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Wednesday, May 3, 2023

GUPTA DYNESTY - गुप्त साम्राज्य और उसका विस्तार


GUPTA DYNESTY - गुप्त साम्राज्य और उसका विस्तार 
भारत का स्वर्ण काल व सांस्कृतिक व धार्मिक उन्नति काल 

गुप्त साम्राज्य: भारतीय राजवंशों का तारीखवार लेखा जोखा मिलना शुरू होता है महाजनपद काल से। तब भारत 16 महाजनपदों में बंटा हुआ था। अपने पराक्रम से इस भूभाग को एक किया मौर्य वंश ने। सम्राट अशोक के समय अपने चरम पर पहुंच गया यह साम्राज्य। लेकिन, अशोक के जाने के साथ ही इसके बुरे दिन शुरू हो गए।

अशोक की मौत के पांच दशक बाद आखिरी मौर्य शासक बृहद्रथ को उसी के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मार डाला। यहां से शुरू हुआ शुंग राजवंश। उसी दौर में कण्व, सातवाहन जैसे दूसरे राजवंशों का उदय भी होने लगा। इसी बीच भारत के पश्चिमोत्तर से कुषाण आ गया।

कुषाण काल आने तक भारत में सामंत व्यवस्था वजूद में आ चुकी थी। इस व्यवस्था में राजा दूर-दूर तक फैले अपने राज्य के विभिन्न भागों पर सामंतों के ज़रिए शासन करते। इस बात का ज़िक्र ज़रूरी इसलिए है, क्योंकि कुषाण राज्य के ही एक सामंत थे श्रीगुप्त। वह आज के उत्तर प्रदेश के निचले दोआब क्षेत्र के सामंत थे। श्रीगुप्त एक वैश्य अग्रवाल परिवार से थे. उनका गोत्र धारण था. जो की अग्रवालो का एक गोत्र हैं. उनकी कुलदेवी माता लक्ष्मी थी. भगवान्य विष्णु उनके अराध्य व कुल देवता थे. 

यह  भी गौरतलब है कि कुषाण राजवंश के कमजोर पड़ने के बाद सामंत श्रीगुप्त ने अपने क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन, उन्होंने ख़ुद को राजा घोषित नहीं किया, इसीलिए गुप्तवंश के पहले राजा के रूप में उनका नाम नहीं लिया जाता।

श्रीगुप्त के बेटे थे घटोत्कच। उन्होंने भी अपने पिता की तरह पहले से चली आ रही व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया। लेकिन, जब घटोत्कच के बेटे चंद्रगुप्त प्रथम को राज्य मिला, तो उन्होंने ख़ुद को राजा घोषित किया। इसी वजह से चंद्रगुप्त प्रथम को ही गुप्त शासन का पहला औपचारिक राजा माना गया।

चंद्रगुप्त प्रथम ने राज्य विस्तार के लिए लिच्छवी राजवंश की राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। यहीं से गुप्त साम्राज्य के भौगोलिक विस्तार की शुरुआत हुई। इस दौर में कई नए सिक्के चलाए गए। कहते हैं कि लिच्छवी से अपने संबंध मजबूत करने के लिए राजा-रानी को एक साथ दर्शाते हुए सिक्के भी जारी किए गए।

चंद्रगुप्त प्रथम और कुमार देवी के पुत्र थे समुद्रगुप्त। वह सन 335 में राजा बने। इसी काल विशेष को गुप्त वंश के स्वर्णकाल की शुरुआत मानी जा सकती है। दरअसल समुद्रगुप्त साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के राजा थे। कई इतिहासकार मानते हैं कि उन्हीं के दौर में गुप्त साम्राज्य का तेज़ी से विस्तार हुआ। कुछ ही समय में उन्होंने उत्तर भारत के एक के बाद एक 9 राज्य जीत कर गुप्त साम्राज्य को विशाल बना दिया। दक्षिण भारत में भी उन्होंने 12 राज्यों को हराकर अपने अधीन कर लिया। भारत के इतने बड़े भूभाग पर वर्चस्व के कारण ही समुद्रगुप्त को धरणीबंध कहा गया यानी वह व्यक्ति जिसने धरती को बांध लिया। इसीलिए समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है।

समुद्रगुप्त के बाद गुप्त राजवंश में चंद्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त, स्कंदगुप्त जैसे कई सफल राजा हुए, जिनके समग्र विकास कार्यों के कारण ही गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग माना गया।

गुप्त काल को स्वर्ण युग सिद्ध करने के कई तर्क हैं। इनमें एक यह कि इसी दौर में कला और साहित्य का आश्चर्यजनक विकास हुआ। दरअसल गुप्त राजवंश के राजा ख़ुद भी काव्य प्रतिभा संपन्न थे। सम्राट समुद्रगुप्त को तो कविराज की उपाधि दी गई थी। इस दौर के साहित्यिक परिवेश का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के दो सबसे लोकप्रिय महाकाव्य, रामायण और महाभारत का संकलन इसी काल में हुआ माना जाता है।

किसी देश या काल में विकास का एक सूचक न्याय प्रणाली को भी माना गया है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि प्राचीन कानून व्यवस्था का ग्रंथ ‘नारद स्मृति’ गुप्त काल में लिखा गया। राज व्यवस्था का ग्रंथ ‘कामन्दकीय नीतिसार’ भी इसी दौर का है। विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, वायु पुराण जैसे पुराणों के संकलन भी इसी काल खंड में हुए माने जाते हैं। पाणिनि इसी काल के हैं, जिन्हें इस दौर में संस्कृत व्याकरण के अपूर्व विकास का श्रेय दिया जाता है।

महाकवि भास भी इसी काल विशेष में हुए। उनके लिखे नाटकों ने संस्कृत भाषा के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि गुप्तकाल की साहित्यिक प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण बने महान रचनाकार कालिदास। उनकी रचनाएं आज विश्व साहित्य की धरोहर हैं। इन रचनाओं में अभिज्ञान शाकुंतलम की लोकप्रियता का क्या कहना! इस रचना को दुनिया में कई भाषाओं में अनुवाद करके पढ़ा गया। इसी तरह कालिदास रचित मेघदूत, मालविकाग्निमित्रम जैसी कालजयी रचनाएं भी गुप्त काल की ही साहित्यिक धरोहर हैं।

किसी कालखंड को स्वर्णयुग मानने के पहले यह भी देख जाता है कि उस दौर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का स्तर क्या था। पूरी दुनिया जानती है कि विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट ने इसी दौर में ऐतिहासिक खोजें कीं। एलजेबरा यानी बीजगणित के कई सूत्र और शून्य की अवधारणा देने वाले आर्यभट्ट का नाम आज भी बड़े आदर से लिया जाता है। आर्यभट्ट ही थे, जिन्होंने यह समझा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उनके लिखे ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ में भारतीय दशमलव प्रणाली का उल्लेख है। सूर्य और चंद्र ग्रहण के तार्किक कारण पहली बार आर्यभट्ट ने ही समझे। वरना उसके पहले तक माना जाता था कि ये खगोलीय घटनाएं राक्षसी या मायावी कारणों से होती हैं।

सिर्फ आर्यभट्ट ही नहीं, वराहमिहिर की उपस्थिति भी गुप्तकाल में ही है। खगोल और गणित का भारतीय इतिहास वराहमिहिर के ज़िक्र के बिना अधूरा माना जाता है। उनके ग्रंथ ‘बृहत्संहिता’ में पर्यावरण, जलवायु का ज्ञान संचित है। इस ज्ञान ने गुप्त काल की खेती, बागवानी और पशुपालन के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी। रेखागणित के कई प्रमेय यानी सिद्धांत देने वाले ब्रह्मगुप्त की भी कर्मस्थली गुप्त साम्राज्य में ही थी।

भारतीय चिकित्सा के क्षेत्र में शल्य यानी सर्जरी के जनक माने जाने वाले सुश्रुत की रचना ‘सुश्रुत संहिता’ इसी युग में संकलित की गई। कहा तो यह भी जाता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों में शामिल थे आयुर्वेद के ज्ञाता धन्वन्तरी।

किसी काल के स्वर्णिम होने की पहचान उस दौर की कला से भी होती है। गुप्त काल की वास्तुकला और चित्रकारी आधुनिक कला के विशेषज्ञों को हैरत में डाल देती है। भारत में मंदिरों का आज का जो स्वरूप है, वह पहली बार गुप्त काल में ही सामने आया। दरअसल गुप्त शासकों ने अपने दौर में वैष्णव धर्म के कई मंदिर बनवाए। शुरू में बने ये मंदिर सपाट छत वाले थे। भले ही तबके मंदिर आज के मुक़ाबले बेहद साधारण थे, लेकिन मौजूदा उत्तर भारत के नागर शैली के मंदिरों का आधार उन्हीं गुप्तकालीन मंदिरों को माना गया है। इसी तरह इतिहासकारों ने यह भी जाना है कि गुप्त काल में फ्रेस्को और टेम्परा शैलियों के चित्र बनाए जाते थे। इनमें गीले प्लास्टर पर ही आकार बनाकर रंग भर दिए जाते। ऐसी चित्रकारी अजंता की गुफाओं में देखी जा सकती है।

किसी कालखंड को स्वर्णिम सिद्ध करने के लिए उस दौर की आर्थिक संपन्नता पर नज़र डालना भी ज़रूरी है। इतिहास के जिस भी दौर में धातुकर्म की उन्नति हुई, वह उतना ही समृद्ध बना। इस लिहाज से देखें तो गुप्त काल में बनी गौतम बुद्ध की कांस्य प्रतिमा, दिल्ली में कुतुब मीनार परिसर में लगा लौह स्तंभ और गुप्त साम्राज्य की एरण टकसाल में ढले सिक्के उस दौर की उत्कृष्ट धातु कला और संपन्नता का प्रमाण हैं।

शिक्षा क्षेत्र की बात करें तो गुप्त काल की ख्याति पूरी दुनिया में थी। गुप्त शासक कुमारगुप्त का बनवाया नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का पहला छात्रावास की सुविधा वाला विश्वविद्यालय था। दुनियाभर के छात्र वहां पढ़ने आते। डेढ़ हज़ार साल पहले इतने विशाल शिक्षण संस्थान की कल्पना करना मुश्किल लगता है। लेकिन, नालंदा विश्विद्यालय के पुरातात्विक अवशेष आज वैश्विक धरोहर है।

गुप्त काल की राजव्यवस्था का एक अंदाज़ा हम तबकी न्याय प्रणाली से लगा सकते हैं। यह वही दौर था, जब पहली बार फौजदारी क़ानून और दीवानी क़ानून अलग-अलग बनाए गए। लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले इन दोनों क़ानूनों के लिए अलग नियम-कायदे और सजा के प्रावधान बना लिए गए थे।

गुप्त काल से जुड़े कई और पहलू भी हैं, जिनकी जानकारी अभिलेखों, प्रशस्तियों और विदेशी यात्रियों के संस्मरणों से मिलती है। इस पूरे दौर को एक नज़र में समेट पाना मुश्किल काम है। बहरहाल उस दौर की दास प्रथा और सती प्रथा जैसी कुछ कुरीतियों को छोड़ दें, तो गुप्त काल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहना ग़लत नहीं।

साभार: उगता भारत ब्यूरो

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