुणों के आधार पर व्यापार के हर क्षेत्रों में सफलता चूमी है|

बनियों के इन्हीं गुणों की वजह से उनको कायर मानने वाले लोग यह क्यों नहीं समझते कि आज तो व्यापार करना आसान है, ट्रांसपोर्ट के साधनों से एक जगह से दूसरी जगह माल लाना ले जाना, बैंकों के जरिये धन का स्थानांतरण करना एकदम आसान है जबकि पूर्व काल में जब न बैंक थे न आवागमन के साधन थे तब भी बनिए अपने घर से हजारों मील दूर ऊंट, बैल गाड़ियों में माल भरकर यात्राएं करते हुए व्यापार करते थे रास्ते में डाकुओं द्वारा लुटे जाने का पूरा खतरा ही नहीं रहता था बल्कि कई छोटे शासक भी डाकुओं की भूमिका निभाते हुए व्यापारिक काफिलों को लुट लिया करते थे फिर भी अपने धन व जान की परवाह किये बगैर बनिए बेधड़क होकर दूर दूर तक अपने काफिले के साथ व्यापार करते घूमते रहते थे| उनका यह कार्य किसी भी वीरता व साहस से कम नहीं था|

व्यापार ही क्यों युद्धों में भी बनियों ने क्षत्रियों की तरह शौर्य भी दिखा इस क्षेत्र में भी पीछे नहीं रहे जोधपुर जैसलमेर का इतिहास पढ़ते हुए ऐसे कई उदाहरण पढने को मिल जाते है| इन पूर्व राज्यों में कई बनिए राज्य के सफल प्रधान सेनापति रहे है जिनकी वीरता व कूटनीति का इतिहासकारों ने लोहा माना है|

राजस्थान का प्रथम इतिहासकार मुंहता नैणसी (मोहनोत नैणसी) जो जैन था और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह का सफल प्रधान सेनापति था जिसने जोधपुर राज्य की और से कई युद्ध अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया| जोधपुर राज्य में महाराजा भीमसिंह व उनके बाद महाराजा मानसिंह के समय में इंद्रराज सिंघवी नामक बनिया जोधपुर का सेनापति रहा जिसकी वीरता, राजनैतिक समझ और कूटनीति इतिहास में भरी पड़ी है| इंद्रराज सिंघवी ने अपनी राजनैतिक कूटनीति व समझदारी से जोधपुर राज्य को ऐसे बुरे वक्त में युद्ध से बचाया था जब जोधपुर महाराजा के ज्यादातर सामंत विरोधियों से मिल जयपुर व बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर पर चढ़ा लाये थे और जोधपुर की सेना में सैनिक तो दूर तोपें इधर उधर करने के लिए मजदुरों तक की कमी पड़ गयी थी| ऐसी स्थिति में इंद्रराज सिंघवी ने अपने बलबूते जोधपुर किले से बाहर निकल ऐसी चाल चली कि जयपुर, बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर सेना के कमजोर प्रतिरोध के बावजूद मजबूर होकर वापस लौटना पड़ा|

आजादी के कुछ समय पहले भी जब जयपुर की सेना ने सीकर के राजा को गिरफ्तार करने हेतु सीकर पर चढ़ाई की तो शेखावाटी की समस्त शेखावत शक्तियाँ एकजुट होकर जयपुर सेना के खिलाफ आ खड़ी हुई यदि वह युद्ध होता तो भयंकर जनहानि होती पर शेखावाटी के सेठ जमनालाल बजाज की सुझबुझ व कूटनीति ने शेखावाटी व जयपुर के बीच होने वाले इस भयंकर युद्धपात से बचा लिया|

इन उदाहरणों के अलावा राजस्थान के पूर्व राज्यों के इतिहास में आपको कई ऐसे सफल सेनापतियों के बारे में पढने को मिलेगा जो बनिए थे और उन्होंने अपना परम्परागत व्यापार छोड़ सैन्य सेवा में अपनी वीरता व शौर्य का लोहा मनवाया| ज्ञान दर्पण पर जल्द ही आपको ऐसे शौर्य पुरुषों का परिचय भी पढने को मिलेगा|




साभार : SRI RATAN SINGH SHEKHAWAT



Monday, February 25, 2013

वैश्य महाकुम्भ, रुड़की

उत्तराँचल वैश्य महाकुम्भ, दिनांक ३/३/१३, दिन रविवार, आप सभी वैश्य बंधू सादर आमंत्रित


Wednesday, February 13, 2013

मधेशिया बनिया समाज - MADHESHIYA VAISHYA

Madhesiya Baniya Samaj

मद्धेशिया वैश्य वस्तुत: कानू, कान्दू (कन्दोइ) और हलवाइ एक ही जाति है। जिसका मुख्य व्यवसाय मिठाइ बनाना होता है साथ ही भुजा भुजने वाले भी कानू, कान्दू जाति के ही लोग हैं।

कानू, कान्दू, कन्दोइ हलवाइ एक ही श्रेणी में होने के नाते एक ही कुल देवता की पूजा करते है। वैवाहिक सम्बन्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान में समानता होने के साथ ही शादी में मूल-डीह को मान्यता देते है।

प्राचीन काल से मुगल कालीन व अंग्रेजों के शासन काल में लिखे गये अनेकों ग्रन्थों और अभिलेखों में इस जाति समूह को कानू-कान्दू (कन्दोइ) नाम से उल्लेख किया गया है।

सन 1891 में जनगणना आयुक्त एच.एस.रिस्ले ने अपनी पुस्तक जन जातियां एवं जातियां (ट्राइब्स एण्ड कास्टस) में इस जाति समूह की व्याख्या की है। तथा इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि हलवाइ तथा 34 जातियां कानू या कान्दू (कन्दोइ) का ही अंश है।

पराधीनता की लंबी अवधि में इस जाति समूह के स्तर में काफी गिरावट आर्इ फलस्वरूप समाज के प्रति समर्पण के भाव नष्ट होने लगे, व्यकित स्वेरूछाचारी हो गया स्वामि विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, बहन एनी बेसेण्ट आदि महापुरूषों के भारतीय संस्कृति के गुण-गान करने का अत्यधिक प्रभाव सभी जाति व्यवस्था पर स्पष्ट दिखाइ देने लगा। सभी जातियां अपने सुधार की नइ दिशाए ढुंढने लगी।

सौभाग्य से हनुमानगंज बलिया उ.प्र. के श्री विष्णु कुमार गुप्त मुजफरपुर बिहार में डिप्टी क्लेक्टर थे। उन पर तत्कालीन परिसिथतियों का विषेष प्रभाव पड़ा फलस्वरूप सन 1905 र्इ. में महात्मा गणीनाथ जयंति के अवसर पर मुजफफरपुर नगर (बिहार) में एक स्वजाति सभा का विशाल आयोजन हुआ। सभा में दूर-दूर से आये हुए समाज बंधूओं ने एक स्वर में माननीय विष्णु कुमार गुप्त के विचारों का समर्थन किया। उनकी समाज के प्रति निष्ठा, लगन, त्याग, उच्चभाव को देखकर उन्हे इस जाति समूह (कानू-कांदू-कन्दोर्इ-हलवार्इ-भूर्जी, कान्यकुब्ज, क्रोंच, चेचड़ सहित 34 जाति समूह) को अखिल भारतीय मध्यदेशीयवैष्य के नाम सें विभूषित कर अपना प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया।

History of Madhesiya Samaj
Baba Ganinath



Madhesiya has been formed with the combination of two Sanskrit words i.e. "Madhya" and "Desh" hence some times also referred as "Madhyadeshiye" meaning who belonged to central part of the country.

Currently, members of the community are spread throughout India and overseas as well. They have earned respect in the society due to their tenderness and ability to make gold out of wastes that means they are highly skilled businessmen.

These are the some surnames generally used by our Vaisya Madhesia Samaj are as follows Shah, Shaw,Sah,Gupta,Prasad,Kanu,Madhesiya,Seth,Kannaujiya,Rai BahadurAgarwal etc.

There are many deities which are worshipped among Madhesiya Kanu and other vaisya community. Prominent among them are:Sri Baba Ganninath Sri Ganninath is one of the 14 deities of the community and great saint of the communitySome of them are Sri Govind Ji,Braham Baba, Mata sati.etc.



साभार : http://baniyasamaj.blogspot.in,

रौनियार वैश्य - ROUNIYAR VAISHYA





साभार :

Rauyinar Vaishya Sabha Delhi

rouniyarvaishyasabhadelhi.com/