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Tuesday, July 16, 2019

Anamika Jain Ambar (Poetess) - अनामिका जैन अम्बर




डॉ. अनामिका जैन अम्बर देश की विख्यात हिंदी कवयित्री हैं. हिंदी-उर्दू कवि सम्मेलन, मुशायेरे में उनका नाम इन दिनों सबसे ऊपर आता है. मौलिकता, कवित्व, चरित्र, सौम्यता, नैतिक मूल्यों के प्रति उनका समर्पण आदि उनकी प्रमुख विशेषताएं हैं. अनेक टीवी सीरियल्स में हिंदी कविता को समर्पित उनके काव्य पाठ आते रहते हैं. आइये जानते हैं कुछ देश की इस बड़ी कवयित्री के विषय में...

काव्य परिचय:

अनामिका जैन अम्बर बाल कवयित्री हैं. बचपन से ही उनको कविता लिखने एवं बोलने का शौंक था. उनकी कविता "शहीद के बेटे की दीपावली" से उन्हें खूब पहचान मिली. छोटी सी बच्ची जब काव्य मंचों से देश के सैनिकों का दर्द गाती थी तो सबकी आँखे नम हो जाया करती थी. इस कविता के बाद उनका लेखन दिन दुनी रात चौगुनी गति से बढ़ता गया. वर्तमान हिंदी काव्य मंचों पर मौलिकता की दृष्टि से सबसे ऊपर यदि किसी कवयित्री का नाम लिया जाता है तो वह निर्विवाद डॉ. अनामिका जैन अम्बर का नाम होता है. 

उनकी कुछ प्रमुख रचनाओ में

शहीद के बेटे की दीपावली

दामिनी (दिल्ली बलात्कार कांड पर आधारित कविता)

रुक्मणी (भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी के पत्नी अधिकार को लेकर लिखी कविता)

कंगना (बिटिया की विदाई पर)

महाराणी पद्मावती (पद्मिनी)

पी संग खेले होली रे...

आँखों के रस्ते मेरे दिल में समां गया...

पतझर में जो बसंत की बहार कर गए....

आँखों के इस कारोबार में....

अपने मोहन की मैं संवरी हो गई...

आओ झूमो नाचो गाओ....

बंद पिंजरे के कैद परिंदे....

आदि न जाने कितनी कवितायेँ उनकी कलम से निकली जिन्होंने उनकी जिव्हा से श्रोताओं के दिलों तक का सफ़र तय किया....


डॉ अनामिका अम्बर ने पहला मंच सन 1997 में चौदह वर्ष की अल्पायु में पढ़ा था. उसके बाद अनवरत उनकी काव्य यात्रायें जारी हैं. देश भर के बड़े मंचों पर उनको जनता का अपार नेह मिलता रहा है. कविता का उनके जीवन में इतना प्रभाव था की उन्होंने जीवनसाथी के रूप में भी हिंदी काव्य मंचों के लाडले कवि सौरभ जैन सुमन को अपना जीवन साथी चुना. 

माँ शारदे की कृपा स्वयं पर मानने वाली डॉ अनामिका अम्बर ने माँ को समर्पित "माँ शारदे वंदना" का ऐसा सृजन किया की यदि अब वह मंच पर हों तो सरस्वती वंदना करने का अवसर किसी अन्य को देना संचालक के लिए संभव ही नहीं हो पाता. माँ सरस्वती के 108 नामो को आधार बनाते हुए गढ़ी हुई स्तुति का कोई तोड़ नहीं है.

डॉ अनामिका जैन अम्बर के काव्य उपलब्धियों के विषय में जितना कहा जाए कम है...उनकी पहचान उनकी कविता है....उनकी शाश्वत प्रस्तुति है....उनकी वाक्पटुता, उनकी मुखरता, उनकी सादगी, उनकी कवितव् पर पकड़ है....

टीवी पर अनामिका:

यूँ तो अनेक चैनल डॉ अनामिका अम्बर की कविताओं को दिखाते रहते हैं किन्तु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

सब टीवी का प्रसिद्ध शो "वाह वाह क्या बात है"

जीवन परिचय:

डॉ अनामिका अम्बर का जन्म सन 1983 में बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के धनगौल ग्राम में हुआ. उनके पिता श्री उत्तम चंद जैन ललितपुर शहर के नामी वकील हैं. उनकी माता श्रीमती गुणमाला जैन गृहणी हैं. अनामिका की आरंभिक शिक्षा ललितपुर के कोंवेंट विद्यालय में हुई. एक ओर जहाँ उन्होंने लौकिक शिक्षा ग्रहण की वहीँ माता जी के धार्मिक संस्कार भी उनमे कूट कूट के समा रहे थे. बचपन से ही हिंदी के प्रति उनकी रूचि उन्हें हिंदी कविताओं की ओर खींचने लगी. उनको संगी साथी भी ऐसे ही मिल गए जो कविता के प्रति रुचिकर थे. उनका साथ अनामिका को और अधिक बल देने लगा. धीरे धीरे उनकी रूचि उनको हिंदी कविता के मंच तक ले आयी. बाल कवयित्री के रूप में उन्हें श्रोता मन से सुनने लगे. पारिश्रमिक के रूप में मिलने वाला बहुत थोडा मान उन्हें प्रेरक पुरस्कार सा लगने लगा.

बारवी कक्षा के बाद उनका चयन सी.पी.एम.टी. में हो गया. किन्तु पूरे खानदान में इकलौती बेटी होने के कारण परिवार ने उन्हें डाक्टरी की पढाई के लिए दूर भेजना उचित नहीं समझा इसलिए उन्होंने ग्वालियर के जीवाजी विश्व् विद्यालय से विज्ञान में स्नातक एवं परास्नातक पास किया. पढाई के प्रति उनकी निष्ठां उन्हें वाचस्पति की डिग्री की ओर ले गई. जीवाजी यूनिवर्सिटी से ही उन्होंने Ph.D. किया. 

इसी मध्य हिंदी काव्य मंचों के युवा कवि सौरभ जैन सुमन के साथ उनकी भेंट हुई. दोनों की जोड़ी को हिंदी मंचो पर पसंद किया जाने लगा. 6 वर्ष अनवरत उनके साथ कविता के मंच करने के बाद सन 2006 में दोनों ने घर वालों की सहमती से विवाह किया. उसके बाद हिंदी काव्य मंचों का प्रथम विख्यात कवियुगल होने का गौरव भी प्राप्त किया. यूँ तो कुछ और भी नाम ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी मंचों पर एक दुसरे को जीवन साथी के रूप में चुना है किन्तु सौरभ सुमन-अनामिका अम्बर में विशेष ये रहा की विवाह के उपरांत भी दोनों मंच पर अपनी प्रस्तुति देते रहे और सफलता के शिखर की ओर अग्रसित होते रहे. आज कवि सम्मेलनों के मंच पर एक मात्र युगल दंपत्ति के रूप में दोनों स्थापित हैं.


सौरभ-अनामिका के इस पुनीत युगल को दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम क्रमशः काव्य-ग्रन्थ रखा गया. दोनों बेटो में भी शुरू से कविता के गुण हैं. काव्य जहाँ छोटी सी आयु में शब्द संयोजन में विशेष रूचि रखता है वहीँ छोटा बेटा ग्रन्थ प्रस्तुति के मैदान में तेजी से आगे बढ़ रहा है. 

डॉ अनामिका अम्बर ने मेरठ में अपना एक निजी प्ले-स्कूल भी खोला हुआ है. जिसका सञ्चालन वह स्वयं करती हैं. लगातार बाहर रहने के कारण प्राचार्य एवं संचालक मंडल स्कूल देखता अवश्य है किन्तु व्यस्त रहते हुए भी अनामिका अपना पूरा समय स्कूल को देती हैं.

साभार: anamikajainambar.blogspot.com/2017/10/profile-anamika-jain-ambar-poetess.html

तेली साहू जाति की सामाजिक व्यवस्था

तेली साहू जाति की सामाजिक व्यवस्था


वैश्य समाज की घटक इकाइयों में यह सर्वाधिक प्राचीन इकाइयों में यह सर्वाधिक प्राचीन इकाइयों में से सर्वप्रथम नहीं तो प्रारंभिक एक - तो निविर्वाद रूप से है । समाज के आर्थिक स्वरूप के विाककास का इतिहास बतलाता है कि प्राकृतिक सम्पदा के रूप में तिल, सरसों आदि के वाणिज्यिक उपयोग (तेल - निर्माण) आदि की सर्वप्रथम शुरूआत को जिस जन - संवग्र ने की, वे ही तेली कहलाये इस तेल - निर्माण के बाद समाज के आर्थिक जगतृ में हचल - सी मच गयी फिर तो अन्य अनेक फल - बीजों से तेल निकाले जानें लगे । इसी परम्परा में गो - दुग्ध से घी से गोधूमचूर्ण (आटा), चनाचूर्ण (बेचन) आदि का मेल काराकर मिषन्नादि का निर्माण होने लगा और हलवा आदि बनाने वाले हलवाई सामने आये हलवाई मिष्ठान्न निर्माता तेलियो नेही तिल शक्कर गुड मिश्रित कर रेवडी बनाया जो एक नई मिठाई थी । पापडी का निर्माण भी इसी समय हुआ ।

राजाओं के विजयाभिमान पर निकलने वाले सौनिक - समूहों के कल्य (नाश्ता, कलेवा, भोजन ) आदि व्यवस्था करने वाले कल्यवाल (कलवार) उन्ही सैनिकों के लिए धातु - शुण्डों (पाइप) के सहारे विभिन्न अन्नों एवं फलों का आसवन कर शराब त्ेयार करने वाले शौण्डिक (सूंढी) आदि सामने आये रात मै प्रकाशार्थ तेल से मशाल प्रज्वलन कार्य और तत्पश्चात इनकी शाखा एवं उप-शाखाएं कर्म की विशेषता एवं स्थान - भेद के वैष्टिये से सामने आती चली गयी , आज इन्ही सभी शाखा उपशाखाओं के जन - सवर्ण के मेल से विशाल वैश्य समाज बना हुआ है ।

विशाल वैश्य - जन समुदाय की यह अतिप्राचीन इकाई (तैलिक जाति) संपूर्ण भारतवर्ष में विशाल आबादी के साथ फैली है । उत्तर भारत एवं मध्य एवं पूर्व भारत में इस जाति के लोग तेली, तैलिक, साहु,। शाह, साव, गुप्त प्रसाद, लाल राम, राठौर, विेषकर राजस्थान में श्रीवास्तव आदि उपनामों से जाने जाते है । दक्षिण भारत में गंडला, गनियाशा, घानीगार, चेट्टी, चेटिटयार आदि उपनामों से जाने जाते है । महाराष्ट्र में स्थानवाची उपनाम भी प्रचलित है । ईसा पूर्व 5 वी शती के आस-पास ब्राम्हण जाति और तेली जाति के सदस्यों के बीच वर्चस्व की जमकर लडाई चली । शास्त्राधार रखने और विभिन्न विधि शास्त्रादि में व्यास उवाज का समावेश कर अपने वर्चस्व को थोपने में कुशल कट्अरपाथी ब्राम्हण - वर्ग ने इस तैलिक जाति की समाजिक अवमानना के कुचक्र में सफलता पायी । फिर तो वह उपेक्षित ही होती चली गयी ।

डॉ. ए. एस. अल्टेकर ने तेली जाति का इतिहास में ही समप्रमाण दिखलाया है कि नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न तेली जाति के ही श्रेष्ठी-जन थे । ब्राम्हण धर्म के वर्चस्व के विरूद्ध उन्होनें ही बौद्ध धर्म को अश्रय दिया था । और उसके साहित्य के विशेष अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वप्न साकार किया था । आज भी नालंदा के खंडहरो से जहा बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित है, उसे तेलिया भंडार के रूप मे जाना जाता है । उस समय काल में निर्माण कार्य मे सहभागी होना महत्वपुर्ण है । अपने इसी त्यागी स्वाभिमानी एवं सहयोगी प्रवृत्ती ने तेली समाज को वह महत्वपुर्ण स्थापन दिलाया । जिसमे महाभारत कालीन तुलाधर है तो जनचेतना वाहक गुरू गोरखनाथ जी है । 

महान गुप्त वंश तो हमारे आधार पीढी है महाराज श्री. चेदिराज गांगेयदेव का पराक्रम अप्रतिम है माता कमा का आपने वर्ग नेतृत्व की क्षमता समाज हितकारी है । माता राजिम की भक्ति साधना वंदनीय है । हेमचंद हेमू विक्रमादित्य का भाग्य साथ देता तो भारतीय इतिहास बदल जाता । वीरांगणा ताई ने वीरता का प्रदर्शन कर कर्तवत्य निभाया चुनौती दी । संताजी जगनाडे महाराज का योगदान भक्मितगीतों अभंगो का भाषायी संशोधन संत साहित्य का धरोहर है । जन कवयित्री खगनिया जन - जन में प्रिय है ।

दानवीर भामाशाह की राष्ट्रभकित ने ही चितौंड का सम्मान ऊंचा किया । वर्तमान समय मैं सम्पूर्ण भारत में राषट्रीय संगठन क्रियाशील है शताब्दि वर्ष में समहित अखिल भारतीय साहू महासभा नई दिल्ली के निर्देशन में सभी प्रदेश स्जतरीय संगठन संचलित है । वही कुठ संगठन महात्वाकांक्षा से देश स्तरपर अखिल भारतीय तैलिक साहू वैश्य महासभा नई दिल्ली एवं तैलिक साहू राठौर चेतना मंच लखनऊ भी सामाजिक गतिविधियों के साथ सक्रिय है । 

साभार: teliindia.com/news.php

Friday, July 12, 2019

भारत में वैश्य समाज उच्च स्थान पर

वैश्य समाज का भारतीय राजनीति में सदा से ही उच्च स्थान रहा है । महाभारत कालीन मंत्रिमंडल में सर्वाधिक 21 मंत्रिपद वैश्यों के लिए, 4 मंत्री पद ब्राह्मणों के लिए, 8 मंत्रिपद क्षत्रियों के लिए और 4 मंत्रिपद शूद्रों के लिए थे । इसी से वैश्य समाज का राजनीतिक महत्व पता चलता है । भारत मे गांधी, लोहिया से लेके मोदी शाह और केजरीवाल तक भारतीय राजनीति को दशा और दिशा वैश्य समाज ने ही दी है । गुप्त वंश को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा गया है। आजादी के बाद से अभी तक वैश्यों ने राजनीति, पत्रकारिता, विज्ञान, उद्योग, शिक्षाविद, लेखक, चिकित्सक, सैन्य अधिकारी, दानदाता आदि अनेक पदों पर रहकर देश और समाज की सेवा की है।
जय महाराज अग्रसेन जय कुलदेवी महालक्ष्मी


राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

सेठ चुन्नामल की हवेली




SURYAVANSHI AGRAWAL VAISHYA - सूर्यवंशी अग्रवाल वैश्य समाज की विशेषताए


Wednesday, July 10, 2019

AGRABHAGWAT - 'अग्रभागवत'



प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं. रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2500 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का यह रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.

जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है? अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली, जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं.

आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुडी हुई. इस गांव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं. घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं. रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं. एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है. अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया, इसका कोई कारण उनके पास नहीं था. यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं. असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं. मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.

‘ब्रम्ह्कुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है. भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी. उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्ह्कुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है. हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्ह्कुंड दर्शन की..! वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्ह्कुंड पहुंच गए. दुसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ. रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्ह्सरोवर के तट पर एक वटवृक्ष हैं, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं. इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..! दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्ह्सरोवर के तट पर गये, तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी. रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपडे में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा, “जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.” वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१.

आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है, लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही... असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहां वे रुके थे. उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बांधकर रखे थे. इन पर कुछ भी नहीं लिखा था. एकदम कोरे..! इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं, इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी. अब इसका क्या करे..? उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गांव, आमगांव, लेकर आये. लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे. बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गांव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे. रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?” गुरु ने जवाब दिया, “तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.” अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए. रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..! उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.

कुछ दिन बीत गए. एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..! जहां पर पानी गिरा था, वहां पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..! उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा. अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था. कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए. अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया. यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था. यह काम कुछ वर्षों तक चला. जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया, तब समझ में आया, की भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं. लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था. उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ. पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय. इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.

रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई. इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ. ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए. इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की. यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया. इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी. आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं. रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.

यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं. जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..? इसका उपयोग कैसे किया जाता था..? कहां उपयोग होता था, इस तकनीक का..? भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं. ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.

मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था. यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं. इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था. उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था. फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बांधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था. यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे. भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था. भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं. लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं. भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है. परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पध्दतियां थी, जिनकी जानकारी मिली हैं. आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था. चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं. केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.

मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था. कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे. पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था. फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपडे में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे. और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी. बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे. काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है. आश्चर्य इस बात का हैं, की जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं. जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं. पानी से मिटती नहीं. उलटें, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं. इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था. यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे. अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा. इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं. उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ. लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूं कहे, "आजकल का शास्त्रशुध्द विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है. स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिध्द हो चुका है..! दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है. यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके.

साभार:Written by प्रशांत पोळ Taken from Desi CNN by Suresh Chiplunkar

गुप्तवंश के अग्रवाल वैश्य होने में प्रमाण

गुप्तवंश के अग्रवाल वैश्य होने में प्रमाण


1. चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती ने पूना अभिलेख में सम्राट को धारण गोत्रीय कहा है। और अग्रवालों के 18 में से एक धारण गोत्र है।

2. गुप्त वैश्यों की उपाधि है। आज भी वैश्य धार्मिक कर्म का संकल्प पढ़ते समय स्वयं को गुप्त कहते हैं। गुप्त शासकों के नाम समुद्र, चन्द्र, कुमार, स्कंद आदि थे और गुप्त इनका उपनाम था।

3. बौद्ध ग्रन्थ आर्य मंजूश्री मूलकल्प में गुप्तवंश को वैश्य बताया गया है।

4. इतिहासकार एलेन, अल्टेकर एवं आयंगर ने गुप्तवंश को वैश्य माना है परंतु कुछ षड्यंत्रकारी इतिहासकारों ने इनको जाट व शूद्र आदि बताया जबकि जाटों व शूद्रों दोनों का ही यग्योपवीत नहीं होता। गुप्त सम्राटों ने अश्वमेध आदि महान यज्ञ करवाए थे जो केवल द्विज (जनेऊधारी) करा सकते हैं। अग्रवालों का यग्योपवीत होता है इसलिए गुप्त वही हो सकते हैं। जिन इतिहासकारों ने गुप्तवंश को क्षत्रिय बताया है उससे भी इनका अग्रवाल नहीं होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि सर्वविदित है कि अग्रवाल प्राचीन क्षत्रिय जाति है जिसने कालांतर में वैश्यधर्म अपनाया।

5. प्रख्यात इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक जय यौधेय में अग्रवालों की प्राचीन भूमि अग्रोहा की कन्या दत्ता को गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त की पत्नी बताया है। व लिखा है कि समुद्रगुप्त के दूसरे पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का जन्म भी अग्रोहा में हुआ।

6. प्रसिद्ध इतिहासकार सत्यकेतु विद्यालंकार ने जायसवाल के मत का खंडन करते हुए गुप्तवंश को वैश्य सिद्ध किया है। वैश्यों में अग्रवाल सर्वप्रमुख जाति है जिसमें पूना अभिलेख वाला धारण गोत्र सम्मिलित है।

7. गुप्त शासक भानुगुप्त ने एरण शिलालेख सागर के पास लगवाया। एरण भी अग्रवालों के 18 गोत्रों में से एक है। अग्रवालों का एरण गोत्र मप्र के इस क्षेत्र में ज्यादा पाया जाता है मालवा तक। इसी एरण में नागजाति का शासन रहा और नागों से अग्रवालों का सम्बंध है क्योंकि महारानी माधवी नागवंशी थीं। आज भी अग्रवाल नागों को मामा मानते हैं।

8. अग्रवाल जाति हमेशा से प्रमुख रूप से वैष्णव जाति रही है। आज भी अधिकांश अग्रवाल वैष्णव होते हैं। गुप्त सम्राट इतिहास में परम वैष्णव शासक थे। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय, समुद्रगुप्त एवं स्कंदगुप्त ने विष्णुभक्त होने के कारण परमभागवत की उपाधि धारण की थी। इसलिए धार्मिक रूप से भी गुप्तवंश के अग्रवाल होने में कठिनाई नहीं है। जबकि जाट मुख्यरूप से शैव जाति रही है। चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती परम वैष्णव थी। वह अपनी राजधानी नन्दिवर्धन के समीप रामगिरि पर स्थापित श्रीराम पादुकाओं की भक्त थी। उससे विवाह के बाद शैव रुद्रसेन भी वैष्णव हो गया था।

9. चंद्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी यात्री फाह्यान भारत आया जिसने लिखा है कि, "गुप्त साम्राज्य में नीच चांडालों के अतिरिक्त न तो कोई जीवहिंसा करता है, न मदिरापान करता और न लहसुन प्यास खाता है।" अग्रवाल जाति में भी आजतक सामान्यतया मांसाहार, व प्याज लहसुन तक नहीं खाया जाता। अग्रवाल जाति की स्थापना के मूल में ही महाराजा अग्रसेन द्वारा जीवहिंसा का निषेध है। इसलिए यह प्राचीन जाति चरित्र गुप्त शासकों के अनुकूल ही है। जबकि जाटों में मांसाहार बहुतायत में पाया जाता है।

10. गुप्त साम्राज्य की मुद्राओं पर अग्रोहा की कुलदेवी महालक्ष्मी जी अंकित थीं।

11. गुप्तों का उदय गणराज्यों की शक्ति क्षीण होने के काल में हुआ। इन्हीं में से एक गणराज्य था यौधेय, जो 150 ई.पू. से 350 ईसवी तक उत्तरप्रदेश व राजस्थान के क्षेत्रों तक फैला हुआ था। इस द्वितीय रक्षापंक्ति के दो ही कार्य थे कृषि और युद्ध, इसलिए ये वैश्य और क्षत्रिय दोनों गुणों से परिपूर्ण थे व सिकन्दर से लेकर शकों, कुषाणों तक एक के बाद एक विदेशी हमलों का प्रत्युत्तर दे रहे थे। सभी इतिहासकार मानते हैं कि कुषाणों को पराजित करने वाले यौधेय ही थे। यौधेय गणराज्य के अंतर्गत हरियाणा का अग्रोहा अग्रवालों का उत्पत्ति स्थान है। गुप्त राजवंश भी लगातार शकों कुषाणों से लड़ता हुआ ही ऊपर उठा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश से इसका राज्य शुरू होता हुआ चंद्रगुप्त प्रथम के काल में मगध तक पहुंचा। राहुल सांकृत्यायन ने माना है कि समुद्रगुप्त की शक्ति अग्रोहा में यौधेयों के साथ हुई उसकी संधि व वैवाहिक सम्बन्ध के बाद बढ़ी। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि गुप्त वंश वैश्य था व यौधेय अग्रवाल जाति से सम्बंधित था।

साभार: - मुदित मित्तल, महामंत्री, राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

Wednesday, June 26, 2019

SAMANT GOEL - सामंत गोयल बने रॉ चीफ

सामंत गोयल बने रॉ चीफ, बालाकोट एयर स्ट्राइक में निभाई थी अहम भूमिका


बालाकोट एयर स्ट्राइक (balakot air strike) में अहम भूमिका निभाने वाले आईपीएस अधिकारी सामंत गोयल को देश की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ (RAW) का प्रमुख बनाया गया है। वहीं, आईपीएस अधिकारी अरविंद कुमार को इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी का निदेशक बनाया गया है।

दोनों ही 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को अहम जिम्मेदारी सौंपी है। सामंत गोयल मौजूदा रॉ चीफ अनिल कुमार धस्माना की जगह लेंगे, जो ढाई साल तक रॉ का शानदार नेतृत्व करने के बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं। गोयल पंजाब कैडर के 1984 बैच के अफसर हैं। 

1990 के दौर में जब पंजाब उग्रवाद की चपेट में था, तब सामंत गोयल ने सराहनीय कार्य करते हुए उग्रवाद के खिलाफ कई अभियान चलाए थे। बता दें कि सामंत गोयल ने ही 26 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में हुए एयर स्ट्राइक की प्लानिंग की थी। पुलवामा में आतंकियों ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया था, जिसमें 40 से ज्यादा जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद भारत ने बालाकोट एयर स्ट्राइक की थी और आतंकियों के ठिकानों को नेस्तनाबूत किया था। 


Monday, June 24, 2019

DINESH AGRAWAL - INDIAMART - दिल्ली का ऑनलाइन सदर बाजार

इंडियामार्ट / 40 हजार रुपए से बना डाला दिल्ली का ऑनलाइन सदर बाजार, अब है 430 करोड़ का कारोबार


नई दिल्ली. दिल्ली का सदर बाजार, उत्तर भारत का सबसे मशहूर थोक बाजार है। जहां सुई से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक थोक दाम पर मिलते हैं। जहां सैकड़ों नहीं, हजारों कारोबारी रोजाना व्यापार करने आते हैं। इस प्रकार के दूसरे बाजार की परिकल्पना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। लेकिन एक बीटेक ग्रेजुएट ने मात्र एक कंप्यूटर और 40,000 रुपए की पूंजी से ऑनलाइन सदर बाजार बना डाला। यहां 5 करोड़ से अधिक प्रोडक्ट का कारोबार होता है।

लाखों हैं रजिस्टर्ड विक्रेता

इस ऑनलाइन थोक बाजार में 6 करोड़ खरीदार तो 47 लाख रजिस्टर्ड विक्रेता हैं। इनमें से 10 लाख से अधिकत तो मैन्यूफैक्चरर्स हैं। इस बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) ऑनलाइन बाजार का नाम है इंडिया मार्ट। जहां वित्त वर्ष 2017-18 में 430 करोड़ रुपए का कारोबार किया गया। हम बात कर रहे हैं इसके संस्थापक एवं सीईओ दिनेश अग्रवाल की। कंपनी ने अपना आईपीओ भी लॉन्च कर दिया है, जो 26 जून तक खुला रहेगा।

हर सेकंड 20 क्रेता-विक्रेताओं का मिलन

अग्रवाल ने मनी भास्कर को बताया कि इंडियामार्ट के प्लेटफार्म पर हर सेकेंड 20 क्रेता-विक्रेताओं का मिलन (मैच) होता है। यानी एक दिन में यह आंकड़ा 20 लाख और हर महीने 4.5 करोड़ तक पहुंच जाता है। अग्रवाल ने बताया कि कंपनी में 3500 लोगों को डायरेक्ट रोजगार मिला हुआ है। राजनैतिक एवं कारोबारी घराने से ताल्लुक रखने वाले अग्रवाल ने कंप्यूटर साइंस में बीटेक की डिग्री ली है। अग्रवाल ने बताया कि उनके दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे और 1957 में बहराइच इलाके से एमएलए भी रहे। कानपुर से बीटेक की डिग्री लेने के बाद 1992-95 तक उन्होंने विदेश में नौकरी की। 1995 में भारत में इंटरनेट लॉन्च हुआ, तब वह अमेरिका में एचसीएल में नौकरी करते थे। लेकिन तभी उन्होंने सोच लिया था कि अब कारोबार करना है। अग्रवाल ने बताया कि 1996 में उन्होंने एक कंप्यूटर और 40,000 रुपए से इंडियामार्ट की शुरुआत की।

साभार : मनिभास्कर.कॉम 

Sunday, June 23, 2019

हिन्दू धर्म मे वैश्य समाज का योगदान


वैश्य समाज सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार व गौरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहा है । मनुस्मृति में वैश्य समाज के लिए वर्णित कर्तव्य अध्ययन, दान, व्यापार, पशु रक्षा व गौसेवा का पूरी तरह पालन कर रहा है । भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार, गौसेवा, धार्मिक एवं नैतिक साहित्य की अभिवृद्धि आदि पर वैश्य समाज के दान के प्रमुख बिंदु रहे हैं । उनकी सेवाओं का प्रसार मानव मात्र से लेकर पशु-पक्षियों, चर-अचर व सृष्टि के समस्त जीवों के लिए है ।

◆ हिन्दू ग्रंथों की प्राचीन पाण्डुलिपियों को खोज के उनका प्रकाशन

सन् 1923 में सेठ जी जयदयाल गोयन्दका और सेठ घनश्याम दास जालान ने गोरखपुर में गीता प्रेस की स्थापना की। इन्होंने प्राचीन हिन्दू ग्रंथों की अधिक से अधिक पुरानी प्रति खोज कर उसका प्रकाशन किया। इन्होंने संस्कृत और विभिन्न भाषायों के विद्वान लोगों को बुला के हर ग्रंथ का अनुवाद विभिन्न भाषायों में करके हिन्दू ग्रंथों का प्रचार प्रसार किया। 

1871 में सेठ गंगाविष्णु दास बजाज और खेमराज कृष्णदास बजाज ने वेंकेटेश्वर प्रेस की स्थापना की थी । जिसने भी हिन्दू ग्रंथों के प्रकाशन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

◆ पूरे भारत वर्ष में भव्य हिन्दू मंदिरों का निर्माण

"यह जाती अपनी उदारता और दानशीलता के कारण ब्राह्मणों की सच्ची हितैषी व हमारे समय में मंदिरों का निर्माण करने वाली मुख्य जाती थी ।" ~ W. Crook

800 वर्ष के दिल्ली पर मुग़लों और अंग्रेजों के शाशन के पश्च्यात 1938 में दिल्ली के पहले हिन्दू मंदिर (लक्ष्मी नारायण मंदिर) का निर्माण बिरला परिवार ने किया था। हिन्दू एकता के लिए खुद घनश्याम दास बिरला जी दलितों को साथ लेके मंदिर में गए। बिरला घराने ने पूरे भारत वर्ष में 20 भव्य हिन्दू मंदिरों का निर्माण किया था जिसमें ग्वालियर का सूर्यमंदिर, बनारस हिन्दू विश्वविधयालय परिसर में बना काशी विश्वनाथ मंदिर, हैदराबद का राधा कृष्ण मंदिर आदि हैं।

गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग कहा गया है । उसने भारत वर्ष में कई भव्य और विशाल मंदिरों का निर्माण किया था।जिनमें देवगढ़ का दशावतार मंदिर, कानपुर का भितराओं मंदिर आदि हैं।

◆ राम जन्मभूमि आंदोलन में वैश्य समाज की भूमिका

अयोध्या जन्मभूमि आंदोलन विहिप अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल जी के नेतृत्व में शुरू हुआ। उन्होंने भारतवर्ष में यात्रा करके चारों शंकराचार्यों, अनेकों साधु-संतों का आशीर्वाद लेकर और समस्त सनातनी समाज को एकजुट किया। जन्मभूमि के लिए आंदोलन चलाया और कई बड़ी रैलियां की पूरे देश मे। ये आंदोलन के दौरान पुलिस की लाठीचार्ज की वजह से घायल भी हुए ।

रामजन्मभूमि आंदोलन में अनेको वैश्यों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और अपनी जान की आहूति भी दी। कलकत्ता से दो मारवाड़ी युवक भाई राम कोठारी और शरद कोठारी पैदल चल के अयोध्या पहुंचे और रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए बलिदान दिया।

◆ जजिया कर से हिंदुओं की रक्षा 

मुग़लों के काल में हिंदुओं पे जजिया कर लगाया गया था। सिर्फ हिन्दू होने की वजह से उनसे भारी कर लिया जाता था जो की आम आदमी चुकाने में समर्थ नहीं था। इतिहास में प्रसंग है की तब ग्राम के नगरसेठ पूरे ग्राम का जजिया कर भर देते थे जिससे उन्हें मुग़लों के अत्याचार से बचाया जा सके।

राजा रतन चंद सय्यद बंधुओं के दीवान और मित्र थे। ये अग्रवाल परिवार से थे। इनकी गिनती सय्यद बंधुओं के साथ मुग़ल साम्राज्य के किंगमेकर में होती थी। मुग़ल काल में हिंदुओं को शाशन में उचित पद नहीं मिलते थे तब इन्होंने हिंदुओं की शिक्षा व्यवस्था में ध्यान दिया और उन्हें शाशन में ऊंचे पद दिलवाए। इन्होंने अपने समय में हिंदुओं पर से जजिया कर हटवा दिया था ।


वैश्य समाज सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार व गौरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहा है । मनुस्मृति में वैश्य समाज के लिए वर्णित कर्तव्य अध्ययन, दान, व्यापार, पशु रक्षा व गौसेवा का पूरी तरह पालन कर रहा है । भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार, गौसेवा, धार्मिक एवं नैतिक साहित्य की अभिवृद्धि आदि पर वैश्य समाज के दान के प्रमुख बिंदु रहे हैं । उनकी सेवाओं का प्रसार मानव मात्र से लेकर पशु-पक्षियों, चर-अचर व सृष्टि के समस्त जीवों के लिए है ।

◆ गौवंश की रक्षा में वैश्य समाज की भूमिका

गौवंश की रक्षा में अग्रवालों के नवरत्न लाला हरदेव सहाय का नाम अग्रणी रूप से लिया जाना चाहिये। इन्होंने गौवंश की रक्षा के लिए 1954 में गौधन नाम से पत्रिका की शुरुवात की। लाला जी को तथ्यों के साथ पता लगा कि पंजाब व राजस्थान से भारी संख्या में गाय बैलों की तस्करी कर उन्हें पाकिस्तान के कसाईखानों में भेजा जाता है। इस जानकारी ने उन्हें उद्वेलित कर दिया। लाला जी ने 31 जुलाई 1956 को प्रतिनिधि मंडल के साथ राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से भेंट कर उन्हें गायों की तस्करी कर पाकिस्तान ले जाए जाने तथा देशभर में प्रतिदिन लाखों गायों की हत्या किए जाने की जानकारी दी। प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से खादी कमीशन की तरह गोरक्षा के लिए अलग से संवैधानिक बोर्ड का गठन कर देश भर में गोहत्या पर रोक लगाने का मार्ग प्रशस्त किए जाने का सुझाव दिया।

सेठ रामकृष्ण डालमिया अनन्य गौभक्त थे। सन् 1978 में गौहत्या के विरोध के लिए आमरण अनशन किया और अनशन के दौरान ही अपनी जीवन लीला समाप्त की।

◆ सात्विक भोजन के प्रचार-प्रसार में वैश्य समाज की भूमिका

"वैश्य युगांतर से ही मांसभक्षण के विरोधी रहे और आज भी अधिकांश वैश्य परिवारों में मांस भक्षण नहीं पाया जाता।" ~ जातिभास्कर, पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र

अग्रवालों के पूर्वज महाराज अग्रसेन ने अपने राज्य में पशुबलि निषेध की थी। उन्होंने अपने राज्य में शाकाहारी भोजन एवं नियम से रहन-सहन का कानून बनाया। अग्रवाल समाज उन्ही के पदचिह्न पर चलके सात्विक भोजन का प्रचार-प्रसार करता है।

हिन्दू जाग्रति का शंखनाद करने वाले तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन करने वाले श्री अयोध्या प्रसाद गोयल जी के पिता श्री रामशरणदास जी ने भी जेल में रहकर ६ माह तक केवल नमक को पानी में घोलकर रोटी इसलिये खाई, क्योंकि जेल में मिलने वाली सब्जी में प्याज रहता है था, उनके मौन सत्याग्रह की आखिर में विजय हुई तथा बिना प्याज की सब्जी इनके लिये अलग से बनने की जेल अधिकारियों ने मंजूरी दी।

◆ वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा

★ महाराज अग्रसेन ने अपने नगर अग्रोहा में बसने वाले नए शख्श के लिए एक निष्क और एक ईंट हर परिवार से देने का नियम बनाया था। ताकि अग्रोहा में आने वाले हर शख्श के पास व्यापार के लिए पर्याप्त पूंजी हो और वो अपना घर बना सके।

★ जगतसेठ भामाशाह महाराणा प्रताप के सलाहकार, मित्र व प्रधानमंत्री थे। इन्होंने हिन्दवी स्वराज के महाराणा प्रताप के सपने के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था । जिसके बाद महाराणा ने एक के बाद एक किले फतेह किये ।

★ एक घटना है जब गुरुगोविंद सिंहः के बच्चो की मुसलमानो ने निर्मम हत्या कर दी, मुसलमान यह दवाब डाल चुके थे, के उनका दाह संस्कार भी नही होने देंगे !! सभी सिख सरदार भी बस दूर खड़े तमाशा देख रहे थे !!

तब एक हिन्दू बनिया टोडरमल जी आगे आये, उन्होंने जमीन पर सोने के सिक्के बिछाकर मुसलमानो से जमीन खरीदी , जिन पर गुरु गोविंद सिंह के बच्चो का दाह संस्कार हो सके !!

आज उनकी कीमत लगभग 150 से 180 करोड़ रुपये तक बेठती है !!

★ बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के निर्माण के समय महामना मदन मोहन मालवीय सेठ दामोदर दास राठी जी से मिले थे। उस समय सेठ जी ने BHU के निर्माण के लिए महामना को 11000 कलदार चांदी के सिक्कों की थैली भेंट की जिसकी कीमत आज 1 हज़ार करोड़ रुपये बैठती है।

★ आजादी के दीवानों में वैश्य समाज के सेठ जमनालाल बजाज का नाम अग्रणी रूप में लिया जाना चाहिए !!

यह रहते महात्मागांधी के साथ थे, लेकिन मदद गरमदल वालो की करते थे ! जिससे हथियार आदि खरीदने में कोई परेशानी नही हो !!

इनसे किसी ने एक बार पूछा था, की आप इतना दान कैसे कर पाते है ?

तो सेठजी का जवाब था ---मैं अपना धन अपने बच्चो को देकर जाऊं, इससे अच्छा है इसे में समाज और राष्ट्र के लिए खर्च कर देवऋण चुकाऊं ।

आज भी अगर आप गांवो में जाये, तो ना जाने कितनी असंख्य धर्मशाला, गौशाला, शिक्षण संस्थान बनियो ने समाज को दान करी है !

जय कुलदेवी महालक्ष्मी जय महाराज अग्रसेन जय महेश

साभार: प्रखर अग्रवाल इ की फेसबु वाल से साभार 



Wednesday, June 19, 2019

"असम के रूपकुंवर जिन्हें मारवाड़ी समाज से ज्यादा असम का समाज अपना मानता है"

"असम के रूपकुंवर जिन्हें मारवाड़ी समाज से ज्यादा असम का समाज अपना मानता है"


रूपकुंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाल एक बहुआयामी और विलक्षण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। उनकी महानता, लोकप्रियता और व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए राज्य की एक लोकप्रिय पत्रिका ने एक हजार साल के दस 'सर्वश्रेष्ठ असमिया' में उन्हें भी स्थान दिया है। ज्योतिप्रसाद का शुभ आगमन उस सन्धिक्षण में हुआ जब असमिया संस्कृ्ति तथा सभ्यता अपने मूल रूप से विछिन्न होती जा रही 

थी। प्रगतिशील विश्व की साहित्यिक और सांस्कृ्तिक धारा से असम का प्रत्यक्ष संपर्क नहीं रह गया था। यहां का बुद्धिजीवी वर्ग अपने को उपेक्षित समक्षकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो रहा था। उन दिनों भारतीय साहित्य, संस्कृ्ति, कला और विज्ञान आदि क्षेत्रों में एक अभिनव परिवर्तन आने लगा था, परन्तु असम ऎसे परिवर्तन से लाभ उठाने में अक्षम हो रहा था। इसी काल में ज्योति प्रसाद ने अपनी प्रतिभा से, असम की जनता को नई दृष्टि देकर विश्व के मानचित्र पर असम के संस्कृ्ति को उजागर कर एक ऎसा कार्य कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी उन दिनों कोई नहीं कर सकता था।

जिन महानुभावों के अथक प्रयासों से असम ने आधुनिक शिल्प-कला, साहित्य आदि के क्षेत्र में प्रगति की है, उनमें सबसे पहले ज्योतिप्रसाद का ही नाम गिनाया जायेगा। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मारवाड़ी समाज से कहीं ज्यादा असमिया समाज उन्हें अपना मानता है। "रूपकुंवर" के सम्बोधन से ऎसा मह्सूस होता है कि यह किसी नाम की संज्ञा हो, यह शब्द असमिया समाज की तरफ से दिया गया सबसे बड़ा सम्मान का सूचक है जो असम के अन्य किसी भी साहित्यकार को न तो मिला है और न ही अब मिलेगा।

अठारहवीं शताब्दी में राजस्थान के जयपुर रियासत के अन्तर्गत "केड़" नामक छोटा सा गांव (वर्तमान में झूंझूंणू जिला) जहां से आकर इनके पूर्वज - केशराम, कपूरचंद, चानमल, घासीराम 'केडिया' किसी कारणवस राजस्थान के ही दूसरे गांव 'गट्टा' आकर बस गये, फिर वहां से 'टांई' में अपनी बुआ के पास बस गये और वाणिज्य-व्यापार करने लगे। सन् 1820-21 के आसपास यह परिवार चूरू आया। परिवार में कुल 4 प्राणी - 10 वर्ष का बालक नवरंगराम, माता व दो छोटे भाई, पिता का साया सर से उठ चुका था। बालक नवरंगराम की उम्र जब 15-16 साल की थी तब उन्हें परदेश जाकर कुछ कमाने की सूक्षी सन् 1827-28 में ये कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, बंगाल होते हुये असम में विश्वनाथ चारिआली नामक स्थान पर बस गये और रतनगढ़ के एक फर्म 'नवरंगराम रामदयाल पोद्दार' के यहां बतौर मुनिम नौकरी की। सन् 1932-33 के आसपास नौकरी छोड़कर " गमीरी " नामक स्थान पर आ अपना निजी व्यवसाय आरंभ कर दिये और यहीं अपना घर-बार बसा कर स्थानिय असमिया परिवार में कुलुक राजखोवा की बहन सादरी से विवाह कर लिया। सादरी की अकाल मृ्त्यु हो जाने के पश्चात उन्होंने पुनः दूसरा विवाह कलंगपुर के चारखोलिया गांव के लक्ष्मीकांत सैकिया की बहन सोनपाही से किया। सादरी से दो पुत्र - हरिविलास (बीपीराम) एवं थानुराम तथा सोनपाही से काशीराम प्राप्त हुये। हरिविलास धार्मिक प्रवृ्ति के व्यक्ति थे। इन्होंने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी थी जो असमिया साहित्य में एक मूल्यवान दस्तावेज के रूप में मौजूद है।

ज्योतिप्रसाद का जन्म 17 जून 1903 को डिब्रुगढ़ जिले में स्थित तामुलबारी चायबागान में हुआ। बहुमुखी प्रतिभा के धनी ज्योतिप्रसाद अगरवाल न सिर्फ एक नाटककार, कथाकार, गीतकार, पत्र संपादक, संगीतकार तथा गायक सभी कुछ थे। मात्र 14 वर्ष की उम्र में ही 'शोणित कुंवरी' नाटक की रचना कर आपने असमिया साहित्य को समृ्द्ध कर दिया। 1935 में असमिया साहित्यकार लक्ष्मीकांत बेजबरूआ के ऎतिहासिक नाटक ' ज्योमति कुंवारी' को आधार मानकर प्रथम असमिया फिल्म बनाई। वे इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथाकार, सेट डिजाइनर, संगीत तथा नृ्त्य निर्देशक सभी कुछ थे। ज्योति प्रसाद ने दो सहयोगियों बोडो कला गुरु विष्णु प्रसाद सभा (1909-69) और फणि शर्मा (1909-69) के साथ असमिया जन-संस्कृ्ति को नई चेतना दी। यह असमिया जातिय इतिहास का स्वर्ण युग है। ज्योतिप्रसाद की संपूर्ण रचनाएं असम की सरकारी प्रकाशन संस्था ने चार खंडों में प्रकाशित की है। उनमें 10 नाटक और लगभग अतनी ही कहानियां, एक उपन्यास,20 से ऊपर निबंध, तथा 359 गीतों का संकल्न है। जिनमें प्रायः सभी असमिया भाषा में लिखे गये हैं तीन-चार गीत हिन्दी और कुछ अंग्रेजी मे नाटक भी लिखे गये हैं। असम सरकार प्रत्येक वर्ष 17 जनवरी को ज्योतिप्रसाद की पुण्यतिथि को शिल्पी दिवश के रूप में मनाती है। इस दिन पूरे असम प्रदेश में सार्वजनिक छुट्टी रहती है। सरकारी प्रायोजनों के अतिरिक्त शिक्षण संस्थाओं में बड़े उत्साह से कार्यक्रम पेश किये जाते हैं। जगह- जगह प्रभात फेरियां निकाली जाती है, साहित्यिक गोष्ठियां आयोजित की जाती है। आजादी की लड़ाई में ज्योतिप्रसाद के योगदानों की चर्चा नहीं की जाय तो यह लेख अधुरा रह जायेगा इसके लिये सिर्फ इतना ही लिखना काफी होगा कि आजादी की लड़ाई में जमुनालाल बजाज के पहले इनके योगदानों को लिखा जाना चाहिये था। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक आपने नाटक, गीत, कविता, जीवनी, शिशु कविता, चित्रनाट्य, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि के माध्यम से असमिया भाषा- साहित्य और संस्कृ्ति में अतुलनीय योगदान देकर खुद तो अमर हो गये साथ ही मारवाड़ी समाज को भी अमर कर गये।

असम के एक कवि #शंकरलाल_पारीक ने अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोया है रूपकुंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला को :

असम मातृ के आंगन में, जन्म हुआ ध्रुव-तारे का;
नाम था उसका 'ज्योतिप्रसाद'
यथा नाम तथा गुण का, था उसमें सच्चा प्रकाश
जान गया जग उसको सारा
गीत रचे और गाये उसने, नाटक के पात्र बनाये उसने; जन-जन तक पहुंचाये उसने,
स्वतंत्रता की लड़ी लड़ाई, घर-घर अलख जगाई
असम की माटी की गंध में, फूलों की सुगंध में
लोहित की बहती धारा की कल-कल में, रचा-बसा है नाम 'ज्योति' का
असम संस्कृ्ति को महकाने वाला, आजादी का बिगुल बजाने वाला।
#अग्रवाल_गौरव
साभार: प्रखर अग्रवाल की फसेबूक वाल से

पहली बार प्रमुख पद वैश्य समाज के पास

इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है. भारत के संविधान में तीन प्रमुख पद हमारे वैश्य समाज के पास हैं. बहुत बहुत बधाई.

१. प्रधानमंत्री: श्री नरेन्द्र मोदी जी, मोध मोदी वनिक वैश्य


२. गृह मंत्री : श्री अमित शाह जी, खडायत वनिक वैश्य



३. लोकसभा अध्यक्ष : श्री औम बिरला जी, माहेश्वरी वैश्य

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४. रेल मंत्री : पियूष गोयल जी, अग्रवाल वैश्य
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५. स्वास्थय मंत्री : श्री हर्षवर्धन जी. अग्रवाल वैश्य
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६. श्री रामेश्वर तेली जी, तैलिक वैश्य
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Tuesday, June 18, 2019

OM BIRLA - ओम बिरला, नये लोकसभा अध्यक्ष

अनुभव पर मोदी ने युवा जोश को दी तरजीह, ओम बिड़ला होंगे लोकसभा के नए स्पीकर


राजस्थान के बूंदी से सांसद ओम बिड़ला लोकसभा के नए अध्यक्ष होंगे। सारे पूर्वानुमानों और अटकलों पर विराम लगाते हुए पीएम मोदी ने लोकसभा के नए स्पीकर के मामले में अनुभव पर ऊर्जावान युवा चेहरे को तरजीह दी है। नाम तय होने के बाद बिड़ला ने मंगलवार को स्पीकर पद के लिए नामांकन भर दिया। उन्हें राजग में शामिल दलों के अलावा वाईएसआर कांग्रेस, बीजेडी (कुल 10 दलों) का समर्थन हासिल हुआ। संभावना है कि बिड़ला बुधवार को निर्विरोध स्पीकर चुन लिये जाएंगे।

56 वर्षीय बिड़ला का नाम बतौर स्पीकर सोमवार देर रात तक चली भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में तय किया गया। बूंदी से दूसरी बार सांसद बिड़ला इससे पहले तीन बार राजस्थान विधानसभा केसदस्य रह चुके हैं। विधायक रहते हुए उन्होंने संसदीय सचिव की जिम्मेदारी संभाली थी। जबकि सांसद रहते बीती लोकसभा में कई संसदीय समितियों में शामिल रहे थे। 

बिड़ला वैश्य बिरादरी के है, और राज्य में वसुंधरा विरोधी खेमे के हैं। जीएसटी लागू होने के बाद यह बिरादरी भाजपा से नाराज थी। हालांकि लोकसभा चुनाव में यह बिरादरी पार्टी के खिलाफ खड़ी नहीं हुई। इसके अलावा बिड़ला वसुंधरा विरोधी खेमे से हैं। इससे पहले उनके विरोधी खेमे के अर्जुन मेघवाल और गजेंद्र सिंह शेखावत को मंत्री बनाया जा चुका है। जबकि कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की तैयारी की जा रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा राजस्थान में नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने में जुट गई है।

भाजपा सूत्रों का कहना है कि स्पीकर उम्मीदवार बनाने में बिड़ला की निर्विवाद छवि और काम पर ध्यान केंद्रित रह कर विवाद से दूर रहने की रणनीति काम आई। वैसे भी पीएम ने बीते हफ्ते आयोजित संसदीय दल की बैठक में साफ कर दिया था कि जिम्मेदारी देने केमामले में वरिष्ठता की जगह गुणवत्ता, निपुणता और तत्परता को मापदंड बनाया जाएगा।

साभार: अमरउजाला 

Sunday, June 16, 2019

प्रेमलता अग्रवाल: जिनके हौसलों के आगे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी छोटी पड़ गई

प्रेमलता अग्रवाल: जिनके हौसलों के आगे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी छोटी पड़ गई

premlata-agarwal-the-first-indian-woman-to-conquer-the-top-peaks-of-seven-summits Premlata Agarwal: The First Indian Woman To Conquer The Top Peaks of Seven Summits


किसी भी मंजिल को पाने के लिए आपका जूनून ही आपकी तरक्की की ऊंचाई तय करता है. अगर आपके दिल में अपने सपनों तक पहुंचने का हौसला नहीं है, तो सपने देखने का कोई मतलब नहीं बनता.

आज हम इस लेख में ऐसी महिला की बात करेंगे, जिन्होंने सपने देखे और उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान एक कर दिया.

उनके हौसले के आगे विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी छोटी पड़ गई. आज इनकी उम्र 55 साल हो चुकी है.

ये भारत की पहली महिला हैं, जिनके नाम 50 साल की उम्र में विश्व के सात सर्वोच्च शिखरों को फतह कर उन पर तिरंगा फहराने का रिकॉर्ड है. साथ ही ये भारत की सबसे उम्रदराज महिला पर्वतारोही भी रही हैं.

इन्होंने 2011 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह किया. जी हां! हम बात कर रहे हैं प्रेमलता अग्रवाल की.

आइए जानते हैं इस पर्वतारोही की रोमांचित कर देते वाली कहानी –
एक क्षण में बदल गया जीवन का नजरिया

1963 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के एक छोटे से गांव सुखिया पोखरी में पैदा हुईं प्रेमलता के पिता रामअवतार एक बिजनेसमैन थे. पढ़ाई सामान्य बच्चों की तरह हुई और शुरुआती जीवन भी काफी साधारण रहा. 

स्कूल के दिनों में भी उन्होंने कुछ खास खेलों में हिस्सा नहीं लिया था, सिवाय रनिंग के. महज हायर सेकेंडरी शिक्षा हासिल करने के बाद बहुत कम उम्र में उनकी शादी विमल अग्रवाल से कर दी गई, जो कि पेशे से एक पत्रकार थे.

फिर 18 साल की उम्र में ही वह दो बेटियों की मां बन गईं. शुरुआत से लेकर अब तक हर चीज साधारण तरीके से ही चल रही थी. प्रेमलता के पति और बेटियों ने उस समय सोचा भी नहीं होगा कि आगे आने वाले समय में उनकी पति व मां वो कारनामा कर दिखाएंगी कि उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा.

प्रेमलता के जीवन में बदलाव उनकी उम्र के 35वें साल में आया. इसकी शुरुआत एक वाकिये से हुई, जब प्रेमलता अपनी बेटी को जे.आर.डी. टाटा स्पोर्ट्स काॅम्पलेक्स जमशेदपुर में टेनिस की ट्रेनिंग के लिए लेकर गई थीं.

यहां उन्होंने नोटिस बोर्ड पर डालमा हिल ट्रेक का एक नोटिस लगा देखा, जिसे टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया गया था. इसे देखकर वह काफी प्रभावित हुईं और उनके मन में इस आयोजन का हिस्सा बनने का खयाल आया.

Premlata Agarwal Saluting heros of Our Independence. (Pic: )

बछेंद्री पाल ने दिखाया नया रास्ता

जिसके बाद प्रेमलता ने इस ट्रेक में हिस्सा और 500 प्रतिभागियों में से तीसरा नंबर हासिल किया. उनकी इस जीत के लिए उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित किया जाना था. जिसके लिए वह टीएसएएफ कार्यालय पहुंचीं.

यहां उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया.

इस दौरान प्रेमलता ने कार्यालय में लगी लेजेंडरी पर्वतारोही बछेंद्री पाल की ढेरों तस्वीरों को देखा, जो उन्होंने पर्वतारोहन के दौरान ली थीं. इन तस्वीरों को देख प्रेमलता इस कदर प्रभावित हुईं कि उन्होंने फैसला कर लिया कि वह अपनी बेटी को एडवेंचर स्पोर्टस में शामिल कराएंगी.

इसके बाद वह सीधे बछेंद्री पाल के ऑफिस मिलने चली गईं और उनसे इस बारे में बात की. प्रेमलता की बातों को सुनने के बाद बछेंद्री पाल ने उन्हें कहा कि अपनी बेटी की बजाए आप खुद क्यों नहीं इसे ज्वाइन करतीं.


Premlata is The First Indian Woman To Conquer The Top Peaks of Seven Summits. (Pic: )

खुद से पहले परिवार को दी तवज्जो 

बछेंद्री पाल की यह बात सुनकर प्रेमलता ने झट से इसके लिए हां कर दी और उनके प्रशिक्षण के अधीन साल 2000 तक उन्होंने अपना बुनियादी पर्वतारोहण पाठ्यक्रम पूरा कर लिया.

प्रशिक्षण खत्म करने के बाद प्रेमलता अपने पहले अभियान के तहत साल 2004 में बछेंद्री पाल के साथ नेपाल की आइसलैंड पीक पर गईं. इसके बाद 2008 में उन्होंने साउथ अफ्रिका के माउंट किलिमेनजारो की ट्रेकिंग की.

धीरे-धीरे पर्वतारोहण उनका जुनून सा बन गया और वह इसमें काफी अच्छी भी हो गईं.

उनकी इस काबिलियत को देखकर बछेंद्री पाल ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करनी चाहिए. असल में एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए जो कुछ भी गुण एक पर्वतारोही में होने चाहिए, वह सब उनमें मौजूद हैं.

यहां तक कि अगर प्रेमलता माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए हां कहतीं, तो टाटा स्टील की और से उन्हें स्पोंसरशिप भी दी जाती. लेकिन प्रेमलता ने इस चुनौती को कुछ समय के लिए टालने का फैसला किया.

क्योंकि वह इस बारे में अपने परिवार से विचार-विमर्श करना चाहती थीं.

Premlata Agarwal at Mount McKinley USA. (Pic: )

जिम्मेदारियां निभाने के बाद शुरू किया सफर

फैसला लेने में उन्हें पूरे पूरे 2 साल का समय लगा. इस बीच उन्होंने अपनी बड़ी बेटी की शादी कर दी और छोटी बेटी को पढ़ाई के लिए आगे भेजा.

परिवार की सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद प्रेमलता ने इस बारे में अपने पति विमल से बात की, जिस पर उन्होंने हां में सर हिलाते हुए कहा कि अगर बछेंद्री पाल को लगता है कि तुम ये कर सकती हो, तो तुम्हें जरूर जाना चाहिए.

यहां तक कि इस फैसले में प्रेमलता के सास-ससुर ने भी उनका समर्थन किया था.

आखिरकार, अपनी उम्र के 48वें साल में बछेंद्री पाल के विश्वास के सहारे प्रेमलता ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जाने का अपना प्रशिक्षण शुरू कर दिया.

इस प्रशिक्षण को पूरा करने के बाद प्रेमलता ने अपनी टीम के साथ 25 मार्च को नेपाल के काठमांडू से इस अभियान की शुरूआत कर दी.

शुरुआत में तो सब ठीक रहा, मगर जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई, वैसे-वैसे वातावरण का बदलाव अपना असर दिखाने लगा. उम्रदराज होने के कारण प्रेमलता को सबसे अधिक दिक्कत पेश आ रही थी. इस दौरान उनके पांव में तेज दर्द होने लगा.

ये तो सिर्फ शुरूआत थी, आगे और भी कठिन हालात इनका इंतजार कर रहे थे. 

Premlata Agarwal at Mount Everest NEPAL. (Pic: )

दिक्कतों के बावजूद नहीं मानी हार

प्रेमलता इतनी कमजोर नहीं थीं कि शुरूआत में ही हार मान बैठें. उनका हौसला अडिग था, और दर्द के बावजूद वह लगातार आगे बढ़ती रहीं. इस बीच उनके साथ चल रही पर्वतारोही ने उन्हें बार-बार कहा कि उनकी उम्र ऐसी नहीं है कि वह इस तरह का वातावरण झेल सकें.

इसलिए उन्हें वापस चले जाना चाहिए. इस बीच उनका एक दस्ताना भी कहीं गिर गया. ऐसे में वह ठंड का शिकार हो सकती थीं. सभी ने उन्हें वापस चले जाने का सुझाव दिया. लेकिन उन्होंने किसी की एक न मानी.

यहां-वहां ढूंढने पर उन्हें अपना दस्ताना भी मिल गया और उन्होंने अपना अभियान जारी रखा.

इस दौरान जब प्रेमलता व उनकी टीम 26 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचे, मौसम बिगड़ गया और उन्होंने वापस जाने का फैसला कर लिया. लेकिन थोड़ी देर बाद ही मौसम ठीक हो गया और सभी ने अपनी चढ़ाई फिर से शुरू कर दी.

पूरे रास्ते उन्होंने बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया, पर अंत में वह दुनिया के सात सबसे ऊंचे शिखरों में से एक की चोटी तक पहुंचने में सफल रहीं. जहां उन्होंने तिरंगा लहरा कर न सिर्फ अपना बल्कि पूरे भारत का नाम रौशन कर दिया.

Premlata Agarwal Receiving an Award By President of India. (Pic: tsafindia)

प्रेमलता ने अपने अद्भुत साहस की बदौलत भारत की सबसे उम्रदराज पर्वतारोही का खिताब हासिल किया. मई, 2018 तक ये खिताब प्रेमलता के नाम ही था, मगर अब संगीता बहल इस खिताब की हकदार बन गईं. इन्होंने 53 साल की उम्र में यह कारनामा कर दिखाया.

प्रेमलता को उनकी इस उपलब्धि के लिए 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. बहरहाल, प्रेमलता अब टाटा स्टील में काम करते हुए वहां अपने जैसे ही जोशीले पर्वतारोहियों को प्रशिक्षित देती हैं, और उनमें ऊंचे पहाड़ों को फतह करने का हौसला भी.

साभार: ROAR MEDIA 

JEE Advanced Result 2019: टॉपर कार्तिकेय गुप्ता ने बताया अपनी सफलता का राज





JEE Advanced Result 2019 Topper: आईआईटी रुड़की ने शुक्रवार को जेईई एडवांस 2019 का रिजल्ट जारी कर दिया। देश की 23 आईआईटी में एंट्री दिलाने वाली इस परीक्षा में महाराष्ट्र के चंद्रपुर के रहने वाले कार्तिकेय गुप्ता चंद्रेश ने टॉप किया है। कार्तिकेय ने JEE Main 2019 में 100 NTA स्कोर प्राप्त किया था। JEE Mains exam में उनकी रैंक 18 थी। परीक्षा में भाग लेने वाले परीक्षार्थी जेईई की वेबसाइट jeeadv.ac.in पर जाकर रिजल्ट चेक कर सकते हैं।

कार्तिकेय ने बताया कि वह हमेशा अपने डाउट क्लियर करने पर जोर देते रहे। जब तक सारे डाउट क्लियर नहीं होते थे, उन्हें नींद नहीं आती थी। वह हमेशा रिलेक्स माइंड से पढ़े।

कार्तिकेय ने कहा, 'भरोसा था की मुझे आईआईटी मुंबई में सीएस ब्रांच मिल जाएगी लेकिन टॉप करने की नहीं सोची थी। मैं रेगुलर क्लासेस के अलावा रोजाना 6-7 घंटे सेल्फ स्टडी करता था। मैंने लगातार वीकली टेस्ट दिए। इससे मुझे मेरी तैयारी का स्टेट पता लगता रहा।'

उन्होंने कहा, 'स्टूडेंट्स को बिना किसी तनाव और दबाव के पढ़ाई करनी चाहिए। सेल्फ कंपीटीशन लक्ष्य तक पहुंचने में अहम भूमिका अदा करता है। तैयारी के दौरान मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से रिलेक्स रहना जरूरी है। लंबे समय तक लगातार नहीं पढ़ना चाहिए। दो-दो घंटे की पढ़ाई के बाद ब्रेक लेने चाहिए।
JEE Advanced Result 2019 घोषित, अब खुलने लगा रिजल्ट का लिंक

कार्तिकेय अपना आदर्श महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मानते हैं। 2017 और 2018 में KVPY क्वालिफाई किया था।

कार्तिकेय ने INPHO, INCHO, INAO और INJSO क्वालिफाई किया हुआ है।
JEE Advanced 2019 Toppers: यहां देखें जेईई एडवांस टॉपरों की पूरी लिस्ट

17 साल के कार्तिकेय ने 360 में से 337 अंक प्राप्त किए हैं। वह महाराष्ट्र के चंद्रपुर क्षेत्र के हैं और उनके पिता चंद्रेश गुप्ता पेपर इंडस्ट्री में मैनेजर हैं, जबकि मां पूनम गुप्ता हाउस वाइफ हैं। परीक्षा में दूसरा स्थान इलाहाबाद के हिमांशु सिंह और तीसरा स्थान नई दिल्ली के अर्चित बुबना ने हासिल किया है।


कार्तिकेय ने मुंबई की एलेन इंस्टीट्यूट ब्रांच से कोचिंग की थी।

कार्तिकेय के बड़े भाई भारतीय विद्या भवन सरदार पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मुम्बई से सीएस ब्रांच से इंजीनियरिंग कर रहे हैं।

जेईई एडवांस्ड में कुल 161319 स्टूडेंट्स बैठे थे। 38705 स्टूडेंट्स ने परीक्षा पास की है। इनमें से 5356 लड़कियां हैं।

कार्तिकेय ने 372 में से 346 मार्क्स हासिल किए हैं। वहीं हैदराबाद के माधापुर की शबनम सहाय ने लड़कियों में टॉप किया है। शबनम ने 372 में से 308 अंक हासिल कर ऑल इंडिया में 10वां स्थान प्राप्त किया है।

साभार: दैनिक हिन्दुस्तान 

मोदी के डिजिटल इंडिया में ये हैं देश के सबसे बड़े डिजिटल बनिया

मोदी के डिजिटल इंडिया में ये हैं देश के सबसे बड़े डिजिटल बनिया

दीपेंदर गोयल - zomato
व्यापार के डीएनए के साथ पैदा हुए बनियों ने सफलता की कई कहानियां हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के उभार के साथ इस समुदाय ने चाहे वह बंसल हों, गोयल हों, गुप्ता हो या अग्रवाल- इन्होंने नए व्यापारिक मॉडल, विशेष रूप से तेजी से बढ़ते डिजिटल उद्योग को आसानी से अपना लिया है।

ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म 'जोमेटो' के संस्थापक दीपिंदर गोयल हैं, ऑनलाइन टैक्सी सर्विस 'ओला' के संस्थापक भाविश अग्रवाल हैं, वहीं 'फ्लिपकार्ट' के संस्थापक सचिन बंसल, किफायती होटल श्रंखला 'ओयो रूम्स' के संस्थापक 24 वर्षीय रीतेश अग्रवाल और 'लेंसकार्ट' के संस्थापक पीयूष बंसल हैं।

जोमेटो' को 2.3 अरब डॉलर की कुल पूंजी के साथ शुरू किया गया था, जिसके कोष में हाल ही में 60 करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ। भारत में 'उबर' का स्थानीय प्रतिद्वंद्वी ओला की पूंजी लगभग 60 अरब डॉलर हो गई है। 'ओला' अब लगभग 125 शहरों में है।

फ्लिपकार्ट' से निकलने के बाद उसे अपनी लगभग एक अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेचने के बाद बंसल ने भावीश की 'ओला' में 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया और उनके इसमें और ज्यादा निवेश करने की संभावना है।

इन सभी में एक विशेषता समान है : हिसाब किताब पर मजबूत पकड़ और उनके आधुनिक उपभोक्ताओं के बारे में स्पष्ट समझ, जिनमें ज्यादातर युवा हैं और पिज्जा मंगाने से लेकर, कैब बुलाने, उड़ानें बुक करने और कहीं भी खरीदारी करने तक के लिए अपना ज्यादातर समय स्मार्टफोन और इंटरनेट पर बिताते हैं।

मोर्गन स्टेनली' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारियों, बैंकरों, साहूकारों, अनाजों और मसालों के विक्रेताओं के पेशेवर समुदाय बनिया ने लगभग 40 करोड़ युवाओं की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर खुद को बहुत तेजी से तैयार किया है |

साइबरमीडिया रिसर्च एंड सर्विसिस लिमिटेड' (सीएमआर) के प्रमुख और वरिष्ठ उपाध्यक्ष थॉमस जॉर्ज ने कहा, "पारंपरिक व्यावसायिक घरानों के युवाओं ने फायदेमंद ई-कॉमर्स में कदम रख दिया है, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं, नए व्यापारिक मॉडलों और बेहतर शिक्षा के प्रति जागरूकता के कारण वे सफल भी हुए हैं।"

देश में 40 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता और लगभग 50 करोड़ ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ता (लगभग 97 फीसदी वायरलैस कनेक्शन) हैं, जिसे 'बनिया ब्रिगेड' ने ई-कॉमर्स और ऑनलाइन उद्योग में अपना अबतक का सबसे बड़ा अवसर माना है।

'जोमेटो' वर्तमान में प्रति महीने 2.2 करोड़ ऑर्डर लेती है। कंपनी ने ड्रोन आधारित फूड डिलीवरी के लिए देशी स्टार्टअप 'टैकईगल इन्नोवेशंस' का अधिग्रहण कर लिया।

दीपिंदर गोयल के अनुसार, 'जोमेटो' अभी हवाई नवाचार के शुरुआती दौर में है और नए कल के निर्माण के लिए छोटे-छोटे कदम बढ़ा रहा है, जहां उपभोक्ता उनके ऑर्डर किए गए खाने की डिलीवरी के लिए एक ड्रोन का इंतजार करें।

साभार : udaybulletin.com