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Wednesday, August 4, 2021

KANU VAISHYA SAMAJ HISTORY

KANU VAISHYA SAMAJ HISTORY 

इतिहास किसी भी देश और जाति के उत्‍थान की कुंजी है । किसी भी देश तथा समाज के उत्‍थान व पतन तथा वहाँ के ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्‍य, एवं संस्‍कृति का ज्ञान हमें इतिहास के द्वारा ही मिल सकता है । हमें अपने पूर्वजों के श्रेष्‍ठ कार्यों की जानकारी इतिहास के माध्‍यम से ही मिल सकती है । जिस जाति के पास अपने पूर्वजों का इतिहास नहीं उसे प्राय: मृत समझा जाता है । अर्थात् जिस व्‍यक्ति को अपने इतिहास की जानकारी नहीं वो इतिहास का निर्माण नहीं कर सकता । वास्‍तव में इतिहास ही ज्ञान की कुंजी व ज्ञान का विशाल भंडार होता है । इतिहास वह पवित्र धरोहर है जो जाति को अंधकार से निकाल कर प्रकाश की और ले जाती है । हर व्‍यक्ति दूसरों से तुलना करके अपने आप को श्रेष्‍ठ प्रमाणित करने में गौरव महसूस करता है और उसके लिए इतिहास से बढ़कर कोई आधार नहीं हो सकता । किसी जाति को जीवित रखने तथा विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए इतिहास से अधिक कोई प्रेरणा का स्‍त्रोत नहीं हो सकता । इसलिए साहित्‍य जगत् में इतिहास को भारी महत्‍व दिया गया है । इतिहास पूर्वजों की अमूल्‍य निधि है और वही भटके हुए मनुष्‍यों को मार्ग दिखाता है । किसी भी देश या जाति का उत्‍थान और पतन देखना हो तो उस देश या जाति का इतिहास उठाकर देख लें । यदि किसी देश या जाति को मिटाना है तो उसका इतिहास मिटा दें वह देश या जाति स्‍वत: मिट जायेगी । इतिहास के अभाव में वह जाति या देश अपना मूल स्‍वरूप ही खो बैठेगी, वह भटक जायेगी । इतिहास इस बात का साक्षी है कि विजेता देश या जातियों ने किसी को दबाना या कुचलना चाहा तो पहले उसके इतिहास को नष्‍ट किया जिससे वे वास्‍तविकता को भूल कर गुलामी की बेड़ियों में कैद हो गये । अंग्रेज जब भारत में आए तो सबसे पहले यहां के इतिहास संस्‍कृति को नष्‍ट किया । इतिहास के अभाव में आज बहुत सी जातियों का पता लगाना कठिन हो गया है । भारत में परशुराम के भय से क्षत्रिय लोग कई जातियों में मिल गए । उसके बाद मुगल शासकों के अत्‍याचार से कई नई जातियाँ बन गई । महाभारत काल में भी कई जातियाँ डगमगा गई और छिन्‍न-भिन्‍न हो गई । पहले जहाँ चार वर्ण थे वहाँ भारत में आज लगभग पौन चार हजार जातियाँ हो गई । पिछड़ी हुई जातियों का इतिहास नि:सन्‍देह गौरवशाली रहा है अ‍तीत के पन्‍नों को बटोर कर पिछड़ी हुई जातियों में मानव की महत्‍ता, स्‍वाभिमान तथा स्‍वगरिमा जागृत करने की और ज्‍यादा जरूरत है । पिछड़ी जातियाँ सदियों से शोषित, पीड़ित और उपेक्षित रही है । उनमें आत्‍मविश्‍वास और विकास की चेतना जागृत करना आवश्‍यक है तभी उनमें आगे बढ़ने की भावना वेगवती बनेगी । सरकार द्वारा विकास के जो साधन और सुविधाएं उपलब्‍ध कराई जा रही है उसका लाभ उन्‍हें तभी मिल पाएगा जब उनमें विकास की चेतना उत्‍पन्‍न होगी । इतिहास उनकी सोई महत्ता और अतीत के गौरव को जागृत करेगा तब उनमें स्‍वविकास की प्रेरणा आएगी । इतिहास की आवश्‍यकता का अनुभव आज के युग में कई जातियाँ कर रही है । सही रूप में देखा जाय तो जो जातियाँ आज पिछड़ी हुई मानी जाती है वे उन्‍हीं शासक वर्ग के वंशजों में से हैं जो शासन सत्‍ता के विध्‍वंश हो जाने से अपने प्राणों को बचाने के लिए इन जातियों में मिल गए और जो नहीं मिले उन्‍हें गुलाम बनाकर तुर्कों के हाथ बेच डाले गए । शेष जो रहे वे अपने इतिहास और अस्तित्‍व को ही भूल गए । दूषित वर्ण व्‍यवस्‍था के कारण जिन लोगों पर इतिहास और साहित्‍य रचना का दायित्‍व था उन लोगों ने भी पिछड़ी जातियों के प्रति कभी भी उदारता का परिचय नहीं दिया । आज हम इतिहास को देखते हैं तो शासकों की नामावली तथा शौर्य गाथाओं के सिवाय कुछ नहीं मिलता । जिन लोगों पर यह दायित्‍व था उन्‍हें इतिहास में सभी वर्गों और जातियों को स्‍थान देना चाहिए था मगर संकीर्णता और पक्षपात बरात । राज्‍यों के उत्‍थान और पतन में शासक वर्ग के साथ-साथ अन्‍य जातियों का भी त्‍याग और बलिदान रहा है । मगर इतिहास के ठेकेदारों ने उन्‍हें समुचित स्‍थान देना ठीक नहीं समझा । आज जब पिछड़ी जातियों के लोग अपने पूर्वजों के गौरवपूर्ण इतिहास को कहीं से भी खोज कर सामने लाते हैं तो उसमें गौरव के साथ-साथ आक्रोश पैदा होता है कि इतने महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्‍यों को इतिहास से क्‍यों विलोपित किया गया ? आज भारत विभिन्‍न जातियों एवं संस्‍कृतियों की संगम स्‍थली है । हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव से नए-नए विचारों तथा जीवन-पद्धतियों का प्रभाव यहाँ के निवासियों पर पड़ा है । लेकिन आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की जो परम्‍परा इस देश के ज्ञात इतिहास के प्रारंभ से अब तक देखने को मिलती है, वह अविचल है, स्थिर है । भारत में जीवन-निर्वाह के बेहतर साधनों की तलाश में आर्य यहाँ आए थे, फिर धीरे-धीरे साम-दण्‍ड-भेद की नीति से मालिक बन बैठे ओर समस्त मानव जाति को कार्य की दृष्टि से चार वर्णों में विभाजित कर दिया । यह विभाजन जाति विभेद के आधार पर नहीं किया गया यह चार वर्ण इस प्रकार है : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । वेदों में कहा गया है की उस विरट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिये, सिने से वैश्य, और कमर से नीचे के भाग से शुद्र उत्पन्न हुए । इतिहास में कानू राजाओं का उल्‍लेख जानबूझकर नहीं किया गया । इसलिए कानू जाति के इतिहास का मूल स्‍वरूप और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्‍लेषण जहाँ जरूरी है, वहीं बराबरी की हैसियत प्राप्‍त करने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए, इस पर भी गहरे चिन्‍तन-मनन करने की आवश्‍यकता है । हमारे महापुरूषों ने जो रास्‍ता दिखाया है, उस पर दृढ़ प्रतिज्ञ होकर चले बिना अस्तित्‍व को बरकरार रखना संभव नहीं हो पाएगा । कानू जाति के गौरवशाली इतिहास से सबक लेकर बदलते विश्‍व परिदृश्‍य में सामूहिक प्रयासों से किस प्रकार सामाजिक प्रतिष्‍ठा और आर्थिक मजबूती प्राप्‍त करें, यह हमारी वि‍वेचना का केन्‍द्र बिन्‍दु बने, तो मंजिल की ओर महत्‍वपूर्ण कदम होगा । हमें दूसरों से भी सिखने की जरूरत है कि कम संसाधनों के बावजूद कैसे आगे बढ़ रहे हैं । दुसरों की मानसिकता बदलने के साथ-साथ अपनी कमजोरी को भी दूर करने कर ध्‍यान दिए बिना (मतलब उन्‍हे दूर किए बिना) सार्थक परिणामों की आशा नहीं की जा सकती । बौद्धिक कौशल और त्‍याग की अद्भुत मिसाल है कानू समाज । अर्वाचीन काल से ही इस समाज के लोगों ने सांस्‍कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अपनी अमीट छाप छोड़ी है । पुरे देश में अपनी छाप छोड़ने वाले साधु-संत और समाज को नई दिशा देने वाले क्रांतिकारी विचारक इस समाज की अमूल्‍य निधि है । कानू जाति को इतिहास की आवश्‍यकता अन्‍य पिछड़ी जातियों की तुलना में ज्‍यादा है । अन्‍य पिछड़ी जातियों का वर्णन तो फिर भी इतिहास में कहीं न कहीं किसी रूप में आया है मगर कानू जाति को इतिहास में आज दिन तक कहीं स्‍थान नहीं दिया गया । इतिहास के अभाव में कानू जाति न तो संगठित हो सकी और न तेज गति से विकास कर सकी । कानू जाति का इतिहास सदैव गौरवशाली रहा है । इस जाति में विद्वान संत महात्‍मा तथा समाज सुधारक हुए हैं ।कानू जाति की आदर्श परम्‍पराएं रही हैं । वर्तमान और भावी पीढ़ि को इन सब बातों की जानकारी देना नितान्‍त आवश्‍यक है । इनमें जब तक आत्‍म गौरव पैदा नहीं होगा तब तक यह जाति विकास की दौड़ में पीछे रहेगी । इसलिए एक सुव्‍यवस्थित और गौरवशाली इतिहास का होना कानू जाति के उत्‍थान के लिए अत्‍यावश्‍यक है । इस वेबसाईट में संक्षिप्‍त कानू समाज के गौरवशाली इतिहास का वर्णन दिया जा रहा है जिसका आप सभी महानुभावों को ज्ञान होना अत्‍यावश्‍यक है । जिस जाति या इन्‍सान को मिटने का अहसास नहीं होता । उस जाति व इन्‍सान का दुनियां में इतिहास नहीं होता ।।

–वर्ण व्यवस्था


आज भारत विभिन्‍न जातियों एवं संस्‍कृतियों की संगम स्‍थली है । हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव से नए-नए विचारों तथा जीवन-पद्धतियों का प्रभाव यहाँ के निवासियों पर पड़ा है । लेकिन आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की जो परम्‍परा इस देश के ज्ञात इतिहास के प्रारंभ से अब तक देखने को मिलती है, वह अविचल है, स्थिर है । आर्य बाहर से आए और उन्‍होंने यहाँ के मूलनिवासियों को हराकर अपने आचार-विचारों को उन पर थोप दिया, उनकी उन्‍नतशील सभ्‍यता और प्रकृतिवादी संस्‍कृति को नष्‍ट-भ्रष्‍ट करके एक तरह से उन्‍हें गुलामों की स्थितियों में ला दिया ।

भारत में जीवन-निर्वाह के बेहतर साधनों की तलाश में आर्य यहाँ आए थे, फिर धीरे-धीरे साम-दण्‍ड-भेद की नीति से मालिक बन बैठे ओर समस्त मानव जाति को कार्य की दृष्टि से चार वर्णों में विभाजित कर दिया । यह विभाजन जाति विभेद के आधार पर नहीं किया गया यह चार वर्ण इस प्रकार है : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । वेदों में कहा गया है की उस विरट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिये, सिने से वैश्य, और कमर से नीचे के भाग से शुद्र उत्पन्न हुए ।

मानव शरीर के विश्लेषण से पता चलता है कि हर मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र है । गले के ऊपर वाले भाग को जिसे हम सिर, मस्तक कहते है, यह भग ज्ञान-केन्द्र बिदु है । इस ज्ञान-केन्द्र को ब्रह्म भी कहते हैं । ब्रह्म अर्थात ब्राह्मण । दूसरे भाग भुजाओं और सिने को क्षत्रिय कहते हैं क्योंकि भुजाओं और सिने में सारी वीरता होती है । तीसरा भाग सीना तथा पेट आता है जो वैश्य का प्रतिनिधित्व करता है । व्यापार एवं व्यवसाय के द्वारा समस्त मानव जाति के पोषण का भार वैश्य वर्ण पर जाता है । चौथा भाग कमर के नीचे पैरों तक का शुद्र कहा जाता है ।

मनु स्मृति के अनुसार कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी । मनुष्यों में कोई छोटा या बड़ा नही होता । शरीर के सभी अंगों का अपनी अपनी जगह महत्व है । वैसे तो संसार के सभी धर्म, सम्प्रदायों में जाति-पाति का थोड़ा बहुत भेद अवश्य मिलेगा किन्तु वह भेद अहंकार, घृणा और एक-दूसरे को नीचा दिखाने कि भावना से हुआ, क्योंकि धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सभी मनुष्य समान हैं ।

अन्य जातियां संख्या में ब्राह्मण की कुल संख्या से काफी अधिक संख्या में रहे सभी इस देश के मूल निवासी थे । जिनको राजसत्ता, पाप तथा अधर्म का भय दिखाकर ही शारीरिक व मानसिक रूप से गुलाम बनाया गया । ब्राह्मण को यह भय लगा कि यदि वर्ण के आधार पर जाति की पहचान जारी रहती है तो इस आधार पर जातियां संगठित हो सकते हैं, ब्राह्मण की सत्ता को चुनौती दे सकते है, इसलिए वर्ण के आधार पर की गई पहचान को समाप्त करने की साजिश रची गई । जातियाँ आपस में घुल मिल नहीं सकें, इसके लिए शादी विवाह केवल जाति में ही किये जाने की परिपाटी डाली गई । जाति व्यवस्था को मजबूत बनाया गया । जाति के लोगों के आपसी झगड़े जैसे सम्पत्ति, उत्तराधिकार व पति-पत्नि के विवाद जाति पंचायतों द्वारा निपटाने की व्यवस्था स्थापित की । जन्म से लेकर मृत्यु तक के सारे कार्य जाति में ही सम्पन्न होने का रिवाज बन गया । लोगों ने अपनी जाति के बाहर सोचना ही बन्द कर दिया ।

जातियों को समान धरातल पर नहीं रखा । प्रत्येक जाति के लोगों की अलग-अलग बस्ती बसने लगी । बस्तियों के नाम जाति के नाम से होने लगे । जिनको अन्त्यज या अछूत माना गया उनकी बस्तियाँ दूर बसाई गई । एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों में अधिक घुले मिलें नहीं इस बात का विशेष ध्यान रखा गया। ब्राह्मण ने सभी हिन्दुओं को एक समाज के रूप में विकसित होने से रोका आज हालत यह है कि अन्य वर्ण के लोग अनेक जातियों में विभाजित हैं ।

हिन्दु समाज व्यवस्था में ऊँचे पायदान पर बैठे वर्ग ने अपने स्वार्थ के लिए धर्म को आधार बना स्वयं को समाज का अधिष्ठाता घोषित कर बहुसंख्यक वर्ग को जो यहाँ का मूल निवासी है ईश्वरीय उपदेशों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक व आर्थिक गुलामी का शिकार बना दिया ।

प्रत्येक वर्ण के लोगों के क्या कार्य या व्यवसाय होगें ? इसका निर्धारण भी ईश्वर से ही करवाया गया । ब्रह्मा, विष्णु, कृष्ण आदि ईश्वर व ईश्वर के अवतारों के माध्यम से ब्राह्मण का काम पढ़ना, पढ़ाना, धर्म का ज्ञान प्राप्त करना, दान लेना, धार्मिक अनुष्ठान करना, क्षत्रिय का काम समाज व देश की रक्षा करना, ब्राह्मण को दान देना, धार्मिक अनुष्ठान कराना, वैश्य का काम व्यवसाय व व्यापार करना तथा ब्राह्मण को दान दक्षिणा व आर्थिक सहयोग प्रदान करना व शूद्र का काम तीनों वर्णों विशेषकर ब्राह्मण की सेवा करना तय करवाये । यदि ईश्वर अथवा ईश्वर अवतारों के द्वारा चारों वर्णों के व्यवसाय, दायित्व व निर्योग्यताएँ तय नहीं करवाई जाती तो ब्राह्मणों के अलावा बाकी वर्ण के लोग इस पर आपत्ति उठा सकते थे और ऐसी स्थिति में योग्यता व्यक्ति का समाज में स्थान तय करने का मापदण्ड बनता। इसलिए सोची समझी साजिश के तहत वर्णानुसार कर्म का सिद्धान्त भी ईश्वरीय उपदेश करार दिया गया ।

आर्य ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठता को ओर मजबूत करने की नियत से यह भी तर्क दिया कि व्यक्ति पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही वर्ण में जन्म लेता है जिसके पूर्व जन्म के कर्म श्रेष्ठ होते हैं वह ब्राह्मण वर्ण में और जिसके पूर्व जन्म के कर्म अच्छे नहीं रहे जिसने पाप पूर्ण कार्य किये हों उसका जन्म निम्न वर्ण में होता है इसलिए वर्ण में जन्म होना पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है और पूर्व जन्म के कर्मों का फल समझकर जो भाग्य में लिखा है उसी प्रकार से जन्म वाले वर्ण के लिए निर्धारित कर्म करते रहना चाहिए । तभी मोक्ष संभव है ओर अगला जन्म अच्छे वर्ण में होना भी संभव है । वर्ण में उत्पत्ति को पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम करार दिये जाने से बाकी तीनो वर्णों के लोगों के पास यह विकल्प भी नहीं रहने दिया कि वे वर्तमान में अच्छे कर्म के बल पर अपना वर्ण परिवर्तित कर सकें । इस प्रकार देश के बहुसंख्यक वर्ग की सृजनशीलता, वैज्ञानिक खोज की ललक, आविष्कार की मानसिकता, प्राकृतिक विपदाओं से निजात दिलाने के लिए उपाय तलाशने की इच्छा शक्ति को समाप्त कर दिया । बाकी तीनों वर्णों, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्रों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक घोषित कर दिया और ईश्वर अवतार उत्पन्न व घोषित कर उनके माध्यम ये संदेश या उपदेश दिलवा दिया कि ज्ञान व गुण दोनों से रहित होते हुए भी ब्राह्मण पूजने योग्य है । ब्राह्मणों ने अपने आपको समाज का शिक्षक व धर्म का अधिकृत प्रवक्ता स्थापित कर लिया । उनके द्वारा पाप व दुराचरण करने पर भी उन्हें पापी व दुराचारी करार देने का अधिकार किसी को नहीं दिया ।

मनुस्मृति व अन्य धर्मशास्त्रों के अनुसार हिन्दू धर्म का सामाजिक ताना-बाना समान धरातल पर नहीं है । वर्ण-व्यवस्था में जहाँ ब्राह्मण सर्वोच्च शिखर पर स्थापित है वहीं अन्य अन्तिम पायदान पर है । प्रत्येक वर्ण के लोगों के निश्चित व्यवसाय हैं, उन्‍हें अपनी मर्जी से व्यवसाय चुनने का अधिकार नहीं है । ब्राह्मण के अलावा बाकी वर्ण के लोगों को दूसरे वर्ण के लिए निर्धारित व्यवसाय करने का अधिकार नहीं है । व्यवहार में भी समानता नहीं है, जिस प्रकार इस्लाम व ईसाइयत मे सभी व्यक्ति समान हैं उन्हें किसी भी प्रकार का व्यवसाय करने का अधिकार है उस प्रकार की व्यवसायिक स्वतंत्रता सनातन हिन्दुओं में नहीं है । आजादी के बाद भारतीय संविधान ने स्थिति को बदला है लेकिन धार्मिक अनुष्ठान कराने, मन्दिरों में सेवा पूजा करने का एकाधिकार अब भी ब्राह्मणों के ही पास है जो बिना परिश्रम का काम है । इस कार्य में किसी अन्य वर्ग का दखल नहीं है । ब्राह्मण इस बात पर कट्टिबद्ध है कि मन्दिरों में सेवा-पूजा व धार्मिक अनुष्ठान कराने के क्षेत्र में अन्य वर्ण व जातियों के लोग प्रवेश करने की हिमाकत ही नहीं कर सकें । धार्मिक अंध विश्वासों व परम्पराओं ने लोगों को पूर्णतया ब्राह्मणों पर आश्रित बना दिया है, मन्दिरों में चढ़ावा आता है हमारे देश के तत्कालीन वित्त मंत्री श्री पी. चिबंदरम ने कहा था कि देश के मन्दिरों की सालाना आमदनी सकल बजट से 60 प्रतिशत अधिक है, सारी आमदनी पर केवल ब्राह्मणों का ही एकाधिकार है इस अथाह राशि के खर्च का कोई हिसाब किताब नहीं है मेरे विचार में यह राशि आम लोगों की है इसलिए यदि इस अथाह धनराशि को शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर खर्च किया जाये तो यह देश स्वास्थ्य की दृष्टि से तन्दुरस्त व शिक्षा की दृष्टि से बौद्धिक व कुशल राष्ट्र की श्रेणी में आ सकता है । चर्च की आमदनी जनकल्याण कारी योजनाओं पर खर्च हेाती है इस्लाम में भी जक़ात जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं पर धर्मादा राशि खर्च होती है लेकिन हिन्दू धर्म के मन्दिरों की आमदनी को केवल एक वर्ण विशेष के लोग ही डकार रहे हैं फिर भी सुदामा कहलाते हैं । आमदनी का ब्यौरा व लेखा जोखा नहीं होने से यदि सर्वे कराया जाये तो साढे तीन करोड़ में से लगभग एक करोड़ ब्राह्मण बी.पी.एल. कार्ड धारक मिल जायेंगे इस प्रकार देश के वंचित व उपेक्षित वर्ग का हक ओर मार रहे हैं इसलिए इस धर्म आधारित आरक्षण को समाप्त किए बिना स्वतंत्रता व समानता का कोई महत्व नहीं है । परम संत शिरोमणी गुरू बाबा गणिनाथ जी ने ऐसे राज की कामना करते हुए एक पद की रचना कि जिसमें काई भूखा न रहे और छोटे-बड़े का भेदभाव भुलाकर सभी मिल-जुलकर रहे ।

भारत में जाति तोड़ो आ‍न्‍दोलन की चर्चा आज के इस आधुनिक युग की नई युवा पीढ़ि के द्वारा बहुत जोर शोर के साथ की जाती है, लेकिन जाति की दीवारें टूटने की बजाय ओर अधिक मजबूत होती जा रही है, क्‍योंकि भारत देश की राजनीति जो सभी तालों की चाबी है, इस राजनीति में प्रवेश के लिए टिकीट की आवश्‍यकता होती है ओर उस टिकीट के लिए प्राथमिकता उसकी जाति के लोगों की संख्‍या के आधार पर दी जाती है । हमारे राष्‍ट्रीय स्‍तर के कई नेता इस बात को खुले आम स्‍वीकार भी कर चुके है कि भारत के इस समाज में ब्‍याह-शादी और राजनीति का प्रमुख स्‍तंभ जाति ही है । लेकिन अब धीरे-धीरे इस युवा पीढ़ि में जाति की प्रासंगिकता कम होती जा रही है । यह तर्क भी अपने आप में वजन तो रखता ही है कि सोच का स्‍तर जाति से ऊपर उठकर होना चाहिए, राष्‍ट्र की बेहतरी की बात सोचनी चाहिए , लेकिन जो जातियाँ, सामाजिक और आर्थिक रूप से सदियों से पिछड़ी चली आ रही हैं, उन्‍हें मूलभूत सुविधाएँ उपलब्‍ध नहीं है, उन्‍हें बराबर का इन्‍सान नहीं समझा जाता है, उनकी बेहतरी के लिए राष्‍ट्रवादी विचार-धारा वाले लोगों को भी आगे आना चाहिए, क्‍योंकि वे भी इसी देश के नागरिक है, उन्‍हें भी दूसरों की तरह तन ढंकने के लिए कपड़ा, खाने के लिए दो वक्‍त की रोटी और रहने के लिए एक छत की जरूरत है, और साथ ही बराबरी का सम्‍मान मिलना चाहिए । समाज के ऊँचे कद वाले लोगों और आज के नये युग के आ‍धुनिक विचार धारा वाले लोगों को इसके लिए बाध्‍य तो नहीं किया जा सकता है लेकिन जो लोग इसी दलदल से निकलकर बाहर आए हैं और आज अच्‍छे सामाजिक परिवेश में सुख-सुविधाओं से युक्‍त जीवन-यापन कर रहे हैं, उन्‍हें उनके बारे में थोड़ा-बहुत तो सोचना ही चाहिए । लेकिन क्‍या करे यह तो मानव स्‍वभाव ही है कि लोग अधिकतर अपने बारे में ही सोचता है, और आदमी अगर ऊपर पहुँच जाये तो वह नीचे वालों के बारे में सोचना बन्‍द कर देता है, लेकिन वही आदमी जब नीचे था तब वह यह सोचा करता था कि ऊपर वाले लोग हमारे बारे में क्‍यों नही सोचते ! लेकिन इन ऊँचे पदों पर बेठे हुए प्रगतिशील व्‍यक्तियों का ये सामाजिक दायित्‍व बनता है कि वे अपनी कौम से संबंध रखने वाले गरीब लोगों के लिए काम करना अपनी पहली प्राथमिकता समझे ।

–कानू समाज वंशावली


-बाबा गणिनाथ वंशावली


–कानू (हलुवाई) जाति के गोत्र, इष्टदेव एवं कुलदेव

कानू (हलुवाई) जाति कश्यप गोत्र के माने जाते हैं । हलुवाई अपने इष्टदेव के रूप में मोदनसेन, यज्ञसेन, गणीनाथ तथा अन्य विभुतियों को पुजते हैं । वे विभिन्न देवी–देवता के रूप में गणपति, सूर्य, अग्नि, काली बन्दी का आराधना करते हैं । मूलतः हलुवाई के वंशज तीन सांस्कृतिक समूहों में होने का वर्णन अखिल भारतीय वैश्य हलवाई महासभा के वेबसाइट पर पाया गया है । मोदनसेनी हलुवाई मोदनसेन जी महाराज को, यज्ञसेनी हलुवाई यज्ञसेन जी महाराज को तथा मधेशी हलुवाई गणीनाथ जी महाराज से अपना वंश वृक्ष जुड़ा होने का विश्वास करते हैं । मोदनसेन जी कान्यकुब्ज (कन्नौज, उत्तरप्रदेश) में अवतरित हुए । यज्ञसेन जी बिठूर कानपुर (उत्तर प्रदेश) में अवतरित हुए । गणीनाथ जी गुरलामान्धता पर्वत पलवैया (बिहार) में अवतरित हुए । इसी क्षेत्रीय धरातल पर इनके वंशजों का विस्तार हुआ । अर्थात गणीनाथ, मोदनसेन और यज्ञसेन जी महराज तीनों समूह के कुलदेवता के रूप में पूजित होने का वर्णन पाया जाता हैं ।

वैश्य वंशवृक्ष की जड़ में मूल देवता भलनन्दन जी महाराज हैं । उपर अंकित श्लाकों के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा के उरू देश से उत्पन्न भलनन्दन के पौत्र के रूप में मोदन उत्पन्न हुए । प्रजापति के द्वारा आयोजित यज्ञ में मोदनसेन जी महाराज को खाद्य–व्यवसायी (हलवाई) का चरित्र प्रदान किया गया उल्लेख होने से उनका वंशज मोदनसेनी (मोदनसेनी हलवाई) कहलाए । उसी तरह राजा दक्ष के यज्ञ के क्रम में यज्ञसेन उत्पन्न हुए । यज्ञसेन के वंशजो द्वारा यज्ञ–निर्मित पदार्थों को व्यापार करने के कारण यज्ञसेनी (यज्ञसेनी हलवाई) कहलाए । संत गणीनाथ एघारवीं सदी में उत्पन्न हुए । वे शिव की अवतार कहलाते हैं । गणीनाथ जी का पिता मनसा राम जी हलुवाई के १४ कुलदेवों में पूजित हैं । आस्था के आधार पर हलवाई जाति में कुलदेवता निम्न प्रकार हैं —

१. हलवाई (मोदनवाल) ः मोदनसेन जी महाराज

२. हलवाई (यज्ञसेनी) ः यज्ञसेन जी महाराज

३. कानू हलवाई ः गणीनाथ जी महाराज

४. कान्य कुब्ज वैश्य (भूर्जि) ः बाबा पलटू दास

५. भौज्य हलवाई ः चन्द्रदेव जी महाराज

६. क्रोंच हलवाई ः कंकाली बाबा

७. गुडिया वैश्य ः यह घटक उड़ीसा प्रान्त में गुड का व्यवसाय और गुड की स्वादिष्ट मिष्ठान बनाने का कार्य करते हैं ।

मोदनसेन जी महाराज

आदि काल में प्रजापति ब्रह्मा के द्वारा विश्व कल्याण के लिए सभी देवी–देवता, ऋषि सम्मिलित महायज्ञ आयोजन किया गया । यज्ञ में मोदनसेन जी पर भोजन व्यवस्था का दायित्व था । भांती भांती के व्यञ्जन और मिष्ठान बनाकर यज्ञजनों को सन्तुष्ट करने के कारण उनको इस कार्य (पाकशास्त्र) के आचार्य घोषित किया गया । बाद में उनके वंशज इसी चक्र द्वारा संसार में फैले । मोदनसेन जी महाराज भलनन्दन जी की चौथी पीढ़ी में तथा उनके पूवर्ज मनु महाराज से सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुये थे । आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व श्री मोदनसेन जी महाराज की जयन्ती कार्तिक शुक्ल (अक्षय नवमी) को मनाने की परम्परा मिली है ।

यज्ञसेन जी महाराज

प्रजापति दक्ष के यज्ञ के समय महर्षि भृगु ने ऋचाओं के गायन–आवाहन के साथ, ज्योंही यज्ञकुण्ड की दक्षिणाग्नि में घृताहुति दी, त्योंही यज्ञाग्नि से तप्त स्वर्ण की सी कांति लिऐ एक यज्ञ पुरुष प्रकट हुए । यह यज्ञ पुरुष कस्तुरी मृगों से जुते हुए, दिग्विजयी रथ पर आरूढ़, मणिमुकुटों को धारण किये हुए थे । उन्हें महर्षि मृगु ने ऋभु यज्ञसेन नाम से सम्बोधित किया । यज्ञसेन का विवाह ऋषिपुत्री दक्षिणा से हुआ और उनके ९२ पुत्ररत्न हुए । जो यज्ञ–निर्मित पदार्थों को बनाते व व्यापार करते थे । पुराण के प्रथम अंक के सातवें अध्याय के श्लोक ९३ से २९ तक यज्ञसेन वंश का वर्णन मिलता है । यज्ञसेन महाराज के वंशजो को यज्ञसेनी हलुवाई कहा जाता है । यज्ञसेन जी गुरु पूर्णिमा को अवतरित हुए थे । यज्ञसेन जी का उद्भव कहाँ हुआ था इस विषय में मंगली प्रसाद गुप्त ने लिखा है कि ‘बिठूर, जिला कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुए थे ।’ कुछ लोगों का मत है कि कानपुर से कुछ किलोमिटर दूर गंगा–तट पर जाजमऊ में हुये थे । तिसरा मत यह है कि यज्ञसेन जी महाराज मथुरा में हुये थे । कुछ का मत है कि यज्ञपुर तीर्थ (बिहार–उड़िसा) में हुये थे । इनमें बिठूर (कानपुर) ही ठीक प्रतीत होता है, यहाँ यज्ञ कीलक (कीलों) ब्रह्मशिला है, जहाँ पर यज्ञसेन महाराज ने एक महान यज्ञ किया था ।

गणीनाथ जी महाराज

वैशाली (बिहार ) की धरती मानवता के लिए अपने सर्वश्रेष्ठ योगदानो के लिए जानी जाती है . लोकतंत्र की जननी होने से लेकर वर्द्धमान महावीर की जन्मभूमि तथा गौतम वुद्ध की कर्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है . कलांतर में उसी क्रम में संत प्रवर बाबा गणीनाथ जी महाराज की चरण धूलि से पवित्र होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था .संत गणीनाथ जी का अवतरण भाद्र कृष्ण पक्छ जन्माष्टमी के बाद आगत शनिवार को वैशाली जिला के पलवैया नामक स्थान पर हुआ था .

भगवान शिव के मानस पुत्र अवतारी श्री गणीनाथ जी महाराज के पालक पिता और माता का नाम क्रमशः श्री मनसा राम साह एवं श्रीमती पनमतिया या पून्यमती था जो जाति के कानू थे . श्री गनिनाथ जी महाराज की शादी खेमा सती ( छेमा सती ) देवी के संग हुआ था , जिनसे तिन पुत्र -श्री गोविन्द जी महाराज ( बाल ब्रहमचारी) , श्री रायचंद्र राय जी , श्री श्रीधर राय जी थे तथा शीलमती `और सोनमती नामक दो पुत्रिया थी .गृहस्थ जीवन में होने के बावजूद भी श्री गनिनाथ जी का अवतरण लोक कल्याण तथा परम मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु था .उन्होंने अपनी आलौकिक शक्तियों से ना केवल समाज में व्याप्त बुराइयो को संवर्द्धन किया बल्कि साथ -साथ समाज में व्याधिग्रस्त तथा असाध्य रोगों से व्यथित लोगो का काया कल्प किया . स्थानीय राजा धरमपाल की आँखों की ज्योति और उसके एकलौते पुत्र की सर्पदंश से मृत्यु पश्चात भी जीवित होने की चमत्कार से प्रभावित होकर पलवैया राज उपहार स्वरूप श्री गनिनाथ जी महाराज को देने का चर्चा मिलाता है . बिहार राज्य के विभिन्न भाषाओ के लोक गीतों, लोक कथाओ में बाबा की महिमा , चमत्कार , जीवन लीला , पुत्रो की शौर्य -पराक्रम, उनके विवाह और लाल खान से युद्ध का चर्चा मगही, भोजपुरी , मैथली , अंगिका में विस्तृत रूप में है .

बाबा गनिनाथ जी महाराज ने अपने राज्य में कृषि ,गौ – रकछा और वाणिज्य विकाश पर बल दिया . वे तन्त्र मन्त्र , योग विदध्या , वेद तत्वों के मर्मग्य ज्ञाता , कुशल ज्ञानी और सैन्य संचालन में निपूर्ण थे . वे महान कर्मयोगी , संत- महात्मा, साधक , योगिधिराज़ और क्रन्तिकारी समाज सुधारक थे . धर्म की रक्छा के लिए शस्त्र उठाकर आतातायियो को परास्तकर तत्कालीन समाज को त्राण दिलाया वही सत हृदय का परिचय देते हुए युद्ध में बंदी लाल खान जैसे मुख्य आततायी का हृदय परिवर्तन कर अपना मुख्य सिपाहसलार ( शिष्य ) बना लिया . बाबा गनिनाथ जी ने कानू या मद्धेशिय वैश्य में मूल डीह का सरचना कर वर्ण संकट के दोष से उबरा . इस प्रकार संत शिरोमणि श्री गनिनाथ जी ने भारत के महान संत परंपरा के उच्चतम जीवन मूल्यों को पुनर्जीवित किया . बाबा गनिनाथ जी ने सभी जाति, वर्णो धर्मो के भेदभाव को भुलाकर मानवता के आदर्श का पाठ पढाया और जन कल्याण की सेवा में अपना जीवन को परित्याग किया . आज भी श्री गनिनाथ जी की पूजा कूल देवता के रूप में किया जाता है और उनकी भक्तो की संख्या करोडो से उपर भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशो के अतिरिक्त नेपाल, वर्मा ,बंगला देश आदि देशो में फैले हुये .

समाज के कुछ व्यक्तियों को बाबा गनिनाथ जी को नाथ संप्रदाय से जूडा ने का भ्रम डाला जा रहा है, जो जन भावनाओ, कूल देवता के प्रति आस्था और इतिहास के प्रति अन्याय है . यह सत्य है की नाथ सम्प्रदाय में गहनी नाथ नामक महान संत हुए जो नवो नाथ में से एक नाथ थे, उनके नाम के साथ आंशिक उच्चारण की समानतावश लोग गनिनाथ और गहनिनाथ को भूल या अज्ञानता वश एक मान कर चर्चा कर देते है. इस सन्दर्भ में लगभग अधिसंख्य समाज के इतिहासकारों , विद्वतजनों ने अपनी- अपनी लेखो, पुस्तकों में बाबा गनिनाथ जी को नाथ संप्रदाय से अलग माना है . इस संदरभ्य में मेरी समाज के कई बुजुर्गो , भक्तो और इतिहास के ज्ञाताओ से बात हुआ जिसमे श्री भोला नाथ “ मधुकर “ बाबा गनिनाथ उपन्यास के रचयिता, श्री गंगा प्रसाद आजाद सतमाल पुरी जी, कामेश्वर प्रसाद जी , डा पुष्पा गुप्ता , प्रध्यापक व सहयोगी डा सरोज प्रधान द्वारा रचित अन्वेषण पुस्तिका बाबा गनिनाथ , स्वय डा सरोज प्रधान जी , पलावैया धाम के मुख्य पंडा जी, बिभिन्न स्मारिकाओ, अपनी वाणी के मुख्य सम्पादक स्व रामावतार गुप्ता द्वारा आलेख , लोक गीतों ( मगही,भोजपुरी, मैथली, ब्रज्जिका , अंगिका ) में बाबा गनिनाथ जी के जीवन गाथाओ, आदि से बाबा गनिनाथ जी के जीवन चरित्र का सजीव वर्णन मिलता है.

–कानू (हलवाई )शब्द की उत्पति

हलवाई भारत में मिष्ठान बनाने वाले को कहते हैं। हलवाई भारत और पकिस्तान में एक जाति हैं जिनका मिठाईयों का पारंपरिक व्यवसाय होता हैं। अरबी शब्द हलवा, जिसका अर्थ मिठाई होता हैं, से हलवाई शब्द की उत्पत्ति मानी जाती हैं। हलवाई शब्द प्रसिद्द भारतीय मिष्ठान हलवा से लिया गया हैं। हलवाई हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म में पाया जाता हैं। मोदनवाल, कांदु, आदि हलवाई समुदाय द्वारा प्रयोग किया जाने वाला उपनाम हैं।

फिल्म में बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण स्टारिंग फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में शाहरुख खान, राहुल नामक हलवाई के किरदार में थे। जिसमे दीपिका पादुकोण (मीना के किरदार में) “डोंट अंडरएस्टीमेट द पॉवर ऑफ़ हलवाई” डायलॉग बोलते हुई दिखी।

–कानू (हलुवाई) जाति का विस्तार

आदि पुरुष श्री मोदनसेन महाराजा के वंशावली सम्बद्ध ग्रन्थों के अनुसार वैश्यों की ३५२ उपजातियां तथा १४४४ ग्रन्थों की संख्या बताई गई है । कानू (हलुवाई) जाति आज संसार भर में फेले हैं । परन्तु इस जाति का उद्गमस्थल कहाँ है ? कुलपुरुष मोदन जी ने अपना वंश पृथ्वी के किस खण्ड से विस्तार किया ? महाराज भलनन्दन जी कान्यकुब्ज देशाधिपति थे । जिनकी राजधानी महोदयपुरी थी । जो अब कन्नौज के रूप में जानी जाती है और यह उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत पड़ता है । अस्तु मोदनसेन का विस्तार कान्यकुब्ज देश से हुआ । कालान्तर में मोदन वंशीय वैश्यों का कई वर्ग और उपवर्ग बना ।

यज्ञसेन जी का वंशज कान्यकुब्ज से निचे कानपुर क्षेत्र से हुआ और गणीनाथ जी का वंशज उससे निचे पटना आसपास से चारो ओर फैले । वैश्विक आप्रवासन का प्रभाव इन पर भी पड़ा । और हजारौं वर्ष के दौरान ये संसार भर फैले । कानू (हलुवाई) जाति का कान्यकुब्ज देश से लेकर मध्यदेशीय जनपदों तक का प्राचीन बसोवास आज भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बंगलादेश में बटा हुआ है । नेपाल के मधेशी हलुवाई साह, साहु, साउ, गुप्ता, दास सरनेम से जाने जाते हैं । हलुवाई जाति भारत के विहार, वंगाल, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मगध, कन्नौज आदि क्षेत्र से ताल्लुक रखता है । उत्तर प्रदेश में मोदनवाल, यज्ञसेनी, हलुवाई, गुप्ता, पंजाव मे कम्बोज, अडोडा, उडिसा में गुडिया, पश्चिम बंगाल मे मायरा, दास टाइटल से जाने जाते हैं । इनका अभी तक ९–१० उप समूह देखा गया है । जैसे मधेशीया, मोदनसेनी, कान्यकुब्ज, यज्ञसेनी, मघिया, जैनपुरी, कानवो, कैथिया, नगारी, रावतपुरिया, बदशाही । इनकी भाषा क्षेत्र के आधार पर हिन्दी, मैथिली, बंगाली, अवधी, भोजपुरी रहा है । नेपाल मे हिमाली जिला को छोडकर महाभारत पहाड़ एवं तराई भूभाग के प्रायः सभी जगह इनकी कहीं सघन तो कहीं अल्प उपस्थिति पाया जाता है । फिर भी पूर्वी तराई के जिलों में तुलनात्मक रूप में अधिक जनसंख्या पाया जाता है । नेपाल में हलुवाई जाति सामाजिक–पिछड़ेपन एवं विभेद का सिकार हैं । सामाजिक चेतना की कमी के कारण यह अपनी मानवीय मूल्य, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक गौरव, राजकीय अवसर, व्यावसायिक संरक्षण सर्वपक्षीय हक और अधिकार से वञ्चित हैं ।

-गोत्रों का महत्व एवं उत्पति

गोत्र की परिभाषा :- गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है । यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है ।

गोत्रों का महत्व :- जाति की तरह गोत्रों का भी अपना महत्‍व है ।


1. गोत्रों से व्‍यक्ति और वंश की पहचान होती है ।
2. गोत्रों से व्‍यक्ति के रिश्‍तों की पहचान होती है ।
3. रिश्‍ता तय करते समय गोत्रों को टालने में सुविधा रहती है ।
4. गोत्रों से निकटता स्‍थापित होती है और भाईचारा बढ़ता है ।
5. गोत्रों के इतिहास से व्‍यक्ति गौरवान्वित महसूस करता है और प्रेरणा लेता है ।

गोत्रों की उत्‍पत्ति- हिन्दू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए गए है । ये किसी न किसी गाँव, पेड़, जानवर, नदियों, व्यक्ति के नाम, ॠषियों के नाम, फूलों या कुलदेवी के नाम पर बनाए गए है । गोत्रों की उत्‍पत्ति कैसे हुई इस सम्‍बंध में धार्मिक ग्रन्‍थों एवं समाजशास्त्रियों के अध्‍ययन का सहारा लेना पड़ेगा ।

धार्मिक आधार- महाभारत के शान्‍तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे- अंग्रिश, कश्‍यप, वशिष्‍ठ तथा भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्‍वामित्र तथा अगस्‍त्‍य के नाम जुड़ गए । गोत्रों की प्रमुखता उस काल में बढी जब जाति व्‍यवस्‍था कठोर हो गई और लोगों को यह विश्‍वास हो गया कि सभी ऋषि ब्राह्मण थे । उस काल में ब्राह्मण ही अपनी उत्‍पत्ति उन ऋषियों से होने का दावा कर सकते थे । इस प्रकार किसी ब्राह्मण का अपना कोई परिवार, वंश या गोत्र नहीं होता था । एक क्षत्रिय या वैश्‍य यज्ञ के समय अपने पुरोहित के गोत्र के नाम का उच्‍चारण करता था । अत: सभी स्‍वर्ण जातियों के गोत्रों के नाम पुरोहितों तथा ब्राह्मणों के गोत्रों के नाम से प्रचलित हुए । शूद्रों को छोड़कर अन्‍य सभी जातियों जिनको यज्ञ में भाग लेने का अधिकार था उनके गोत्र भी ब्राह्मणों के ही गोत्र होते थे । गोत्रों की समानता का यही मुख्‍य कारण है । शूद्र जिस ब्राह्मण और क्षत्रिय परिवार का परम्‍परागत अनन्‍तकाल त‍क सेवा करते रहे उन्‍होंने भी उन्‍हीं ब्राह्मणों और क्षत्रियों के गोत्र अपना लिए । इसी कारण विभिन्‍न आर्य और अनार्य जातियों तथा वर्णों के गोत्रों में समानता पाई जाती है । भाटी, पंवार, परिहार, सोलंकी, सिसोदिया तथा चौहान राजपूतों, मालियों, सरगरों तथा मेघवालों आदि कई जातियों में मिलना सामान्‍य बात है । सारांश में पुरोहितों तथा क्षत्रियों के परिवारों की जिन जातियों ने पीढ़ि सेवा की उनके गोत्र भी पुरोहितों और क्षत्रियों के समान हो गए । राजघरानों के रसोई का कार्य करने वाले सूद तथा कपड़े धोने का कार्य करने वाले धोबियों के गोत्र इसी वजह से राजपूतों से मिलते हैं । लम्‍बे समय तक एक साथ रहने से भी जातियों के गोत्रों में समानता आई ।

समाजशास्त्रिय आधार- समाजशास्त्रियों ने सभी जातियों के गोत्रों की उत्‍पत्ति के निम्‍न आधार बताए हैं-
1. परिवार के मूल निवास स्‍थान के नाम से गोत्रों का नामकरण हुआ ।
2. कबीला के मुखिया के नाम से गोत्र बने ।
3. परिवार के इष्‍ट देव या देवी के नाम से गोत्र प्रचलित हुए ।
4. कबिलों के महत्‍वपूर्ण वृक्ष या पशु-पक्षियों के नाम से गोत्र बने ।

समाजशास्त्रियों द्वारा उपरोक्‍त बताए गए गोत्रों की उत्‍पत्ति के आधार बहुत ही महत्‍वपूर्ण है । सभी जातियों के गोत्रों की उत्‍पत्ति उपरोक्‍त आधारों पर ही हुई है ।

–बीसवीं शताब्दी के पूर्व कानू समाज

भारत वर्ष के मानवीय भूगोल कर्म प्रधान रहा है । कर्म या व्यवसाय के आधार पर आज भी व्यक्ति व उनका सन्तती सम्बोधित होता है । किसी खास कर्म–व्यवसाय में संलिप्त व्यक्ति, परिवार और विस्तारित पारीवारिक संगठनों ने जातीय–संज्ञा प्राप्त की ।

देश, काल और परिस्थिति की धरातल पर सम्पूर्ण मानवीय समाज को कर्म–व्यवसाय के आधार पर चार वर्ण में वर्गीकृत कर जातीय संरचना का निर्माण हुआ । ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र । ईन चार वर्णों के भितर विभिन्न जाति एवं उपजाति विकसित हुआ । इन्हीं वर्ण एवं जातीय संरचना में वैश्य वर्ण अन्तर्गत हलवाई जाति बना । हलवाई को नेपाल में हलुवाई बोला जाता है । हलवाई का पृष्ठभूमि, चरित्र, जीवन और आजीविका ‘अन्न एवं अन्य फसल उगाना, उन पदार्थाें का पाककला के माध्यम से स्वादिष्ट व्यञ्जन और मिष्टान बनाना तथा देवी–देवता, ऋषि–मुनि, पितृ एवं समस्त समाज की क्षुधा को तृप्त करने’ जैसे सर्वाधिक प्राचीन सामाजिक आयाम और प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है । हमारा बहुत पिछला जीवन कबिलाई संस्कृति से जुड़ा हुआ है । कदाचित उन समूहों मे भोजन–प्रभारी (या समूह) भी जाति विशेष के रूप में सम्बोधित होते थे । हमें हमारी आदिम इतिहास, संस्कृति और पहचान पर गर्व है । हम अपनी विशिष्टताओं का स्मरण कर रोमाञ्चित होते हैं । और, यदाकदा टूटी–फूटी जातीय इतिहास और अशिक्षा–गरिबी से ग्रस्त अपने कुटुम्बों की बद्हाली देखकर दुःखी भी होते हैं ।

सम्भवतः इतिहासकारों ने जितनी सजगता एवं तत्परता राजवंशो के इतिहास लेखन में दिखाई है, उतनी जातीय इतिहास लेखन में नहीं । यही कारण है कि जातीय एवं उपजातीय इतिहास विशुद्ध रूप से सामने नहीं आ पाया है । यह खुशी की बात है कि सदियों से शोषित, पीडित, उपेक्षित आम जातियों में २० वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जातीय जागरण का श्री गणेश हुआ और वर्तमान दौर में यह एक उचाइ पर है । सांस्कृतिक जिज्ञासा, पहचान और समान जातीय महता की खोज तीव्र रूप में बढ़ गया है । हलवाई जाति भी इससे अछुता नहीं है ।

भारतीय वाङमय के अनुसार मोदनसेन जी महाराज, यज्ञसेन जी महाराज, गणीनाथ जी महाराज तथा महान संत पलटु दास एवं महाकवि जय शंकर प्रसाद जैसे वैश्य–हलुवाई जाति की महानतम विभुति इस समाज के नहीं बल्कि विश्व के गौरव हैं ।

हलुवाई जाति का प्रादुर्भाव और इतिहास की बातें वेदकाल से लेकर वर्तमान काल खण्डों तक विभिनन समय में सिर्जित यजुर्वेद (अध्याय–३२ सुक्ति–१२), अथर्ववेद गरुड़ पुराण (अध्याय ४४ क–१८), वराहपुराण, मनुस्मृति, गर्ग संहिता (खण्ड–७ अध्याय–८), वर्णविवेक चन्द्रिका, वर्ण विवेकसार जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों में उल्लेख है । आधुनिक काल में विभिन्न विद्वानों द्वारा हलुवाई जाति पर शोध कर विभिन्न ग्रन्थ, शोधपुस्तक, इन्टरनेट प्रकाशित किया गया है । शताब्दी पूर्व स्थापित अखिल भारतीय वैश्य हलवाई महासभा से लेकर उसके बाद विभिन्न काल में विभिन्न स्थान पर स्थापित संघ–संगठनों ने जाति एकीकरण का प्रयास किया है, जातीय इतिहास और संस्कृति का अध्ययन कर प्रसारित किया है और आधुनिक राज्य व्यवस्था में जातीय हिस्सा प्राप्त करने में क्रियाशील हैं ।

‘वर्णविवेक चन्द्रिका’ में सृष्टि का उत्पत्ति क्रम दिखाते हुए वैश्यों की उत्पत्ति और बाद में हलुवाई वैश्यों की उत्पत्ति का वर्णन निम्न लिखित अनुसार है —

देव देव महादेव लोकानां हितकाकार ।

वर्णानामाश्रमाणां च संकाराणां तथैवच ।।

उत्पत्तिं श्रोतु मिच्छासि विस्तरेण कृपानिधे ।

कृया तृत्या महादेव, फलौ तिष्ठेच मानावः ।।

अर्थात— ‘श्री पार्वती जी ने देवों के देव श्री महादेव जी से पूछा कि हे कृपानिधे ! मनुष्यों के वर्ण, आश्रम, उत्पत्ति तथा संकरों के भेद क्या है ? कृपया लोकों के हित के लिए विस्तार पूर्वक कहिये ।’ इस पर श्री महादेव जी ने कहा—

श्रृणु देवी प्रवक्ष्यामि जातीनांच विनिर्णयम् ।

अव्यक्ताच समुत्पन्ना ब्रह्मविष्णु महेश्वराः ।।

ब्राह्मण निर्मिता वर्णामुख बाहुरूपादतः ।

ब्राह्मणः क्षत्रियों वैश्यः शूद्रश्रैव यथा क्रमम ।।

अर्थात— ‘हे देवी ! सुनो ! जातियों का विवरण इस तरह है कि, पहले अव्यक्त यज्ञ से ब्रह्मा, विष्णु , महेश्वर उद्धत हुए । फिर प्रजापति (ब्रह्मा) ने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रीय, उरू से वैश्य और पाद से शूद्र वर्ण रचे ।’ फिर

मरीचिरत्र्यंगिरसौ पुलस्यः पुलहः क्रतुः ।

भृगुर्वशिष्ठ श्रयवो नारदो दक्ष एच च ।।

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठिताः ।

वेदाध्ययन सम्पन्ना स्त्रिषु वर्णाषु पूजिताः ।।

अर्थात— मरीचि, अंगिरा, पुलस्य, पुलह, क्रत, भृगु, वशिष्ठ, श्रयव, नारद और दक्ष के पुत्र प्रभृति से ब्राह्मणों का वंश चला । और ये, वेदादि से सम्पन्न तीनों वर्णो से पूजित और गोत्रकार ऋषि हुए । और —

ब्राह्मणो बाहु देशाश्च मनुः स्वायंम्भुवोऽभवत् ।

वाम वाहोः समुत्पन्नां शतरूपा पतिव्रताः ।।

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च क्षत्रवंशे प्रतिष्ठिताः ।

चतुर्दशमनूनां च वंशास्ते क्षत्र जातयः ।।

अर्थात— प्रजापति के दाहिने बाहु देश से स्वायम्भुवमनु तथा बाहु से उनकी स्त्री शतरूपा नास्त्री उत्पनन हुई । इनके पुत्र पौत्र प्रभृति क्षत्रीय वंश के प्रतिष्ठित हुए ।

इसके बाद —

अरूदेशात्समुतपन्नों ब्राह्मणः प्राणवल्लभे ।

भलनदनेति विख्यातस्तस्य पत्नी मरूत्वति ।।

वत्समीति सुतस्तस्य प्रांशुस्तस्याऽभवनसुतः ।

प्राशोः पुत्राः षडासन्वै तेषां नामानिमे श्रृणु ।।

मोदः प्रमोदो बालश्च मोदनश्च प्रमर्दनः ।

शंकुकर्णेति विख्यातस्तेषां कर्म पृथक् पृथक ।।

अर्थात— प्रजापति के उरू देश से वैश्यों के मूलपुरुष भलनन्दन और उनकी स्त्री मरूत्वती नाम से पैदा हुई । इनके पुत्र वत्सप्रीति, वतसप्रीति से प्रांशु हुए । प्रांशु के छः पुत्र हुए जिनका नाम क्रमशः मोद, प्रमोद, बाल, मोदन, प्रमर्दन, शंकु और कर्ण हुआ । इनके कर्म भी पृथक पृथक हुए ।

मोदनस्य च वंशाये मोदकानां प्रकारकाः ।

वैश्य वृत्ति समाश्रित्य संजाताः पृथिवीतले ।।

अर्थात— मोदन के वंश में, मोदक (लड्डू) आदि का व्यवसाय करने वाले— वैश्य उत्पन्न हुए । जो कि इस वैश्य वृत्ति के द्वारा संसार में फैले । वर्णविवेक चन्द्रिका के अनुसार भलनन्दन और मरूत्वती नाम से उत्पन्न मोदन से हलुवाई जाति की विकास हुई ।

जिस तरह माली द्वारा तोडा गया फूल, डोम द्वारा बनाया गया बा“स का वर्तन, कुम्हार द्वारा बनाया गया मिट्टी का वर्तन धर्म कार्य हेतु शुद्ध माना गया हैं, उसी तरह सिर्फ हलुवाई द्वारा बनायी गई नेवैद्य ही देवी देवता को अर्पण करने के लिए शुद्ध माना गया हैं ।

मोदनसेन, मोदक और मोदनवाल

मोदनसेन महाराजा के बाद व्यञ्जन÷मिष्ठानादि के लिए जातीय कर्म में निरूपित हुए । उनका मूल नाम ‘मोदन’ से मोदक शब्द बना जिसका तात्पर्य सर्वोत्कृष्ठ मिष्ठान्न होता है । संस्कृति में ‘मोदक’ शब्द का अर्थ इस प्रकार दर्शाया गया है— मुद वर्ष ददति मोदक यानि जो सबको आनन्दित करें । मोद से ही मधु अर्थात मिठा होता है । उसी तरह मोदन का अर्थ बताया गया है— जिसमें सबको आनन्दित करने की क्षमता निहित हो । इस तरह संस्कृत के भावार्थ में ‘मोदन’ एक व्यक्तित्व के रूप में और ‘मोदक’ एक वस्तु के रूप में प्रतीत होता है ।

मोदक को बोलचाल में लड्डु कहते हैं । एभयउभि न्चयगउक क्ष्लमष्बके वेवसाइट के अनुसार मिष्ठान बनाने बाले हलुवाई प्रथम पुजीत भगवान् श्री गणेश जी का प्रिय भोजन मोदक (लड्डु) बनाने वाले के नाम से जाने जाते हैं । इसिलिए मोदक बनाने वाले मोदनवाल के रूप में परिचित हैं । आटा, चिनी, घी, बदाम, पिस्ता और केशर के मिश्रण से बनने वाला स्वादिष्ट मिष्टान्न ‘हलवा’ बनाने वाले को हलवाई कहा गया है ।

किन्तु अखिल भारतीय वैश्य हलवाई महासभा (भदोही, संतकवीरनगर, उत्तरप्रदेश) इस बात से सहमत नहीं है । महासभा की शताब्दी प्रवाह स्मारिका के अनुसार एक मात्र ‘हलवा’ से ‘हलवाई’ समझना उचित नहीं है । क्यों कि हलवा शब्द यहाँ का नहीं है— अरब आदि यवन देशों का है । यहाँ इस तरह के मिष्ठान को ‘मोहनभोग’ कहा जाता है । हलुवाई शब्द हलवा बनाने को लेकर नहीं, बल्कि ‘हलवाही’ शब्द अपभ्रंश होकर हलवाई हुआ जिसका तात्पर्य हल जोतना होता है । हलवाही कर अन्न उगाना और उसका मोदक आदि मिष्ठान सहित विभिन्न व्यञ्जन बनाने के कारण ये हलवाई तथा मोदनवाल आदि शब्दों से परिचित हुए । ‘वाल’ शब्द समूह वाचक है । संस्कृत में इसका अर्थ है— वृक्ष । ये चारो ओर से मिट्टी के घेरे से मेढ़ बन्दी कर दी जाती है । उसे वाल कहा गया है । अतः मोदनवाल सगुणों से परिपूर्ण प्रतीत होता है । हलुवाई जाति विशेष को मोदनवाल टाइटिल से पुकारा जाता था । आज हलुवाई जाति विभिन्न टाइटिल प्रयोग करने लगे है.। मोदनवाल हलुवाई का इतिहास मोदनसेन महाराजा के साथ शुरू होता है । मोदक बनाने वाले मोदनसेन कहलाए ।

–धर्म गुरु की प्रेरणा

धर्म गुरू बाबा गणिनाथ जी महाराज कानू समाज में सनातनी धर्म परम्‍परा के अग्रणीय संत महापुरूष हुए । आपने समाज को अंधकारमय परिस्थितियों से मुक्ति हेतु संस्‍कारित करने, सामाजिक, धार्मिक व शैक्षणिक चेतना तथा विभिन्‍न सुधारों द्वारा समाज को संगठित करने में विशेष भूमिका रही ।

बाबा गणिनाथ जी महाराज के द्वारा किये सद्कार्यों व जीवन संबंधित परिचय या उल्‍लेख, ‘सर्य’ को ‘दीप’ दिखाने के समान है । परन्‍तु ऐसा करना भी अवश्‍यमभवी है, ताकि बाबा गणिनाथ जी महाराज का तेजोमय दिव्‍य प्रकाश इन शब्‍दों के माध्‍यम से वर्तमान व भविष्‍य में आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सके तथा कानू समाज में उत्‍पन्‍न हुई, इस जीवन दायिनी गंगधार रूपी, मानव जाति‍ के लिये कल्‍याणकारी परम्‍परा को, निरन्‍तर, निर्विघ्‍न, सुचारू रखा जा सके व इससे अनन्‍त युगों तक प्रेरणा प्राप्‍त होती रहे ।

मनुष्‍य में प्रेम-बन्‍धुत्‍व हो, सामाजिक कुरीतियों का नाश हो ।

चहुँ-मखी विकास हो, शिक्षा तथा ‘विवेकशील ज्ञान’ का प्रकाश हो ।।

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दया दान सत नम्रता, सब घट हरि समान ।

ज्ञानस्‍वरूप यह भक्‍त का लक्षण जान ।।

मान्यजन प्रथा

मान्यजन प्रथा हलवाई जाति का एक सांगठनिक प्रथा है । यह एक प्राचीन जातीय संगठन है जो सभी वैश्य तथा अन्य जातजातियों में भी है । जातीय बाहुल्य इलाका या गावं मान्यजन प्रथा के मातहत संगठित होता था । संगठन के मुखिया को मान्यजन कहा जाता था । जातीय विवाद को सुल्झाने प्रमुख जिम्मेवारी मान्यजन का होता था । उन्हें पुरस्कृत करने या दण्ड देने का अधिकार होता था । कुछ प्रमुख व्यक्ति या सामूहिक÷जातीय छलफल के आधार पर मान्यजन अपना निर्णय देते थे । विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कार में मान्यजन का परामर्श लिया जाता था । भोज कार्य में सामूहिक न्यौता मान्यजन के मार्फत दिया जाता था । मान्यजन अपनी कार्य सम्पादन करने हेतु सहयोगी नियुक्त करते थे । आज कल मान्यजन प्रथा संकुचित होते गया है ।

–कुछ ऐतिहासिक तथ्य

-सामाजिक संगठन


अखिल भारतीय मध्यदेशीय वैश्य सभा की स्थापना सर्व कानू समाज के उत्थान के लिए पूर्वजो ने 1905 में मुजफ्फरपुर बिहार में किया था . जो दिल्ली से पंजीकृत है और इसका पंजीकरण संख्या – 27613 है. इस संगठन का कार्य क्षेत्र सम्पूर्ण भारत , नेपाल और भूटान है .



सामाजिक उत्थान के लिए वर्ष 2003 में समाज के प्रबुद्ध लोगो के द्वारा कानू कल्याण महासभा की स्थापना मुजफ्फरपुर में किया गया जो बिहार सरकार से पंजीकृत संस्था है . इसका पंजीकरण संख्या-869 / 2003 -2004 है .इस संस्था का कार्य क्षेत्र सम्पूर्ण बिहार है .

नोट- इसके अतिरिक्त सर्व कानू समाज में अन्य संगठन भी कार्यरत है जिसकी सूची शीघ्र ही अपडेट किया जाएगा .

Our Heroes

–समाज के गौरव


सर्व कानू समाज की गौरवगाथा बहुत लम्‍बी है । हमारे समाज में अनेकों मनिषियों का जन्‍म हुआ जिन्‍होंने हमारे समाज के गौरव को चार चाँद लगाए और समाज को गौरवान्वित किया है । उनकी यशो गाथाऐं सदा-सदा के लिए अमर रहती है, अतीत के सुनहरे कल को आज जिन्‍होने प्रेरणा स्‍त्रोत के रूप में दिखाया, ऐसी महानआत्‍माओं को हम कोटी-कोटी प्रणाम करते है जिनके सदकर्मों से समाज गोरवान्वित हुआ है । ऐसे हमारे समाज के महात्‍माओं ने हमारी आने वाली पीढ़ि के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा स्‍त्रोत बनकर समाज को और गौरवशाली बनाते हुए एक आदर्श व अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किया है । हमारे समाज में अनेको ऐसी विभुतियों हुई है जिन्‍होंने समाज के साथ-साथ देश के लिए भी अपना बलिदान दिया है । हमारे समाज के बन्‍धुओं ने ऐतिहासीक कार्य किए जिन्‍हें आज मिसाल के तोर पर देखा जाता है । हमारे समाज में समाज सुधारक ऐसे कई संत महात्‍मा हुए है उनमें अनुभव के आलोक, आदर्श जीवन की प्रतिभा पलटू दास जी महाराज और आदर्श प्रतिभा के धनी सरयुग दास जी,स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस, संत पलटू प्रसाद,संत हुलास दास ,संत गरीब दास,संत विश्वनाथ प्रसाद ,संत केशो दास ,(साभार- शक्ति प्रेस रीवा) श्री बाबा गया दास परमहंस ने अपना पूरा जीवन सम्‍पर्पित कर दिया । सर्व कानू बन्‍धुओं ने अपने देश प्रेमी होने का प्रमाण देते हुए स्‍वतन्‍त्रता संग्राम की लड़ाई में अग्रेजों से लोहा लिया ओर देश की आजादी में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई ओर अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया ओर समय आने पर स्‍वतन्‍त्रता सेनानीयों ने समाज की सेवा भी की ओर समाज हीत में भी अपना योगदान दिया । समाज के राज‍नीतिज्ञों ने समाज को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर एक नई पहचान दिलाते हुए देश की सेवा की है और समाज ने राजनीति में भी अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हुए मंत्री,विधायक, पार्षद दिये है जिनसे समाज का गौरव बढ़ाया है । हमारे समाज के उदार हृदय, सरलता की प्रतिमूर्ति स्व.श्री विष्णु प्रसाद (बलिया),स्व.श्री मुकुंदलाल जी (दरभंगा),स्व. माधव लाल जी (मुजफ्फरपुर),स्व.श्री हजारीलाल जी (पटना),स्व.श्री शिव प्रसाद जी(बलिया),स्व.श्री बैजनाथ प्रसाद जी (मुजफ्फरपुर),स्व.श्री रईस लाल गुप्ता (बिहार),स्व.माखन लाल गुप्त (गोरखपुर), स्व.पाना लाल आर्य (आरा),स्व.प्रो.लक्ष्मी नारायण सिरिस (दानापुर) दानवीर धर्मनिष्‍ठ भामाशाह सेठ स्व.श्री राय बहादुर टुनकी साह (मुजफ्फरपुर), स्व. श्री शिव देनी राम (चम्पारण), स्व.श्री राम अयोध्या प्रसाद (चम्पारण) हमारे समाज के ऐसे रत्‍न है जिनका समाज हमेशा आभारी रहेगा इनके सदकर्मों एवम् महान कार्यों ने समाज का मान-सम्‍मान बढ़ाया है ओर समाज को एक नई दिशा और गति प्रदान की है श्री नन्द कुमार साह उर्फ़ नंदू बाबू जी ने ऐतिहासिक कानू अधिकार रैली मुजफ्फरपुर, और श्री मुनेश्वर प्रसाद कानू ने बंसी चाचा शहादत दिवस पटना में आयोजित कर समाज को एक राजनैतिक ताकत दिया. यह कानू समाज के इतिहास में बहुत ही सुनेहरा अवसर था, डॉ.विनोद गुप्ता जी ( अयोध्या), स्व. श्री भवानी फेर साव (कलकत्ता) अखिल भारतीय मध्यदेशिये वैश्य सभा दिल्ली प्रदेश ने समाज में वर्षो से विवाह सम्‍मेलन निशुल्‍क करवाकर नया र्कितीमान बनाकर कानू समाज का गौरव बढाया है ओर समाज के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है ओर कर रहे है । स्व.राय साहब लक्ष्मण प्रसाद, श्री अशोक कुमार, श्री राज कुमार प्रसाद आदि ने अपनी उच्‍च शासकीय सेवाओं से समाज के गौरव में अदभूत प्रतिभा का परिचय दिया है जो समाज के लिए गर्व की बात हैं । ऐसी हमारे समाज की महान आत्‍माओं एवं महात्‍माओं ने हमारी आने वाली पीढ़ि के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा स्‍त्रोत बनकर समाज को और गौरवशाली बनाते हुए एक आदर्श व अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किया है ।

ईश-वन्‍दना

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्त्तव्‍य मार्ग पर डट जाएं ।
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जाएं ।।
हम दीन दु:खी निबलों विकलों, के सेवक बन सन्‍ताप हरें ।
जो हैं अटके भूले-भटके, उनको तारें खुद तर जाएं ।।
छल दम्‍भ द्वेष पाखंड झूँठ, अन्‍याय से निशि-दिन दूर रहें ।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम सुधा रस बरसाएं ।।
निज आन मान मर्यादा का, प्रभु ध्‍यान रहे अभिमान रहे ।
जिस देश जाति में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाएं ।।

–समाज के संत महात्मा

–समाज के ऐतिहासिक कार्य

–समाज के स्वतंत्रासेनानि


एक समय हुआ करता था जब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था एवं उसमें दुध दही की नदियां बहा करती थी, यह सत्‍य है लेकिन अंग्रेजों ने भारत के राजा-महाराजओं की आपसी फूट का नाजायज़ फायदा उठाकर कई बहुमुल्‍य हीरे-जवाहरात, सोना-चांदी एवं अमूल्‍य साहित्‍य कब्‍जें में लेकर अपने देशों में लेकर चले गये । अंग्रेजी हकुमत ने भारत एवं भारतवासियों पर तरह-तरह के जुल्‍म ढाने लगी । अत्‍याचार चरम सीमा पर थे । तब देशभक्‍तों ने भारत को आजाद करने का दृढ़ संकल्‍प लिया और उसको क्रियान्वित करने में लग गये । महात्‍मा गांधी ने अहिंसात्‍मक तरिके से विदेशी हकुमत के खिलाफ पूरे राष्‍ट्र में स्‍वतंत्रता संग्राम का आन्‍दोलन प्रभावित रूप से चलाने का प्रयास किया । दूसरी ओर गर्म दल ने हिंसा-तोड़फोड़ का रास्‍ता अपना कर अंग्रेजों को यह जता दिया की आजादी हर किमत पर हम लेकर रहेंगे । देश का हर बच्‍चा-बच्‍चा आजादी का दिवाना हो चुका था । इस आन्‍दोलन मे कई स्‍वतंत्रता सैनानियों को कठोर यातनाएं दे बेरहमी से जेल में ठूस दिया गया तो कईयों की आखों में गरम-गरम सलाखें डालकर जिन्‍दगी भर के लिए अन्‍धा कर दिया गया । तो कईयों को गोलियों से छन्‍नी कर दिया गया । इस प्रकार कई देशभक्‍तों ने स्‍वतंत्रता बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति प्रदान की ।

जन चेतना के लिए स्‍वतंत्रता सेनानियों ने समाचार पत्रों, सूचना पत्रों, नारों, भाषणों का सहारा लेकर देश को आजादी के लिए प्रेरित कर आजादी नई लहर को देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया । देश की आजादी के इस पावन यज्ञ में हर जाति वर्ग तथा धर्म के लोगों ने अपना योगदान दिया ओर इस योगदान में हमारी सर्व कानू जाति भी पीछे नहीं रही और सर्व कानू समाज के सपूत आजादी के लिए सब कुछ न्‍यौछावर करने तो तैयार थे ओर वे भारत को आजाद कराने के लिए तन-मन-धन से स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े । इस पावन यज्ञ में सर्व कानू समाज के योगदान की ओर दृष्टि डाले तों सर्व कानू समाज के जिन सपूतों ने सक्रिय होकर स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन में भाग लिया सर्व श्रद्धेय श्री पब्बर राम (गाजीपुर ,उत्तरप्रदेश) , श्रद्धेय श्री रामचंद्र प्रसाद साह उर्फ़ बजरंज बली (हाजीपुर, बिहार ), श्रद्धेय श्री बंशी साह उर्फ़ बंशी चाचा (सीतामढ़ी , बिहार ) , श्रद्धेय श्री बादल गुप्ता (बंगाल ) (18 वर्ष की उम्र में भगत सिंह के साथ फांसी ,अभिलेख सेंट्रल जेल मुजफ्फरपुर में उपलब्ध ), श्रद्धेय श्री दिनेश गुप्ता (बंगाल ) (19 वर्ष की उम्र में भगत सिंह के साथ फांसी, अभिलेख सेंट्रल जेल मुजफ्फरपुर में उपलब्ध) , श्रद्धेय श्री रईस लाल गुप्ता क्रांतकारी (पश्चमी चम्पारण , बिहार ) , श्रद्धेय श्री सूरज साह (बेतिया, बिहार), श्रद्धेय श्री जानकी राम (मुजफ्फरपुर,बिहार), श्रद्धेय श्री प्रो.भुवनेश्वर प्रसाद (बेगूसराय,बिहार),श्रद्धेय श्री साधु शंकर गुप्ता (उज्जैन,मध्यप्रदेश), श्रद्धेय श्री नंदराम गुप्ता (ग्वालियर,मध्यप्रदेश), श्रद्धेय श्री चंद्रशेखर प्रसाद (बलिया, उत्तरप्रदेश), श्रद्धेय श्री सीताराम गुप्ता ( बलिया,उत्तरप्रदेश), श्रद्धेय श्री चन्द्रिका गुप्ता (बलिया, उत्तरप्रदेश), श्रद्धेय श्री फूलचंद गुप्ता (मऊ, उत्तरप्रदेश),स्व0 श्री हरि प्रसाद आर्य (क़ानू)प्यारेपुरा, मऊ (यू0 पी0),स्व0 विश्वनाथ प्र0 गुप्त अमिला, मऊ (यू0 पी0),श्री महावीर प्र0 गुप्त ” बिगुलर” ईशापुर , जौनपुर ,( यू0 पी0),स्व0 डॉ0 सरयू प्र0 गुप्त सिवान , (बिहार),प्रो0 स्व0भुवनेश्वर प्रसाद चेरिया बरियारपुर, बेगुसराय (बिहार),स्व0 श्री अर्जुन साह बलहा नरायणपुर , भागलपुर (बिहार ) (अन्य कई नाम अभी जुड़ना बाकी है ) आदि का नाम मुख्‍य रूप से उल्‍लेखनिय है । राष्‍ट्रीय आन्‍दोलनों में अग्रणी रहते हुए इन्‍होंने पुलिस के डंडे खाए, गिरफ्तारियां दी तथा जेल जाकर कठोर यातनाएं सही । एवं साथ ही राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए राष्‍ट्रीय आंदोलन के दौरान अपनी गिरफ्तारियां देकर मातृभूमि के प्रति अपना फर्ज निभाया ।
परन्तु दुर्भाग्य है की राष्‍ट्रीय आन्‍दोलनों में छ: माह से अधिक की जेल काटने वाले और स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन में भाग लेने वाले अनेको सर्व कानू देश भक्‍तों को सरकार ने अभी तक स्‍वतंत्रता सेनानी घोषित नहीं किया है ।

–समाज सुधारक

–समाज के राजनीतिज्ञ


सर्व कानू समाज बहुत लम्‍बे समय से पिछड़ा हुआ है । जिसको छोटा -मोटा व्यवसाय ,मेहनत मजदूरी कर अपना पेट रोजाना भरना पड़ता है लेकिन अब धीरे-धीरे स्थिति सुधरने की उम्मीद दिख रही है । आज हमारे समाज ने अपनी राजनैतिक जड़े मजबूत करने के प्रयास में है और हमारे समाज के बंधुओं ने ग्राम पंचायत से लेकर मंत्री पद तक अपनी दावेदारी साबित की है और समाज का गौरव बढाया है ।

पूर्व में समाज के स्व.श्री पब्बर राम जी विधायक रहकर उत्तरप्रदेश से, स्व.श्री हरी प्रसाद साह जी विधायक एवं मंत्री रहकर बिहार से, स्व.श्री इंद्र कुमार जी एमएलसी रहकर बिहार से,स्व.श्री राम लाल भाई उत्तरप्रदेश से, स्व.श्री शुकदेव प्रसाद साह विधायक रहकर बिहार से , श्रीमती चंद्रमुखी देवी विधायिका रहकर बिहार से,श्री सतीश कुमार विधायक रहकर बिहार से , श्री राजेंद्र प्रसाद गुप्ता एमएलसी रहकर बिहार से , श्री भैया जी कंदोई इंदौर म्युनिस्पल कॉर्पोरेशन इंदौर मध्यप्रदेश से समाज का गौरव बढ़ाते आये है . उत्तर प्रदेश से सर्व क़ानू समाज के प्रथम विधायक स्व0 श्री किशन लाल मद्धेशिय नानपारा , बहराइच (यू0 पी0) ( जनसंघ ,1965 ) समाज का गौरव बढ़ाये है .

वर्तमान में श्री प्रमोद कुमार विधायक सह कैबिनेट मंत्री बिहार सरकार , श्री केदार प्रसाद गुप्ता विधायक के रूप में बिहार से , श्री राधा चरण सेठ एमएलसी के रूप में बिहार से , श्री सुदामा साह विधायक के रूप में बिहार से और श्री अजय कुमार उर्फ़ लल्लू भैया जी विधायक सह नेता प्रतिपक्ष के रूप में उत्तरप्रदेश से , श्री विजय कुमार गुप्ता चेयरमैन असम वित्तीय निगम के रूप में असम से, के अतिरिक्त बिभिन्न राज्यों में जिला परिषद अध्यक्ष ,नगरपालिका अध्यक्ष ,पार्षद ,ग्राम प्रधान ,वार्ड सदस्य,सरपंच , आदि के रूप में अनेको हमारे समाज के लोग समाज का गौरव बढ़ा रहे है .

-समाज के लेखक / साहित्यकार


समाज वही आगे बढ़ता है जिसमें भविष्‍य की सोच हो, चिन्‍तन हो । साहित्‍यकार चिन्‍तनशील होता हैं । इस लिए वह समाज को दिशा देता है । जिस समाज या जाति का साहित्‍य नहीं वह दिशाहीन है । वह भटका हुआ समाज है । साहित्‍य प्रगतिशील समाज की पहचान है । साहित्‍य का महत्‍व- मनुष्‍य के जीवन में साहित्‍य का बहुत बड़ा महत्‍व है । मनुष्‍य के लिए जितना भोजन आवश्‍यक है, साहित्‍य भी उतना ही जरूरी है । साहित्‍य मनुष्‍य के मस्तिष्‍क की खुराक हैं । मनुष्‍य को ज्ञान साहित्‍य से ही प्राप्‍त होता है साहित्‍यकारों ने अनकों लोगों के जीवन को बदला है और जीने की राह दिखाई है । इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितनी भी क्रांतियां हुई है उनके जन्‍मदाता दार्शनिक और साहित्‍यकार ही है । साहित्‍यकारों ने युग की दिशाओं को मोड़ा है । साहित्‍याकर की कलम में असीम ताकत होती है । जो समाज को उचाईयों तक पहुँचा सकती है । किसी भी समाज के विकास और उन्‍नती में साहित्‍य का अपना महत्‍व होता है । सर्व कानू समाज में भी अनकों साहित्‍यकार हुए है (जिनके नामो की सूची जल्द ही उपलब्ध कराई जा रही है ) जिन्‍होंने अपनी कला, कार्यकुशलता, लगन, निशकाम सेवा भाव और प्रगतिशील विचार धारा से समाज को नई दिशा दिखाई है । समाज को नई राह दिखाने में हमारे समाज के साहित्‍यकारों ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे समाज में जागरूकता पैदा हुई है । हमारे समाज में साहित्‍यकारों की कोई कमी नहीं है । साहित्‍य के साथ ही समाज का विकास पूर्ण रूप से हो सकता है । इसलिए समाज के हर व्‍यक्ति को चाहिए कि वह साहित्‍य के महत्‍व को समझे ।

-समाज की पत्र-पत्रिकाएं

1905 ई0 में महासभा की स्थापना के साथ ही हमारे पूर्वजों ने समाज की माली हालत में सुधार के लिए चिन्हित कर ससक्त संगठन और शिक्षा पर विशेष बल दिया । इसी समय स्व0श्री मुकुंद लाल जी द्वारा ” कान्दू गोहार ” नामक प्रथम पत्रिका संज्ञान में आता है जो काफी सुर्खियां बटोरीं ।
“दूर अविद्या करो भाईयो, टाट कुटुम्ब और गोतिया से ।
करो जाति काअब गोहार,मिल चुटकी, चन्दा, मुठिया से ।।”
इसी “कान्दू गोहार ” पत्रिका ने लोगों में हलचल मचा दिया, क्योकि उसमे जाति की हीनावस्था के वर्णन ये लाइने कहि गयी थी —
” हुआ कही पर भोज- भात, तब कानू कौवे आते है।
काँव काँवकर , लड़ते भिड़ते , खा पीकर उड़ जाते है।।
सम्भवतः महासभा द्वारा ” वैश्य मित्र “नामक एकमात्र पत्रिका का प्रकाशन किया गया, जो सम्भवतः 1964 ई0 तक चला , समाज को जनसंदेश देने के लिए आजतक कई नामो से पत्र पत्रिकाएं क्रमशः आते -जाते रहे है परन्तु कोई भी पत्र -पत्रिका सुचारू रूप में नही चल पाया वैसे समय -समय पर प्रयास होता रहा कई पत्रिकाएं अल्प आयु तक प्रकाशित होती रही और कालकलवित धन की कमी , इच्छाशक्ति , आपसी तालमेल के आभाव में इतिहास बनता रहा है। लम्बे काल तक समाज को सेवा देने वाली पत्रिकाओ में सम्पादक श्री प्रेमी हृदय द्वारा ” वैश्य वाणी “( पटना), “गंगोजी गणिनाथ गोविन्द जी पत्रिका” (पटना ) , सम्पादक श्री हरेकृष्ण शाह , सम्पादक श्री रामावतार गुप्त द्वारा “अपनी वाणी ” (कलकत्ता), ” वैश्य मित्र” (शक्ति प्रेस , रीवा), श्री राजीव रंजन जी के संपादकीय में ” मधुर वाणी” (बोकारो), श्री राम कुमार गुप्ता के सम्पादकीय में ” वैश्य लहर” (लखनऊ) रहा है ।
प्रो0 जनार्दन प्रसाद , सुल्तानगंज के सम्पादन में “ज्योति ” (भागलपुर कमिशनरी),” वैश्य बन्धु, वैश्य संगम “, “वैश्य सन्देश “(मुंगेर) , श्री एस के निराला के सम्पादकीय में “बाबा गणिनाथ गोविन्द जी सन्देश “(रांची), श्री राजेश्वर प्रसाद नेपाली के संपादकीय में ” गोविन्द सन्देश” (जनकपुर ,नेपाल), “वैश्य चेतना” त्रैमासिक (बनारस) आदि समाज मे आये और गये। इन सभी के प्रकाशन पर पूर्णविराम का कारण लगभग समान है। समय- समय पर लगभग सभी प्रदेशों ने तथा महासभा की राष्ट्रीय कमेटी ने स्मारिका , समाचार पत्र बुलेटिन आदि प्रकाशित करती आई है ।
जबकि वर्तमान में मुजफ्फरपुर से एकमात्र समाज की पत्रिका ” पुनरो उत्थान” त्रैमासिक जीवित है। जिसके मुख्य सम्पादक श्री गोपाल भारतीय जी है।


 

SABHAR : sarvkanusamaj.wordpress.com

DOSAR VAISHYA HISTORY

DOSAR VAISHYA HISTORY - दोसर वैश्य समाज का इतिहास

दोसर वैश्य समाज का इतिहास - कौन ? - कैसे ? - कहाँ से ?

आज दोसर वैश्य समाज के हर व्यक्ति के मन में एक प्रश्न उठता है कि दोसर वैश्य समाज में जन्म लिया है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ और कैसे हुई। इसकी जानकारी ज्ञात हो सके इसके लिए मैंने समाज और राजनीती में कार्य करते हुए और विभिन्न प्राचीन पुस्तको से जो जानकारी प्राप्त हुई वह मैं आप सबकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ ।

गोत्र - महाभारत व जातक आदि प्राचीन ग्रंथो में व्यक्ति का परिचय पूछते समय उसका नाम तथा गोत्र दोनों विषय में पुछा जाता था । गोत्रो की परंपरा प्राचीन ऋषियों से चली आ रही है , मान्यता है कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र - भ्रगु , अंगिरा , मरीचि और अत्रि हुए । ये चार ऋषि गोत्रकर्ता थे ।

ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप थे , हमारा दोसर वैश्य समाज कश्यप ऋषि का गोत्र है ।

उत्पत्ति का स्थल -दोसर वैश्य ,"दूसर वैश्य "का कालांतर में परिवर्तित रूप है । डा . मोतीलाल भार्गव द्वारा लिखी पुस्तक "हेमू और उसका युग "से पता चलता है कि दूसर वैश्य हरियाणा में दूसी गाँव क़े मूल निवासी थे ।जो कि गुरगाव जनपद के उपनगर रिवाड़ी के पास स्थित है ।यह स्थान बलराम जी (बलदाऊ)की ससुराल जो वधुसर कि दूसर और बाद में दूसी कहलाया।

दोसर वैश्य समाज की विजय गाथा / दिल्ली विजय -

हेमू की दिल्ली विजय - भारतीय इतिहास में प्रशिद्ध हेमचन्द्र विक्रमादित्य 'हेमू' दोसर वैश्य जाति के थे । हेमू के पिता का नाम पूरन दास और चाचा का नाम नवलदास था जो दोसर वैश्य समाज के प्रशिद्ध संत थे । हेमू ने 6 अक्टूबर सन 1556 को दिल्ली विजय प्राप्त की । 300 वर्षो बाद किसी हिन्दू शासक ने दिल्ली की सत्ता प्राप्त की थी ।

दॊसर वैश्य का वर्गीकरण -पंडित कामता प्रसाद द्वारा लिखी पुस्तक "जाति भास्कर " सम्वत 1960 विक्रमी के लगभग से पता चलता है कि इसमें लगभग 400 वैश्य उप-जातियों का विवरण है ।इस सूची में दोसर वैश्य के स्थान पर दूसर वैश्य का विविरण मिलता है जो कि दिल्ली और मिर्जापुर के बीच गंगा किनारे निवास करते है ।
दोसर वैश्य समाज की धार्मिक मान्यताएं - दोसर वैश्य समाज गाय को बहुत ही सुभ एवं पवित्र मानते थे । दोसर वैश्य समाज वैष्णव् मत को मानने वाले है । उत्तर भारत में केवल दोसर वैश्य समाज में विवाह में वधू को निगोड़ा पहनाया जाता था । आज भी दोसर वैश्य समाज के अतिरिक्त आज किसी समाज में निगोड़ा नहीं पहनाया जाता है |

मोती लाल जी का शॊध - ब्रिटिश शासनकाल में सन 1880 में मोतीलाल भार्गव द्वारा दिए गए शॊध पुत्र "हेमू और उसका युग" में वर्रण है - दूसी जो हेमू का जन्म स्थान था वहां वैश्य को दूसी वैश्य जो वर्तमान में दॊसर वैश्य कहा गया है ।

INTERNATIONAL VAISH FEDERATION MEET

 

INTERNATIONAL VAISH FEDERATION MEET




Saturday, July 31, 2021

BHAVISH AGRAWAL OLA CABS

BHAVISH AGRAWAL OLA CABS 

ओला के ब्रांड बनने की कहानी:12 हजार करोड़ खर्च करके पहले कैब को जरूरत बनाया, फिर शुरू हुई बंपर कमाई; अब ई-स्कूटर पर दांव


एक टैक्सी ड्राइवर के साथ झगड़े से निकला ओला कैब का आइडिया

ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूके में भी चलती है भारत की ओला कैब

आपने कभी न कभी ओला कैब से सफर जरूर किया होगा। करीब 60% मार्केट शेयर के साथ ये भारत की सबसे बड़ी कैब एग्रीगेटर कंपनी है। 2010 में IIT बॉम्बे के दो इंजीनियर्स ने इसकी शुरुआत की थी। आज इस कंपनी की वैल्युएशन 330 करोड़ डॉलर, यानी करीब 24 हजार करोड़ रुपए है। 15 जुलाई को ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर की बुकिंग शुरू होने के बाद से ये ब्रांड चर्चा में है। आइए, ओला के 11 साल के सफर को शुरू से शुरू करते हैं...

टैक्सी ड्राइवर के झगड़े से निकला आइडिया

ओला के फाउंडर भाविश अग्रवाल हैं। उन्होंने 2008 में IIT बॉम्बे से बीटेक की पढ़ाई की। कॉलेज के बाद माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च में दो साल तक नौकरी की। इसके बाद उन्होंने एक ऑनलाइन वेबसाइट Olatrip.com शुरू की जो हॉलीडे पैकेज और वीकेंड ट्रिप प्लान करती थी।

एक दिन भाविश ने बेंगलुरु से बांदीपुर के लिए टैक्सी बुक की। रास्ते में टैक्सी ड्राइवर ने ज्यादा किराया देने की बात कही। भाविश ने इनकार किया तो ड्राइवर उन्हें बीच रास्ते छोड़कर चला गया। इस परेशानी से उन्हें एक आइडिया क्लिक किया।

उन्हें महसूस हुआ कि ऐसी समस्या का सामना करोड़ों लोग करते होंगे। भाविश ने अपनी ट्रैवल वेबसाइट को कैब सर्विस में बदलने का फैसला किया। उन्होंने IIT बॉम्बे के ही अंकित भाटी के साथ ये आइडिया शेयर किया। दोनों ने मिलकर 3 दिसंबर 2010 को ओला कैब्स लॉन्च कर दिया।


ओला का पहला ऑफिस एक 10*12 फीट का कमरा था। इसमें भाविश, अंकित और शुरुआती दिनों के साथी काम करते थे।

पेरेंट्स को नहीं, लेकिन इन्वेस्टर्स को पसंद आया आइडिया

शुरुआत में भाविश के पेरेंट्स उनके स्टार्टअप से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि IIT से पढ़ने के बाद 'ट्रैवल एजेंट' बनोगे, लेकिन इन्वेस्टर्स को ये आइडिया पसंद आया। ओला को पहले राउंड की फंडिंग स्नैपडील के फाउंडर कुनाल बहल, रेहान यार खान और अनुपम मित्तल से मिली।

इसके बाद फंडिंग का सिलसिला शुरू हो गया। ओला को अब तक 26 राउंड की फंडिंग में 48 इन्वेस्टर्स से 430 करोड़ डॉलर, यानी करीब 32 हजार करोड़ रुपए की फंडिंग मिल चुकी है। 9 जुलाई 2021 को एक प्राइवेट इक्विटी से 3,700 करोड़ की लेटेस्ट फंडिंग मिली है।

भाविश अग्रवाल का कहना है कि इन्वेस्टर्स तीन चीजें चाहते हैं। क्लियर विजन, सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल और एग्जिक्यूशन प्लान। जिस स्टार्टअप के पास ये चीजें हैं, उसे कभी फंड की कमी नहीं होगी।

ओला के पिछले 11 साल के सफर को फाउंडर भाविश तीन फेज में बांटते हैं...

फेज-1: ये 2011 से 2014 का स्ट्रगल वाला वक्त था। न ज्यादा लोग थे, न ज्यादा पैसे। भाविश खुद प्रचार करने जाते थे। कभी-कभी खुद ड्राइवर भी बन जाते थे।

फेज-2: 2014 से 2017 तक का स्केलिंग वाला वक्त था। कॉम्पिटीटर्स पैसे झोंक रहे थे। ओला ने भी इन्वेस्टर्स तलाशे और पैसे झोंकने शुरू कर दिए। इस फेज में सिर्फ बिजनेस का स्केल बढ़ाने पर जोर था।

फेज-3: ये 2017 के बाद शुरू हुआ कंसॉलिडेशन का वक्त था। इसमें ओला ने बेहतर ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर बनाया। कमाई और मुनाफे पर फोकस किया।

भाविश का मानना है कि भारत की नई जनरेशन कार खरीदना नहीं, उसे एक्सपीरिएंस करना चाहती है। वो इसी क्लियर विजन के साथ आगे बढ़े। उन्होंने शुरुआती 7 साल में इन्वेस्टर्स के पैसे सिर्फ बिजनेस का स्केल बढ़ाने पर खर्च किए। ज्यादा इन्सेंटिव देकर ड्राइवर्स बढ़ाए और छूट देकर कस्टमर बढ़ाए। एक बार जब ओला कैब लोगों की जरूरत में शामिल हो गई, तब उससे कमाई करने के बारे में सोचा।


ओला की अपनी कार नहीं, फिर पैसे कैसे कमाती है?

ओला सिर्फ कैब बुकिंग की सर्विस उपलब्ध कराती है। कंपनी के पास अपनी कोई कार नहीं है। ऐप के जरिए वो कस्टमर्स को कैब और ड्राइवर्स को कस्टमर से जोड़ती है। ऐप पर हुई सभी बुकिंग्स पर किराए का 15% कंपनी कमीशन लेती है।

ओला के सामने चुनौतियां कम नहीं

ओला सीधे तौर पर यूएस की लीडिंग कंपनी ऊबर से मुकाबला करती है। ऊबर की वैल्युएशन 82 बिलियन डॉलर है जो ओला से 25 गुना ज्यादा है। इसके अलावा भारत में अन्य कॉम्पिटीटर्स में मेरू कैब, जूमकार और रैपिडो शामिल हैं। ओला ने अब तक कुल 6 अधिग्रहण किए हैं। उनमें टैक्सी फॉर श्योर, जियोटैग, क्वार्थ, फूडपांडा, रिडलर और पिकअप शामिल हैं।

कैब सर्विस को ग्लोबल बनाने और इलेक्ट्रिक व्हीकल पर फोकस

ओला ने भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूके में अपनी कैब सर्विस शुरू की है। भाविश अग्रवाल का कहना है कि हमने भारत में एक सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल बना लिया है। अब हम इसे ग्लोबल स्तर पर लेकर जाना चाहते हैं।

कंपनी का दूसरा फोकस मोबिलिटी को इन्वायरनमेंट फ्रेंडली बनाने पर है। भाविश का कहना है कि भारत की ज्यादातर आबादी टू व्हीलर या थ्री व्हीलर वाहनों पर चलती है। अगर इसे इलेक्ट्रिक कर दिया जाए तो इसका बड़ा इम्पैक्ट दिखेगा। हम अगले कुछ साल में 10 लाख इलेक्ट्रिक व्हीकल रोड पर देखना चाहते हैं।
खबरें और भी हैं...

क्लैट 2021 टोपर

क्लैट 2021 टोपर 


RAKESH JHUNJHUN WALA A GREAT SHARE MARKET TYCOON

RAKESH JHUNJHUN WALA A GREAT SHARE MARKET TYCOON 



आर्थिक तंगी के बीच एंट्री लेगी 'आकासा':शेयर बाजार के बिग बुल राकेश झुनझुनवाला नई एयरलाइन कंपनी लाएंगे, बेड़े में शामिल होंगे 70 प्लेन

शेयर बाजार के बिग बुल राकेश झुनझुनवाला जल्द ही नई एयरलाइन कंपनी खोलने वाले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वे नए एयरलाइन वेंचर में 3.5 करोड़ डॉलर (लगभग 260.7 करोड़ रुपए) का निवेश कर सकते हैं। एयरलाइन कंपनी में अगले 4 साल में 70 एयरक्राफ्ट्स को शामिल करने की बात भी सामने आ रही है। फोर्ब्स के मुताबिक झुनझुनवाला की नेटवर्थ 4.6 अरब डॉलर (लगभग 34.21 हजार करोड़ रुपए) है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक नई एयरलाइन के पीछे भारत के ज्यादा से ज्यादा लोगों को हवाई यात्रा मुहैया कराने की मंशा है। झुनझुनवाला को कंपनी में 3.5 करोड़ डॉलर के निवेश पर 40% हिस्सेदारी मिलेगी। ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि हमें अगले 15 दिन में एविएशन मिनिस्ट्री से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) की उम्मीद है।

स्पाइसजेट और जेट एयरवेज में हिस्सेदारी

रिपोर्ट के मुताबिक नई एयरलाइन कंपनी का नाम 'आकासा' (Akasa Air) हो सकता है। नई एयरलाइन कंपनी की टीम के साथ डेल्टा एयरलाइंस के पूर्व सीनियर एग्जीक्युटिव भी शामिल होंगे। राकेश झुनझुनवाला ने बताया कि एयरलाइन के बेड़े में शामिल होने वाले प्लेन की क्षमता 180 पैसेंजर्स तक की हो सकती है। झुनझुनवाला के पास स्पाइसजेट और ग्राउंडेड एयरलाइन कंपनी जेट एयरवेज में 1-1% की हिस्सेदारी है।


राकेश झुनझुनवाला के पास स्पाइसजेट और जेट एयरवेज की 1-1% हिस्सेदारी है।

कोरोना के बाद पैसेंजर डिमांड बढ़ेगी

कोरोना महामारी से एविएशन इंडस्ट्री की हालत पहली ही खस्ता है। साथ ही कोरोना की तीसरी लहर की संभावना भी है। दूसरी ओर महामारी से बिगड़े हालात के बावजूद राकेश झुनझुनवाला को आने वाले दिनों में एविएशन इंडस्ट्री में डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। उनका कहना है कि भारतीय बाजार में बढ़त जारी रहेगी और जल्द ही महंगाई भी काबूू में आएगी।

आर्थिक तंगी से जूझ रहा एविएशन सेक्टर

महामारी के पहले भी एविएशन सेक्टर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। उदाहरण के तौर पर किंगफिशर कभी देश की दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन बन गई थी, लेकिन 2012 में कंपनी को अपना कारोबार ठप करना पड़ा। इसी तरह जेट एयरवेज भी 2019 से ग्राउंडेड है, जो अब एक फिर उड़ान भरने की तैयारी में है। टाटा ग्रुप और सिंगापुर एयरलाइन लिमिटेड के जॉइंट वेंचर वाली कंपनी विस्तारा और इंडिगो भी कोरोना महामारी के चलते आर्थिक तंगी में हैं।
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WE ARE AGRAWAL - WE MAKE HISTORY

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MOHAN LAL SUKHADIA JI - A GREAT LEADER

MOHAN LAL SUKHADIA JI - A GREAT LEADER


Saturday, July 17, 2021

THE TEMPLES OF BIDLA FAMILY - बिरला परिवार ने पूरे भारत में बनाए 19 भव्य मंदिर

THE TEMPLES OF BIDLA FAMILY - बिरला परिवार ने पूरे भारत में बनाए 19 भव्य मंदिर


बिरला परिवार ने पूरे भारत में बनाए 19 भव्य मंदिर । 20 वीं शताब्दी से लेकर आज तक बिरला परिवार के अलावा किसी और परिवार ने इतने भव्य मंदिर नहीं बनाए... परंपरा में बिरला परिवार वैष्णव था लेकिन पंचदेवों के भव्य मंदिर बनवाए... बिरला परिवार मारवाड़ी बनिया समुदाय का रत्न है...



Friday, July 16, 2021

DEEPAK KABRA - दीपक काबरा बने ओलिम्पिक में जज

 

DEEPAK KABRA - दीपक काबरा बने ओलिम्पिक में जज  



MARVADI VAISHYA - मारवाड़ी व्यापारी के प्रमुख व्यापारिक गुण क्या हैं?

MARVADI VAISHYA - मारवाड़ी व्यापारी के प्रमुख व्यापारिक गुण क्या हैं?

वैसे तो किसी एक समुदाय के लोग में सिर्फ़ एक ही तरह के गुणगान लोग निकलेंगे ऐसा कहना कठीन है। हर समुदाय में योग्य और अयोग्य लोग भरे पड़ें हैं। इसिलिए generalize करना कठीन है। मेरे हिसाब से हर व्यापारी के लिए ये निम्नलिखित गुण श्रेष्ठ व्यापारिक गुण हैं, मारवाड़ी व्यापारियों में भी यह गुण पाये जातें हैं।

१) पैसे की समझ -

धन, पूँजी, संपत्ति की समझ रखना एक व्यापारी के लिए बहुत आवश्यक है। व्यापारी की निजी राय या विचारधारा मार्क्सवादी हो या समाजवादी या पूँजीवादी हो पर पूँजी की समझ उसके लिए अत्यावश्यक है। you don’t need to be a capitalist to understand “capital” but just a businessman to understand it. यह पूँजी केवल पैसा नहीं, कोई सामग्री हो सकती है, कोई idea हो सकता है या कोई मेटीरियल हो सकता है। इस पूँजी को सम्भालकर और इसके बलबूते पर धंधा करना ही व्यापारीक तंत्र है। इसके अलावा पैसे की समझ भी बहुत ज़रूरी है। अकसर इंसान खुद के पैसे से धंधा नहीं करता है, क़र्ज़े के पैसे से ही धंधा होता है। क़र्ज़ लेना और चुकाने का सामर्थ्य रखना हर व्यापारी के लिए अनिवार्य है।

२) कर्मचारी और प्रतिनिधियों की निगरानी

कर्मचारी और व्यापार के प्रतिनिधी करने वालों और सह मददगार लोगों पर trust करना बहुत मुश्किल काम है। tragedy of commons नाम का फ़लसफ़ा है - जिसमें यह बताया गया है की आम आदमी में ख़ामी यह है की वह परिस्थितियों से विवश है, इच्छाओं का दास है। ऐसे में हर इंसान का इमानदार होना नामुम्कीन है और व्यापारी को किस पर कितना भरोसा करना चाहिए, इस बात की जानकारी होना अत्यावश्यक है। मारवाड़ी व्यापारियों में यह ख़ास गुण है की वे उनके अपने मारवाड़ इलाक़े के कर्मठ और भरोसेमंद कर्मचारी सहजता से ढूँढ लेते हैं और उनका अच्छा ख़्याल भी रखतें हैं।

३) स्थानीय तहज़ीब का मान रखना

हर व्यापारी को स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का मान रखते हुए धंधा करना पढ़ता है। उदाहरणत: हमारे चेन्नई शहर के साहूकारपेट इलाक़े में क़रीब १०० साल से भी अधिक समय से मारवाड़ी व्यापारी रहतें हैं और स्थानीय भाषा तामिल में बात करतें हैं और तामिल त्योहार जैसे कार्तिक महीना और पोंगल के दिनों अपने दुकान पर विशेष डिस्काउंट रखतें हैं। एक जैन ज्वेलेरस दुकान थी नारी मैडरास के इक जिल्हे में और वहाँ पर मैंने देखा था की एक ग्राहकों ने उसके विवाह के लिए कुछ गहने ख़रीदे थे। जैन ज्वेलेरस के मालिक ने स्वर्ण चैन और कंगन को दुकान में उनके कॉउंटर के पीछे रखे मीनाक्षी और मुरुगन भगवान के सामने रखकर पूजा की और अपने एक औरत स्टॉफ को बुलाकर कहा की पूजा करके इसे ग्राहक को सोंप दो। एक बार सौंपने के बाद जैन साहब बोले, “हम प्रार्थना करते हैं की आपका विवाह जीवन सुखद रहे - बेस्ट ऑफ़ लक्क !” मैं मुंबई से वहाँ गया था और जैन साहब को पहचानता था तो मैंने पूछा उनसे की आप हर वक़्त ऐसा पूजा करने के बाद ही गहने बेचते हो? तो जैन साहब का जवाब था - “कोई लोकल हिन्दु कस्टमर हो तो करता हूँ - वैसे मैं मारवाड़ी जैन हूँ पर लोकल तामिल लोगों के आस्था का ध्यान रखना पड़ता है - इसिलिए तामिल भी सिखा और उनको जैसा चाहिए वैसे अपने दुकान में चिज़ें रखता हूँ। यहॉं पर superstitions बहुत है, इसिलिए मेरा एक विवाहित स्त्रि जो स्टॉफ है उसके हाथ से गहने डेलिवर करता हूँ।” यह एक बहुत महत्वपूर्ण व्यापारिक गुण है।

इन सब चीज़ों के अलावा एक महत्वपूर्ण चीज है - PLANNING. यह व्यापारिक गुण अगर एक व्यापारी में श्रेष्ठ है याने अगर वो अच्छी बिज़नेस प्लानिंग कर सकतें हैं मतलब उनके लिए तरक़्क़ी करने के लिए कोई सिमा नहीं है। एक बार एक मारवाड़ी व्यापारी दोस्त ने मुझे यह उदाहरण दीया था १९९५ के टैम। फ़र्ज़ करो एक मारवाड़ी तिरुप्पुर जो दक्षिण तामिलनाडू का एक शहर है और अपने टॉवल्स व्यापार के लिए प्रसिद्ध है। फ़र्ज़ करो की एक मारवाड़ी तिरुप्पुर से हर महीने १०० रुपये के ५०० टॉवल ख़रीदता है और मुंबई में अपनी दुकान पर बेचने लगा देता है तो purchasing cost हुआ ५०,००० रुपये प्रति महीना। हर टॉवल को मुंबई में वह ३०० रुपये में बेचता है याने २०० का मुनाफ़ा प्रति टॉवल और यदि wholesale ऑर्डर मिले तो वो १५० में बेचता है याने ५० रुपये प्रति टॉवल। अगर उसके १७० टॉवल ग्राहक के पास बीक जाएँ तो उसके उपर का उसका मुनाफ़ा है - चलिए २०० टॉवल पकड़ें - यदि वो २०० टॉवल बेचेगा तो ६०,००० बनते हैं। बाक़ी बचे ३०० टॉवल जिसमें फ़र्ज़ करो की वो कम से कम २०० टॉवल wholesale में बेचने का टॉरगट रखता है। इसमें हुआ wholesale पर मुनाफ़ा १०,००० रुपये प्रति महीने। वैसे कोशिश तो यही करेगा की वो individual ग्राहक को २०० से अधिक टॉवल बेचे पर डिमांड अनुसार। २०० टॉवल का threshold और wholesale की सेल पर वह कहता की धंधा “ठीक ठाक” चल रहा है। बाक़ी के १०० टॉवल गोडॉउन में पड़े रहतें हैं। इस तरह साल भर में “ठीक ठाक” वाले धंधे में उसका फ़ायदा होता है प्रतिमाह २०,००० रुपये और बाक़ी के १०० टॉवल परतिमाह बचतें हैं तो १२०० टॉवल गोडॉउन में रहता है। याने अब तक हमारे व्यापारी दोस्त ने २,४०,००० तो बना लीया है। साल के अंत में - याने दिवाली के पहले वो मुंबई के किसी exhibition हॉल में टॉवल का एक स्टॉल लगाता है। इसमें वह एक टॉवल यदि १५० रुपये या bargaining करने पर १२० में भी बेचेगा तो उसका फ़ायदा होता है २४००० रुपये (१२० रेट के हिसाब से) या ६०,००० रुपये (१५० रेट रेल हिसाब से)। अगर वह टॉवलों को तीन अलग प्रकार में छटनी कर तीन अलग वेराईटी में भी बेच सकता है याने - ४०० टॉवल लक्सरी २०० रुपये के, ४०० टॉवल १५० रुपये के डिलक्स और ४०० टॉवल १२० रुपये के एकोनॉमी। तो भले सारे टॉवल तिरुप्पुर के एक वेराईटी के हीं क्यों न हो पर उस व्यापारी को मुनाफ़ा मिला २०० वालों में ४०००० रुपये, १५० वालों में २०००० रुपये और १२० वालों में २४००० रुपये - कुल मिलाकर exhibition से कमाई हुई ८४००० रुपये। सालभर में देखें तो मुनाफ़ा मिला ३,२४,००० रुपये और निवेश कीया ६,००,००० रुपये। अगर २५००० का ख़र्चा ट्रेन और भागदौड़ और करमचारी पर लग जायें तब भी ३,००,००० का सालाना मुनाफ़ा होता है।

ऐसे कमाल के प्लानिंग के साथ वे किसी भी तरह का नुक़सान झेल लेतें हैं। यदि महँगाई बढ़ गई और ग्राहक कम मिले तो गोडाउन में टॉवल जमा रखो और साल में एक से अधिक भी exhibition करो तो “ठीक ठाक” वाला धंधा तो चल सकता है।

लेख साभार: कृष्णन लक्ष्मीनारायणन, ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी में काम किया है

Thursday, July 15, 2021

लाला शब्द को क्यों बदनाम करते हो ?

लाला शब्द को क्यों बदनाम करते हो ? 

अक्सर बाबा रामदेव को लाला , व्यापारी और बनिया कहा जाता रहा है ।

मैं खुद भी एक व्यापारी हूं , लाला हूं और जन्म और कर्म दोनों से बनिया हूं ।

और मैंने सदैव इस बात पर गर्व का अनुभव किया है कि मैं उस समुदाय से आता हूं जो भारत के आर्थिक चक्र को गतिमान रखने में सूक्ष्म योगदान देती है ।

लेकिन आजकल ऐसा वातावरण बनाए जा रहा है कि यह सब विशेषण एक गाली की लग रहे हैं ।

मैं अक्सर सोचता था कि सारे बड़े बिलेनियर या बड़ी बडी कंपनी अमेरिका में क्यों होती हैं जैसे गूगल , माइक्रोसॉफ्ट , एप्पल , फेसबुक , अमेजॉन , टेसला , वॉलमार्ट , बर्क शायर हेथवे , डोमिनोज , मैकडोनाल्ड , पिज़्ज़ा हट , KFC , एडोब , डेल , IBM , हेवलेट पेकर्ड, ऑरेकल , कोग्निजेंट, फोर्ड , जनरल मोटर्स , जे पी मोर्गेंन, सिटी ग्रुप , अमेरिकन एक्सप्रेस , पे पाल , नाइके , फायजर आदि आदि ।
 
इसका कारण यह था कि वहां पर एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दिया जाता है जबकि हमारे देश में बच्चों को शुरू से ही यह सिखाया जाता है कि तुम्हारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करना है ।

व्यापारी या लाला की छवि सदैव एक लालची व्यक्ति की बनायी गई है ।

आज भी अंबानी अदानी जैसे उद्योगपति इतना टैक्स भरने के बावजूद और इतने लोगों को रोजगार देने के बावजूद कुछ लोगों के निशाने पर बने रहते हैं और गाली खाते रहते हैं ।

जहां तक बाबा रामदेव की बात है तो चूंकि उनकी कर्मभूमि उत्तराखंड है ,इस लिये मैं इस बात को अच्छी तरह से जानता हूं कि हरिद्वार में हजारों घरों का चूल्हा बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि के कारण चलता है ।
बाबा की कंपनी में हजारों कर्मचारी हैं जिनका वेतन उनकी योग्यता के अनुसार ₹10000 से लेकर लाखों रुपए महीने तक है ।
 
उन सब कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा लोकल मार्केट मे जाता है जिस से अर्थिक चक्र चलता रहता है और समाज मे खुश हाली बनी रहती है ।
फिर उस से इतनी चिड क्यों ।

------ गोविन्द अग्रवाल जी

MAHARAJA AGRASEN JI - अग्रसेन जी के १८ सिद्धांत

MAHARAJA AGRASEN JI - अग्रसेन जी के १८ सिद्धांत 



PIYUSH GOYAL - राज्यसभा में संसदीय दल के नेता

 PIYUSH GOYAL - राज्यसभा में संसदीय दल के नेता 



Thursday, July 1, 2021

KUNAL GUPTA - A YOUNG ENTERPRENEUR

KUNAL GUPTA - A YOUNG ENTERPRENEUR

पुणे के कुनाल ने दोस्तों के साथ 2 साल पहले शुरू किया ई-बाइक्स का बिजनेस, आज देश-विदेश से 70 करोड़ रु. का टर्नओवर


पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं, इस कहावत को सार्थक कर दिखाया पुणे के कुनाल गुप्ता ने। उन्होंने साल 2014 में अपने मास्टर्स के दौरान अपना पहला स्टार्टअप शुरू किया। जिसकी सफलता के बाद उन्होंने 2020 में ई-बाइक्स का बिजनेस शुरू किया और भारत की एकमात्र डुअल सस्पेंशन ई-बाइक बनाई। अपने फील्ड से जुड़े दोस्तों के साथ कुनाल इस बिजनेस को शुरू कर न सिर्फ प्रदूषण से जुड़ी परेशानियों का समाधान निकाल रहे हैं बल्कि करोड़ों का बिजनेस भी कर रहे हैं।


कुनाल ने 2014 में सबसे पहला बतौर एक्सपेरिमेंट एक स्टार्टअप शुरू किया। इस बिजनेस ने थोड़े ही समय में मार्केट में अपनी जगह बना ली और कंपनी जल्द ही ढाई सौ करोड़ के वैल्यूएशन पर पहुंच गई। कुनाल इस कंपनी के सीईओ बने और साल 2019 में एक नामी कंपनी ने इस स्टार्टअप को हायर कर लिया।

इसकी सक्सेस के बाद कुनाल एक बार फिर कुछ नया करने को तैयार थे। उन्होंने इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़ी चीजों के बारे में रिसर्च की। जिसके बाद साल 2020 में पुणे से शुरुआत हुई ई-साइकिल स्टार्टअप ‘ई-मोटोरैड’ की। जिसके जरिए कुनाल और उनके तीन पार्टनर राजीव गंगोपाध्याय, आदित्य ओझा, सुमेध बाटेवर भारत समेत 72 से ज्यादा देशों के लिए किफायती ई- साइकिल बना रहे हैं।

4 अलग-अलग फील्ड के दोस्त प्रोडक्ट के लिए हुए एक

कुनाल की बिजनेस और फाइनेंस में दिलचस्पी रही है। ऐसे ही कंपनी के को-फाउंडर आदित्य मार्केटिंग, राजीव इंटरनेशनल सेल्स और सुमित बिजनेस डेवलपमेंट देखते हैं। राजीव और कुनाल की दोस्ती एक प्रोजेक्ट के दौरान हुई। वहीं ई-मोटोरैड के तीसरे फाउंडर आदित्य से कुनाल की दोस्ती मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान हुई थी। उनके चौथे और आखिरी को-फाउंडर सुमित वैंडर रह चुके हैं। एक असाइनमेंट के दौरान दोनों की मुलाकात हुई। धीरे-धीरे एक दूसरे का काम समझा और आज वो कंपनी के को- फाउंडर हैं। चारों की खूबियां मिली और शुरुआत हुई ई-मोटोरैड की।


कुनाल के मुताबिक उनके पास भारत के साथ-साथ दुनिया के 72 देशों में 110 डीलर हैं।

पहले विदेश, फिर देश में शुरू किया बिजनेस

कुनाल बताते हैं कि ‘यूएस और यूरोप में लोगों को ई-बाइक्स के बारे में काफी जानकारी है। हम भारतीय को भी इस बारे में जागरूक करना चाहते थे, जिससे देश में बढ़ते प्रदूषण को कम किया जा सके। हम टू व्हीलर के हब रहे इंडिया को अब ई- बाइक्स का भी हब बनाना चाहते थे। यहीं से शुरुआत हुई ई-मोटोरैड की। इसका आइडिया सबसे पहले हमारे को-फाउंडर और इंटरनेशनल सेल्स के जानकार राजीव को आया। उन्होंने यूरोप, यूएस, चाइना जैसे डेवलप देशों में इस्तेमाल हो रही ई-बाइक्स के बारे में जानकारी जुटाई।’

अपने रिसर्च वर्क का जिक्र करते हुए कुनाल बताते हैं कि ‘जब टीम ने इंडियन मार्केट पर रिसर्च शुरू की तो हमारे सामने टू-व्हीलर की एक अलग तस्वीर बनी। हीरो हॉन्डा, बजाज जैसे ब्रांड्स ने पूरी दुनिया में भारत की टू-व्हीलर के लिए एक अलग पहचान बना दी है। इन्हीं से प्रेरणा लेकर हमने निर्णय किया कि हम भारत में ई-मोटर्स का एक बड़ा ब्रांड खड़ा करेंगे जो पूरी दुनिया तक ई-व्हीकल पहुंचाएगा। इसी के चलते हमने हेड ऑफिस भारत में रखा है, जहां से विदेश में बैठी सभी टीमों को ऑपरेट किया जाता है।

ई-व्हीकल की ओर बढ़ता सरकारों का रुझान

ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के एक्सपर्ट बाइक्स का भविष्य इलेक्ट्रिक बाइक्स के रूप में देखते हैं। कई देश की सरकारें इलेक्ट्रिक बाइक्स और कार को इस इंडस्ट्री का भविष्य मानते हुए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसके पीछे छिपी एक बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज है। कुनाल बताते हैं कि ‘हमारे पास अभी 72 देशों में 110 डीलर हैं। विदेश की बात करें तो यूएस और यूरोप और भारत की बात करें तो दिल्ली, मुंबई और चेन्नई से सबसे ज्यादा लोग ई-बाइक्स में दिलचस्पी दिखाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम से कम करना होगा।'

कुनाल की टीम ने इस तरह से ई बाइक्स की डिजाइनिंग की है ताकि महिलाएं भी आसानी से उसका इस्तेमाल कर सकें।

भारत के लिए 28 में से चुने सिर्फ 4 प्रोडक्ट

कुनाल बताते हैं कि ‘हमने अपने स्टार्टअप की सेल्स और सप्लाई मार्केट के साथ शुरुआत की। बिजनेस इस्टैब्लिश होते ही हमने ई-बाइक्स मैन्युफैक्चर करना शुरू किया। भारत में हमारी 48 लोगों की टीम है जो हर देश के बारे में रिसर्च करती है जिसके बाद देश के मुताबिक ऑर्डर प्लेस किए जाते हैं।’

अपने 4 खास प्रोडक्ट का जिक्र करते हुए कुनाल कहते हैं कि भारत विविधता वाला देश है। यहां समुद्र से लेकर पहाड़, ग्लेशियर, बीच, रेगिस्तान आपको सब कुछ मिल जाएगा। इतनी अलग-अलग चीजों को एक धागे में पिरोने वाले भारत का एक प्रोडक्ट से काम नहीं चल पाता। इसलिए हमने भारत के लिए 28 तरह के अलग-अलग प्रोडक्ट डिजाइन करवा कर टेस्ट किए। इनमें से क्लाइमेट और जमीन की क्वालिटी के हिसाब से सिर्फ 4 ई-व्हीकल्स को ही फाइनल किया गया। हर प्रदेश, जिले, शहर में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग डिमांड होती है। हम हर इलाके के अनुसार अपने प्रोडक्ट को डिजाइन करते हैं। ऑफिस वर्कर से लेकर, ट्रैकर और डिलीवरी बॉय के हिसाब से ई-बाइक्स को डिजाइन किया गया है। फिलहाल हमारी 2000 से ज्यादा ई-बाइक्स भारतीय रोड पर दौड़ रही हैं।

भारत के लिए खास हैं ये 4 ई-बाइक्स

भारत के इलाकों और अलग-अलग इकोनॉमिक क्लास देखते हुए कंपनी ने देश में 4 तरह की ई-बाइक्स लॉन्च की है।

ईएमएक्स - ये भारत की एकमात्र डुअल-सस्पेंशन ई-बाइक है। बाइक और कार में सस्पेंशन दोनों तरफ होता है लेकिन साइकिल में ऐसा नहीं होता। जिससे ये चलाते समय काफी अनकंफर्टेबल हो जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए ईएमएक्स में डुअल-सस्पेंशन दिया गया है, जिससे यह भारतीय इलाकों में आराम से चल सके।

स्पीड - 25 किलोमीटर प्रति घंटा
रेंज - एक चार्ज में 50+ किलोमीटर
मोटर- 250 वोल्ट
कीमत- 54,990 रुपए


इस ई-बाइक को टियर 2 और टियर 3 शहरों के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी स्पीड 25 किमी. प्रतिघंटा है।

टीरेक्स - इस ई-बाइक को टियर 2 और टियर 3 शहरों के लिए डिजाइन किया गया है। कीमत को भी बाकी प्रोडक्ट के मुकाबले थोड़ा कम रखा गया है। कुनाल बताते हैं, ‘देश की 6% महिला साइकिल चलाती हैं। हमने इसलिए टीरेक्स की हाइट महिलाओं के कंफर्ट के हिसाब से थोड़ी कम रखी है। सिर्फ इतना ही नहीं इसमें आगे की तरफ एक स्टिक लगाई गई है जिससे इसे कंट्रोल करना आसान हो जाता है। खास बात ये है कि इसे महिलाएं साड़ी पहनकर भी आसानी से चला सकती हैं।

स्पीड - 25 किलोमीटर प्रति घंटा
रेंज - 35+ किलोमीटर (पैडल असिस्ट के साथ 60+)
बैटरी- 35 वोल्ट
कीमत- 38,990 रुपए

डूडल - ये एक लग्जरी आइटम है। इसके टायर को मोटा रखा गया है जिससे इसे फार्म हाउस, ट्रेकिंग पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

स्पीड - 25 किलोमीटर प्रति घंटा
रेंज - 40+ किलोमीटर (पैडल असिस्ट के साथ 60+)
बैटरी- 36 वोल्ट
कीमत- 75,990 रुपए


कुनाल और उनकी टीम ने बाइक और कार की तरह भारत की एकमात्र डुअल- सस्पेंशन ई-बाइक ईएमएक्स बनाई है।

कॉसमॉस - देश के 30 लाख लोग फूड से लेकर, कपड़े, कुरियर और ग्रॉसरी की घर-घर जाकर डिलीवरी करते हैं। इस तबके के लिए कॉसमॉस को डिजाइन किया गया है। जिससे ना सिर्फ वो अपनी इनकम का सही तरीके से इस्तेमाल कर सकेंगे बल्कि पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों से उनकी रोजी पर भी फर्क नहीं पड़ेगा।

कुनाल बताते हैं, ‘विदेश में लाल से लेकर पीले रंग के टायर इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि वहां के रोड भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर और साफ हैं। हमने भारतीय इलाकों को देखते हुए ई-बाइक्स के टायर का रंग काला और ब्राउंड रखा है। हम अपने ई-बाइक्स के जरिए भारत के लोगों को जागरूक करने के साथ ट्रैफिक के शोर-शराबे से भी दूर कर सकते हैं।’

कोरोना के बाद बिजनेस को मिला पॉजिटिव को रिस्पांस

कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा तो कई बिजनेस को बहुत नुकसान हुआ। लेकिन हेल्थ के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। कुनाल इस बारे में बताते हैं, ‘जहां कोरोना की वजह से लोगों के बिजनेस को बहुत नुकसान हो रहा था। वहीं हमारे बिजनेस को पॉजिटिव रिस्पांस मिला। महामारी के बाद लोगों की स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2020 में 16 करोड़ साइकिल खरीदी गईं वहीं इससे पहले हर साल सिर्फ 6 करोड़ साइकिल खरीदी जाती थीं। कोरोना से साइकिल और ई-बाइक्स के बिजनेस को बहुत फायदा हुआ है।

कुनाल और उनके पार्टनर ने अपने सेविंग्स के साथ इस बिजनेस की शुरुआत की थी। वो इस स्टार्टअप में अभी तक 18 करोड़ रुपए इन्वेस्ट कर चुके हैं जिसका अब टर्नओवर सालाना 70 करोड़ रुपए है। अब उनकी टीम कनेक्टेड बाइक पर काम कर रही है। जिन्हें फोन से कनेक्ट किया जा सकेगा और साथ ही चोरी होने पर भी आसानी से ट्रैक किया जा सकेगा। साथ ही वो ई-बाइक्स के बाद भारत में ई-व्हीकल पर भी काम करने की तैयारी में हैं।

MUKUL GOYAL IPS - NEW DG OF UP POLICE

MUKUL GOYAL IPS - NEW DG OF UP POLICE

मुज़फ्फरनगर व शामली के रहने वाले है मुकुल गोयल, नगर की भारतीय कोलोनी में मुकुल गोयल जी का निवास.  


आईपीएस मुकुल गोयल उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक पद नियुक्त हो गए हैं। उनके डीजीपी बनने की सूचना से शामली का सीना गर्व से फूल गया। दरअसल, मुकुल गोयल मूल रूप से शामली के रहने वाले हैं।

वहीं बुधवार को शामली में यह खबर सुनते ही कि मुकुल गोयल को पुलिस विभाग के मुखिया पद पर नियुक्त किया गया है। इससे उनके परिवार सहित पूरे शहर में खुशी और जश्न का माहौल हो गया। परिवार में मिठाई बांटकर खुशी मनाई गई। लोगों का कहना था कि शामली के लाल ने प्रदेश में जिले का नाम ऊंचा किया है। आईपीएस मुकुल गोयल की पैदाइश शामली की है। शामली के मोहल्ला लाजपतराय शिवमूर्ति निवासी स्व. महेंद्र कुमार गोयल के पुत्र मुकुल गोयल का जन्म दो फरवरी 1964 को शामली में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा शामली में हुई। यहां की गलियों में उनका बचपन बीता। उनके पिता झारखंड के धनबाद जिले में किसी कंपनी में इंजीनियर थे। इसलिए उनकी शिक्षा धनबाद और उसके बाद जयपुर में हुई। दिल्ली से उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की।

बताया गया कि मुकुल गोयल इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक हैं, साथ ही उन्होंने एमबीए की शिक्षा प्राप्त की। 1987 बैच के आईपीएस मुकुल गोयल 1991 में सीनियर स्केल प्राप्त कर एसएसपी बने। इसके बाद वर्ष 2004 में डीआईजी पद पर प्रोन्नत हुए और 2008 में आईजी बने। उनके डीजीपी पद पर आसीन होने की सूचना से शामली में खुशी का माहौल बन गया था।

मुकुल गोयल के चाचा अरुण गोयल ने बताया कि जब उन्हें डीजीपी बनने की सूचना मिली तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। उन्होंने बताया कि उनके बाबा मनोहर बजाज के नाम से पूरे परिवार को जाना जाता है। चाची पूनम गोयल व भाभी मीनू गोयल ने कहा कि मुकुल गोयल बहुत सरल स्वभाव के हैं और शुरू से ही होनहार हैं।

चचेरे भाई विकास गोयल ने बताया कि उनके डीजीपी बनने की सूचना पर बहुत खुशी हुई लेकिन, कुछ देर बाद पता चला कि अभी डीजीपी पद के लिए नाम की घोषणा नहीं हुई है। उनका कहना है कि इस खुशी के लिए परिवार को इंतजार कर रहा था। शाम को उनके डीजीपी बनाए जाने की खबर से परिवार खुशी से झूम उठा। मुकुल गोयल के भाई हितेश गोयल दिल्ली में सरकारी विभाग में उच्च पद पर कार्यरत हैं।

परिवार से रखते हैं पूरा लगाव

आईपीएस मुकुल गोयल के चाचा अरुण गोयल, अशोक गोयल और राकेश कुमार की शिव चौक पर कपड़े की दुकान है। अरुण गोयल ने बताया कि मुकुल गोयल का परिवार से पूरा लगाव रहता है। परिवार में होने वाले कार्यक्रम में वह शामिल होते रहते हैं। 2017 में भतीजे वैभव की शादी में शामली आए थे। वे बताते हैं कि शामली आने के दौरान वह अक्सर दुकान पर आते हैं।

मेरठ में 16 महीने एसएसपी रहे मुकुल गोयल

1987 बेंच के आईपीएस मुकुल गोयल मेरठ में 16 महीने एसएसपी रहे। इस दौरान इनका कार्यकाल बेहतर रहा और उन्होंने कई सराहनीय कार्य भी किए। बताया गया कि अपने बेहतर कुशल व्यवहार के चलते मेरठ के कई लोग आज भी मुकुल गोयल से जुड़े हुए हैं। उनके साथ पुरानी कुछ फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर भी किया गया। मुकुल गोयल मेरठ में पांच मई 2002 से 24 सितंबर 2003 तक एसएसपी मेरठ रहे।

उत्तर प्रदेशयूपी डीजीपी मुकुल गोयल ने मेरठ में बनाया था ताबड़तोड़ एनकाउंटर का रिकाॅर्ड

यूपी के नए डीजीपी आईपीएस मुकुल गोयल जितने शांत और सरल स्वभाव के हैं, अपराधियों पर उतने ही सख्त हैं। मेरठ में तैनाती के दौरान इन्होंने अपराधियों की कमर तोड़ दी थी। ताबड़तोड़ 24 से ज्यादा एनकाउंटर का रिकार्ड भी बनाया था। राजस्थान के अपराधी का सदर बाजार में एनकाउंटर कर दिया था और उसके पास से एके-47 बरामद की गई थी। इसके बाद वह चर्चाओं में आ गए थे। इसके अलावा दरोगा की हत्या के आरोपी और दो लाख के ईनामी बदमाश को भी मुठभेड़ में गिरफ्तार किया था।

आईपीएस मुकुल गोयल की मेरठ में तैनाती के समय राजस्थान के भरतपुर का अपराधी पुष्पेंद्र जाट मेरठ में आया था। पुलिस के पास इनपुट था कि किसी बड़े व्यक्ति की हत्या की प्लानिंग की गई है। दिल्ली पुलिस ने कुछ जानकारी मेरठ के एसएसपी मुकुल गोयल से साझा की थी और एक टीम को मेरठ के लिए रवाना भी किया गया था। इसी इनपुट के बाद पुष्पेंद्र जाट को घेर लिया गया था और सदर चाट बाजार में एनकाउंटर किया गया था। एनकाउंटर में पुष्पेंद्र की मौत हो गई थी और उसके पास से पुलिस को एके-47 मिली थी। पुष्पेंद्र जाट दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और यूपी में 37 से ज्यादा संगीन मामलों में आरोपी और वांटेड था। उस समय पुष्पेंद्र जाट के सिर पर 50 हजार रुपये का ईनाम था।

धर्मा गैंग के शूटर को किया था गिरफ्तार

आईपीएस मुकुल गोयल के मेरठ एसएसपी रहने के दौरान दूसरा चर्चित मामला अपराधी विजय उर्फ बबलू की गिरफ्तारी का था। विजय धर्मा गैंग का शार्प शूटर था और उस पर दरोगा की हत्या का आरोप था। पुलिस विभाग की ओर से दो लाख रुपये का ईनाम घोषित किया गया था। आरोपी को मेरठ में आईपीएस मुकुल गोयल की टीम ने गिरफ्तार किया था। मेरठ में ही एक चर्चित एनकाउंटर में आईपीएस मुकुल गोयल ने दौराला के बदमाश चमन और सुभाष ताऊ को ढेर किया था। चमन और वतन दोनों भाई थे और शातिर बदमाश थे। लोगों से वसूली और रंगदारी मांगना इनका धंधा था। चमन और सुभाष को एनकाउंटर में पुलिस ने मार गिराया था।

बावरियों का किया था एनकाउंटर

मेरठ के टीपीनगर में बावरियों ने तीन लोगों की हत्या कर दी थी। इस मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी और एनकाउंटर की कार्रवाई मुकुल गोयल की टीम ने की थी। इसके बाद पूरे गिरोह की धरपकड़ की गई थी। इसके बाद उनके कार्यकाल में कोई वारदात बावरियों ने नहीं की।

जब पथराव में हुए थे घायल

लिसाड़ी गेट में अंसारी एवं कुरैशी बिरादरी के बीच जमकर बवाल हुआ था। इसमें कई स्थानों का पुलिस फोर्स और पीएसी को लेकर आईपीएस मुकुल गोयल उतर आए थे और मोर्चा लिया था। इस दौरान उन्हें पत्थर लगा था। घंटों तक बवाल हुआ, लेकिन मुकुल गोयल ने मोर्चा नहीं छोड़ा। उनके साथ उस समय के इंस्पेक्टर सदर बाजार सीपी सिंह और दरोगा राजेंद्र सिंह भी डटे रहे। लापरवाही को लेकर लिसाड़ी गेट थाना प्रभारी पर कार्रवाई की और चार्ज राजेंद्र सिंह को दे दिया था। इसी मामले में तत्कालीन डीआईजी ने एसएसपी के खिलाफ रिपोर्ट शासन को भेजी थी, जिसे लेकर पुलिस टीम एसएसपी के साथ आ गई थी।

साभार: अमरउजाला व हिन्दुस्तान 

ANJALI GOYAL - अंजली गोयल ने संभाला डीरेका के महाप्रबंधक का कार्यभार, 1985 बैच की हैं आईआरएएस

ANJALI GOYAL - अंजली गोयल ने संभाला डीरेका के महाप्रबंधक का कार्यभार, 1985 बैच की हैं आईआरएएस


वाराणसी के डीजल रेल इंजन कारखाना (डीरेका) महाप्रबंधक का कार्यभार बुधवार को अंजली गोयल ने ग्रहण कर लिया। इसके पूर्व वह रेलवे बोर्ड नई दिल्ली में प्रधान कार्यकारी निदेशक व लेखा के पद पर कार्यरत थीं।

1985 बैच की भारतीय रेल लेखा सेवा (आईआरएएस) अधिकारी अंजली गोयल ने श्रीराम कॉलेज, दिल्ली से अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से एडवांस इकोनोमिक्स में मास्टर डिग्री प्राप्त की।

मंडल रेल प्रबंधक जयपुर व रेलवे बोर्ड में कार्यकारी निदेशक फाइनेंस (बजट) कार्यकारी निदेशक फाइनेंस (स्थापना) सहित अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहकर कार्य किया है। वहीं प्रतिनियुक्ति पर नीति आयोग में एडवाइजर व केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण विभाग में डायरेक्टर फाइनेंस के पदों पर भी रह चुकी हैं। इसके अलावा कई लेख भी विभिन्न विषयों जैसे हाई स्पीड रेलवे इन इंडिया, स्टे नेबल डेवलपमेंट ऑफ रेलवे एवं जनरल बजटिंग पर प्रकाशित कर चुकी हैं।

Source - Amar Ujala