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Saturday, July 15, 2023

PORWAL PURWAR - पोरवालों पुरवारों की राष्ट्रीय एकता

PORWAL PURWAR - पोरवालों पुरवारों की राष्ट्रीय एकता

पोरवालों/पुरवारों की राष्ट्रीय एकता*- आज जब हम राष्ट्रीय समारोह/सम्मेलन की बात करते हैं, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और देश के अन्य दूसरे प्रांतों से सभी पुरवारों/पोरवालों को एक पताका, एक समारोह में आने की बात करते हैं तो हमें इसके इतिहास में जानना भी जरूरी हो जाता है।
सल्तनत काल और उसके बाद 14वीं शताब्दी में जब मुहम्मद तुगलक के आतंक और जबरन धर्म परिवर्तन के कारण पुरवारों/पोरवालों को अपना नगर त्यागना पड़ा तो वो पूर्व की तरफ अथवा अन्य स्थानों की ओर कूच कर गए। चूंकि मुसलमान आक्रमणकारियों का मुख्य आक्रमण शहरों पर होता था इसलिए उन्होंने गांवों को अपना आसरा बनाना सबसे ज्यादा अच्छा समझा और गांवों में बसे।

धीरे धीरे एक जगह से दूसरे जगह पुरवार/पोरवाल फैलते गए। उस समय यातायात और डाक के साधन आज की भांति नहीं थे। इसलिए उनमें आपस में संबंध भी धीरे धीरे टूटते गए। कालांतर में नाम में भी फर्क पड़ने लगा। पुरवार, पोरवाल, प्राग्वाट, पुरवाल इत्यादि नाम प्रचलन में आ गए। कहने का मतलब है कि विभिन्न स्थानों में रहने के कारण नाम और संपर्क दोनों में अंतर आ गया।
 
फिर ब्रिटिश शासन का आविर्भाव हुआ और सड़क, रेल इत्यादि के साधन सामने आए, डाक की व्यवस्था बनी। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को असभ्य करार दिए जाने के कारण भारतीयों का राष्ट्रीयता के प्रति नया आकर्षण पैदा हुआ और भारतीय विभूतियों ने देश के स्वर्णिम इतिहास की तरफ सबका ध्यानाकर्षण किया। साथ ही अंग्रेजों की जाति आधारित व्यवस्था जिसमें हरेक भारतीय को उसके जाति के साथ पहचान दी गई, का जाति के तरफ नया आकर्षण पैदा हुआ।
 
यहां यह बताना आवश्यक है कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज में पहले से ही थी, लेकिन जैसा कि समाजशास्त्रियों का विचार है, यह कोई ठोस ढांचा नहीं था और अक्सर छोटी जातियों को ऊंची जातियों में शामिल किया जाता रहता था। लेकिन अब अंग्रेज भारतीयों पर राज करने के लिए यहां के ढांचे को समझना चाहते थे तो उन्होंने प्राकृतिक रूप से ब्राह्मणों को इसका आधार बनाया। इस तरह से भारतीय समुदाय को बिल्कुल ठोस कंक्रीटनुमा जातियों में विभक्त कर दिया गया। हरेक जाति को जब पता चला कि उन्हें कागजों में ऊंचा और नीचा लिखा जाना है, सभी जातियां अपने आप को ऊंचे से ऊंचा दिखाना चाहती थीं (फणीश्वरनाथ जी की *मैला आंचल* में इसकी बानगी देखने को मिलती है)। इन कारणों से सभी जातियों ने अपने आपको ज्यादा से ज्यादा संगठित करना शुरू कर दिया। यही आश्चर्य की बात है कि ज्यादातर जातीय महासभाएं इसी दौरान बनी थीं, जैसे अ० भा० पुरवार पोरवाल महासभा का शताब्दी समारोह अभी 17 व 18 जून 2023 को मनाया गया है। यादव महासभा का शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है।

अपनी -२ जातीय महासभाओं को बनाने की स्थिति में पश्चिम उत्तर प्रदेश के बरनवालों ने सबसे पहले 1881 में मुरादाबाद के जरगांव में एक बैठक की और एक समिति गठित की। मुंशी तोताराम जी, मुरादाबाद ने बरनवाल उपकारक नाम की एक उर्दू पत्र का भी प्रकाशन किया। सन् 1895 में सहारनपुर में सम्मेलन हुआ और 1905 में वाराणसी में 26 और 27 दिसंबर को गौरीशंकर लालजी रईस, रसड़ा की अध्यक्षता में बरनवालों की बैठक हुई। अखिल भारतवर्षीय बरनवाल वैश्य सभा का जन्म भी इसी बैठक में हुआ था। यहीं से शुरू हुआ जातियों का अपनी -२ महासभाओं को बनाने का सिलसिला।

अब हम आते हैं अपनी- अखिल भारतीय पुरवार पोरवाल महासभा के निर्माण गाथा पर। यहां पर यह ज्ञातव्य हो कि यह महासभा पुरवार व पोरवाल दो थोकों से मिलकर बनी हुई है। पुरवार तीन थोकों में विभक्त थे- इटावा थोक, कालपी थोक और महोबा थोक। यह खामगांव, अमरावती, दमोह, सागर, राठ, महोबा, नागौद, पनगरा, सिलहरा, मंढी, जस़ो, लुहरगांव, कटनी, उरई, जालौन, औरैया, बकेबर, इलाहाबाद, कानपुर, सिरसागंज, बांदा आदि स्थानों पर रहते हैं, इन्हें खर्रौवा पुरवार भी कहते हैं। जबकि पोरवाल भरथना, फिरोजाबाद, आगरा, इटावा, बकेबर, लखना, औरैया, उरई, सिरसागंज, कानपुर, इलाहाबाद, फफूंद, महेबा मन्दिर, बसरेहर, अछल्दा, अजीतमल, बाबरपुर आदि स्थानों में रहते हैं।

इस स्थिति में खामगांव निवासी सेठ मोहनलाल, सेठ लक्ष्मीनारायण (बाबू सेठ) एवं अमरावती निवासी सेठ मोतीलाल ने मिलकर निश्चय किया कि खर्रौवा पुरवार समाज का एक सम्मेलन आयोजित करके उसे संगठन का रूप दिया जाये। इस कार्य हेतु इन लोगों ने अमरावती निवासी सेठ गोपीचरन, मास्टर जगन्नाथ प्रसाद, घासीराम आदि से चर्चा की। सहमति के बाद यह निश्चय किया गया कि सम्मेलन अमरावती (महाराष्ट्र) कराया जाये। समाज के प्रत्येक क्षेत्र व श्रेणी के लोगों ने इस सम्मेलन के प्रति उत्साह दिखाया। उदारवादी खर्रौवा पुरवारों की लगन और परिश्रम से अमरावती के श्रीबाला जी मंदिर के प्रांगण में इटौरा ( कालपी-उरई) के गुरू श्रद्धेय श्री 108 श्री चतुर्दश महन्त जी के विशेष आतिथ्य में 01 सितम्बर 1924 ई० को अ० भा० खर्रौवा पुरवार महासभा का प्रथम अधिवेशन संपन्न हुआ, जिसकी अध्यक्षता कालपी निवासी श्री कन्हैयालाल जी ने की। इस अधिवेशन में खर्रौवा पुरवारों के तीनों थोकों से आये हुए लगभग 80 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यद्यपि सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को आने जाने का व्यय देने का आयोजकों ने घोषणा की थी परन्तु किसी ने भी आने जाने का व्यय नहीं लिया। तीनों थोकों के प्रतिनिधियों ने अपने -2 विचार व्यक्त किए। अन्त में एकीकरण सम्भव हुआ। अधिवेशन के अन्त में तीनों थोकों के बीच रोटी-बेटी का सम्बन्ध बढा़ने का प्रस्ताव बहुत विरोधाभास के बाताबरण में इस संशोधन के बाद पारित हुआ कि अगले अधिवेशन में पुनः विचार किया जायेगा।

इस अधिवेशन में श्री कन्हैयालाल जी कालपी सभापति, उपसभापति- श्री बैजनाथ इटावा और श्री मोहनलाल खामगांव, प्रधानमंत्री- श्री घासीराम देवडिया अमरावती, कोषाध्यक्ष- श्री अन्या प्रसाद अमरावती, सहमंत्री- श्री गुलज़ारीलाल उरई, श्री रामसनेही दामोदरपुर, श्री देवीदीन राठ व श्रीलालचंद्र खामगांव चुने गए तथा कार्यकारिणी सदस्य 21 चुने गए। इस अधिवेशन में स्वजातीय पत्रिका *पुरवार जाति हितैषी* अमरावती से प्रारंभ हुई जिसके सम्पादक मा० जगन्नाथ प्रसाद नियुक्त हुए थे।

इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों के पुरवार/पोरवालों को ढूंढने और उन्हें शामिल करने का कार्य शुरू हुआ। सन् 1924 से लेकर आज 2023 तक कोई 100 वर्षों में एक जुट करने में कई चुनौतियां थीं। इसी बीच देश-प्रदेश के समस्त पुरवारों-पोरवालों का एक महासंघ के निर्माण हेतु दिनांक 26, 27 व 28 अगस्त 1989 को दिल्ली के पुरवाल समाज द्वारा एक समस्त भारत के पुरवार-पोरवालों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन बुलाया गया जिसमें अखिल भारतीय पोरवाल महासंघ का गठन किया गया। अब देश के सभी हिस्सों के पुरवार/पोरवाल एक और बराबर माने जाते हैं और अब तो हर जगह के पुरवार/पोरवालों के आपस में वैवाहिक संबंध होना सामान्य बात है। यह जरूर है कि अभी भी अपने क्षेत्र में ही वैवाहिक संबंध करने की इच्छा के कारण ऐसे संबंध कम ही नजर आते हैं।

पिछले 100 वर्ष में हम काफी आगे आए हैं। लेकिन इसे और भी आगे ले जाना अति आवश्यक है। वरना क्षेत्रीय भावनापरक हो कर टूट होना भी संभव है जो हमारे पूर्वजों की मेहनत पर और दूरदर्शिता पर पानी फेरने के समान होगा।
 
लेख साभार:- नवजीवन लाल गुप्ता, उरई
मोबाइल न०- 8604003303

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