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Sunday, April 3, 2022

MANDAWA CITY A VAISHYA HERITAGE

MANDAWA CITY A VAISHYA HERITAGE

राजस्थान के कलाप्रेमी सेठों के जीवन से रूबरू होना है तो आपको मंडावा आना चाहिए। यहां आप मध्यकालीन भारत की तस्वीर को भी करीब से देख और समझ पाएंगे। यहां के हर दरो-दीवार में छुपी है उस जमाने की अनूठी तस्वीर। मंडावा एक छोटा मगर जीवंत कस्बा है। इस पूरे क्षेत्र को ‘शेखावटी’ भी कहा जाता है। समूचे भारत में केवल शेखावटी ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जिस पर अंग्रेज कभी पूरी तरह हुकूमत नहीं कर सके।

लुभाती है फ्रेस्को पेंटिंग की जीवंतता: सेठों का इलाका मंडावा अपनी भित्ति चित्रकारी (जिसे ‘फ्रेस्को पेंटिंग’ भी कहा जाता है) के लिए दुनियाभर में मशहूर है। कहते हैं फ्रेस्को पेंटिंग्स 200 साल पुरानी है, लेकिन इनकी चमक आज भी नई जैसी लगती है। इन पेंटिंग्स को बनाने में जो रंग इस्तेमाल किए जाते थे, वे शुद्ध प्राकृतिक हुआ करते थे। इन पेंटिंग्स को ही नहीं, बल्कि रंगों को तैयार करने में भी चित्रकार जी-जान लगा दिया करते थे। इस संबंध में एक कहानी मशहूर है। किसी सेठ ने अपनी हवेली को रंगने का ठेका यहां के चित्रकार को दिया। सेठ कोलकाता में व्यापार करते थे। जब वह 4 महीने बाद लौटे तो देखा कि हवेली जस की तस है और चित्रकार वहां बैठकर रंग बना रहा है। सेठ जी ने नाराजगी दिखाते हुए उससे कहा कि इतना समय बीत गया और तुमने एक पत्थर तक नहीं रंगा। चित्रकार को भी गुस्सा आया और उसने रंग में घुला ब्रश दीवार पर फेंक दिया। आज भी पत्थर की दीवार पर उस रंग के निशान हैं। ये रंग बेहद पक्के होने के कारण सालों साल टिके रहते थे।











ओपन आर्ट गैलरी: मंडावा में घूमने का सबसे अच्छा तरीका है पैदल चलना, क्योंकि यहां हर गली में एक हवेली है और हर हवेली एक ‘ओपन आर्ट गैलरी’ की तरह आगंतुकों के लिए खुली रहती है। यहां के लोगों की मानें तो भारत की तरक्की में विशेष योगदान देने वाले मारवाड़ी व्यापारी घराने, जैसे-बिड़ला, मित्तल, बजाज, गोयनका, झुनझुनवाला, डालमिया, पोद्दार, चोखानी आदि के दादा-परदादाओं ने इस नगर को बसाया था और इन्हीं सेठों ने यहां एक से बढ़कर एक खूबसूरत हवेलियां भी बनवाई थीं। करीब सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी इन हवेलियों की दीवारों, मेहराबों, खंभों पर बने भित्ति-चित्रों की खूबसूरती हर किसी का मन् मोह लेती है। इन चित्रों में रामायण, महाभारत और कृष्ण-लीला के प्रसंग बहुत बारीकी से चित्रित किए गए हैं। कुछ हवेलियों में राजस्थानी लोक कथाओं, पशु-पक्षियों, मिथकों, धार्मिक रीति-रिवाजों, आधुनिक रेल, जहाज, मोटर आदि का चित्रण रंगों के माध्यम से किया गया है।

होड़ में हुईं आलीशान: कहते हैं कि हवेलियां जिस दौर में तैयार हुईं, उस दौरान यहां आपस में प्रतिस्पर्धा थी कि किसकी हवेली कितनी शानदार होगी। कलाप्रेमी सेठों के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। अत: अपनी हवेलियों के सौंदर्यीकरण में वे कोई कसर नहीं रखना चाहते थे। ऐसा माना जाता है कि मंडावा पुराने सिल्क रूट पर पड़ने वाला मुख्य व्यापारिक केंद्र था, इसलिए यहां के व्यापारी खूब फलेफूले। कालांतर में उनके पास इतना पैसा आ गया कि उन्हें इस छोटे से कस्बे में रहना अप्रासंगिक लगने लगा और वे मुंबई, दिल्ली, सूरत, कोलकाता जैसे बड़े व्यापारिक नगरों की ओर चले गए। अब इन हवेलियों के मालिक किसी मांगलिक अवसर पर अपने कुलदेवता की पूजा-अर्चना करने हवेलियों में लौटते हैं, बाकी समय ये हवेलियां लगभग वीरान रहती हैं।

ये हैं कुछ मशहूर हवेलियां
हनुमान प्रसाद गोयनका हवेली: कहते हैं इस हवेली का संबंध प्रसिद्ध कारोबारी गोयनका घराने से है। इसमें भगवान विष्णु का मंदिर भी है। हवेली की चित्रकारी और नक्काशी का काम देखने लायक है। बाहर से देखकर आप इसकी गहराई की थाह नहीं लगा सकते। जब आप हवेली में प्रवेश करते हैं तो यह आपके सामने
किसी अनूठी किताब की तरह एक-एक करके खुलती चली जाती है।
गुलाब राय लाडिया हवेली: इसकी संरचना इतनी विशाल है कि इसकी छत से पूरा मंडावा नजर आता है। मंडावा में मोर बहुतायत में हैं।मंडावा में मोर बहुतायत में हैं। इन छतों पर टहलते हुए नाचते मोरों को निहारना आंखों को बड़ा सुकून देता है।

चोखानी डबल हवेली: यह हवेली स्थानीय चोखानी भाइयों ने अपने रहने के लिए 19वीं शताब्दी में बड़े दिल से बनवाई थी। यह हवेली बहुत से आधुनिक रंग समेटे हुए है। यह मंडावा के वार्ड नंबर 5 में पड़ती है।
बिंसिधर नवातिया हवेली: कहते हैं वर्ष 1920 में बनकर तैयार हुई यह हवेली उस समय की एक आधुनिक हवेली थी। इसे बनवाने वाले यूरोपीय वास्तुकला के कितने बड़े प्रेमी थे, इस बात का अंदाजा इस हवेली की वास्तुकला में प्रयोग में लाए गए विदेशी पैटर्न और नमूनों को देखकर लगता है। यहां इन बेल-बूटों के बीच कार चलाती हुई महिला और हवाई जहाज उड़ाते राइट ब्रदर्स की तस्वीरों को देखने लोग दूर-दूर से आते हैं।

मुरमुरिया हवेली : यह हवेली वर्ष 1930 के आसपास बनी थी। इस हवेली की दीवारों पर बनी फ्रेस्को आर्ट उस समय को दर्शाती है, जब भारत में रेलगाड़ी आई थी। इस हवेली में घोड़े पर तिरंगा लिए पंडित नेहरू की खूबसूरत पेंटिंग भी बनी हुई है। एक तरह से ये हवेलियां अपने समय के समाज से हमें मिलवाती हैं। मुरमुरिया हवेली से थोड़ी ही दूर स्थित है हरलालकर की बावड़ी। बड़े-से चबूतरे पर बनी मीनारें और गुंबद इस संरचना को आकर्षक बनाते हैं। इस बावड़ी का निर्माण सेठ हरलालकर ने 19वीं शताब्दी में यहां के लोगों की पानी की आपूर्ति के लिए करवाया था।
लक्ष्मी नारायण लडिया हवेली : कहते हैं यह हवेली यहां की सबसे सुंदर हवेली है। इसकी दीवारों पर कृष्णलीला, रामायण और महाभारत के प्रसंग बहुत खूबसूरती से उकेरे गए हैं। इसे देखने के लिए थोड़ा समय निकाल कर जाएं, क्योंकि यहां की खूबसूरत चित्रकारी को देखकर आप इसमें खो जाएंगे।

रानी सती माता का मंदिर
झुंझुनू जिले में चौबारी मंडी के पास रानी सती माता का मंदिर है। इसमें 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच सती हुई स्त्रियों के छोटे-छोटे मंदिर बनाए गए हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण अमीर सेठों द्वारा करवाया गया, जबकि निर्माण कार्य को स्थानीय मुस्लिम कारीगरों ने अंजाम दिया।

ढोले के ठंडे मकान और झुप्पे
एक तरफ जहां मंडावा में सेठ आलीशान हवेलियां बनवाते थे, वहीं यहां के ग्रामीण राजस्थान की भीषण गर्मी से बचने के लिए देसी नुस्खे अपनाकर अपने घर बनवाते थे। यहां हर परिवार में चूने की चक्की हुआ करती थी। ईंटों की चुनाई में सीमेंट की जगह चूने (कलई) को रात भर भिगोकर रखा जाता था, फिर उसमें ईंट और उड़द की दाल मिलाई जाती थी। इसके बाद दो दिन तक चूने को बैलों से खींची जाने वाली चक्की में पीसा जाता था। चूने के मसाले से बनी दीवारें पत्थर की तरह मजबूत हो जाती थीं। चूने से बने होने कारण घर अंदर से ठंडे रहते थे। बाहर-भीतर के तापमान में 10 से 15 डिग्री का फर्क होता था। इन मकानों की छतें ऊंची और गार्डर व शहतीर के बिना अर्ध-गोलाकार गुंबद जैसी होती थीं, जिनके ऊपर सरकंडे के छप्पर डाले जाते थे। इनकी वास्तुकला का अध्ययन करने देश-विदेश से छात्र आते हैं। स्थानीय भाषा में इन मकानों को ‘ढोले’ और ‘झुप्पे’ कहा जाता है।
जय श्री नृसिंह नारायण ||जय श्री सेठ ||विजई सेठ समाज

लेख साभार: श्री नरसिंह सेना 

SURESH CHANDRA AGRAWAL - A ENTERPRENEURE OF CHAMBAL AREA

 SURESH CHANDRA AGRAWAL - A ENTERPRENEURE OF CHAMBAL AREA




Thursday, March 31, 2022

SHIRISH KUMAR MEHTA - A GREAT REVOLUTIONARY

SHIRISH KUMAR MEHTA - A GREAT REVOLUTIONARY

शिरीषकुमार मेहता (28 दिसम्बर, 1926 – 9 सितम्बर, 1942) भारत के एक स्वतन्त्रता सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। शिरीष कुमार ने भारत के स्वतंत्रता स्वतंत्रता संग्राम में अपने पांच साथियों के साथ अपने प्राणों को न्योछावर किया था।



शिरीषकुमार का जन्म नंदूरबार गाँव में हुआ था जो महाराष्ट्र-गुजरात सीमा पर बसा एक छोटा सा गाँव है। नंदुरबार की पहचान एक व्यापारी नगर के तौर पर की जाती है। इसी गांव में एक गुजराती वैश्य व्यापारी के घर में सन 1926 में शिरीष कुमार का जन्म हुआ था। वे अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। बचपन से शिरीष कुमार अपनी माता से स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां सुनते थे। ऐसा माना जाता है कि शिरीष कुमार पर आजाद हिंद फौज के संस्थापक के सुभाष चंद्र बोस का अच्छा खासा प्रभाव था। शिरीष कुमार जब 12 साल के थे तभी से वह अपने दादाजी के साथ तिरंगा उठाकर आजादी के आंदोलन में शामिल हो जाते थे।

सन 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ। उसके बाद हर गांव में तिरंगा लेकर लोग 'वंदे मातरम', 'भारत माता की जय' का जय घोष लेकर निकल पड़े। 9 मार्च 1942 को नंदुरबार में एक बड़ी रैली निकाली गई। उस रैली में शिरीष कुमार तिरंगा लेकर रैली का नेतृत्व करने लगे। उस समय उनकी उम्र मात्र 16 वर्ष थी। अपनी मातृभाषा गुजराती में घोषणा देने लगे। 'नहीं शमसे' 'नहीं शमसे' निशान भूमि भारतभूनी', भारत माता की जय, वंदे मातरम , उनके अंदर उनके अंदर पूरी तरह से मातृभूमि के लिए एक अलग ही जोश था।

जब रैली शहर के बीचो बीच पहुंची तब अंग्रेज पुलिस अफसर ने रैली पर लाठीचार्ज करने का आदेश दे दिया। लेकिन शिरीष कुमार अपने साथियों के साथ रैली में डटे रहे और भारत माता की जय वंदे मातरम का जयघोष करना जारी रखा। इस बात से अंग्रेज अफसर काफी गुस्से में आ गया, और उसने प्रदर्शन करने वाले लोगों के ऊपर बंदूक तान दी। शिरीष कुमार उन प्रदर्शन करने वालों के आगे खड़े हो गए और अंग्रेज अफसर को बड़े गुस्से में सुनाया। 'अगर तुम्हें गोली मारनी है तो पहले मुझे मारो' और तिरंगा हाथ में लहराते हुए अंग्रेज अफसर के सामने नारा लगाने लगे 'वंदे मातरम -वंदे मातरम' । इससे अंग्रेज अफसर को और गुस्सा आया और उसने शिरीष कुमार के सीने में चार गोलियां मार दी। और उनके साथ में उनके साथी लाल-लाल धनसुख लालवानी, शशिधर केतकर, घनश्याम दास शाह इन इन लोगों को गोली मार कर शहीद कर दिया गया।

VAISHYA HERITAGE - MOHTA PALACE - KARACHI PAKISTAN

VAISHYA HERITAGE - MOHTA PALACE - KARACHI PAKISTAN

Mohatta पैलेस में स्थित एक संग्रहालय है कराची , सिंध , पाकिस्तान । आगा अहमद हुसैन द्वारा डिजाइन किया गया, महल का निर्माण १९२७ में क्लिफ्टन के पॉश समुद्र तटीय इलाके में एक हिंदू मारवाड़ी व्यवसायी शिवरतन मोहट्टा के ग्रीष्मकालीन घर के रूप में किया गया था, जो अब राजस्थान का आधुनिक भारतीय राज्य है । महल राजस्थान के पत्थर के महलों की परंपरा में बनाया गया था , गुलाबी जोधपुर पत्थर का उपयोग पास के गिजरी से स्थानीय पीले पत्थर के संयोजन में किया गया था. मोहट्टा भारत के विभाजन से लगभग दो दशक पहले ही इस इमारत का आनंद ले पाए थे , जिसके बाद उन्होंने कराची को भारत के नए राज्य के लिए छोड़ दिया।


मोहट्टा पैलेस कराची के सबसे मान्यता प्राप्त स्थलों में से एक है

शिवरतन चंद्ररतन मोहट्टा एक हिंदू मारवाड़ी व्यवसायी थे, जिन्होंने राजस्थान में अपनी जड़ें जमाईं, उनका दर्ज वंश मोतीलाल मोहता (अंग्रेजी में मोहट्टा) के साथ शुरू हुआ, जो 1842 में बीकानेर से हैदराबाद ( तेलंगाना , भारत में) एक क्लर्क बनने के लिए चले गए। दुकान। उनके चार बच्चे कलकत्ता चले गए और आयातित कपड़े के प्रमुख व्यापारी बन गए। उनमें से एक, गोवर्धन मोहता, 1883 में कराची चले गए। उनका बड़ा बेटा, रामगोपाल, एक विद्वान और लेखक बन गया। कराची की हिंदू जिमखाना इमारत, जिसे आधिकारिक तौर पर सेठ रामगोपाल गोवर्धनदास मोहट्टा हिंदू जिमखाना के नाम से जाना जाता है, इस बेटे के नाम पर रखा गया था। गोवर्धन मोहता का छोटा बेटा शिवरतन कराची में एक उद्योगपति बन गया, और ताड़ के जैतून के साबुन के निर्माण से अपना भाग्य बनाया।

विशेषताएं

महल का क्षेत्रफल १८,५०० वर्ग फुट (१,७२० मीटर २ ) है और इसके अग्रभाग को खिड़कियों, पत्थर के ब्रैकेट , स्पैन्ड्रेल, गुंबदों, फूलों की आकृति और उत्तम रेलिंग के साथ छंटनी की गई है । नौ गुंबद हैं, बीच में एक केंद्र गुंबद है; जबकि बगीचे में खुलने वाले सामने के हिस्से की खिड़कियाँ नीले रंग की हैं और जो पीछे के क्षेत्र में हैं वे सना हुआ ग्लास के साथ धनुषाकार खिड़कियाँ हैं। महल में भूतल पर मनोरंजन के लिए डिज़ाइन किए गए बड़े आलीशान कमरे हैं और पहली मंजिल पर अधिक निजी सुविधाएं हैं, जहाँ तीव्र धूप से छाया प्रदान की गई एक छत है। महल पूरी तरह से सागौन की लकड़ी से बना है जिसमें एक पॉलिश सीढ़ी, लंबे गलियारे और दरवाजों के भीतर खुलने वाले दरवाजे हैं। मोहट्टा पैलेस के "बरसाती" (छत) में हिंदू भगवान, भगवान शिव को समर्पित एक सुंदर पारिवारिक मंदिर था। अमलगम ने महल को एक सुंदर पड़ोस में एक विशिष्ट उपस्थिति दी, जिसकी विशेषता इंडो-सरसेनिक वास्तुकला थी

मोहट्टा पैलेस 1920 के दशक के अंत में बनाया गया एक शानदार घर था, जिसमें 18,500 वर्ग फुट (1,720 मी 2 ) शामिल था। सुरुचिपूर्ण महल विभिन्न स्तरों पर बनाया गया है और १९४७ में भारत के लिए रवाना होने से पहले दो दशकों के लिए मोहट्टा परिवार के लिए ग्रीष्मकालीन घर था। छत तक पहुंचने तक तीन स्तर, बेसमेंट, भूतल, पहली मंजिल हैं। इमारत के उत्तर की ओर स्थित बेसमेंट काफी छोटा है और इसमें एक गर्म पानी के पूल कक्ष की ओर नीचे की ओर जाने वाली सीढ़ियां शामिल हैं जिसमें एक जुड़ा हुआ चेंजिंग रूम है। उनका कहना है कि इसमें गर्म और ठंडे पानी की व्यवस्था थी, जो पूल को पानी की आपूर्ति करती थी। पूल कक्ष के पास छोटे वेंटिलेटर हैं, प्रत्येक तरफ दो जो सूर्य के प्रकाश के स्रोत के रूप में उपयोग किए जाते हैं

इमारत के अंदर कदम रखने पर एक गलियारा है जो भूतल पर स्थित प्रत्येक कमरे से जुड़ता है। भूतल में मनोरंजन के लिए डिज़ाइन किए गए बड़े आलीशान कमरे हैं, दो प्रवेश द्वार (उत्तर) के दाईं ओर, दो बाईं ओर (दक्षिण) और एक पीछे। इमारत के अंदर की आवाजाही एक विशाल गलियारे में महान प्रवेश द्वार के माध्यम से होती है जो एक विशाल हॉल के चारों ओर अलंकृत छत और दक्षिण की ओर एक सीढ़ी के साथ चलता है।

गलियारे में जाने वाले सात उद्घाटन के साथ एक बड़ा वर्ग हॉल है। हॉल एक डेटाम के रूप में कार्य करता है और इसके चारों ओर गलियारे उन कमरों से जुड़े होते हैं जहां विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। दो कमरों के बीच दक्षिण में एक ठोस सागौन की लकड़ी है, भूतल और पहली मंजिल को जोड़ने वाली पॉलिश सीढ़ियाँ।

महल के प्रत्येक कोने पर अष्टकोणीय मीनारें हैं, जिनमें सामने के प्रवेश द्वार के पास केवल दो में सर्पिल सीढ़ियाँ हैं जो छत तक जाती हैं। दूर अंत में, प्रवेश द्वार के सामने मनोरंजन के लिए एक कमरा है जिसमें प्रत्येक तरफ कुछ सीढ़ियां हैं जो सीधे महल के पीछे के मैदान में जाती हैं।

जब बाहर से देखा जाता है, तो भूतल में प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो बहुत ही अलंकृत खिड़कियां होती हैं जिनमें प्रत्येक में तीन शटर होते हैं। एक ही खिड़कियाँ उत्तर और दक्षिण की ओर भी, सीढ़ियों के दोनों ओर हैं जो कमरों से मैदान तक जाती हैं। अष्टकोणीय टावरों में प्रत्येक में पांच खिड़कियां हैं। उसी तरह एक फैला हुआ छज्जा है जो भूतल के चारों ओर छाया प्रदान करने के लिए जाता है।

भूतल के विपरीत पहली मंजिल में निजी सुविधाएं हैं। हालांकि इस मंजिल में केंद्र में एक बड़ा हॉल भी है जिसमें दस दरवाजे हैं जो गलियारे में खुलते हैं जो इसे दो तरफ (उत्तर और दक्षिण) और दूसरी तरफ (पूर्व और पश्चिम) में निजी कमरे बनाते हैं। संलग्न टॉयलेट और ड्रेसिंग रूम के साथ चार बड़े बेडरूम हैं। प्रत्येक शयनकक्ष में दो खुलते हैं, जैसे 'दरवाजे खुलते हैं'। दक्षिण की सीढ़ियां इस मंजिल पर समाप्त होती हैं, बाईं ओर एक मार्ग छोड़ती है जो छत तक जाने वाली अष्टकोणीय टावर सीढ़ी से जुड़ती है। विपरीत छोर पर एक समान सीढ़ी है जो छत तक जाती है। जबकि शेष दो टावरों को काट दिया जाता है, बस खिड़कियों से प्रत्येक मंजिल तक एक बाहरी दृश्य दिखाई देता है।

इसी तरह, भूतल पर खिड़कियों के ठीक ऊपर स्थित खिड़कियां हैं जो नीचे के विशाल मैदानों का दृश्य प्रस्तुत करती हैं। इसके अलावा, पहली मंजिल पर बड़ी छत में तीन उद्घाटन हैं, जो अरब सागर को नज़रअंदाज़ करते हैं। इसके अलावा, छत के ऊपर शायद इमारत का सबसे दिलचस्प हिस्सा है, जो आसपास के पड़ोस का हवाई दृश्य और नीचे में किए गए सुंदर भूनिर्माण को दर्शाता है।

छत पर उत्तर और दक्षिण अष्टकोणीय टावरों के माध्यम से, भूतल से ऊपर की ओर आने वाली सीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। चार अष्टकोणीय मीनारें छतरियों द्वारा सबसे ऊपर हैं। टावरों के बीच में, उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ सुंदर तीन भाग आयताकार छतरियां हैं। कुल मिलाकर नौ गुंबद हैं, बीच में एक केंद्र गुंबद और इसके चारों ओर छोटे चार गुंबद हैं। यह थोड़ा ऊंचा है और छत के सामने एक कमरे की तरह है। इसके उत्तर और दक्षिण की ओर सीढ़ियाँ हैं और पाँच गुम्बद आपस में जुड़े हुए हैं।




मोहट्टा पैलेस एक विस्तृत इमारत है जिसमें जटिल विवरण हैं जो इस शानदार इमारत के लगभग हर हिस्से में मौजूद हैं। ये नक्काशी के रूप में हैं। नाजुक डिजाइनों में मेहराब के ऊपरी दाएं और बाएं कोनों में स्थित बड़ी खिड़कियों में पक्षी के पंख शामिल हैं।

पत्थर के काम में मोर के रूपांकन भी हैं और वे नौ गुंबदों में से प्रत्येक के आसपास पाए जाते हैं। इसके अलावा, निचले क्षेत्रों के चारों ओर ऊपर और नीचे की स्थिति में, इमारत के चारों ओर जाने वाली पट्टी के रूप में और पहली और दूसरी मंजिल की खिड़कियों के शीर्ष पर जो बाहर की ओर निकलती हैं, स्कैलप आकार का बहुत उपयोग किया गया है। आसपास की दीवार के चारों ओर, प्रत्येक स्कैलप के बीच, जैसे कि गेंदा, कई पुष्प रूपांकनों हैं। हिबिस्कस के फूल सभी खिड़कियों के नीचे आयताकार आकृतियों के बीच हल्के ढंग से उकेरे गए पाए जाते हैं, जो दरवाजे के किनारों पर होते हैं।

इसी तरह, प्रत्येक खिड़की और द्वार मेहराब के ऊपरी दाएं और बाएं तरफ दो बड़े, जटिल नक्काशीदार मैरीगोल्ड द्वारा तैयार किए गए हैं।

इसके अलावा, बेलस्ट्रेड टैरेस, रूफटॉप और अष्टकोणीय टावरों में सुंदर घुंडी और प्रत्येक बेलस्टर में एक आयताकार बॉक्स जैसी आकृति होती है।

इसके अलावा, प्रत्येक खिड़की के नीचे सजावटी कोष्ठक हैं, जो 'छज्जा', प्रवेश मार्ग, गुंबदों, इमारत के चारों ओर पेश करते हैं जो इसे किसी की आंख के लिए अधिक नाजुक बनाते हैं। इसके अलावा, इमारत के चारों ओर के प्रत्येक स्तंभ में रिक्त स्थान के बीच क्षैतिज रूप से उकेरे गए रूपांकनों और फूल हैं। ये इमारत के चारों ओर एक क्षैतिज रेखा में जाते हैं।

इसी तरह, बरसती के पांच गुंबदों में रेखाएं उकेरी गई हैं, जो उन्हें अष्टकोणीय टावरों के विपरीत और अधिक रूप और बनावट देती हैं, जो सभी गुंबदों में मौजूद मोर की नक्काशी को छोड़कर सिर्फ सादे हैं।
आजादी के बाद

मोहट्टा के भारत जाने के बाद, पाकिस्तान सरकार ने 1947 में विदेश मंत्रालय के लिए भवन का अधिग्रहण किया। कायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना , 1964 में इसमें चली गईं। 60 के दशक में मोहट्टा पैलेस को कसरे-ए-फातिमा करार दिया गया था , जो राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ उनके राष्ट्रपति अभियान का केंद्र बन गया । उनकी असामयिक मृत्यु के बाद, उनकी बहन शिरीन जिन्ना कई वर्षों तक भूतल पर रहने के लिए चली गईं। 1980 में उनकी मृत्यु के साथ, महल को सील कर दिया गया था।

संग्रहालय

१९९५ में इसे सिंध सरकार द्वारा पाकिस्तान की कला को समर्पित संग्रहालय में बदलने के लिए खरीदा गया था । सिंध सरकार ने संपत्ति का स्वामित्व अपने हाथ में ले लिया और राज्यपाल की अध्यक्षता में न्यासी का एक स्वतंत्र बोर्ड नियुक्त किया, जो इस बात पर सिफारिशें तैयार करता है कि महल को कैसे अनुकूलित और उपयोग किया जाए। [६] संपत्ति का प्रबंधन करने और यह सुनिश्चित करने के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गई थी कि इसे ट्रस्ट डीड में निर्धारित के अलावा वाणिज्यिक या किसी अन्य उद्देश्य के लिए बेचा या उपयोग नहीं किया जाएगा। संग्रहालय के लिए संग्रह के अधिग्रहण और एक विस्तार के निर्माण के लिए ट्रस्टियों द्वारा निजी और सार्वजनिक अनुदान, दान और अन्य धन उगाहने वाली गतिविधियों के माध्यम से लगातार धन जुटाया जाता है। मोहट्टा पैलेस संग्रहालय औपचारिक रूप से 1999 में खोला गया। मुख्य भवन के बगल में "अंग्रेजी" मूर्तियों का एक छोटा संग्रह पाया जा सकता है, जो कभी कराची के प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर गर्व से खड़ी थी, लेकिन 1960-61 में राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान सार्वजनिक रोष को भड़काती थी। [७] कुछ मूर्तियां, विशेष रूप से महारानी विक्टोरिया और राज के सैनिकों की मूर्तियां, उथल-पुथल के दौरान क्षतिग्रस्त हो गईं।

Sunday, March 27, 2022

GANERIWAL FAMILY - गनेड़ीवाल घराना

GANERIWAL FAMILY - गनेड़ीवाल घराना
 
गनेड़ीवाला परिवार एक मारवाड़ी सेठ घराना है, जो राजस्थान के वित्तीय, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा है।1800 के अंत में उनका प्रभाव कोषाध्यक्षों, व्यापारियों और फाइनेंसरों के रूप में बढ़ा, उनके राजस्थान के शाही परिवारों के साथ घनिष्ठ संबंध थे। गनेड़ीवाला परिवार के सदस्यों ने राजस्थान में विभिन्न हिंदू मंदिरों और भव्य हवेली का निर्माण करवाया जो की राजस्थान के पारंपरिक मारवाड़ी घरानों की विशेषता है।

राजा बलदेव दास बिड़ला के दादा शोभाराम बिड़ला ने गनेड़ीवाल परिवार के साथ काम किया, इससे पहले कि बिड़ला भारत के प्रमुख उद्योगपतियों के रूप में उभरे।
छत्रपति शिवाजी महाराज गनेड़ीवालो की हवेली में अक्सर आया करते थे। उनके गनेड़ीवालों के साथ घनिष्ठ संबंध थे। 1800 में, सेठ पूरनमल गनेड़ीवाल (गनेड़ीवाल परिवार की एक शाखा) हैदराबाद के निज़ाम के कोषाध्यक्ष और फाइनेन्सर बन गए। यह बाकी परिवार के लिए स्वीकार्य नहीं था जो मानते थे कि उनके परिवार का हिन्दू राजघराने सी ही जुड़े रहना उनके कर्तव्यों में था। हालांकि सेठ पूरनमल गनेड़ीवाल अपनी हिंदू जड़ों से जुड़े रहे और हैदराबाद के सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक का निर्माण किया - सीताराम बाग मंदिर।




गनेड़ीवाल परिवार ट्रस्टों ने 1800 के दशक से मंदिर, स्कूल, कुएँ और धर्मशालाएँ का निर्माण करवाया। सेठ पूरनचंद गनेड़ीवाल ने 1830 में हैदराबद के सीताराम बाग मंदिर का निर्माण करवाया था, 1850 में उन्होंने ही पुष्कर के रंगजी नाथ मंदिर का निर्माण करवाया। लक्ष्मणगढ़ का मोड़ी विश्वविद्यालय गनेड़ीवाला परिवार द्वारा दान की गई भूमि पर बनाया गया है। सीताराम बाग मंदिर 25 एकड़ में फैला है और इसे एक विरासत संपत्ति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। नासिक में सेठ राम दत्त गनेड़ीवाल श्री रघुनाथजी मंदिर को 120 एकड़ भूमि में फैला हुआ है की माँ ने दान किया था। गीता वाटिका गोरखापुर जिसे गीता गार्डन के रूप में भी जाना जाता है, सेठ जयदयाल गनेड़ीवाल द्वारा दान की गई भूमि पर बनाया गया था। गनेड़ीवाल परिवार की हवेलियाँ फतेहपुर, मुकुंदगढ़, लक्ष्मणगढ़, रतनगढ़ में है । चार चौक की हवेली शेखावाटी की सबसे बड़ी हवेली है, जिसके मालिक गनेड़ीवाल परिवार की शाखा से हैं। गनेड़ीवाल परिवार द्वारा बनवाये गए मंदिर रतनगढ़, मुकुंदगढ़, फतेहपुर, सिरसा, गनेरी आदि जगहों पर हैं।

लेख साभार: नरसिंह सेना

Saturday, March 26, 2022

THE GREAT VAISHYA COMMUNITY

THE GREAT VAISHYA COMMUNITY

आप किसी सरकारी हॉस्पिटल में जाइये। वहाँ आपको किसी दानदाता द्वारा हॉस्पिटल को भेंट की गई बहुत भारी मूल्य की बिल्डिंग या सामग्री दिखेगी। वहीं कहीं इस आशय का बोर्ड भी लगा होगा। सामान्यतया ये दानदाता भारत के वैश्य समाज से होते हैं। अग्रवाल, ओसवाल, माहेश्वरी, जैन इत्यादि जिन्हें बनिया कहा जाता है, इन पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा रही और उसी सहृदयता से इन्होंने अपनी पूंजी परोपकार में व्यय की। अस्पताल के अलावा, सरकारी विद्यालय, धर्मशाला, प्याऊ, मठ, मंदिर, पर्यावरण संरक्षण, प्राचीन कुएं, तालाब इत्यादि भी मिलेंगे जिन पर इस #श्रेष्ठिवर्ग की छाप अंकित है। धर्म को बनाये रखने और बचाये रखने में इनका भी योगदान रहा है। सम्पूर्ण भारत में इनके द्वारा हजारों करोड़ रुपए की सम्पत्तियां प्रतिवर्ष समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित की जाती है। लोककल्याण एवम परोपकार के लिए इनके द्वारा दिया गया धन यदि ठीक से काउंट किया जाए तो यह विश्व का सबसे बड़ा दान का आंकड़ा होगा।

और यह क्यों हुआ? धर्म प्रेरणा से। क्योंकि वे "भारत के वैश्य" हैं, कोई बहुराष्ट्रीय कंपनियां नहीं।

फिर भी #स्वतंत्रत_भारत में इन्हें सबसे ज्यादा लांछित किया गया। फिल्मों ने इन्हें सूदखोर, कामुक और लम्पट दर्शाया। पुस्तकों में इन्हें शोषक और पूंजीपति बताया गया है। और हम, इन्हीं की संपत्तियों का उपयोग करते हुए चटखारे लेकर इनकी निंदा में लिखा गया कम्युनिस्ट वामपंथी साहित्य पढ़ते रहे। होगा कोई हमसे बड़ा कृतघ्न??? जो इनके अद्भुत त्याग को एक क्षण में भुलाकर हमारे ही शत्रुओं द्वारा लिखी बात को सच मान इनके विरुद्ध खड़े हो गए? यह अभागा भारत देश और अभागी हिन्दू जाति, घोर शोक और पतन में क्यों नहीं जाएगी, जो सम्पूर्ण निःस्वार्थ व्यवस्था के संचालक वैश्य वर्ग को गाली देने का कोई मौका नहीं चूकते, तथापि आज भी सबसे ज्यादा धन दान, परोपकार और मानव कल्याण के सतत और व्यापक कार्य इन्ही द्वारा किए जा रहे हैं।

साभार: राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा

Monday, March 21, 2022

ASHOK MITTAL - LPU - NEW ELECTED MP OF RAJYASABHA

ASHOK MITTAL - LPU - NEW ELECTED MP OF RAJYASABHA

कौन हैं अशोक मित्तल?: कभी पिता ने 500 रुपये कर्ज लेकर मिठाई की दुकान खोली थी, आज 850 करोड़ के मालिक

सारआम आदमी पार्टी ने राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। इसमें क्रिकेटर हरभजन सिंह, पंजाब के आप सह प्रभारी राघव चड्ढा, आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर संदीप पाठक, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर अशोक मित्तल और कृष्णा प्राण ब्रेस्ट कैंसर केयर चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक संजीव अरोड़ा का नाम शामिल हैं।
 

अशोक  मित्तल... ये वो नाम है जो आज अचानक हर किसी के जुबां पर है। कारण, आम आदमी पार्टी ने अशोक मित्तल को पंजाब से अपना राज्यसभा का उम्मीदवार घोषित किया है। मित्तल का नाम भले ही ज्यादातर लोग नहीं जानते हों, लेकिन लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी का नाम कहीं न कहीं जरूर सुना होगा। अशोक मित्तल इसी यूनिवर्सिटी के चांसलर यानी कुलाधिपति हैं। अशोक का सफर काफी रोचक है। आइए हम आपको बताते हैं।

1961 : पिता ने 500 का कर्ज लेकर शुरू की मिठाई की दुकान

लवली स्वीट्स - फोटो : अमर उजाला

अशोक मित्तल से पहले उनके पिता स्व. बलदेव राज मित्तल के बारे में जानना जरूरी है। बलदेव राजस्थान में मिलिट्री में ठेकेदार थे। उनके तीन बेटे रमेश, नरेश और अशोक मित्तल हैं। अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए बलदेव ने 1961 में 500 रुपये का कर्ज लेकर जालंधर कैंटोंमेंट एरिया में एक मिठाई की दुकान खोली। इसका नाम लवली स्वीट हाउस रखा।

सबसे पहले 1968 में बड़े बेटे रमेश मित्तल ने पिता के इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए 11वीं के बाद पढ़ाई ही छोड़ दी। इसके बाद 1977 में दूसरे बेटे नरेश भी व्यवसाय से जुड़ गए। देखते ही देखते लवली स्वीट हाउस प्रसिद्ध हो गई। 1986 में ये जालंधर की सबसे प्रतिष्ठित और बड़ी मिठाई की दुकान हो गई। 1984 में अशोक ने भी पिता के व्यवसाय में कदम रख दिया। 2004 में बलदेव राज मित्तल का निधन हो गया था।

1991 : अशोक ने गाड़ियों के डीलरशिप का काम शुरू किया

पिता के व्यवसाय को अशोक मित्तल ने आगे बढ़ाया। - फोटो : अमर उजाला

अशोक पढ़ाई के साथ-साथ पिता की मिठाई के दुकान पर भी काम करते थे। वह अपने बड़े भाई की मदद करते थे। पढ़ाई पूरी हुई तो 1991 में अशोक ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में कारोबार शुरू किया। बजाज कंपनी की डीलरशिप ले ली। 1996 में मारुति सुजुकी की डीलरशिप ली। देखते ही देखते अशोक पंजाब के टॉप ऑटोमोबाइल डीलर बन गए।

आगे यूं चले सफर पर

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी - फोटो : अमर उजाला

2001 : अशोक ने अपने पिता बलदेव राज मित्तल के संरक्षण में फगवाड़ा में 3.5 एकड़ जमीन लेकर कॉलेज की स्थापना की।
2005 : अशोक मित्तल के लवली कॉलेज को प्राइवेट यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल गया। अब ये लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के नाम से पूरी दुनिया में जानी जाती है।
2022 : करीब 50 देशों के 40 हजार से ज्यादा छात्र-छात्राएं यहां पढ़ते हैं। अब इसका 600 एकड़ में विस्तार हो चुका है। 3600 से ज्यादा शिक्षक यहां पढ़ाते हैं। लवली ग्रुप का सालाना टर्न ओवर करीब 850 करोड़ का हो गया है।

परिवार की तीसरी पीढ़ी ने संभाला कारोबार
अशोक मित्तल, नरेश और रमेश मित्तल के साथ 2002 में परिवार की तीसरी पीढ़ी ने भी कारोबार संभाल लिया। तीन भाइयों में सबसे बड़े रमेश मित्तल हैं। इनके बेटे अमित और अमन भी व्यवसाय संभाल चुके हैं। दूसरे नंबर पर नरेश मित्तल के बेटे शैषव मित्तल और वैभव मित्तल भी लवली ग्रुप को जॉइन कर चुके हैं। सबसे छोटे अशोक मित्तल हैं। इनके बेटे प्रथम मित्तल भी लवली ग्रुप को आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। अशोक की पत्नी रश्मि मित्तल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की प्रो-चांसलर हैं।

साभार: अमरउजाला 

VAISHYA MLA ELECTED IN PANJAB - 2022

 VAISHYA MLA ELECTED IN PANJAB - 2022



AMAN GOYAL - PRIDE OF CENTRAL INDIA

AMAN GOYAL - PRIDE OF CENTRAL INDIA 



 

CHAYA GANDHI - KALA RATNA

 CHAYA GANDHI - KALA RATNA



VAISHYA MLA ELECTED IN UP & UTTRAKHAND - 2022

 VAISHYA MLA ELECTED IN UP & UTTRAKHAND - 2022



Saturday, March 19, 2022

VISHAL GARG - BETTER.COM

VISHAL GARG - BETTER.COM

बेटर डॉट कॉम की कहानी:3 हजार स्टाफ को निकालकर चर्चा में आई कंपनी, 22 साल पहले लोन बांटना शुरू किया था, अब 4000 करोड़ टर्नओवर

8 मार्च 2022 को अमेरिकी कंपनी बेटर डॉट कॉम (Better.com) के 3,000 कर्मचारियों को पेरोल ऐप पर एक मैसेज आया। यह मैसेज कंपनी के CEO विशाल गर्ग का था। जैसे ही इन कर्मचारियों ने मैसेज को पढ़ने के लिए क्लिक बटन दबाया, वे दंग रह गए। दरअसल, इस मैसेज में उन्हें कंपनी से फायर किए जाने की जानकारी थी।

ऐसा करना विशाल के लिए नया नहीं था। दिसंबर 2021 में 2 मिनट की जूम मीटिंग में उन्होंने 900 कर्मचारियों को फायर कर दिया था। इस तरह 3 महीने के भीतर 3,900 कर्मचारियों को निकालने के बाद एक बार फिर से यह कंपनी चर्चा में है।

आज ब्रांड स्टोरी में जानते हैं बेटर डॉट कॉम कंपनी की शुरुआत कब और कैसे हुई? इसके CEO विशाल गर्ग की पूरी कहानी क्या है? यह कंपनी क्या काम करती है? इसकी सालाना कमाई कितनी है?

बेटर डॉट कॉम कंपनी का बिजनेस किस चीज से जुड़ा है

बेटर डॉट कॉम एक होम ओनरशिप प्लेटफॉर्म है। सरल भाषा में समझें तो यह होम लोन देने वाली कंपनी है। घर खरीदने की इच्छा रखने वालों को मोर्गेज लोन देती है। होम लोन और इंश्योरेंस प्रोडक्ट भी उपलब्ध कराती है।
भारत और अमेरिका में फिलहाल इस कंपनी में कुल 8,000 स्टाफ काम करते हैं। इसके CEO और फाउंडर विशाल गर्ग हैं। 7 साल की उम्र में विशाल भारत से अमेरिका चले गए थे।
भारत में बेटर डॉट कॉम के कर्मचारियों का अनुपात दिसंबर 2021 में बढ़कर 44% हो गया था जो फायरिंग से पहले जून 2021 में 38% था। भारत में इस कंपनी के हेड भवेश शर्मा हैं।
जब कंपनी ने 900 भारतीय वर्कर्स को निकाला था तब उसे काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद उसने नए स्टाफ की भर्ती की थी।


सबसे पहले साल 2000 में अपने दोस्त के साथ शुरू की थी लोन कंपनी

साल 2000 में विशाल गर्ग ने अपने हाईस्कूल के दोस्त रजा खान के साथ एक निजी लोन कंपनी खोली थी जो छात्रों को कर्ज देती थी। कंपनी का नाम माई रिच अंकल रखा। इसी दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। 2005 में कंपनी पब्लिक हो गई थी।
जब 2007-09 में अमेरिका में आर्थिक संकट आया तो विशाल की कंपनी माई रिच अंकल दीवालिया हो गई। इसके बाद रजा खान और विशाल गर्ग ने EIFC नाम का एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया। यह कंपनी भी उनकी दिवालिया कंपनी माई रिच अंकल की तरह ही मकान मालिकों को कर्ज लेने के लिए बैंक की शर्ताें की जानकारी देती थी।

साल 2013 में कंपनी के पार्टनर रजा खान और विशाल के बीच कंपनी की वित्तीय स्थिति को लेकर मतभेद हुआ। विशाल कंपनी के लेनदेन यानी फाइनेंशियल पार्ट को देखते थे। रजा ने आरोप लगाया कि उन्होंने बिजनेस टैक्स भरने के बदले 3 मिलियन डॉलर यानी अभी के 22 करोड़ 98 लाख रुपए से अधिक की रकम कंपनी के बैंक अकाउंट से निकालकर अपने पर्सनल बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर ली।

जब रजा खान के साथ विवाद बढ़ा तो विशाल गर्ग को अपनी पत्नी का साथ मिला और उन्होंने दूसरी कंपनी खोलने का मन बना लिया।


दोस्त रजा खान के साथ विवाद बढ़ने के बाद विशाल (बाएं) ने पत्नी (दाएं) के साथ बेटर डॉट कॉम को आगे बढ़ाया।

ऐसे हुई बेटर डॉट कॉम की शुरुआत

2012 की बात है। कंपनी के CEO विशाल गर्ग दूसरी बार पिता बनने वाले थे। आम अमेरिकी की तरह वे इससे पहले अपना घर बनाना चाहते थे। वैसे ही विशाल भी चाहते थे कि उनका अपना घर हो। इसलिए वे घर खरीदने की तलाश में जुट गए।

विशाल ने कई घरों को लेने के नजरिए से देखा और परखा। काफी तलाश के बाद एक घर उन्हें पसंद आया। ब्रोकर्स से बात करने की कोशिश की। उसे कई कॉल और ईमेल भेजे। इसके बावजूद उन्हें कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला।

वे जल्द-से-जल्द अपना घर चाहते थे, इसलिए उस घर के मालिक से सीधे संपर्क किया। चूंकि इस काम के बीच कोई ब्रोकर नहीं था, इसलिए मकान मालिक ने उन्हें सीरियस खरीददार नहीं समझा। वे विशाल पर विश्वास नहीं कर पाया।

मकान मालिक ने उनसे कहा कि घर के बदले में उन्हें मोर्गेज प्री-अप्रूवल देना होगा। उन्होंने ऑनलाइन जाकर सभी बड़ी वेबसाइट्स पर अपनी सारी डिटेल डाली। इसके बाद भी उन्हें प्री-अप्रूवल किसी ने नहीं दी।

इसके बदले उन्हें कई लोन ब्रोकरों ने कॉन्टैक्ट किया। इन लोगों की बातों पर अब विशाल को विश्वास नहीं हो पाया। विशाल को यहीं से होम ओनरशिप कंपनी बनाने का आइडिया आया।

2020 में कंपनी की लोन वैल्यू 1.8 लाख करोड़ और ब्रांड वैल्यू 4,000 करोड़ रुपए

बेटर डॉट कॉम के मुताबिक कंपनी की लोन वैल्यू 2020 में 24 अरब डॉलर यानी 1.8 लाख करोड़ से अधिक थी। वहीं, ब्रांड वैल्यू 4,000 करोड़ रूपए की थी। सोशल मीडिया लिस्टिंग में लिंक्डइन पर 2020 और 2021 के टॉप स्टार्टअप्स में कंपनी को पहला स्थान मिला था। फोर्ब्स 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक 3 कंपनियां- अमेरिकन एक्सप्रेस वेंचर्स, गोल्डमैन सैक्स, एली फाइनेंशियल ने कंपनी को 25.4 करोड़ डॉलर यानी 2,000 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग की थी।


आज के समय में तेजी से उभरती स्टार्टअप कंपनियों में से यह एक बड़ी कंपनी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जून 2021 में गर्ग ने दावा किया था कि आज उनकी कंपनी इस स्तर पर पहुंच चुकी है जहां लोन के लिए प्री-अप्रूवल सिर्फ 3 मिनट में मिलता है।

फिर कंपनी ने कर्मचारियों को नौकरी से क्यों निकाला

कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के पीछे का कारण विशाल गर्ग ने उन कर्मचारियों का परफॉरमेंस बताया था। कई कर्मचारियों को भेजे मेल में लिखा भी था, ‘आप काम बहुत धीरे-धीरे करते हैं।’

विशाल गर्ग ने मार्केट कैपेसिटी, उत्पादकता और वर्कर्स के प्रदर्शन को भी जिम्मेदार ठहराया था। जब विशाल ने 900 वर्कर्स को फायर किया था तो वीडियो में कहा था कि ऐसा वे दूसरी बार कर रहे हैं। ऐसा करना उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा है।

हालांकि, फोर्ब्स 2020 की एक जांच में पाया गया था कि कर्मचारी लंबे समय से विशाल गर्ग की लीडरशिप के खिलाफ कंप्लेन करते रहे हैं। इंडिपेंडेंट वेबसाइट के मुताबिक विशाल गर्ग पहले भी अपने कर्मचारियों का अपमान कर चुके हैं। इन पर पैसों की धोखाधड़ी और अनियमितताओं के भी आरोप लग चुके हैं।

विशाल से जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियां

2019 में एक पॉडकास्ट में विशाल ने बताया था कि हाईस्कूल में ही उनका लगाव बिजनेस से हो गया था। साथ पढ़ने वाले दोस्तों को किताबें और नोट्स क्लिप बेचा करते थे। विशाल ने सस्ते दामों में कपड़े लेकर ई-वे पर बेचा था। वे वन जीरो कैपिटल के फाउंडिंग पार्टनर भी हैं। यह एक इन्वेस्टर होल्डिंग कंपनी है। 2021 में कोरोना के समय उन्होंने न्यूयॉर्क शहर के पब्लिक स्कूल के छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई में बेहतर सुविधा देने के लिए 15 करोड़ रुपए दान किए थे। इन पैसों का इस्तेमाल आई पैड, इंटरनेट, किताब, ड्रेस जैसी सुविधा मुहैया कराने के लिए किया गया था। दिसंबर 2021 में कर्मचारियों को फायर करने से एक दिन पहले कंपनी को उसके निवेशकों से 75 करोड़ डॉलर मिले थे। जिसके एक दिन बाद उसने 900 स्टाफ को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

SABHAR: DAINIK BHASKAR

Sunday, March 13, 2022

ANILA BANSAL - A YOUNG ENTERPRENEUR

ANILA BANSAL - A YOUNG ENTERPRENEUR

मिलिए हरियाणा राजकीय पुरस्कार से सम्मानित सबसे कम उम्र की महिला उद्यमी अनिला बंसल से


जीवन में कुछ बनने की ललक हो तो आपको कोई नहीं रोक सकता है. आज हम आपको इंटरप्रेन्योर अनिला बंसल के बारे में बताने जा रहे हैं. अनिला एक ऐसा नाम है, जिन्होंने छोटी सी उम्र में बड़ा मुकाम हासिल किया है.

जीवन में कुछ बनने की ललक (Zeal of Success) हो तो आपको कोई नहीं रोक सकता है. आज हम आपको फरीदाबाद की इंटरप्रेन्योर (Anila Bansal) अनिला बंसल के बारे में बताने जा रहे हैं. अनिला एक ऐसा नाम है, जिन्होंने छोटी सी उम्र में बड़ा मुकाम हासिल किया है. हाल ही में उन्हें हरियाणा राजकीय पुरस्कार ' महिला उद्यमी पुरस्कार' (Women Entrepreneur Award) से नवाजा गया है. महिलाओं के सम्मान का एक विशेष संस्करण है और इसे प्रदेश में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने तथा सर्वश्रेष्ठ महिला उद्यमी के रूप में विशेष योगदान के लिए श्रेणियों के अंतर्गत अनिला बंसल को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. वह इस क्षेत्र में सबसे कम उम्र की पुरस्कार विजेता हैं


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महिलाओं के उद्यमिता, विकास में अहम योगदान देने वाली अनिला एक प्रभावशाली व्यापारिक नेतृत्व देने के तौर पर उभरी हैं. उन्होंने महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं. उनके नेतृत्व में, उन्होंने अपने संगठन में जुनून पैदा किया है. नवोन्मेष और सशक्तिकरण का उत्साह रखने वाली अनिला ने हरियाणा की महिलाओं को एक गतिशील कार्य वातावरण बनाने के विचार की अवधारणा को जन्म दिया है.
अपने सफर की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं, मैंने उद्यमिता व समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए ऐसी टीम को बनाने की शुरुआत की जो समाज के हर मुद्दे को सोशल मीडिया व वेबसाइट के जरिये सभी तक पहुंचाएं व इस क्षेत्र में गुणवत्ता को फिर से परिभाषित करें.

अपनी उपलब्धि के बारे में बात करते हुए अनिला बंसल ने कहा, सही माध्यमों और अवसरों के साथ बदलाव की शुरुआत की जा सकती है. आवाज और पहचान हमारे जीवन में समानता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सशक्तिकरण की अवधारणा बहुत ही कम उम्र में मुझे समझ आ गई थी. इस सम्मान को प्राप्त करना मेरे लिए सम्मान और बहुत गर्व की बात है. उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार मेरे जीवन में एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि यह अपना व्यवसाय करने वाली महिलाओं की प्रेरणा, जुनून, भावना का एक वसीयतनामा है जो दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाते हैं.

VARUN BARNWAL IAS

 

VARUN BARNWAL IAS

SABHAR: DAINIK BHASKAR

Sunday, March 6, 2022

KANNAGI DEVI - वानिया चेट्टीयार (तेली वैश्य) कुलभूषण "माता कन्नगी देवी"

KANNAGI DEVI - वानिया चेट्टीयार  कुलभूषण "माता कन्नगी देवी"


आज से लगभग हज़ारो वर्ष पूर्व तमिलनाडु में मदुरई के पास एक गांव में कोवलन नामक वानिया चेट्टीयार रहता था। कोवलन की पत्नी का नाम कन्नगीथा। कन्नगी कोवलन से असीमित प्रेम करती थी। कन्नगी वेदों शास्त्रोकी ज्ञाता थी और उच्च कोटि की पतिव्रता थी। कोवलन एक व्यापारी था और व्यापार के कारण अक्सर उसे बाहर जाना पड़ता था। एक बार कन्नगीने अपने हाथ के सोने के कंगन कोवलन को बेचने हेतु दिए। कोवलन व्यापार के लिये बाहर गया। एक नर्तकी जिसका नाम माधवी था, कोवलन उसी के यहाँ रुक गया और उस स्त्री से उसके सम्बन्ध बन गए। लेकिन कुछ दिन बाद कोवलन को ऐसा एहसास हुआ की मेरी पत्नी कन्नगी मेरी राह देख रही होगी। जो मैं कर रहा हूँ, वह गलत है। ऐसा विचार कर कोवलन वापिस घर लौटने की सोचने लगा। मदुरई पहुंचकर कोवलन ने कन्नगी के सोने के कंगनमदुरई के व्यापारियो को बेच दिया। मदुरई मेंउस समय महाराजा पांड्य का शासन था। राजा पांड्य की पत्नी के कंगन चोरी हुए थे। राजाने रानी के चोर को पकड़ने हेतु सिपाही फैला रखे थे। सिपाहियो ने अपने राज्य में कोवलन को देखा और उसके कंगनों को देखा जो हु बहु महारानी के कंगन जैसे थे। कोवलन को गिरफ्तार कर लिया गया। राजा पाण्ड्य ने कोवलन को मृत्युदंड दिया। उस ज़माने में चोरी, रेप इत्यादि पर सीधा गर्दन कलम होती थी। कोवलन की गर्दन धड़ से अलग कर दी गयी। उसे अपनी बात कहनेका मौका ही नहीं दिया गया।

कोवलन की मृत्यु की खबरसुनकर कन्नगी को बहुत बड़ा झटका लगा। उसने राजा पांड्य के दरबार में प्रवेश किया और रानी के कंगन के समान 4 कंगन और दिखाए। और कहा की "ये कंगन मेरे है , मेरे पति चोर नहीं थे उनके पास आपकी रानी के कंगनों जैसे कंगन थे,आपने एकपक्षीय फैसला देकर मुझसे मेरा सुहाग छीन लिया"राजा ने जाँच करायी तो मालूम पड़ा की रानी के कंगन तो महल में ही है। राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ मगर अब चिड़िया खेत चुग गयी थी।रोती बिलखती कन्नगी ने कहा--- अगर मैंने मन वचन कर्म से अपने पति की सेवा की है तो हे अग्निदेव मेरे निर्दोषपति की ह्त्या करने वाले इस राज्य का विनाशकर दीजिये। बच्चों और बूढो को छोड़कर इस राज्यमें सब कुछ जलकर राख हो जाये। धिक्कार है ऐसे न्यायतंत्र को जहाँ मेरे पति को झूठे आरोप में मृत्युदंड दे दिया गया।कन्नगी ने ऐसा बोला ही था की पूरा मदुरई राज्यधू-धू कर जल उठा। राजा पांड्य गिड़गिड़ाने लगे मगर कुछ न हुआ। और चारो तरफ हाहाकार मच गया।उधर कन्नगी पागलो की तरह खुले केश किये हुए रोती हुयी भटकने लगी।

इतिहासकारो के अनुसार कन्नगी सशरीर एक विमान पर बैठकर स्वर्ग गयी थीऔर उसको लेने उसका पति स्वयं आया था।आज भी जब मदुरई जाते है तो रास्ते में कई किलोमीटर का क्षेत्रफलअग्नि से जला हुआ साफ साफ दिखता है। कांचीपुरम का शिव मंदिर भी इसी आग की चपेट में आ गया था।ये घटना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर बल देती है।ये घटना वर्तमान समय में व्याप्त "Contempt of court" नामक व्यवस्था पर एक प्रहार है।अगर लोगो को न्याय नहींमिलेगा तो वो न्यायपालिका का अनादर करेंगे ही..फिर क्यों न हम डायना की जगह कन्नगी को न्यायकी देवी माने? और उसे ही न्यायालय में लगाएँ ।डायना के आँखों में पट्टी होती है जबकि कन्नगी देवी की आँखों में नहीं ।
 
वर्तमान में देवी कन्नगी की पूजा तमिलनाडु में होती है।

MODH VAISHYA SAMAJ KA ITIHAS & KULDEVI MA MATANGI

MODH VAISHYA SAMAJ KA ITIHAS & KULDEVI MA MATANGI

मोढ समाज मुख्यतः गुजरात में आबाद है।

Modh Vanik / Bania – ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड के अनुसार इन मोढ़ ब्राह्मणों के सुख के लिए कामधेनु गौ ने मोढ वैश्यों को उत्पन्न किया। ब्रह्माजी से वैश्य-उत्पत्ति का आदेश पाकर कामधेनु ने आगे के पाँव के खुर से पृथ्वी का विदारण किया। कामधेनु की हुंकार के साथ शिखा और यज्ञोपवीतधारी मोढ वैश्य / वणिक उत्पन्न हो गए। उन वैश्यों के गृहस्थाश्रम के निर्वहन के लिए सुन्दर कन्याओं से उनका विवाह कर दिया गया। वे वैश्य गाय कामधेनु की भुजा के प्रताप से उत्पन्न हुए इसलिए वे गोभुजा (Gobhuja) भी कहलाये।
मोढ समाज के विभिन्न जातियां बनीं –

मोढ ब्राह्मण समाज (Modh Brahmin)
मोढ वणिक / वैश्य / बनिया समाज (Modh Vanik / Bania)
मोढ पटेल समाज (Modh Patel)
मोढ मंडलिया समाज (Modh Mandalia)
मोढ मोदी समाज (Modh Modi)

मोढ समाज की कुलदेवी मातंगी देवी Kuldevi Modheshwari Matangi Devi

माहेरपुर / मोढेरा में ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने मोढ ब्राह्मणों की रक्षा के लिए श्रीमाताजी की प्रतिष्ठापना की थी। एक बार कर्णाट दैत्य से पीड़ित होकर ब्राह्मण श्रीमाताजी के पावन धाम पर आकर स्तुति करने लगे। ब्राह्मणों का दुःख देखकर श्रीमाताजी कुपित हो गईं। उनके तेज से सिंहवाहिनी मातंगी देवी का प्राकट्य हुआ। श्रीमाताजी ने मातंगी देवी से कहा महाबली कर्णाट का वध कर दो। देवी मातंगी ने युद्ध में कर्णाट का वध कर दिया। श्रीमाताजी ने कहा आज से माघ कृष्णा तृतीया के दिन प्रतिवर्ष मेरा उत्सव करना। विवाह, यज्ञोपवीत, सीमन्त इन कर्मों के अवसर पर कुलदेवी मातंगी का पूजन करना।

माघ शुक्ला तृतीया के दिन प्रतिवर्ष बनियों को मातंगी कुलदेवी की पूजा करनी चाहिए। मोढ़ बनियों में विवाह होने के बाद एकावन्ना-बावन्ना विधि से पूजा करें। नैवेद्य खाजा लड्डू का रखें।

हर साल कुलदेवी मातंगी का पूजन करना चाहिए। माघ शुक्ला तृतीया को पूजन करके प्रसाद वितरण करना चाहिए। विवाह के समय एकावन्ना विधि का अनुष्ठान करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि बनी रहती है।

मातंगी देवी के मन्दिर –

मातंगी देवी के मन्दिर अहमदाबाद के सोला, रामनगर, सरखेज, गलुदण आदि स्थानों पर तथा कच्छ, मोढेरा, भड़ौच, खेड़ब्रह्मा, नवसारी, कपड़वंज, भावनगर, शेरथा, सिंहोर, सूरत, वड़ोदरा, उज्जैन, भुज, जम्भुआ आदि स्थानों पर स्थापित हैं।

SABHAR: missionkuldevi.in/2017/04/modh-samaj-history-castes-kuldevi-modheshwari-matangi-devi/


दोसर वैश्य कब कहाँ कैसे : HISTORY OF DOSAR VAISHYA

दोसर वैश्य कब कहाँ कैसे : HISTORY OF DOSAR VAISHYA 

दोसर वैश्य कब कहाँ कैसे (Dosar Vaish): जबसे मैंने अपने समाज के कार्यक्रमों में भाग लेना प्रारंभ किया तो कोई न कोई चर्चा इसी बिंदु पर आकार रुक जाती कि हम “दोसर वैश्य” कैसे कहलाये इस विषय को लेकर हम वर्षो तक मंथन ही करते रहे | लेखक क्षेत्र से जुड़े होने के कारण इतिहास की पुस्तकों से हमारे समाज का जो इतिहास बना वह बड़ा ही संघर्ष पूर्ण मना गया | समाज के कुछ ही लोगो को सायद ज्ञात होगा कि यह समाज क्या था | हमने जो इतिहास का विश्लेषण किया वह बड़ा ही रोचक एवं सत्य के करीब निकला | दोसर वैश्य नाम हमे 1556 के बाद दिया गया जो आज तक प्रचलित है.
 
11 फरवरी 1556 के दिन दिल्ली के शासक हिमायुं की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता पाने के लिए अनेक राजपूत राजाओ ने कोशिश की पर वर्तमान के अफगान शासक अब्दुला शाह अब्दाली के भारतीय प्रतिनिधि “हेमू” वैश्य ने अपनी सूझ बुझ एवं सैन्य संगठन के बाल पर 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली के गवर्नर तरदी बेग को परास्त करे सत्ता पर आधिपत्य करके अपने को देश का शासक घोषित करते हुवे “हेम चन्द्र विक्रमादित्य” के नाम से अलंकृत किया | कुछ दिनी बाद वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुवे जिससे सत्ता सदैव के लिए मुस्लिमो के हाथो चली गयी जो बाद में अकबर जो उस समय बालक ही था बैरम खां के सानिध्य में शासन चलने लगा “हेमू” के पतन के बाद बैरम खां द्वारा समस्त वैश्य समाज को मारा काटा जाने लगा तो अन्य वैश्यों के दरबारियों ने कहा कि “हेमू तो ढूसी वैश्य थे इन्ही के समाज के लोगो ने सत्ता के लिए युद्ध किया था फिर क्या था ढूढ-ढूढ कर हमारे समाज के युवको व वर्द्धो को मारा गया | विवश होकर समाज के बचे बंधू उत्तरपूर्ण की ओर पलायन कर गये | “ढूसी” ग्राम आज भी हरियाणा प्रान्त में राजस्थान सीमा के करीब गुडगाव जनपद में रेवाड़ी कस्बे के पास स्थित अरावली पर्वत श्रंखला में स्थित है | उस समय हमारा समाज कृष्ण भक्त था ‘हेमू’ के चाचा नवल दास उच्चकोटि के संत एवं लेखक थे उन्ही द्वारा अपने गुरु के सम्मान में लिखी गई पुस्तक “रसिक अनन्यमाला” का दोहा देखे

“श्री हित हरिवंश के शिष्य है जान |
दुसर कुल पवन कियो जिनको करौ बखान”

एक और प्रमाण देखे उत्तर भारत में केवल हमारे ही समाज में विवाह में वधू को निगोड़ा पहनाया जाता है | तो अन्य किसी भी समाज में नहीं चलता है, जबकि आज भी हरियाणा एवं राजस्थान की सीमा के अन्दर कुछ क्षेत्रो में निगोडो का चलन है, एक राजस्थानी गाना भी निगोडा को लेकर बना है |

हेमचन्द्र विक्रमादित्य हेमू के वीरगति प्राप्त होने के बाद यह समाज वर्षो तक तितर-बितर रहकर 16वि शताब्दी के आस-पास गंगा नदी के किनारे आ गया | उस समय यहां के शासक रजा कर्ण सिंह थे जो व्यापारिक नगर का निर्माण करने की योजना बनाये थे | उन्होंने ने हम वैश्यों को गंगा नदी के उत्तर एवं दक्षिण क्षेत्र को आवंटित करके उस क्षेत्र को ‘वैश्य वारा’ के नाम से घोषित कर दिया जो बिगड़ कर आज “वैसवारा’ के नाम से जाना जाता है |

ब्रिटिश शासन काल में 1880 में विभिन्न जनपदों में वैश्य समाज की गणना करायी गई | उसमे भी पैरा छ: में स्पष्ट निर्देशित किया गया की दोसर वैश्य का मूल स्थान दिल्ली ही है | इतिहासकार डॉ मोतीलाल भार्गव द्वारा किये गए शेष “हेम और उनका युग” में कहा गया है ढूसी जो हेमू का जन्म स्थल था | वहां के वैश्यों को दूसी वैश्य कहा जाता था जो बाद में दूसर वैश्य एवं वर्तमान में दोसर वैश्य कहे गए. (Dosar Vaish)

हमारा समाज पहले शस्त्रों का व्यापर करता था तभी इस समाज के लोग राज्य सत्ता के आसपास या गांगो में जमीदारो के करीब रहकर उनकी अर्थव्यवस्था एवं शस्त्रों की व्यवस्था देखते थे 1857 के संघर्ष में फिर वैसवारा के हमारे दोसर वैश्य समाज में स्वत: का विगुल फूंका जिन्हें अंग्रेजो ने दबाकर उत्पीडन करना सुरु कर दिया | आज अन्य प्रान्तों में जोभी हमारे बंधु चाहे रंगून हो नागपुर कोलकाता या अन्य प्रदेशो में निवास कर रहे हो | वह मूलतः वैसवारा के ही रहने वाले है जो 1857के बाद ही पलायन कर गए थे जैसा कि उन लोगो ने समय-समय पर स्वीकारा भी है |

1980 तक हमारे समाज के अनेक बन्धु आजीवन ग्राम प्रधान बने रहे पर गावो से निकल कर शहर कस्बो में बसने के कारण वह राजनीति की वह भागीदारी न कर पाए जो करनी थी | फिर भी दस वर्षो से कुछ लोग खुलकर शासन प्रशासन में स्थान बनाये है | इस बार के स्थानीय निकाय के चुनाव में अनेक स्थानों पर सभासद एवं नगर पालिका के प्रमुख पदों पर जीते भी है तो कुल बन्धु विधायक बने एवं सांसद का चुनाव लड़ने की सोच भी रहे है |

वर्तमान समय में इस समाज के अनेक युवक युवतियां प्रशासनिक क्षेत्र में प्रवेश कर चुके है | कुछ तैयारी भी किये है पर अपेक्षित शिक्षा के अभाव में जन संख्या के अनुपात में विकास से वह काफी दूर है | मैंने इन सब विषयों को लेकर पुस्तक की रचना की है जो किन्ही कारण वश प्रकाशित नही हो पाई है जिसमे हमारे समाज का पूरा इरिहास समाहित है.

SAABHAR:   
राममनोहर वैश्य
बेनीगंज हरदोई (UP)
Mo. 9795959745

भारत के विकास में जैन वैश्य समुदाय का योगदान

भारत के विकास में जैन वैश्य समुदाय का योगदान 

भारत में जैन धर्म छटा सबसे बड़ा धर्म है और पूरे देश भर में प्रचलित है।

भारत की 1.028 अरब जनसंख्या में 44,51,753 लोग जैन धर्म के अनुयायी हैं, यद्यपि जैन धर्म का प्रसार बहुत दूर तक है जो जनसंख्या से कहीं अधिक है। भारत के केन्द्र शासित प्रदेशों एवं सभी राज्यों में से ३५ में से ३४ में जैन लोग हैं, केवल लक्षद्वीप एक मात्र केन्द्र शासित प्रदेश है जिसमें जैन धर्म नहीं है। झारखण्ड जैसे छोटे राज्य में भी 16,301 जैन धर्मावलम्बी हैं और वहाँ पर शिखरजी का पवित्र तीर्थस्थल है।

* 65.38% के राष्ट्रीय औसत की तुलना में, भारत में जैनियों की सबसे ज्यादा साक्षरता दर 94.1% है | 54.16% के राष्ट्रीय महिला साक्षरता दर औसत के तुलना में, जैनियों महिला की उच्चतम साक्षरता दर, 90.6% है|यह भी माना जाता है कि जैन भारत में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय है |संख्या में जैन समुदाय हालांकि बहुत छोटा है लेकिन भारत के आयकर राजस्व का एक महत्वपूर्ण प्रतिशत योगदान जैनियों से ही जाता है|

* 20 जनवरी 2014 को, भारत सरकार ने भारत में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक(Minority) का दर्जा प्रदान किया|

Jain population in India ::

Total: 66,51,753

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***Maximum Jain population***
1. Maharashtra: 1400349
2. Rajasthan: 622023
3. Gujarat: 579654
4. M. P.: 567028
5. Karnataka : 440280
6. U. P. : 2013267
7. Delhi : 106231
8. Tamil Nadu: 89265
9. Chhattisgarh : 61510
10. West Bengal : 60141
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States having Jain Population between 10000 to 60000
1. Andhra: 53849
2. Haryana: 52613
3. Punjab: 45040
4. Assam: 25949
5. Bihar: 18910
6. Jharkhand: 14974
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***States having Jain Population less than 10000***
1. Odisha: 9420
2. Uttarakhand: 9183
3. Kerala: 4489
4. Nagaland: 2655
5. J&K: 2490
6. Chandigarh: 1960
7. Himachal: 1805
8. Manipur: 1692
9. Pondicherry: 1400
10. Dada & Nagar Haveli: 1186
11. Goa: 1109
12. Arunachal: 771
13. Meghalaya: 627
14. Mizoram: 376
15. Sikkim: 314
16. Daman & Diu: 287
17. Andaman & Nicobar: 31
( समस्त जानकारी भारत मे 2014 में हुऐ सर्वे के अनुसार।)
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More Information About Jain Community
जैन मंदिर
16570
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पाषण की प्रतिमायें
207896
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जैन ऊपाश्रय धर्म स्थानक
19567
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जैन समाज संचालित अस्पताल
145
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जैन समाज संचालित स्कुल कॉलेज
68
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आंशिक रूप से जैन समाज संचालित स्कुल कॉलेज
1233
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जैन समाज द्वारा संचालित जीव रक्षा केन्द्र
1408
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साधु भगवंत
5678
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साध्वी जी ,महासती जी
23768
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जैन N.G.O
3600 के करीब
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जैन समाज की प्रायवेट लिमिटेड कंपनिया
3400
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शेर बजार मे जैनो की हिस्सेदारी
34%
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देश के इन्कम टैक्स में जैन समाज का योगदान
23%
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जैन मालिक एवं जैन संस्थानो के द्वारा दी जा रही प्रत्यक्ष रोजगारी
2.5 करोड
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यह देश का पहला ऐसा समाज है कि जिसका आंदोलन आरक्षण या लाभ के लिये नहीं होता है| सिर्फ और सिर्फ जीवदया और जीव रक्षा के लिये ही होता है |