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Saturday, October 31, 2015

RANI SATI - अमर वीरांगना: श्री राणीसती जी की जीवन गाथा

या देवी सर्व भूतेशु सति रुपेणी संस्थिता ।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नारायणी नमोसतुते ॥

माँ रानी सती 

माता रानी सती जी  का मंदिर


माँ नारायणी का जन्म वैश्य जाती के अग्रवाल वंश में हरियाणे में धनकुबेर सेठ श्री घुरसमाल जी गोयल के सं १३३८ वि कार्तिक शुक्ला ८ शुभ मंगलवार रात के १२ बजे पश्चात हरियाणे की प्राचीन राजधानी ‘महम’ नगर के ‘ढ़ोकवा’ उपनगर में हुआ था।
संवत् तेरह सौ अडतीस कार्तिक शुक्ला मंगलवार ।

बारह बजकर दस मिनट, आधे रात लिया अवतार ।

(सती मंगल से)

सेठ घुरसमाल महाराजा अग्रसेन जी के सुपुत्र श्री गोंदालाल के वंशज थे। गोयल गोत्र के थे। सेठ जी ‘महम’ के तो नगर सेठ थे हे लेकिन उस समय उनकी मानता व सम्मान दिल्ली के बादशाहों तक थी। उन दिनों एक तरह से दिल्ली का शासन मह्म्वालों के इशारों पर चलता था| दिल्ली हिसार (ग्रांड ट्रंक) सड़क पर सैंकड़ो महल, मन्दिर, मकबरे, मस्जिदों, भवनों के खंडहर दोनों तरफ आज भी है, जिससे सिद्ध होता है की उस ज़माने में महम समृध्दशाली व विशाल नगर रहा होगा।

बचपन

दुर्गे हे ये शिवे अम्बिके, ये हे आदि भवानी है।
जन जन को दे रही सभी कुछ, जग में सती नारायणी हैं।

इनका नाम ‘नारायणी’ बाई रखा गया था। ये बचपन में धार्मिक व सतियों वाले खेल सखियों के साथ खेला करती थी। कथा आदि में विशेष रूचि लेती थी। बड़ी होने पर सेठजी ने इन्हे धार्मिक शिक्षा , शस्त्र शिक्षा, घुड़सवारी आदि की भी शिक्षा दिलाई थी। इन्होंने इनमें प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। उस समय हरियाणा में ही नहीं उत्तर भारत में भी इनके मुकाबले कोई निशानेबाज बालिका एवं पुरुष भी नहीं था|

बचपन का शील स्वभाव निरख, पित – मात स्वजन हर्षाते थे।
कुल का ये मान बढायेगी, मंतव्य सभी दर्शाते थे ॥
भरपूर भक्ति और धर्म सहित, नितकर्म ‘नारायणी’ करती थी।
निज दिव्य ओज से भावी का, आभास कराया करती थी।

(प्राचीन पोथी अग्नि समाधि से)

बचपन में ही ये अपने चमत्कार दिखलाने लगी थी। एक डाकिन (पुराने ज़माने में बच्चे खाने वाली एक औरात) महम नगर में आया करती थी। इनकी सुन्दरता की ख्याति सुनकर डाकिन एक दिन आई। इन पर हमला करने की तो हिम्मत नही पड़ी, लेकिन डाकिन इनकी सहेली को उठाकर लेके जाने लगी| उन्हें आता देख डाकिन बेहोश होकर अंधी हो गई।

डाकिन अंधी हो चली, खड़ी नगर के बाहर।
दीखे उसको कुछ नही, करने लगी विचार।

(सती मंगल से)

डाकिन के पास पहुंचकर नारायणी जी ने तुंरत सहेली को छुड़ाया और उसे जीवित किया। डाकिन इनका ये चमत्कार देखकर डर गई। उसने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और प्रतिज्ञा की कि आगे से मैं बच्चे नही खाया करूंगी। इन्होंने उसे क्षमा किया और उसकी आँखे भी ठीक कर दी। इस तरह दादी ने अपने बहुत सारे चमत्कार बचपन में दिखाए।

विवाह

इनका जन्म अग्रवाल कुल शिरोमणि हिसार राज्य के मुख्य दिवान स्वनाम धन्य सेठ श्री जालानदास जी बंसल के सुपुत्र श्री तनधनदास जी के साथ मंगसिर शुक्ला ८ सं. १३५१ मंगलवार को महम नगर में बहुत ही धूमधाम से समारोह पूर्वक हुआ था। इनके पिता श्री ने जो दहेज़ दिया था उसमे हाथी, घोडे, ऊंट, घोड़े और सैकड़ोँ छवड़े सामान से भरे हुए दिये थे। सबसे विशेष वस्तु एक ‘श्यामकर्ण’ घोड़ी थी। उस काल में उत्तर भारत में यही केवल एक ‘श्यामकर्ण’ घोड़ी थी।

श्री तनधन दास जी का जीवन परिचय

इनका जन्म वैश्य जाती में महाराज अग्रसैन जी के सुपुत्र विशाल्देव जी (वीरभान जी) के वंश में हुआ था। इनके वंशज ‘बंसल’ गोत्री कहाये । उसी बंसल गोत्र में सेठजी श्री जालानदास जी के श्री तनधनदास जी ने जन्म लिया था। इनके एक छोटे भाई का नाम कमलराम था।

उस समय हिसार का नवाबी राज्य आजकल के हरियाणा प्रदेश से बड़ा था। उसी नवाबी राज्य हिसार केश्री जालानदासजी मुख्य दिवान थे । इनकी न्यायप्रियता की धाक दूर-दूर तक राज्यों में थी। ये चतुर व कर्मठ शासक थे।विवाह के पश्चात श्री तनधनदास जी सायकाल अपनी ससुराल वाली घोड़ी पर सैर करने हिसार में जाया करते थे। नवाब के पुत्र शेह्जादे को दोस्तों ने भड़काया कि जैसी घोड़ी दिवान के लड़की के पास है ऐसी तेरे राज्य में नही है। शहजादा तो घोड़ी देखकर पहले से हे जला भुना बैठा था। दोस्तों कि बातो ने आग में घी का काम किया। शहजादा तुंरत नवाब साहब के पास गया और घोड़ी लेने की हठ की। नवाब ने दिवान साहब को बुलाकर घोड़ी मांगी। दिवानजी ने कहा – मालिक ये घोड़ी मेरी नही है। लड़के को ससुराल से मिली है। वह घोड़ी नहीं देंगे। आप क्षमा करें। समय व संस्कार की बात है। नवाब ने घोड़ी छीनने का प्रयत्न किया। संघर्ष में बहुत से सैनिक सेनापति सहित मारे गये।

भाग दौड़ पल्टन गई|
कहा नवाब सन जाय।
सेनापति रण खेत में, दिये प्राण गवांय।

(सती मंगल से)

यह देखकर नवाब ज्यादा निराश हो गया और दोस्तों की बातों में आकर दिवानजी की हवेली से घोड़ी लाने आधी रात को गया। नया आदमी देखकर घोड़ी हिनहिनाने लगी। शाम हो गई। श्री तनधन जी सांग (भाला) लेकर उस ओर चले।

तब लक्ष साध कर शब्द-भेद । तन धन ने उठा फेंकी॥
इक चीख उठी, हो गया ढेर। इक मनुज देह गीरती देखि ॥

(अग्नि समाधी से)


सांग के एक वार में हे नवाबजादा मारा गया। दिवानजी ने मिलकर विचार किया और तुरन्त हिसार छोड़कर झुंझनू – नवाब के पास जाने का निर्णय किया क्यूंकि हिसार और झुंझनू के नवाबो की आपस में लड़ाई व शत्रुता थी। रातों रात हिसार से परिवार सहित दिवानजी चल पड़े।

उधर सुबह होने पर नवाब ने शहजादे को महलों में नहीं देखा। चरों ओर तलाश की गई। अंत में दिवानजी की हवेली से शहजादे की लाश लायी गई। नवाब के महल में कोहराम मच गया। नवाब ने सेना को तुरन्त दिवान को पकड़ लाने का आदेश दिया। सेना चारों और चल पड़ी, उत्तर की और जाने वाली सेना ने लुहारू के पास दिवानजी को जातें हुए देखा। लेकिन तब तक दिवान सपरिवार झुंझनू राज्य की सीमा में प्रवेश कर चुके थे। हिसारी सेना की ताकत झुंझनू सेना से टक्कर लेने की नहीं थी, सेना निराश होकर हिसार लौट आई। नवाब सब सुनकर सिर पीटकर रह गया।

श्री जालान्दास जी के सपरिवार जी के झुंझनू पहुँचने पर नवाब साहब ने शाही मुरतब व लवाजमें के साथ स्वंय नगर सीमा पर स्वागत सम्मान किया और दिवान (मुख्यमंत्री) का पद दिया। उन्होंने हिसार से भी उच्चकोटि का कार्यकर जनता व नवाब के विश्वास पात्र बनकर शानदार ढंग से रहने लगे। राज्यभर में दिवानसाहब की न्यायप्रियता व शासन की धूम मच गई।

मुकलावा (गौना)

‘महम’ नगर चूँकि हिसार राज्य में था। इसलिए शहजादे काण्ड की शान्ति के बाद सेठ घुर्सामल जी के मुकलावा करने के लिए झुंझनू दिवान साहब के पास ब्राह्मण द्बारा निमंत्रण भेजा। साथ ही सारे समाचार और मंगसिर क्रष्ण १ मंगलवार का लग्न मुहूर्त भेज दिया। झुंझनू से लौटकर ब्राह्मण ने मुहूर्त पर कुंवर तनधनदास जी के आने का सुसमाचार नगर सेठ को बताया।

लग्न-मुहूर्त से ४ दिन पहले श्री तनधनदास जी मित्रों व साथियों सहित ढोकवा (महम) सांयकाल पहुंच गये। नगर सेठ की और से स्वागत सत्कार का शानदार व सराहनीय प्रबंध किया गया। सेठ जी श्री तनधनदास जी से प्रार्थना की कि आप महम में ही निवास कीजिये।

जो इच्छा हो व्यापार या कार्य कीजिये। लेकिन गर्वीले श्री तनधन जी ने ससुराल में रहना स्वीकार नहीं किया। मंगसिर कृष्णा १ सं. १३५२ मंगलवार को प्रात: शुभ बेला में नगर सेठ श्री घुरसामल जी ने मुकलावा देकर बाई नारायणी जी को कुंवर श्री तनधनदास जी के साथ झुंझनू के लिए विदा किया। साथ में बहुत धन तथा सामान आदि भी दिया।

श्री तनधन जी के रवाना होते समय अपशकुन होने लगे, सामने छिंक हुई। यह देखकर सबको बहुत ही फिकर व विचार हुआ। पर वीर तनधन जी ने श्री गणेश मनाकर अपनी पत्नी नारायणी देवी के साथ झुंझनू प्रस्थान किया।

मार्ग में दोपहर भोजनादि के बाद आगे चले। नवाब हिसार के राज्य कि सीमा को एक और बचाते हुए दोपहर बाद भिवानी नगर से ४-५ मील दूर ‘देवसर’ की पड़ी के पास पहुंचे ही थे कि पहाड़ी क्षेत्र के खडड खेलों से निकल निकलकर हिसार नवाब की फौजों ने इन पर भयंकर हमला कर दिया।

मार्ग झुंझनू निकट ‘देवसर’ । सेना हिसारी ने घेरा ॥
था सोर झाडियों खड्डों से । मारो पकडो करके घेरा ॥

(अग्नि समाधी से)

श्री तनधन जी के दल ने संख्या में उनसे कम होतें हुये भी वीरता से डटकर हिसारी फौजों से युद्ध किया। हिसारी फौजें श्री तनधन जी के दल की मार न सह सकने के कारण अस्त-व्यस्त होकर भाग चली।

तनधन ने जीवन की बाजी । खांडे से खुल खुल कर खेली ॥
तौबा तौबा अल्ला करते । दम तोड़ा जिसने भी झेली ॥

(अग्नि समाधी से)

नवाबी फौजों के भाग जाने पर सिपहसालार ने छुप कर पीछे से आकर धोखे से दुधारे से श्री तंधन जी पर वार किया ।

कलियुग के इस अभिमन्यु को । घेरा धोखे से वार किया ॥
गडजोड़ा बांधे ‘तंधन’ को । मार दुधारा ख़तम किया ॥

(अग्नि समाधी से)

लेकिन मरते मरते भी वीर तंधन ने सिपहसालार का सिर अपनी सिरोही (तलवार) से एक ही वार में काट दिया।

सती-स्थल

देवसर (भिवानी)

लड़ाई के समय हल्ला बहुत हुआ था। नवाबी फौजे तितर-बितर होने लगी थी। इससे पहाड़ी के नीचे क्षेत्र में वातावरण शान्त सा हो गया। पर्देदार रथ में बैंठी नवेली बहु नारायणी जी ने ये देखने के लिए जरा पर्दा हटाया कि क्या बात हुई। पर्दा हटाते ही जो कुछ देखा, वह सब देखकर सन्न रह गई। रथ के सामने उनके प्राणप्रिय तनधन जी का शव पड़ा हुआ था।

थोड़े समय बाद हे वीर तनधन जी की मृत्यु समाचार जानकर नवाबी फौजें वापस उसी और घेरा डालने आगे लगी। वीरांगना नारायणी जी ने सब देखा और तुंरत निर्णय कर क्रोध में भरकर अपने पति की तलवार हाथ में लेकर उनकी घोडी पर सवार हो गई और रणचणडी सी फौजों पर टूट पड़ी।

ले खडग, नयन अंगार भरे।
ललकारा कुछ को मार दिया॥
इस आधी हारी बाजी को।
माँ जितुंगी ये ठान लिया॥

(अग्नि समाधी से)

श्री नारायणी जी ने कुछ ही समय में अधिकांश नवाबी फौज को मार डाला।

या शेष बचा राणा सेवक । और घोडी उनके पास खड़ी ॥
चिता बनाओं जल्दी से । सती होने तैयार खड़ी ॥

श्री नारायणी जी ने कहा की कोई है । ये सुनते ही घोडी का राणा (सेवक) घायल अवस्था में गिरता पड़ता आया। पुछा क्या आज्ञा है। नारायणी ने कहा – मैं इसी पहाड़ी के नीचे सती होउंगी। जल्दी चिता बनाओं, संध्या होने वाली है।

राणाजी ने झुंझनू ले चलो – सेवक ने कहा। नारायणी ने कहा – मेरा झुंझनू तो सामने है, वहा जाकर क्या करुँगी। जल्दी चिता बना दो, सूर्य छिपने वाला है। ये सुनकर राणा ने आस पास से तुंरत लकड़िया चुनकर इकट्ठी कर चिता बनाई। सती की आज्ञा से राणा ने, तब वहाँ चिता बना दी थी ।

पति का शव गोदी में लेकर, बैठी वह सतवाली थी ॥
स्वय उठी अन्दर से ज्वाला, पति के लोक सिधारी थी ।
धूं धूं करके जली चिता, हो गई सती नारायणी थी ॥

(जीवन गाथा से)

श्री नारायणी जी पति का शव लेकर चिता पर बैठ गई। उसी क्षण सती तेज से अग्नि प्रगट हुई । चिता धायं धायं जलने लगी।

‘महम-झुंझनू’ बीच रहा एक शिखर ‘देवसर’ का भारी ।
उसके नीचे पति संग में, सती हुई दादी म्हारी ॥
‘हरियाणे’ की अमर लाड़ली ही तो ‘श्री रानी सती’ है ।
उलट पुलट कर गाथा,
गाँव गाँव में गूंजे है॥

चिता धायं धायं कर जलने लगी। इसी बीच मारकाट भागदौड़ देखकर आपास के गावों के नर नारियों के झुंड इकट्ठे हो गए। चिता पर नारियल, चावल, घी आदि सामान चड़ने लगे। जय जयकार होने लगी।

गावं गावं से जन-जन आया, पुष्पों की बौछार रहा।
मंगसिर क्रष्ण भोग नौमी को, सटी हुई ‘नारायणी’ थी ॥

थोड़े समय बाद आप चिता में से देवी रूप में प्रगत हुई और मधुर वाणी से बोली – हे राणाजी, मेरी चिता ३ दिन में ठंडी हो जाएगी। भास्मी इकट्ठी करके मेरी चुनरी में बाँध हमारी घोड़ी पर रख देना। तुम भी बैठ जाना। घोड़ी ख़ुद ही जहाँ ठहर जाए उसी स्थान पर मै अपने प्यारे पति के साथ निवास करती हुई जन-जन का भला व कल्याण करती रहूंगी|

ले त्रिशूल राणा ,जन-जन के समुख प्रगट हुई देवी ।
भस्मी को घोड़ी पर रख दो, राणा से बोली देवी ॥

(जीवन गाथा से)

तीन दिन बाद चिता ठंडी होने पर राणा ने सती नारायणी के आदेशानुसार भस्मी इकट्ठी करके उनकी चुनड़ी में बाँध कर घोड़ी पर रख दी और ख़ुद भी बैठ गये। घोड़ी उत्तर दिशा की और झुंझनू के माढ पर चल पड़ी। घोड़ी चलती चलती झुंझनू के बीड़ (गोचर भूमि) को पार करके झुंझनू नगर के उत्तर दिशा में आकर रुक गई। राणा ने अनेक प्रयत्न किये। पर घोड़ी वहीं डट गई।

सती भस्मी

झुंझनू आगमन

राणा ने घोड़ी को वहीं एक जाटी वृक्ष से बांधकर दीवानजी श्रीजालानदास जी के घर जाकर मार्ग के सब समाचार सुनाये। सुनते ही सेठजी का परिवार रो पड़ा, घर में कोहराम मच गया। बहुत समझाने पर सब घोड़ी के पास श्मशान में आये वहां चोतरा बनाकर भस्मी को स्थापित कर पूजन किया गया।

पूजन किया भस्मी का सबने, पावन मरघट में आकर ।
फिर सम्मान किया देवी का, सुंदर सा ‘मंढ’ बनाकर ॥

(जीवन गाथा से)

कुछ लोगों में सती होने पर शंका हुई। उसी समय चेंतरे पर चढे हुए पूजा के सामान से आग की चिनागारिया निकलने लगी। चेंतरे ने चिता का रूप ले लिये । ये देखकर जन-जन जयकार करता हुआ श्मसान की और उमड़ पड़ा। चौतरें पर १३ दिन १३ रात अग्नि चिता सी जलती रही। अंत में बहुत प्रार्थना करने तथा क्षमा मांगने पर जलते हुये चौतरें पर से मधुर वाणी सुनाई दी की ‘चौतरें’ पर जल चढ़ाओँ।

सती चिता ठंडी करने को, जन-जन जल लाया था।
उसी समय से सती देहरी पर, जन-जन जल है चढ़ा रहा ॥

(आज भी समस्त मंदिरों की देहरी पर प्रथम जल चढ़ता है। पूजा सामग्री हो या न हो केवल जल चढ़ाने से हे श्री रानी सती जी प्रसन्न हो जाती है।)

ये सुनते ही जन समूह पात्रों में जल ले लेकर चढ़ाने लगा और चिता शांत हो जाने पर पूजा-दान शुरू हो गया।ये प्रत्यक्ष चमत्कार देखकर जनता जय जय करने लगी।

दूसरा चमत्कार

भस्मी का भूतल प्रवेश

जब पूजा जात-धोक सती की चालू थी। उसी समय जन-जन के सामने तभी हुआ विस्फोट यकायक।

विस्मय एक हुआ भारी ॥
धरती फटी, समाई भस्मी ।
घोड़ी और सम्पत साड़ी ॥

(अग्नि समाधी से)

अर्थात उस समय चौतरें पर यकायक विस्फोट (धमाका) हुआ। जन साधारण ने आश्चर्य से देखा कि चौतरें वाली भूमि फट गई और भस्मी, घोडी और जो-जो सामान को राणा साथ लाये थे, सब के सब उसी भूमि में समा गये। उसी समय तीसरा चमत्कार हुआ कि सब सामान के भूमि में समा जाने के बाद चौतरा फिर जैसा था, वैसा हो गया।

अनुमानत: आज जो विशाल मन्दिर (मंढ) बना हुआ है, ये उसी चौतरे पर चौथा मन्दिर है ।

स्वर्गारोहण

देवसर पड़ी के निचे मंगसिर क्रष्ण ९ सं. १३५२ मंगलवार को जब माँ नारायणी जी सती हो गई तो उसी समय दशों दिगपालों व् अन्य देवलोकों में जयकार होने लगी और कहने लगे कलियुग में सतियाँ आज भी है।

१३ सतियों के मंढ

श्री रानीसती जी माँ नारायणी सं. १३५२वि. में ‘देवसर‘ में सती हुई थी। इनके ही परिवार में सं १७६२वि. तक १२ सतियाँ और हुई। इन १२ सतियों के छोटे छोटे सुंदर कलात्मक मंढ शवेत संगमरमर के एक पंक्ति में बने हुए थे। जिनकी मान्यता व् पूजा बराबर होती आ रही है ।

श्री जालानदास जी के पुत्र कि पुत्रवधू सं. १३५२ में सती हुई। इसी कुल कि १२ सतियाँ झुंझनू में और हुई। (१) माँ नारायणी (२) जीवणी सती (३) पूर्णा सती (४) पिरागी सती (५) जमना सती (६) टीली सती (७) बानी सती (८) मैनावती सती (९) मनोहरी सती (१०) महादेई सती (११) उर्मिला सती (१२) गुजरी सती (१३) सीता सती


साभार : BY SAKSHI LIHLA
















Friday, October 30, 2015

HISTORY OF KAMLAPURI VAISHYA - कमलापुरी वैश्य का इतिहास

HISTORY OF KAMLAPURI VAISHYA - कमलापुरी वैश्य का इतिहास

भारतीय वैश्यों का उपवर्ग "कम्लापुरी वैश्य " उस प्राचीन वर्ग की सन्तान हे जो कश्मीर स्थित कमलापुर स्थान के मूल निवाशी थे | कमलापुर कश्मीर में 8वीं शताब्दी काल में एक समृद्द नगर था , जिसका वर्णन 12वीं शताब्दी में चित्रित कश्मीर के महाकवि कल्हण के प्रख्यात संस्कृत इतिहास ग्रन्थ राज तरंगिनी में अंकित हे | कम्लापूरी के मूल निवासी होने के कारण यह वैश्य उपवर्ग कम्लापुरी के नाम से जाना जाता हे | 


इतिहासकारो का मत हे की कमलापुर का प्रद्रर्भाव एवं विकाश कारकोट वंशी कश्मीर राजाओं के काल में हुआ | वैश्यवंशीय राजा जयापिड़ की महारानी कमलादेवी ने इस विशाल नगर का निर्माण अपने नाम पर 8वीं शताब्दी के उत्त्तराद्र में ( सन 751 लगभग ) किया था | एतिहासिक अध्ययन से यह भी पता चलता हे की राजा जयापिड़ के पितामह महाराजा ललितादित्य मुक्तिपिड़ की पट्टमहिषी कमलावती ने 50-60 वर्ष कमलाहट्ट का निर्माण किया था | सम्भवतः उसी स्थान का विकास एवं सुधार करते हुए कमलावती ने कमलापुर की स्थापना की हो | 

उपर्युक्त काल में ही प्रख्यात चीनी यात्री ह्युएनसान्ग भारत भ्रमण को आया था , जिसने तत्कालीन सामाजिक स्थिति एवं समृधि का उल्लेख अपने लेखों में किया था | जिस समय शेष भारत में गुप्तवंशीय राजाओं के शासनकाल में उत्कर्ष का स्वर्णयुग था , जिसकी चरम वृद्धि महाराज हर्षवर्धन द्वारा संपन्न हुई , उसी समय कश्मीर में वैश्य वंशीय कारकोट राजवंश का स्वर्णयुग चल रहा था | 

कश्मीर से उत्तर पश्चिम काबुल नदी की उपत्यका को पूर्व में गीढ़ देश को तथा समस्त दक्षिणात्य प्रदेशों को इन राजाओं के प्रशासन ने निरापद एवं निद्रदंद बना दिया था | कश्मीरी वैश्य समुदाय श्रेनिबद्र हो कश्मीर से वाराणसी , पाटलिपुत्र , कन्नोज , गौड़ अंग अवन्नित आदि छेत्रों को व्यापार के लिए आते जाते थे | कमलापुर नगर के तत्कालित ख्याति के कारण वे अपने वैश्यत्व में कमलापुर का विशेषण कम्लापुरी जोड़कर अपने को उस स्थान विशेष के वणिक होने का परिचय देते रहे | 

वर्तमान समय में कमलापुर का नाम विकृत होकर कमाल्पोर हो गया हे , जो कश्मीर में सिपीयन - श्रीनगर मार्ग पर अवस्थित हे | इस तथ्य का प्रतिवेदन राज- तरंगिनी के प्राचीन भाष्यकार भट्टहरक ने भी किया हे |

साभार: http://kamlapuri.org/history.php

V.SHANTARAM - व़ी शांताराम एक महान कलाकार - वैश्य गौरव

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Wednesday, October 21, 2015

Anshu Gupta - अंशु गुप्ता - वैश्य गौरव


Anshu Gupta is an Indian social entrepreneur who founded Goonj, a Delhi-based non-governmental organisation  (NGO) that positions the under-utilised urban material as a development resource for the rural parts of India.

Born in Meerut, (Uttar Pradesh), Gupta spent his initial years in Chakrauta, Banbasa and Bariely, smaller towns of Uttar Pradesh as his father got postings in his job with Indian Army’s Military Engineering Services (MES). After finishing his college from Dehradun, Gupta came to Delhi to do a double PG diploma in Journalism and Advertising and Public Relations from the Indian Institute of Mass Communication. He has also done an MA in Economics.

After working in the corporate sector for some time, he started Goonj in 1999, with his wife Meenakshi Gupta and a few friends, to work on the basic need of clothing, an issue that does not have a place in the development agenda. Using cloth as a metaphor for other crucial but ignored needs like sanitary pads for menses or school material for education, for the last 16 years, under Gupta’s leadership Goonj has taken the growing urban waste and used it as a tool to trigger development work on diverse issues; roads, water, environment, education, health etc. in backward and remote pockets of India. Under Goonj’s flagship intiative ‘Cloth for Work’ village communities across India work on their own issues and get the urban material as a reward for their efforts. Cloth for work and all other initiatives of Goonj have received various, national and international, awards and accolades. 

He won the Ramon Magsaysay Award in 2015, for "his creative vision in transforming the culture of giving in India, his enterprising leadership in treating cloth as a sustainable development resource for the poor, and in reminding the world that true giving always respects and preserves human dignity."  Also, Gupta is an Ashoka fellow and was conferred with ‘Social Entrepreneur of the Year Award' by Schwab Foundation for Social Entrepreneurship in 2012, amongst many others.

साभार: विकिपीडिया 

SAMUDRA GUPTA - समुद्र गुप्त (वैश्य गौरव - गुप्त वंश का शेर)

भारत के महानतम चक्रवर्ती सम्राट "समुद्रगुप्त" की सम्पूर्ण जानकारी






गुप्त साम्राज्य को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है और इसके लिये सम्राट समुद्रगुप्त के साम्राज्य और उनके कार्यों का महत्वपूर्न योगदान है। गुप्त-वंश एवं गुप्त-साम्राज्य का सूत्रपात सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम ने किया है, तथापि उस वंश का सबसे यशस्वी सम्राट समुद्रगुप्त (335-380 ) को ही माना जाता है। इसके एक नहीं, अनेक कारण हैं। एक तो समुद्रगुप्त बहुत वीर था, दूसरे महान् कलाविद्! और इन गुणों से भी ऊपर राष्ट्रीयता का गुण सर्वोपरि था। असाधारण विजय, अद्भुत रणकौशल, प्रशासनिक एवं कूटनीतिक दक्षता, व्यवहार कुशलता, आखेट प्रियता, प्रजा-प्रेम, न्याय प्रियता समुद्रगुप्त का उद्देश्य उसके राज्य के अतिरिक्त भारत में फैले हुए अनेक छोटे-मोटे राज्यों को एक सूत्र में बाँधकर एक छत्र कर देना था, जिससे भारत एक अजेय शक्ति बन जाये और आये-दिन खड़े आक्राँताओं का भय सदा के लिए दूर हो जाये।

समुद्रगुप्त अच्छी तरह जानता था कि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त देश कभी भी एक शक्तिशाली राष्ट्र नहीं बन पाता है और इसीलिए देश सदैव विदेशी आक्राँताओं का शिकार बना रहता है। जिस देश की सम्पूर्ण भूमि एक ही छत्र, एक ही सम्राट अथवा एक ही शासन-विधान के अंतर्गत रहती है, वह न केवल आक्राँताओं से सुरक्षित रहती है, अपितु हर प्रकार से फलती-फूलती भी है। उसमें कृषि, उद्योग तथा कला-कौशल का विकास भी होता है। उसकी आर्थिक उन्नति और सामाजिक सुविधा न केवल दृढ़ ही होती है, बल्कि बढ़ती भी है।

सम्राट समुद्रगुप्त देश-भक्त सम्राट था। वह केवल वैभवपूर्ण राज्य सिंहासन पर बैठ कर ही संतुष्ट नहीं था, वह उन लोलुप एवं विलासी शासकों में से नहीं था, जो अपने एशो-आराम की तुलना में राष्ट्र-रक्षा, जन-सेवा और सामाजिक विकास को गौण समझते हैं। मदिरा पीने और रंग-भवन में पड़े रहने वाले राजाओं की गणना में समुद्रगुप्त का नाम नहीं लिखा जा सकता है। वह एक कर्मठ, कर्तव्य-निष्ठ तथा वीर सम्राट था।

एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने की समुद्रगुप्त की विजय यात्रा इस प्रकार शुरू होती हैं

सबसे पहले उसने दक्षिणापथ की ओर प्रस्थान किया और महानदी की तलहटी में बसे दक्षिण-कौशल महाकान्तार, पिष्टपुर, कोहूर, काँची, अवमुक्त , देव-राष्ट्र तथा कुस्थलपुर के राजा महेन्द्र, व्याघ्रराज महेन्द्र, स्वामिदत्त, विष्णुगोप, कोलराज, कुबेर तथा धनञ्जय को राष्ट्रीय-संघ में सम्मिलित किया। उत्तरापथ की ओर उसने गणपति-नाग, रुद्रदेव, नागदत्त, अच्युत-नन्दिन, चन्द्रबर्मन, नागसेन, बलवर्मन आदि आर्यवर्त के समस्त छोटे-बड़े राजाओं को एक सूत्र में बाँधा। इसी प्रकार उसने मध्य-भारत के जंगली शासकों तथा पूर्व-पश्चिम के समतट, कामरुप, कर्तृपुर, नैपाल, मालव, अर्जुनायन, त्रौधेय, माद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक, काक और खर्पपरिक आदि राज्यों को एकीभूत किया।

इस दिग्विजय में समुद्रगुप्त ने केवल उन्हीं राजाओं का राज्य गुप्त-साम्राज्य में मिला लिया, जिन्होंने बहुत कुछ समझाने पर भी समुद्रगुप्त के राष्ट्रीय उद्देश्य के प्रति विरोध प्रदर्शित किया था। अन्यथा उसने अधिकतर राजाओं को रणभूमि तथा न्याय-व्यवस्था के आधार पर ही एक छत्र किया था। अपने विजयाभिमान में सम्राट समुद्रगुप्त ने न तो किसी राजा का अपमान किया और न उसकी प्रजा को संत्रस्त। क्योंकि वह जानता था कि शक्ति बल पर किया हुआ संगठन क्षणिक एवं अस्थिर होता है। शक्ति तथा दण्ड के भय से लोग संगठन में शामिल तो हो जाते हैं किन्तु सच्ची सहानुभूति न होने से उनका हृदय विद्रोह से भरा ही रहता है और समय पाकर फिर वे विघटन के रूप में प्रस्फुटित होकर शुभ कार्य में भी अमंगल उत्पन्न कर देता है।

किसी संगठन, विचार अथवा उद्देश्य की स्थापना के लिये शक्ति का सहारा लेना स्वयं उद्देश्य की जड़ में विष बोना है। प्रेम, सौहार्द, सौजन्य तथा सहस्तित्व के आधार पर बनाया हुआ संगठन युग-युग तक न केवल अमर ही रहता है बल्कि वह दिनों-दिन बड़े ही उपयोगी तथा मंगलमय फल उत्पन्न करता है।

राष्ट्र को एक करने के लिये परम्परा के अनुसार समुद्रगुप्त ने सेना के साथ ही प्रस्थान किया था, किन्तु उसको शायद ही कहीं उसका प्रयोग करना पड़ा हो। नहीं तो अधिकतर राजा लोग उसके महान राष्ट्रीय उद्देश्य से प्रभावित होकर की एक छत्र हो गये थे। कहना न होगा कि जहाँ समुद्रगुप्त ने इस राष्ट्रीय एकता के लिये अथक परिश्रम किया वहाँ उन राजाओं को भी कम श्रेय नहीं दिया जा सकता जिन्होंने निरर्थक राजदर्प का त्याग कर संघबद्ध होने के लिये बुद्धिमानी का परिचय दिया। जिस देश के अमीर-गरीब, छोटे-बड़े तथा उच्च निम्न सब वर्गों के निवासी एक ही उद्देश्य के लिये बिना किसी अन्यथा भाव के प्रसन्नतापूर्वक एक ध्वज के नीचे आ जाते हैं वह राष्ट्र संसार में अपना मस्तक ऊँचा करके खड़ा रहता है। इसके विपरीत राष्ट्रों के पतन होने में कोई विलम्ब नहीं लगता।

सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने प्रयास बल पर सैकड़ों भागों में विभक्त भरत भूमि को एक करके वैदिक रीति से अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया जो कि बिना किसी विघ्न के सम्पूर्ण हुआ, और वह भारत के चक्रवर्ती सम्राट के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। उस समय भारतीय साम्राज्य का विस्तार ब्रह्मपुत्र से चम्बल और हिमालय से नर्मदा तक था।

भारत की इस राष्ट्रीय एकता का फल यह हुआ कि लंका के राजा मेघवर्मन, उत्तर-पश्चिम के दूरवर्ती शक राजाओं, गाँधार के शाहिकुशन तथा काबुल के आक्सस नदी तक राज्य करने वाले शाहाँशु आदि शासकों ने स्वयं ही अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार कर ली।

इस प्रकार सीमाओं सहित भारत की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर समुद्रगुप्त ने प्रजा रंजन की ओर ध्यान दिया। यह समुद्रगुप्त के संयमपूर्ण चरित्र का ही बल था कि इतने विशाल साम्राज्य का एक छत्र स्वामी होने पर भी उसका ध्यान भोग-विलास की ओर जाने के बजाय प्रजा जन की ओर गया। सत्ता का नशा संसार की सौ मदिराओं से भी अधिक होता है। उसकी बेहोशी सँभालने में एक मात्र आध्यात्मिक दृष्टिकोण ही समर्थ हो सकता है। अन्यथा भौतिक भोग का दृष्टिकोण रखने वाले असंख्यों सत्ताधारी संसार में पानी के बुलबुलों की तरह उठते और मिटते रहे हैं, और इसी प्रकार बनते और मिटते रहेंगे।

चरित्र एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अभाव में ही कोई भी सत्ताधारी फिर चाहे वह राजनीतिक क्षेत्र का हो अथवा धार्मिक क्षेत्र का मदाँध होकर पशु की कोटि से भी उतरकर पिशाचता की कोटि में उतर जाते है।

सम्राट समुद्रगुप्त ने अश्वमेध के समन्वय के बाद जहाँ ब्राह्मणों को स्वर्ण मुद्रायें दक्षिणा में दीं वहाँ प्रजा को भी पुरस्कारों से वंचित न रक्खा। उसने यज्ञ की सफलता की प्रसन्नता एवं स्मृति में अनेकों शासन सुधार किये, असंख्यों वृक्ष लगवाये, कुएँ खुदवाये और शिक्षण संस्थाएँ स्थापित कीं।

एकता एवं संगठन के फलस्वरूप भारत में धन-धान्य की वृद्धि हुई। प्रजा फलने और फूलने लगी। बुद्धिमान समुद्रगुप्त को इससे प्रसन्नता के साथ-साथ चिन्ता भी हुई। उसकी चिन्ता का एक विशेष कारण यह था कि धन-धान्य की बहुतायत के कारण प्रजा आलसी तथा विलासप्रिय हो सकती है। जिससे राष्ट्र में पुनः विघटन तथा निर्बलता आ सकती है। राष्ट्र को आलस्य तथा उसके परिणामस्वरूप जड़ता की सम्भावना के अभिशाप से बचाने के लिये सम्राट ने स्वयं अपने जीवन में संगीत, कला, कौशल तथा काव्य साहित्य की अवतारणा की। क्योंकि वह जानता था कि यदि वह स्वयं इन कलाओं तथा विशेषताओं को अपने जीवन में उतारेगा तो स्वभावतः प्रजा उसका अनुकरण करेगी ही। इसके विपरीत यदि वह विलास की ओर अभिमुख होता है तो प्रजा बिना किसी अवरोध के आलसी तथा विलासिनी बन जायेगी।

सारे भारतवर्ष में अबाध शासन स्थापित कर लेने के पश्चात्‌ इसने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों दीनों, अनाथों को अपार दान दिया। शिलालेखों में इसे 'चिरोत्सन्न अश्वमेधाहर्त्ता' और 'अनेकाश्वमेधयाजी' कहा गया है। हरिषेण ने इसका चरित्रवर्णन करते हुए लिखा है-

'उसका मन सत्संगसुख का व्यसनी था। उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था। वह वैदिक धर्म का अनुगामी था। उसके काव्य से कवियों के बुद्धिवैभव का विकास होता था। ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है जो उसमें न रहा हो। सैकड़ों देशों पर विजय प्राप्त करने की उसकी क्षमता अपूर्व थी। स्वभुजबल ही उसका सर्वोत्तम सखा था। परशु, बाण, शकु, आदि अस्त्रों के घाव उसके शरीर की शोभा बढ़ाते थे। उसकी नीति थी "साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो"। उसका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र से पिघल जाता था। उसने लाखों गायों का दान किया था। अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग 'कविराज' कहकर उसका सम्मान करते थे।'

समुद्रगुप्त के 6 प्रकार के सिक्के इस समय में मिलते हैं।

पहले प्रकार के सिक्कों में उसका जो चित्र है, उसमें वह युद्ध की पोशाक पहने हुए है। उसके बाएँ हाथ में धनुष है, और दाएँ हाथ में बाण। सिक्के के दूसरी तरफ़ लिखा है, "समरशतवितत-विजयी जितारि अपराजितों दिवं जयति" सैकड़ों युद्धों के द्वारा विजय का प्रसार कर, सब शत्रुओं को परास्त कर, अब स्वर्ग को विजय करता है।

दूसरे प्रकार के सिक्कों में उसका जो चित्र है, उसमें वह परशु लिए खड़ा है। इन सिक्कों पर लिखा है, "कृतान्त (यम) का परशु लिए हुए अपराजित विजयी की जय हों।

तीसरे प्रकार के सिक्कों में उसका जो चित्र है, उसमें उसके सिर पर उष्णीष है, और वह एक सिंह के साथ युद्ध कर उसे बाण से मारता हुआ दिखाया गया है। ये तीन प्रकार के सिक्के समुद्रगुप्त के वीर रूप को चित्रित करते हैं।

पर इनके अतिरिक्त उसके बहुत से सिक्के ऐसे भी हैं, जिनमें वह आसन पर आराम से बैठकर वीणा बजाता हुआ प्रदर्शित किया गया है। इन सिक्कों पर समुद्रगुप्त का केवल नाम ही है, उसके सम्बन्ध में कोई उक्ति नहीं लिखी गई है। इसमें सन्देह नहीं कि जहाँ समुद्रगुप्त वीर योद्धा था, वहाँ वह संगीत और कविता का भी प्रेमी था।

समुद्रगुप्त के जिस प्रकार के सिक्के आजकल मिलते हैं अगर उतने ही वजन के सोने के सिक्के आज बनाये जाए तो एक सिक्के कीमत पांच लाख रु से ज्यादा होगी सोचो उस समय समुद्रगुप्त ने ऐसे लाखो सिक्के चलवाए थे कितना धनी था हमारा भारतवर्ष

अक्सर इतिहास में हमको पढ़ाया जाता हैं समुद्रगुप्त भारत का नेपोलियन था हकीकत में देखा जाए समुद्रगुप्त कभी नेपोलियन नहीं हो सकता और नेपोलियन कभी समुद्रगुप्त बन ही नहीं सकता हैं समुद्रगुप्त ने कभी मात नहीं खाई जबकि नेपोलियन ने ब्रिटिश कमांडर नेल्सन से और रूस से मात खाई थी नेपोलियन तो साम्राज्यवादी था जबकि समुद्रगुप्त राष्ट्रवादी था उसने तो भारत को एक बनाया जो उसके भारतवर्ष के सपने में शामिल होते गए वे राज्य अधीन होते हुए भी स्वतंत्र थे

केवल एक संयमी सम्राट के हो जाने से भारत का वह काल इतिहास में स्वर्णयुग के नाम से प्रसिद्ध है, तो भला जिस दिन भारत का जन-जन संयमी तथा चरित्रवान बन सकेगा उस दिन यह भारत, यह विशाल भारत उन्नति के किस उच्च शिखर पर नहीं पहुँच जायेगा?

फिर अंत में फिर से एक बात इतिहास में गौरी गजनी अकबर बाबर औरंगज़ेब लोदी को चार पन्नें और महानतम सम्राट समुद्रगुप्त चार लाइन क्यों ?

ROUNIYAR VAISHYA HISTORY - रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा

हम रौनियार वैश्य और हमारा वैश्य वंश-

हमारी रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा के प्रथम पुरुष सम्राट चन्द्रगुप्त बिक्रमादित्य हैं,जो गुप्त बंश के सस्थापक थे । इनकी शादी नेपाल की राज कुमारी" कुमारदेवी" से हुआ था ,नेपाल हमारे बंश का ननिहाल है । हमारी राजधानी पटलिपुत्रा थी जो आज पटना कहलाता है । हमारे ही समय में स्वेत हूँण का आक्रमण हुआ था जिसका लोहा हमारे पूर्वज सम्राट स्कन्द गुप्त ने लिया था । हम ही सम्राट हेमचन्द्र बिक्रमादित्य के बंशज है जिसे हेमू के नाम से पुकारते है जो दिल्ली से भारत देश चलाता था ।मध्यकाल में हमें अपमानित करने के लिए "रनहार" (रण +हार) कहा गया जो आधुनिक काल तक आते -आते अपभ्रंश" रौनियार "प्रचलित हो गया ।प्राचीन काल मे भी मुझे करास्कर (कड़कश आबाज मे बात करने वाला ,कड़ी संघर्ष ,कड़ी मेहनत करनेवाला )कहा गया । हमसे अत्याचार बर्दास्त नहीं होता ,अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाना डीएनए में है। 

ऋग्वेद का दसवां मण्डल के पुरुष सूक्त मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य की उत्पाती की गई। वैश्य शब्द वैदिक विश् से निकला है। अर्थ की दृष्टि से वैश्य शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूल अर्थ बसना होता है। वैदिक काल में प्रजा मात्र को विश् कहते थे। पर बाद में जब वर्ण व्यवस्था हुई, तब वाणिज्य व्यवसाय और गौ पालन आदि करने वाले लोग वैश्य कहलाने लगे। इनका धर्म यजन, अध्ययन और पशुपालन तथा वृति कृषि और वाणिज्य था। आजकल अधिकांश वैश्य प्रायः वाणिज्य, व्यवसाय करके ही जीविका निर्वाह करते हैं। वैश्य वर्ण (वर्ण शब्द का अर्थ है-जिसको वरण किया जाए वो समुदाय ) रौनियार वैश्य का इतिहास जानने के पहले हमे वैश्य के विषय मे जानना होगा । हमे यह जानना होगा की वैश्य शब्द कहां से आया है? वैश्य शब्द विश से आया है, विश का अर्थ है प्रजा, प्राचीन काल मे प्रजा (समाज) को विश नाम से पुकारा जाता था। विश के प्रधान संरक्षक को विशपति (राजा) कहते थे, जो निर्वाचन से चुना जता था। वैश्य समाज व्यापार से समाज में रोजगार के अवसर प्रदान कराता है। सामाजिक कार्य मे दान से समाज कि आवश्यकता की पूर्ति करता है। जिससे उसे समाज में शुरू से ही विशिष्ट स्थान प्राप्त है। 

ऋग्वेद का दसवां मण्डल के पुरुष सूक्त मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य की उत्पाती की गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र- कौटिल्य का निर्देश है की गंधी , कारस्कर,माली ,धान्य के व्यापारी और प्रधान शिल्पी, क्षत्रियों के साथ राजमहल से पूर्वी भागो में निवास करें ,पक्वान्न ,मदिरा और मांस के बिक्रयी वैश्य राजप्रासाद से दक्षिण के भागों में रहे ,ऊनी और सूती बस्त्रों के शिल्पी तथा जौहरी ब्रहमानों के संग उत्तर दिशा में रहें । 

सिन्धु- घटी की सभ्यता का निर्माण तथा प्रसार दूर के देशों तक वैश्यों ने किया या उनकी वजह से हुआ है। सिन्धु- घाटी की सभ्यता मे जो विशालकाय बन्दरगाह थे वे उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका, यूरोप के अलग-अलग भाग तथा एशिया (जम्बोदीप) आदि से जहाज दवरा व्यापार तथा आगमन का केन्द्र थे।मध्यकाल मे नमक के व्यापारी अफ्रीका भी जाते थे ,नाइजेरिय के टिंबकटु स्थान के गाफ़र जाती के पाण्डुलिपि से पता चलता है की भारतिए व्यापारी नमक के बदले सोना ले जाते थे ,यहाँ बसे गफार जाती का मूल बंश ब्रिक्ष भारतिय व्यापारियो का बताया जाता है । 

हजारो वर्षो से खेती ,पशुपालन ,बाणिज्य ,कारीगरी ,उद्धोग-धंधा तथा अन्य प्रकार के स्वरोजगार व्यापार श्रेणी के मेहनतकश और कड़ी मेहनत से जीविका उपार्जन करने बालो की अपमान जनक स्थिति से गुजरना पड़ा है। ये सभी व्यापारी की श्रेणी में आते है यानि कमेरा(काम काजी लोग ) वर्ग जिसे वैश्य कहते हैं । इसी श्रेणी की एक वैश्य की जाती “कारस्कर “था । जिसका गोत्र कश्यप था । इस समुदाय के लोग फेरि लगाकर नमक व अन्य बस्तुए बेचते थे ,जो नमक बनाकर एवं उत्खनन करके उससे खड़िया नमक ,साधारण नमक एवं सेंधा नमक आदि गाँव –शहर ,देश –विदेश मे बेचते थे । अन्नय आदि बस्तु के बदले बिक्रय करते थे ,इस तरह मुख्य व्यावसाय नमक उत्पादन से लेकर वितरण था । कड़ी मेहनत ,संघर्सशील और बस्तुएँ बेचने के क्रम मे चिल्लाने के कारण प्राचीन काल मे इस जाती को “कारस्कर ”( कड़ी मेहनत,संघर्षशिलता, जुझारूपन और कर्कस आवाज में बोलने बाला )बताया और नीची जाती कहाँ ,एवं अपमानित किया जाता था। कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार [सभी वैश्य जाती ]का सम्बोधन हो गया बताया है । (अर्थशास्त्र पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ फीक पृष्ट 303-4) वह आज भी रौनियार प्रचलित है । मेहनती कामों में लगे हुये लोगों को शुरू से लांछित और अपमानित किया जाता रहा है ,जबकि देश के आर्थिक स्थिति मजबूत करने में रौनियार समुदाय की अहम भूमिका थी । सदियों से देशहित ,समाजहित एवं धार्मिकहित में इस समुदाय के लोगों ने अग्रिणी भूमिका निभाते आया है । 

विक्रमादित्य सम्राट चन्द्रगुप्त को कौन नहीं जानता है । अगर भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ कहा गया था तो वह काल चन्द्रगुप्तबंश का था।किन्तु उस समय भी इस समुदाय के लोगों को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा था । “कौमुदी महोत्सव नामक प्राचीन नाटक “में चन्द्रगुप्त को “कारस्कर” बताकर ऐसे नीच जाती के पुरुष को राजा होने के अयोग्य बताया है । जबकि वकाटक महारानी प्रभावती गुप्ता के अभिलेख (महरौली और प्रयाग लौह स्तम्भ लेख )में गुप्तों की वंशावली दी गई है । गुप्त अभिलेखों में जो वंश वृक्षों में सर्वप्रथम नाम ‘श्री गुप्त ‘ का आता है ।“ श्री “शब्द सम्मानार्थ है “गुप्त ”का शाब्दिक अर्थ संरक्षित है । “श्री गुप्त ” का अर्थ लक्ष्मी व्दरा रक्षित (लक्ष्मी पुत्र ) है । चन्द्रगुप्त ,समुद्रगुप्त ,कुमारगुप्त तथा कार्तिकय व्दरा रक्षित हुआ । जो किसी प्रतापी राजा के लिए अत्यंत उपयुक्त है । चीनी यात्री इत्सिंग ने भी यात्रा वृतांत में “चे –लि –कि –तो”(लक्ष्मी पुत्र) बताया है । स्वयं समुद्रगुप्त कि प्रयाग प्रशस्ति –महाराजा श्री गुप्त प्रपौत्रस्य महाराजा घटोत्कच पौत्रस्य महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त पुत्रस्य .....श्री समुद्रगुप्तस्य ......क्रमशः ! (1)कुमार गुप्त प्रथम ,स्कन्ध गुप्त ,पुरू गुप्त ,नरसिंह गुप्त बालादित्य ,कुमार गुप्त व्दितिये ,बुध्द गुप्त ,तथागत गुप्त ,बज्रगुप्त ,भानु गुप्त वैन्य गुप्त व्दादशादित्य गुप्त ........परमभट्टारिकायां राजां महादेव्यां श्री श्रीमती देवयामुतपन्ना । 

मेहरौली एवं प्रयाग प्रशस्ति से स्पष्ट है कि चन्द्रगुप्त के विरासत लक्ष्मी पुत्र “चे –लि –कि –तो” है । जो सम्मानजनक नमक के व्यापार में लगी जाती का वंशज है । चन्द्रगुप्त की एक स्वर्णमुद्रा है जिस पर एक ओर लिच्छवियः तथा दूसरी ओर चन्द्रगुप्त तथा कुमार देवी उत्कीर्ण है एवं दोनों का चित्र उस पर अंकित है । लिच्छवियों के वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त के साथ था ,इस कारण इस समुदाय के वंशज को क्षत्रिय भी माना जाने लगा था ,और उत्तर का भू-भाग तथा पश्चिम बंगाल के भू-भाग गुप्तो के अधिकार मे था एवं उत्तर बिहार (वैशाली तक )जो लिच्छवियों की राजकुमारी कुमार देवी के अधिकार मे था । दोनों वंशों का एकीकरण हो गया तथा चन्द्रगुप्त प्रथम ने प्रराक्रम से अन्य राज्यों को जीत कर पाटलीपपुत्र मे फिर से एक साम्राज्य की नींव डाली एवं शुभ अवसर पर महाराजाधिराज की पदवि धारण किया । .........वायुपुराण में ’भोक्षन्ते गुप्त –वंशजाः’ एवं अपने राज्याभिषेक की तिथि को नए संवत ‘गुप्त संवत ‘का घोषणा किए जो तिथि 20 दिसंबर 318 ई॰ अथवा 26 फरवरी 320 ई॰ निश्चित होती है । लगभग 319-320 ई॰ से गुप्त संवत का श्रीगणेश होता है । इस समय तक आते-आते भारत का नक्शा चतुर्भुज की तरह हो गया था तथा भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ नाम से संबोधित किया जाने लगा था । सम्राट स्कन्ध गुप्त के समय भारत पर कई वार श्वेत हूणों का भयानक आक्रमण हुआ था ,जिसमे गुप्त वंश विजय प्रप्त किया था। इन आक्रमणों ने स्कन्ध गुप्त की शक्ति को झकझोर दिया तथा काफी धन-जन की हानी उठाना पड़ा था। (बिष्णु स्तम्भ-कंधार –हुणेयस्य समागतस्य समरे दोभर्या धरा कंम्पित भीमावर्तकस्य )सम्राट बुद्ध गुप्त तक अपने साम्राज्य की सुरक्षा में लगा रहा ,किन्तु बार-बार हूण आक्रमण जारी रहा । एरण अभिलेख बुद्ध गुप्त ने 484-85ई॰ में प्रसारित किया था। इनके मृत्यु के बाद हूणों ने कब्जा कर लिया । बुद्ध गुप्त के पश्चात उत्तराधिकारी तथागत गुप्त ,नरसिंह गुप्ता ,वैन्य गुप्त तक आते-आते अपने साम्राज्य को एक नहीं रख पायेँ । प्रायः सभी लड़ाई हारते चले गए । छोटे-छोटे राज्यों में देश का विघटन हो गया । छोटे-बड़े सामंतों ने भी कब्जा कर लिया । इस तरह से लंबे समय से गुप्त वंशों का विघटन होते चला गया । सभी लड़ाईयाँ हारते-हारते गुप्त सम्राट के वंशज को मध्यकाल आते आते रणहार (रण +हार)कहा जाने लगा । जो प्राचीन काल मे कारस्कर वंशबृक्ष का था । कारस्कर जाती नमक के व्यापारी थे,अब मध्यकाल मे इनका सम्बोधन रणहार जो काफी प्रचलित हो गया । उस समय अपमान सूचक था । मध्यकाल में सम्राट हेमचन्द्र हेमू जो 1556 में दिल्ली के साशक थे उन्हे भी हारना पड़ा था ,हेमू के बाद के समय तक आते-आते रणहार (रण +हार) शब्द का मध्य –आधुनिक काल में अपभ्रंस रौनियार ,रोनियार ,नूनियार ,नूनिया ,लानियार (सभी वैश्य वर्ग ) गुप्त वंशजों को कहा जाने लगा , जो आज उस गुप्त वंश के समुदाया का जाती सूचक हो गया है। वर्त्तमान में इस जाती का नाम हीं रौनियार हो गया है ।.( कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार लानियार जाती का सम्बोधन हो गया बताया है । (अर्थशास्त्र पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ फीक पृष्ट 303-4)).

हम अपने विरासत के इतिहास की छान-बिन करने पर पाते है की शुरू में कारस्कर जाती जिसका गोत्र कश्यप थी , लिच्छवि राजकुमारी ‘कुमार देवी ‘से वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त से होना ,चीनी यात्री व्हेनसांग का विवरण ,नेपाल की वंशावली ,प्राचीन तिब्ती ग्रन्थ ‘दुल्व ‘आदि से भी प्रमाणित है । उक्त वैवाहिक संबंध से लिच्छवि तथा गुप्त राज्य का एकिकारण हो सका ,उस समय उत्तर का कुछ भू-भाग तथा पश्चिमी बंगाल पर गुप्तों का अधिकार था और उत्तर बिहार लिच्छवियों के अधिकार में था ,चन्द्रगुप्त ने पराक्रम से अन्य राज्यों को भी जीत कर पाटलीपुत्र में फिर से एक साम्राज्य की नींव रखी तथा उस शुभ अवसर पर ‘महाराजाधिराज ‘की उपाधि धारण किया ,इसका प्रमाण स्वयं चन्द्रगुप्त की है । 

परंतु यह प्रमाणित नहीं है की गुप्त वंश के आदि पुरुष क्षत्रिय थे । गुप्त वंश को जाट या शूद्र भी नहीं कहा जा सकता , क्योंकि भारतिये सांस्कृति में पुरुष के विवाह के उपरांत पुरुष के जाती से ही वंश का जाती माना जाता है । गुप्त वंश तो वैश्य है ,यह प्रमाणित है । गुप्त वंश के पूर्वज नमक के व्यापार करते थे, हमारे कुल देवता लक्ष्मी है तथा हमारे पूर्वजों के द्वारा पीढ़ी –दर पीढ़ी चले आ रहे कहानी से भी गुप्त वंश वैश्य हैं । मौर्य वंश भी वैश्य थे यह भी प्रमाणित है । यह दोनों वंश बौद्ध हो गए थे । गुप्त वंश बौद्ध से पुनः वैश्य हिन्दू हुये थे । जिनके वंशज आज भी वही है । जिनके नाम के साथ गुप्त तथा गुप्ता (पुलिंग तथा स्त्रीलिंग ) पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज तक जुड़ा चला आ रहा है । सदियों से वे आज भी वैश्य हैं । उनके वंशज आज भी लक्ष्मी महारानी के साथ-साथ कुल देवता कि पुजा में ‘अहम श्री गुप्तस्याः वंशजाः ‘कहकर पूजा में अपने पूर्वजों को याद कराते हैं और उसी गुप्त वंश को रणहार (रण +हार )तथा रोने-हारे मिलकर या रौनियार शब्द जो अपभ्रंस है कहा जाता है जिसका गोत्र आज भी कश्यप है । जो प्राचीन काल में कास्करजाती (नमक बेचनेवाला जाती )था । हमारे आखिरी पुरखे हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य हेमचन्द्र @हेमू साह जिनके हम वंशज हैं प्रमाणित है । हमारे पूर्वजों ने समग्र समाज कि अगुआई कि थी । 

हमें अपनी विरासत से प्रेरणा लेकर समग्र समाज कि अगुआई आगें बढ़कर करना चाहिए । अपनी विरासत कि परम्पराको कायम करना चाहिए । राजनीति में रौनियार समुदाया कि कोई जगह नहीं दी जा रही है ऐसी परिस्थिति में इस समुदाय के स्वाभिमान को जगाना और एकता कायम करना अत्यंत आवश्यक है । यह समग्र समाज कि विकास के लिए भी आवश्यक है कि रौनियार समाज को इस कार्य के लिए आगे लाया जाय इतिहास में हमारे पुरखों ने किया है ,आज समग्र समाज का नेतृत्व करने के लिए रौनियार को आगें बढ़-चढ़ कर आना चाहिए ।

साभार: डॉ ॰ कामेश्वर गुप्ता ,अध्यक्ष (प्रोफेशनल ),अखिल भारतीय वैश्य सम्मेलन..

Friday, August 28, 2015

Bold banias conquer nayi duniya

In the street theatre of Indian politics, the mercantile community has always enjoyed playing puppeteer. Away from the arc lights, they have used the muscle of money to ensure that irrespective of who reigns, they control the strings. Now, the kingmakers are turning kings. Two of India's top politicians, Narendra Modi and Arvind Kejriwal, belong to the mercantile community of west and north India. 

Columnist Aakar Patel, who has written extensively on banias, says Modi marks a departure from the past because he is direct in his quest for power. Similarly, Kejriwal's forceful and articulate leadership is markedly different from the community's traditional image of keeping its cards close to its chest. "But Kejriwal is the bigger radical as he also rejects the community's money-driven worldview. In their own ways, the two leaders represent the mercantile community's new confident face,"says Patel. 

It isn't just politics. The bold bania has stepped out to conquer brave new worlds. Four of the top 20 UPSC successful candidates in 2011, including topper Shena Aggarwal, came from this community. So did toppers Arpit Aggarwal (IIT-JEE 2012), Vidit Aggarwal (CAT 2010) and Nikhil Agarwal (2011-13 batch, IIM-A). 

In medical science, they rank among the best. A 2011 article in a national daily rated Vipul Gupta and Deepak Agrawal as two of India's best neurosurgeons. And let's not forget Flipkart's Sachin Bansal, Zomato's Deepinder Goyal and Myntra's Mukesh Bansal — all poster boys of the new economy. 

Author Ashwin Sanghi says that in recent times "the community has become far more open to the idea that individuals can excel outside the world of business". This is not to suggest that banias did not excel beyond core areas in the past. Sanghi talks of Gujarat's Sarabhai clan, as famous for their textile mills as for Vikram Sarabhai, ISRO and IIM-A. "Similarly, Sir Shankar Lal set up DCM but also patronized the arts through the Sir Shankarlal Festival of Music. Even Hindi film hero Bharat Bhushan came from the merchant class. More recently, we have examples of Sanjay Leela Bhansali, Abhishek Singhvi, Lalit Modi, Bimal Jalan and others who made a name for themselves in other areas," he says. 

The banias can be largely categorized as the traditional entrepreneurial and trading classes of north and west India. In the Hindu varna system, most are vaishyas by caste. Some are Jains too. If we include petty traders and small, caste-driven, professional communities, some would be OBCs as well. For instance, Modi's a ghanchi (oil pressers), an OBC. 

That the community has now widened its field of play is evident from Kejriwal's background. He comes from a family of grain merchants in Haryana. In his hometown Siwani, two of his uncles still practise the trade. His father was the first to break out by becoming an engineer. Arvind went several steps further: the engineer has transformed into a tough-talking politician. 

However, social commentator Santosh Desai says Kejriwal's rise needs to be seen beyond the bania lens. "We need to understand that a third kind of India is emerging beyond the India-Bharat binary or the caste-community prism," he says. 

This is also, because as Patel points out, the mercantile community is "generally socially conservative and finds resonance with Hindutva, especially on issues of cow slaughter." 

Desai links the rise of the bania to the changing values of post-liberalization India where money, once regarded as a contaminant, is seen as an energizer. "Money-making has not only earned legitimacy, it is central to most lives. This change in society's attitude has helped in the rise of the bania community," he says. 

Business historian Gita Piramal believes that education, urban-rural migration, satellite TV and economic growth have forced the country to shed its past. "The change in the mercantile community is just a small sub-section in the larger transformation of India," she says. 

Most experts agree that the key to the community's bold new vision lies in its embrace of education. As Patel points out, "Once you blend stable, upper middle class income with five-six generations of decent education, you find a confident community empowered to move away from its conservative roots." 

He illustrates the point with an example. Basant Kumar Birla, grandfather of Kumar Mangalam Birla, was already in office by the time he was 14-15. "Staff members were deputed to teach him cash flow and book-keeping. Now the alumni of top business schools are full of surnames from the mercantile communities," says Patel. Sanghvi says, "Parents are more open to children choosing a path that may be remarkably different to the ones that they chose for themselves." 

Sanghvi says, "Parents are more open to children choosing a path that may be remarkably different to the one they chose for themselves." Desai sums it up, "In the past, the community was sequestered by a conservative, inward-looking view of the world. Now the fear of the outsider is gone." 

It wasn't always like that. In politics, right from the days of the 18th-century Jagat Seths, the banias were primarily backroom boys. 

Business historian and journalist Harish Damodaran says, "Apart from Gandhi (and Ram Manohar Lohia, though he was more an OBC in spirit!), we didn't have too many banias in politics. They preferred to be backroom funders (Birla, Bajaj, Dalmia). The politicians were largely brahmins (Nehru, Morarji Desai, G B Pant) or kayasthas (Rajendra Prasad, JP, Lal Bahadur Shastri, Subhash Chandra Bose)." 

He adds, "State-level politicians like Chandra Bhanu Gupta in UP and Banarasi Dass Gupta in Haryana got marginalized by Jat leaders like Charan Singh, Devi Lal and Bansi Lal. Post-Mandal, the community became more politically irrelevant. Post-Mandal, the community became more politically irrelevant." At the most they were trusted as treasurers in a top political party; such as Sitaram Kesari in Congress. 

SAABHAAR: Avijit Ghosh,TNN




Friday, August 21, 2015

जींद के विपुल गर्ग ने किया ऑल इंडिया प्री मेडिकल में किया टॉप


जींद शहर के एक हौनहार विपुल गर्ग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की एआइपीएमटी की परीक्षा में देश भर में प्रथम स्थान प्राप्त कर न केवल जींद शहर बल्कि अपने प्रदेश का नाम भी ऊचां किया है उसने 12 वीं परीक्षा में 90 फीसदी अंक हासिल किए थे। जैसे ही यह समाचार मिला तो विपुल गर्ग के यहां बधाई देने वालों की कतार लगनी आरंभ हो गई और सभी इस हौनहार छात्र की तारिफ कर रहे थे विपुल के पिता पेशे से व्यवशायी हैं परिवार के लोग भी उसकी इस उपलब्धि पर खुशी से फुले नही समा रहें है विपुल ने बताया कि वह मेहनत और लग्र से कार्य करेगा और आगे भी अपने शहर व प्रदेश का नाम ऐसे ही ऊचां करने का प्रयास करेगा। अपनी सफलता पर विपुल ने कहा कि परीक्षा के बाद मैं खुश था कि मेरे पेपर अच्छे हो गए थे लेकिन टॉप करने के बारे में कभी नहीं सोचा था। उसने कहा कि मुझे अब बहुत खुशी है कि मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली में एडमिशन मिल सकेगा। यह एक स्वप्न था मेरे और मेरे परिवार के लिए जो सच हो गया। विपुल ने बताया कि 3 मई को हुई परीक्षा में उसके पेपर अच्छे रहे थे ले किन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था। इसके बाद उसे तैयारी का एक और मौका मिल गया। रिटेस्टे होने से और अच्छा परफार्म कर सका।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ;सीबीएसई की ओर से गत 25 जुलाई को देशभर में पुन: ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट की परीक्षा हुई थी। इसके लिए कुल 6लाख 32हजार 625 उम्मीदवार पंजीकृत हुए थे जिसमें 4लाख22हजार859 उम्मीदवारों ने परीक्षा देने के लिए प्रवेश पत्र डाउनलोड किया। देश विदेश के कुल 50 शहरों के कुल 1065 सेंटरों पर यह परीक्षा हुई। सीबीएसई ने परीक्षा के सफल संचालन के लिए कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे। दिल्ली में करीब 80 परीक्षा सेंटरों पर परीक्षार्थियों ने ये प्रवेश परीक्षा दी थी

Monday, August 3, 2015

IRA SINGHAL - इरा सिंघल "IAS TOPPER"



मैं हूं इरा सिंघल। मैंने आईएएस टॉप किया है। आज लोग मुझे जानते हैं, लेकिन एक समय मुझे अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। मैंने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। बचपन में ही मेरी रीढ़ की हड्डी सिकुड़ने लगी। मेडिकल में इसे रेअरेस्ट माना जाता है। डॉक्टर्स ने इसे स्कोलियोसिस बताया। मुझे उस उम्र में इस बीमारी का पता भी नहीं था। पर मेरी ज़िंदगी में संघर्ष यहीं से शुरू हो गया। ऑपरेशन कराने में जान का खतरा था, तो माता-पिता ने जाेखिम नहीं लिया। मेरी ज़िंदगी अपनी राह पर थी, तो यह स्थिति भी साथ थी।

स्कूल में एडमिशन का समय आया, तो बहुत मुश्किलें आईं। मुझे यह तक कहा गया कि मैं नाक में बोलती हूं। बड़ी मिन्नतों के बाद अलग से टेस्ट लिया। पांचवीं तक मैं हमेशा फर्स्ट आई, क्योंकि मां पढ़ाई पर ध्यान देती थी। बाद में पापा को बिज़नेस में घाटा होने पर ऐसे हालात हो गए कि मेरी पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी। पापा ने 1993 में एक बिज़नेस शुरू किया, जिसमें बड़ा नुकसान हुआ। 1997 तक तो आर्थिक हालात बेहद खराब हो गए। हम किराए के घर में रहे। पैसों की इतनी कमी थी कि घर में एक टेबल फैन खरीदने के भी पैसे नहीं थे। बाद में मकान मालिक ने हमें पंखा दिया।

इरा कहती हैं, ‘अब दुनिया मेरे जैसों को अलग तरीके से देखने लगेगी।’ मेरी हमेशा से इच्छा कुछ अलग करने की ही रही है। 1995 में दिल्ली आने से पूर्व हमारा परिवार मेरठ में रहता था। जहां मैंने सोफिला गर्ल्स स्कूल से पहली से छठी तक की पढ़ाई की। वहां से दिल्ली आने के बाद दिल्ली के लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल से 10वीं पास की फिर धौला कुआं स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल से अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 2006 में एनएसआईटी द्वारका से पढ़ाई की। वर्ष 2006 से 2008 तक डीयू के एफएमएस से फाइनेंस और मार्केटिंग में एमबीए किया। फिर कैडबरी इंडिया में कस्टमर डेवलपमेंट मैनेजर की पोस्ट पर दो साल तक काम किया।

बचपन में मुझे डॉक्टर बनने का शौक था। पढ़ाई में भी अच्छी थी, लेकिन पापा ने समझाया कि पढ़ाई तो कर लोगी लेकिन खड़े होकर घंटो सर्जरी कैसे करोगी। मन मारकर मैंने डीयू के नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। यहां बीटेक कंप्यूटर साइंस में दाखिला मिला। परीक्षा होने से कुछ दिन पहले पढ़ाई करती थी। अच्छे नंबरों से पास हुई। कॉलेज के दिनों में मैंने थियेटर ग्रुप भी ज्वाइन किया, क्योंकि शारीरिक दिक्कतों ने कभी मेरा हौसला नहीं तोड़ा। मन में हमेशा यह कोशिश रहती की दूसरों के समकक्ष आने के लिए मुझे थोड़ी ज्यादा कोशिश करनी है। यही ज्यादा कोशिश मुझे यहां तक ले आई। मैंने भूगोल को मुख्य विषय के रूप में चुना, मन लगाकर पढ़ाई की। वर्ष 2010 के पहले ही प्रयास में सफलता मिली। मेरा मन विदेश सेवा में जाने का था, लेकिन मेडिकल शर्तों की वजह से मुझे पोस्टिंग नहीं दी गई। लगातार तीन बार सिविल सेवा की परीक्षा मैंने उत्तीर्ण की। परीक्षा पास करने के बाद भी पोस्टिंग न मिलना यकीनन कठिन रहा। मैंने हार नहीं मानी। अपने हक के लिए कोर्ट गई, इसमें पापा ने बहुत फाइट लड़ी। हर कदम पर वे मेरे साथ रहे।

2011 में मैंने परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन इसके जश्न पर तब पानी फिर गया, जब सरकार ने मुझे नियुक्ति देने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, मेरी उम्मीदवारी ही खत्म कर दी गई, क्योंकि उनका मानना था कि मैं इस काम के लिए शारीरिक रूप से अक्षम हूं। एक कारण यह दिया गया कि 62 फीसदी विकलांगता ने मेरी दोनों बाहों को प्रभावित किया है, जिसके कारण मैं किसी चीज़ को न खींच सकती हूं, न धकेल सकती हूं और न उठा सकती हूं। बड़ी अजीब बात थी कि सरकार को लगता था कि भारतीय राजस्व सेवा के दायित्व को निभाने के लिए इन शारीरिक क्षमताओं की जरूरत है। मैंने सोच लिया कि मैं यह मूर्खतापूर्ण नियम अपने पर लागू नहीं होने दूंगी। अपनी लड़ाई मैं केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण तक लाई।

वहां 18 महीने तक संघर्ष चला और मेरे पक्ष में फैसला आया। बेंच के सदस्यों ने भी इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या वाकई किसी आईआरएस ऑफिसर को किसी रेड के दौरान ऐसे भारी पैकेट उठाने की जरूरत पड़ती है। मेरी मेडिकल जांच में मैंने उन्हें बता दिया कि 10 किलो तक का वजन तो मैं उठा सकती हूं। जिस दिन मैंने यूपीएससी की परीक्षा पास की, केंद्रीय कार्मिक प्रशासन विभाग से फोन आया कि मंत्री महोदय मुझसे मिलना चाहते हैं। मजे की बात यह है कि ये वही विभाग है, जिसने मुझे आईआरएस की परीक्षा पास करने के बाद ठुकरा दिया था। वर्ष 2014 में आईआरएस सेवा में ज्वाइनिंग मिली, इस दौरान एक दोस्त से मुलाकात हुई, जिसने कहा कि मैं चौथी बार आईएएस के लिए परीक्षा दूं। मैंने उसकी सलाह मानी और दो महीने तक उसके साथ ग्रुप डिस्कशन और पढ़ाई की। जिससे न केवल मेरा चयन हुआ, बल्कि मैं परीक्षा में टॉप कर सकी।

मेरी शारीरिक सीमाएं कभी मुझे अपने सपनों को साकार करने में बाधा नहीं लगी। सच तो यह है कि जब हम अपनी सीमाएं और मर्यादाएं तोड़ते हैं, तो ही सीमित दायरे से बाहर आते हैं और कामयाबी के लायक बनते हैं। हर संघर्ष आपको कुछ न कुछ सीखाता है। संघर्ष में हार की संभावना तो रहती है, लेकिन जीवन में आपको लड़ते चले जाना पड़ता है। किसी न किसी तरह का संघर्ष हर व्यक्ति को करना पड़ता है और इससे बचना तो मेरे ख्याल से जिंदगी को ठुकराने जैसा ही है।

मेरे माता-पिता फाइनेंशियल एवं इंशुरेन्स कंसलटेन्सी के व्यवसाय में हैं। उन्होंने कभी मुझे विकलांग मानकर मेरे साथ व्यवहार नहीं किया। बचपन से ही उन्होंने मुझे यह सिखाया है कि परिस्थितियों को एक शारीरिक रूप से सामान्य व्यक्ति की तरह कैसे देखना चाहिए। मेरा संघर्ष इसलिए नहीं था कि मैं शारीरिक रूप से अक्षम थी, बल्कि संघर्ष इसलिए था कि मैं महिला हूं। जैसे हर महिला को भेदभाव और एक पिछड़ी सोच का सामना करना पड़ता है, वैसा ही मुझे भी करना पड़ा। आईएएस अफसर की भूमिका में भी मैं महिला, बच्चों और शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए काम करना चाहूंगी। यह सफलता पाकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैं हर किसी से यह कहना चाहती हूं कि अपनी बेटी को पढ़ने और काम करने दीजिए। उन्हें दुनिया में जाने दीजिए और अपनी ज़िंदगी खुद बनाने का मौका दीजिए।

साभार: दैनिक भास्कर

Saturday, August 1, 2015

पुरातन वैज्ञानिक ब्रह्मगुप्त - BRAHAMGUPT



साभार: भारतीय वैज्ञानिक-K.M.L. SHRIVASTAVA

जांगडा पोरवाल समाज - JANGDA PORWAL SAMAJ

गौरी शंकर हीराचंद ओझा (इण्डियन एक्टीक्वेरी, जिल्द 40 पृष्ठ क्र.28) के अनुसार आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था।

जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। समय-समय पर उन्होंने अपने शौर्य गुण के आधार पर जंग में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था और मरते दम तक भी युद्ध भूमि में डटे रहते थे। अपने इसी गुण के कारण ये जांगडा पोरवाल (जंग में डटे रहने वाले पोरवाल) कहलाये। नौवीं और दसवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर हुए विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिये एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये। दिल्ली में रहनेवाले पोरवाल “पुरवाल”कहलाये जबकि अयोध्या के आस-पास रहने वाले “पुरवार”कहलाये। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गये। यहां ये पोरवाल व्यवसाय /व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा। और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाये। वर्तमान में इनकी कुल जनसंख्या 3 लाख 46 हजार (लगभग) है।

राजा टोडरमल पोरवाल - RAJA TODARMAL


टोडरमल का जन्म चैत्र सुदी नवमी बुधवार संवत् 1658 वि. (सन् 1601, मार्च 18) को बूँदी के एक पोरवाल वैश्य परिवार मे हुआ था। बाल्यकाल से वह हष्टपुष्ट, गौरवर्ण युक्त बालक अत्यन्त प्रतिभाशाली प्रतीत होता था। धर्म के प्रती उसका अनुराग प्रारंभ से ही था। मस्तक पर वह वैष्णव तिलक लगया करता था।

युवावस्था में टोडरमल ने अपने पिता के लेन-देन के कार्य एवं व्यवसाय में सहयोग देते हुए अपने बुद्धि चातुर्य एवं व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया । प्रतिभा सम्पन्न पुत्र को पिता ने बूँदी राज्य की सेवा में लगा दिया । अपनी योग्यता और परिश्रम से थोड़े ही दिनों में टोडरमल ने बूँदी राज्य के एक ईमानदार , परिश्रमी और कुशल कर्मचारी के रुप में तरक्की करते हुए अच्छा यश अर्जित कर लिया।

उस समय मुगल सम्राट जहाँगीर शासन कर रहा था। टोडरमल की योग्यता और प्रतिभा को देखकर मुगल शासन के अधिकारियों ने उसे पटवारी के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही काल में टोडरमल की बुद्धिमत्ता , कार्यकुशलता, पराक्रम और ईमानदारी की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वह तेजी से उन्नति करने लगा।

सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का स्वामी बना। 1639 ई. में शाहजहाँ ने टोडरमल के श्रेष्ठ गुणों और उसकी स्वामी भक्ति से प्रभावित होकर उसे राय की उपाधि प्रदान की तथा सरकार सरहिंद की दीवानी, अमीरी और फौजदारी के कार्य पर उसे नियुक्त कर दिया। टोडरमल ने सरहिंद में अपनी प्रशासनिक कुशलता का अच्छा परिचय दिया जिसके कारण अगले ही वर्ष उसे लखी जंगल की फौजदारी भी प्रदान कर दी गई । अपने शासन के पन्द्रहवें वर्ष में शाहजहाँ ने राय टोडरमल पोरवाल को पुन: पुरस्कृत किया तथा खिलअत, घोड़ा और हाथी सहर्ष प्रदान किये । 16 वें वर्ष में राय टोडरमल एक हजारी का मनसबदार बन गया। मनसब के अनुरुप से जागीर भी प्राप्त हुई। 19वें वर्ष में उसके मनसब में पाँच सदी 200 सवारों की वृद्धि कर दी गई । 20वें वर्ष में उसके मनसब में पुन: वृद्धि हुई तथा उसे ताल्लुका सरकार दिपालपुर परगना जालन्धर और सुल्तानपुर का क्षेत्र मनसब की जागीर में प्राप्त हुए । उसने अपने मनसब के जागीरी क्षेत्र का अच्छा प्रबन्ध किया जिससे राजस्व प्राप्ति में काफी अभिवृद्धि हो गई ।

राय टोडरमल निरन्तर उन्नति करते हुए बादशाह शाहजहाँ का योग्य अधिकारी तथा अतिविश्वस्त मनसबदार बन चुका था । 21वें वर्ष में उसे राजा की उपाधि और 2 हजारी 2हजार सवार दो अस्पा, तीन अस्पा की मनसब में वृद्धि प्रदान की गई । राजा की पदवी और उच्च मनसब प्राप्त होने से राजा टोडरमल पोरवाल अब मुगल सेवा में प्रथम श्रेणी का अधिकारी बन गया था। 23वें वर्ष में राजा टोडरमल को डंका प्राप्त हुआ।

सन् 1655 में राजा टोडरमल गया। जहाँ उसका एक परममित्र बालसखा धन्नाशाह पोरवाल रहता था। धन्नाशाह एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। आतिथ्य सेवा में वह सदैव अग्रणी रहता था। बूँदी पधारने वाले राजा एवं मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी उसका आतिथ्य अवश्य ग्रहण करते थे। बूँदी नरेश धन्नाशाह की हवेली पधारते थे इससे उसके मानसम्मान में काफी वृद्धि हो चुकी थी। उसकी रत्ना नामक एक अत्यन्त रुपवती, गुणसम्पन्न सुशील कन्या थी। यही उसकी इकलौती संतान थी। विवाह योग्य हो जाने से धन्नाशाह ने अपने समान ही एक धनाढ्य पोरवाल श्रेष्ठि के पुत्र से उसकी सगाई कर दी।

भाग्य ने पलटा खाया और सगाई के थोड़े ही दिन पश्चात् धन्नाशाह की अकाल मृत्यु हो गई । दुर्भाग्य से धन्नाशाह की मृत्यु के बाद लक्ष्मी उसके घर से रुठ गई जिससे एक सुसम्पन्न, धनाढ्य प्रतिष्ठित परिवार विपन्नावस्था को प्राप्त हो गया। धन्नाशाह की विधवा के लिए यह अत्यन्त दु:खमय था। गरीबी की स्थिति और युवा पुत्री के विवाह की चिन्ता उसे रात दिन सताया करती थी । ऐसे ही समय अपने पति के बालसखा राजा टोडरमल पोरवाल के बूँदी आगमन का समाचार पाकर उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ।

एक व्यक्ति के साथ धन्नाशाह की विधवा ने एक थाली मे पानी का कलश रखकर राजा टोडरमल के स्वागत हेतू भिजवाया। अपने धनाढ्य मित्र की ओर से इस प्रकार के स्वागत से वह आश्चर्यचकित रह गया। पूछताछ करने पर टोडरमल को अपने मित्र धन्नाशाह की मृत्यु उसके परिवार के दुर्भाग्य और विपन्नता की बात ज्ञात हुई, इससे उसे अत्यन्त दु:ख हुआ । वह धन्नाशाह की हवेली गया और मित्र की विधवा से मिला। धन्नाशाह की विधवा ने अपनी करुण गाथा और पुत्री रत्ना के विवाह की चिन्ता से राजा टोडरमल को अवगत कराया।

अपने परममित्र सम्मानित धनाढ्य श्रेष्ठि धन्नाशाह की विधवा से सारी बातें सुनकर उसे अत्यन्त दु:ख हुआ। उसने उसी समय धन्नाशाह की पुत्री रत्ना का विवाह काफी धूमधाम से करने का निश्चय व्यक्त किया तथा तत्काल समुचित प्रबन्ध कर रत्ना के ससुराल शादी की तैयारी करने की सूचना भिजवा दी। मुगल साम्राज्य के उच्च सम्मानित मनसबदार राजा टोडरमल द्वारा अपने मित्र धन्नाशाह की पुत्री का विवाह करने की सूचना पाकर रत्ना के ससुराल वाले अत्यन्त प्रसन्न हुए ।

राजा टोडरमल ने एक माह पूर्व शान शौकत के साथ गणपतिपूजन करवा कर (चाक बंधवाकर) रत्ना के विवाहोत्सव का शुभारंभ कर दिया। निश्चित तिथि को रत्ना का विवाह शाही ठाटबाट से सम्पन्न हुआ। इस घटना से राजा टोडरमल की उदारता, सहृदयता और मित्रस्नेह की सारी पोरवाल जाति में प्रशंसा की गई और उसकी कीर्ति इतनी फैली की पोरवाल समाज की स्त्रियाँ आज भी उनकी प्रशंसा के गीत गाती है और पोरवाल समाज का एक वर्ग उन्हें अपना प्रातः स्मरणीय पूर्वज मानकर मांगलिक अवसरों पर सम्मान सहित उनका स्मरण करता है तथा उन्हें पूजता है। इस प्रकार राजा टोडरमल का यश अजर-अमर हो गया। हाड़ौती (कोटा-बूँदी क्षेत्र) तथा मालवा क्षेत्र में जहाँ भी पोरवाल वास करते है, वहाँ टोडरमल की कीर्ति के गीत गाये जाते हैं तथा उनका आदरसहित स्मरण किया जाता है। उनके प्रति श्रद्धा इतनी अधिक रही है कि पोरवाल व्यापारी की रोकड़ न मिलने पर टोडरमल का नाम लिखा पर्चा रोकड़ में रख देने से प्रातःकाल रोकड़ मिल जाने की मान्यता प्रचलित हो गई है।

सम्राट शाहजहाँ का उत्तराधिकारी दाराशिकोह वेदान्त दर्शन से अत्यन्त प्रभावित उदार विचारों का व्यक्ति था। सन् 1658 से बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रुप से अस्वस्थ हो जाने की अफवाह सुनकर उसके बेटे मुराद और शुजा ने विद्रोह कर दिया। 16 अप्रैल 1658 ई. शुक्रवार को धरमाट (फतियाबाद) के मैदान में औरंगज़ेब की सेनाओं ने शाही सेना को करारी शिकस्त दी। सामूगढ़ के मैदान में पुनः दाराशिकोह के नेतृत्व में शाही सेना को औरंगज़ेब और मुराद की संयुक्त सेना से पराजय का सामना करना पड़ा। दारा युद्ध में पराजित होकर भागा। औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर पिता को किले में कैद किया और फिर आगे बढ़ा। रास्ते में मुराद को समाप्त कर औरंगज़ेब ने पंजाब की ओर भागे दाराशिकोह का पीछा किया।

राजा टोडरमल की प्रारम्भ से ही दाराशिकोह के प्रति सहानुभूति थी। पराजित दारा के प्रति उसकी सहानुभूति में कोई अन्तर नहीं आया। अतः जब दारा लखी जंगल से गुजरा तो राजा टोडरमल ने जो लखी जंगल का फौजदार था, अपने कई मौजें में गड़े धन से 20 लाख रुपये गुप्त रुप से सहायतार्थ प्रदान किये थे।

इसी कारण पंजाब की ओर दारा का पीछा करने के बाद लाहौर से दिल्ली की तरफ लौटते हुए औरंगज़ेब ने अनेक सरदारों और मनसबदारों को खिलअते प्रदान की थी। तब लखी जंगल के फौजदार राजा टोडरमल को भी खिलअत प्राप्त हुई थी।

इटावा का फौजदार रहते हुए राजा टोडरमल ने अपनी पोरवाल जाति को उस क्षेत्र में बसाने तथा उन्हें व्यापार- व्यवसाय की अभिवृद्धि के लिये समुचित सुविधाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था। सम्भवतः इस कारण भी जांगड़ा पोरवाल समाज में इसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के उद्देश्य से एक श्रद्धेय पूर्वज के रुप में राजा टोडरमल की पूजा की जाती है ।

राजा टोडरमल अपने अंतिम समय में अपने जन्मस्थल बूँदी में अपना शेष जीवन परोपकार और ईश्वर पूजन में व्यतीत करने लगे तथा समाज के सैकड़ों परिवार इटावा क्षेत्र त्यागकर बून्दी कोटा क्षेत्र में आ बसे। यहीं से ये परिवार बाद में धीरे-धीरे मालवा क्षेत्र में चले आए।

राजा टोडरमल की मृत्यु कहाँ और किस तिथि को हुई थी इस सम्बन्ध में निश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है । किन्तु अनुमान होता है कि सन् 1666 ई. में पोरवाल समाज के इस परोपकारी प्रातः स्मरणीय महापुरूष की मृत्यु बूँदी में ही हुई होगी । कोटा बूँदी क्षेत्र में आज भी न केवल पोरवाल समाज अपितु अन्य समाजों मे भी राजा टोडरमलजी के गीत बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं।

साभार : jangda porwal samaj history http://jangdaporwalsamaj.org/

श्रेष्ठी पाड़ाशाह और पारस पत्थर

श्रेष्ठी पाड़ाशाह और पारस पत्थर

पाड़ाशाह नाम के धर्मात्मा श्रेष्ठी (व्यापारी) गृहपति गहोई जाति के वैश्य रत्न थे जो चेंदी जनपद (वर्तमान चंदेरी ) के थुबौन ग्राम (वर्तमान अतिशय क्षेत्र थुबौन जी ) के रहने वाले कहे जाते थे । बचपन से ही पाड़ाशाह को जैन धर्म में सच्ची आस्था थी । वह स्वभाव से सरल होकर सत्य, अहिंसा एवं रतनात्रय धर्म के पक्के श्रद्धालु भक्त थे । बचपन से ही उन्हें जैन धर्म के ज्ञान की देवोपुनीत प्रतिभा की देन थी । पुण्य कर्मो के प्रभाव से उन्हें धनी होने का सौभाग्य प्राप्त था। बाल्यावस्था से ही इस पुण्य जीव के भाव जगह जगह जिन मंदिर बनवाना, प्रतिष्ठा करना तथा धर्म की प्रभावना करते रहने का था ।
पाड़ाशाह अधिकतर पाड़ो की पीठ पर सामान क्रय विक्रय का व्यापार किया करते थे। वह एक कुशल व्यापारी थे । संभवतः इसीलिए इनका नाम पाड़ाशाह पड़ा हो, पूर्व नाम कुछ और हो।
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एक दिन जब वह अपने पाड़ो सहित ग्राम बजरंगढ़ की ओर जा रहे थे की रास्ते में पठार पर उनके पाड़ो में से एक पाड़ा गुम हो गया। वह चिन्तित हुवे अपने गुमशुदा पाड़े की खोज करने लगे। परेशान होकर जब वह निराश होकर लौट रहे थे तो उन्हें गुमशुदा पाड़ा दिखा और उसके गले की लोहे की जंजीर सोने (स्वर्ण) की हो गयी थी, वही उन्हें खोज करने पर पारस पत्थर मिला। पारस पत्थर पाकर उनकी धर्म प्रभावना प्रबल हो उठी। उन्हें उसी रात्रि को ऐसा सपना आया कि वो इस पारस पत्थर द्वारा इसी ग्राम में जिनालय का निर्माण कराये और ऐसा ही हुआ पाड़ाशाह ने मुख्य मंदिर का निर्माण कराया और तभी से इस पठार के रास्ते का नाम पाड़ा-खोह के नाम से प्रसिद्ध हो गया। उन्होंने मंदिर और मूर्तियाँ निर्मित कराकर उन्हें प्रतिष्ठित कराने का संकल्प किया और सर्वप्रथम उन्होंने बजरंगढ़ में ही पाड़ा-खोह नामक स्थान से 2 किलोमीटर दूर दक्षिण में भगवान शांतिनाथ के भव्य जिनालय का निर्माण कराया और उसमे इन तीनों तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमायें फाल्गुन सुदी 6 विक्रम सम्वत 1236 को प्रतिष्ठित करायी । यह क्षेत्र पाड़ाशाह की उदारता, धर्मनिष्ठा एवं जैन संस्कृति का ज्वलंत प्रमाण है ।
पाड़ाशाह ने अपने जीवन काल में इस क्षेत्र के अलावा भी कई विशाल मंदिरों का निर्माण कराया जिनमे मनोज्ञ मनभावन मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई है जैसे थूबौन जी, चंदेरी, आहार जी, पपोरा जी, झालरापाटन, चाँदखेड़ी, बानपुर, सोनागिर का एक मंदिर, भियादांत बेरसिया, वर्री, मामोन (भाभोंन), सतना, सुम्मे के पहाड़, परचाई चौरासी, गोलाकोट, सेरोन जी खलारा, बल्हारपुर, सुखाया, शेषई, राई, पनवाडा, आमेट, दूवकुण्ड, आरा (अगरा), में भी जिनालयों का निर्माण कराया ।
प्रायः उन्होंने शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ तीर्थंकर की प्रतिमाये प्रतिष्ठित करायी। उनमे सर्वत्र मूलनायक भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा को ही रखा। कहीं कहीं तो उन्होंने शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा ही प्रतिष्ठित करायी। इससे ऐसा लगता है कि धर्म वात्सल्य पाड़ाशाह की यधपि सभी तीर्थंकरो के प्रति अगाथ श्रद्धा थी, किन्तु शांतिनाथ भगवान के प्रति उनका विशेष आकर्षण था । संभवतः शांतिनाथ भगवान के दर्शन, पूजन और नाम स्मरण से उन्हें अपेक्षाकृत अधिक शांति प्राप्त होती थी।
पाड़ाशाह द्वारा निर्मित एक माणिक रत्न की 17 इंच की पद्मप्रभु की पदमासन प्रतिमा बूढी चंदेरी के जंगल में बहने वाली नदी के किनारे एक विशाल जैन मंदिर “बीठ्ली” में आज भी मौजूद है ।

पूर्वकालीन इतिहास

किसी भी क्षेत्र के इतिहास पर जब नज़र डाली जाती है तो हमें क्षेत्र के निर्माण व अतिशय की जानकारी सहर्ष उपलब्ध हो जाती है परन्तु बजरंगढ़ का इतिहास पढने से पूर्व हमें यहाँ की राजनैतिक, सामाजिक व भौगोलीक सीमाओं का भी एक वृहत इतिहास जान पढता है। जो इस पावन अतिशय क्षेत्र की समृद्धशाली गौरव गाथा है।
इस नगर ने इतिहास के अनेक उत्थान-पतन और राजनैतिक अनेक उथल-पुथल देखी है । इतिहास में इस नगर के कई नाम प्राप्त होते है – जैसे मूसागढ़, झरखोन, सारखोन, बजरंगढ़, जयनगर, जैनागढ़। इन नामों का अपना-अपना एक इतिहास भी है।
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कहा जाता है लगभग संवत 1200 के पूर्व से ही यहाँ अलग अलग समुदायों का शासन रहा है इसका पूर्व नाम “मूसागढ़ ” हुआ करता था जहाँ नन्दवंशीय अहीरों के वंशज बेरगढ़ियों का राज था। किला उस समय छोटी बस्ती के रूप में था तथा तलहटी में लगभग 100 जैन परिवारों की बस्ती हुआ करती थी जो आसपास के क्षेत्रो में व्यापर संलग्न थी। कालांतर में बेरगढ़ियों व झिरवार रघुवंशियों के बीच शासन सत्ता को लेकर युद्ध हुआ तथा झिरवार रघुवंशियों को सत्ता हासिल हो गई और इस नगर का नामकरण“झरखोन ” रखा गया और फिर बदलते बदलते “सारखोन” हो गया ।
“झरखोन” के दक्षिण पश्चिम में राघौगढ़ में खीची राजपूत चौहानों का शासन था। उन दिनों महाराजा धीरजसिंह जी गद्दी आसीन थे उस समय इनका शासन खिलचीपुर, चाचौड़ा, भदोरा, राघौगढ़ आदि में विधमान था। यह समस्त क्षेत्र “खीचीबाड़ा” कहलाता था।
महाराजा धीरज सिंह को अपने राज्य की सीमाएं विस्तारित करने का शौक था वह छोटी छोटी जागीरो को अपने में मिला लेना चाहते थे इसी उद्देश्य से उन्होंने बजरंगगढ़ पर आक्रमण कर दिया और किले पर अपनी विजय प्राप्त कर ली अब “झरखोन ”महाराजा राघौगढ़ के अधीन आ गया था ।
गढ़ी (किले) में विजयोल्लास मनाया जा रहा था । महाराजा धीरजसिंह जी इसमें सम्मलित होने के लिए सदर दरवाजे से गढ़ी (किले) की ओर बढ़ रहे थे की अचानक एक बेरगढ़िये ने महाराज पर आक्रमण कर उनकी हत्या कर दी। महाराज की मृत्यु के पश्चात् खीजी चौहान अपना आधिपत्य न रख सके और बेरगढ़ियों ने पूरे “झरखोंन” पर अपना शासन स्थापित कर लिया।
महाराजा धीरजसिंह की हत्या की घटना 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में घटित हुई थी किन्तु इसी शताब्दी के उत्तरार्ध में सम्वत 1833 में धीरजसिंह के प्रपोत्र बलवंत सिंह ने “झरखोंन” पर आक्रमण करके बेरगढ़ियो को मार भगाया और इस प्रकार अपने प्रपितामह की हत्या का प्रतिशोध लिया। उसने “झरखोंन” का नाम परिवर्तन करके “बजरंगढ़” कर दिया जो आजतक इसी नाम से पहचाना जाता है। उसने नवीन किला बनवाया।

बजरंगढ़ और जैनागढ़

सम्वत 1855 में राजा बलवंत सिंह की मृत्यु के पश्चात राजा जयसिंह “बजरंगढ़” की गद्दी पर आसीन हुए।
राजा जयसिंह ने किले को व किले का निचला भाग की बसाहट कार्य तेजगति से प्रारंभ किया। तब किले के निचले भाग जयनगर कहते थे ।
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उस समय लगभग 200 जैन परिवार यहाँ निवास करते थे और यह सम्वत 1200 से ही व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा। राज्य में जैन समाज का बड़ा सम्मान और प्रभाव था। जब इन सभी बातों का जिक्र महाराजा जयसिंह के दरबार में हुआ तो उन्होंने अगहन वदी 13 बुधवार सम्वत 1855 को “जैनागढ़” नाम घोषित कर दिया। सम्वत 1855 से सम्वत 1872 तक महाराजा जयसिंह ने “बजरंगढ़ और जैनागढ़” पर अपना शासन प्रशासन किया।

महाराजा जयसिंह के सुशासन का अंत

सम्वत 1872 चेत्र वदी 1 बुधवार को बजरंगढ़ में ढिंढोरा हुआ। सिन्धे अलीजाह के फ़्रांसिसी सेनापति सर जॉन वेप्तिस ने रात्रि के मध्य में किले पर चढाई की, घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ, राजा जयसिंह ने अपने आपको वीरगति में जाने के पूर्व खीची वंश की मर्यादा को चिरस्मरणीय बनाये रखने के लिए अपनी रानीयों के सतीत्व को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें रनवास के पिछले भाग में जिन्दा चुनवा दिया और वीरों की तरह दुश्मन से बदला लेने को जान बचाकर स्वयं वहां से निकल गए जो केवल यादगार बन उस खीची वंश के यशश्वी वीर की याद दिला रहा है ।
मयाचंद नाज़र जो महाराजा जयसिंह का विरोधी था, सर जॉन बत्तीस से मिल गया व “बजरंगढ़ और जैनागढ़” पर ग्वालियर स्टेट के नियम शर्तों के अनुसार चेत्र वदी 2 गुरूवार सम्वत 1872 को गादी पूजन कर, काबिज हो गया।
सम्वत 1876 से बजरंगढ़ श्रीमंत महाराजा अलीजाह बहादुर श्री दौलत रामजी शिन्धे ने अपने नियमानुसार इसे जिले का दर्जा घोषित कर दिया और यहाँ का प्रशासन ग्वालियर स्टेट के अंतर्गत चालू कर दिया । बाद में सम्वत 1895 में राय बहादुर लक्ष्मण सिंह को जिला मजिस्ट्रेट बनाये गए। ग्वालियर शासन काल में यहाँ कई देव स्थान, शासकीय कार्यालय, भवन आदि का निर्माण कराया गया। 1895 के समय गुना एक छोटा सा गावं हुआ करता था । स्वतंत्रता के पश्चात देसी रियासतों के भारत में विलय होने पर बजरंगढ़ मध्यप्रदेश के गुना जिले के अंतर्गत आ गया ।

शिव प्रसाद गुप्त - स्वतंत्रता सेनानी




बाबू शिव प्रसाद गुप्ता (28 जून 1883 – 24 अप्रैल 1944) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, परोपकारी, राष्ट्रवादी कार्यकर्ता तथा महान द्रष्टा थे। उन्होने काशी विद्यापीठ की स्थापना की। शिव प्रसाद ने 'आज' नाम से एक राष्ट्रवादी दैनिक पत्र निकाला। उन्होंने बनारस मे 'भारत माता मन्दिर' का भी निर्माण करवाया।

जीवनी 

बाबू शिव प्रसाद गुप्ता बनारस के एक समृद्ध वैश्य परिवार में जून, 1883 में पैदा हुए थे। उन्होंने संस्कृत, फारसी और हिंदी का अध्ययन घर पर ही किया था। उन्होंने इलाहाबाद से स्नात्तक की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे पण्डित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, आचार्य नरेन्द्र देव तथा डॉ॰ भगवान दास से अत्यन्त प्रभावित थे। 

यद्यपि उनका जन्म एक धनी उद्योगप्ति एवं जमीनदार परिवार में हुआ था, किन्तु उन्होने अपना सारा जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए चल रहे विभिन्न आन्दोलनों में भाग लेने तथा उनकी आर्थिक सहायता करने में लगा दिया। बाबू शिव प्रसाद गुप्ता ने क्रांतिकारियों का सहयोग दिया था वे अपनी राष्ट्रवादी गतिविधियों के कारण अनेक बार जेल गये। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए के बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ दिया था जो उनकी शिक्षा, पूरा करने के लिए उन युवाओं को एक मौका देने के लिए अब एक विश्वविद्यालय है, जो वाराणसी में काशी विद्यापीठ की स्थापना की. उन्होंने कहा कि भारत की राहत का नक्शा संगमरमर पर नक्काशीदार किया गया है, जिसमें भारत माता मंदिर का निर्माण किया। मंदिर 1936 में महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन किया गया . एक राज्य विश्वविद्यालय, " भारत माता मंदिर " एक राष्ट्रीय विरासत स्मारक, " शिव प्रसाद गुप्ता अस्पताल" - - वाराणसी, हिन्दी दैनिक आज के सिविल अस्पताल - सबसे पुराना मौजूदा हिंदी अखबार और कई वाराणसी में उन्होंने काशी विद्यापीठ की स्थापना अन्य परियोजनाओं और सार्वजनिक महत्व की गतिविधियों . अकबरपुर में, वह सेटिंग्स को देश में ही खादी के कपड़े के विनिर्माण के उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने के लिए भारत में पहली बार गांधी आश्रम के लिए भूमि की 150 एकड़ (0.61 km2) दे दी है आज हिन्दी दैनिक समाचार पत्र, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुविधा के क्रम में वर्ष 1920 में राष्ट्र रत्न बाबू शिव प्रसाद गुप्ता द्वारा शुरू Jnanamandal लिमिटेड का मील का पत्थर प्रकाशन . बाबू शिव प्रसाद गुप्ता कई वर्षों के लिए अपनी कोषाध्यक्ष के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़े थे। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए के बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ दिया था जो उनकी शिक्षा, पूरा करने के लिए उन युवाओं को एक मौका देने के लिए अब एक विश्वविद्यालय है, जो वाराणसी में काशी Vidhyapith की स्थापना की. उन्होंने कहा कि भारत की राहत का नक्शा संगमरमर पर नक्काशीदार किया गया है, जिसमें भारत माता मंदिर का निर्माण किया। मंदिर 1936 में महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन किया गया . 

वर्ष 1928 में वाराणसी में आयोजित होने वाली पहली राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए कुल व्यय और व्यवस्था अपने निवास 'सेवा Upawan ', अपने मित्र श्री Catley के लिए सर एडविन लुटियन द्वारा डिजाइन एक विरासत भवन, पर राष्ट्र रत्न श्री शिव प्रसाद गुप्ता द्वारा किया गया था वाराणसी के कलेक्टर और वर्ष 1910 में राष्ट्र रत्न जी ने खरीदा . यह लोग यहां की पेशकश की थी अमीर आतिथ्य का पर्याय था, जो महात्मा गांधी ने 'सेवा Upawan ' नाम दिया गया था। इमारत appertained भूमि की 20 एकड़ (81,000 M2) द्वारा कवर पवित्र गगा riverGanges के पश्चिमी तट पर स्थित 75,000 वर्ग फुट (7000 मीटर 2) का एक निर्माण क्षेत्र के साथ में मौजूद हैं। राष्ट्र रत्न जेईई रुपये का दान दिया. 1,01,000 / - 20 वीं सदी की शुरुआत में, 50 लाख के एक भव्य कुल विभिन्न रियासतों और औद्योगिक घरानों से मालवीय जी की शह और नेतृत्व में एकत्र किया गया था जिसके लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए पहली बार दान के रूप में . राष्ट्र रत्न जी सक्रिय रूप में भाग लिया इस महान और समाज की applifment और उस पर आराम में ब्रिटिश शासन, महात्मा गांधी के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ' राष्ट्र रत्न - राष्ट्र का गहना ' के शीर्षक की ओर से इन अमूल्य योगदान के लिए भारतीय डाक विभाग उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया.

साभार: विकिपीडिया