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Tuesday, February 11, 2025

मंडावा : ये है सेठो की हवेलियों से भरा छोटा सा मनोरम कस्बा

मंडावा : ये है सेठो की हवेलियों से भरा छोटा सा मनोरम कस्बा


राजस्थान के शेखावटी इलाके में हवेलियों से भरा एक छोटा मगर मनोरम कस्बा है यह जिसे कलाप्रेमी ‘ओपन आर्ट गैलरी’ की तरह देखते हैं। बारिश में और भी संवर-निखर जाती है इसकी सूरत।

राजस्थान की बात करते ही राजसी ठाट के दृश्य जेहन में उभर आते हैं। रजवाड़ों के ठाट देखने हों तो लोग जोधपुर, जयपुर और उदयपुर का रुख करते हैं, पर अगर आपको राजस्थान के कलाप्रेमी सेठों के जीवन से रूबरू होना है तो आपको मंडावा आना चाहिए। यहां आप मध्यकालीन भारत की तस्वीर को भी करीब से देख और समझ पाएंगे। यहां के हर दरो-दीवार में छुपी है उस जमाने की अनूठी तस्वीर। मंडावा एक छोटा मगर जीवंत कस्बा है। इस पूरे क्षेत्र को ‘शेखावटी’ भी कहा जाता है। राजस्थान के शूरवीर राजपूतों में शेखावत राजवंश का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। समूचे भारत में केवल शेखावटी ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जिस पर अंग्रेज कभी पूरी तरह हुकूमत नहीं कर सके।


लुभाती है फ्रेस्को पेंटिंग की जीवंतता: सेठसाहूकारों का इलाका मंडावा अपनी भित्ति चित्रकारी (जिसे ‘फ्रेस्को पेंटिंग’ भी कहा जाता है) के लिए दुनियाभर में मशहूर है। कहते हैं फ्रेस्को पेंटिंग्स 200 साल पुरानी है, लेकिन इनकी चमक आज भी नई जैसी लगती है। इन पेंटिंग्स को बनाने में जो रंग इस्तेमाल किए जाते थे, वे शुद्ध प्राकृतिक हुआ करते थे। इन पेंटिंग्स को ही नहीं, बल्कि रंगों को तैयार करने में भी चित्रकार जी-जान लगा दिया करते थे। इस संबंध में एक कहानी मशहूर है। किसी सेठ ने अपनी हवेली को रंगने का ठेका यहां के चित्रकार को दिया। सेठ कोलकाता में व्यापार करते थे। जब वह 4 महीने बाद लौटे तो देखा कि हवेली जस की तस है और चित्रकार वहां बैठकर रंग बना रहा है। सेठ जी ने नाराजगी दिखाते हुए उससे कहा कि इतना समय बीत गया और तुमने एक पत्थर तक नहीं रंगा। चित्रकार को भी गुस्सा आया और उसने रंग में घुला ब्रश दीवार पर फेंक दिया। आज भी पत्थर की दीवार पर उस रंग के निशान हैं। ये रंग बेहद पक्के होने के कारण सालों साल टिके रहते थे।



हवेलियों का बॉलीवुड कनेक्शन! : किसी फिल्म के सेट की तरह दिखता है हवेलियों से भरा यह नगर। यहां 100 से ज्यादा हवेलियां हैं। इन खूबसूरत हवेलियों में आज कोई नहीं रहता और ये वीरान पड़ी हैं। फिलहाल इनकी रखवाली के लिए कुछ चौकीदार ही मौजूद हैं। यहां आकर लगता है कि पिछले सौ साल से वक्त जैसे ठहर-सा गया है। इसीलिए यह जगह बॉलीवुड की पहली पसंद है। 1989 में आई फिल्म ‘बंटवारा’, फिर ‘गुलामी’ से लेकर पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों ‘जब वी मेट’, ‘पहेली’, ‘लव-आजकल’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘पीके’, ‘जेड प्लस’, ‘मिर्जिया’, ‘हॉफ गर्लफ्रेंड’ आदि की शूटिंग यहां हुई है। इस अनोखे गांव के हर निवासी ने किसी न किसी फिल्म में कोई न कोई काम किया है!

ओपन आर्ट गैलरी: मंडावा में घूमने का सबसे अच्छा तरीका है पैदल चलना, क्योंकि यहां हर गली में एक हवेली है और हर हवेली एक ‘ओपन आर्ट गैलरी’ की तरह आगंतुकों के लिए खुली रहती है। यहां के लोगों की मानें तो भारत की तरक्की में विशेष योगदान देने वाले मारवाड़ी व्यापारी घराने, जैसे-बिड़ला, मित्तल, बजाज, गोयनका, झुनझुनवाला, डालमिया, पोद्दार, चोखानी आदि के दादा-परदादाओं ने इस नगर को बसाया था और इन्हीं सेठों ने यहां एक से बढ़कर एक खूबसूरत हवेलियां भी बनवाई थीं। करीब सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी इन हवेलियों की दीवारों, मेहराबों, खंभों पर बने भित्ति-चित्रों की खूबसूरती हर किसी का मन् मोह लेती है। इन चित्रों में रामायण, महाभारत और कृष्ण-लीला के प्रसंग बहुत बारीकी से चित्रित किए गए हैं। कुछ हवेलियों में राजस्थानी लोक कथाओं, पशु-पक्षियों, मिथकों, धार्मिक रीति-रिवाजों, आधुनिक रेल, जहाज, मोटर, ईसा मसीह आदि का चित्रण रंगों के माध्यम से किया गया है।

होड़ में हुईं आलीशान: कहते हैं कि हवेलियां जिस दौर में तैयार हुईं, उस दौरान यहां आपस में प्रतिस्पर्धा थी कि किसकी हवेली कितनी शानदार होगी। कलाप्रेमी सेठों के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। अत: अपनी हवेलियों के सौंदर्यीकरण में वे कोई कसर नहीं रखना चाहते थे। ऐसा माना जाता है कि मंडावा पुराने सिल्क रूट पर पड़ने वाला मुख्य व्यापारिक केंद्र था, इसलिए यहां के व्यापारी खूब फलेफूले। कालांतर में उनके पास इतना पैसा आ गया कि उन्हें इस छोटे से कस्बे में रहना अप्रासंगिक लगने लगा और वे मुंबई, दिल्ली, सूरत, कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक नगरों की ओर चले गए। अब इन हवेलियों के मालिक किसी मांगलिक अवसर पर अपने कुलदेवता की पूजा-अर्चना करने हवेलियों में लौटते हैं, बाकी समय ये हवेलियां लगभग वीरान रहती हैं।


ये हैं कुछ मशहूर हवेलियां

हनुमान प्रसाद गोयनका हवेली: कहते हैं इस हवेली का संबंध प्रसिद्ध कारोबारी गोयनका घराने से है। इसमें भगवान विष्णु का मंदिर भी है। हवेली की चित्रकारी और नक्काशी का काम देखने लायक है। बाहर से देखकर आप इसकी गहराई की थाह नहीं लगा सकते। जब आप हवेली में प्रवेश करते हैं तो यह आपके सामने

किसी अनूठी किताब की तरह एक-एक करके खुलती चली जाती है।

गुलाब राय लाडिया हवेली: इसकी संरचना इतनी विशाल है कि इसकी छत से पूरा मंडावा नजर आता है। मंडावा में मोर बहुतायत में हैं। इन छतों पर टहलते हुए नाचते मोरों को निहारना आंखों को बड़ा सुकून देता है।

चोखानी डबल हवेली: यह हवेली स्थानीय चोखानी भाइयों ने अपने रहने के लिए 19वीं शताब्दी में बड़े दिल से बनवाई थी। यह हवेली बहुत से आधुनिक रंग समेटे हुए है। यह मंडावा के वार्ड नंबर 5 में पड़ती है।

बिंसिधर नवातिया हवेली: कहते हैं वर्ष 1920 में बनकर तैयार हुई यह हवेली उस समय की एक आधुनिक हवेली थी। इसे बनवाने वाले यूरोपीय वास्तुकला के कितने बड़े प्रेमी थे, इस बात का अंदाजा इस हवेली की वास्तुकला में प्रयोग में लाए गए विदेशी पैटर्न और नमूनों को देखकर लगता है। यहां इन बेल-बूटों के बीच कार चलाती हुई महिला और हवाई जहाज उड़ाते राइट ब्रदर्स की तस्वीरों को देखने लोग दूर-दूर से आते हैं।

मुरमुरिया हवेली : यह हवेली वर्ष 1930 के आसपास बनी थी। इस हवेली की दीवारों पर बनी फ्रेस्को आर्ट उस समय को दर्शाती है, जब भारत में रेलगाड़ी आई थी। इस हवेली में घोड़े पर तिरंगा लिए पंडित नेहरू की खूबसूरत पेंटिंग भी बनी हुई है। एक तरह से ये हवेलियां अपने समय के समाज से हमें मिलवाती हैं। मुरमुरिया हवेली से थोड़ी ही दूर स्थित है हरलालकर की बावड़ी। बड़े-से चबूतरे पर बनी मीनारें और गुंबद इस संरचना को आकर्षक बनाते हैं। इस बावड़ी का निर्माण सेठ हरलालकर ने 19वीं शताब्दी में यहां के लोगों की पानी की आपूर्ति के लिए करवाया था।

लक्ष्मी नारायण लडिया हवेली : कहते हैं यह हवेली यहां की सबसे सुंदर हवेली है। इसकी दीवारों पर कृष्णलीला, रामायण और महाभारत के प्रसंग बहुत खूबसूरती से उकेरे गए हैं। इसे देखने के लिए थोड़ा समय निकाल कर जाएं, क्योंकि यहां की खूबसूरत चित्रकारी को देखकर आप इसमें खो जाएंगे।

झुंझुनू में भी हैं दर्शनीय हवेलियां
झुंझुनू से मंडावा तकरीबन 30 किमी. दूर है। पर मंडावा में ही नहीं, झुंझुनू में स्थित हवेलियां भी दर्शनीय हैं। यहां भी पूरे क्षेत्र में हवेलियां ही हवेलियां हैं, जैसे मोदी हवेली। यह हवेली मोदी घराने की संपत्ति है। यहां एक ‘सोने चांदी की हवेली’ भी है। कहते हैं इस हवेली की फ्रेस्को पेंटिंग्स में सोने-चांदी का उपयोग किया गया है।


रानी सती माता का मंदिर
झुंझुनू जिले में चौबारी मंडी के पास रानी सती माता का मंदिर है। इसमें 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच सती हुई स्त्रियों के छोटे-छोटे मंदिर बनाए गए हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण अमीर सेठों द्वारा करवाया गया, जबकि निर्माण कार्य को स्थानीय मुस्लिम कारीगरों ने अंजाम दिया।

DELHI NEW VIDHANSABHA VAISHYA VIDHAYAK

DELHI NEW VIDHANSABHA VAISHYA VIDHAYAK


वैश्य गौरव इस्कोन के संस्थापक श्री शील प्रभुपाद को मिली पहली विश्व गुरु की उपाधि

 वैश्य गौरव इस्कोन के संस्थापक श्री शील प्रभुपाद को मिली पहली विश्व गुरु की उपाधि 



JEE MAIN TOPPER 2025, ग्यारह में से नो वैश्य समाज से

JEE MAIN TOPPER 2025, ग्यारह में से नो वैश्य समाज से

JEE Main 2025 session 1 results declared: 11 toppers score 100 percentile

The candidates who achieved the 100 percentile in JEE Main 2025 session 1 have earned a place in the spotlight. The following list provides the names of the top scorers and their respective states of eligibility:

S. No.
Candidate Name
State of Eligibility

1
Ayush Singhal
Rajasthan


2
Kushagra Gupta
Karnataka


3
Daksh
Delhi (NCT)


4
Harsh Jha
Delhi (NCT)

5
Rajit Gupta
Rajasthan

6
Shreyas Lohia
Uttar Pradesh

7
Saksham Jindal
Rajasthan

8
Saurav
Uttar Pradesh

9
Vishad Jain
Maharashtra


10
Arnav Singh
Rajasthan

11
Shiven Vikas Toshniwal
Gujarat


Monday, February 10, 2025

Wednesday, February 5, 2025

MARWADI BANIYAS WEDDING - मारवाड़ी शादी

MARWADI BANIYAS WEDDING - मारवाड़ी शादी

ज्यादातर भारतीय विवाहों की तरह मारवाड़ी विवाह भी काफी उत्साह और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह विवाह काफी भव्य और रंगीन है। जो कोई भी इसमें शामिल होता है। यह उस पर अपना छाप डालने में कोई कसर नहीं छोड़ती है।

मारवाड़ी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में अपनी जड़ें सदियों पहले से जमाए हुए हैं लेकिन अब ये भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए हैं। प्रामाणिक मारवाड़ी शादियों की जड़ें वेदों की प्राचीन परंपराओं में हैं। मारवाड़ी विवाह के रीति-रिवाज और रस्में सात दिनों तक विस्तार से चलते हैं। उनकी शादियां सिर्फ एक विस्तारात्मक लेकिन शानदार, रंगीन और मजेदार अनुभव है।

आइए कुछ सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक रस्मों और रीति-रिवाजों पर एक विस्तृत नज़र डालते हैं जो मारवाड़ी विवाह के लिए अपरिहार्य हैं।

मारवाड़ी शादी से पहले की रस्में और फंक्शन

सगाई

मारवाड़ी विवाह समारोह सगाई समारोह से शुरू होता है। दूल्हा-दुल्हन को साथ लाने में यह पहला अनुष्ठानिक कदम है। दूल्हे के परिवार द्वारा आयोजित इस अवसर पर दूल्हे के माथे पर टीका लगाया जाता है जिसे दुल्हन के परिवार से कपड़े, मिठाई आदि उपहार भी मिलते हैं।

गणपति स्थापना और गृह शांति

शादी से कुछ दिन पहले, एक 'हवन' (एक पवित्र आसन पर एक अनुष्ठान आग; दोनों दुल्हन और दूल्हे के घरों में आयोजित किया जाता है शादी के दौरान शांति और समृद्धि के लिए भगवान गणेश से प्रार्थना की की जाती है। जोड़े के मिलन के लिए आशीर्वाद मांगा जाता है। संबंधित घरों में गणेश की मूर्ति स्थापित की जाती है और, प्रसाद अग्नि भगवान को किया जाता है। अग्नि ताकि वह प्रार्थनाओं को आगे ले जा सके। गणपति स्थापना के साथ ही दोनों संबंधित स्थानों पर पुरोहित द्वारा एक और पवित्र पूजा या गृह शांति का अनुष्ठान किया जाता है। इस रस्म का मकसद दोनों परिवारों को आशीर्वाद देने और शादी का आशीर्वाद देने के लिए देवताओं को खुश करना है।

संगीत महफिल

विवाह से 2-3 दिन पहले आयोजित इस मारवाड़ी समारोह में संगीत नामक उत्सव, गायन और नृत्य की एक शाम होती है। इसमें दोनों परिवार के लोग शामिल हो सकते हैं। पुरुष और महिला अपना जोड़ो में शामिल होते हैं और मज़े से इस समारोह को आगे बढ़ाते हैं। परंतु कई जगह इसे अलग अलग आयोजित किया जाता है। महिला व पुरूष दोनों एक साथ नहीं आते हैं। महिलाओं के लिए और इसके विपरीत महिलाओं की महफिल में पुरुषों को अनुमति नहीं है। हर कोई पारंपरिक राजस्थानी या मारवाड़ी गीतों की धुनों पर आश्चर्यजनक पोशाक पहनकर नृत्य करता है।

पिथी दस्तूर या बावन समारोह

मारवाड़ी शादी की सबसे महत्वपूर्ण प्री-वेडिंग रस्मों में से एक, पिथी दस्तूर मूल रूप से ज्यादातर भारतीय शादियों की तरह हल्दी फंक्शन है। इस समारोह में उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दूल्हा-दुल्हन पर हल्दी (हल्दी या बावन; और चंदन का लेप लगाते हैं। मारवाड़ी परंपराओं के अनुसार दूल्हा-दुल्हन इस दिन से अपने घरों से बाहर नहीं जा सकते जब तक उनकी शादी समारोह खत्म नहीं हो जाती है।

माहिरा दस्तूर या भात दस्तूर

यह महत्वपूर्ण प्री-वेडिंग सेरेमनी दूल्हा-दुल्हन के घर पर व्यक्तिगत रूप से आयोजित की जाती है। मामा मारवाड़ी शादियों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। संबंधित मामा एक पारंपरिक दूल्हे और दुल्हन की माताओं द्वारा आयोजित भोजन के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। वे अपने भांजे और भांजी के लिए उपहार और आशीर्वाद लेकर जाते हैं। दुल्हन के मामा उसे दुल्हन की ड्रेस और गहने गिफ्ट करते हैं जबकि दूल्हे का मामा उसे शादी का सूट और गहने देता है। यह रस्म अपने बच्चों की शादी जैसे महत्वपूर्ण पारिवारिक आयोजनों में एक महिला के परिवार की भागीदारी का प्रतीक है।

मेहंदी

इस समारोह में दुल्हन के होथों व पैरों पर जटिल मेंहदी डिजाइन लगाया जाता है। शादी में शामिल होने वाले दूल्हा-दुल्हन पक्ष की अन्य महिला रिश्तेदारों और दोस्तों को भी मेंहदी की कलाकृत बनवाते हैं।

जनेव

इस आयोजन में एक पूजा शामिल है जहां दूल्हे को पीठासीन पुरोहित द्वारा एक पवित्र धागा दिया जाता है। पवित्र धागा पहनने से पहले, दूल्हे को एक रस्म अदा करना होता है जिसमें वह भौतिक दुनिया छोड़ रहा है एक भिक्षु बनने के लिए है। उसके मामा उसे शादीशुदा जिंदगी जीने के लिए राजी करते हैं। इस रस्म के साथ दूल्हा विवाह के महत्व को समझता है और शादीशुदा जिंदगी की जिम्मेदारियों को स्वीकार करता है।
 
पल्ला दस्तूर

दूल्हे के करीबी रिश्तेदारों के एक मेजबान दुल्हन की शादी के गहने और उपहार लेकर जाते हैं, जो वह अपनी विवाह के दिन पहनेगी। यह समारोह चाहे शादी के दिन किया जाए या शादी से एक दिन पहले किया जा सकता है।

मारवाड़ी शादी समारोह और रस्में
 
निकासी

निकासी के लिए दूल्हे को पगड़ी या साफा नामक पगड़ी बांधी जाती है, जिसके ऊपर सेहरा होता है, जो उसके चेहरे को कवर करता है। उसे बुरी नजर से बचाने के लिए सेहरा पहना जाता है। इससे पहले कि दूल्हे अपनी शादी के लिए बारात के लिए निकले उसकी बहन एक छोटी सी रस्म वाग गुनथई निभाती है। जहां वह घोड़े को एक धागा बांधती है। ताकि जब दूल्हा अपनी शादी स्थल के लिए रवाना हो तो कोई परेशानी न हों।
 
बारात

दूल्हे की शादी की बारात है। दूल्हा एक महिला घोड़े (घोड़ी; पर सवारी और परिवार और दोस्तों के साथ ही एक शादी बैंड के अपने दल के साथ अपनी विवाह स्थल के लिए रवाना होता है। बारात के महत्वपूर्ण पुरुष सदस्य साफा नामक रंगीन मारवाड़ी पगड़ी पहनते हैं।
 
तोरन या द्वार तोरन

मारवाड़ी परंपरा और संस्कृति शगुन में विश्वास करते हैं। दुल्हन के घर के प्रवेश द्वार को विस्तार से तोरन से सजाया जाता है। दूल्हे को दुल्हन के स्थान पर प्रवेश करने से पहले नीम की छड़ी से तोरण को मारना पड़ता है, माना जाता है कि यह किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। इसके बाद दुल्हन की मां दरवाजे पर दूल्हे का स्वागत करते हुए आरती उतारकर माथे पर तिलक लगाती है।

जयमाला या वरमाला

जब दूल्हा-दुल्हन मिलते हैं तो वे फूलों की माला का आदान-प्रदान करते हैं, जो कि जयमाला भी है वरमाला भी। जयमाला अनुष्ठान के बाद दंपती को मंडप (वेदी; के लिए ले जाया जाता है।

ग्रंथी बंधन और पाणीग्रहण

ग्रंथी बंधन में भी गठजोदा के नाम से जाना जाता है, दूल्हे की कमर के चारों ओर एक कपड़ा दुल्हन की साड़ी या चुन्नी (चुराया या दुपट्टा; से बंधा होता है। इसके बाद दुल्हन दूल्हे का हाथ पर अपना हथा रखती है जिसके ऊपर पवित्र जल डाला जाता है, जिसे पाणीग्रहण रस्म कहते हैं।

कन्यादान

इस आम भारतीय शादी की रस्म में दुल्हन के पिता प्रतीकात्मक रूप से अपनी बेटी को अपने पति को सौंपते हैं और उसे अपनी जिम्मेदारी लेने और उसकी देखभाल करने के लिए कहते हैं। दुल्हन भी दूल्हे के परिवार और उसके उपनाम को उसकी तरह स्वीकार करती है। दंपति एक दूसरे के सुख व दुख में पूरा जीवन साथ रहने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
 
फेरस

पुरोहित हवन (पवित्र अग्नि; को प्रज्वलित करते हैं और पवित्र विवाह मंत्रों का जाप करते हैं। दूल्हा-दुल्हन पवित्र अग्नि के चारों ओर फरे लेते हैं और हर फेरे के बाद एक-दूसरे से वचन मांगते हैं। एक पारंपरिक मारवाड़ी विवाह में, केवल चार फेरों पहले तीन फेरों और दुल्हन, शेष अग्रणी दूल्हे के साथ किया जाता है।

अश्वरोहन

दुल्हन को सात बार पीसने वाले पत्थर (जांता; को आगे बढ़ाना पड़ता है। यह दर्शाता है कि दुल्हन दृढ़ विश्वास और साहस के साथ अपने विवाहित जीवन में सभी चुनौतियों का सामना करेगी। इसके बाद दुल्हन का भाई उसे मुट्ठी भर फूला हुआ चावल देता है जिसे दुल्हन और दूल्हे को मिलकर अग्नि में डालना पड़ता है। इस अनुष्ठान को उत्तर भारत में लावा परछना करते हैं। अनुष्ठान के साथ भाई अपनी सुख-समृद्धि बांटता है और दंपती के लिए समृद्धि की कामना करता है।
 
वामंग स्थापना और सीर गुथी (सिंदूरदान;

फेरों के पूरा होने के बाद दुल्हन अपने पति के बाईं ओर बैठती है। जैसे मानव शरीर के बाईं ओर हृदय होता है, इसी प्रकार यह इस बात का प्रतीक है कि दूल्हा अपनी पत्नी को अपने हृदय में स्वीकार और स्थापित कर रहा है।

इसके बाद सिंदूरदान की रस्म होती है जहां दूल्हा अपनी दुल्हन के मांग में सिंदूर भरता है। यह बहुत शुभ माना जाता है और विवाह संपन्न होने का प्रतीक है। अब से दुल्हन अपने एक विवाहित महिला होने के निशान के रूप में सिंहद्वार पहनती है।
 
अंजला भरई

इसके बाद अंजला भरई अनुष्ठान आता है जहां नवविवाहित जोड़े को मंडप छोड़ने से पहले दुल्हन के ससुर उसकी गोद में रुपयों से भरा बैग डालते हैं। यह अनुष्ठान दुल्हन का उसके ससुराल के परिवार में स्वागत करने और अपने नए घर के प्रति अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी के बारे में भी जागरूक करने का प्रतीक है।
 
पहाड़वाणी

पहाड़वाणी रिवाज में दुल्हन का परिवार दूल्हे को उपहार भेंट करता है और उसके माथे पर टीका लगाया जाता है। कछला नामक चांदी का विशेष बर्तन दूल्हे के पिता को भेंट किया जाता है। दुल्हन एक पूजा करती है जहां वह अपने पैतृक परिवार से एक जुदाई के प्रतीक के रूप में एक मिट्टी के बर्तन को तोड़ती है और अपने पति के साथ एक नया जीवन शुरू करती है।
 
बिदाई या विदाई

शादी समारोह खत्म होने के बाद यह एक भावनात्मक रस्म है। दुल्हन के अश्रू पूरित आंखों वाले माता-पिता अपनी बेटी को अपने नए घर के लिए विदा करते हैं।

मारवाड़ी शादी के बाद की रस्में और कार्य
 
बार रूकीई

यह मजेदार मज़ाक है, जहां दूल्हे की बहन और चचेरी बहने व भाभी नव बुध जोड़े से शगुन लेने के बदले में उंहें उनके आगमन पर घर में प्रवेश करने से रोकते हैं। बहनें उन्हें तब तक प्रवेश नहीं करने देतीं, जब तक कि उपहार न मिल जाए।
 
गृह प्रवेश या वधु प्रवेश

यह समारोह तब होता है जब दुल्हन पहली बार अपने नए घर में प्रवेश करती है। दुल्हन की सास आरती कर उसका स्वागत करती है। अब दुल्हन को अपने दाहिने पैर को दहलीज पर रखें एक पात्र में डालना पड़ता है जिसमें सिंदूर और दूध का मिश्रण होता है। इसके बाद वह परिवार में अपने पैरों के निशान डालने के लिए अपने रंगीन पैरों के साथ पांच कदम चलती है। इससे पहले वह चावल और सिक्कों से भरे एक बर्तन को अपने दाहिने पैर से धकेलती है, जो प्रजनन क्षमता और समृद्धि का प्रतिक है। यह रस्म दर्शाता है कि वधु अपने साथ सुख व समृद्धि लेकर आई है।

पगलगनी

यह समारोह शादी के एक दिन बाद आयोजित किया जाता है जहां दुल्हन औपचारिक रूप से अपने पति के रिश्तेदारों से मिलती है। रिश्तेदार दुल्हन के लिए उपहार और पैसे लाते हैं, और वह बड़ों का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेती है। यह भी एक मौका है जब दुल्हन अपना घूंघट उठाती है।

शादी का रिसेप्शन

मारवाड़ी शादी का रिसेप्शन आमतौर पर शादी समारोह के एक दिन बाद आयोजित किया जाता है। पारंपरिक मारवाड़ी भोजन इस समारोह में परोसा जाता है जिसमें शाकाहारी मेनू होता है और कोई शराब नहीं परोसी जाती है।

मारवाड़ी शादी की पोशाक

मारवाड़ी दुल्हनें आमतौर पर घाघरा या लेहेंगा चोली पहनती हैं। लाल रंग पसंद किया जाता है, जिसे शुभ माना जाता है। इसके अलावा ऑरेंज, पिंक, क्रीम, मरून, गोल्ड जैसे अन्य रंग भी पसंद किए जाते हैं। मारवाड़ी दुल्हनों के लिए गहने में आद या तिमानियान (एक चोकर;, राखड़ी (उसके मांग में पहना जाने वाला सोने का आभूषण;, चूड़ा (चूड़ियां;, बाजू (उसकी बाहों पर गहने;, पजेब (पायल;, और बिछिया (पैर के अंगूठे की अंगूठी; शामिल हैं।
मारवाड़ी दूल्हों के लिए पारंपरिक शादी की पोशाक में शेरवानी या अक्कन, दुपट्टा (दुपट्टा;, राजस्थानी जूतियां (पारंपरिक जूते; शामिल हैं। दूल्हा भी अपनी शादी की पोशाक से मेल खाते हुए अपने सिर पर पगड़ी/साफा पहनता है।

Monday, February 3, 2025

बनिया कितने प्रकार के होते हैं

बनिया कितने प्रकार के होते हैं? घटक जातियों, नियमों के पालन, धर्म तथा क्षेत्र के आधार पर बनिया के प्रकार


बनिया शब्द का प्रयोग व्यापक रूप से भारत के पारंपरिक व्यापारिक जातियों या बिजनेस समुदाय के सदस्यों लिए किया जाता है. इस प्रकार इस शब्द का प्रयोग व्यापारी, दुकानदार, साहूकार और बैंकर आदि के लिए किया जाता है. आइए जानते हैं बनिया कितने प्रकार के होते हैं?
बनिया कितने प्रकार के होते हैं

मनुष्य के गुण और कर्म के आधार पर निर्मित हिंदू धर्म के वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत बनिया समुदाय को वैश्य वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है. हालांकि बनिया जातियों के कुछ सदस्य किसान हैं, लेकिन किसी भी अन्य जाति की तुलना में, अधिक बनिया अपने पारंपरिक व्यवसाय का पालन करते हैं. बनिया समुदाय में अनेक व्यापारिक जातियां शामिल हैं. उत्तर भारत की बात करें तो यहां अग्रवाल और ओसवाल प्रमुख बनिया जातियां हैं. वहीं, दक्षिण भारत में चेट्टियार एक सफल कारोबारी समुदाय है, जो मुख्य रूप से तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में निवास करते हैं.आइए अब मूल विषय पर आते हैं और बनिया कितने प्रकार के होते हैं. यहां हम घटक जातियों, नियमों के पालन, धर्म तथा क्षेत्र के आधार पर बनिया के प्रकार के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे.
(1). घटक जातियों के आधार पर

बनिया समुदाय कई उपसमूहों/उपजातियों/ उपवर्गों का एक समामेलन है. घटक जातियों के आधार पर बनिया के महत्वपूर्ण प्रकार इस प्रकार हैं-अग्रहरि, अग्रवाल, असाटी, ओसवाल, अवध बनिया, बजाज, वर्णवाल, भोजवाल, चेट्टियार, चूरीवाल, जायसवाल, दोसर वैश्य, गहोई, गणेरीवाला, घाटे बनिया, गुप्ता, हलवाई, झुनझुनवाला, कन्नड़ वैश्य, कासलीवाल, केसरवानी, कलाल, कलार, कलवार, कोमाटी, खंडेलवाल,‌ गुलहरे, पोरवाल, महावर, महेश्वरी, माहुरी, माथुर, मोढ, मारवाड़ी, उमर बनिया, रौनियार, रस्तोगी, सालवी, सुंगा, सुनवानी, शिवहरे, तेली, टिबरेवाल, उनाई साहू, लोहाना, वैश्य वानी, विजयवर्गीय, वार्ष्णेय, आदि.

(2). नियमों के पालन के आधार पर

एक अन्य वर्गीकरण के अनुसार, बनिया में छह उपसमूह हैं- बीसा या वैश्य अग्रवाल, दासा या गाटा अग्रवाल, सरलिया, सरावगी या जैन, माहेश्वरी या शैव और ओसवाल. बीसा का मानना ​​​​है कि वे बशाक नाग की 17 सर्प बेटियों के वंशज हैं, जिन्होंने उग्रसैन के 17 पुत्रों से विवाह किया था.

बता दें कि अग्रवाल वैश्य समुदाय का प्रमुख घटक है. जैन ग्रंथों में मिले विवरण के अनुसार, प्रारंभ में अग्रोहा से निकलने के कारण इनमें एकता थी. लेकिन कालांतर में स्थान, आचार, धर्म, सामाजिक रीति रिवाज आदि के पालन में इनमें भेद उत्पन्न होने लगे और इसी आधार पर कई उप वर्ग बनते गए. उदाहरण के तौर पर बीसा, दस्सा, पंजा, ढैया, इनके उपविभाजन हैं. यह उपविभाजन उन 20 नियमों के पालन के आधार पर बनाया गया है, जो कभी इनकी परंपरा में प्रचलन में थे. इन 20 नियमों का पूर्ण रुप से पालन करने वाले “बीसा” कहलाए. इनमें से जो उदारवादी या सुधारवादी थे, जो सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं का विरोध करते थे तथा इन 20 नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं करते थे, “दस्सा” कहलाए. इसी प्रकार से दस्सों से कम नियम पालन करने वाले “पंजा” तथा और उनसे भी कम नियम का पालन करने वाले “ढैया” कहलाए.

(3). धर्म

धर्म के आधार पर बनिया मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं- हिंदू और जैन.

(4). क्षेत्र के आधार पर

बनिया समाज में क्षेत्र के आधार पर भी विभाजन देखने को मिलता है. प्रसिद्ध साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र क्षेत्रवार विभाजन के आधार पर बनिया समुदाय के 4 शाखाओं को बताते हैं-मारवाड़ी, देशवाली, पूरिबए और पंछहिए. मारवाड़ी अपने आप को बीसे अग्रवाल मानते हैं. जो अग्रवाल अग्रोहा से निकलकर भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर बस गए, देशवाली कहलाए. पूर्वी क्षेत्रों में बसने वाले पूरिबए कहलाए. इसी प्रकार से, पश्चिमी भाग में बसने वाले “पंछहिए” कहलाए.

बनियों से हम क्या सीख सकते हैं

बनियों से हम क्या सीख सकते हैं


बनिया समुदाय में क्या खास बात है? मैं इस समुदाय का प्रशंसक हूं जो लगातार भारत के एकमात्र विश्वस्तरीय उद्योगपतियों को जन्म देता है।

उनके रहस्य क्या हैं?

हम सौभाग्यशाली हैं कि बिड़ला परिवार के बारे में लिखा गया है और उन्होंने खुद भी इतनी सामग्री लिखी है कि हम एक सफल, रूढ़िवादी मारवाड़ी बनिया परिवार के कामकाज की झलक पा सकते हैं। मारवाड़ी शब्द का इस्तेमाल राजस्थान के बनियों के लिए एक सामान्य नाम के रूप में किया जाता है। बेशक, बिड़ला शेखावाटी से हैं।

इसमें पितामह घनश्याम दास बिड़ला की जीवनी और उनके बेटे कृष्ण कुमार (केके) बिड़ला की आत्मकथा है, दोनों ही अंग्रेजी में हैं। फिर स्वान्तः सुखाय (मेरे अपने आनंद के लिए) है, जो आदित्य के पिता और कुमार मंगलम के दादा बसंत कुमार (बीके) बिड़ला की हिंदी में आत्मकथा है। 1991 में प्रकाशित, यह एक उल्लेखनीय दस्तावेज है और अगर इसे ध्यान से पढ़ा जाए तो इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

अक्सर इसके विवरण सामान्य और अरुचिकर होते हैं। उदाहरण के लिए, बीके द्वारा डच के साथ कपड़ा फर्म सेंचुरी-एनका में अपनी दीर्घकालिक साझेदारी का विवरण, अपनी सादगी में बचकाना है। डॉ. एक्स एक अच्छे आदमी थे, मि. वाई एक अच्छे आदमी थे और इसी तरह।

जब बीके हमें अपने और अपने परिवार के बारे में बताते हैं तो वे दिलचस्प लगते हैं। अपनी शैली का वर्णन करने के लिए वे सबसे पहले यही कहते हैं: "आर्थिक नियंत्रण मेरा अच्छा है" (अध्याय 10, पृष्ठ 67)।

उनका मुख्य निर्देश यह है कि "हिसाब किताब" को साफ-सुथरी प्रविष्टियों और हर विवरण के साथ अद्यतन रखा जाए। संख्याओं पर यह कड़ा नियंत्रण ही कारण है कि "मेरी कंपनियों में लंबी-चौड़ी गड़बड़ नहीं हुई।" वे कहते हैं कि उन्होंने एक लड़के के रूप में शांतिमल मेहता नामक एक बनिया से अकाउंट्स का अध्ययन किया था। बिड़ला में इसे सीखने की एक स्वाभाविक प्रतिभा थी।

फादर घनश्याम दास (जीडी) बिड़ला ने उनके लिए इसे सीखने के लिए एक साल का कार्यक्रम बनाया, और बीके कहते हैं कि उन्हें मेहता के प्रशिक्षण के तहत पूरे एक साल की ज़रूरत थी। उन्होंने सीखा: नकदी, नकल, हिसाब-किताब, बिल बनाना, बैंक स्टेटमेंट समझना, दैनिक रिपोर्ट, दैनिक और वार्षिक लाभ और हानि खाते, बचत और व्यय, और बिक्री।

कर्मचारियों ने बाद में बताया कि जहां भी वे संख्या छिपाने या बढ़ाने की कोशिश करते थे, वहां बाबू (बीके) की नजर उन ग्रे कॉलमों पर पड़ जाती थी।

अपने कामकाजी जीवन के दौरान, हर महीने की 12 तारीख से पहले, वे पिछले महीने की किताबों की जांच करते थे। संख्याओं के प्रति उनका यह समर्पण अद्भुत है। पाठकों के आश्चर्य का अनुमान लगाते हुए, वे कहते हैं कि यह बिल्कुल ज़रूरी है और उन्होंने इस अभ्यास में कभी देरी नहीं की: "विलंब करने से नुक्सान होता है।" उन्होंने अपनी कुछ फर्मों की हर महीने, कुछ की हर दूसरे महीने की हिसाब किताब पर ध्यान केंद्रित किया।

पाठ 1: मारवाड़ी बनिया की कंपनी बैलेंस शीट के ज़रिए नियंत्रित होती है। प्रबंधन अकाउंटेंसी के ज़रिए होता है, न कि बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन के ज़रिए। बसंत कुमार कहते हैं कि उन्हें पता था कि उनकी कौन सी कंपनियाँ सिर्फ़ इस अभ्यास के ज़रिए अच्छी तरह से प्रबंधित हैं। इसके बाद, उन्होंने प्रबंधकों से मुलाकात की और सुना कि क्या चल रहा है। बड़ी फ़र्मों की डीब्रीफिंग में हर महीने एक या दो पूरे दिन लगते थे। इन बैठकों से तीन उद्देश्य पूरे हुए: उन्होंने प्रबंधकों को आत्मविश्वास दिया, उन्हें उनके विचारों को जानने का मौक़ा दिया और उनकी क्षमता और उनके चरित्र का आकलन करने का अवसर दिया। अकाउंट्स सीखने के बाद, बसंत कुमार ने मुरलीधर डालमिया और सीताराम खेमका (फिर से, दोनों बनिया) के अधीन मिल का प्रबंधन करना सीखा।

उन्होंने मशीनों को चलाना सीखा। हालाँकि, 70 साल की उम्र में, वे मानते हैं कि उनकी कमज़ोरी तकनीकी मामलों में है। वे निम्नलिखित कारण बताते हैं: इंजीनियरिंग का पर्याप्त प्राथमिक ज्ञान नहीं, विविध व्यवसाय, तकनीशियन साइट पर काम करते थे जहाँ वे अक्सर उनसे नहीं मिल पाते थे। ऐसा नहीं था कि उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उनका "योगदान मुख्य रूप से आर्थिक और वित्तीय था"।

13 साल की उम्र में, परिवार ने घोषणा की कि वे बीके को पैसे देना बंद कर देंगे। उन्हें अपने खर्चों का प्रबंधन करना था, और घर के खर्च में योगदान देना था, शेयर बाजार से पैसे कमाकर, जिसे उन्हें परिवार के दलाल की मदद से खुद ही तय करना था। उन्होंने पहले साल, 1935 में ₹ 4,000 कमाए, और 14 साल की उम्र में आयकर का भुगतान किया।

1921 में जन्मे बीके ने 1936 में 15 साल की उम्र में काम करना शुरू किया। उन्होंने अपनी डायरी (अंग्रेजी में) में लिखा: "मैंने अपना व्यवसायिक करियर शुरू किया। तीन बजे ऑफिस गया, जूट मिल और कॉटन मिल में अकाउंटिंग सीखी। 5:45 तक काम किया। 'युद्ध आनंद' का अनुभव किया। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि एक व्यवसायी के रूप में मुझ पर अपना आशीर्वाद बरसाएं।"

1939 के मध्य में, 18 वर्ष की आयु में, उन्हें भारत की सबसे बड़ी मिल, केसोराम दी गई, जो घाटे में चल रही थी। कुछ महीने बाद, नेविल चेम्बरलेन ने हिटलर के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। ब्रिटिश सरकार ने अपने सैनिकों के लिए होजरी की खरीद आक्रामक तरीके से शुरू कर दी, और भारतीय मिलों का मुनाफा बढ़ गया।

19 तक बीके स्वतंत्र हो गया था। जीडी से केवल तभी परामर्श की आवश्यकता होती थी जब नई पूंजी जारी की जाती थी। अन्यथा मुखिया ने प्रबंधकों से मिलना बंद कर दिया और दूर रहने लगे, केवल कभी-कभार पूछताछ करते थे: "बसंत, केसोराम ठीक चल रही है न? क्या फायदा है?"

जीडी ने जब यह सलाह दी तो वह सामान्य थी: "सावधान रहो, अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत रखो, इज्जत पर कोई दाग नहीं लगना चाहिए।"

यह अविश्वसनीय है कि एक 19 वर्षीय युवक ने भारत की सबसे बड़ी मिल का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया।

पाठ II: व्यापार करना व्यापार करके सीखा जाता है।

मिल के साथ-साथ बीके को एक नया काम सौंपा गया। जीडी ने उन्हें हंगरी के एक फार्मास्यूटिकल्स विशेषज्ञ डॉ. पर्क्स से मिलवाया और 10 मिनट की चर्चा के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया। बीके और पर्क्स को एक दवा फर्म शुरू करनी थी। कौन सी दवा? उन्हें नहीं बताया गया और उन्हें खुद ही इसका पता लगाना था। डॉ. पर्क्स ने बाजार को स्कैन किया और तय किया कि यह एक हार्मोनल दवा होनी चाहिए। इसके लिए गाय के अंगों की आवश्यकता थी, जिसे उन्होंने बूचड़खाने से हासिल किया।

जीडी को इससे कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन जब परिवार के बड़े लोगों, बीके के दादा और चाचाओं को पता चला कि "बवंडर मच गया"। जानवरों के अंग? गाय के!? वे बीके पर भड़क गए और उन्होंने इसे दिखाया। इसके बाद परियोजना को कुछ महीनों के लिए स्थगित कर दिया गया, जबकि बीके ने चिढ़े हुए डॉ. पर्क्स को समझाने की कोशिश की कि उन्हें दूसरा रास्ता क्यों खोजना पड़ा।

विश्व युद्ध शुरू होने के कुछ समय बाद ही डॉ. पर्क्स हंगरी वापस चले गए। परियोजना समाप्त हो गई। बिड़ला ने अपने घाटे का लेखा-जोखा किया। यह 2.5 लाख रुपये निकला और ऑडिटर किशनदत्त गोयनका ने कहा कि हिसाब-किताब ठीक नहीं है। बीके को बुलाया गया और उन्हें डांटा गया। घाटा तो ठीक था, लेकिन यह अस्वीकार्य था कि उन्होंने खातों में लापरवाही बरती।

सबक III: व्यवसाय पर नियंत्रण न होना व्यवसाय खोने से भी बदतर है।

बिड़ला राजकोषीय रूढ़िवादी थे और जीडी बिड़ला कर्ज से डरते थे। वह आमतौर पर फर्म के स्टार्ट-अप मूल्य का 25% सहायता निधि के रूप में अलग रखते थे, जो आज पूंजी की अकल्पनीय बर्बादी है। बसंत कुमार के इस प्रस्ताव पर कि वे परिवर्तनीय डिबेंचर जारी करके धन जुटाते हैं, उनकी प्रतिक्रिया थी: "मैं ऐसे जोखिम लेने के विरुद्ध हूँ।"

बसंत कुमार लिखते हैं, "यह अपने समय के लिए एक अच्छी नीति थी," "इसने हमें धीमी और ठोस वृद्धि दी।" 1975 के बाद, धन जुटाना और पूंजी जारी करना आसान हो गया। सरकारी स्वामित्व वाले फंड अच्छे शेयरों के लिए भूखे थे। बैंक भी पैसे उधार देने के लिए उत्सुक थे। धीरूभाई अंबानी के नेतृत्व में व्यापारियों की एक नई पीढ़ी ने बड़े उद्यम बनाने शुरू किए।

1981 में, 37 वर्षीय आदित्य बिड़ला ने अपने पिता बीके से कहा कि वे परिवर्तनीय डिबेंचर जारी करके भारतीय रेयान का विस्तार करना चाहते हैं। बीके सहमत हो गए। जब ​​जीडी को पता चला, तो वे हैरान रह गए और अपने बेटे से इस बारे में पूछा। बीके पीछे नहीं हटे और आदित्य ने अपनी बात मनवा ली।

पाठ IV: रूढ़िवादिता स्थिर नहीं रहती। अपने परिवेश को जानें और उसमें अपनी स्थिति जानें।

बीके ने विस्तार से लिखा है कि जीडी की मृत्यु के बाद बिड़ला ने किस तरह व्यावहारिक रूप से अपने साम्राज्य को विभाजित किया। यहाँ बहुत सारी सामग्री है और मैं भविष्य में किसी लेख में इस पर वापस आऊँगा।

मेरे मित्र शशांक जैन, जो स्वयं बनिया हैं, कहते हैं कि प्रबंधन का लेखा-आधारित दृष्टिकोण दूसरे युग का है।

आज, आधुनिक विचारों सहित अधिक कौशल की आवश्यकता है। यह कितनी उल्लेखनीय बात है कि बनिया ने इसे भी दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से अपनाया है। भारत की सबसे छोटी जातियों में से एक, वह भारत के 10 सबसे अमीर लोगों की सूची में नंबर 1. मुकेश अंबानी 2. लक्ष्मी मित्तल 4. सावित्री जिंदल 5. सुनील मित्तल 6. कुमार मंगलम बिड़ला 7. अनिल अंबानी 8. दिलीप सांघवी और 9. शशि और रवि रुइया पर है।

हम सभी बनियों से सीख सकते हैं, तथा उनसे वह सीख सकते हैं जो हमारी संस्कृति और हमारी जाति से छूट गया है।

SABHAR : AKAR PATEL आकार पटेल एक लेखक और स्तंभकार हैं।

बनिया समुदाय का व्यापार में कुशल होने का क्या कारण है?

बनिया समुदाय का व्यापार में कुशल होने का क्या कारण है?

बनिया समाज में अग्रवाल, माहेश्वरी और जैन (ओसवाल, पोरवाल आदि) लोगों को लिया जाता है - मैं यहाँ पर राजस्थान के इन लोगों के बारे में बताऊंगा जिनको मारवाड़ी भी कहा जाता है. ये एक अफ़सोस है की साम्यवादी लेखकों के निहित लक्ष्यों के कारण मारवाड़ी को हर साहित्य और हर फिल्म में एक लोभी लालची के रूप में दर्शाया जाता रहा है. कोई भी फिल्म देखिये या कोई भी काल्पनिक उपन्यास पढ़िए - कुछ पात्र इस प्रकार लिखे जाएंगे - एक मारवाड़ी होगा जो बहुत लोभी और निर्दयी होगा और एक पठान होगा जो बहुत सहयोगी होगा - ये जानबूझ कर इस समाज को हीनभावना से भरने का षड्यंत्र था. मारवाड़ी समाज के बारे में कुछ शोध-आधारित सामग्री प्रस्तुत है - अगर आप फिल्मों में दिए हुए इम्प्रैशन को एक बार के लिए हटाएंगे तो इसको पढ़ पाएंगे नहीं तो आप ये ही मान कर चलेंगे - मारवाड़ी यानी .... .परिवर्तन संसार का नियम है और इसका कोई अपवाद नहीं है. हर अगली पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी पुरानी, दकियानूसी, पुरातनपंथी और अविकसित नजर आती है और इसी कारण हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की व्यवस्थाओं को बदल देती है और नयी व्यवस्थाएं स्थापित करने का प्रयास करती है. इसी प्रक्रिया में कई परम्पराएं लुप्त हो जाती है और फिर हम चाह कर भी उनको नहीं सहेज सकते हैं. ऐसी ही एक व्यवस्था है मारवाड़ी प्रबंधन शैली. नयी पीढ़ी ने पाश्चात्य शिक्षा को अपना लिया है और वे अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी संकोच करते हैं. जो मारवाड़ी प्रबंध शैली अनेक वर्षों की गुलामी के बाद भी सलामत रह गयी वो आजादी के बाद उपेक्षा का शिकार हुई और कुछ ही दशकों में लुप्त हो गयी. सरकार या किसी भी प्रबंध संस्थान की तरफ से इस अद्भुत प्रबंध शैली को लिपिबद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए. भारतीय प्रबंध संस्थानों ने विदेशों की प्रबंध शैलियों को सीखने और समझने में अपना सारा समय लगा दिया और उन्ही प्रबंध शैलियों को आगे बढ़ावा दिया लेकिन इस अद्भुत प्रबंध शैली को हीन दृष्टि से देखा और उस उपहास के कारण ये व्यवस्था आज लुप्त हो चुकी है. आज का ये फैशन बन गया है की प्रबंध सीखना है तो अमेरिका की कुछ प्रबंध संस्थाओं में जाओ (वो संस्थाएं वाकई महान है) लेकिन अफ़सोस तो ये है की अद्भुत प्रबंध दक्षता रखने वाले मारवाड़ी अपनी नयी पीढ़ी को अपनी प्रबंध दक्षता सिखाने की बजाय इसी फैशन में बह कर विदेश से प्रशिक्षित करवा रहे हैं. आधुनिक शिक्षित लोगों ने ऐसा चश्मा पहना है की उनको भारतीय व्यवस्थाओं में अच्छाइयां ढूंढने से भी नहीं मिलती हैं - शायद उनको मेरे इस लेख में भी कुछ भी काम का न मिले. लेकिन १०० साल बाद पश्चिम से किसी ने भारत पर अध्ययन किया और फिर किसी ने पूछा की अद्भुत भारतीय व्यवस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए कौन जिम्मेदार है तो क्या जवाब देंगे ?

एक समय मारवाड़ी व्यावसायिक दक्षता पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत पहचान स्थापित कर चुकी थी लेकिन आज ये कला लुप्त होने के कगार पर है. मारवाड़ी प्रबंध शैली दुनिया में कहीं पर भी पूरी तरह से लिखी हुई नहीं है और ये उन लोगों के साथ ही विदा हो गयी है जो लोग इस कला में मर्मज्ञ थे. लेकिन जैसे ही ये पूरी तरह लुप्त हो जायेगी - वैसे ही हमें अहसास होगा की एक बहुत ही शानदार प्रबंध व्यवस्था हमने खो दी है.

लुप्त हुई मारवाड़ी व्यवस्था का आज कोई जिक्र बेमानी है लेकिन फिर भी उनकी कुछ व्यवस्थाओं के बारे में मैं अवश्य जिक्र करना चाहूँगा: -

१. मौद्रिक प्रबंधन और ब्याज गणना की अद्भुत व्यवस्था : - मारवाड़ी प्रबंध व्यवस्था का आधार मौद्रिक गणना है और इसी कारण ब्याज को नियमित रूप से गिना जाता है जो की पैसे के समुचित सदुपयोग के लिए जरुरी है. फिल्मों में मारवाड़ी ब्याज पर बहुत ही उपहास और व्यंग्य नजर आते हैं लेकिन आज ये ही व्यवस्थाएं आधुनिक बैंकिंग संस्थाएं अपना रही है. बाल्यकाल से ही गणना (गणित) का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और इसी कारण बिना केलकुलेटर के भी कोई भी व्यक्ति दशमलव अंकों की गुना-भाग भी आसानी से कर लिया करते थे और गणना में छोटी से छोटी गलती की भी बड़ी सजा मिलती थी. ब्याज जितना होता है उतना ही लेना सिखाया जाता है - एक पैसा भी हराम का लेना पाप है और इसी प्रशिक्षण के कारण मारवाड़ी ब्याज की गणना भी करता है लेकिन अपने धर्म का भी पालन करता है - लेकिन अफ़सोस ये है की आपने तो फिल्मों में उसको हमेशा लोभी और लालची के रूप में ही देखा है - आप जब तक मारवाड़ी परिवारों में रह कर ये सब नहीं देखोगे विश्वास नहीं करोगे - मैंने तो बचपन से ये सब देखा भी है और बार बार आजमाया भी है - कई बार जान बुझ कर ज्यादा भुगतान कर के भी देखा और एक एक पाई वापिस लेनी पड़ेगी क्योंकि हराम का नहीं लेना बचपन से सिखाया जाता है - बचपन से ये ही प्रशिक्षण मिलता है की सही नियत रखिये और सही गणना करिये

२. जीवन पर्यन्त की प्रबंध कारिणी - यानी मुनीम व्यवस्था: मारवाड़ी व्यवस्था में मुनीम को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता था. मुनीम को आधुनिक व्यवस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के सामान इज्जत और सम्मान दिया जाता था और उसके ऊपर पूरा विश्वास किया जाता था. उसको पारिवारिक सदस्य की तरह सम्मान मिलता था. उसको जीवन पर्यन्त के लिए व्यवसाय का प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता था. उसके परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाई जाती थी ताकि उसके परिवार को कोई परेशानी न हो.

३. पड़ता व्यवस्था : मारवाड़ी निर्णय का आधार पड़ता यानी शुद्ध लाभ. शुद्ध लाभ की गणना का ये तरीका अद्भुत था. इसमें सिर्फ अस्थायी आय और अस्थायी खर्चों के आधार पर हर निर्णय से मिलने वाले शुद्ध लाभ या हानि पर चिंतन कर के ये निर्णय लिया जाता था की मूल्य क्या रखा जाए.

४. संसाधन बचत : मारवाड़ी अपने हर निर्णय में संसाधनों का कमसे कम इस्तेमाल कर के अधिक से अधिक बचत करने का प्रयास करते थे और इस प्रकार पर्यावरण की बचत में योगदान देते थे. मारवाड़ी एक दूसरे को चिठ्ठी भी लिखते थे तो उसमे कम से कम कागजों का इस्तेमाल करते हुए अधिक से अधिक जानकारियां प्रेषित करते थे.

५. बदला व्यवस्था: मारवाड़ी अपने सौदों को भविष्य में स्थानांतरित करने के लिए बदला व्यवस्था काम में लेते थे जिसके तहत सौदों को आगे की तारीख पर करने के लिए निश्चित दर से ब्याज की गणना होती थी. (ऐसी ही कुछ व्यवस्था विकसित करने के लिए दो अर्थशास्त्रियों को हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया लेकिन मारवाड़ियों की इस व्यवस्था को रोक दिया गया था)

६. हुंडी व्यवस्था: आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के शुरू होने से भी अनेक वर्ष पहले से मारवाड़ी व्यापारी हुंडी व्यवस्था को चलाते आ रहे हैं जिसको अंग्रेजों ने पूरी तरह से रोक दिया और फिर आजादी के बाद आधुनिक सरकार ने पूरी तरह से ख़तम कर दिया था. ये हुंडी व्यवस्था आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से कम लागत पर मुद्रा के स्थानांतरण का माध्यम था जिसमे बिना तकनीक या बिना इंटरनेट के भी आज की तरह ही एक जगह से दूसरी जगह पर मुद्रा का आदान प्रदान होता था.

७. पर्यावरण अनुकूल निर्णय: मारवाड़ी हमेशा पर्यावरण अनुकूल निर्णय लिया करते थे - जिसमे वे स्थानीय पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बिना ही व्यापार और व्यवसाय को बढ़ावा देने का प्रयास करते थे.

८. धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना : व्यापार शुरू करने से पहले वे मंदिर बनाते थे और शुभ - लाभ लिखते थे. शुभ यानी हर व्यक्ति का कल्याण लाभ से पहले लिखते थे ताकि हर निर्णय को सबके कल्याण के लिए ले सकें. हर निर्णय को धर्म - और अध्यात्म के आधार पर जांचा जाता था. तकनीक के देवता विश्वकर्मा की पूजा की जाती थी तो धन के देवता गणेश और लक्ष्मी को आराध्य माना जाता था. सभी निर्णय सिद्धांतों पर आधारित होते थे और सबसे बड़ा सिद्धांत ये था की जो भी निर्णय हो वो जीवन को जन-कल्याण और आत्मकल्याण की तरफ ले जाए. जीवन का मकसद था केवलयज्ञान की तरफ जाना और इसी लिए हर निर्णय को पुण्य का अवसर के रूप में देखा जाता था और पाप से बचने के प्रयास किये जाते थे. ऐसी तकनीक नहीं अपनायी जाती थी जिससे जीवों का नाश हो. शुरुआत करते समय से ही सकल भ्रमांड के कल्याण को आदर्श के रूप में रखा जाता था.

९. देवों को अर्पण : - हर व्यापारिक निर्णय श्री गणेश और रिद्धि सिद्धी की आराधना के बाद किया जाता है. श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है. आय का कुछ हिस्सा देवों को अर्पित कर दिया जाता था जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण के काम में आता था. व्यापार की आम्दानी का कुछ भाग गोशाला या ऐसी ही अन्य किसी संस्था को देने से ये माना जाता था की देवताओं का हिस्सा उनको अर्पित कर दिया गया है. प्राचीन भारत में इसी कारण मंदिरों में प्रचुर संपति दान में आती थी जो किसी न किसी रूप में समाज के कल्याण हेतु अर्पित की जाती थी.

१०. गद्दियों की व्यवस्था: आधुनिक तड़क भड़क की जगह मारवाड़ी अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गद्दियों की व्यस्था रखते थे जो बहुत ही आरामदायक, आत्मीयता पूर्ण और स्वच्छता पर आधारित माहौल बनाती थी. ये मेहमानों के ढहरने के लिए भी काम आती थी. किसी मेहमान को जरुरत के समय इन्हीं गद्दियों में रुकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाती थी ताकि अनावश्यक होटल का खर्च भी नहीं होता था. आधुनिक एयर कंडीशन ऑफिसों से तुलना करके पर्यावरण के ज्यादा अनुकूल क्या है ये आप स्वयं तय कर सकते हैं.

११. बचत और उत्पादकता पर जोर : मारवाड़ी व्यवस्था में बचत और उत्पादकता पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था और इसी कारण विषम परिस्थितियों में भी मारवाड़ियों ने व्यापार कर के अपने आप को सफल बनाया. आधुनिक कंपनियों की जगह पर मारवाड़ियों ने बचत और उत्पादकता के क्षेत्र में शानदार कार्य किया और वैश्विक व्यापार स्थापित किया. रविवार की जगह पर अमावस्या की छुट्टी होती थी (यानि महीने में सिर्फ एक दिन की छुट्टी) - लेकिन सामान्य दिनों में भी कार्य के घंटे बहुत ज्यादा होते थे - लेकिन हर कर्मचारी को साल में एक महीने अपने गांव जाने की छुट्टी दी जाती थी.

१२. जरुरत पड़ने पर राज्य की मदद: - मारवाड़ी व्यवसायी उस समय के राजा की जरुरत के समय आर्थिक मदद किया करते थे और इसी कारन अनेक शहरों में मारवाड़ी व्यापारियों को नगर-शेठ की उपाधि दी जाती थी. कई बार देश हित में व्यापार और उद्यम की बलि भी चढ़ा दी जाती थी.

१३. स्थानीय लोगों की भागीदारी: मारवाड़ी जहाँ पर भी व्यापार करने के लिए जाते थे वहां के स्थानीय लोगों को अपने व्यापार और उद्योगों से लाभान्वित करने का प्रयास करते थे और इसी कारण उनको स्थानीय लोगों से पर्याप्त सहयोग और सम्मान मिलता था.

१४. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध को सहना : मारवाड़ियों को अन्य भारतियों की तरह सत्ता पक्ष से विरोध का सामना करना पड़ा. डाकुओं, लुटेरों और अनेक अधिकारियों को मारवाड़ी सरल लक्ष्य नजर आते थे जिन पर वे अपने अत्याचार आसानी से कर लेते थे. सत्ताधारी उनसे मनमाना टैक्स वसूलते थे. ब्याज की सूक्ष्म गणना किसी को भी अच्छी नहीं लगती थी. लोग मारवाड़ियों से पैसे तो उधार लेना चाहते थे लेकिन ब्याज नहीं देना चाहते थे लेकिन मारवाड़ियों की सफलता का आधार ही उनकी सूक्ष्म गणना थी जिस के कारण वे पैसे के सही इस्तेमाल पर जोर देते थे. अंग्रेजों और उनके इतिहासकारों ने मारवाड़ियों को सूदखोर के रूप में स्थापित किया क्योंकि अंग्रेजों को मारवाड़ियों की व्यवस्था बैंकिंग व्यवस्था से बेहतर नजर आयी और वे आधुनिक बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ियों को हटाना चाहते थे - जबकि मारवाड़ी खुद बैंकिंग व्यवस्था के समर्थक थे और बैंकें भी मारवाड़ियों की तरह चक्रवर्ती ब्याज लेती थी. मारवाड़ी किसानों को जरुरत के समय पर ऋण प्रदान करदेते थे और इसी कारण अनेक वर्षों से मारवाड़ियों ने किसानों के साथ मिल कर हर जगह पर कृषि को सफल बनाने में योगदान दिया था लेकिन ये आधुनिक व्यवस्था में नकारात्मकता के माहौल में तब्दील हो गया. अंग्रेजों के बाद में आधुनिक भारत में मारवाड़ियों के योगदान और उद्यमिता को पूरी तरह से विरोध का सामना करना पड़ा और उसी के कारण मारवाड़ियों ने परम्परागत व्यवस्थाओं को बदल दिया और नयी प्रोफेशनल प्रबंधन पर आधारित व्यवस्थाओं को अपना लिया ताकि उनका विरोध न हो. आधुनिक मीडिया द्वारा मारवाड़ियों का पूरी तरह से नकारात्मक चित्रण हुआ और इस प्रकार उनकी उद्यमिता को लगाम लग गयी. मारवाड़ियों की नयी पीढ़ी अपने आपको मारवाड़ी कहने में भी हिचकिचाने लगी.

१५. सामाजिक उद्यमिता : मारवाड़ी उद्यमी अपनी आय में से कुछ राशि बचा कर के समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी क्रम में उन्होंने प्याऊ, गोशालाएं, मंदिर, शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल और धर्मशालाओं का निर्माण किया. उनके प्रयासों से राजस्थान में विकट परिस्थितियों में भी लोगों को रहने में दिक्कत नहीं आयी. आजादी से पहले अनेक शिक्षण संस्थाएं मारवाड़ियों ने इस प्रकार स्थापित की ताकि भारतीय संस्कृति भी सलामत रहे और युवा पीढ़ी भी शिक्षित हो सके.

१६. विपणन की व्यक्तिगत शैली: - आधुनिक विज्ञापन आधारित व्यवस्था की जगह पर मारवाड़ी व्यवसायी व्यक्तिगत संपर्क और व्यक्तिगत सेवा पर आधारित विपणन व्यवस्था अपनाते थे जिसमे एक व्यक्ति को ग्राहक बनाने के बाद पूरी जिंदगी उसकी जरूरतों के अनुसार उत्पाद उसको प्रदान करते थे. व्यापारिक रिश्तों को पूरी जिंदगी निभाया जाता था और व्यापारिक सम्बन्ध मधुर व्यवहार, वैयक्तिक संबंधों और आपसी विश्वास पर आधारित होते थे. "अच्छी नियत" के आधार पर ही सारे निर्णय लिए जाते थे ताकि पूरी जिंदगी व्यापारिक सम्बन्ध बना रहे और इसी लिए आपसे मेलजोल, जमाखर्च, लेनदेन और आपसी खातों के मिलान पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था.

१७ दीर्धजीवी उत्पाद : मारवाड़ी ऐसे उत्पाद विकसित करते थे जो दीर्ध समय तक सलामत रह सके और इस प्रकार निवेश करते थे ताकि दीर्ध काल तक कोई दिक्कत न आये. आधुनिक कम्पनियाँ ऐसे उत्पाद बनाती है जो अलप काल में ही नष्ट हो जाएं. वे पैकेजिंग और विज्ञापन पर अत्यधिक अपव्यय करती है लेकिन मारवाड़ी लोग इस प्रकार के अपव्यय को बचाते थे.

१८. साख पर बल: मारवाड़ी अपने व्यापर में साख बनाने पर सबसे अधिक जोर देते थे और साख पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने देते थे. इसी कारण "गुडविल" शब्द के आने से बहुत पहले से साख और "नाम" जैसे शब्द मारवाड़ी व्यापारिक जगत में काम आते थे.

१९. कार्य विभाजन व युवाओं को मार्गदर्शन : मारवाड़ी व्यापर में बुजुर्ग लोग नीतिगत निर्णय लेते हैं लेकिन युवा रोज का काम देखते हैं - अतः इस प्रकार सभी लोगों में काम बंटे रहते थे और आपसी तालमेल भी बना रहता था. सबसे बड़ा पुरुष व्यक्ति कर्ता कहलाता था और वो सभी नीतिगत निर्णय लेता था. परिवार के युवा उससे मार्गदर्शन ले कर रोजमर्रा के निर्णय लेते थे और उसको एक एक पैसे का हिसाब देते थे. पूरे घर में एक ही रसोई होती थी और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ में नहीं बहाया जाता था. अन्न का सबसे पहला टुकड़ा गाय, फिर अन्य प्रमुख जानवरों जैसे कुत्तों आदि के लिए निकला जाता था और फिर घर के लोग खाना कहते थे. भोजन सामान्य लेकिन होता था लेकिन बड़े प्यार से मिल कर खाने में अलग ही आनंद होता था. थाली में एक भी दाना व्यर्थ नहीं छोड़ा जाता था. थाली में सबसे पहले कर्ता भोजन की शुरुआत करता था और आखिर में भी वो ये ही देखता की कोई भी भूखा नहीं रह गया है और सबसे आखिरी दाना (अगर कुछ बच जाए) गृह स्वामिनी उठाती थी. आज की बड़ी कंपनियों की पांच सितारा संस्कृति की तुलना में बहुत कम भोजन व्यर्थ जाता था. भोजन के समय ही अच्छे उद्यमियों और अच्छे सामाजिक आदर्शों का वृत्तांत सुनाया जाता था जो युवाओं को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित करता था. ऐसा माना जाता था की साथ में भोजन करने से आपसी प्रेम बढ़ता है. साल में कम से कम एक बार पूरा परिवार तीर्थयात्रा के लिए या सत्संग के लिए जाता था जो परिवार के लोगों को जीवन मूल्यों से जोड़ देता था. व्यवसाय का केंद्र परिवार था - परिवार का आपसी प्रेम व्यापारिक संबंधों में भी परिलक्षित होता था.

२०. प्रेम भरा संवाद : मारवाड़ी लोगों ने अनेक व्यवस्थाएं की थी जिनमे आपसी मधुर संवाद हो सके. सब पुरुष लोग एक साथ एक ही थाली में भोजन करते थे और सब महिलायें एक साथ एक ही थाली में भोजन करती थी. इस प्रकार भोजन के दौरान आपस में मधुर संवाद स्थापित हो जाता था. रात्रि में युवा वर्ग बुजुर्गों के पैर दबाता था और उसी दौरान बुजुर्ग लोग युवाओं को व्यापारिक सीख भी दिया करते थे और दिन भर के समाचार भी पूछ लेते थे. उसी समय वे उनको व्यावसायिक नीतियों और परम्पराओं की शिक्षा भी प्रदान करते थे. इसी प्रकार मारवाड़ी उद्यमी अपने कर्मचारियों से भी प्रेम से बात करते थे और इस प्रकार एक सौहार्द-पूर्ण माहौल बनाया करते थे.

२१. सुव्यवस्थित खाते और सुव्यवस्थित वार्षिक विवरण : - मारवाड़ी उद्यमी दिवाली से दिवाली अपने व्यापार के बही - खाते रखते थे. बहीखाते बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे जाते थे जिनमे कभी भी कोई त्रुटि नहीं होती थी. हर विवरण बहुत ही सहेज कर रखा जाता था. हर दिवाली को नयी पुस्तकों में खाते - बही की पूजा कर के शुरुआत की जाती थी. हर खाता पूरी तरह से व्यवस्थित होता था. उस जमाने में कम्प्यूटर नहीं था अतः सारे खाते वर्षों तक सुरक्षित रखे जाते थे.

पूरी दुनिया जानती है किस प्रकार बजाज, बिरला, सिंघानिया, पीरामल, लोहिया, दुगड़, गोलछा, संघवी, मित्तल, पोद्दार, रुइया, और बियानी आदि घराने अपने व्यापारिक कौशल से आगे बढे हैं. बिरला समूह तो इस बात के लिए जाना जाता है की वो फैक्ट्री बाद में लगाता है - पहले वहां लक्ष्मी नारायण का मंदिर बनाता है, लोगों को रहने के लिए मकान देता है और फिर फैक्ट्री लगाता है. है न अद्भुत बात. भामा शाह ने राणा प्रताप को दिल खोल कर मदद की तो जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को दिल खोल कर मदद की. इन्हीं नीतियों के कारण अंग्रेजों के आने से पहले भारत में लाखों गुरुकुल, उपासरे, पोशालाएँ, धर्मशालाएं, भोजनशलायें कार्यरत थी और उस समय की शिक्षा मूल्य परक थी. उस समय में हर घर में श्रवण कुमार जैसे पुत्र होते थे जो अपने व्यापार से ज्यादा अपने माँ - बाप और देश की सेवा को तबज्जु देते थे. मारवाड़ी व्यवस्था में कमियां निकालना बहुत आसान है लेकिन उसकी जो अच्छाइयां हैं उनको अगर आज का उद्यमी अपनाता है तो वो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल प्रबंध व्यवस्था स्थापित कर पायेगा और इससे उसका और इस दुनिया का दोनों का भला ही होगा. लेकिन लुप्त हो रही इस व्यवस्था से सीखना और इसको आगे बचाना अब तो मुश्किल ही है. अमेरिका की आधुनिक प्रबंध शिक्षा हो सकता है अधिक आर्थिक सफलता प्रदान कर दे लेकिन जो सुकून और पर्यावरण से जो जुड़ाव भारतीय व्यवस्थाओं ने स्थापित किया था वो तो अब लुप्त ही हो गया है और इसके लिए वर्तमान पीढ़ी ही जिम्मेदार है.

त्रिलोक कुमार जैन

OMAR VAISHYA - उमर एक भारतीय बनिया जाति

OMAR VAISHYA - उमर एक भारतीय बनिया जाति

उमर एक भारतीय बनिया जाति (लेवेंटाइन या लेवाइट्स) है जो मुख्य रूप से मध्य उत्तर प्रदेश (कानपुर क्षेत्र), मगध, अवध, विदर्भ क्षेत्र और पूर्वांचल में पाई जाती है। वे अयोध्या से उत्पन्न होने का दावा करते हैं, और फिर अवध के अन्य हिस्सों में फैल गए, अंततः उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड के विभिन्न हिस्सों में बस गए। कुछ सिद्धांतों और प्राचीन ग्रंथों से पता चलता है कि 'उमर' नाम ओम से लिया गया है जो धार्मिक या भारतीय धर्मों, यानी हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म में एक पवित्र/रहस्यमय शब्दांश है। उमर को उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के विभिन्न हिस्सों में उमर के नाम से जाना जाता है। वे उपनाम के रूप में "उमर" "उमर" और "गुप्ता" का उपयोग करते हैं। अधिकांश लोग कानपुर, सोनभद्र, हमीरपुर, महोबा, बांदा, जालौन, मुंगरा बादशाहपुर, शाहजहाँपुर, प्रतापगढ़ और सुरियावां में रहते हैं; और झारखंड के देवघर जिले में; बिहार के जमुई, साहिबगंज, सिवनी, सारन और गोपालगंज जिले में। जीवन स्तर मध्यम वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक भिन्न होता है। एक बड़ा और जीवंत उमर वैश्य भी महाराष्ट्र के पूर्वी भाग के विदर्भ में साकोली क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित समुदाय के रूप में स्थापित है। उमर के तीन उप-विभाग हैं, तिल उमर, डेरध उमर और दोसर। डेरध उमर वैश्य के अधिकांश लोग उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र जैसे राठ, उरई, महोबा, छतरपुर और झांसी आदि में रहते हैं। ऐतिहासिक रूप से, उमर मुख्य रूप से दुकानदार, औद्योगिक क्षेत्र में उच्च श्रेणी के व्यवसायी, रत्न और आभूषण, उच्च सरकारी अधिकारी और उच्च शिक्षित, बहुत बुद्धिमान लोग थे, लेकिन अब उनमें से कई ने अन्य व्यवसाय अपना लिए हैं। उनके रीति-रिवाज कसौंधन, एक अन्य बनिया समुदाय के समान हैं। इस जाति के कई लोगों का देवघर, प्रांत में "आयोजक" के रूप में व्यवसाय भी है ।

Friday, January 31, 2025

महान तेली वैश्य संत श्री संतजी महाराज जगनाडे

श्री संत संताजी महाराज जगनाडे 

संता नहीं जाता. संत का कार्य मानव जाति के लिए होता है। हम सभी जानते हैं कि संत संताजी महाराज एक महान संत हुए और उन्होंने इसी प्रकार समाज सुधार का कार्य भी किया।

उन्होंने संत तुकाराम महाराज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सारे कार्य किये। और महाराष्ट्र में तेली समाज का गठन किया।

संतजी महाराज का जन्म 8 दिसंबर 1624 को हुआ था। दादा भिवसेठ जगनाडे , पिता विठोबाशेठ और मां मथुबाई सुंदुमबारे के काले परिवार से थे। संताजी की शिक्षा साक्षरता और अंकगणित तक ही सीमित थी। घर के हालात बहुत अच्छे थे. तो संताजी को कोई कमी महसूस नहीं हुई. 10 साल की उम्र में संताजी के पिता ने उन्हें तेल व्यवसाय से परिचित कराया। और विवाह 11 वर्ष की उम्र में खेड़ के काहने परिवार की यमुनाबाई से हुआ। यमुना बहुत छोटी थी. संसार क्या है ? दोनों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी. उस समय समाज में बाल विवाह आम बात थी। संताजी महाराज और तुकाराम महाराज की मुलाकात शक 1562 यानी जनवरी 1640 में हुई थी। तुकोबा की पहली पत्नी यानी रखमाबाई का एक बेटा था जिसका नाम संतू था। ढाई वर्ष के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गई। रखमाबाई की मृत्यु भी क्रोनिक अस्थमा से हुई। कीर्तन में संतजी को देखकर तुकारामण को अपने बेटे की याद आ गई। क्योंकि उनके बेटे का नाम भी संथु है. उनके मन में संतजी के प्रति प्रेम और स्नेह विकसित हो गया । अत: महाराज ने संतजी को अपने सान्निध्य में रखा।

संतजी महाराज के लेख एवं भजनों के रचयिता तुकाराम महाराज मिलते हैं। दरअसल, तुकाराम महाराज को ऐसे किसी लेखक की जरूरत नहीं थी, वे खुद तो अच्छा लिख-पढ़ लेते थे, लेकिन कीर्तन के दौरान उनके मुंह से निकलने वाली प्रारंभिक कविताओं और नए अभंग संताजी को वे लिख लिया करते थे।

संतजी तुकाराम महाराज को गुरुस्थानी मानते थे। और उन्हीं के कारण आज हमें तुकाराम महाराज का अनमोल साहित्य प्राप्त हुआ है। संताजी का पत्र बहुत सुंदर था. वे अपनी नोटबुक में तुकाराम के नये-नये पद लिखते थे। उसने हजारों टुकड़े संग्रहित कर रखे हैं। इतिहास साक्षी है कि संतजी महाराज के कारण ही लोगों ने तुकाराम महाराज की महिमा को समझा। उनकी स्मृति सचमुच सराहनीय थी। आज भी, उनके द्वारा स्वयं बनाया गया गंदगी का मलबा कई स्थानों पर पाया जा सकता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। बहुत ही कम उम्र में संतजी महाराज को तुकरत महाराज का कीर्तन गाने को मिला। और तब से उन्हें कीर्तन के प्रति आकर्षण पैदा हो गया और इससे वे तुकाराम महाराज के प्रति आकर्षित हो गए क्योंकि उनका पिछले जन्म में तुकाराम महाराज के साथ एक रिश्ता था।

संतजी महाराज की कड़ी मेहनत के कारण तुकाराम की गाथा जीवित रह सकी। तुकाराम महाराज के नियमित सान्निध्य और मार्ग दर्शन के कारण संतजी का गठन अच्छी तरह से हो गया, विशेषकर मोगली आक्रमण के समय, संतजी महाराज ने अपनी जान की परवाह किये बिना तुकाराम महाराज के अभंग, कीर्तन और काव्य ग्रंथों की रक्षा की।

चाकण के कीर्तन के बाद संतजी सदैव तुकाराम महाराज के सान्निध्य में रहे । लिया महाराज की संगति के कीर्तन का संतजी के मन पर असाधारण प्रभाव पड़ा। और घर-संसार की उपेक्षा करने लगे। प्रतिदिन कीर्तन और अभंग से आम लोगों की समस्याओं का समाधान हो रहा था, समस्या के समाधान के लिए कोई भी ब्राह्मण के पास नहीं जाता था। इससे ब्राह्मणों को कष्ट होने लगा। उन्हें दक्षिणा मिलना बंद हो गया और उनका सारा क्रोध तुकाराम महाराज पर फूट पड़ा। और उस स्थान पर न्यायाधीश के रूप में स्वयं रामेश्वर भट्ट कार्यरत थे और उन्होंने इस प्रकार निर्णय दिया। तुकाराम को गाथाएँ लिखने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि वह पवित्र है. कीर्तन करने और प्रणाम करने का कोई अधिकार नहीं है. उसकी संपत्ति जब्त कर उसे गांव से बाहर निकाल दो। और उनकी कहानियों को इंद्रायणी नदी में विसर्जित कर देते हैं। इस प्रकार का परिणाम स्वयं रामेश्वर भट्ट ने दिया था। तुकारा महाराज को कई बार पीटा गया। उसके संतजी महाराज साक्षी हैं। उन्होंने तुकाराम महाराज को कभी अकेला नहीं छोड़ा। संतजी महाराज को कई बार धमकियाँ भी मिलीं और उन पर कई बार हमले भी हुए। तुम्हें नींद आती है या नहीं ? अन्यथा तुम जीवित नहीं बचोगे. और तुम्हारा भी! हालाँकि, संतजी महाराज डरे नहीं। तुकोबारया की गाथा को इंद्रायणी में डुबाने का फैसला तो रामेश्वर भट्ट पहले ही दे चुके थे। जीवन भर कड़ी मेहनत करके अभंग द्वारा लिखी गई सभी पुस्तकें धार्मिक दबाव के कारण डूब गईं।

अगले तेरह दिनों में, संतजी महाराज की प्यास और भूख गायब हो गई और उन्होंने अपनी शानदार याददाश्त के बल पर फिर से अभंग लिखना शुरू कर दिया। सभी अभंग , कीर्तन को वैसे ही फिर से लिखा गया , गाथाएँ इंद्रायणी नदी से सूख गईं, पांडुरंग प्रसन्न हुए और एक चमत्कार हुआ। लेकिन स्थानीय लोग ये सब जानते थे. संतजी महाराज द्वारा तुकाराम महाराज की गाथा को संजोकर रखने के कारण लोगों में उनके प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न हुई और उनके प्रति आदर , प्रेम और आस्था विकसित हुई । हमारे समाज में संतजी महाराज का योगदान अत्यंत सराहनीय है। अभंग के माध्यम से उनकी शिक्षाएँ आज भी हमें उनकी याद दिलाती हैं।

ऐसा काम करो कि महिमा का बखान होता रहे। हम उसी के लिए पैदा हुए हैं. इसका इस्तेमाल करें! सावधान रहो मेरी जाति के तेलों, मृत्यु अवश्यंभावी है। वह किसी भी क्षण आ जायेगा. उसके सामने जाओ! इस जीवन का अधिकतम लाभ उठायें। संतजी महाराज ने सोचा कि एक बार मानव जन्म समाप्त हो गया तो वह दोबारा नहीं आएंगे।

फिर संताजी महाराज का 76 वर्ष की आयु में मार्गशीर्ष वद्य 13 को निधन हो गया। मृत्यु के बाद शवयात्रा में भजन-कीर्तन किये गये। उनके शरीर पर मालाएँ , फूल , गुलाल और पैसे बिखरे हुए थे । उन्हें विट्ठल के नाम पर विदाई दी जा रही थी. स्थान को साफ करने के बाद, एक गड्ढा खोदा गया और उसमें चंदन , तुलसी के पत्ते डाले गए और संतजी महाराज के शरीर को नमक के साथ एक लकड़ी के तख्ते पर रखा गया। और यद्यपि आये हुए सभी भक्तों ने हरिनाम ध्वनि के साथ उन पर खूब कीचड़ उछाला, फिर भी उनका चेहरा फीका नहीं पड़ा, बल्कि तेज दिखने लगा। लेकिन काफी समय के बाद कुछ लोगों को एहसास हुआ कि तुकाराम महाराज ने संतजी महाराज को वचन दिया था कि मैं आपके अंतिम दर्शन करने और आपकी मृत्यु के समय आपको अपनी मुठ्ठी देने जरूर आऊंगा। इस तरह की बात याद आने पर उसने मिट्टी डालना बंद कर दिया। प्रातःकाल प्रकाश की एक बड़ी किरण चमकी और कुछ ही क्षणों में तुकाराम महाराज प्रकट हो गये। और पांडुरंग का जाप करते हुए वे संतजी महाराज के शरीर के पास गए। संताजी महाराज के शरीर पर तीन मुट्ठी मिट्टी डाली गई और क्या चमत्कार था कि संताजी महाराज का सिर पूरी तरह ढँक गया। पांडुरंग पांडुरंग कहते हुए तुकाराम महाराज गायब हो गए लेकिन जाते ही उन्होंने संतजी महाराज के बारे में कहा।

चरित गोधन | मेरे शब्द खो गए हैं. हम बनने आये | एक तेल की वजह से. मरे हुए की तीन मुट्ठियाँ देखना फिर उनके चेहरे उतर गए. आलो म्हाने तुका | विष्णु के लोक संतुष्ट हों।

संताजी महाराज की अंत्येष्टि के बाद चाकन, खेड़ , कडुस , पुणे शहर और महाराष्ट्र के कोने-कोने से 13 मार्च को मार्च किया गया । बहुत से अभ्यर्थी वहां जाते हैं. और समस्त ग्रामवासियों के सहयोग से जश्न मनायें। उस समय भजन कीर्तन और प्रसाद के माध्यम से भोजन का कार्यक्रम रखा जाता है।

हालाँकि संतजी महाराज तुकाराम महाराज के चौदह अनुयायियों में से एक हैं, लेकिन संतजी महाराज ने तुकाराम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बहुत काम किया है। उन्होंने कई प्रकार के अभंगों की रचना की है। इससे सिद्ध होता है कि संतजी भक्त थे।

चूंकि संतजी महाराज लगातार तुकाराम महाराज के सान्निध्य में थे, इसलिए उन्हें पांडुरंगा का भी बोध था। सभी प्रमाण सत्य हैं कि तुकाराम महाराज, जो अपनी शुद्ध भक्ति के कारण अपने जीवन के अंत में वैकुठ में मर गए, को मृत्युलोक में लौटना पड़ा।

उनके कार्य को समाज के सभी भाई-बहन आगे बढ़ाएं और जय संतजी सिर्फ होठों से नहीं बल्कि दिल से निकले, यही श्री संतजी से प्रार्थना!!!

॥ जय संतजी ॥ ॥ जय तेली समाज ॥

लेखक :- सुश्री सुरेखा राजेंद्र हाडके म.पो. शिरवाल , ता. खंडाला , जिला. सतारा रूपाली प्रिंटिंग प्रेस मेन रोड , पिन नं. 412 801

Chhattisgarh Vaishy Teli Sahu Samaj Gotra

Chhattisgarh Vaishya Teli Sahu Samaj Gotra

छत्तीसगढ के तेली साहू समाज में प्रचलित गोत्रं

ब्रम्हा के पुत्र कषपय ऋषि को आदि गोत्र पिता एवं आदिति को गोत्र माता माना जाता है । अभी तक चिन्हित 903 गोत्रों में से लगभग 85 गोत्र छत्तीसगढ में प्रचलन में है :-

1) अष्ठबंधु 2) अठभैया 3) आडिल 4) अटभया 5) अटलखाम 6) अरठोना 7) अडील 8) आटनागर 9) आडी 10) कन्नोजिया 11) कलिहारी 12) कष्यप 13) कुंवरढांढर 14) किराहीबोईर 15) किरण 16) केकती 17) गंजीर 18) गंगबेर 19) गंगबोइर 20) गजपाल 21) गायग्वलिन 22) गाडागुरडा 23) गुरूपंच 24) गुरूमाणिक पंच 25) गुरू पंचांग 26) घिडोरा 27) चंदोले 28) चंदन मलागर 29) चोरनार 30) चोरमार 31) छटबी 32) जग्डिया 33) जेठमल 34) झपटमार 35) झपटमार सार्वा 36) ढावना 37) तेलासी 38) तोनिहा 39) तुरूपमार 40) तिलभुजिया 41) दहेले 42) धुवक्का 43) नाग 44) बाडाबाघ 45) बारावाघ 46) बाडावाक 47) बनपेला 48) बरपेला 49) बरामार 50) बेलपुरिया 51) भैंसा 52) भोंसले 53) मांढर टेका 54) मांढारटेका 55) महापात्र 56) मलघाटी 57) महमल्ला 58) महेश्वरी 59) सार्वा 60) साबराटी 61) साहढा 62) सिंह सार्वा 63) सिरपारू 64) सेनकपाट 65) सोनबोईर 66) सोनबरहा 67) सोनबरसा 68) सोनवानी 69) सोनकालर 70) सोनकथरी 71) सोनकलिहारी 72) सोनखडी 73) सोनगेर 74) सेनगेरवा 75) सोनबेर 76) सोनबेरसा 77) सोनसाटी 78) सोनपडे 79) हिरवानी 80) गुपकुमार सर्वा 81) सिरसाठ 82) सोनकला 83) सांधुरि 84) साबरसांटी 85) कौशिक 86) कौशिल 87) सुलुभ मलागर 88) लोहोरिया 89) खांडढिहा 90) बागरिया 91) पांच खोरिहा 92) मरकाम 93)

WE MAHURI VAISHYA - हम(माहुरी) कहाँ हैं?

WE MAHURI VAISHYA - हम(माहुरी) कहाँ हैं?

माहुरी एक हिंदू जाति है । माहुरी के बारे में कहा जाता है कि वे मथुरा शहर और उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों से मुगल साम्राज्य के तहत बंगाल के उपनगर में चले गए थे। एक आस्थावान समुदाय के रूप में, माहुरी वैश्य समुदाय अभी भी माता मथुरासिनी देवी , जो शक्ति का अवतार हैं , को अपने परिवार की देवी के रूप में पूजते हैं ।

माहुरी जाति की उत्पत्ति द्वापर युग में लगभग 3228 ईसा पूर्व (संभवतः) हुई थी। माहुरियों की कहानी जिसे माहुरी-वैश्य समुदाय के रूप में भी जाना जाता है, भागवत पुराण-सुख सागर में मिलती है जब भगवान ब्रह्मा ने अपनी शक्ति से सभी गोपियों को गायब कर दिया और उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए। तब भगवान कृष्ण अपनी दिव्य शक्ति से स्वयं गोपियों के रूप में अवतरित हुए। बाद में जब मूल गोपियां ब्रह्मलोक से आईं तो भगवान कृष्ण ने अपने स्वयं के अवतार को व्यापार और व्यवसाय में संलग्न होने का आदेश दिया और आशीर्वाद दिया। भगवान कृष्ण के ये वंशज बाद में मथुरा के पास 14 विभिन्न पहाड़ों और जंगलों में चले गए और अपने नामों के साथ 14 अलग-अलग खता या उपाधियों का उपयोग किया। वे देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गए। यह भी माना जाता है कि जो लोग उत्तर और पश्चिम में फैल गए वे अब महावर वैश्य समुदाय के रूप में पहचाने जाते हैं उनके खान-पान की आदतें भी एक जैसी हैं और ये सभी समुदाय ज़्यादातर शाकाहारी हैं और शराब और तंबाकू से परहेज़ करते हैं। हालाँकि लोगों की राय अलग-अलग है और यह बात व्यापक रूप से स्वीकार नहीं की जाती है कि ये तीनों समुदाय एक ही हैं। आज उनकी आबादी विशेष रूप से माहुरी-वैश्य समुदाय ज़्यादातर बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों के मगध क्षेत्र में पाया जाता है। हालाँकि वे अन्य समुदायों की तुलना में आबादी में बहुत कम हैं, लेकिन बढ़ती शैक्षिक और सामाजिक जागरूकता के साथ वे मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरु और हमारे देश के कई अन्य हिस्सों में भी बस गए हैं।

इतिहास

कई परिवार बिहार-ए-शरीफ पहुंचे , जो वर्तमान में भारत के बिहार राज्य में स्थित है । कई दशकों की अवधि में, माहुरी वैश्य लोग छोटा नागपुर पठार (या छोटा नागपुर) के भीतरी इलाकों में पहुँच गए और कई गाँवों में बस गए।
इससे पहले, वे मगध के क्षेत्रों के कई उपजाऊ स्थानों में पहले से ही बस चुके थे। अंततः, गया का विरासत शहर , कई मायनों में, सभी माहुरी वैश्य लोगों की "राजधानी" के रूप में उभरा। [ उद्धरण वांछित ] 20वीं सदी की शुरुआत से, कई माहुरी परिवार वर्तमान पश्चिम बंगाल झारखंड छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों में स्थित स्थानों पर चले गए। पिछली सदी के अंत तक, माहुरी वैश्यों की गतिशीलता उन्हें भारत के कई हिस्सों में ले गई, खासकर कलकत्ता , नई दिल्ली और मुंबई के महानगरीय शहरों में। उनमें से कई ने व्यापार और वाणिज्य के अपने पारंपरिक व्यवसाय को भी त्याग दिया है, और कई तरह के अन्य व्यवसायों में लगे हुए हैं।

हम अन्य समुदायों के साथ तुलना करते हैं, हम पाते हैं, हमारे देश के भीतर और बाहर माहुरी की वास्तविक कमी है , हम दुनिया में कुल या यहां तक ​​कि वैश्यों की आबादी में बहुत कम प्रतिनिधित्व करते हैं

एचएचपीआईएसएलएवाई, आईसीएस, ने वर्ष 1891 में अपनी पुस्तक "ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल" में माहुरी जाति के बारे में लिखा है, तब बिहार और बंगाल एक ही राज्य थे।

पुस्तक बंगाल सचिवालय द्वारा प्रकाशित की गई थी, पृष्ठ संख्या 44 में माहुरियों के बारे में बताया गया है।

बिहार में बनिया की एक उपजाति माहुरी, जो सिखों की तरह सामाजिक रूप से अग्रवालों के बराबर ही उच्च स्थान रखती है, माहुरी में तम्बाकू के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध है और धूम्रपान करते पाए जाने पर समुदाय से निष्कासित कर दिया जाता है। एक और अजीबोगरीब प्रथा यह है कि विवाह हमेशा दूल्हे के घर पर मनाया जाता है, दुल्हन के घर पर नहीं। व्यापार और धन उधार देना माहुरियों का मुख्य व्यवसाय है। उनमें से कुछ ने पर्याप्त भूमि प्राप्त कर ली है और जमींदार और जमींदार बन गए हैं।

मुगल शासकों के समय से पहले माहुरियों की उत्पत्ति का पता लगाना अभी बाकी है, जहां से वे मथुरा के वैश्य समुदाय से अलग हो गए थे।

कुछ दशक पूर्व अपना मूल स्थान खोजने के प्रयास में हम उत्तर प्रदेश के वैश्यों, जिन्हें महावर , माथुर , माहौर आदि के नाम से जाना जाता है, के संपर्क में आए। हमारे स्वभाव, व्यवहार, समुदाय का विस्तार करने की उत्सुकता को देखकर वे भी हमारा मूल स्थान जानने के लिए इच्छुक हो गए और उनमें कुछ समानताएं देखकर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि माहुरी , किसी न किसी तरह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के हैं और उनके साथ एकीकृत हो सकते हैं।

उरु तंत्र एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन है, जोसंतुलन के प्रतीक के साथ स्थापित किया गया था , जिसका उद्देश्य अखिल भारतीय माथुर , महावर , महुड़ और माहुरी संगठनों को व्यक्तिगत और व्यावसायिक समझ के लिए एकजुट करना था, बाद में पूर्ण एकीकरण के लिए। लेकिन अंततः, इन समुदायों के भीतर भारी मतभेदों ने खाई को चौड़ा कर दिया। हालांकि, उनके संयुक्त प्रयास से, झरिया माहुरी मंडल के अध्यक्ष , श्री रामदासगुप्ता, श्री दामोदर पीडी गुप्ता [ माहुरी (द्वितीय)], और माहौर और महावरों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्तियों की एक टीम माहुरियों की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए एक मिशन के लिए यूपी के लिए रवाना हुई।

टीम ने उत्तर प्रदेश के कई स्थानों का दौरा किया और मथुरा पहुँची , जहाँ कुछ बहुत ही बुजुर्ग लोगों ने, जिन्हें बड़े भैया के नाम से जाना जाता है, उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, क्योंकि उन्हें पता था कि बिहार से कुछ लोग आए हैं। पीढ़ियों से उन्हें पता था कि उनके 700 परिवार जिन्हें छोटे भैया के नाम से जाना जाता है, उन्हें मथुरा में छोड़कर बिहार चले गए हैं और खो गए हैं, तब तक उन्हें कोई पता नहीं था कि वे कहाँ हैं। यह तथ्य मथुरा के एक कुएँ के नीचे दबे पत्थरों पर लिखा हुआ था , जैसा कि उन्होंने सोचा था।

उन्होंने उन्हें छोड़ने का कारण बताया कि मुगल साम्राज्य के तत्कालीन शासक औरंगजेब ने धर्म परिवर्तन के लिए अपना बचा हुआ हुक्का पीकर सभी भारतीय आबादी को अपने समुदाय में परिवर्तित करने का फैसला किया था । एक बार, सभी गैर- मुस्लिम दरबारी (अधिकारी) औरंगजेब के छोड़े हुए/होंठ से छूए हुए हुक्के को पीते हैं , उन्हें स्वचालित रूप से माना जाता है और उनका धर्म परिवर्तित कर दिया जाता है और जिन दरवारियों का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके अधीन आबादी भी वांछित धर्म बन जाती है। लेकिन माहौरियों का प्रतिनिधित्व करने वाले दरवारी बहुत सख्त थे, उनके अधीन धूम्रपान, शराब पीने और मांसाहारी खाने की कोई अवैध आदत की अनुमति नहीं थी, उस समय माहौरी वास्तव में बहुत पवित्र थे। धर्म परिवर्तन के लिए आबादी को निकालने की तय तारीख से पहले, छोटे भैया के नाम से जाने जाने वाले दरवारी ने लगभग 700 परिवारों के साथ हमेशा के लिए मथुरा छोड़ दिया ।

दरवारी 700 परिवारों के साथ सूबेदार मलिक बैयो की शरण में गया पहुँची, सरदार बैयो की विधवा, जो कभी दरवारी के बहुत अच्छे मित्र थे, ने एक बार युद्ध के मैदान में स्वर्गीय सरदार बैयो की जान बचाई थी। चूंकि, उस समय एक स्थान से दूसरे दूर स्थान पर जाना बहुत कठिन था, लेकिन काफी समय बीतने के बाद, मुगल शासक सूबेदार मलिक बैयो के आश्रय में गया ( बिहार )शहर में माहुरी दरबारी के साथ माहुरी झुंड की उपस्थिति का पता लगा सका। कुछ ही समय में, गया से बचने के लिए सेना भेजी गई, कुछ समय तक युद्ध चला, एक सूबेदार बादशाह की विशाल सेना के सामने कब तक टिक सकता था, सूबेदार मलिक बैयो अपने पूरे परिवार के साथ युद्ध लड़ते हुए मर गईं। सम्राट का भयंकर क्रोध यहीं शांत नहीं हुआ, माहुरी लोगों की खोज के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाए गए , जो उपनगरों के अंदरूनी इलाकों और फिर घने जंगलों, गांवों में भाग गए, वे सभी बिखर गए और हिंदू आबादी के साथ मिल गए जिससे उन्हें अलग करना मुश्किल हो गया, अंततः, वे शांत हो गए और वापस लौट आए। माहुरी दो खंडों में विभाजित हो गए, उनमें से मुट्ठी भर फिर से सदी से अधिक समय तक अलग हो गए, आबादी का एक बड़ा प्रतिशत गिरिडीह के अंदरूनी इलाकों में चला गया, जो तब एक अलग जगह और जंगल था, जो फिर से जुड़ गया और वर्ष 1926 में बरबीघा बैठक में एकजुट हो गया।

यही कारण है कि माहुरी आबादी गया , आस-पास के गांवों (जो अब शहर में परिवर्तित हो चुके हैं) से लेकर विभिन्न दिशाओं में, पटना, कोडरमा , गिरिडीह के उपनगरों और उस समय के अंदरूनी स्थानों तक बनी रही।

बैयो परिवार के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप , माहुरी प्रत्येक गया श्राद्ध पिंडदान पर उनके लिए एक पिंड बनाती हैं , इसे बनाने वाले पंडित को यह नहीं पता होता कि परिवार के सदस्यों के अलावा अन्य लोगों को पिंड क्यों दिया जाता है।

जहाँ भी महुरी रहे, उन्होंने अंदरूनी इलाकों में भी अपना दबदबा कायम किया, उनमें से ज़्यादातर ज़मींदार /शासक, महान व्यापारी और उद्योगपति बन गए। हिसुआ एस्टेट उनमें से एक था, जिसके पास कोडरमा और गया बेल्ट तक की बहुत बड़ी ज़मीन थी, और झुमरीतलैया के दुनिया के सबसे समृद्ध और सबसे बड़े अभ्रक क्षेत्रों के ज़मीन के मालिक भी थे ।

माहुरी उद्योगपति, मेसर्स चतुराम होरिलराम को मीका किंग से सम्मानित किया गया था, जिसके पास दुनिया में अधिकतम खदानें/स्क्वायर थे, अपने साझेदारों, दरसन राम और सहयोगी के साथ मीका का उत्पादन और निर्यात करते हुए, मीका उत्पाद का सर्वोच्च विश्व रिकॉर्ड बनाया। समूह के पास कई कपास और जूट मिलें भी थीं, जैसे:- गया कॉटन एंड जूट मिल्स, गुजरात कॉटन मिल्स अहमदाबाद और हिरजी मिल्स बॉम्बे। चतुरामजी के व्यवसाय से संबद्ध, झाड़ी राम भदानी उस समय बॉम्बे के बिहारी सेठ के रूप मेंबहुतलोकप्रिय थे, दामोदर प्रसाद भदानी ने शहरी भूमि सीलिंग से बॉम्बे में बहुत बड़ी जमीनों का स्वामित्व और बचाव किया , चतुरामजी के पुत्र श्रीप्रमेश्वर प्रसाद भदानी ने गया में प्रतिकूल पर्यावरणीय स्थिति मेंसफलतापूर्वक कपास और जूट मिलस्थापित राय बहादुर राम चंद राम गया के बिजनेस टाइकून बन गए, उनके बेटे लाला गुरुशरण लाल भारत के उभरते उद्योगपति के रूप में उभरे , उन्हें फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स का अध्यक्ष चुना गया , हमारे समुदाय का कोई अन्य व्यक्ति अब तक शीर्ष राष्ट्रीय पद हासिल नहीं कर सका, जिन्होंने भुरकुंडा (झारखंड) में एशिया की दूसरी सबसे बड़ी ग्लास फैक्ट्री इंडो-आशाई ग्लास कंपनी की स्थापना की । उन्हें वर्ष 1943 में बिहार सरकार का मानद व्यापार सलाहकार नियुक्त किया गया और उनके नाम के आगे लाला की उपाधि दी गई। इसके अलावा, वे कई चीनी मिलों जैसे गुरारू और वारिसलीगंज चीनी मिल्स और प्रसिद्ध कॉटन मिल्स, मधुसूदन मिल्स बॉम्बे के मालिक थे । दुनिया के ग्लास टाइकून में से एक उनके व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षित कर्मचारी थे, जो शुरू में मैट्रिक पास थे और तब उनके कलकत्ता कार्यालय में काम कर रहे थे श्री जोगेश्वर प्रसाद , विज्ञान स्नातक, उनके व्यवसाय से जुड़े लोगों में से एक, वास्तविक सामाजिक व्यक्ति थे जिन्होंने माहुरी समाज को एक निश्चित उच्च स्तर तक पहुंचाया और इसके मूल सिद्धांतों को बनाया

माहुरी समाज के काफी लम्बे समय तक अध्यक्ष रहने के साथ ही वे प्रसिद्ध गया कॉलेज के विश्वासपात्रों में से एक थे। उन्हें कलकत्ता पूर्वी जोन के रेलवे बोर्ड का जोनल सदस्य मनोनीत किया गया। इतना ही नहीं वे सेंट्रल बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स, गया के अध्यक्ष भी चुने गए । गिरिडीह के श्री कमलापति राम तारवे और उनके पुत्रों ने भी कई देशों में अभ्रक के प्रसंस्करण और निर्यात का कीर्तिमान स्थापित किया। गिरिडीह में स्थापित अभ्रक की प्रसंस्करण इकाईयों ने न केवल उस स्थान के माहुरियों को आधार प्रदान किया बल्कि कोडरमा क्षेत्र तक भी इसका विस्तार हुआ। तीस के दशक में तीव्र औद्योगिकीकरण ने भारत में भी कॉर्पोरेट गठन का फैशन ला दिया। जबकि कठोर कंपनी कानून के प्रावधानों के अनुसार, कंपनी का कभी स्वामित्व नहीं हो सकता, उसका केवल प्रबंधन किया जा सकता है और वह हाथ बदलने के लिए उत्तरदायी है। यहां तक ​​कि डनलप , डंकन , शॉ वालेस जैसी मजबूत बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वामित्व भी छाबड़िया समूह के पास गयाऔर फिर मलैया समूह के पास गया। इसी प्रकार रायबहादुर और गुरुशरणलाल समूह ने अपनी कंपनी भुरकुंडा ग्लास और मधुसूदन मिल्स को खो दिया, यही नहीं, कॉर्पोरेट जगत की तेज हवा के कारण छत्ररामजी समूह की गुजरात कॉटन, होरिलराम समूह की पुनः हिरजी मिल्स को भी परिसमापन कार्यवाही के माध्यम से ले लिया गया , इस प्रकार माहुरी उद्योग के इतिहास में भूचाल आ गया ।

झरिया शहर, भारत का प्रसिद्ध कोयला क्षेत्र होने के कारण, हमेशा से ही माहुरियों के लिए महत्वपूर्ण रहा है , झरिया के श्री प्रभुदयाल गुप्ता , रायबहादुर राम चंद राम और अभ्रक राजा छठूराम भदानी के कोयला साझेदार,अपने कमला प्रेस झरिया से पहला माहुरी मयंक प्रकाशित करके माहुरी इतिहास स्थापित किया , इस उद्देश्य के लिए इंग्लैंड से एक प्रेस आयात किया था। उन्होंने माहुरी समाज द्वारा समानांतर चल रहे दो माहुरी मंडलों, मगध और हजारीबाग माहुरी मंडलों में से एक को भी मिला लिया। वे माहुरी समाज द्वाराकीउपाधि से सम्मानित एकमात्र व्यक्ति थे। श्री खीरीराम गुप्ता, उनके छोटे भाई और श्री रामदास गुप्ता , उनके पुत्र ने माहुरी मयंक को लंबे समय तक जीवित रखा और इसे बहुत सफल बनाया । नूरसराय निवासी श्री शिव प्रसाद लोहानी ,

श्री रामदास गुप्ता केंद्रीय माहुरी महामंडल , गया में कार्यसमिति के बहुत सक्रिय सदस्य थे , एक समय में उन्हें विभिन्न राजनीतिक संगठनों पर हावी होने वाले व्यक्ति के समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया था , जिसे उन्होंने अपना सहायक बनाया। श्री रतन चंद्र गुप्ता उनके भतीजे , भारत के प्रसिद्ध शेर निखिल चंद्र गुप्ता के बेटे ने भारतीय संसद से बचकर इतिहास रच दिया ( शहीद भगत सिंह के बाद दूसरे चोर ), जिसका उद्देश्य देश के भीतर उस समय चल रही गैर-संघीय राजव्यवस्था की ओर सांसदों को आकर्षित करना था। वर्तमान में वह जातिगत बाधाओं को दूर करना चाहते हैं, उन्होंने खुद को मानब में बदल लिया है , वह अब गुप्ता नहीं रहे और मानब बन गए हैं , रतन चंद्र मानब । वर्तमान में वह भारतीय जनसंख्या विस्फोट पर गंभीरता से काम कर रहे हैं, उनका आंदोलन पहले ही जिले, राज्य और फिर पूरे देश में शुरू हो चुका है।

निमियाघाट के पास इसरी बाजार के लोहेडीह के स्वर्गीय कोकिल चंद राम भदानी को कृषि पंडित पुरस्कार से सम्मानित किया गया था , उन्हें डेनमार्क में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करने के लिए भी नामित किया गया था , लेकिन अपनी बीमारी के कारण वे डेनमार्क नहीं जा सके। उनके पुत्र स्वर्गीय विश्वनाथ राम भदानी अपने क्षेत्र के प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र के रिपोर्टर के रूप में काम करते थे, वे भाजपा कार्यसमिति के सदस्य भी थे और हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध थे ।

भागलपुर के स्वर्गीय डॉ. केदारराम गुप्ता को पहली बार भारत के राष्ट्रीयकृत बैंकों में से एक यूबीआई के निदेशक के रूप में नामित किया गया था , जो उस समय भागलपुर के मारवाड़ी कॉलेज में प्रोफेसर थे ।

गया के सम्मानित माहुरी श्री एस.एन.प्रसाद ने लंबे समय तक दिल्ली में मोनोपोली एंड ट्रेड रिस्ट्रिक्टेड प्रैक्टिसेज (एमआरटीपी) के निदेशक के रूप में काम किया।

सिलाओ शहर के पोस्ट मास्टर ( स्वतंत्रता पूर्व ) श्री लालजी लाल के बेटों ने शिक्षित परिवार का इतिहास बनाया। पहले बेटे, श्री दामोदर प्रसाद ने तत्कालीन जिला न्यायाधीश पटना को पदस्थापित किया । दूसरे बेटे श्री जोगेश्वर प्रसाद , साइंस मास्टर गैराज और साथ ही चीनी विशेषज्ञ सह प्रसिद्ध गुरारू चीनी मिल्स के जीएम। तीसरे बेटे, डॉ राजेश्वर प्रसाद , एमडी (पैट), एफआरसीपी (लंदन) और ( एडिनबर्ग ), एफसीसीपी (यूएसए), टीडीडी (वेल्स), डीसीएच (इंग्लैंड), मेडिसिन के प्रोफेसर महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज , जमशेदपुर में फिजिकल कंसल्टेंट टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड के रूप में काम करते थे । वे प्रसिद्ध भारतीय उद्योगपति श्री जेआरडी टाटा की पत्नी एल्विन टाटा के निजी चिकित्सक भी थे विहंगम योग के मंत्र का प्रचार-प्रसार करने के लिए उन्होंने अनेक देशों की यात्रा की तथा उन्हें बहुत सफलता मिली । उन्होंने प्रसिद्ध टाटा जुबली पार्क स्थित अपनी बहुमंजिला इमारत विहंगम योग को उपहार में दे दी। चौथे पुत्र श्री ब्रजेश्वर प्रसाद का बीएचयू में शानदार शैक्षणिक करियर था। इलेक्ट्रिसिटी इंजीनियर को दामोदर वैली कॉरपोरेशन द्वारा कार्य अनुभव के लिए दो वर्ष के लिए इंग्लैंड भेजा गया था। बाद में वे प्रसिद्ध बिहार विद्युत बोर्ड से उप मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए । उनकी पत्नी सुश्री प्रेमा प्रसाद बीए, बीएड थीं तथा गया कॉटन एंड जूट मिल्स के मालिक श्री परमेश्वर प्रसाद की पुत्री थीं। उनके पहले पुत्र श्री विनय कुमार , एमफिल (भौतिकी) डीयू ओएनजीसी , राजमुंदरी में कार्यरत हैं , दूसरे पुत्र कर्नल निर्मल कुमार भारतीय सेना में कर्नल का पद प्राप्त करने वाले पहले माहौरी हैं ।

गिरिडीह निवासी श्री अप्रतिम कोडरमा के जिला न्यायाधीश थे । वैसे तो हमारे समाज के कई सम्मानित और विद्वान व्यक्ति न्यायपालिका में उच्च पदों पर रहे हैं, लेकिन श्री राम ने उच्च पद प्राप्त किया और आगे बढ़ते रहे।

गिरिडीह के श्री राम दुलार गुप्ता को नलवा स्पंज आयरन एंड स्टील लिमिटेड का पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त किया गया है और वे प्रसिद्ध स्टील टाइकून जिंदल के पूर्व भागीदार हैं। वर्तमान में, वे अन्य बातों के अलावा , रायपुर में एक अद्वितीय उद्योग, रायगढ़ा इलेक्ट्रोड्स लिमिटेड, रायगढ़ा, एक पेपर मिल के सीएमडी हैं । वे रायपुर में भी बहुत तेजी से औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ रहे हैं । उन्होंने रायगढ़ा और रायपुर में कई माहुरी परिवार स्थापित किए हैं। उनके पास बहुत ही किफायती तरीके से छोटे स्पंज आयरन यूनिट स्थापित करने की विशेष विशेषज्ञता है , जिसे वे बहुत ही समर्पित माहुरी के साथ साझा कर सकते हैं जो ऐसी यूनिट स्थापित करने में रुचि रखते हैं।

श्री ओम प्रकाश वारिसलीगंज से हैं और वर्तमान में भारतीय खान विद्यालय में कार्यरत हैं। वे वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के पूर्व निदेशक हैं, जो कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनियों में से एक है । वे देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक भारत सरकार के उपक्रम SECLtd के पूर्व CMD भी हैं। उनके छोटे भाई श्री उदय कुमार मुख्य मरीन इंजीनियर हैं और हांगकांग में रहते हैं । उनकी पत्नी सुषमा हांगकांग में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रही हैं । उनके पास भारतीय संगीत की डिग्री है। उनके बेटे मास्टर श्रेयांश कनाडा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे हैं और उनका माहुरी संगीत में रुझान है। उनकी प्रतिक्रिया mumbaimahuri.org पर पढ़ी जा सकती है ।
उनके सबसे छोटे भाई श्री शमर कुमार वर्तमान में भारतीय संसद के महत्वपूर्ण अधिकारियों में से एक हैं।

ब्रिटिश संसद से भारत गौरव सम्मान प्राप्त करने वाले श्री आशीष कंधवे माहुरी इतिहास में इस प्रकार का सम्मान पाने वाले पहले माहुरी व्यक्ति हैं।