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Thursday, April 25, 2024

CHETTIYAR VAISHYA PROMINENT PERSONALITIES

#CHETTIYAR VAISHYA PROMINENT PERSONALITIES

1. Alagappa Chettiar - founder of the various educational institutions in Karaikudi and its surroundings. Alagappa University, Alagappa Chettiar College of Engineering and Technology, and Alagappa Government Arts College are a few institutes named in his honour.

2. Annamalai Chettiar - founder of Indian Bank and the Annamalai University bears his name.

3. Muthiah Chettiar

4. S. Rm. Muthiah Chettiar

5. M. A. M. Muthiah

6. M. A. M. Ramaswamy

7. M. A. Chidambaram

8. P. Chidambaram - former Finance Minister of India.


9. Kaviarasar Kannadasan - Tamil poet.

10. Justice A. R. Lakshmanan (b. 1942) - former judge of the Supreme Court of India and current chairman of the Law Commission of India.

11.Lena Chettiar

12. A. V. Meiyappan - founder of AVM Productions, the oldest and largest film production studio in Kollywood, the Tamil language film industry of India.

13. Hari Sevugan

14. Rama Narayanan, film director and producer

15. Sp Muthuraman, film director and producer

16. Vasanth, director

17. Soma Valliappan

ARYAVAISHYA PROMINENT PERSONALITIES

#ARYAVAISHYA PROMINENT PERSONALITIES

1. Grandhi Mallikarjuna Rao: Chairman of GMR Group and GM Rao received the Economic Times Entrepreneur of the year Award in 2007

2. Konijeti Rosaiah: Former Chief Minister of Andhra Pradesh and Governor of Tamil Nadu also Andhra University conferred Konijeti Rosaiah with an honorary doctorate in 2007

3. Ramesh Gelli: Indian banking executive who served as the Chairman and Managing Director of Vysya Bank, CMD of Global Trust Bank. Top official of the Asian Development Bank

4. Chegu Seshavatharam: B.E.,C.E.(Hons.), F.I.E.(Ind), F.I.V., Chief Engineer P.W.D. & General. Before and after formation of the state of Andhra Pradesh

5. Gampa Nageshwer Rao: Motivational Expert, HR Trainer, Management Thinker, Leadership trainer, Developmental authority and author, Corporate Trainer of India.

6. Meena (Film actress): A child artist, model, singer, dancer, TV judge and occasional dubbing artiste

7. Vilas muttemwar: Political figure and former minister of state of Ministry of New and Renewable Energy of India.

8. T. G. Venkatesh: Member of Rajya Sabha, Indian businessman and politician

9. T. G. Bharath: Managing Director of SRHHL Industries Ltd

10. S.N. Krishnaiah Shetty: Former BJP minister at Bengaluru

11. Anna Rambabu: Krishna Chaitanya Institute of Technology and Sciences, [KCITS] promoted by Anna Educational Society, was established in the year 2008, He is an Ex-MLA, Giddalur constituency, Chairman of the trust. Awards like JALADATA, VIDYADATA and PRATIBA PURASKAR

12. Yoganand Gajjala: Indian Politician and Chairman/Managing Director/CEO at Manjeera Constructions Ltd

13. Ambica Krishna: Chief Executive Officer and President of Ambica Agarbathies Aroma and Industries Ltd, and Film producer

14. Sidda Raghava Rao: Indian politician who currently serves as a Minister for Environment, Forests, Science and Technology in the Andhra Pradesh Cabinet. He earlier worked as a Minister for Transport, Roads & Buildings.

15. C.C. Kesava Rao: Founder of Fizikem Laboratories Pvt Ltd

16. Dr Krishna Murthy Bhavanasi: GM-Formulation R&D, Natco Pharma and he was award as FDD Leadership Awards 2017, he did PH.d from Malaysia also social service too.

17. Mounika Polisetty: Singer and musician of Indian books of records from Hyderabad, India

18. Actress Kavitha: Indian actress, who works in Telugu, Tamil and Kannada film industries, also acted Malayalam movies. Now she is an Indian politician from Bharatiya Janata Party

19. V. V. Lakshminarayana: Police officer is a retired Additional Director General of Police in Mumbai, Maharashtra. He is known for leading the investigations

29. Pendekanti Venkata Subbaiah: Former Union Minister of State for Home & Parliamentary Affairs and Former Governor of Bihar and Karnataka. He started Vasavi College of Engineering in 1981, Hyderabad

21. K S R Anjaneyulu: Managing Director and Chief Executive Officer of private sector Lakshmi Vilas Bank also GM in ING Vysya Bank (Now it is called as kotak mahindra bank)

22. Maddali Veera Brahmananda Rao: former executive director of Andhra Pradesh State Financial Corporation [APSFC] also he is active in India-Vysya Professionals Association (VYSPRO) and Arya Vysya Officials & Professionals Association (AVOPA) and so on…

23. Kalpana Gurram: Founder of GurramTax, It has clients from all over the United States and internationally, USA

24. Swathi Manchikanti: Specialist at United Nations Children’s Fund (UNICEF) and International health specialist, USA.

25. ManepallyRaghavulu: Founder of Manepally jewellers

26. Mutha Gopalakrishna: Former AP minister and four-time MLA from Kakinada

27. Grandhi Subba Rao: Founder of the Crane Betel Nut Power works limited

28. Mela Satyanarayana: founder and chairman of sundkar PVC products

29. Bommidala Srikrishna Murthy Guntur: founder of cotton business and Imports and exports

Wednesday, April 24, 2024

GREAT MATHEMATICIAN AND ASTRONOMER - BRAHMGUPTA

GREAT MATHEMATICIAN AND ASTRONOMER - BRAHMGUPTA

भारत के इतिहास में कई ज्योतिषी खगोलशास्त्री व गणितज्ञ हुए है जिनमें आर्यभट,भास्कराचार्य प्रथम के बाद ब्रह्मगुप्त का नाम ही आता हैं।ब्रह्मगुप्त भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ थे।उनका जन्म 598 ई. में राजस्थान में भीनमाल में हुआ था।इनके पिता का नाम विष्णुगुप्त था।वें तत्कालीन गुर्जर प्रदेश(भीनमाल) के अंतर्गत आनेवाले प्रख्यात नगर उज्जैन की अन्तरिक्ष प्रयोगशाला के प्रमुख थे।


भौगोलिक शास्त्री व गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ई. में पश्चिम भारत के भिन्नमाल नामक स्थान पर एक वैश्य परिवार में हुआ था।ब्रह्मगुप्त के जन्म के समय भिन्नमाल गुजरात की राजधानी हुआ करती थी।भिनमाल नामक स्थान के बारे में अलग-अलग शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने अपने अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए हैं।
 
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है कि महान खगोल शास्त्री व गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त वैश्य सेठ समाज से ही थे।डॉक्टर वी.ए. अस्मित ने ब्रह्मगुप्त के विषय में कहा था कि वह उज्जैन नगरी में निवास करते थे और वहीं पर कार्य करते थे।भास्कराचार्य के अनुसार ब्रह्मगुप्त चांपवंशी राजा के राज्य में निवास करते थे।
 
ब्रह्मगुप्त प्राचीन भारत के एक महान गणितज्ञ थे।उन्होंने भारतीय गणित को सर्वोच्च शिखर पर पहुचा दिया था।यही वजह है की बाहरवी शताब्दी के विख्यात ज्योतिष गणितज्ञ भास्कराचार्य ने उन्हें गणक चक्र चूडामणि के नाम से संबोधित किया था।

आर्यभट्ट के बाद भारत के पहले गणित शास्त्री भास्कराचार्य प्रथम और उसके बाद ब्रह्मगुप्त हुए।वे खगोल शास्त्री भी थे।उन्होंने शून्य के उपयोग के नियम खोजे थे।उनकें मुलाको को ज्योतिषी भास्कराचार्य ने सिद्धांत शिरोमणि का आधार माना हैं।उनके ग्रन्थ में ब्रह्मास्फुट सिद्धांत और खंड खाद्यक बेहद प्रसिद्ध हैं।

ब्रह्मगुप्त के ये ग्रन्थ इतने प्रसिद्द हुए कि अरब के खलीफाओं के राज्यकाल में उनका अनुवाद अरबी भाषा में कराया गया।उनके ग्रंथों को अरब देश में अल सिंद हिंद और अल अर्कंद के नाम से जाना गया।इन ग्रंथों के माध्यम से ही पहली बार अरबों को भारतीय गणित और ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त हुआ।इस तरह से ब्रह्मगुप्त अरबी के गणितज्ञ एवं ज्योतिषियों के गुरु थे।ब्रह्मास्फुट सिद्धांत उनका सबसे पहला ग्रन्थ था।उसमें शून्य को एक अलग ग्रन्थ के रूप में बताया गया।इस ग्रंथ में ऋणात्मक अंकों और शून्य पर गणित के सभी नियमों का वर्णन किया गया हैं।उनके ग्रंथ में बीजगणित भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।उन्होंने बीजगणित का पर्याप्त विकास किया और ज्योतिष के प्रश्नों को हल करने में उनका प्रयोग किया।ज्योतिष विज्ञान भी विज्ञान और गणित पर ही आधारित हैं।ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।ब्रह्मगुप्त ने बताया कि चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण परस्पर लम्बवत होते हैं।668 ई में ब्रह्मगुप्त की मृत्यु हो गई।

गणित के क्षेत्र में ब्रह्मगुप्त ने अपना जो सूत्र प्रतिपादित किया था वह उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाता है। ब्रह्मगुप्त का सूत्र चक्रीय चतुर्भुज पर आधारित है।

ब्रह्म गुप्त के सूत्र के अनुसार चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण परस्पर लम्बवत होते हैं।ब्रह्म गुप्त ने अपने सूत्रों में चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल निकालने का तरीका बताया था।चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल निकालने के लिए ब्रह्मगुप्त ने दो तरह के सूत्रों का वर्णन किया था पहला सूत्र सन्निकट सूत्र जिसे अंग्रेजी में approximate formula कहते हैं और दूसरा सूत्र यथातथ सूत्र है इसे अंग्रेजी में exact formula कहते हैं।

सन्निकट सूत्र के अनुसार चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल का फार्मूला (p+r/2) (q+s/2) होता है और यथातथ सूत्र के अनुसार चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल का फार्मूला √(t-p)(t-q)(t-r)(t-s) होता है।

ब्रह्मगुप्त ने गणित के क्षेत्र में जितने भी योगदान दिए हैं उन सभी योगदानों को आज भी विश्व गणित में याद किया जाता है।628 ईसवी में लिखी गई 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' उनका सबसे पहला ग्रन्थ माना जाता है जिसमें शून्य का एक अलग अंक के रूप में उल्लेख किया गया है।यही नहीं, बल्कि इस ग्रन्थ में ऋणात्मक (negative) अंकों और शून्य पर गणित करने के सभी नियमों का वर्णन भी किया गया है।

"ब्रह्मस्फुटसिद्धांत" के साढ़े चार अध्याय मूलभूत गणित को समर्पित हैं। १२वां अध्याय, गणित, अंकगणितीय शृंखलाओं तथा ज्यामिति के बारे में है।१८वें अध्याय, कुट्टक(बीजगणित) में आर्यभट्ट के रैखिक अनिर्धार्य समीकरण(linear indeterminate equation, equations of the form ax − by = c) के हल की विधि की चर्चा है।(बीजगणित के जिस प्रकरण में अनिर्धार्य समीकरणों का अध्ययन किया जाता है, उसका पुराना नाम ‘कुट्टक’ है।ब्रह्मगुप्त ने उक्त प्रकरण के नाम पर ही इस विज्ञान का नाम सन् ६२८ ई. में ‘कुट्टक गणित’ रखा।)[1] ब्रह्मगुप्त ने द्विघातीय अनिर्धार्य समीकरणों (Nx2 + 1 = y2) के हल की विधि भी खोज निकाली।इनकी विधि का नाम चक्रवाल विधि है।गणित के सिद्धान्तों का ज्योतिष में प्रयोग करने वाला वह प्रथम व्यक्ति था।उनके ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के द्वारा ही अरबों को भारतीय ज्योतिष का पता लगा।अब्बासिद ख़लीफ़ा अल-मंसूर(७१२-७७५ ईस्वी) ने बग़दाद की स्थापना की और इसे शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित किया।उसने उज्जैन के कंकः को आमंत्रित किया जिसने ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के सहारे भारतीय ज्योतिष की व्याख्या की।अब्बासिद के आदेश पर अल-फ़ज़री ने इसका अरबी भाषा में अनुवाद किया।

ब्रह्मगुप्त ने किसी वृत्त के क्षेत्रफल को उसके समान क्षेत्रफल वाले वर्ग से स्थानान्तरित करने का भी यत्न किया।ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी की परिधि ज्ञात की थी,जो आधुनिक मान के निकट है।

ब्रह्मगुप्त पाई(π) (३.१४१५९२६५) का मान १० के वर्गमूल (३.१६२२७७६६) के बराबर माना।

ब्रह्मगुप्त अनावर्त वितत भिन्नों के सिद्धांत से परिचित थे। इन्होंने एक घातीय अनिर्धार्य समीकरण का पूर्णाकों में व्यापक हल दिया, जो आधुनिक पुस्तकों में इसी रूप में पाया जाता है और अनिर्धार्य वर्ग समीकरण,K y2 + 1 = x2, को भी हल करने का प्रयत्न किया।

इस पुस्तक के साढ़े चार अध्याय मुख्य रूप से गणित पर आधारित है।ब्रह्मगुप्त के पुस्तक में बीजगणित को सबसे ऊपर रखा गया है।ब्रह्मगुप्त ने अपनी पुस्तक में वर्गीकरण के विधि का भी बहुत ही सरल वर्णन किया है।ब्रह्मगुप्त ने अपनी पुस्तक में गणित के विलोम विधि का भी वर्णन किया है।

668 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त जी ने खण्डखाद्य की रचना की थी।अपने इस पुस्तक में उन्होंने ज्योतिषी पंचांग का वर्णन किया था।ब्रह्मगुप्त के मूलांकों को सिध्दान्त शिरोमणि का आधार बना कर भास्कराचार्य ने अपने ग्रंथ की रचना की थी।
 
उज्जैन में ब्रह्मगुप्त ने काफी समय तक कार्य भी किया था।उन्होंने उज्जैन के वेधशाला में प्रमुख के तौर पर कई समय तक कार्य भी किया था।अपने गणित पद्धतियों से उन्होंने पृथ्वी की परिधि ज्ञात की थी।
 
प्राचीन भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने गणित के क्षेत्र में अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए और उन्हें गणित के बारे में नई चीजें बताने के लिए ग्रंथ की भी रचना की थी।ब्रह्मगुप्त ने अपने कार्यकाल के दौरान दो महान ग्रंथों की रचना की थी। इन दोनों ग्रंथ के नाम हैं –

ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त और खण्डखाद्यक या खण्डखाद्यपद्धति. ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त नामक इस ग्रंथ की रचना ब्रह्मगुप्त ने 628 ईसवी में की थी।और फिर कुछ समय बाद ब्रह्मगुप्त ने अपने दूसरे खण्डखाद्यपद्धति की रचना 665 ईसवी में किया था।उन्होंने गणित के विचारों को अपने दूसरे ग्रंथ में भी वर्णन किया है जिसका नाम ध्यानग्रहोपदेश है।ब्रह्मगुप्त की दोनों पुस्तकों को अरबी भाषा में अनुवाद किया गया था।ब्रह्मगुप्त के अरबी में अनुवादित पुस्तक का नाम सिंद-हिंद’ और अलत-अरकन्द है।
 
महान गणितज्ञ,ज्योतिषी और खगोल शास्त्री ब्रह्मगुप्त की मृत्यु 668 ईस्वी में हो गई थी।लेकिन आज भी गणित के क्षेत्र में ब्रह्मगुप्त के योगदान को सर्वोपरि माना जाता है।ब्रह्मगुप्त ने गणित के क्षेत्र में जो विचार प्रस्तुत किए थे उनका बाद में अरबी भाषा में भी अनुवाद किया गया था।ब्रह्मगुप्त के अरबी गणित में आने से अरबी गणित काफी सशक्त हो गया था।




Tuesday, April 23, 2024

नेपाल बनिया - (Newar caste)

नेपाल बनिया - (Newar caste)


Bania (Newar caste)


Itum Bahal, Kathmandu. The surrounding area is a traditional Bania neighborhood.

Newari Banias (Devanagari: बनिया) are a Bania caste from the Newar community of the Kathmandu Valley in Nepal. The name Bania is derived from the Sanskrit word vanijya (merchant); by preference, Bania (caste).

Banias belong to the Urāy group which includes Tuladhar, Kansakar, Tamrakar, Sthapit, Sindurakar, Selalik and other castes. They speak Nepal Bhasa as a mother tongue and follow Newar Buddhism.

Traditional occupation

Banias are traditionally herbalists and wholesalers of raw materials for Newar, Tibetan and Āyurvedic traditional medicines. Traditional Bania neighborhoods in Kathmandu are Itum Bahal, Bania Chuka and Jhwabahal where the streets are lined with herbal shops.

Cultural life

Banias participate in the performance of Gunla Bajan religious music. Samyak is the greatest Newar Buddhist festival held every 12 years in Kathmandu where statues of Dipankara Buddha are displayed. During this festival, each Urāy caste has been assigned a duty from ancient times, and Banias have the task of preparing and serving "sākhahti", a soft drink made by mixing brown sugar and water

Panchthariya (Vaishyas): Usually the rich trading clans who now mostly write Shrestha. And also included is the Buddhist Uray of Kathmandu (Tuladhar, Kansakar, Bania, Sthapit) as well as Halwai/Rajkarnikar and Tamrakars of Patan, Shresthas of Dhulikhel and Banepa.

बनारस (बनिया), नेवार्स, नेपाल का उपखंड

नेवारी बनिया (देवनागरी: बनिया) नेपाल में काठमांडू घाटी के नेवार समुदाय की एक बनिया जाति है। बनिया नाम संस्कृत शब्द वाणिज्य (व्यापारी) से लिया गया है.

बनिया उरे समूह से संबंधित हैं जिनमें तुलाधार, कंसाकर, ताम्रकार, स्थापित, सिंदुराकर, सेलालिक और अन्य जातियाँ शामिल हैं। वे मातृभाषा के रूप में नेपाल भाषा बोलते हैं और नेवार बौद्ध धर्म का पालन करते हैं।

पंचथरिया (वैश्य): आमतौर पर अमीर व्यापारिक कबीले जो अब ज्यादातर श्रेष्ठ लिखते हैं। और इसमें काठमांडू के बौद्ध उरे (तुलाधार, कंसकर, बनिया, स्थापित) के साथ-साथ पाटन के हलवाई/राजकर्णिकार और ताम्रकार, धुलीखेल और बनेपा के श्रेष्ठ भी शामिल हैं।

पारंपरिक व्यवसाय

बनिया पारंपरिक रूप से जड़ी-बूटी विशेषज्ञ और नेवार, तिब्बती और आयुर्वेदिक पारंपरिक दवाओं के लिए कच्चे माल के थोक व्यापारी हैं। काठमांडू में पारंपरिक बनिया पड़ोस इतुम बहल, बनिया चूका और झवाबहल हैं जहां सड़कें जड़ी-बूटियों की दुकानों से सजी हैं।

सांस्कृतिक जीवन

बनिया गुंला बाजन धार्मिक संगीत के प्रदर्शन में भाग लेते हैं। सम्यक काठमांडू में हर 12 साल में आयोजित होने वाला सबसे बड़ा नेवार बौद्ध त्योहार है जहाँ दीपांकर बुद्ध की मूर्तियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस त्योहार के दौरान, प्रत्येक उरे जाति को प्राचीन काल से एक कर्तव्य सौंपा गया है, और बनिया को ब्राउन शुगर और पानी को मिलाकर बनाया गया शीतल पेय "सखाती" तैयार करने और परोसने का काम सौंपा गया है।

उल्लेखनीय बनिया

ईश्वरानंद श्रेष्ठाचार्य, लेखक और भाषाविद्

Sunday, April 21, 2024

ASHOK KAJARIA - KAJARIA CERAMICS

ASHOK KAJARIA - KAJARIA CERAMICS

दुनिया में घूमकर देखे 50 कारखाने, फिर लगा दिया अपना प्लांट, देश की मिट्टी से बनाने लगे सोना! आज अरबपति


अशोक कजारिया ने अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी. भारत वापस आए और अपने परिवार के धंधे में शामिल हो गए. खाड़ी देशों की यात्रा में उन्हें फर्श टाइलों की डिमांड का पता चला. स्पेन जाकर उन्होंने 50 कारखाने देखे, और 1985 में स्पेन की मदद से भारत में कजारिया सिरेमिक्स (Kajaria Ceramics) की स्थापना की. बेहतरीन मार्केटिंग और बाजार के ट्रेंड के अनुकूल बदलावों से कंपनी ने खूब तरक्की की. आज कजारिया भारत की नंबर 1 और दुनिया की 8वीं सबसे बड़ी टाइल निर्माता कंपनी है. पूरी कहानी काफी दिलचस्प है, जिसे पढ़ा ही जाना चाहिए.

जब अशोक कजारिया अमेरिका से अपनी डिग्री छोड़ने का साहसिक कदम उठाया तो कइयों को लगा कि शायद वह गलत कर रहा है. वे वापस आए और अपने परिवार के कच्चे लोहे के व्यापार में लग गए. वे खाड़ी देशों की सेल्स के लिए आने-जाने लगे. इसी यात्रा के दौरान अशोक को कुछ दिलचस्प मिला, जिससे उनका फ्यूचर पूरी तरह बदल गया.

यात्रा के दौरान किस्सा था यह था कि कास्ट खरीदार फर्श पर लगने वाली टाइलों में भी रुचि रखते थे. उन्होंने कहा कि अगर वह इसे बना सकते हैं तो वे (खरीदार) उसे स्पेन तक पहुंचा सकते हैं. अशोक को बात अच्छी लगी और सहमत हो गए. उन्होंने 50 कारखानों की विजिट की. वह भारत में अपना खुद का कारखाना स्थापित करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने स्पेन की टॉप कंपनी – टोडाग्रेस (Todagres) संग साझेदारी की. 1985 में, कजारिया सिरेमिक्स (Kajaria Ceramics) का जन्म हुआ.

सिकंदराबाद में लगाया पहला प्लांट

अशोक कजारिया की योजना काफी सरल थी. टोडाग्रेस टेक्निकल नॉलेज में मदद करेगा और कजारिया सिरेमिक फर्श टाइल कारखाना शुरू करेगा. 1988 तक, कजारिया ने सिकंदराबाद (यूपी) में अपना पहला प्लांट शुरू किया, जिसकी क्षमता प्रति वर्ष 1 मिलियन वर्ग मीटर थी.

सेल शुरू करने के लिए, अशोक ने मार्केटिंग का सहारा लिया और 1989 में कजारिया का पहला विज्ञापन आया. विज्ञापन ने ग्राहकों को कजारिया की बेहतर गुणवत्ता की ओर मोड़ दिया और यह सिर्फ दो वर्षों में मार्केट लीडर बन गया. लेकिन, 1995 आते-आते ट्रेंड बदल गया.

यूरोप ने बड़े आकार के टाइल बनाने शुरू कर दिए. अशोक को छोटे फर्श टाइल्स से लंबी दीवार टाइल्स बनाने की ओर रुख करना पड़ा. मार्च 1998 में, उन्होंने गाइलपुर (राजस्थान) में एक और कारखाना चालू किया, जिसकी क्षमता प्रति वर्ष 6 मिलियन वर्ग मीटर दीवार टाइलें थी. यह कारखाना गेम चेंजर साबित हुआ.

कजारिया ने 2007 में 528.9 करोड़ रुपये की सेल को छुआ. इसने रिकॉर्ड 20.79 मिलियन वर्ग मीटर टाइलें बेचीं. जब 2008 में बाजार धराशायी हो गया, तो कजारिया NSE पर सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय टाइल कंपनी बन गई. आज (15 अप्रैल 2024) को कजारिया का मार्केट कैप 19,305.29 करोड़ रुपये है. आज इसके शेयर ने NSE पर 1212.20 रुपये पर क्लोजिंग दी है. तो लौटते हैं स्टोरी पर. सेल अच्छी हो रही थी, शेयर मार्केट में कंपनी लिस्ट हो चुकी थी. तभी, अशोक कजारिया ने एक और नया ट्रेंड देखा.

हार्डवेयर दुकानों से परेशान ग्राहकों को दिया सॉल्यूशन

लोग हार्डवेयर की दुकानों से टाइल खरीदने से नाराज थे. न तो वहां पर ज्यादा विकल्प थे और न ही अच्छा कस्टमर एक्सपीरियंस. इसलिए अशोक ने अपना 3,000 वर्ग फुट का टाइल शोरूम – कजारिया वर्ल्ड (Kajaria World) खोलना शुरू किया. 2012 तक, कजारिया वर्ल्ड 17 आउटलेट तक बढ़ गया और 1045.71 करोड़ रुपये की बिक्री को छुआ.

साथ ही, यूरोपीय बाजार ग्रेनाइट टाइल्स से विट्रिफाइड टाइल्स की ओर चला गया. इसलिए, अशोक ने अपने दो कारखानों में उनका उत्पादन शुरू कर दिया. 2015 तक, कजारिया ने पॉलिश और ग्लेज्ड विट्रिफाइड टाइल्स बेचकर 1600 करोड़ रुपये कमाए. यह एक यूनिकॉर्न बन गया और 8000 करोड़ रुपये के मूल्यांकन को छू गया.

कजारिया ने बाथवेयर (केरोविट) की संबंधित श्रेणी में वृद्धि और विस्तार किया. 2016 में इसने अभिनेता अक्षय कुमार को भी ब्रांड एंबेसडर के रूप में साइन किया. कंपनी की टैगलाइन थी- “देश की मिट्टी से बनी टाइल.” और अक्षय के विज्ञापन से ब्रांड को और ऊंचाई मिली.

2019 तक, कजारिया ने बिक्री में तेजी से बढ़ोतरी हुई और बाजार में 11% हिस्सेदारी हासिल कर ली. कंपनी का मुनाफा भी काफी बढ़ा और इसकी वैल्यूएशन उसके दो सबसे बड़े प्रतिस्पर्धियों, सोमानी और सेरा से दोगुनी हो गई. (दोनों की सेल को मिलाकर). आज, कजारिया भारत की सबसे बड़ी सिरेमिक और विट्रिफाइड टाइल निर्माता कंपनी है और दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी कंपनी है. इसके छह प्लांट हैं, जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 86.47 मिलियन वर्ग मीटर है.

अशोक कजारिया की नेट वर्थ

फोर्ब्स के अनुसार, दुनियाभर के अरबपतियों की सूची में अशोक कजारिया 2410वें नंबर पर आते हैं. उनकी नेट वर्थ 9 हजार करोड़ रुपये से अधिक (1.1 बिलियन डॉलर) है. अशोक कजारिया 1988 में स्थापित कजारिया सिरामिक्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (Chairman and Managing Director) हैं. उनके दोनों बेटे, चेतन और ऋषि, संयुक्त प्रबंध निदेशक (Joint Managing Directors) के रूप में कंपनी चलाने में उनकी मदद करते हैं. फिलहाल, बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह कजारिया के ब्रांड एम्बेसडर हैं.

PROF. AVINASH KR. AGRAWAL - DIRECTOR OF JODHPUR IIT

PROF. AVINASH KR. AGRAWAL - DIRECTOR OF JODHPUR IIT

प्रोफेसर अविनाश कुमार अग्रवाल को आईआईटी, जोधपुर का निदेशक नियुक्त किया गया


भारतीय मैकेनिकल इंजीनियर, ट्राइबोलॉजिस्ट और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर अविनाश कुमार अग्रवाल को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जोधपुर का निदेशक नियुक्त किया है।

राजस्थान राज्य के करौली में 22 अगस्त 1972 को जन्में अविनाश कुमार अग्रवाल आंतरिक दहन इंजन , उत्सर्जन , वैकल्पिक ईंधन और सीएनजी इंजन पर अपने अध्ययन के लिए जाने जाते हैं।

प्रोफेसर अविनाश कुमार अग्रवाल ने मालवीय क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (एमआरईसी) जयपुर (वर्तमान में मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जयपुर ) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग (बीई) में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1994 में राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली के ऊर्जा अध्ययन केंद्र से अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की, जहां से उन्होंने 1996 में ऊर्जा अध्ययन में एमटेक की उपाधि प्राप्त की। आईआईटी दिल्ली, के ऊर्जा अध्ययन केंद्र में, एलएम दास के मार्गदर्शन में उन्होंने 1999 में बायोडीजल-ईंधन संपीड़न इग्निशन इंजन पर अपनी पीएचडी की।

इसके बाद वह अपने पोस्टडॉक्टरल कार्य के लिए अमेरिका चले गए, जिसे उन्होंने 1999 और 2001 के बीच विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के इंजन रिसर्च सेंटर में पूरा किया । मार्च 2001 में भारत लौटने पर, वह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर में सहायक प्रोफेसर के रूप में शामिल हो गए। उन्हें 2007 में एक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में पदोन्नत किया गया था और 2012 से मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर के रूप में संस्थान की सेवा कर रहे हैं। इस अवधि के दौरान उन्होंने विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में विदेश में सात छोटे कार्यकाल पूरे किए, पहला 2002 में लॉफबोरो विश्वविद्यालय के वोल्फसन स्कूल ऑफ मैकेनिकल एंड मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियरिंग में, दूसरा और तीसरा, 2004 और 2013 में वियना के तकनीकी विश्वविद्यालय के फोटोनिक्स इंस्टीट्यूट में और 2013, 2014 और 2015 में हनयांग यूनिवर्सिटी, दक्षिण कोरिया में चौथा, पांचवां और छठा और 2016 में कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (KAIST) में आखिरी कार्यकाल पूरे किया।

अग्रवाल के शोध ने इंजन दहन, वैकल्पिक ईंधन, उत्सर्जन और कण नियंत्रण, ऑप्टिकल निदान, मेथनॉल इंजन विकास, ईंधन स्प्रे अनुकूलन और ट्राइबोलॉजी के क्षेत्रों को कवर किया है और उनके काम ने कम लागत वाले डीजल ऑक्सीकरण उत्प्रेरक और सजातीय चार्ज संपीड़न इग्निशन के विकास में सहायता की है।

वह अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग (2013), सोसाइटी ऑफ ऑटोमोटिव इंजीनियर्स, यूएस (2012) के निर्वाचित फेलो हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस, इलाहाबाद (2018), रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री, यूके (2018), इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी (2016), और इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग (2015) के फेलो रहे हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भारत सरकार की सर्वोच्च एजेंसी, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने उन्हें 2016 में इंजीनियरिंग विज्ञान में उनके योगदान के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया , जो सर्वोच्च भारतीय विज्ञान पुरस्कारों में से एक है। अग्रवाल को विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड की प्रतिष्ठित जेसी बोस फ़ेलोशिप प्रदान की गई है ।

वेब ऑफ साइंस की एक शाखा, क्लेरिवेट एनालिटिक्स के अनुसार, अग्रवाल भारत के 2018 के शीर्ष दस उच्च उद्धृत शोधकर्ताओं (एचसीआर) में से एक हैं।

Dr. Manindra Aggarwal - Director of kanpur IIT

Dr. Manindra Aggarwal - Director of kanpur IIT

Manindra Aggarwal Becomes Director Of Kanpur Iit

मणींद्र अग्रवाल बने कानपुर आईआईटी के निदेशक, कोरोना काल में इसलिए हुए थे चर्चित

वह कोरोना काल में गणितीय मॉडल सूत्र के जरिये महामारी के पैटर्न का सटीक आकलन कर चर्चित हुए थे।


देश की छह आईआईटी को बृहस्पतिवार को नए निदेशक मिल गए। मणींद्र अग्रवाल को आईआईटी-कानपुर का निदेशक बनाया गया है। वह कोरोना काल में गणितीय मॉडल सूत्र के जरिये महामारी के पैटर्न का सटीक आकलन कर चर्चित हुए थे।

आईआईटी कानपुर के अविनाश कुमार अग्रवाल आईआईटी-जोधपुर, आईआईटी खड़गपुर के अमित पात्रा आईआईटी-बीएचयू, आईआईटी-मद्रास के देवेंद्र जलिहाल आईआईटी-गुवाहाटी, सुकुमार मिश्रा आईआईटी-धनबाद और डीएस कट्टी आईआईटी-गोवा के निदेशक नियुक्त किए गए हैं।

PIYUSH BANSAL - A BIG ENTERPRENEUR

#PIYUSH BANSAL - A BIG ENTERPRENEUR

बिजनेस के लिए छोड़ी माइक्रोसॉफ्ट की नौकरी, आज बन चुकें हैं हजारों करोड़ की कंपनी के मालिक


कहते हैं सफलता पाने के लिए कई बार रिस्क लेना पड़ता है। रिस्क लेने वाले ही इतिहास रचते हैं। लेंसकार्ट कंपनी के फाउंडर पीयूष बंसल ने ऐसा ही रिस्क लिया और आज वह सफलता का स्वाद चख रहे हैं। पीयूष बंसल (Peyush Bansal) ने बिजनेस करने के लिए अपनी माइक्रोसॉफ्ट की अच्छी खासी नौकरी को छोड़ दिया था। आज उनकी कंपनी लेंसकार्ट चश्मा बनाने वाली कंपनियों के बीच एक बड़ा नाम बन गई है। आज पीयूष अपने इसी बिजनेस से करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। पीयूष शार्क टैंक इंडिया में बतौर जज भी काफी सुर्खियां बटोर चुके हैं। साल 2010 में बनी यह कंपनी आज अरबों रुपये की हो चुकी है। पीयूष ने अपने मिशन और विजन से कंपनी को इतनी सफलता दिलाई है। हालांकि यह सफर इतना आसान नहीं था। पीयूष को कई बार मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। आईए आपको बताते हैं पीयूष बंसल ने इतनी सफलता कैसे हासिल की।

अच्छे पैकेज वाली नौकरी छोड़ी

पीयूष साल 2007 तक यूएस में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में एक अच्छे पैकेज की नौकरी कर रहे थे। बढ़िया सैलेरी के बावजूद पीयूष कुछ अलग करना चाहते थे। 2007 में पीयूष ने तय किया कि वे अब अपने देश जाकर सपनों को पूरा करेंगे। माइक्रोसॉफ्ट में एक साल से भी कम समय तक काम करने के बाद पीयूष बंसल ने अपनी नौकरी छोड़ दी। उनके इस फैसले से परिवार और दोस्त हैरान थे, काफी समझाने के बाद भी वे नहीं माने और भारत लौट आए। यहां बाजार को समझने के लिए उन्होंने एक क्लासिफाइड वेबसाइट सर्च माइ कैंपस शुरू की। यहां छात्रों को किताबें, पार्ट टाइम जॉब और कारपुल जैसी चीजें ढूंढने में मदद की जाती थी। तीन साल तक पीयूष इस प्रोजेक्ट पर काम करते रहे। इसके जरिए इंडियन कस्टमर का बिहेवियर और रिक्वायरमेंट रीड करते रहे।

इस तरह हुई लेंसकार्ट की शुरुआत

तीन साल तक कस्टमर की जरूरतों को समझने के बाद पीयूष बंसल ने चाल अलग-अलग वेबसाइट्स लॉन्च की। इनमें से एक आईवियर थी। वहीं बाकी तीन कंपनियां यूथ को टारगेट करते हुए ज्वेलरी, घड़ी और बैग्स की थी। रिस्पांस को देखते हुए उन्होंने आईवियर पर फोकस किया औ यहीं से लेंसकार्ट की शुरुआत हुई। पीयूष बंसल ने आईवियर पर अपना पूरा ध्यान लगाते हुए देश के छोटे बड़े शहरों में आउटलेट्स खोलने शुरू किए, जहां हर रेंज के चश्मों के साथ आंखों के चेकअप की सुविधा भी दी जाने लगी। साथ ही इन चश्मों को ऑनलाइन मार्केट में बेचना शुरू किया गया।

पीयूष के इस यूनिक कॉन्सेप्ट को देखते हुए इन्हें कई इंवेस्टर्स मिले। धीरे-धीरे उनकी कंपनी सफलता की ओर आगे बढ़ने लगी। साल 2019 में लेंसकार्ट 1.5 अरब डॉलर की वैल्युएशन के साथ एक यूनिकॉर्न बन गई थी। आज पीयूष इस कंपनी से करोड़ों रुपयों की कमाई कर रहे हैं।

KUHU GARG IPS & BADMINTON CHAMPION

KUHU GARG IPS & BADMINTON CHAMPION 

देश की इस बैडमिंटन खिलाड़ी ने UPSC में भी गाड़ दिए सफलता के झंडे, हासिल की 178वीं रैंक; पिता रहे चुके हैं DGP


Kuhoo Garg ने यूपीएससी में 178वीं रैंक हासिल की.

देश की इस बैडमिंटन खिलाड़ी ने UPSC में भी गाड़ दिए सफलता के झंडे, हासिल की 178वीं रैंक; पिता रहे चुके हैं DGP

UPSC CSE Result 2023: कुहू गर्ग की प्रारंभिक शिक्षा सेंट जोसेफ देहरादून से हुई थी. उन्होंने दिल्ली के एसआरसीसी कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पढ़ाई पूरी की. कुहू ने यूपीएससी की तैयारी के दौरान एक दिन में 16 घंटे तक पढ़ाई की. हालांकि कुछ लोग 8 घंटे की पढ़ाई में भी यूपीएससी क्लियर कर लेते हैं, और उन्होंने भी कई दिन 8 से 10 घंटे की पढ़ाई की.

उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार की बेटी कुहू गर्ग ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में 178वीं रैंक हासिल कर बड़ी सफलता हासिल की है. कुहू बैडमिंटन में देश का नाम रोशन कर चुकी हैं. 56 ऑल इंडिया मेडल्स और 18 इंटरनेशनल मेडल्स कुहू के नाम हैं. उनका बैडमिंटन में मिक्स्ड डबल्स में टॉप इंटरनेशनल रैंक 34 और देश में मिक्स डबल्स रैंकिंग में नंबर-1 है.


खास बातचीत में कुहू गर्ग ने अपनी सफलता का श्रेय पूर्व आईपीएस अधिकारी पिता अशोक कुमार को दिया. बताया कि स्पोर्ट्स इंजरी के दौरान की मेहनत और बैडमिंटन ने उन्हें अनुशासन सिखाया. यही आगे जाकर यूपीएससी में सफलता का कारण बना.

देहरादून और दिल्ली से हुई पढ़ाई-लिखाई

कुहू गर्ग की प्रारंभिक शिक्षा सेंट जोसेफ देहरादून से हुई थी. उन्होंने दिल्ली के एसआरसीसी कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पढ़ाई पूरी की. कुहू ने यूपीएससी की तैयारी के दौरान एक दिन में 16 घंटे तक पढ़ाई की. हालांकि कुछ लोग 8 घंटे की पढ़ाई में भी यूपीएससी क्लियर कर लेते हैं, और उन्होंने भी कई दिन 8 से 10 घंटे की पढ़ाई की.

क्रिकेट को लेकर पूछा गया था सवाल

यूपीएससी के इंटरव्यू के दौरान पूछा गया था कि क्या क्रिकेट की वजह से बाकी सभी खेल खराब हो रहे हैं? क्या क्रिकेट को एक इंडस्ट्री बना दिया जाए? इसके जवाब में कुहू ने कहा कि क्रिकेट किसी भी खेल को प्रभावित नहीं कर रहा है, बल्कि क्रिकेट देश में अच्छा होता जा रहा है और बाकी खेल भी बेहतर हो सकते हैं.

बैडमिंटन के खेल ने सिखाई दृढ़ता

कुहू ने यह भी बताया, परिवार के अलावा दोस्तों और सोसाइटी में रह रहे पूर्व ब्यूरोक्रेट्स ने उनकी काफी मदद की और उन्हें अच्छी गाइडेंस दी. उन्होंने यह भी बताया कि अगर वह बैडमिंटन खिलाड़ी नहीं होतीं, तो शायद यूपीएससी क्लियर करने के लिए उन्हें दृढ़ता से मेहनत करने की ताकत नहीं मिलती और अनुशासन भी नहीं होता. परिवार के सपोर्ट के बिना कोई भी परीक्षा मुश्किल हो जाती है.


उत्तराखंड के पूर्व DGP अशोक कुमार और उनकी बेटी कुहू गर्ग.

पिता IPS और मां प्रोफेसर

बता दें कि कुहू गर्ग के पिता अशोक कुमार 2020-23 तक उत्तराखंड के डीजीपी रहे. अशोक कुमार ने हरियाणा से प्रारंभिक पढ़ाई की और आईआईटी दिल्ली से इंजीनीरिंग की थी. वहीं, कुहू की माँ प्रोफेसर अलकनन्दा अशोक पंत विश्विविद्यालय में कार्यरत हैं. कुहू के दो भाई हैं जो पढ़ाई कर रहे हैं.

Thursday, April 18, 2024

Monday, April 15, 2024

KAVARAI VAISHYA - A TAMIL VAISHYA CASTE

KAVARAI VAISHYA - A TAMIL VAISHYA CASTE

Kavarai is the name for Balijas (Telugu trading caste), who have settled in the Tamil country. The name is said to be a corrupt form of Kauravar or Gauravar, descendants of Kuroo of Kauravar or Gauravar, of the Mahâbaratha, or to be the equivalent of Gauravalu, sons of Gauri, the wife of Siva. Other suggested derivatives are: 

(1) a corrupt form of the Sanskrit Kvaryku, meaning badness or reproach, or Arya, i.e., deteriorated Aryans; 

(2) Sanskrit Kavara, mixed, or Kavaraha, a braid of hair, i.e., a mixed class, as many of the Telugu professional belong to this caste; 

(3) Kavarai or Gavaras, buyers or dealers in cattle. The Kavarai call themselves Balijas, and derive the name from bali, fire, and jaha , sprung, i.e., "men sprung from fire." Like other Telugu castes, they have exogamous septs, e.g., tupâki (gun), jetti (wrestler), pagadâla (coral), bandi (cart), símaneli, etc. The Kavarais of Srívilliputtîr, in the Tinnevelly district, are believed to be the descendants of a few families, which emigrated there from Manjakuppam (Cuddalore) along with one Dora Krishnamma Nâyudu. About the time of Tirumal Nâyak, one Râmaswâmi Râju, who had five sons, of whom the youngest was Dora Krishnamma, was reigning near Manjakuppam. Dora Krishnamma, who was of wandering habits, having received some money from his mother, went to Trichinopoly, and, when he was seated in the main bazar, an elephant rushed into street. The beast was stopped in its stampede, and tamed by Dora Krishnamma. Vijayaranga Chokkappa sent his retinue and ministers to escort him to his palace. While they were engaged in conversation, news arrived that some chiefs in the Tinnevelly district refused to pay their taxes, and Dora Krishnamma volunteered to go and subdue them. Near Srívilliputtîr he passed a ruined temple dedicated to Krishna, which he thought of rebuilding if he should succeed in subduing the chiefs. When he reached Tinnevelly, they, without raising any objection, paid their dues, and Dora Krishnamma returned to Srívilliputtîr, and settled there.

KAVARAI DEESAI

They could have followed the Vijayanagar expansion south, and settled in these districts. The ancesters of Mr Thumboo Chetty could have acted as the chieftain of a part of the town of Trichinopoly since the father was a Desayi and this appointment is hereditary.

Thumboo Chetty's father, Desayi Royalu Chetti Garu, was the head of his caste. He was an honourable and upright man, highly respected. (page 1; T. Royaloo Chetty).

" The word Desayi means of the country. For almost every taluk in the North Arcot district there is a headman, called the Desayi Chetti, who may be said in a manner to correspond to a Justice of the Peace. The headmen belong to the Kavarai or Balija caste, their family name being Dhanapala a common name among the Kavarais which may be interpreted as ' the protector of wealth". In former days they had very great influences, and all castes belonging to the right-hand faction would obey the Desayi Chetti.

कवराई बालिजास (तेलुगु व्यापारिक जाति) का नाम है, जो तमिल देश में बस गए हैं। कहा जाता है कि यह नाम कौरवर या गौरवर का भ्रष्ट रूप है, जो महाभारत के कौरव या गौरवर के कुरू के वंशज हैं, या शिव की पत्नी गौरी के पुत्र गौरवलु के समकक्ष हैं। अन्य सुझाए गए व्युत्पन्न हैं:

(1) संस्कृत क्वार्यकु का एक भ्रष्ट रूप, जिसका अर्थ है बुराई या निंदा, या आर्य, यानी, बिगड़े हुए आर्य;

(2) संस्कृत कवरा, मिश्रित, या कवराहा, बालों की एक चोटी, यानी, एक मिश्रित वर्ग, क्योंकि कई तेलुगु पेशेवर इस जाति से संबंधित हैं;

(3) कवराई या गवारस, मवेशियों के खरीदार या व्यापारी। कवराई खुद को बालिजास कहते हैं, और यह नाम बाली, आग और जाहा से लिया गया है, यानी, "आग से पैदा हुए लोग।" 

अन्य तेलुगु जातियों की तरह, उनके पास बहिर्विवाही सेप्ट हैं, उदाहरण के लिए, तुपाकी (बंदूक), जेटी (पहलवान), पगडाला (मूंगा), बंदी (गाड़ी), सिमानेली, आदि। ऐसा माना जाता है कि तिन्नवेल्ली जिले में श्रीविल्लिपुत्तिर के कवराई हैं। कुछ परिवारों के वंशज, जो एक डोरा कृष्णम्मा नायडू के साथ मंजाकुप्पम (कुड्डालोर) से वहां आए थे। तिरुमल नायक के समय, एक रामस्वामी राजू, जिनके पांच बेटे थे, जिनमें से सबसे छोटे डोरा कृष्णम्मा थे, मंजकुप्पम के पास राज्य करते थे। डोरा कृष्णम्मा, जो घूमने-फिरने की आदत वाली थी, अपनी मां से कुछ पैसे लेकर त्रिचिनोपोली चली गई और जब वह मुख्य बाजार में बैठी थी, तभी एक हाथी सड़क पर आ गया। जानवर की भगदड़ में उसे रोक दिया गया और डोरा कृष्णम्मा ने उसे वश में कर लिया। विजयरंगा चोक्कप्पा ने उन्हें अपने महल तक ले जाने के लिए अपने अनुचर और मंत्रियों को भेजा। जब वे बातचीत में लगे हुए थे, खबर आई कि टिननेवेल्ली जिले के कुछ प्रमुखों ने अपने करों का भुगतान करने से इनकार कर दिया, और डोरा कृष्णम्मा ने स्वेच्छा से जाकर उन्हें अपने अधीन कर लिया। श्रीविल्लिपुत्तिर के पास वह कृष्ण को समर्पित एक खंडहर हो चुके मंदिर के पास से गुजरा, जिसके बारे में उसने सोचा कि यदि वह प्रमुखों को वश में करने में सफल हो जाए तो वह इसे फिर से बनवाएगा। जब वह टिननेवेल्ली पहुंचे, तो उन्होंने बिना कोई आपत्ति उठाए अपना बकाया चुका दिया और डोरा कृष्णम्मा श्रीविल्लिपुत्तिर लौट आईं और वहीं बस गईं।

कवराई देसाई

वे दक्षिण में विजयनगर विस्तार का अनुसरण कर सकते थे और इन जिलों में बस सकते थे। श्री थम्बू चेट्टी के पूर्वज त्रिचिनोपोली शहर के एक हिस्से के मुखिया के रूप में कार्य कर सकते थे क्योंकि उनके पिता देसीई थे और यह नियुक्ति वंशानुगत है।

थंबू चेट्टी के पिता, देसाई रोयालु चेट्टी गारू, अपनी जाति के मुखिया थे। वह एक सम्मानित और ईमानदार व्यक्ति थे, बहुत सम्मानित थे। (पेज 1; टी. रॉयलू चेट्टी)।

"देशाई शब्द का अर्थ देश है। उत्तरी अर्कोट जिले के लगभग हर तालुक के लिए एक मुखिया होता है, जिसे देसीई चेट्टी कहा जाता है, जिसे शांति के न्यायाधीश के अनुरूप कहा जा सकता है। मुखिया कवराई के होते हैं या बलिजा जाति, उनके परिवार का नाम धनपाल है जो कावरियों के बीच एक सामान्य नाम है जिसकी व्याख्या 'धन के रक्षक' के रूप में की जा सकती है। पूर्व दिनों में उनका बहुत बड़ा प्रभाव था, और दाहिने हाथ के गुट से संबंधित सभी जातियाँ देसाई चेट्टी का पालन करती थीं दक्षिणी भारत की जातियों और जनजातियों से निकाला गया। लेखक: थर्स्टन, एडगर, 1855-1935; रंगाचारी, के.

LINGAYAT BANIYA - बनिया: लिंगायत

LINGAYAT BANIYA - बनिया: लिंगायत

मध्य प्रांत में लिंगायत बनियों की संख्या लगभग 800000 है, जो वर्धा, नागपुर और सभी बरार जिलों में बड़ी संख्या में हैं। एक अलग लेख में लिंगायत संप्रदाय का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। लिंगायत बनिया एक अलग अंतर्विवाही समूह बनाते हैं,

और वे न तो अन्य बनियों के साथ और न ही लिंगायत संप्रदाय से संबंधित अन्य जातियों के सदस्यों के साथ भोजन करते हैं और न ही विवाह करते हैं। लेकिन उन्होंने बनियों का नाम और व्यवसाय बरकरार रखा है। इनके पांच उपविभाग हैं, पंचम, दीक्षावंत, मिर्च-चाहते, तकलकर और कनाडे। पंचम या पंचम-सलिस लिंगायत संप्रदाय में परिवर्तित मूल ब्राह्मणों के वंशज हैं। वे समुदाय के मुख्य निकाय हैं और आठ गुना संस्कार या ईजिता-वर्ण के रूप में जाने जाने वाले द्वारा आरंभ किए जाते हैं।

दीक्षावंत, दीक्षा या दीक्षा से, पंचमसालिस का एक उपखंड है, जो स्पष्ट रूप से दीक्षित ब्राह्मणों की तरह शिष्यों को दीक्षा देते हैं। कहा जाता है कि तकलकरों का नाम ताकली नामक जंगल से लिया गया है, जहां उनकी पहली पूर्वज ने भगवान शिव को एक बच्चे को जन्म दिया था। कनाडे कैनरा से हैं। चिलीवंत शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है; ऐसा कहा जाता है कि इस उपजाति का कोई सदस्य अपना भोजन या पानी फेंक देता है यदि यह किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा देखा जाता है जो लिंगायत नहीं है, और वे पूरा सिर मुंडवा लेते हैं। उपरोक्त अंतर्विवाही उपजातियाँ बनाते हैं। लिंगायत बनिया में बहिर्विवाही समूह भी हैं, जिनके नाम मुख्यतः निम्न जाति के हैं। इनके उदाहरण हैं काओडे, कावा से कौवा, तेली से तेल बेचने वाला, थुबरी से बौना, उबडकर से आग लगाने वाला, गुड़कारी से चीनी बेचने वाला और धामनगांव से धामनकर। उनका कहना है कि गणित या बहिर्विवाही समूहों को अब नहीं माना जाता है और अब एक ही उपनाम वाले व्यक्तियों के बीच विवाह निषिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि अगर किसी लड़की की शादी किशोरावस्था से पहले नहीं की जाती है तो उसे अंततः जाति से बाहर कर दिया जाता है, लेकिन यह नियम शायद पुराना हो चुका है। विवाह का प्रस्ताव लड़के या लड़की पक्ष की ओर से आता है, और कभी-कभी दूल्हे को उसके यात्रा व्यय के लिए एक छोटी राशि मिलती है, जबकि अन्य समय दुल्हन को - 1 संप्रदाय की कुछ सूचना के लिए लेख बैरागी देखें। कीमत अदा की जाती है. शादी में दूल्हे के हाथों में लाल रंग का चावल और दुल्हन के हाथों में जुआरी का रंग पीला रखा जाता है। दूल्हा दुल्हन के सिर पर चावल रखता है और वह उसके पैरों पर जुआरी रख देती है।

पानी से भरा एक बर्तन जिसमें एक सुनहरी अंगूठी है, उनके बीच रखा जाता है, और वे पानी के नीचे अंगूठी पर एक साथ अपने हाथ रखते हैं और असली के अंदर बने एक सजावटी छोटे विवाह-शेड के चारों ओर पांच बार घूमते हैं। एक दावत दी जाती है, और दुल्हन का जोड़ा एक छोटे से मंच पर बैठता है और एक ही पकवान से खाना खाता है। विधवाओं के पुनर्विवाह की अनुमति है, लेकिन विधवा अपने पहले पति या अपने पिता के वर्ग के किसी पुरुष से शादी नहीं कर सकती है। तलाक को मान्यता मिल गई है. लिंगायत मृतकों को शिव के लिंगम या प्रतीक के साथ बैठी हुई मुद्रा में दफनाते हैं, जिसने अपने जीवनकाल के दौरान मृत व्यक्ति को कभी नहीं छोड़ा था, जिसे उसके दाहिने हाथ में रखा गया था। कभी-कभी कब्र के ऊपर शिव की छवि वाला एक मंच बनाया जाता है। वे शोक के प्रतीक के रूप में सिर नहीं मुंडवाते।

उनका प्रमुख त्योहार शिवरात्रि या शिव की रात है, जब वे भगवान को बेल के पेड़ की पत्तियां और राख चढ़ाते हैं। लिंगायत को कभी भी शिव के लिंगम या लिंग चिन्ह के बिना नहीं रहना चाहिए, जिसे चांदी, तांबे या पीतल के एक छोटे से डिब्बे में गर्दन के चारों ओर लटकाया जाता है। यदि वह उसे खो देता है, तो उसे तब तक न खाना चाहिए, न पीना चाहिए और न ही धूम्रपान करना चाहिए जब तक कि वह उसे पा न ले या दूसरा प्राप्त न कर ले। लिंगायत किसी भी उद्देश्य के लिए ब्राह्मणों को नियुक्त नहीं करते हैं, बल्कि उनके स्वयं के पुजारी, जंगम, द्वारा सेवा की जाती है, जिन्हें पंचम समूह के सदस्यों से वंश और दीक्षा दोनों द्वारा भर्ती किया जाता है। लिंगायत बनिया व्यावहारिक रूप से सभी तेलुगु देश के अप्रवासी हैं; उनके तेलुगु नाम हैं और वे अपने घरों में यही भाषा बोलते हैं। वे अनाज, कपड़ा, किराने का सामान और मसालों का व्यापार करते हैं।

BANAJIGA A VAISHYA CASTE - A KANNADA VAISHYA CASTE

BANAJIGA A VAISHYA CASTE

बनजिगा को अक्सर बलिजा जाति की एक उपजाति माना जाता है। बनजिगा बलिजा की उपजाति नहीं है।

बनजिगा एक व्यापारिक लोग हैं जो पूरे कर्नाटक राज्य में पाए जाते हैं। इस जाति को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जिनमें से एक है "बलिजा'। यह बनजिगा का बाद वाला रूप प्रतीत होता है।

कर्नाटक राज्य में बलिजा को बनजिगा के नाम से जाना जाता है। मध्ययुगीन अतीत में उपयोग में आने वाले नाम के भिन्न रूप थे बलांजा, बनांजा, बनांजू और बनिजिगा, जिनके संभावित सजातीय बालिजिगा, वलंजियार, बालनजी, बनानजी और बालिगा जैसे व्युत्पन्न हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि ये सभी संस्कृत शब्द वणिक या से व्युत्पन्न हैं। वणिज, व्यापारी के लिए।

बलिजा और उनकी उपजातियाँ जिनके नाम बालाजीगा/बनजिगा/गौड़ा बनजिगा, नायडू, तेलगा बलिजा/तेलगा बनजिगा/शेट्टी बलिजा/शेट्टी बनजिगा/बनजिगा शेट्टी, दसरा बलिजा/दासरा बालाजीगा/दासरा बलिजिगा/दासा बनजिगा, कापू, मुन्नोरा/मुन्नूर/मुन्नूर कापू , बालिगारा/बाले बनजिगा/बाले बालाजीगा/बाले शेट्टी/बानागारा, रेड्डी (बालिजा), जनप्पन, उप्पारा (बालिजा) तुलेरू (बलिजा)

बुकानन द्वारा यह कहा गया है कि सभी बनजिगा पृथ्वी मल्ला चेट्टी नामक व्यक्ति के वंशज हैं, जो उनकी पहली पत्नी थी, जो वैष्णव वर्ग की थी; उनके पूर्वज बनजिगा जाति के थे, और उनकी दूसरी पत्नी जो ईश्वर या शिव की पूजा करती थीं, उनके पूर्वज लिंगवंतरु थे।

बनजिगा धर्म में वैष्णव हैं, लेकिन वे शिव का भी सम्मान करते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं। उनके बारे में लिखा है कि वे मूल रूप से बौद्ध (मतलब शायद जैन) हैं, और फिर उन्होंने वैष्णववाद और शैववाद अपनाया, और इन देवताओं के लिए कई मंदिरों का निर्माण किया। उनके सभी गुरु तथाचार्य या भट्टाचार्य परिवारों के श्री वैष्णव ब्राह्मणों के वंशानुगत प्रमुख हैं। वे तिरूपति, मेलकोटे और अन्य वैष्णव तीर्थस्थलों की तीर्थयात्रा पर जाते हैं; ननजनागुड में शिव मंदिर के लिए भी।

बनजिगा हिंदुओं के सभी त्योहारों जैसे कि नए साल (युगादि) के दिन, गौरी, गणेश, दशहरा, दीपावली, संक्रांति और होली का पालन करते हैं और आषाढ़ और पुष्य के उज्ज्वल पखवाड़े की एकादशियों और माघ में शिवरात्रि पर उपवास भी करते हैं। वे अक्सर आपस में भजन समूह बनाते हैं।

मृतकों को दफनाया जाता है. दफ़नाने की रस्मों में जाति से जुड़ी कोई अनोखी बात नहीं है।

BANAJIGAs के विभिन्न उप-विभागों में से, निम्नलिखित सबसे महत्वपूर्ण हैं। वे हैं:

1. दासा बनजिगा,

2. एले बनजिगा या टोटा बनजिगा,

3. डूडी बनजिगा,

4. गज़ुला बनजिगा या सेट्टी बनजिगा,

5. पुवुलु बनजिगा,

6. नायडू बनजिगा,

7. सुकामांची बनजिगा,

8. जिदिपल्ली बनजिगा,

9. राजमहेंद्रम या मुसु कम्मा,

10. उप्पू बनजिगा,

11. गोनी बनजिगा,

12. रावुत राहुतार बनजिगा,

13. रल्ला,

14. मुन्नुतामोर पूसा,

दास बानाजिगा या जैसा कि वे खुद को जैन क्षत्रिय रामानुज-दास वाणी कहते हैं, कहते हैं कि वे पहले जैन क्षत्रिय थे, और रामानुजाचार्य द्वारा उन्हें वैष्णव धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। ये कर्नाटक के रामानगर जिले में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

एले बानाजिगास, जैसा कि उनके नाम से पता चलता है, पान उगाने वाले हैं।

डुडी या कपास बानाजिगा कपास के व्यापारी हैं। ये कर्नाटक के कोलार और चिक्काबल्लापुर जिले में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

गज़ुलु या कांच की चूड़ी अनुभाग को सेट्टी बनजिगा के नाम से भी जाना जाता है। वे कांच की चूड़ियों के व्यापारी हैं। सेट्टी इस अनुभाग के व्यक्तियों पर लागू होने वाली उपाधि है।

पुवुलु या फूल विक्रेता भी गज़ुलु डिवीजन के माने जाते हैं।

नायडू डिविजन को एले/टोटा/कोटा डिविजन के समान ही कहा जाता है। इन सिद्धांतों की ओर से यह दावा किया जाता है कि वे चंद्र जाति के क्षत्रिय हैं, और यह शब्द जो कि संस्कृत 'नायक' का भ्रष्ट रूप है, उन पर तब लागू हुआ जब, विजयनगर शासन के चरम पर, राजा ने अपना पूरा राज्य विभाजित कर दिया। क्षेत्र को नौ जिलों या प्रांतों में विभाजित किया गया और प्रत्येक जाति के एक व्यक्ति को नायक शीर्षक के साथ रखा गया (बलिजा वंश पुराणम पृष्ठ 33)

जिदिपल्ली और राजमहेंद्रम की उत्पत्ति उनके निवास स्थान से हुई, लेकिन बाद में वे जाति उपविभाजनों का दान करने लगे। बाद के डिवीजन के सदस्य नेल्लोर, कडप्पा, अनंतपुर, उत्तरी अर्कोट और चिंगलपेट जिलों के अप्रवासी हैं।

रावुत एक छोटा वर्ग है जो विशेष रूप से मैसूर शहर में रहता है। उन्हें ओप्पाना बनजिगास के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि कहा जाता है कि उन्हें उस राजा के कारण श्रद्धांजलि इकट्ठा करने के लिए विजयनगर से मैसूर देश में भेजा गया था, ओप्पाना का अर्थ नियुक्ति है। वे सभी सैनिक थे, और इसलिए रावुत्स के नाम से जाने जाते थे। कम देखें

उत्तर कर्नाटक में लिंगायत बाणजिगा बहुतायत में हैं और शुद्ध शाकाहारी हैं। उनका मुख्य व्यवसाय व्यवसाय है। दक्षिण कर्नाटक के बालिजास या बाणजिगाओं के बीच विवाह बालिजास या लिंगायत बाणजिगा के रूप में नहीं होगा।

VANIA CHETTIYAR

VANIA CHETTIYAR

Vaniya Chettiar is a subcaste of Chettiars living primarily in the south Indian states of Tamil Nadu, Kerala, Andhra Pradesh and Karnataka. Their major professions are oil and groceries. Vaniyambadi (near Vellore-Ambur) was originally a Vaniya Chettiar town(Now most of the Chettiars have moved to neighboring towns).

In Tamil Nadu, Sizable numbers of this caste can be found in the Coimbatore,Erode,Vellore,Madurai,Paramakudi, Krishnagiri, Cudalore, Periyakulam, Tirunelveli. Kanyakumari and Villupuram districts (basically erstwhile undivided Arcot/Chengalpattu Districts).In Kerala, they are living in Kottayam, Idukki,Ernakulam, Thrissur and Palakkad districts. Though not in large enough numbers to command a vote bank, People of the community in small towns in these areas can still be found running Chekku (oil press); these are now mostly electric rather than bull driven. While some sections of the community have taken to education in the past couple of generations and made a mark as IT pros, entrepreneurs and business men with their traditional business acumen have been very successful others still find studies a difficult task. Late R.K.Shanmugam Chettiyar, free India's first finance minister belonged to this community.The South India Vaniya Chettiyar Education Trust (SIVET) College at Medavakkam on Tambaram Velachery road is one of the many educational institutions run by the community.The community has a large population in Kerala. In kerala the community is known in different names Vanian, Vanika, Vanika Vaisya, Vanibha Chetty, Vaniya Chetty, Ayiravar, Nagarthar etc.

From ancient time in India, vegetable oils were obtained by crushing oilseeds in village, using an oil-press - or Ghana or chekku.

In Sanskrit literature of about 500 BC there is a specific reference to an oil-press, or Ghanis, chekku although it was never described (by Monier-Williams, M. 1899. A Sanskrit-English dictionary, Delhi, India, Motilal Banarsidass. Reprinted 1963).

वानिया चेट्टियार चेट्टियारों की एक उपजाति है जो मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में रहती है। उनका प्रमुख व्यवसाय तेल और किराने का सामान है। वानीयंबादी (वेल्लोर-अम्बूर के पास) मूल रूप से एक वानिया चेट्टियार शहर था (अब अधिकांश चेट्टियार पड़ोसी शहरों में चले गए हैं)।

तमिलनाडु में, इस जाति की बड़ी संख्या कोयंबटूर, इरोड, वेल्लोर, मदुरै, परमकुडी, कृष्णागिरी, कुडालोर, पेरियाकुलम, तिरुनेलवेली में पाई जा सकती है। कन्याकुमारी और विल्लुपुरम जिले (मूल रूप से पूर्व अविभाजित अर्कोट/चेंगलपट्टू जिले)। केरल में, वे कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम, त्रिशूर और पलक्कड़ जिलों में रह रहे हैं। हालाँकि वोट बैंक पर कब्ज़ा जमाने के लिए इतनी बड़ी संख्या नहीं है, फिर भी इन क्षेत्रों के छोटे शहरों में समुदाय के लोग अभी भी चेक्कू (तेल प्रेस) चलाते हुए पाए जा सकते हैं; ये अब बैल चालित के बजाय अधिकतर विद्युत चालित हैं। जबकि समुदाय के कुछ वर्गों ने पिछली कुछ पीढ़ियों में शिक्षा को अपनाया है और अपने पारंपरिक व्यावसायिक कौशल के साथ आईटी पेशेवरों, उद्यमियों और व्यवसायियों के रूप में अपनी पहचान बनाई है, वे बहुत सफल रहे हैं, दूसरों को अभी भी अध्ययन एक कठिन काम लगता है।

स्वतंत्र भारत के पहले वित्त मंत्री स्वर्गीय आर.के.शनमुगम चेट्टियार, इसी समुदाय से थे। तांबरम वेलाचेरी रोड पर मेदावक्कम में दक्षिण भारत वानिया चेट्टियार एजुकेशन ट्रस्ट (SIVET) कॉलेज समुदाय द्वारा संचालित कई शैक्षणिक संस्थानों में से एक है।

समुदाय की आबादी बड़ी है केरल में. केरल में इस समुदाय को वानियन, वणिका, वणिका वैश्य, वनिभा चेट्टी, वानिया चेट्टी, अयिरवर, नागरथार आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है। भारत में प्राचीन काल से, वनस्पति तेल गांव में तिलहन को कुचलकर, तेल-प्रेस - या घाना या चेक्कू का उपयोग करके प्राप्त किया जाता था। लगभग 500 ईसा पूर्व के संस्कृत साहित्य में तेल-कोल्हू, या घानी, चेक्कू का एक विशिष्ट संदर्भ है, हालांकि इसका कभी वर्णन नहीं किया गया था (मोनियर-विलियम्स द्वारा, एम. 1899। एक संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश, दिल्ली, भारत, मोतीलाल बनारसीदास। 1963 में पुनर्मुद्रित)।

HARSHA GUPTA - हर्ष गुप्त - A VAISHYA KING

HARSHA GUPTA - हर्ष गुप्त - A VAISHYA KING 

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था।
इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था।

अफ़सढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त की था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था।

कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरुद्ध संघर्षरत था।

अफ़सढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थिति एक सामन्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोवर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।

हर्ष गुप्त की बहन का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं।

वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

KRISHNA GUPTA - कृष्ण गुप्त - VAISHYA UTTARA GUPT VANSH

KRISHNA GUPTA - कृष्ण गुप्त - VAISHYA UTTARA GUPT VANSH

कृष्ण गुप्त 'असफढ़ अभिलेख' के अनुसार वैश्य उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक था। अभिलेख के अनुसार कृष्ण गुप्त का मूल स्थान मगध था, जबकि विद्वानों ने उसका मूल स्थान मालवा कहा गया है।'असफढ़ अभिलेख' के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासन काल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता, तथापि इस दिशा में ईशानवर्मा के 'हड़हा अभिलेख' से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है।

दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों ने कृष्ण गुप्त को छठी से सातवीं शती ई. में मगध पर शासन करने वाले उत्तरवर्ती गुप्त वंश का संस्थापक कहा है।

उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासन काल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमारगुप्त तृतीय के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासन काल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

कुछ इतिहासकारों की यह धारणा भी है कृष्ण गुप्त चंद्रगुप्त द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनका उल्लेख वैशाली से प्राप्त मुहर पर 'गोविंद गुप्त' के नाम से हुआ था। किंतु इस कल्पना के लिये कोई सबल आधार नहीं है।

ISHAN VERMA - ईशानवर्मा - A GREAT KING

ISHAN VERMA - ईशानवर्मा - A GREAT KING

ईशानवर्मा कन्नौज के वैश्य मौखरि राजवंश का चौथा राजा था। उसके पहले के तीन राजा अधिकतर उत्तर युगीन वैश्य मागध गुप्तों के सामंत नृपति रहे थे।ईशानवर्मा 554 ई. के आसपास राज्य करता था।

ईशानवर्मन ने वैश्य उत्तर गुप्तों का आधिपत्य कन्नौज से हटाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर ली थी।

उसकी प्रशस्ति में लिखा है कि- "उसने आन्ध्रों को परास्त किया और गौड़ों को अपनी सीमा के भीतर रहने के लिए मजबूर कर दिया। इसमें संदेह नहीं कि यह प्रशस्ति मात्र प्रशस्ति है, क्योंकि ईशानवर्मन् के आन्ध्रों अथवा गौड़ राजा के संपर्क में आने की संभावना अत्यंत कम थी।

गौड़ों और मौखरियों के बीच तो स्वयं उत्तर कालीन गुप्त ही थे, जिनके राजा कुमारगुप्त ने, जैसा कि उसके अभिलेख से विदित होता है, ईशानवर्मन को परास्त कर उसके राज्य का कुछ भाग छीन लिया था।

महाराजाधिराज की पदवी धारण करने वाला यह मौखरि राजा था।

NAGVANSH - नागवंश

NAGVANSH - नागवंश 

नागवंश प्राचीन काल का एक राजकुल था। इस वंश के कुछ सिक्कों पर बृहस्पति नाग, देवनाग और गणपति नाग नाम लिखे प्राप्त हुए हैं। नागवंश का शासनकाल 150 से 250 विक्रम संवत के मध्य जान पड़ता है। आर्य मंजुश्री कल्प ग्रन्थ में नाग जाति को वैश्य बताया गया हैं  वैश्य गुप्त वंश और वैश्य अग्रवंश से नागजाति का रोटी बेटी का रिश्ता रहा हैं.

प्राचीन काल में नागवंशियों का राज्य भारत के कई स्थानों में तथा सिंहल में भी था। पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि सात नागवंशी राजा मथुरा भोग करेंगे, उसके पीछे गुप्त राजाओं का राज्य होगा। नौ नाग राजाओं के जो पुराने सिक्के मिले हैं, उन पर 'बृहस्पति नाग', 'देवनाग', 'गणपति नाग' इत्यादि नाम मिलते हैं। ये नागगण विक्रम संवत 150 और 250 के बीच राज्य करते थे। इन नव नागों की राजधानी कहाँ थी, इसका ठीक पता नहीं है, पर अधिकांश विद्वानों का मत यही है कि उनकी राजधानी 'नरवर' थी। मथुरा और भरतपुर से लेकर ग्वालियर और उज्जैन तक का भू-भाग नागवंशियों के अधिकार में था।

पुराण उल्लेख

प्राचीन काल से ही भारत में नागों की पूजा की परंपरा रही है। माना जाता है कि 3000 ईसा पूर्व आर्य काल में भारत में नागवंशियों के कबीले रहा करते थे, जो सर्प की पूजा करते थे। उनके देवता सर्प थे। यही कारण था कि प्रमुख नाग वंशों के नाम पर ही जमीन पर रेंगने वाले नागों के नाम पड़े थे। पुराणों के अनुसार कश्मीर में कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें आठ पुत्र मिले थे, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार थे

-अनंत (शेषनाग)
वासुकी
तक्षक
कर्कोटक
पद्म
महापद्म
शंख
कुलिक

कश्मीर का अनंतनाग इलाका अनंतनाग समुदायों का गढ़ था। उसी तरह कश्मीर के बहुत सारे अन्य इलाके भी कद्रु के दूसरे पुत्रों के अधीन थे। कुछ अन्य पुराणों के अनुसार नागों के प्रमुख पाँच कुल थे- अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला। जबकि कुछ और पुराणों ने नागों के अष्टकुल बताये हैं- वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड़, महापद्म और धनंजय। अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। नागों का पृथक् नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असम, नागालैंड, मणिपुर, केरल और आंध्र प्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है। भारत में इन आठ कुलों का ही क्रमश: विस्तार हुआ, जिनके नागवंशी रहे थे- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादि।

अन्य तथ्यकृष्ण काल में नाग जाति ब्रज में आकर बस गई थी। इस जाति की अपनी एक पृथक् संस्कृति थी। कालिया नाग को संघर्ष में पराजित करके श्रीकृष्ण ने उसे ब्रज से निर्वासित कर दिया था, किंतु नाग जाति यहाँ प्रमुख रूप से बसी रही। मथुरा पर उन्होंने काफ़ी समय तक शासन भी किया।

नागसेन आदिनाग नरेश ब्रज के इतिहास में उल्लेखनीय रहे, जिन्हें गुप्त वंश के शासकों ने पराजित किया था। नाग देवताओं के अनेक मंदिर आज भी ब्रज में विद्यमान हैं।

इतिहास में यह बात प्रसिद्ध है कि महाप्रतापी गुप्तवंशी राजाओं ने शक या नागवंशियों को परास्त किया था। प्रयाग के क़िले के भीतर जो स्तंभलेख है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि महाराज समुद्रगुप्त ने गणपति नाग को पराजित किया था। इस गणपति नाग के सिक्के बहुत मिलते हैं।

महाभारत में भी कई स्थानों पर नागों का उल्लेख है। पांडवों ने नागों के हाथ से मगध राज्य छीना था। खांडव वन जलाते समय भी बहुत से नाग नष्ट हुए थे।

जनमेजय के सर्प-यज्ञ का भी यही अभिप्राय मालूम होता है कि पुरुवंशी आर्य राजाओं से नागवंशी राजाओं का विरोध था। इस बात का समर्थन सिकंदर के समय के प्राप्त वृत्त से होता है। जिस समय सिकंदर भारत में आया, तब उससे सबसे पहले तक्षशिला का नागवंशी राजा ही मिला था। उस राजा ने सिकंदर का कई दिनों तक तक्षशिला में आतिथ्य किया और अपने शत्रु पौरव राजा के विरुद्ध चढ़ाई करने में सहायता पहुँचाई। सिकंदर के साथियों ने तक्षशिला में राजा के यहाँ भारी-भारी साँप पले देखे थे, जिनकी नित्य पूजा होती थी। यह शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी। अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को 'नागभाषा' कहते हैं।